लोग अपने से बात करते हुए पाठ अंतर्जाल पर पढ़ना चाहते हैं-संपादकीय

आज यह ब्लाग/पत्रिका की पाठ पठन/पाठक संख्या एक लाख को पार कर गयी। इस ब्लाग/पत्रिका के साथ इसके लेखक संपादक के दिलचस्प संस्मरण जुड़े हुए हैं। यह ब्लाग जब बनाया तब लेखक का छठा ब्लाग था। उस समय दूसरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर यूनिकोड में न रखकर सामान्य देव फोंट में रचनाएं लिख रहा था। वह किसी के समझ में नहीं आते थे। ब्लाग स्पाट के हिंदी ब्लाग से केवल शीर्षक ले रहा था। इससे हिन्दी ब्लाग लेखक उसे सर्च इंजिन में पकड़ रहे थे पर बाकी पाठ उनकी समझ में नहीं आ रहा था। यूनिकोड में रोमन लिपि में लिखना इस लेखक के लिये कठिन था। एक ब्लाग लेखिका ने पूछा कि ‘आप कौनसी भाषा में लिख रहे हैं, पढ़ने में नहीं आ रहा।’ उस समय इस ब्लाग पर छोटी क्षणिकायें रोमन लिपि से यूनिकोड में हिन्दी में लिखा इस पर प्रकाशित की गयीं। कुछ ही मिनटों में किसी अन्य ब्लाग लेखिका ने इस पर अपनी टिप्पणी भी रखी। इसके बावजूद यह लेखक रोमन लिपि में यूनिकोड हिंदी लिखने को तैयार नहीं था। बहरहाल लेखिका को इस ब्लाग का पता दिया गया और उसने बताया कि इसमें लिखा समझ में आ रहा है। उसके बाद वह लेखिका फिर नहीं दिखी पर लेखक ने तब यूनिकोड हिन्दी में लिखना प्रारंभ किया तब धीरे धीरे बड़े पाठ भी लिखे।

उसके बाद तो बहुत अनुभव हुए। यह ब्लाग प्रारंभ से ही पाठकों को प्रिय रहा है। यह ब्लाग तब भी अधिक पाठक जुटा रहा था जब इसे एक जगह हिन्दी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों का समर्थन नहीं मिलता था। आज भी यहां पाठक सर्वाधिक हैं और एक लाख की संख्या इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी अपनी गति से अंतर्जाल पर बढ़ रही है। मुख्य बात है विषय सामग्री की। इस ब्लाग पर अध्यात्मिक रचनाओं के साथ व्यंग, कहानी, कवितायें भी हैं। हास्य कवितायें अधिक लोकप्रिय हैं पर अध्यात्मिक रचनाओं की तुलना किसी भी अन्य विधा से नहीं की जा सकती। लोगों की अध्यात्मिक चिंतन की प्यास इतनी है कि उसकी भरपाई कोई एक लेखक नहीं कर सकता। इसके बाद आता है हास्य कविताओं का। यकीनन उनका भाव आदमी को हंसने को मजबूर करता है। हंसी से आदमी का खून बढ़ता है। दरअसल एक खास बात नज़र आती है वह यह कि यहां लोग समाचार पत्र, पत्रिकाओं तथा किताबों जैसी रचनाओं को अधिक पसंद नहीं करते। इसके अलावा क्रिकेट, फिल्म, राजनीति तथा साहित्य के विषय में परंपरागत विषय सामग्री, शैली तथा विधाओं से उन पर प्रभाव नहीं पड़ता। वह अपने से बात करती हुऐ पाठ पढ़ना चाहते हैं। अंतर्जाल पर लिखने वालों को यह बात ध्यान रखना चाहिये कि उनको अपनी रचना प्रक्रिया की नयी शैली और विधायें ढूंढनी होंगी। अगर लोगों को राजनीति, क्रिकेट, फिल्म, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विषयों पर परंपरागत ढंग से पढ़ना हो तो उनके लिये अखबार क्या कम है? अखबारों जैसा ही यहां लिखने पर उनकी रुचि कम हो जाती है। हां, यह जरूर है कि अखबार फिर यहां से सामग्री उठाकर छाप देते हैं। कहीं नाम आता है कहीं नहीं। इस लेखक के गांधीजी तथा ओबामा पर लिखे गये दो पाठों का जिस तरह उपयेाग एक समाचार पत्र के स्तंभकार ने किया वह अप्रसन्न करने वाला था। एक बात तय रही कि उस स्तंभकार के पास अपना चिंतन कतई नहीं था। उसने इस लेखक के तीन पाठों से अनेक पैरा लेकर छाप दिये। नाम से परहेज! उससे यह लिखते हुए शर्म आ रही थी कि ‘अमुक ब्लाग लेखक ने यह लिखा है’। सच तो यह है कि इस लेखक ने अनेक समसामयिक घटनाओं पर चिंतन और आलेख लिखे पर उनमें किसी का नाम नहीं दिया। उनको संदर्भ रहित लिखा गया इसलिये कोई समाचार पत्र उनका उपयोग नहीं कर सकता क्योंकि समसामयिक विषयों पर हमारे प्रचार माध्यमों को अपने तयशुदा नायक और खलनायकों पर लिखी सामग्री चाहिये। इसके विपरीत यह लेखक मानता है कि प्रकृत्तियां वही रहती हैं जबकि घटना के नायक और खलनायक बदल जाते हैं। फिर समसामयिक मुद्दों पर क्या लिखना? बीस साल तक उनको बने रहना है इसलिये ऐसे लिखो कि बीस साल बाद भी ताजा लगें-ऐसे में किसी का नाम देकर उसे बदनाम या प्रसिद्ध करने
से अच्छा है कि अपना नाम ही करते रहो।
मुख्य बात यह है कि लोग अपने से बात करते हुऐ पाठ चाहते हैं। उनको फिल्म, राजनीति, क्रिकेट तथा अन्य चमकदार क्षेत्रों के प्रचार माध्यमों द्वारा निर्धारित पात्रों पर लिख कर अंतर्जाल पर प्रभावित नहीं किया जा सकता। अपनी रचनाओं की भाव भंगिमा ऐसी रखना चाहिये जैसी कि वह पाठक से बात कर रही हों। यह जरूरी नहीं है कि पाठक टिप्पणी रखे और रखे तो लेखक उसका उत्तर दे। पाठक को लगना चाहिये कि जैसे कि वह अपने मन बात उस पाठ में पढ़ रहा है या वह पाठ पढ़े तो वह उसके मन में चला जाये। अगर वह परंपरागत लेखन का पाठक होता तो फिर इस अंतर्जाल पर आता ही क्यों? अपने मन की बात ऐसे रखना अच्छा है जैसे कि सभी को वह अपनी लगे।
इस अवसर पर बस इतना ही। हां, जिन पाठकों को इस लेखक के समस्त ब्लाग/पत्रिकाओं का संकलन देखना हो वह हिन्द केसरी पत्रिका को अपने यहां सुरक्षित कर लें। इस पत्रिका के पाठकों के लिये अब इस पर यह प्रयास भी किया जायेगा कि ऐसे पाठ लिखे जायें जो उनसे बात करते हुए लगें।

लेखक संपादक दीपक भारतदीप,ग्वालियर 

सम्मान का भ्रम-हिन्दी हास्य व्यंग्य (samman ka bhram-hasya vyangya)

दीपक बापू तेजी से अपनी राह चले जा रहे थे कि पान की एक दुकान के पास खड़े आलोचक महाराज ने उनको आवाज देकर पुकारा-‘अरे, ओए फ्लाप कवि कहां जा रहे हो, कहीं सम्मान वम्मान का जुगाड़ करना है क्या?’
दीपक बापू चैंक गये। दायें मुड़कर देखा तो साक्षात आलोचक महाराज खड़े थे। दीपक बापू उनको देखकर उतावली के साथ बोले-‘आलोचक महाराज, आप अपनी घर से इतनी दूर यहां कैसे पधारे? हमारे लिये तो यही सम्मान है कि आपने हमें पुकारा। धन्य भाग हमारे जो इस इलाके की सीमा तक ही आपका पदार्पण तो हुआ। वरना आप जैसा साहित्यक महर्षि कहां इतनी दूर से यहां आयेगा? चलिये हुजूर हमारे घर को भी पवित्र कर दीजिये जो यहां से केवल तीन किलोमीटर दूर है।’
आलोचक महाराज ने पास ही नाली में पहले थूका फिर बोले-‘जब भी करना, घटिया बात ही करना! ऐसे भी साहित्यक महर्षि नहीं है कि तुम्हारे घर तक तीन किलोमीटर पैदल चलें। वैसे हमारी कार देखो उधर खड़ी है, पर अगर तुम्हें अपने घर लेकर चलना हो तो कोई अलग से इंतजाम करो।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज क्या करें, अपनी साइकिल तो घर पर ही छोड़े आये इसलिये यह संभव नहीं है कि कोई दूसरा इंतजार करें। हां, यह बताईये कि आप इधर कैसे आये, कोई सेवा हमारे लायक हो तो जरूर बतायें।’
आलोचक ने फिर दूसरी बार जाकर नाली में थूक और बोले-‘हमेशा लीचड़ बात ही करना! हम कार में बैठने वाले तुम्हारी साइकिल पर बैठकर क्या अपनी भद्द पिटवायेंगे। गनीमत समझो तुमसे बार कर रहे हैं। बहरहाल यह लो पर्चा! एक साहित्य पुस्तक केंद्र का उद्घाटन हैं। वहां जरूर आना। हमने तुम्हारी दो कवितायें एक गांव के अखबार में छपवा दी थी जिसमें अपनी समालोचना भी लिखी थी। लोगों ने हमारी समालोचना की प्रशंसा की। यह कार्यक्रम नये कवियों का परिचय कराने के लिये भी हो रहा है। तुम तो पुराने हो सोचा क्यों न उद्घाटन पर बुलाकर उनके समक्ष प्रस्तुत करें ताकि वह तुमसे कुछ सीखें।’

दीपक बापू शर्माते हुए बोले-‘क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं आप? हमारे अंदर ऐसी क्या येाग्यता है जो हम उस केंद्र का उद्घाटन करें? हम तो ठहरे एक अदना कवि! केवल कवितायें ही लिख पाते हैं। आप जैसे आलोचकों के सामने हमारी क्या बिसात? भले ही आप कहानी या कविता न लिखते हों पर साहित्य महर्षि का खिताब आपको ऐसे ही न मिला होगा। यह सम्मान कोई छोटी बात नहीं है।

अबकी बार आलोचक महाराज थूके बिना ही उनकी तरफ मुखातिब हुए और घूर घूर कर देखने लगे। अपना मुंह उनके मुंह के पास ले गये। फिर अपना हाथ उनके मस्तक पर रखा। दीपक बापू सिहर कर बोले-‘यह क्या आलोचक महाराज?’
आलोचक महाराज बोले-‘हम सोच रहे हैं कि कहीं तुम बुखार में तो घर से बाहर भाग कर नहीं आ गये। आजकल मौसम खराब है न! यह कैसी गलतफहमी पाल ली कि हम तुम्हारे इन नाकाम हाथों से किसी पुस्तक केंद्र का उद्घाटन करायेंगे। हमने तुम्हें उद्घाटन करने वाले मुख्य अतिथि के रूप में नहीं बल्कि वहां आकर कुछ किताबें खरीदो जिनको पढ़कर तुम्हें लिखने के लिये ढंगा आईडिया मिले, इसलिये बुलाया है। नये कवियों को तुम्हारा यह थोबड़ा दिखाकर बतायेंगे कि देखो इनको, ताउम्र कवितायें लिखने का प्रयास किया पर लिख नहीं सके। कभी कभी कामयाब आदमी की कामयाबी के साथ ही नाकाम आदमी की नाकामी से भी नये लोगों को सिखाने का एक अच्छा प्रयास होता है।’

दीपक बापू का चेहरा उतर गया वह बोले-‘ठीक है आलोचक महाराज, हमने कविता लिखने का प्रयास किया पर न लिख सके यह अलग बात है? मगर आपने तो कभी लिखी ही नहीं। बल्कि दूसरे लोगों की कविताओं का आलोचना करते हुए उनके कुछ हिस्सों को अपनी कविता बना डाला। हमारी कवितायें कहीं नहीं छपवायीं बल्कि हर बार टरका दिया। खैर, हमें बुरा नहीं लगा। अब चलता हूं।

आलोचक महाराज ने कहा-’नहीं! अभी रुको! मैंने अपना वक्त तुम्हें रोककर खराब नहीं किया। सुनो, यह कूपन लेकर उस दुकान पर आना। इसके लिये पांच सौ रुपया हमें दे दो। वहां इसके बदले तुम छह सौ रुपये की किताब खरीद सकते हो। वैसे मैं सोच रहा हूं कि तुम्हारी कवितायें अब शहर के अखबारों में भी छपवा दूं। तुमसे बहुत तपस्या करवा ली। लाओ, निकालो पांच सौ रुपये। वहां आकर साढ़ छह सौ रुपये किताबें खरीदना। तुम्हारे लिये पचास रुपये का फायदा करवा देंगें।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज, किताबों का तो मेरे घर पर ढेर लगा हुआ है। एक नयी अलमारी बनवा लूं तभी अब किताबें खरीद पाऊंगा। वैसे भी हम आपके पास अपनी एक किताब छपवाने के लिये पांडुलिपि लाये थे तब आपने इतनी अधिक सामग्री देखकर उसे पढ़ने से मना करते हुए कहा था कि ‘किताबों से पढ़ने योग्य पढ़ा जाये उससे अच्छा है कि उनमें लिखने योग्य कार्य किया जाये।’ आपकी बात चुभ गयी तभी से किताबें खरीदना बंद कर दिया। अब जब उनमें लिखने योग्य कर लेंगे तभी सोचेंगे।’
आलोचक महाराज ने कहा-’ठीक है! अब भूल जाना कि मैं तुम्हारी कविताओं पर आलोचना लिखकर उनको प्रकाशित करवाऊंगा।’
दीपक बापू वहां से जल्दी खिसक लिये यह सोचकर कि कहीं उनको पांच सौ रुपये की चपत न लग जाये। साथ ही उनको अपनी गलतफहमी पर भी हैरानी हो रही थी।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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शब्द महर्षि और क्रिकेट मैच-हिन्दी आलेख (shabda maharshi aur cricket match-hindi lekh)

उन महान शब्द ऋषि की मृत्यु की खबर ने स्तब्ध कर दिया। यह लेखक घर से बाहर अपने काम पर जाने की तैयारी कर रहा था। उसी समय टीवी पर यह खबर दिखाई दी। खबर यह थी कि‘अपने प्रिय खिलाड़ी के आउट होने के बाद भारतीय टीम की हार का सदमा उनसे सहन नहीं हुआ।’
मन ही मन यह शब्द फूट पड़े‘हे शब्द ऋषि! आप तो सत्य के अन्वेषण करने वाले तपस्वी थे फिर कहां इस मिथ्या खेल में मन फंसाये बैठे थे।’
एक तरफ उनके निधन का दुःख और दूसरा क्रिकेट के प्रति उनके लगाव पर आश्चर्य एक साथ हो रहा था। ऐसे में अधिक शब्द नहीं सूझ पाये।
इस हिंदी भाषा में अनेक पत्रकार आये और गये पर जिसने आजादी के बाद एक हिंदी पत्रकार के रूप में अकेले ख्याति अर्जित की तो उसमें वही एक व्यक्ति थे। कहने को तो अनेक प्रकाशक ही अपना नाम संपादक के रूप में लिखते हैं। इसके अलावा अधिकतर समाचार पत्र अंग्रेजी के लेखकों के अनुवाद कर उनको हिंदी में प्रतिष्ठित करते हैं इसलिये हिंदी में एक प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक पत्रकार बनना हरेक के बूते नहीं होता। केवल हिंदी के दम पर महान पत्रकार का दर्जा केवल उन्हीं महर्षि को ही दिया जा सकता है क्योंकि उनका लिखा अनुवाद के माध्यम से नहीं पढ़ा गया।
एक गैरपूंजीपति पत्रकार हमेशा अपना जीवन एक सामान्य आदमी की तरह व्यतीत करता है और उन्होंने भी यही किया। लिखने में जब विशिष्टता प्राप्त होती है तब आदमी अत्यंत सहज हो जाता है। उसे अपनी विशिष्टता का अहंकार नहीं आता क्योंकि उसे एक के बाद दूसरी रचना करनी होती है।
वह शब्द ऋषि एक आदमी की तरह जिया। इस लेखक से कभी उनकी मुलाकात नहीं हुई पर उनके अनेक लेख पढ़े। क्या गजब की लेखनी थी? हर पंक्ति में अपना अर्थ था। उनकी भाषा शैली की नकल अनेक पत्रकार करने का प्रयास करते हैं। लंबें चैड़े वाक्यों में हिंदी के आकर्षक शब्दों का प्रयोग करने की शैली को कोई दूसरा छू नहीं पाया पर कुछ लोग कोशिश करते हैं पर जो पढ़ने वाले जानते हैं उनका स्तर कितना ऊंचा था।
फिर क्रिकेट जैसे खेल में उनका मन कैसे फंसा। वह खेल प्रेमी थे। अपने ही अखबारों में क्रिकेट के संबंध में समय समय पर जो प्रतिकूल छपता है क्या वह पढ़ते नहीं थे? हमने तो उनका अखबार पढ़ते ही पढ़ते क्रिकेट देखा और फिर देखना कम कर दिया। किसी पर यकीन नहीं है। किसी क्रिकेट खिलाड़ी में लगाव नहीं है। हार जीत के समाचार जबरन सामने आते हैं तो देख लेते हैं। जिस मैच को देखने के बाद उनके दिल ने साथ छोड़ा उसकी खबर हमने उनके परमधाम गमन के साथ ही सुनी।
संभव है कि जान बूझकर इसका प्रचार किया गया हो कि देखो कैसे इस देश में जुनून की तरह माना जाता है-हालांकि मैच के समय जिस तरह पहले सड़कों पर इसकी चर्चा देखते थे अब नहीं दिखती । एक तरह से संदेश होता है कि अगर आप क्रिकेट नहीं देखते तो इसका मतलब है कि आप युवा नहीं है-जैसे कि क्रिकेट कोई सैक्सी खेल हो।
बहरहाल उन शब्द ऋषि के देहावसान की खबर ने दुःख तो दिया पर सच बात तो यह है कि एक दिन यह सभी के साथ होना है। फिर हम कहें कि क्रिकेट की वजह से यह हुआ-गलत होगा। सत्य के अन्वेषक एक ऋषि का दिल एक मैच से टूट जाये यह संभव नहीं है। मृत्यु के लिये कोई न कोई बहाना तो बनता ही है।
इतने सारे मैच भारत हारा। सच तो यह है कि अनेक लोग तो पक गये हैं कि जीतने पर ही यकीन नहीं करते। जिसने मैच न देखा हो उसे कसम खाकर बताना पड़ता है कि भारत मैच जीत गया। उनका जो प्रिय खिलाड़ी है तो उसका कहना ही क्या? ढेर सारे रिकार्डों से लोग खुश जरूर होते हैं पर टीम कभी विश्व नहीं जीत सकी। केवल एक मैच की वजह से उनका दिल टूटेगा यह संभव नहीं हो सकता। जो आदमी जितनी सांसे लिखवाकर लाया है उतनी ही ले पायेगा।
अलबत्ता क्रिकेट वह शौकीन जो बड़ी उम्र के हैं उनको अब इसे देखना बंद करना चाहिये। कुछ लोग इसे देखते हुए ही वृद्ध हो गये हैं पर फिर भी उनका दिल मानता नहीं है। जिन लोगों ने यकीन कम होने के कारण क्रिकेट देखना बंद कर दिया है वह बहुत आराम अनुभव करते हैं। वरना पहले जब भारत हारता था तो अनेक लोगों का सदमे से सारा शरीर सुन्न हो जाता था। सारा दिन मैच आंखें लगाकर देखा और जब भारत हार गया तो बाहर जाने पर ऐसा लगता था कि नरक से बाहर आये हैं। सुबह मैच हो तो रात को नींद नहीं आती थी। वह तो भला उस भारतीय खिलाड़ी का जिसने पाकिस्तानी खिलाड़ी द्वारा इसके काले पक्ष को उजागर करने के बाद उसका समर्थन किया जिससे अनेक क्रिकेट प्रेमियों की आंखें खुल गयीं। इधर हम यह भी देखते हैं कि भारत पाकिस्तान के बीच अन्य विषयों पर भले ही दुश्मनी हो पर क्रिकेट के विषय पर एका दिखता है। इससे हमें क्या? लब्बोलुआब यह कि क्रिकेट एक पैसे का खेल है जिसमें आगे पैसा, पीछे पैसा, नीचे पैसा, ऊपर पैसा, दायें पैसा, बायें पैसा यानि हर बात में पैसा है।
उन शब्द ऋषि जैसा हम तो नहीं लिख सकते पर उन जैसे हमारे गुरु भी थे। उनके परमधाम गमन के समय हमें अपने गुरुजी की भी याद आयी। वही हमसे कहते कि क्रिकेट गुलामों का खेल है। सच तो यह है कि हमारा मन भर आया था। लोग रोये भी होंगे पर सोच रहे थे कि ‘क्या यह सच नहीं है कि आजादी के बाद वही ऐसे एकमात्र शख्स रहे हैं जिन्होंने पत्रकार के रूप में बिना धन लगाये केवल शब्दों के सहारे ख्याति अर्जित की। उनको नमन करने का मन करता है क्योंकि वह भी हमारे लेखन के प्रेरक रहे थे।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।

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रौशनी और अंधेरे की जंग-लघुकथा (roshni aur andher ke jang-hindi laghu katha)

वैसे तो उन सज्जन की कोई इतनी अधिक उम्र नहीं थी कि दृष्टिदोष अधिक हो अलबत्ता चश्मा जरूर लगा हुआ था। एक रात को वह स्कूटर से एक ऐसी सड़क से निकले जहां से भारी वाहनों का आवागमन अधिक होता था। वह एक जगह से निकले तो उनको लगा कि कोई लड़की सड़क के उस पार जाना चाहती है। इसलिये उन्होंने अपने स्कूटर की गति धीमी कर ली थी। जब पास से निकले तो देखा कि एक श्वान टांग उठाकर अपनी गर्दन साफ कर रहा था। उन्हें अफसोस हुआ कि यह क्या सोचा? दरअसल सामने से एक के बाद एक आ रही गाड़ियों की हैडलाईट्स इतनी तेज रौशन फैंक रही थी कि उनके लिये दायें बायें अंधेरे में हो रही गतिविधि को सही तरह से देखना कठिन हो रहा था।
थोड़ी दूर चले होंगे तो उनको लगा कि कोई श्वान वैसी ही गतिविधि में संलग्न है पर पास से निकले तो देखा कि एक लड़की सड़क पार करने के लिये तत्पर है। अंधेरे उजाले के इस द्वंद्व ने उनको विचलित कर दिया।
अगले दिन वह नज़र का चश्मा लेकर बनाने वाले के पास पहुंचे और उसे अपनी समस्या बताई। चश्में वाले ने कहा‘ मैं आपके चश्में का नंबर चेक कर दूसरा बना देता हूं पर यह गारंटी नहीं दे सकता कि दोबारा ऐसा नहीं होगा क्योंकि कुछ छोटी और बड़ी गाड़ियों की हैड्लाईटस इतनी तेज होती है जिन अंधेरे वाली सड़कों से गुजरते हुए दायें बायें ही क्या सामने आ रहा गड्ढा भी नहीं दिखता।’
वह सज्जन संतुष्ट नहीं हुए। दूसरे चश्मे वाले के पास गये तो उसने भी यही जवाब दिया। तब उन्होंने अपने मित्र से इसका उपाय पूछा। मित्र ने भी इंकार किया। वह डाक्टर के पास गये तो उसने भी कहा कि इस तरह का दृष्टिदोष केवल तात्कालिक होता है उसका कोई उपाय नहीं है।
अंततः वह अपने गुरु की शरण में गये तो उन्होंने कहा कि ‘इसका तो वाकई कोई उपाय नहीं है। वैसे अच्छा यही है कि उस मार्ग पर जाओ ही नहीं जहां रौशनी चकाचौध वाली हो। जाना जरूरी हो तो दिन में ही जाओ रात में नहीं। दूसरा यह कि कोई दृश्य देखकर कोई राय तत्काल कायम न करो जब तक उसका प्रमाणीकरण पास जाकर न हो जाये।
उन सज्जन ने कहा‘-ठीक है उस चकाचौंध रौशनी वाले मार्ग पर रात को नहीं जाऊंगा क्योंकि कोई राय तत्काल कायम न करने की शक्ति तो मुझमें नहीं है। वह तो मन है कि भटकने से बाज नहीं आता।’
गुरुजी उसका उत्तर सुनकर हंसते हुए बोले-‘वैसे यह भी संभव नहीं लगता कि तुम चका च ौंधी रौशनी वाले मार्ग पर रात को नहीं जाओ। वह नहीं तो दूसरा मार्ग रात के जाने के लिये पकड़ोगे। वहां भी ऐसा ही होगा। सामने रौशनी दायें बायें अंधेरा। न भी हो तो ऐसी रौशनी अच्छे खासे को अंधा बना देती है। दिन में भला खाक कहीं रौशनी होती है जो वहां जाओगे। रौशनी देखने की चाहत किसमें नहीं है। अरे, अगर इस रौशनी और अंधेरे के द्वंद्व लोग समझ लेते तो रौशने के सौदागर भूखे मर गये होते? सभी लोग उसी रौशनी की तरफ भाग रहे हैं। जमाना अंधा हो गया है। किसी को अपने दायें बायें नहीं दिखता। अरे, अगर तुमने तय कर लिया कि चकाचौंध वाले मार्ग पर नहीं जाऊंगा तो फिर जीवन की किसी सड़क पर दृष्टिभ्रम नहीं होगा।सवाल तो इस बात का है कि अपने निश्चय पर अमल कर पाओगे कि नहीं।’’
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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समाज हिन्दी भाषा का महत्व समझे- चिंतन आलेख (hindi ka mahatva-hindi chitan lekh

सुना है अब इंटरनेट में लैटिन के साथ ही देवनागरी में भी खोज सुगम होने वाली है। यह एक अच्छी खबर है मगर इससे हिंदी भाषा के पढ़ने और लिखने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ जायेगी, यह आशा करना एकदम गलत होगा। सच तो यह है कि अगर देवनागरी में खोज सुगम हुई भी तो भी इसी मंथर गति से ही हिंदी लेखन और पठन में बढ़ोतरी होगी जैसे अब हो रही है। हिंदी को लेकर जितनी उछलकूल दिखती है उतनी वास्तविकता जमीन पर नहीं है। सच कहें तो कभी कभी तो लगता है कि हम हिंदी में इसलिये लिख पढ़े रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी हमारे समझ में नहीं आती। हम हिंदी में लिख पढ़ते भी इसलिये भी है ताकि जैसा लेखक ने लिखा है वैसा ही समझ में आये। वरना तो जिनको थोड़ी बहुत अंग्रेजी आती है उनको तो हिंदी में लिखा दोयम दर्जे का लगता है। वैसे अंतर्जाल पर हम लोगों की अंग्रेजी देखने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि लोगों की अंग्रेजी भी कोई परिपक्व है इस पर विश्वास नहीं करना चाहिए-क्योंकि बात समझ में आ गयी तो फिर कौन उसका व्याकरण देखता है और अगर दूसरे ढंग से भी समझा तो कौन परख सकता है कि उसने वैसा ही पढ़ा जैसा लिखा गया था। बहरहाल अंग्रेजी के प्रति मोह लोगों का इसलिये अधिक नहीं है कि उसमें बहुत कुछ लिखा गया है बल्कि वह दिखाते हैं ताकि लोग उनको पढ़ालिखा इंसान समझें।
‘आप इतना पढ़ें लिखें हैं फिर भी आपको अंग्रेजी नहीं आती-‘’हिंदी में पढ़े लिखे एक सज्जन से उनके पहचान वाले लड़के ने कहा’‘-हमें तो आती है, क्योंकि अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं न!’
मध्यम वर्ग की यह नयी पीढ़ी हिंदी के प्रति रुझान दिखाने की बजाय उसकी उपेक्षा में आधुनिकता का बोध इस तरह कराती है जैसे कि ‘नयी भारतीय सभ्यता’ का यह एक एक प्रतीक हो।
जैसे जैसे हिंदी भाषी क्षेत्रों में सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों और महाविद्यालयों के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है-निजी क्षेत्र में अंग्रेजी की शिक्षा का प्रसार बढ़ा है। एक दौर था जब सरकारी विद्यालयों में प्रवेश पाना ही एक विजय समझा जाता था-उस समय निजी क्षेत्र के छात्रों को फुरसतिया समझा जाता था। उस समय के दौर के विद्यार्थियों ने हिंदी का अध्ययन अच्छी तरह किया। शायद उनमें से ही अब ऐसे लोग हैं जो हिंदी में लेखन बेहतर ढंग से करते हैं। अब अगर हिंदी अच्छे लिखेंगे तो वही लोग जिनके माता पिता फीस के कारण अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालयों में नहीं पढ़ा सकते और सरकारी विद्यालयों में ही जो अपना भविष्य बनाने जाते हैं।
एक समय इस लेखक ने अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध स्तंभकार श्री खुशवंत सिंह के इस बयान पर विरोध करते हुए एक अखबार में पत्र तक लिख डाला‘जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदी गरीब भाषा है।’
बाद में पता लगा कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा बल्कि उनका आशय था कि ‘हिन्दुस्तान में हिंदी गरीबों की भाषा है’। तब अखबार वालों पर भरोसा था इसलिये मानते थे कि उन्होंने ऐसा कहा होगा पर अब जब अपनी आंखों के सामने बयानों की तोड़मोड़ देख रहे हैं तो मानना पड़ता है कि ऐसा ही हुआ होगा। बहरहाल यह लेखक उनकी आलोचना के लिये अब क्षमाप्रार्थी है क्योंकि अब यह लगने लगा है कि वाकई हिंदी गरीबों की भाषा है। इन्हीं अल्पधनी परिवारों में ही हिंदी का अब भविष्य निर्भर है इसमें संदेह नहीं और यह आशा करना भी बुरा नहीं कि आगे इसका प्रसार अंतर्जाल पर बढ़ेगा, क्योंकि यही वर्ग हमारे देश में सबसे बड़ा है।

समस्या यह है कि इस समय कितने लोग हैं जो अब तक विलासिता की शय समझे जा रहे अंतर्जाल पर सक्रिय होंगे या उसका खर्च वहन कर सकते हैं। इस समय तो धनी, उच्च मध्यम, सामान्य मध्यम वर्ग तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिये ही यह एक ऐसी सुविधा है जिसका वह प्रयोग कर रहे हैं और इनमें अधिकतर की नयी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित है। जब हम अंतर्जाल की बात करते हैं तो इन्हीं वर्गों में सक्रिय प्रयोक्ताओं से अभी वास्ता पड़ता है और उनके लिये अभी भी अंग्रेजी पढ़ना ही एक ‘फैशनेबल’ बात है। ऐसे में भले ही सर्च इंजिनों में भले ही देवनागरी करण हो जाये पर लोगों की आदत ऐसे नहीं जायेगी। अभी क्या गूगल हिंदी के लिये कम सुविधा दे रहा है। उसके ईमेल पर भी हिंदी की सुविधा है। ब्लाग स्पाट पर हिंदी लिखने की सुविधा का उपयेाग करते हुए अनेक लोगों को तीन साल का समय हो गया है। अगर हिंदी में लिखने की इच्छा वाले पूरा समाज होता तो क्या इतने कम ब्लाग लेखक होते? पढ़ने वालों का आंकड़ा भी कोई गुणात्मक वुद्धि नहीं दर्शा रहा।
गूगल के ईमेल पर हिंदी लिखने की सुविधा की चर्चा करने पर एक नवयौवना का जवाब बड़ा अच्छा था-‘अंकल हम उसका यूज (उपयोग) नहीं करते, हमारे मोस्टली (अधिकतर) फ्रैंड्स हिंदी नहीं समझते। हिंदी भी उनको इंग्लिश (रोमन लिपि) में लिखना पसंद है। सभी अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं। जो हिंदी वाले भी हैं वह भी इससे नहीं लिखते।’
ऐसे लोगों को समझाना कठिन है। कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी की कितनी भी सुविधा अंतर्जाल पर आ जाये उसका लाभ तब तक नहीं है जब तक उसे सामान्य समाज की आदत नहीं बनाया जाता। इसका दूसरा मार्ग यह है कि इंटरनेट कनेक्शन सस्ते हो जायें तो अल्प धन वाला वर्ग भी इससे जुड़ेे जिसके बच्चों को हिंदी माध्यम में शिक्षा मजबूरीवश लेनी पड़ रही है। यकीनन इसी वर्ग के हिंदी भाषा का भविष्य को समृद्ध करेगा। ऐसा नहीं कि उच्च वर्ग में हिंदी प्रेम करने वाले नहीं है-अगर ऐसा होता तो इस समय इतने लिखने वाले नहीं होते-पर उनकी संख्या कम है। ऐसा लिखने वाले निरंकार भाव से लिख रहे हैं पर उनके सामने जो समाज है वह अहंकार भाव से फैशन की राह पर चलकर अपने को श्रेष्ठ समझता है जिसमे हिंदी से मूंह फेरना एक प्रतीक माना जाता है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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नया सामान भी कबाड़ हो जाता है-हिंदी व्यंग्य कविता (naya saman aur kabad-hindi vyangya kavita)

सुनने और पढने वाला
जाल में फंस जाए
विज्ञापन ऐसे ही सजाये जाते हैं.
अगर उनमें सच होता तो
नहीं भर जाते घर उस कबाड़ के सामान से
जिनको खरीदा था कभी चाव से
बड़े महंगे भाव से
आये थे जो सामान नए बनकर ठेले से
वही कभी कबाड़ बनकर फिर उसमें लद जाते हैं.
———————
बाज़ार अब नगद ही नहीं
उधार पर भी चलते हैं.
चुकाते हुए रोते रहो
नहीं चुकाने पर
चीख पुकार भी मचती है
कभी उधार वाले
पहलवान बनकर गर्दन भी पकड़ते हैं.

—————————-
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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अय्याशी की चीजों पर वह फ़िदा हो जाते-हिंदी व्यंग्य कविताएँ (khamosh duniya-hindi kavita

निरापद रहने की कोशिश
निष्क्रिय बना देती है
बाहर जलती आग पर
दिल को ठंडा रखने की सोच
घर को राख बना देती है.
खामोशी से जीती जा सकती हैं दुनिया
पर जीतती है वही बांह
जो जंग में हथियार लेती है.
———————-
जिन के पेट भरे हैं
उनके घर भी बहुत बड़े हैं
अय्याशी की चीजों पर वह फ़िदा हो जाते.
भूख का मतलब वह क्या समझें
रोटी को जो पेट तरसे
उनकी निहारती आँखों को अमीर नहीं पढ़ते
बगावत के इन्तजार में उनके पल भी गुजर जाते.
मौके पर टूटे लोग ही
अपने हाथों से जलाकर चिंगारी
अपनी आग को इतिहास की धारा से बुझाते.
ऐ, दौलतमंदों तुम यह क्यों नहीं समझ पाते.

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बाहर जलती रौशनी देखकर भी
कब तक खुश रहा जा सकता है
अंदर का अंधेरा कभी न कभी
बाहर आकर दर्द देता
खुशियों का बोझ भी कब तक सहा जा सकता है
………………………………
अपनी आवाज बुलंद होने का गुमान
कुछ इस तरह है उनको कि
कहीं मशहूर हम भी न हो जायें
वह अपने लबों सें नाम लेते भी डरते हैं।
हम भी कहां चाहते हैं
रौशनी करने की कीमत
क्योंकि ठहरे वह चिराग जो
अपने तले अंधेरा रखते हैं।


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hindi poem, masti, shayri, sher, कला, मनोरंजन, मस्त राम, मस्ती, शायरी, शेर, समाज, हिंदी साहित्य

यह स्वयंवर-हिंदी हास्य व्यंग (the swyanvar-hindi vyang

जहां तक भारत की स्वयंवर परंपराओं से जुड़ी कथाओं की हमें जानकारी है तो उसके नायक नायिका तो नयी उम्र के एकदम ताजा पात्र होते थे पर इधर दूरदृश्य प्रसारणों (टीवी कार्यक्रम) में देख रहे हैं उस परंपरा के नाम पर एक तरह से पुराना कबाड़ सजाया जा रहा है।
उच्च शिक्षा-अजी, यही वाणिज्य स्नातक की-के दौरान महाविद्यालयों के आचार्य अपने अपने विषयों के पाठ्य पुस्तकें लाने के निर्देश साथ उनके लेखकों का नाम भी लिखाते थे। चूंकि अपने यहां शिक्षा के दौरान उस समय तक-अब पता नहीं क्या स्थिति है- आचार्य का वाक्य ब्रह्म वाक्य समझा जाता था इसलिये हम उन पुस्तकों ढूंढने निकलते थे। पुराने साथी छात्रों ने बता दिया कि इसके लिये ‘द्वितीय हस्त पुस्तकें (सैकिण्ड हैण्ड बुक्स) लेना बेहतर रहेगा। वह यह राय इसलिये देते थे कि वह अपनी पुस्तकें बेचकर आगे की पुस्तकें इसी तरह लाते थे। उनके मार्गदर्शन का विचार कर हम भी ‘द्वितीय हस्त पुस्तकें’ हम खरीद लाते थे अलबत्ता उनको बेचने कभी नहीं गये।
उस समय शहर में एक दुकान तो ऐसी थी जो उच्च और तकनीकी शिक्षा की द्वितीय हस्त पुस्तकों का ही व्यापार करती थी। पहले से दूसरे हाथ में जाती पुस्तकें उनके लिये कमीशन जुटाने का काम करती थी। हम सोचते थे कि ‘द्वितीय हस्त पुस्तकें’ खरीद रहे हैं पर बाद में जब थोड़ा भाषा ज्ञान हुआ तो पता लगा कि पुस्तकें तो पुस्तकें हैं उनके लिये द्वितीय हस्त -हो सकता है तृतीय और चतुर्थ भी हो- हम ही उनके लिये होते थे।
बहरहाल इतना तय रहा कि हमने अपनी उच्च शिक्षा ऐसी ‘द्वितीय हस्त पुस्तकों’ के सहारे ही प्राप्त की। इसलिये जब कहीं नयी पुरानी चीज की चर्चा होती है तब हमें उस द्वितीय हस्त पुस्तकों का ध्यान आता है।

देखा जाये तो हम जीवन में कभी न कभी द्वितीय हस्त या कहें पुराना माल बन ही जाते हैं। कम से कम शादी के मामले में तो यही होता है। पहली शादी का महत्व हमेशा ही रहता है दूसरी शादी का मतलब ही यही है कि आप सैकिण्ड हैंड हैं या आपकी साथी? इस पर विवाद हो सकता है।
इधर एक दूरदृश्य (टीवी कार्यक्रम) धारावाहिक में हमने देखा कि एक तलाकशुदा आदमी अपना स्वयंवर रचा रहा है। तब हमें भी सैकिण्ड पुस्तक का ध्यान आया। हम आज तक तय नहीं कर पाये कि उन पुस्तकों के लिये हम द्वितीय हस्त थे या वही हमारे लिये पुरानी थी। अलबत्ता उन पुस्तकों को पाठक मिला और हमें ज्ञान-इसका प्रमाण यह है कि हम इतना लिख लेते हैं कि लोगों की हाय निकल जाती है। फिर हम स्वयंवर प्रथा पर विचार करते हैं जिनका अध्यात्म पुस्तकों में-जी, वह बिल्कुल नयी खरीद कर लाते थे क्योंकि पाठ्य पुस्तकों के मुकाबले वह कुछ सस्ती मिलती थी-इस प्रथा का जिक्र पढ़ते रहे हैं। जहां तक हमारी जानकारी है स्वयंवर ताजा चेहरों के लिये आयोजित किया जाता था। तलाक शुदा या जीवन साथी खो चुके लोगों के लिये कभी कोई स्वयंवर आयोजित हुआ हो इसका प्रमाण नहीं मिलता। हम यह जरूर कहते हैं कि स्त्री के प्रति समाज के मानदण्ड अलग हैं पर जहां तक पहली शादी की बात है तो उसका ताजगी का पैमाना दोनों पर एक जैसा लागू होता है। वैसे हमारे यहां प्रचलित विदेशी विचार के अनुसार पहला प्यार ही आखिरी प्यार होता है पर देसी भाषा में ‘पहली शादी’ को ही आखिरी शादी माना गया है। उसके बाद आदमी हो या औरत- जहां तक सामाजिक रूप से शादी का प्रश्न है-बासी चेहरे की श्रेणी में आ जाते हैं। अगर स्त्री का दूसरा विवाह हो तो एकदम सादगी से होता है और पुरुष का कुछ धूमधाम से होने के बावजूद बारातियों का चेहरा बासी लगता है क्योंकि वह इतने खुश नहीं दिखते जितना पहली शादी में थे-यह अनुभव की हुई बात बता रहे हैं। तात्पर्य यह है कि यह स्वयंवर केवल ताजा चैहरे वाले नवयुवा वर्ग-जी, युवा वर्ग से पहले का वर्ग- के सदस्यों के लिये रहा है। इसमें लड़का लड़की आपस में दूर किसी दूसरे से भी नहीं मिले होते थे। इसलिये उनके विवाहों का वर्णन आज भी ताजगी से भरा लगता है।
अभी एक अभिनेत्री का स्वयंवर हुआ था। वह वर चुनने नहीं आई बल्कि मंगेतर चुनने आयी थी और फिर उसे प्रेमी बताने लगी। उसी अभिनेत्री का एक अभिनेत्रा से प्रेम संबंध कुछ दिन पहले ही विच्छेद हुआ था। देखा जाये तो उसे एकदम ताजा चेहरा नहीं माना जा सकता था क्योंकि अंततः उसने प्रचार माध्यमों में अनेक बार उस अभिनेता से प्रेम संबंध होने की बात स्वीकारी थी। मगर बाजार ने उसका स्वयंवर बेचा और कमाया भी।

इधर एक बड़े आदमी का बेटे ने भी दूरदृश्य धारावाहिकों में अपने को अभिनेता के रूप में स्थापित कर लिया है। उस पर मादक द्रव्यों के सेवन का आरोप तो एक बार लग ही चुका है साथ ही उसने एक विवाह भी किया जिसकी परिणति तलाक के रूप में हुई। अब उसके स्वयंवर का कार्यक्रम हो रहा है। देश में जो बौद्धिक जड़ता है उसे देखकर उसके कार्यक्रम की सफलता में कोई संदेह नहीं है। कहने को तो लोग कहते हैं कि भारतीय अध्यात्म ग्रंथों को पढ़ने से कुछ नहीं होता पर बाजार उसमें से बेचने योग्य परंपराओं क्यों ला रहा है? सच बात तो यह है कि हमारे धर्म ग्रंथों में शिक्षा, तत्व ज्ञान के साथ मनोरंजन भी है इसलिये उनका आकर्षण सदाबहार रहता है। दूसरा सच यह भी है कि रामायण, श्रीमद्भागवत, महाभारत, वेद, पुरान, उपनिषद जिस तरह लिखे गये हैं उसकी बराबरी अब कोई लिखने वाला कर ही नहीं सकता। शायद यही कारण है कि आधुनिक विद्वानों ने जहां तक हो सके समाज से उनको बहिष्कृत करने के लिये हर संभव प्रयास किया है क्योंकि उनके प्रचलन में रहते उनकी रचनायें प्रतिष्ठित नहीं हो पाती। आधुनिक भारत में विवेकानंद जैसे जो दिग्गज हुए हैं वह भी इन्हीं महाग्रंथों के अध्ययन के कारण हुए हैं। इसलिये बकायदा इन महाग्रंथों से समाज को दूर रखने का प्रयास किया गया। उसका परिणाम यह हुआ कि आजकल की नयी पीढ़ी के वही सदस्य अपने देश को समझ सकते हैं जिन्होंने घर पर इनका अध्ययन किया है, बाकी के लिये यह संभव नहीं है क्योंकि इनके अध्ययन के लिये कोई औपचारिक शिक्षा केंद्र नहीं है। अगर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के लिये कोई शैक्षणिक केंद्र खुले तो आज भी लोग उसमें अपने बच्चों को ही नहीं पढ़ायेंगे बल्कि स्वयं भी जायेंगे। यह कमी पेशेवर संतों से नहीं पूरी हो सकती। ऐसे मे स्वयंवर जैसी व्यवस्था के बारे में किसी को अधिक पता नहीं है या फिर लोग ध्यान में नहीं ला रहे।
बाजार के प्रभाव में तो प्रचार माध्यम खलनायकों को नायक बनाये जा रहे हैं। पता नहीं वह कैसे वह इन सितारों को चमका रहे हैं जिनके चरित्र पर खुद इन्हीं प्रचार माध्यमों ने कभी दाग दिखाये हैं। देखा जाये तो यह स्वयंवर कार्यक्रम देश का मजाक उड़ाने जैसा ही है। अगर विदेशी लोग इनको देखेंगे तो यही सोचेंगे कि-‘अरे, यह कैसी इस देश की घटिया प्रथा है? जिसमें चाहे कभी भी किसी का स्वयंवर रचाया जा सकता है
वैसे बाजार जो कर रहा है उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। होना भी नहीं चाहिए पर लोगों में जागरुकता आ जाये तो हो सकता है ऐसे कार्यक्रम ऊंची वरीयता प्राप्त नहीं कर सकते। कम से कम सैकिण्ड हैण्ड पुस्तक को नया बेचने का काम तो करने से उन्हें रोका जा सकता है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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किसका हुआ कभी कोहिनूर-व्यंग्य कविता (kiska hua kohinoor-vyangya kavita)

चंद खोये सिक्के ढूंढने के लिए
पूरा घर का सामान बिखेर डाला
मिले पलंग के नीचे गिरे हुए
पहले तो खुशी मिली, फिर हुई काफूर।
बिखरी हुई शयों को समेटने के
ख्याल ने कर दिया बदन पहले ही चूर।
खोये पाये के हिसाब में
पूरी जिंदगी हो जाती है बेनूर।
सिक्के इतने जमा कर लिये संभाले नहीं जाते
गिनती में भूल जायें
तो देखते हैं उनको घूर।
सोचते कौन कम हुआ चश्मेबद्दूर।
खोये हुए सिक्के मिल गये
पर चले जायेंगे हाथ से
बनेंगे किसी दूसरे हाथ का नूर।
जिंदगी में गमों का सिलसिला भी आता है
खुशियां भी साथ चलती थोड़ी दूर।
अपना कितनों ने माना होगा
पर किसका हुआ कभी कोहिनूर।

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ऐसे ही अफसाने-हिंदी व्यंग्य कविता (bade log-hindi vyangya kavita)

जब बहता था दरिया में पानी
तब भला कौन वादा करता था उसे लाने का।
कहीं बांध बनाये
कहीं रास्ता बदला
पानी को बनाकर बेचने की शय
जिन्होंने बिगाड़ दी प्रकृति की लय
अब वही करते हैं सभी जगह दावा
पानी का दरिया बहाने का।
छोटे ईमान के लोग
बड़े बन जाते हैं इस जमाने में
लेकर सहारा ऐसे ही अफसाने का।
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शोर और शांति-हिन्दी कविता (shor aur shanti)

शोर कर रही भीड़ में
शांति कराने के लिये
बहुत तेज आवाज में शोर मचाओगे
तो तुम भी शांति के मसीहा हो जाओगे।
अंधेरे में खड़े लोगों से
रौशनी का वादा करते रहो
तारीफों के कसीदे पढ़े जाते रहेंगे,
लोग भूल जायेंगे अपनी तकलीफ
तब कोई नहीं देखेगा तुम्हारी तरफ
जब सचमुच चिराग जलाओगे।

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हमदर्दी बेजान होकर जताते-हिंदी कविता (bezan hamdard-hindi poem

अक्सर सोचते हैं कि
कहीं कोई अपना मिल जाए
अपने से हमदर्दी दिखाए
मिलते भी हैं खूब लोग यहाँ
पर इंसान और शय में फर्क नहीं कर पाते.
हम अपने दर्द छिपाते
लोग उनको ही ढूंढ कर
ज़माने को दिखाने में जुट जाते
कोई व्यापार करता
कोई भीख की तरह दान में देता
दिल में नहीं होती पर
पर जुबान और आखों से दिखाते.
हमदर्दी होती एक जज़्बात
लोग बेजान होकर जताते.
दूसरे के जख्म देखकर मन ही मन मुस्कराते.
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नापसंद लेखक, पसंदीदा आशिक-हिन्दी हास्य कविता (rejected writer-hindi hasya kavita)

आशिक ने अपनी माशुका को
इंटरनेट पर अपने को हिट दिखाने के लिये लिए
अपने ब्लाग पर
पसंद नापसंद का स्तंभ
एक तरफ लगाया।
पहले खुद ही पसंद पर किल्क कर
पाठ को ऊपर चढ़ाता था
पर हर पाठक मूंह फेर जाता था
नापसंद के विकल्प को उसने लगाया।
अपने पाठों पर फिर तो
फिकरों की बरसात होती पाया
पसंद से कोई नहीं पूछता था
पहले जिन पाठों को
नापसंद ने उनको भी ऊंचा पहुंचाया।
उसने अपने ब्लाग का दर्शन
अपनी माशुका को भी कराया।
देखते ही वह बिफरी
और बोली
‘‘यह क्या बकवाद लिखते हो
कवि कम फूहड़ अधिक दिखते हो
शर्म आयेगी अगर अब
मैंने यह ब्लाग अपनी सहेलियों को दिखाया।
हटा दो यह सब
नहीं तो भूल जाना अपने इश्क को
दुबारा अगर इसे लगाया।’’

सुनकर आशिक बोला
‘‘अरे, अपने कीबोर्ड पर
घिसते घिसते जन्म गंवाया
पर कभी इतना हिट नहीं पाया।
खुद ही पसंद बटन पर
उंगली पीट पीट कर
अपने पाठ किसी तरह चमकाये
पर पाठक उसे देखने भी नहीं आये।
इस नपसंद ने बिना कुछ किये
इतने सारे पाठक जुटाये।
तुम इस जमाने को नहीं जानती
आज की जनता गुलाम है
खास लोगों के चेहरे देखने
और उनका लिखा पढ़ने के लिये
आम आदमी को वह कुछ नहीं मानती
आम कवि जब चमकता है
दूसरा उसे देखकर बहकता है
पसंद के नाम सभी मूंह फुलाते
कोई नापसंद हो उस पर मुस्कराते
पहरे में रहते बड़े बड़े लोग
इसलिये कोई कुछ नहीं कर पाता
अपने जैसा मिल जाये कोई कवि
उस अपनी कुंठा हर कोई उतार जाता
हिट देखकर सभी ने अनदेखा किया
नापसंद देखकर उनको भी मजा आया।
ज्यादा हिट मिलें इसलिये ही
यह नापसंद चिपकाया।
अरे, हमें क्या
इंटरनेट पर हिट मिलने चाहिये
नायक को मिलता है सब
पर खलनायक भी नहीं होता खाली
यह देखना चाहिये
मैं पसंद से जो ना पा सका
नापसंद से पाया।’’

इधर माशुका ने सोचा
‘मुझे क्या करना
आजकल तो करती हैं
लड़कियां बदमाशों से इश्क
मैंने नहीं लिया यह रिस्क
इसे नापसंद देखकर
दूसरी लड़कियां डोरे नहीं डालेंगी
क्या हुआ यह नापसंद लेखक
मेरा पसंदीदा आशिक है
इसमें कुछ बुरा भी समझ में नहीं आया।’
……………………………..

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हिंदी

बनाते हैं अपनी दुनियां खुद-हिंदी कविता (khud banate apne duinyan-hindi kavita

धरती पर अपने कदम दर कदम
चलते हुए जब
नजर करता हूं नीचे की तरफ
तब जहां तक देखता हूं
वहीं तक ख्याल चलते हैं
दुनियां बहुत छोटी हो जाती है।

आंखें उठाकर देखता हूं जब आकाश में
चारों तरफ घुमते हुए
उसके अनंत स्वरूप के दृश्य से
इस दुनियां के बृहद होने की
अनुभूति स्वतः होने लग जाती है।
ख्यालों को लग जाते हैं पंख
सोचता हूं मेरे पांव भले ही
नरक में चलते हों
पर कहीं तो स्वर्ग होगा
तब अधरों पर मुस्कान खेल जाती है।

दृष्टि से बनता जैसा दृष्टिकोण
वैसा ही दृश्य सामने आता है
मगर दृष्टिकोण से जब बनती है दृष्टि
तब हृदय को छू लें
ऐसे मनोरम दृश्य सामने आते हैं
शायद यही वजह है
इस संसार में रहते दो प्रकार के लोग
एक जो बनाते हैं अपनी दुनियां खुद
दूसरे वह जिनको दूसरी की
बनी बनायी लकीर चलाती है।
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दर्द देकर इलाज करने वाले-हिंदी शायरी (hindi poem)

अपना दर्द यूं जमाने को न दिखाओ
दवा देकर इलाज करने वाले
हर जगह नहीं मिलते हैं।
जो अल्फाजों की जादूगरी से
जख्मों का बहता खून चूस लें
इस जहां में
जुबानी हमदर्दी के ऐसे सौदागर भी मिलते हैं।
…………………………
चक्षुहीन करते प्रकृति सौंदर्य का बखान
बहरे सिर हिलाते, सुनकर कोई भी गान
पैसे से प्रायोजन की महिमा होती अपरंपार
गूंगे गाते कविता, मूर्ख बताते वेदों का ज्ञान।
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