उनका नाम ही दरियादिल हो जाता-कविता

अपने दिल का बयां कभी कभी

दूसरे के अल्फाजों में नजर आता है

वह दिल को छू जाता है

इसलिए कहते हैं

दर्द और खुशी दोनो ही

बांट लिया करो दोस्तों से
 
जश्न का मौका हो तो

मजा हो जाता दुगुना

गम आधा रह जाता है

खोये रहोगे अपने ही दिल में

तो रोशनी कहीं से नहीं आयेगी

जो सुनोगे किसी और की आवाज

तभी कोई मिलेगा आसरा

वरना कहते हैं कि

अकेला चना कभी भाड़ नहीं फोड़ पाता है

अपने लिये तो जिंदा हैं सब

बांटकर खाते हैं जो लोगों से मिलकर

उनका नाम ही दरियादिल हो जाता है
……………………….

इस ब्लाग (पत्रिका) की पाठक संख्या बीस हजार के पार

12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर चुके इस ब्लाग ने कल बीस हजार की पाठक संख्या को पार कर लिया। इस संख्या को पार करने वाला यह मेरा  दूसरा ब्लाग है।
इस ब्लाग के साथ मेरी दिलचस्प याद जुड़ी हुई है। ब्लागस्पाट पर टाईप करते हुए यूनिकोड में अपनी पहली पोस्ट छोटी कविता के रूप  में इसी पर रखी-क्योंकि मुझे उसमें बड़ी पोस्ट लिखने में दिक्कत आ रही थी-और सबसे पहला कमेंट भी इस पर आया। उससे पहले मैंने सभी तीनों ब्लाग पर कृतिदेव की पोस्ट रखी थी और मैं मानकर चल रहा था कि अब उसी से आगे जाना है। जब कुछ ब्लाग  लेखक उन ब्लाग पर मुझसे यूनिकोड में लिखने को कह रहे थे तो भी मैं उसकी परवाह नहीं कर रहा था। ऐसे में कोई महिला ब्लाग लेखिका (जिससे  बाद में  फिर संपर्क नहीं हो सका) ने मुझे इस  बारे में ईमेल भेजकर रोमन हिंदी में लिख रही थी कि मेरे ब्लाग पढ़ने मेंे नही आ रहे तब मैंने उसे इस ब्लाग का पता दिया। उसने लिखा-‘वहां तो सब पढ़ने में आ रहा है। वाह,वाह बढ़िया  । मगर उसने कोई कमेंट इस पर नहीं लिखी। हां, मैने तब यूनिकोड में लिखने का निर्णय लिया।

नारद पर उसी समय इसे पंजीकृत नहीं कराया पर ब्लागवाणी के अभ्युदय के साथ ही दोनों जगह इसे पहुंचाया और हिंदी ब्लाग पर तो यह पहले से ही था। यह मेरा ऐसा ब्लाग रहा है जो बिना फोरम पर दिखे भी वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर नंबर एक पर आया था। फोरमों पर दिखने से पहले ही यह ब्लाग अपने लिये तीन  हजार पाठक जुटा चुका था। तब अनुभव की कमी के कारण मुझे समझ में कुछ नहीं आता था पर बाद में यह बात समझ में आयी कि ब्लाग का मार्ग फोरमों से आगे भी जाता है। ब्लाग की डालरों में बताने वाली वेब साईट के मुताबिक यह मेरा सबसे महंगा ब्लाग है। हालांकि फिर भी यह अन्य ब्लाग लेखकों के ब्लाग के मुकाबले बहुत सस्ता है पर फिर भी मैं इससे संतुष्ट हूं। मुझे इस ब्लाग से एक ही संदेश मिलता है‘डटे रहो, तुम जिस रास्ते पर चल रहे हो उससे विचलित नहीं हो’। जिस तरह से पिछले पंद्रह दिन से यह ब्लाग व्यूज ले रहा था उससे मुझे लग रहा था कि  आज शाम तक यह जादूई आंकड़ा पार करेगा पर कल इसने अपने पुराने तेवर दिखाये जब मैं इस पर पोस्ट डालने लगा तो उसी समय यह इस आंकड़े को पार करने की तैयारी में लग रहा  था और आज तो यह उससे भी आगे जा रहा है।

नीचे इस ब्लाग की प्रथम बीस पोस्ट जिन्हें अधिक पाठकों ने देखा और विभिन्न फोरमों से मिलने वाले व्यूज की संख्या। यह स्पष्ट संदेश कि अध्यात्म और व्यंग्य पर ही मुझे लिखते रहना चाहिए। अपने ब्लाग लेखक मित्रों, पाठकों और समय समय पर तकनीकी विषय पर सहायता देने वाले मित्रों का मैं हृदय से आभारी रहूंगा। दूसरों को बहुत लघु लगने वाली यह उपलब्धि मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है।

प्रथम बीस पोस्ट

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रहीम के दोहे:सुख में अंहकार दु:ख में कुं 244 
चाणक्य नीति:विद्या की शोभा उसकी सिद्धि  205 
मेरा परिचय=दीपक भारतदीप, ग्वालियर  202 
चाणक्य नीति:परोपकार मधुमक्खी से सीखें  175 
पहले आतंकवाद आया कि पर्यावरण प्रदूषण  175 
रहीम के दोहे:जहाँ उम्मीद हो वहीं जाएं  146 
रहीम के दोहे:मछली का जल प्रेम प्रशंसनीय  142 
चाणक्य नीति: कुत्ते और कौवे से गुण ग्रहण 126 
चतुराई से मुट्ठी में कर लो-हास्य कविता  123 
चलना ज़रा संभल कर-हास्य कविता  119 
आज नवमी-भक्तों के रक्षक हैं भगवान् श्रीर 117 
रहीम के दोहे:परिश्रम कर भोजन ग्रहण करें  115 
चाणक्य नीति:पांच वस्तुओं का संग्रह अवश्य 115 
चाणक्य नीति:बेमौसम राग अलापना हास्यास्पद 115 
दादा-पोते की राजनीति और मनोरंजन  112 
मन के बहरों के आगे क्या बीन बजाना  111 
चाणक्य नीति:क्रोध उतना ही करें जितना निभ 104 
दिल हुआ इधर से उधर  103 
असल पर नक़ल का राज  101 
चाणक्य नीति:प्रेम और व्यवहार बराबरी वाले १००
चाणक्य नीति:मनुष्य को हर विधा में पारंगत 100

Referrer Views (पाठकों के आने के मार्ग)

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blogvani.com 718
narad.akshargram.com 369
hi.wordpress.com/tag/%E0%A4%9A%E0%A4%… 223
filmyblogs.com/hindi.jsp 187
botd.wordpress.com 165
chitthajagat.in 151
 

दर्द की बजाय लिखना पसंद है संघर्ष पर

अंतर्र्जाल पर मैं लिखता हूं इसका अर्थ यह कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि मै किसी उच्च मध्यम परिवार से हूं। सत्य तो यह है कि मेरा जन्म निम्न मध्यम वर्ग में हुआ और बोर्ड की परीक्षा के बाद भी मैंने मजदूरी की और ठेला चलाया। जिस दुकान पर मैं नौकरी करता था वह थोक की दुकान थी और सामान दूसरी दुकान पर पहुंचाने के लिये मुझे कई बार ठेला चलाना पड़ता था। यह बात मैने अपने पिताजी से भी छिपाई थी। कई बार मेरे पैरों में कीलें घुसकर खून निकाल चुकीं हैं। अपने उस नौकरी के दौरान भी दोपहर जब मैं घर पर आता था तो लिखता था-उसमें कोई पीड़ा नहीं बल्कि जीवन के प्रति आशावाद होता था। आज नहीं तो कल मेरा होगा-यह विश्वास मेरे जीवन की अनमोल पूंजी रहा है।

मैं आजकल आपने काम पर स्कूटर पर जाता हूं पर मेरा साइकिल से अभी भी नाता हैं। मेरा काम भी अब शारीरिक श्रम करने का नहीं है पर फिर मैं उसमें कोई अपनी तरफ से नहीं रखता। शारीरिक श्रम करने वाले को बेचारा या गरीब कहना शायद कुछ लोगों को सहज लगता है पर मुझे नहीं। इसलिये जो लोग गरीब के दर्द पर कहानियां या कविताएं लिखकर वाह’-वाह जुटाते हैं उनमें मेरी रुचि नहीं रही। इस देश में परिश्रम करने वालों की कमी नहीं है पर वह भी ऐसे दर्द भरी रचनाओं को पसंद नहीं करते। हां, एसी कमरों तथा होटलों के भोजन करने वालों को एकांत में बैठकर उनके हृदय में ऐसी संवेदनशील रचनाएं दर्द का रस पैदा करतीं हैं तो वह खुश हो जाते हैं। दर्द भी एक रस है और जिनके पास सब कुछ है पर दर्द नहीं है वह इस रस से वंचित रहते हैं और इसी कारण उनको गरीबों के दर्द पर बनीं फिल्में और रचनाएं पसंद आती हैं। हमारे देश के कुछ विख्यात फिल्मकार और लेखक इसी दर्द के सहारे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुके हैं पर उनको यहां कोई पूछता भी नहीं था। हां, जब उनको इस देश से बाहर ख्याति मिली तो यहां भी उनको पुरस्कारों प्रदान किये गये पर आम आदमी भावनात्मक रूप से कभी उनसे नहीं जुड़ा।

मैने एक मजदूर के रूप में देखा है मुझे रोटी या सहानुभूति की नहीं सम्मान और प्यार की आवश्यकता होती है और ऐसे में और लोगों की बात क्या करें अपने भी पीछे हट जाते हैं। अपने जीवन में हर चीज अपने परिश्रम से बनाते हुए मैंने एक बात देखी है कि गरीब और मजदूर के दर्द और भावनाओं पर कुछ लोग व्यापार करते हैं। भले ही उनको पैसा अधिक नहीं मिलता पर सम्मान और नाम उन्होंने खूब कमाया। किसी गरीब मजदूर के बीमार होने पर उस पर कुछ असली तो कुछ नकली कथा लिखकर लोगों को दर्द का रस बेचा।
मैं अपनी कविताओं और कविताओं के हमेशा संघर्ष के भाव इसलिये स्थापित कर पाता हूं क्योंकि मेरा यह अनुभव रहा है कि परिश्रम करने से आत्मविश्वास बढ़ता है। इस देश में गरीब और मजदूर के कल्याण के नारे लगाने वाले बुद्धिजीवियों का लंबे समय तक वर्चस्व रहा है और उन्होंने शैक्षणिक तथा सामाजिक संस्थानों इस तरह घुसपैठ कर ली कि उनके ढांचे से बने समाज में लोग आज भी दर्द के रस में प्रफुल्लित होना चाहते हैं-उनमें आत्मविश्वास की कमी है क्योंकि वह परिश्रम नहीं करते और इसलिये दर्द का रस उनमे पैदा ही नहीं होता। जिनके पास धन की कमी है उन्हें जीवित रहने के लिये संघर्ष करना पड़ता है और बीमारी और अन्य सामाजिक संकटों में भी उसे कोई संवेदना न तो कोई देता है न वह चाहता है। वह थोड़ा सम्मान और प्रेम चाहता है और वह कोई नहीं देता।

मेरी पत्नी कई बार ठेला वालों से सामान खरीदते समय मोलभाव करती है तो मैं उसे मना करते हुए कहता हूं कि-‘यह मेहनत कर रहा है तो समाज पर उसे उपकार ही समझो क्योंकि अगर वह ऐसा न करता तो पेट पालने के लिये अपराध भी कर सकता है।’

यह मेरे अंदर मौजूद कोई दर्द नहीं है बल्कि यह अपने जीवन संघर्ष के अनुभव से मिला एक यथार्थ है। अपने जीवन के संघर्ष में मैंने इस बात का अनुभव किया है कि अधिकतर लोग परिश्रम इसलिये करते हैं कि उनका सम्मान किसी के पैरो के तले कुचला न जाये। मैं यह दावा भी नहीं करता कि मैं परिश्रम करने वालों के प्रति मै बहुत संवेदनशील हैं क्योंकि इसका अर्थ यह है कि उनके श्रम को कम कर देखना।
मै आजकल इतना शारीरिक श्रम नहीं करता। जब मैं जमकर शारीरिक श्रम करता था तब भी मै हास्य व्यंग्य लिखता था और जब भी कभी पसीना नहा जाता हूं तब भी मुझे वैसा ही लिखने में मजा आता है। इसलिये जिन लेखकों को यह भ्रम हो कि वह दर्द पर लिखकर लोकप्रियता अर्जित करेंगे उन्हें इस भ्रम का निवारण कर लेना चाहिए। इस देश के परिश्रम करने वाला भी वैसा ही अच्छा पढ़ना चाहता है जैसा कभी कभी कुर्सियों पर काम करने वाले लोग-जो दर्द की फिल्म देखकर या रचना पढ़कर उसके रस से प्रफुल्लित हो जाते है-कभी पढ़ने को इच्छुक होते हैं। इसलिये मुझे दर्द की बजाय संघर्ष पर लिखना पसंद है।

अच्छा हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य

श्रीमतीजी ने रात को पूछा-‘‘क्या खाना खाओगे?’’
हमने कहा-‘‘हम रात को कहां खाते हैं?तुम दूध का एक कप ले आओ तो उसके साथ एक छोटा टोस्ट खाकर सो जायेंगे। वैसे तुमने यह पूछा क्यों?’
कहने लगीं-‘तुम अभी कुछ खाने पर लिख रहे थे। मैने देखा तो सोचा कि शायद तुम्हें भूख लग जाये। जब रात को खाना नहीं खाते तो उस पर लिखते क्यों हो?’
मैने कहा-‘अपने लिये तो लिखते नहीं है जो यह सोचें। पढ़ने वाले तो रात को खाते होंगे न! फिर कितनी गंभीर बात है कि अपने देश के लोगों पर अधिक खाने का आरोप लग रहा है तो यह समझाना जरूरी है कि ऐसी कोई बात नहीं है।’
हमारी श्रीमती जी बोली-‘‘लगाने वाला भी तुम जैसा कोई आदमी रहा होगा। सारी दुनियां से कहते हो कि एक समय खाना खाता हूं पर तुम रात को घर आते ही चाय के साथ  दो से चार बिस्कुट  खाते हो और रात को दूध के कप के साथ एक दो टोस्ट उदरस्थ कर जाते हो। यह खाना नहीं तो और क्या है? और लोगों से कहते हो कि एक समय खाता हूं।’

हमने कहा-‘‘तो क्या लोगों का बताता फिरूं कि मैं यह खाता हूं और वह खाता हूं। यह तो तय बात है कि रात को हमारे घर पर खाना नहीं बनता।’’

हमारी श्रीमती जी चुप हो गयीं। सुबह ही एक सज्जन आये और बोले-‘‘देखो यार, अपने देश के  बाहर के लोग क्या कह रहे हैं  भारत के लोग अधिक खाते हैं इसलिये दुनियां में खाद्यान्न का संकट है। अब बताओ, इस देश के लोग गरीब थे तो झंडे और डंडे लेकर इस देश पर विचाराधाराओं के साथ हमला करते थे। सरकारीकरण खत्म करो उदारीकरण चलो। अब कह रहे हैं कि अधिक खाते हैं। अब क्या रोटी भी पेट भरकर  नहीं खायें?’

हमने कहा-‘‘भरपेट तो खाना नहीं चाहिए। जरूरत से एक रोटी कम खाना चाहिए।
वह सज्जन बोले-‘‘यार तुम जैसा तो कोई हो नहीं सकता कि एक समय खाना खाये।’
हमने कहा-‘‘हम आजकल शारीरिक मेहनत कम कर रहे हैं इसलिये कम खाते हैं।
हमारी श्रीमती उनसे परिचित थीं और उनसे बोलीं-‘‘कहां एक समय खाते हैं? रात को आते ही चाय के साथ बिस्किट और रात को दूध के कप के साथ टोस्ट जरूर खाते हैं। वह क्या खाने से कम है?’

हमने सोचा झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है और हमने कहा-‘हम कम कहते हैं कि नहीं लेते?’
वह सज्जन बोले-‘यह तो हम भी करते है पर फिर भी खाना खाते हैं। खाने के बाद दूध का ग्लास जरूर लेते हैं। हा, उसके साथ टोस्ट वगैरह नहीं लेते। भाभीजी, आप क्या समझ रही हो कि केवल आप लोग ही दूध पीते हैं। खाने के बाद हम दूध न पियें तो नींद ही नहीं आये।’
हमने कहा-‘पर आप खाने को लेकर इतने परेशान क्यों हो रहे हैं? आपके लड़के की शादी में आयेंगे तो जरूर हम भी जमकर खायेंगे जैसे दूसरे। ऐसी कोई कसम नहीं खा रखी कि रात को कभी नहीं खायेंगे। हां, जबसे योग साधना शूरू की है तब से रात को खाने की चिंता से मुक्त हो गये हैं पर आपको कभी यह नहीं कहेंगे कि रात का भोजन लेना छोड़ दें। कहने वाला कुछ भी कहता रहे।’

वह बोले-‘मुद्दे की बात यह है कि क्या वाकई हम बहुत खाते हैं?’
हमने कहा-‘‘अधिक मत सोचो? पहले ही तुम मधुमेह की शिकायत करते हो  और उसमें फायदा उन कंपनियों का ही होगा जो बाहर की हैं क्योंकि उनकी गोलियों से ही तुम खाना पचा पाते हो। हो सकता है कि योग साधना के प्रचार से  अब स्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही हो और उन पर ‘अधिक खाने’ के शगूफे से तनाव बढ़ाकर फिर उनको बीमार बनाया जाये यही इसके पीछे यही चाल हो सकती है।
वह सज्जन बोले-‘‘पर तुमने यह अभी तक नहीं बताया कि क्या हम भारतीय अधिक खाते हैं?’
हमने कहा-‘‘इस देश में एक सौ पांच करोड़ लोग रहते हैं। कहीं लोग गेंहूं अधिक खाते हैं तो कही चावल तो कहीं कुछ और। किसी के पास कोई पैमाना नहीं है। घर में चार एक आयु वर्ग के चार सदस्य होते हैं पर उनके खाने की मात्रा अलग-अलग होती है। अब कैसे कहें कि इस देश के लोग अधिक खाते हैं या कम।’
वह सज्जल बोले-‘हम तो पिछले दस साल से देख रहे हैं कि अपने घर में जितना गेंहूं आता है उससे अधिक कभी लेते नहीं है। बल्कि बाहर के खाने से उसकी खपत कम होती जा रही है। छोटे बच्चे तो तमाम तरह की चिप्स वगैरह खाकर पेट भरते हैं, पीजा, बर्गर और पैट्रीज खाकर पेट भरेंगे तो फिर घर में कहां खायेंगे?’
हमने कहा-‘फिर बाहर खाने से दूसरे लोगों को खाते दिखते हैं। पैसे की आवाजाही सड़क पर होने से बाहर के लोगों को दिख रही हैं इसलिये ऐसी बातें कर रहे हैं। उनको बाजार में खाने के स्थानों पर लोगों की भीड़ और पैसे का बहाव देखकर ऐसा  लगता है कि यह देश बहुत खाता है।’
वह सज्जन चिंता में पड़े रहे तो आखिर हमारी श्रीमती जी ने कहा-‘भाई साहब, इतनी चिंता में आप पड़े क्यों हैं? इस देश के लोग खाते हैं तो किसी से छीनकर थोड़े ही खाते हैं। किसी के खाने में नजर तो नहीं डालते। किसी को सुखी देखकर उससे छीनते तो नहीं हैं? किसी के घर पर जाकर लूटपाट तो नहीं करते। आप यह बताईये हम आपके घर रात के खाने पर कब आयें? आप तो भाभीजी और बच्चों को लेकर कभी खाने पर लेकर  आते ही नहीं।’
 
वह सज्जन बोले-‘आप कमाल कर रही हो? इतनी बहस हो गयी खाने पर और आप फिर खाने की बात  लेकर बैठ गयीं। कभी आयेंगे चाय पीने पर आप खाने के जबरदस्ती करतीं हैं इसीलिये नहीं हम परिवार सहित आपके घर नहीं आते। हां, आप एक बार खाने पर आयें तो फिर सोचेंगे।’
फिर हमने बातचीत का विषय बदला और वह चले गये तो श्रीमतीजी ने कहा-‘‘पर यह कहा किसने है कि भारत के लोग खाते अधिक हैं?’

हमने कहा-‘‘हमें पता है पर तुम जानने की कोशिश कर अपनी चिंता क्यों बढ़ा रही हो। अधिक चिंता शरीर को हानि पहुंचाती है।’
वह बाहर जाते हुए बोलीं-हां यह तो बात है। वैसे आज अखबार में ऐसा कोई ऐसा शीर्षक तो देखा था पर खबर पूरी नहीं पढ़ी। अच्छा हुआ नहीं पढ़ी। बिना मतलब की खबर पढ़ने से क्या फायदा?’

The comic satire on http://rajdpk1.wordpress.com to be read in English

कम दर्शकों द्वारा फिल्म देखने की शिकायत बेमानी-आलेख

आज मैने एक अंग्रेजी ब्लाग पर पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिये’ के बारे में चर्चा पढ़ी। अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के जरिये पढ़ी इस चर्चा में भारत में इसे अधिक दर्शकों द्वारा न देखने का उल्लेख किया गया। इसकी तारीफ में बहुत सारे कसीदे भी पढ़े गये। मुझे वहां एक अनाम व्यक्ति की टिप्पणी भी दिखी जिसमें उसने इस बात का उल्लेख किया कि फिल्म में कोई बड़ा भाई है जो अपने एक गोरे  छात्र को बता रहा है कि ताजमहल का निर्माण हम मुसलमानों ने किया है। उस टिप्पणी देने वाले ने यह बात भी स्पष्ट की कि यह पाकिस्तान की फिल्म न होकर एक धर्म के लोगों को संदेश देती है कि वह अपने धार्मिक भावनाओं को अपने देश से अधिक महत्व दें।  साथ ही यह भी दर्शाती है कि पाकिस्तान का एक बहुत बड़ा वर्ग अभी भी भ्रम का शिकार है। उस टिप्पणीकार ने लिख कि ताजमहल क निर्माण में आगरा और उसके आसपास के लोगों ने काम किया इसलिये उसे किसी विशेष से जोड़ना ठीक नहीं है। मै उसकी इस बात से सहमत था।

इसमें अमित नाम के व्यक्ति की टिप्पणी भी थी कि जिसने इसका उल्लेख किया गया था। मतलब यह है कि भारत के बुद्धिजीवी भी बहुत सारे भ्रमों के शिकार हैं। वह इस बात को नहीं समझ रहे कि जिस तरह विदेशों से आयातित विचारधाराओं और नारों से पूर्वाग्रहों से ग्रसित   हैं वैसे ही पाकिस्तानी भी मजहब की भावनाओं से बंधे हैं। दोनों तरफ एकता के नाम पर पाकिस्तानी ऐसी सामग्री इस देश में लायेंगे जो उनके पूर्वाग्रहों से सुसज्जित होंगी। 

पहले ताजमहल की बात कर लें। ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था-हालांकि कुछ लोग इस पर भी विवाद खड़ा करते हैं-ऐसा कहा जाता है पर उसमें खून पसीना बहाया था मजदूरों ने और उसकी कीमत चुकाई थी इस देश के किसानों और व्यापारियों ने। उस समय कोई उद्योग नहीं थे और न कोई आयकर था। सर्वाधिक वसूली किसानों की उपज और बाहर से आने वाले व्यापारियों से होती थी। शाहजहां ने कोई घर से पैसा नहीं लगाया बल्कि इस देश की गरीब जनता की खून पसीने से लगान के रूप में या जमीदारों और साहूकारों से कर उसे इस एतिहासिक इमारत में लगाया गया। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि ताजमहल पर बहुत अधिक व्यय से भी राज्य की आर्थिक स्थिति खराब हो रही थी इसलिये उसके पुत्र औरंगजेब ने अपने पिता को हटाकर राज्य अपने कब्जे में ले लिया। मतलब उसे अपनी माता की स्मृति में बनाये गये इस स्मारक से अधिक अपने राज्य की दुर्दशा ने कष्ट पहुंचाया और उसने राज्य हथिया लिया।

पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों की अगर ऐसी हालत है तो उनसे किसी प्रकार का संपर्क इस देश के लिये लाभदायक नहीं रहने वाला है। जो इतिहास ( जिसे कुछ विद्वान झूठ का पुलिंदा भी मानते हैं) का बोझ अपने सिर पर रखकर चलते हैं वह चिंतन और अध्ययन से परे होते हैं। पाकिस्तान के फिल्मकार और बुद्धिजीवियों भी इसका शिकार हैं। अगर वह विदेश में भारत की एतिहासिक इमारतों के निर्माण का गौरव अपने मजहब के नाम से दिखाते हैं तो फिर उनसे यह आशा करना बेकार है कि वह इस देश के आम लोगों के सच्चे सहानुभूति प्रदान करने वाले हैं।

मैंने वह फिल्म नहीं देखी। न उसमें मेरी रुचि है क्योंकि इस तरह की फिल्में मुझे किसी तरह का मनोरंजन नहीं देतीं। जहां तक ज्ञान की बात है तो अभी बहुत सारी किताबें हैं जिससे पढ़ना है और मनोरंजन तो साहित्य  या संगीत ही से हो पाता है और हिंदी में लिखा अभी पूरा पढ़ा भी नहीं हैं सो एक पाकिस्तानी फिल्म क्या दिखायेगी जबकि भारतीय फिल्में भी इससे परे हैं। इसी ब्लाग में मैंने पढ़ा कि उसमें कोई प्रेम कहानी है। भारत हो या पाकिस्तान की कोई भी फिल्म प्रेम कहानी के बिना बनती नहीं। हां कुछ फिल्मकार उसकी आड़ में अपने  के धनदाता के  विचारों के  के अनुसार कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक पुट डालते हैं ताकि वह प्रसन्न रहें। यह भी कोई ऐसी फिल्म रही होगी। भारतीय दर्शक अगर उसमें कम रुचि ले रहे हैं तो इसका कारण यही है कि उनको पता चल गया था कि इस फिल्म में कला के नाम पर कुछ नहीं है। अब इस तरह कुछ लोग हमारे देश की मानसिकता पर प्रश्न उठा रहे हैं तो पहले उन्हें यह भी देखना चाहिए कि इस देश में सैंकड़ों फिल्में बनती हैं और उनसे भरपूर मनोरंजन होता है तब क्यों वह ऐसी साधारण फिल्म को देखना चाहेगा जिसका प्रचार केवल इसलिये हो रहा है कि उसे एक पाकिस्तानी ने बनाया है। जहां तक मेरी जानकारी है पाकिस्तान में भी भारतीय फिल्में इस पर भारी पड़ीं हैं। ऐसे में क्यों केवल भारत में इसको कम देखे जाने की शिकायत हो रही है। वैसे भी भारत के आम लोग इस बात को समझ गये हैं कि फिल्मों की आड़ में किस तरह उस पर  ऐसी संस्कृति और काल्पनिक घटनायें प्रस्तुत की जा रही है जो उसकी समझ से परे है और जो कथित विद्वान उस पर दाद चाहते है वह स्वयं भ्रमित हैं.

it transtalshan by googl tool

The complaint by the audience could reduce redundant - Stories
Today I on an English Blog Pakistani film ‘for God’ read about. Hindi translation from English to read through this discussion in India in more viewers by not see it mentioned. It also praised the many embroidered were read. There’s an anonymous person I see a comment which he also noted that this is a film in a big brother who is a student tell the Europeans is that we Muslims have done to build the Taj Mahal. He made the comment it’s also clear that this is Pakistan’s film and not a religion of the people is that it gives a message to his religious feelings of more importance to his country. It also shows that a large section of Pakistan is still a victim of confusion. Has been a commentator writing that the construction of the Taj Mahal, Agra and nearby people have worked so it is not proper to link a particular. I agree with her.

The name of Amit person who commented that it was also mentioned. This means that India’s intellectuals are also a lot of confusions of the victims. He does not understand the fact that the kind of slogans and ideologies imported from abroad prejudices are so obsessed with the feelings of Pakistanis also bound by religion. On both sides of unity in the name of the Pakistani such material in this country who will be equipped with their prejudices.

Before talking about the Taj Mahal. Shah Jahan built the Taj Mahal - even though some people are standing dispute - It is said of the blood and sweat of the workers had poured out his price was paid in this country, farmers and traders. At that time there were no industry and no income tax. The recovery of most farmers produce coming from outside and from traders. Shah Jahan had not put any money from the house but the poor people of this country’s blood, sweat or rent in the form of landlord and capilist it was put up in this historical building. Some historians say that too much expenditure on the Taj Mahal, the state’s economic situation was so bad that his son Aurangzeb to his father removed his capture in the state. It means to the memory of his mother made to the memorial over the plight of his state and he has brought pain and grabbed the state.

Pakistan’s intelligentsia such circumstances, if any kind of contact with them for this country living is not profitable. The history (which some scholars believe the lies of the sheaf) burden to place on their heads walk beyond the thought and study them. Pakistan is also a victim of the filmmakers and intellectuals. India’s Foreign If the historical buildings, the pride of building your faith in the name of the show, then expect him to waste to the country’s ordinary people who provide genuine sympathy.

I have not seen the film. It is not my interest because this kind of films I do not let any kind of entertainment. As far as knowledge is concerned, it is still a lot of books that are read and entertainment, literature or the music gets to be written in Hindi and read are not yet complete So what a Pakistani film show, while Indian films are also beyond it. I read it in this Blog a love story. India, Pakistan or any film without the love story going. Yes, some of his screen his film-contributory, according to the views of some religious and cultural be happy to put it to kill. It is also a film will be. Indian audiences less interested if there are reasons, it is that they discover that the film was in the name of art is nothing. Now this kind of mentality of our country some people are taking the first question they should also see that this country hundreds of films made and they are full of entertainment then why is he wants to see a film simply because it is only a publicity That has made him a Pakistani. As far as I know the Indian films in Pakistan, also fell on heavy. So why in India, only to see it reduced the complaint is happening. The common people of India have to understand that this movie screen in a culture of how the fictional incidents and is being submitted beyond the understanding of his and which he allegedly learned he is wanted on ringworm are confused

धन आने से बुद्धि नहीं आ जाती-लेख Money is not coming to mind - article

पैसे में बहुत बड़ी ताकत होती है यह भी बहुत समय से सुनते आ रहे हैं। बड़े बुजुर्ग यह भी कहते हैं कि पैसे से आदमी में बुद्धि नहीं आती। इस पर विचार करते हुए कई बार दिमाग ऊहापोह में फंस जाता है कि सत्य क्या है।

अब समझ में आने लगा है कि दोनों ही बातें सत्य के दो पहियों की तरह है जिन पर जीवन का रथ चल रहा है। अब देखिये जब देश गरीब कहलाता था तो यहां के कुछ लोग विश्व में चमकते थे। कुछ ने खेलों में तो कुछ ने अध्यात्म में नाम कमाया। मैं यहां खेलों के बारे में अधिक लिखना चाहता हूं। भारत हाकी में आठ बार ओलंपिक और विश्व कप में विजेता रहा चुका हैं। 1971 में हाकी में तो 1983 में भारत ने विश्व कप क्रिकेट कप जीता। उसके बाद तो सब थम सा गया। 1983 में भारत की आर्थिक रूप से कोई ताकत नहीं थी पर उसने विश्व कप जीता जिसने यहां इतनी लोकप्रियता पायी कि उसको नियंत्रण करने वाली संस्था बीसीसीआई दुनियां की सबसे अमीर संस्था बन गयी। मगर क्रिकेट! यहां के चयनकर्ता मानते हैं कि यहां अब प्रतिभाएं नहीं हैं।  अब उसके विकास का काम फिर शुरू करने के लिये विदेशी खिलाडियों को नीलामी में खरीद कर कुछ टीमों के मैच करवाये जा रहे हैं कि अब सीखो क्रिकेट। यानि 1983 के बाद पैसा खूब आता गया पर हमारी क्रिकेट प्रतिभा कम होती गयी। हाकी में 2010 के विश्वकप का आयोजन भारत करने जा रहा है जबकि विश्व में उसकी इस खेल में कोई हैसियत नहीं है और अपने पड़ौस में हो रहे ओलंपिक में हमारी भागीदार नगण्य हो गयी है।

अब सवाल उठता है कि विश्व कप की मेजबानी क्यों मिली? क्योंकि यहां खेलों पर पैसा खर्च किया जा सकता है प्रतियोगिताओं के लिये वह जरूरी है। मतलब अब हमारी पूछ विश्व में पैसे खर्च के कारण बढ़ी है न कि अपनी प्रतिभा के कारण। मैने एक पश्चिमी विशेषज्ञ का भारत में यह कथन कहीं पढ़ा था कि ‘ भारत एक ऐसा अमीर देश है जहां गरीब लोग अधिक रहते हैं‘। अगर आप देश में चल रहे नाटकों को देखें तो लगता है कि सब जगह पैसा बरस रहा है और ऐसा लग रहा है कि हर आदमी करोड़पति होने की तरफ बढ़ रहा है।
महत्वहीन क्रिकेट मैचों को देखने के लिये लोग स्टेडियमों मे भागे जा रहे हैं। बैट-बाल को द्वंद्व देखने के लिये हजारों लोग टिकट खरीद कर मैदान में नाचते हैं। टीवी और रेडियों पर लोगों के लिये पुरस्कारों की भीड़ लगी जा रही है। एक अजीब सा माहौल है। एक तरफ बढ़ती महंगाई और जलसंकट और बिजली के अभाव से ग्रस्त देश में ऐसा वातावरण रहना अपने आप में आश्चर्यजनक लगता है।

इस देश में न तो धन पहले कम था न आज है समस्या उसके वितरण की है-अर्थशास्त्र पढ़ने वाला हर आदमी इस बात को जानता है। दूसरी समस्या है कुप्रबंध जो कि आज के समय में सबसे अधिक है। लोग कहते है कि भारत के लोग अपने देश में ठीक काम नहीं करते पर विदेश में उनका प्रदर्शन अच्छा है। यह बात नहीं है। सत्य तो यह है कि यहां प्रबंध कौशल के अभाव में उनका प्रदर्शन ठीक नहीं रहता  क्योंकि जो तकनीकी विशेषज्ञता या  किसी विशेष काम में योग्यता होने पर भी उसे जिस प्रकार के प्रबंधन की आवश्यकता है वह यहां नहीं मिल पाता। बाहर भी भारत के लोग जो हैं उनमें कोई प्रबंधन के कारण ख्याति अर्जित नहीं कर सका। सभी खेल संघों की हालत देखें तो वह कुप्रबंध (भ्रष्टाचार भी उसका ही हिस्सा है) का शिकार हैं। जिन लोगों का यहां पद मिल गया वह तो अपने आपको राजा और अपने से नीचे वाले को प्रजा समझने लगता है। याद करें अभी जो खिलाडियों की बोली लगी थी उसे लगवाने एक अंग्रेज विद्वान की सेवायें लीं गयी जिसने तमाम तरह के नियम भी बनाये। भारत के जो लोग विदेशों में अमीर बने हैं वह प्रबंध कौशल के कारण नहीं बल्कि व्यवसायिक कौशल के कारण हंै। उनको विदेशों के योग्य प्रबंध विशेषज्ञों की सेवायें मिलतीं हैं।
हैरानी की बात यह है कि किसी समय गरीब कहलाने वाले इस देश के आर्थिक रूप से ताकतवर होने की बात तो हो रही है पर सामाजिक और क्रीड़ा के क्षेत्र में इसका पिछड़ापन बढ़ता ही जा रहा है। क्रिकेट प्रतियोगिताओं के हजारों करोड़ के लेनदेन की आंकड़े चकित कर देते हैं पर खेलने के नाम इसके खिलाडियों की हालत बहुत दयनीय है। आजकल जो प्रतियोगिता चल रही है उसमें विदेशी खिलाडियों के खेल को देखकर ऐसा लगता है कि भारतीय खिलाडी कभी-कभार ही अच्छा खेल सकते हैं वह भी इसलिये ताकि टीम में उनकी जगह बनी रहे।

हाकी में तो इतनी हास्यास्पद स्थिति देश में ही देखी जा सकती है। 15-16 वर्षों से हाकी टीम गड्डे में जाती दिख रही थी पर कोई हाथ लगाने को तैयार नहीं था। आखिर विश्व ओलंपिक संघ ने जब धमकाया तब कहीं यहां के लोग अपनी निद्रा से जागे।  इससे यह समझ में आ सकती है कि हमारी बुद्धि आज भी विदेशों की तरफ बंधुआ मजदूरों की तरह देखती है। विश्व ओलंपिक महासंघ भी इसलिये जागा क्योंकि उसको यहां विश्व कप हाकी प्रतियोगिता करानी है और अगर भारत की टीम उसमें ऐसी ही रही तो उसकी प्रतियोगिता का मजा खराब हो जाता और फिर यहां से पैसे की उगाही शायद वैसी नहीं हो पाती-प्रायोजक भारतीय कंपनियों या यहां सक्रिय विदेशी कंपनियों को ही करना है और यहां भले ही दिखावे के हीरो हों पर होने तो चाहिए वरना उनके उत्पादों का विज्ञापन कैसे होगा? धन के बल पर प्रायोजन मिल गया पर प्रतिभा कहां से आयेगी? ऐसा नहीं है कि इस देश में प्रतिभाओं की कमी है पर उनको खोजने और उनका मार्ग प्रशस्त करने वाले प्रबंधकों का यहां अभाव है क्योंकि यहां के अमीर चाहे कितना भी पश्चिम का अनुकरण कर लें पर किसी नयी प्रतिभा को प्रोत्साहन वह तब तक नहीं देते जब तक कोई उनके सामने जाकर  मस्तक न झुकाये। सभी प्रदर्शन व्यवसायों (खेल, फिल्म और टीवी) में प्रभावशाली लोगों का बोलबाला है और सभी अपने लोगों को चमकाना चाहते हैं। फिल्म की हालत तो यह है कि आज देश का कोई युवक हीरो बनने की सोचता भी नहीं है क्योंकि वह तो पुराने हीरो के लिये सुरक्षित हो गयी हैं। कहने को इस देश के निर्माता दंभ भरते हैं कि हाॅलीवुड की बराबरी करेंगे पर उनमे व्यवसायिकता के भाव का अभाव है। फिल्में बनाते हैं और हिंदी फिल्में  देखने वाले लोग इतनी संख्या में हैं कि रद्दी फिल्म बनाने वाले को भी  आर्थिक  लाभ हो ही जाता है पर इसका मतलब यह नहीं कि उनकी फिल्में कोई ऊंची श्रेणी  की हैं। हाॅलीवुड में शुद्ध रूप से व्यवसायिक भाव से फिल्में बनती हैं और वहां कोई निर्माता या निर्देशक अपने बेटे या बेटी को फिल्म में इस तरह हीरो-हीरोइन नहीं बनाता जैसे यहां बनाते हैं।

मतलब यह है कि पैसा आने से बुद्धि नहीं आ जाती-यह बात भी हमारे बुजुर्ग सही कह गये हैं। इसके अलावा आर्थिक विकास का आशय यह भी नहीं है कि लोगों का बौद्धिक विकास हो जायेगा यह बात अच्छी तरह से समझी जा सकती है। भारत में तो एक बात और भी है कि यहां तो लोगों को बौद्धिक रूप से भ्रमित रखकर ही पैसा कमाया जा सकता है शायद इसलिये ही कथित आर्थिक विकास प्रचार में बहुत सुनाई देता है पर जमीन पर परिलक्षित नहीं होता।

Traasnlet by googal tool(Hindi writer has no knowledge of English, so he is not responsible for the lack of translation) 

A large force of money is also a lot of time listening to come. It also says that the large elderly man of wisdom does not come from money. The idea of the mind at times confused the truth of what is caught.

Now, coming to understand that both the truth of things is like the two wheels of the chariot on which life is going on. Now, when our view was called the poor people in the world, here’s some beads. Some of the games, some have earned a name of spirituality. Games here I wish to write more about. India hockey in the Olympics eight times and winning the World Cup is finished. Hockey in 1971, in 1983, India has won the World Cup Cricket Cup. After all, what was ceased. India in 1983 as an economic power was not on it who won the World Cup is so popular here that he found the body control to the BCCI to become the world’s richest institution has been. But cricket! The selectors believe that the talents are not here now. Now, to resume development of foreign players in the auction for the purchase of some of the teams that are going to match dais now learn cricket. That was 1983, after the money comes a lot of talent on our cricket has been low. 2010 World Cup of Hockey in India is going to the event in the world while the game is not in a position to be in the Olympics and its neighbourhood, our partners have been negligible.

The question that arises is, why did host the World Cup? Games here because of the money can be used for the championships is important. Means we now ask for money in the world because of increased spending, not because of his talent. I was a specialist in India, the western statement read somewhere that India is a rich country where poor people are more ‘. If you look at plays in the country running everywhere, it is money that is years, and it seems that every man on behalf of millionaires is increasing.
Unimportant to see cricket matches in the stadiums of people fled are going. BAT - for the child to see the conflict thousands of people buy tickets in the field dancing. TV and Radio awards for the people of the crowd is engaged. Like a strange environment. On the one hand and rising inflation suffer from lack of water and electricity in the country to live in their own environment so it seems surprising.

In this country, not less, money was not the first problem today is the distribution - economics read every word of this man knows. The other problem is that today’s mismanagement of the most time. People say that the people of India do not work properly in our country abroad on their good performance. It is not. The truth is that in the absence of their performance management skills do not always because of the technical expertise or a special ability to work on it just as the management of the need to not get it here. The people of India are also outside the management of any of them could not earn a reputation. All sports federations to see the condition of mismanagement, it (corruption, his part is) a victim. The people’s office here, he has found himself under the king and his people to understand it. The players still remember that it began to bid a British scholar of vaccination services did all kinds of rules which was also created. India’s foreign people who have the management skills of the rich not because of professional skills but also because of हंै. For managing them abroad get services of experts.
The surprise is that at any time, so-called poor in this country to be financially powerful thing, being on the field of sports and social backwardness, it is growing. Thousands of cricket competitions million of the transaction data baffled to play on the name of its players very poor condition. Today the competition is doing it is to see foreign players of the game it appears that the Indian Players ever - makes it too can play the better team, so that his place remains so.

Hockey, the situation is so ridiculous as can be seen in the country. 15-16 years in the hockey team is showing trouble was not ready to put on a hand. After all, the World Olympic Association has so far threatened when the people woke from his sleep. It is understood that our minds could still abroad on behalf of bonded labourers looks like. World Federation of the Olympics because it up because the World Cup hockey competition here and if India is to the team if there is such bad shape as the competition’s fun here and then raised money from the same may not be deciduous - Indian companies or sponsors here Active foreign companies here and even if it is to show the hero, should be on how to advertise their products or else be? On the strength of sponsorship money received from Where will the talent? Not that the lack of talent in this country and find them on their path to the lack of managers, because even if the rich how to emulate the West take on a new talent, he will not give incentives until Faced with a visiting head झुकाये not. All businesses performance (sports, film and TV) in a couple of influential people and all its people want to irradiate. The film is that the condition of the country today is a young man to become a hero because he did not think it was safe for the old hero. The country’s producer, said the arrogance of the match will enter the हाॅलीवुड ones on the sense of a lack of professionalism. Make films and Hindi movies to see the number of people so that the trash the film also is on the economic benefit it would not mean that his films are a high-class. hollywood purely commercial in the sense of the films are made there, a producer or director and his son or daughter of the hero of the film - like the heroine makes not make here.

This means that money is not coming to mind - it is also true to say we were elderly. In addition, economic growth has not meant that the people of this intellectual development will be well understandable. In India, and one thing here is that if people intellectually confused with the money earned can be put perhaps because the so-called economic development to hear a lot of publicity on the ground is not reflected.

क्रिकेट मैच के दौरान नृत्य कार्यक्रम:एक विचार

अभी चल रही प्रतियोगिता में क्रिकेट मैचों के दौरान ‘चीयर गर्ल’ की भूमिका पर अनेक लोग सवाल उठा रहे हैं।  कई लोग ऐसे देश की संस्कृति के विरुद्ध तो कई इसे क्रिकेट खेल से इतर बता रहे हैं। मुझे लगता है कि ऐसा करने वाले लोग संभवतः केवल इसमें क्रिकेट को देखना चाहते हैं-शायद यही वजह है कि वह ऐसी आपत्तियां उठा रहे है। मुझे लगता है कि ऐसी आपत्तियां उठाने की कोई वजह नहीं हैं।

मैं बरसों से क्रिकेट खेल देख रहा हूं और अब कभी कभार देखता हूं। पहले लगन के  साथ पूरा मैच देखता था पर अब मन में आता है और जब भारत के जीतने की आशा लगती है तब देखता हू। मतलब यह कि पहले जैसा कोई लगाव नहीं है पर अंतर्राष्ट्रीय मैचों में थोड़ी दिलचस्पी रहने के बावजूद मैने एक भी मैच नहंी देखा है। इस बारे में खबरें अक्सर समाचार पत्रों और टीवी पर दिख जातीं है और उनसे नजरे बचाना मुश्किल है। मैच के दौरान नृत्य पेश करने को लेकर अनेक  लेख मैने सब जगह देखे हैं और मुझे इसके विरोध का आधार अभी तक मजबूत नहीं दिखाई दिया।

अभी जब भारत ने ट्वंटी-ट्वंटी विश्व कप प्रतियोगिता में विजय हासिल की तो देश में जिस तरह  जश्न मनाया गया तो उसी समय  मैने यह अपना विचार लिख दिया था कि बाजार इसे भुनाने का प्रयास करेगा क्योंकि उसको यहां अपने लिये कमाई का एक जरिया दिख रहा है। उस प्रतियोगिता में भी ऐसे नृत्य थे और लोगोंं ने इसे देखा पर शायद राष्ट्रप्रेम के जज्बे में इसकी अनदेखी करते रहे। इसके बाद भी देश में एक ट्वंटी-ट्वंटी का मैच हुआ उसमें भी वह सब दिखाया गया-अब  चूंकि प्रतियोगिता लंबी है इसी कारण यह चर्चा का विषय बना। मतलब इस प्रतियोगिता के शुरू होने से पहले ही यह सबको पता था कि ऐसा होगा फिर अचानक उसका विरोध शुरू होना मेरी समझ से परे है। दरअसल यह नृत्य कार्यक्रम एक तरह से