Tag Archives: hindi nibandh

राज्य प्रबंध का समाज में हस्तक्षेप अधिक नहीं होना चाहिये-हिन्दी लेख


                    भारत में सामाजिक, आर्थिक, धाार्मिक, शिक्षा पत्रकारिता, खेल, फिल्म, टीवी तथा अन्य सभी सार्वजनिक विषयों में राज्य का हस्तक्षेप हो गया है।  अनेक ऐसे काम जो समाज को ही करना चाहिये वह राज्य प्रबंध पर निर्भर हो गये हैं। ऐसे में जब कोई राजनीतिक बदलाव होता है तो हर क्षेत्र में उसके प्रभाव देखने को मिलते हैं।  देश में गत साठ वर्षों से राजनीतिक धारा के अनुसार ही सभी सार्वजनिक विषयों तथा उनसे संबद्ध संस्थाओं में राज्य का हस्तक्षेप का हस्तक्षेप हुआ तो विचाराधाराओं के अनुसार ही वहां संचालक भी नियुक्त हुए।  हमारे देश में तीन प्रकार की राजनीतिक विचाराधारायें हैं-समाजवादी, साम्यवादी और दक्षिणपंथी।  उसी के अनुसार रचनाकारों के भी तीन वर्ग बने-प्रगतिशील जनवादी तथा परंपरावादी।  अभी तक प्रथम दो विचाराधारायें संयुक्त रूप से भारत की प्रचार, शिक्षा तथा सामाजिक निर्माण में जुटी रहीं हैं पर परिणाम ढाक के तीन पात।  उल्टे समाज असमंजस की स्थिति में है।

                    पिछले साल हमारे देश में एतिहासिक राजनीतिक परिवर्तन हुआ। पूरी तरह से दक्षिणपंथी संगठन राजनीतिक परिवर्तन के संवाहक बन गये।  भारत में यह कभी अप्रत्याशित लगता  था पर हुआ।  अब दक्षिणपंथी संगठन अपने प्रतिपक्षी विचाराधाराओं की नीति पर चलते हुए वही कर रहे है जो पहले वह करते रहे थे।  प्रतिपक्षी विचाराधारा के विद्वान शाब्दिक विरोध करने के साथ ही  हर जगह अपने मौजूदा तत्वों को प्रतिरोध  के लिये तत्पर बना रहे हैं।

                    इस लेखक ने तीनों प्रकार के बुद्धिजीवियों के साथ कभी न कभी बैठक की है।  प्रारंभ  में दक्षिण पंथ का मस्तिष्क पर  प्रभाव था पर श्रीमद्भागवत गीता, चाणक्य नीति, कौटिल्य, मनुस्मृति, भर्तुहरि नीति शतक, विदुर नीति तथा अन्य ग्रंथों पर अंतर्जाल पर लिखते लिखते अपनी विचाराधारा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से मिल गयी है।  हमें लगता है कि हमारे अध्यात्मिक दर्शन में न केवल आत्मिक वरन् भौतिक विषय में भी ढेर सारा ज्ञान है। पश्चिमी अर्थशास्त्र में दर्शन शास्त्र का अध्ययन नहीं होता और हमारे यहां दर्शन शास्त्र में भी अर्थशास्त्र रहता है।  दक्षिणपंथ की विचाराधारा से यही सोच हमें प्रथक करती है।

          बहरहाल हमारा मानना है कि समाजवाद और साम्यवादियों की विचाराधारा के आधार  पर समाज और उसकी संस्थाओं का राज्य प्रबंध की शक्ति से  ही चलाया गया था।  अब अगर राज्य प्रबंध बदल गया है तो अन्य संस्थाओं में  दक्षिणपंथी विद्वानों का नियंत्रण चाहें तो न चाहें तो होगा तो जरूर।  अध्यात्मिक विचारधारा के संवाहक होने की दृष्टि से हम भी चाहते हैं कि परिवर्तन हो। आखिर समाज और उसके विचार विमर्श तथा शिक्षण की संस्थाओं में जनमानस के दिमाग में परिवर्तन की वही चाहत तो है जो लोगों ने राज्य प्रबंध में बदलाव कर जाहिर की है।

—————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

Advertisements

भारतीय मीडिया की #आतंकवाद में बहुत रुचि लाभप्रद नहीं-हिन्दी चिंत्तन #लेख


                लगभग आईएसआईएस नामक एक आंतकी संगठन के समाचार एक विज्ञापन की तरह भारतीय प्रचार माध्यम इस तरह कर रहे हैं जैसे कि उसमें आकाश से उतरे महादानव हों। जिनसे लड़ने के लिये कोई भारत में कोई  पैदा ही नहीं हुआ।  शायद प्रचार प्रबंधकों को लग रहा है कि कथित भारतीय आतंकी सगंठनों के दम पर अब उनकी सनसनी का व्यवसाय चल नहीं पा रहा या फिर ज्यादा नहीं चलेगा। हमारे हिसाब से आईएसआईएस अपने सहधर्मी राष्ट्र की सरकारें से संरक्षित है जो अपने आसपास के कमजोर क्षेत्रों में धार्मिक आधार पर वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। भारतीय प्रचार माध्यम उन देशों के नाम छिपाते हैं क्योंकि इनके स्वामियों के अन्य व्यवसाय उनके शहरों में ही है।

                              प्रचारकों के चेहरे अनेक बार इस तरह झल्लाते दिखते हैं अभी तक आईएसआईएस वाले इस देश में आये क्यों नहीं? दुर्भाग्य से किसी दिन इस संगठन के नाम पर कोई छोटी वारदात भी  हुए उस दिन यह विज्ञापनों के बीच  चिल्लायेंगे-आ गया आ गया आईएसआईएस आ गया। इन प्रचारकों को भारतीय आतंकी संगठन उसके मुकाबले कम क्रूर लगते हैं क्योंकि वह बम विस्फोट कर भाग जाते हैं। आईएसआईएस वाले तो क्रूरता पूर्वक हत्या का सीधा प्रसारण करते है।  भारतीय प्रचार प्रबंधक उसका सतत प्रचार इस आशा से करते लगते हैं कि भविष्य में ऐसे दृश्य यहां हो तो कुछ संवेदनाओं का व्यापार चमकदार हो जाये।  हमारी यह समझायश है कि अनावश्यक रूप से इस संगठन का प्रचार न करें। यह संगठन भारत में सक्रिय होगा या नहीं, यह कहना कठिन है पर कहीं ऐसा न हो जाये कि प्रचार पाने के लिये कुछ खरदिमाग लोग उस जैसे कांड करने लगें। हम भारतीय प्रचार माध्यमों की दो खबरों से बेहद चिढ़ते हैं। एक तो श्रीनगर में हर शुक्रवार को पाकिस्तानी झंडे फहराने दूसरा आईएसआईएस के हत्या के प्रसारण हमें बेहद चिढ़ा देते हैं। इन खबरों की भारत में चर्चा करना  एक तरह से आतंकवाद का विज्ञापन करना है।

—————————

#आईएसआईएस (#isisi)

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

बरसात का मौसम मैंढक की टर्र टर्र-हिन्दी कवितायें


अक्लमंदों को नहीं आता

समाज सुधारने का तरीका

वह नहीं खेद भी जताते।

जात भाषा और धर्म के

नाम पर उठाते मुद्दे

इंसानों में भेद बताते।

कहें दीपक बापू एकता के नाम

चला रहे अपना व्यापार

वही समाज में छेद कराते।

———–

बरसात का मौसम है

मैंढकों की आवाज

चारों तरफ आयेगी।

कोयल मौन हो गयी

संगीत जैसी सुरीली

आवाज अब नहीं आयेगी।

कहें दीपक बापू शोर कर

छिपाते लोग अपनी कमजोरी,

स्वार्थ से तोड़ते और जोड़ते

प्रेम की डोरी,

झूठ का तूफान उठाते

इस उम्मीद में कि

उनकी सच्चाई दब जायेगी।

——–

कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

४.हिन्दी पत्रिका

५.दीपकबापू कहिन

६. ईपत्रिका 

७.अमृत सन्देश पत्रिका

८.शब्द पत्रिका

कूड़े पर पद्य रचना हो सकती है-हिन्दी कवितायें


सर्वशक्तिमान के दरबार में

अब वह हाजिरी नहीं लगायेंगे,

कूड़े के इर्द गिर्द झाड़ू 

झंडे की तरह लहराकर

प्रतिष्ठा का दान पाकर

शिखर पर चढ़ जायेंगे।

—————-

शहर में कचरा बहुत

उम्मीद है कोई तो आकर

उसे हटायेगा।

कभी अभियान चलेगा

स्वच्छता का

कोई तो झाड़ू झंडे की तरह

लहराता आयेगा।

—————–

पुरानी किताबों में लिखे

शब्दों के अर्थ का व्यापार

वह चमका रहे हैं।

स्वर्ग का सौदा करते

बंदों में सर्वशक्तिमान के दलाल बनकर

 नरक के भय से

वह धमका रहे हैं।

कहें दीपक बापू सांसों से

लड़खड़ाते बूढ़े हो चुके चेहरे

इंसानों में पुराने होने के भय से

खंडहर हो चुके ख्यालों को

नया कहकर चमका रहे हैं।

———–

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

आदमी चूहे की प्रवृत्ति न रखे-हिन्दी चिंत्तन लेख


                              सब जानते हैं कि लालच बुरी बला है पर बहुत कम लोग हैं जो इस ज्ञान को धारण कर चलते हैं। हम में से अनेक लोगों ने पिंजरे में चूहे को फंसाकर घर से बाहर जाकर छोड़ा होगा।  सभी जानते हैं कि चूहे को पकड़ने के लिये पिंजरे में रोटी का एक टुकड़े डालना होता है।  चूहा जैसे ही उस रोटी के टुकड़े को पकड़ता है वह पिंजरे में बंद हो जाता है। चूहे में वह बुद्धि नहीं होती जिसे प्रकृत्ति ने भारी मात्रा में इंसान को सौंपा है।  फिर भी सामान्य मनुष्य इसका उपयोग नहंी करते।  अनेक लोग यह शिकायत करते हैं कि हमें अमुक आदमी ने ठग लिया है अथवा धोखा दिया है। इस तरह की शिकायत करने वाले लोग इस आशा में रहते हैं कि अपने साथ हुई ठगी या धोखे का बयान दूसरों से करेंगे तो सहानुभूति मिलेगी पर यह नहीं सोचते कि सुनने वाले उन्हीं की बुद्धि पर हंसते हैं-मन में कहते हैं कि यह चूहा बन गया।

                              कहा जाता है कि पशु पक्षियों तथा मनुष्य में भोजन, निद्रा तथा काम की प्रवृत्ति एक जैसी रहती है पर उसके पास उपभोग के  अधिक विकल्प चुनने वाली सक्षम बुद्धि होती है।  यह अलग बात है कि अनेक ज्ञान और योग साधक अपनी बुंिद्ध का उपयोग ज्ञान के साथ करने की योग्यता अर्जित कर लेते हैं जबकि सामान्य मनुष्य उसी तरह ही विषयों के पिंजरे में फंसा रहता है जैसे चूहा रोटी के टुकड़े में ठगा जाता है।  कहा जाता है कि आजकल तो मनुष्य अधिक शिक्षित हो गया है पर हम इसके विपरीत स्थिति देख रहे हैं।  निरर्थक शिक्षा नौकरी की पात्रता तो प्रदान करती है पर जीवन के सत्य मार्ग से विचलित कर देती है।  पढ़े लिखे लोग अशिक्षित लोगों से अधिक ठगी या धोखे का शिकार हो रहे हैं।  हमारे देश में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से जुड़ी शिक्षा को धर्म से जोड़कर शैक्षणिक संस्थानों से दूर रखा गया है पर अनुभव तो यह है कि इसके अभाव में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से पढ़े लोग अनपढ़ लोगों से ज्यादा दूसरों के बहकावे में आ जाते हैं। इसलिये यह भ्रम भी नहीं रखना चाहिये कि आधुनिक शिक्षा से व्यक्ति अध्यात्मिक ज्ञानी हो जाता है।

                              इसलिये जिन लोगों का अपना जीवन सुखद बनाना है वह नित्य भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्यययनर अवश्य करें। जीवन में सांसरिक विषयों के साथ अध्यात्मिक सिद्धांतों के अनुसार संपर्क करने का तरीका चाणक्य और विदुर नीति में अत्यंत सरलता से समझाया गया है।

————————–

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

गरीबी शब्द अब भी बिकता है-हिन्दी व्यंग्य


                              ‘गरीबी’ शब्द अब किसी श्रेणी की बजाय किसी आकाशीय फरिश्ते  का प्रतीक लगता है।  यह फरिश्ता अपनी चादर ओढ़े विचरने वालो  लोगों की तरफ तो नहीं देखता मगर अपना नाम जपने वालों को तख्त की सीढ़ियों पर पहुंचा देता है। जो गरीब इस फरिश्ते को घर में धारण किये हैं उनकी तरफ तो देखता भी नहीं है पर जो उससे हटाने या मिटाने के नारे लगाता है उसे खूब लोकप्रियता इतनी मिल जाती है कि वह दौलत, शौहरत और प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंच जाता है।

                              सामान्य इंसानों में गरीब होना अभिशाप है पर यह उन चालाक लोगों के लिये वरदान बन जाता है जो इस अभिशाप को दूर करने के लिये संघर्ष करने के नाटक रचते हैं।  हमारे देश में तो स्थिति यह है कि अगर कहीं क्रिकेट मैच में जीत पर जश्न मनाया जा रहा हो तो टीवी पर कोई भी कहता है कि ‘‘इससे क्या? पहले देश की गरीबी दूर करो।’’

                              हंसी तो तब आती है जब टीवी चैनलों पर प्रचारक खेल, क्रिकेट, कला या साहित्यक विषय पर चर्चा करते करते देश की गरीबी पर चले आते हैं।  अनेक स्वयंभू समाज सेवक जब इन बहसों के चरम पहुंचते हैं तो केवल गरीबी को दूर करना ही अपना लक्ष्य बताते हैं।

                              अभी डिजिटल इंडिया सप्ताह पर बहस चल रही थी।  यह सभी जानते हैं कि डिजिटल कार्य के लिये शिक्षित होने के साथ ही कंप्यूटर या मोबाइल होना जरूरी है। हमारे देश में करोड़ों लोग इस कार्य से जुड़ भी चुके हैं।  जब डिजिटल सप्ताह की चर्चा चल रही है तब उसके योग्य काम करने वालों की समस्याओं पर चर्चा होना चाहिये न कि उस समय गरीबी का रोना धोना होना चाहिये।  अब यह तो हो नहीं सकता कि पहले सभी को शिक्षित करने के साथ ही उनके कंप्यूटर तथा मोबाइल देने के बाद यह  सप्ताह मनाया जाये। इन टीवी चैनलों से कोई पूछे कि इस देश मेें अनेक गांवों में तो उनका कार्यक्रम भी देखने को नहीं मिलता तो क्या वह अपना प्रसारण बंद कर देंगे?

                              हमारे यह प्रगतिशील और जनवादी सोच इस कदर घुस गयी है कि किसी को विद्वान तब तक नहीं माना जाता जब तक गरीबी या गरीब का हितैषी होने का दावा कोई कर ले। इस सोच का विस्तार इस कदर है कि मजदूर को मजबूर और गरीब को भिखारी की तरह समझा जाता है।  यही कारण है कि मजदूरों को सिंहासन और गरीब को स्वर्ग दिलाने का वादा करने वाले अपना रोजगार  खूब चलाते हैं। यह अलग बात है कि आजकल मजदूर और गरीब यह समझ गये हैं कोई उनको सिंहासन तो क्या जमीन पर बैठने के लिये  चटाई और ही चलने लिये गाड़ी तो क्या साइकिल तक नहीं देगा।

————–

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

पूंजीपति भारत का स्वदेशी सर्वर बनवायें.डिजिटल इंडिया सप्ताह पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


                  डिजिटल इंडिया सप्ताह में अनेक प्रश्न हम जैसे उन लोगों के मन में आ रहे हैं जो करीब आठ दस वर्ष से अंतर्जाल पर सक्रिय हैं।  भारत के संगठित प्रचार माध्यमों के-टीवी और अखबार-के स्वामी कभी नहीं चाहेंगे कि अंतर्जाल का सामाजिक जनसंपर्क कभी उनका महत्व कम कर दे।  अब तो औ़द्योगिक समूह ही संगठित प्रचार माध्यमों के संचालक होने के साथ ही  टेलीफोन कंपनियों के भी स्वामी है इसलिये यह अपेक्षा करना कि अंतर्जाल को स्वदेशी सर्वर जैसा कोई मील का पत्थर रखना चाहेगा अतिश्योक्ति या आत्ममुग्धता होगी।

                  भारत के पूंजीपतियों की यह प्रवृत्ति है कि  वह सेवक और उपभोक्ता का निर्ममता से दोहन करना ही व्यापार का मूल सिद्धांत मानते हैं।  परंपरागत वस्तुओं के विक्रय विनिमय के आगे उनकी कोई योजना नहीं होती। नयी वस्तु का अविष्कार कर उसके लिये बाज़ार बनाना इनके स्वभाव में नहीं है। इसके अलावा वर्तमान पूंजीपति समूह कभी नहीं चाहता कि कोई उनका नया सदस्य बने।   भारत के वर्तमान पूंजी पुरुष  किसी तकनीकी विशारद  के हाथ स्वदेशी सर्वर होने का सपना भी नहीं देख सकते।  पश्चिम में जहां अपने व्यवसाय के तकनीकी ज्ञान रखने वाले अपनी कपंनी बनाकर स्वामी बनते हैं जबकि भारत कंपनियों के स्वामी बनने के बाद तकनीकी विशारदों को दोयम दर्ज का सेवक मानकर साथ लिया जाता है।  भारत में पूंजीपति होने के लिये तकनीकी ज्ञान, कलाकार होने के लिये कला और पत्रकार होने के लिये लेखक होना जरूरी नहीं है और इस जड़ प्रथा डिजिटल इंडिया के सप्ताह का प्रभाव पहले ही दिन दिखाई देने लगा जब अंतर्जाल और कंप्यूटर के विशारदों से अधिक धन शिखर पर बैठे लोग इसे सफल बनाने के लिये आगे आते दिखे।

      जिन डद्योगपतियों ने डिजिटल सप्ताह में उत्साह दिखाया है उनका लक्ष्य केवल अपनी टेलीफोन कंपनियों के अधिक कमाई जुटाना है न कि भारत में कोई डिजिटल क्रांति लाने का कोई उनका इरादा दिखता है।  अगर होता तो वह भारत में जल्दी कोई स्वदेशी सर्वर स्थापित करने की योजना के प्रति अपना रुझान दिखाते।  हम यहां स्पष्ट कर दें कि हम इंटरनेट पर भी उसी तरह की गुलामी झेल रहे हैं जैसे अंग्रेजों की झेलते थे। हमारे जैसे स्वतंत्र, संगठनहीन तथा मौलिक लेखक की पहचान अधिक नहीं होती इसलिये अधिक लोगों तक बात नहीं पहुंचती पर फिर भी अपना कर्तव्य पूरा करने के साथ यह आशा तो है कि कोई न कोई सामर्थ्यवान उठेगा जो भारतीय सर्वर का सपना पूरा करेगा।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।

अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन

5.हिन्दी पत्रिका 

६.ईपत्रिका 

७.जागरण पत्रिका 

८.हिन्दी सरिता पत्रिका 

९.शब्द पत्रिका

भोजन का औषधि की तरह सेवन करें-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


            भोजन के विषय पर हमारे समाज में जागरुकता और ज्ञान का नितांत अभाव देखा जाता है। सामान्य लोग यह मानते हैं कि भोजन तो पेट भरने के लिये है उसका मानसिकता से कोई संभव नहीं है। जबकि हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार उच्छिष्ट और बासी पदार्थ तामसी बुद्धि तथा प्रवृत्ति वाले को प्रिय होते हैं-यह हमारे पावन ग्रंथ में कहा गया है।  हम इसके आगे जाकर यह भी कह सकते हैं कि उच्छिष्ट और बासी पदार्थ के सेवन से बुद्धि और प्रवृत्ति तामसी हो ही जाती है। जिस तरह भारत में बड़ी कंपनियों के आकर्षक पैक में रखे भोज्य पदार्थ हैं उसे हम इन्हीं श्रेणी का मानते हैं।  स्वयं इसका सेवन कभी नहीं किया क्योंकि भगवत्कृपा से घरेलू भोजन हमेशा मिला। बाहर भी गये तो ऐसे स्थानों पर भोजन किया जो घर जैसे ही थे। इसलिये इन दो मिनट में तैयार होने वाले भोज्य पदार्थों के  स्वाद का पता नहीं पर भारतीय जनमानस में उनकी उपस्थिति अब पता लगी जब एक बड़ी उत्पाद कंपनी के भोज्य पदार्थ पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव आया।

           हैरानी है सारे प्रचार माध्यम कागज में बंद बड़ी कंपनियों के भोज्य पदार्थों पर संदेह जता रहे हैं तब भी कुछ लोग उसका सेवन करते हुए कैमरे के सामने कह रहे हैं कि उनके बिना नहीं रह सकते। इनका स्वाद अच्छा है।

       हमारा तो यह भी मानना है कि कुछ दिन में जब बड़ी कंपनियों के भोज्य उत्पाद का विवाद थम जायेगा जब लोग फिर इसका उपयोग पूर्ववत् करने लगेंगे जैसे कि कथित शीतल पेय का करते हैं।

          21 जून पर आने वालेे योग दिवस पर जिन महानुभावों को प्रचार माध्यमों पर चर्चा के लिये आना है वह श्रीमद्भागवत् गीता के संदेशों की चर्चा अवश्य करें।  एक योग साधक  भोजन पेट में दवा डालने की तरह प्रयुक्त करता है। वह स्वादिष्ट नहीं पाचक भोजन पर ध्यान देता है। पता नहीं हमारी यह बात  उन तक पहुंचेगी कि नहीं।

—————-

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

६.ईपत्रिका

७.दीपकबापू कहिन

८.जागरण पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका

नियमित अभ्यास वाले ही योग पर बोलें तो अच्छा रहेगा-21 जून विश्व योग दिवस पर विशेष लेख


     भारतीय योग संस्थान देश में योग साधना के निशुल्क शिविर लगाता है। इसमें निष्काम भाव से शिक्षक नये लोगों को योगसाधना का अभ्यास बड़े मनोयोग से सिखाते हैं। यह लेखक स्वयं इस संस्थान के शिविर में अभ्यास करता रहा है।  हमारा मानना है कि योग साधना की पूरी प्रक्रिया जो भारतीय योग संस्थान के शिविरों में अपनाई जाती है वह अत्यंत वैज्ञानिक है।  समय समय पर अनेक योग विशारद भी अपना कीमती समय व्यय कर योग साधकों का मार्गदर्शन करते हैं। एक बात तय रही कि भारतीय योग संस्थान से जुड़ा कोई भी साधक यह स्वीकार नहीं कर सकता कि ओम शब्द और सूर्यनमस्कार के बिना कम से कम आज के समय में योग पूर्णता प्राप्त कर सकता है।  सूर्यनमस्कार कोई कठिन आसन है यह भी सहजता से स्वीकार नहीं किया जा सकता।

      21 जून को विश्व में योग दिवस मनाया जा रहा है पर देखा यह जा रहा है कि भारत के प्रचार माध्यम अपनी कथित निष्पक्षता दिखाने के लिये योग विरोधियों को सामने ला रहे हैं। प्रश्न यह है कि इन प्रचार माध्यमों के पास वह कौनसा पैमाना है कि वह किसी एक व्यक्ति को अपने समुदाय का प्रतिनिधि मान लेते हैं।  हमने यह देखा है कि अनेक ऐसे लोग भी इन शिविरों में आते हैं जिन्हें भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा से प्रथक कर देखा जाता है। वह न केवल ओम का जाप करते हैं वरन् सूर्यनमस्कार के साथ ही गायत्री मंत्र, शांति पाठ, महामृत्यंजय पाठ तथा प्रार्थना का गान करते हैं।  जब हम उन्हीं के समुदाय का कोई आदमी  टीवी उनके प्रतिनिधि के रूप में योग साधना का विरोध करते देखते  है तब हमारे मन में यह सवाल आता है कि उसे समूचे समुदाय का स्वर कैसे मान लिया जाये? क्या भारतीय प्रचार माध्यम यह मानते हैं कि सामुदायिक नाम से पहचान तथा किसी समाज विशेष से जुड़ी संस्था से जुड़े होने पर कोई भी अपने लोगों का अघोषित प्रतिनिधि हो जाता है?

   यह सोच प्रचार माध्यमों में कार्यरत लोगों की जड़ प्रकृत्ति की परिचायक है। ऐसे लोग योग पर अधिकार के साथ बोलते जरूर हैं पर उनका स्वयं का  अभ्यास नहीं होता वरन् उनकी योग्यता यह होती है कि येनकेन प्रकरेण वह पर्दे के सामने आ ही जाते हैं। ऐसे लोगों को हमारी सलाह है कि योग करो तो जानो। इस विषय पर बोलने या लिखने का मानस मन पर गहरा प्रभाव तब तक  नहीं होता जब तक वक्ता या लेखक स्वयं योग के समंदर में गहराई में जाकर मोती न चुनकर आया हो।

———————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर   

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

नारी के विषय पर 23 माह पहले लिखा आज भी प्रासंगिक-हिंदी लेख


       इस लेखक के इन्टरनेट पर लिखे गए लेखों में एक है कन्या भ्रुण हत्या से मध्ययुगीन स्थिति की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी लेख। 11 फ़रवरी 2011 को लिखे गए इस लेख पर आज तक भी टिप्पणियाँ आती हैं।  इस पर कुछ टिप्पणीकारों ने यह भी लिखा कि  आपकी बात हमारे समझ में नहीं आयी तो  अनेक लोगों ने अपनी  व्यथा कथा भी कही है।  लिखने का अपना अपना तरीका होते है।  जब किसी विषय पर  गंभीरता से  लिखते हुए कोई डूब जाये तो भाषा सौंदर्य दूर हो जाता है और अगर शब्दों की चिंता करें तो दिमाग सतह पर आ जाता है।  हम जैसे हिंदी के गैर पेशेवर लेखकों के लिया यही मुश्किल है कि पाठक हमारे लेखों में भाषा सौन्दर्य न देखकर यह मान लेते हैं इनकी बात तो आम भाषा में लिखी गयी है इसलिए यह कोई मशहूर लेखक नहीं बन पाए।  बाज़ार के सहारे  मशहूर लेखकों को  पढ़कर भी  पाठक  निराश होते हैं की उन्होंने कोई नयी बात नहीं कही।  कन्या भ्रूण हत्या पर लिखे गए इस लेख में समाज की आंतरिक और बाह्य सत्यता का वर्णन किया गया था।  इसके लिए किसी खास घटना पर आंसू नहीं बहाए गए थे।   एक पेशेवर लेखक की तरह पाठकों का ध्यान सामयिक रूप से अपनी तरफ आकर्षित करने का यह कोई प्रयास नहीं था।
       आज मन में आया कि  भारतीय नारियों के प्रति अपराध पर कुछ नया लिखा जाए पर पता चला की पाठकों की नज़र आज भी इस पर पड़ी  हुई है तब लगा कि  इसे पुन: प्रस्तुत किया जाए।  पूरे लेख को हमें पढ़ा तो लगा कि  यह अब भी प्रासंगिक है।  11 फरवरी 2011 तथा 29 दिसंबर 2012 में करीब 23 महीने का अंतर है।  नारियों के प्रति बढ़ते अपराधों के लिए अनेक कारण है।  दरअसल कुछ ऐसे भी हैं जो सभीके सामने हैं, लोग जानते हैं, मानते भी हैं मगर बाहरी रूप से कोई स्वीकार नहीं करना चाहता है।  पुरुष ही नहीं नारियां भी शुतुर्मुर्गीय अंदाज़ में  बहस कर रहे हैं।  अभी हाल ही में दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की घटना हुई।  इस पर इतने प्रदर्शन हुए। अख़बारों में सम्पाकीय छपे। टीवी चैनलों पर बहसें  हुई।  सब कुछ प्रायोजित लगा।  हमें लगा कि  11 फरवरी 2011 को लिखा गया यह लेख अभी भी सीना तनकर खड़ा है और पेशेवर लेखकों को ललकार रहा हो ऐसा बोलकर और लिखकर दिखाओ।
 जिन्होंने बहस की उन्होंने कुछ न कुछ पाया होगा। चैनलों ने पांच मिनट  की बहस की तो पच्चीस  मिनट का विज्ञापन चलाया।  मगर सच कोई नहीं बोला।  वैसे तो .धनपतियों के हाथ में पूरी दुनिया है पर समाज उनके हाथ में पूरी तरह नहीं रहा था। उनके सहारे चल रहे प्रचार माध्यमों  ने यह काम भी कर दिखाया। उदारीकरण के चलते सार्वजानिक क्षेत्र कम हुआ है। सीधी बात कहें तो समाज की राज्य से अधिक निजी क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ गयी है।  मान सम्मान की रक्षा, सुरक्षित सेवाओं का प्रबंध तथा प्रजा हित को सर्वोपरि मानते हुए अपना काम जितना राज्य कर सकता है, निजी क्षेत्र के लिए यह संभव नहीं है।  राज्य के लिए अपने लोग महत्वपूर्ण होते हैं निजी क्षेत्र के लिए अपनी कमाई सर्वोपरि होती है।
                इससे भी अधिक  बात यह है की राज्य का जिम्मा अपने प्रजा को संभालना भी होता है और निजी क्षेत्र कभी इसे महत्व नहीं देता।
  निजी क्षेत्र कभी राज्य का प्रतीक  नहीं हो सकते।   जब निजी क्षेत्र अपने साथ राज्य के प्रतीक के रूप में अपनी ताकत दिखाते हैं तो कुछ ऐसी समस्याएँ उठ सकती हैं जिनकी कल्पना कुछ लोगों ने की भी होगी।  इस पर किसी ने  प्रकाश नहीं डाला। इसी अपेक्षा भी नहीं थी। कारण की बाज़ार के सौदागरों और प्रचार प्रबंधकों का या सिद्धान्त है की बहसें खूब हों पर इतनी कि  लोग बुद्धिमान न हो जाएँ।  इसलिए नारे लगाने तथा रुदन करने वाले बुद्धिजीवियों को आमंत्रित करते हैं।  इनमें कुछ एक हद तक व्यवस्था तो कुछ समाज की आलोचना करने की खानापूरी करते हैं।  इस विषय पर बहुत कुछ लिखने का मन है पर क्या करें अपने पास समय की सीमायें हैं।  पेशेवर बुद्धिजीवियों के मुकाबले हम जैसे आम लेखकों को समाज अधिक महत्व भी नहीं देता।  इसलिए जब समाज मिलता है अपनी बात कह जाते हैं। 

पहले लिखा गया लेख पढना चाहें तो पढ़ सकते हैं।

हो सकता है कि कुछ लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना तय है कि जब देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीखते हैं तब उसे हम समस्या नहीं बल्कि समस्याओं या सामाजिक विकारों का परिणाम मानते हैं। टीवी और समाचार पत्रों के समाचारों में लड़कियों के विरुद्ध अपराधों की बाढ़ आ गयी है और कुछ बुद्धिमान लोग इसे समस्या मानकर इसे रोकने के लिये सरकार की नाकामी मानकर हो हल्ला मचाते हैं। उन लोगों से हमारी बहस की गुंजायश यूं भी कम हो जाती हैं क्योंकि हम तो इसे कन्या भ्रुण हत्या के फैशन के चलते समाज में लिंग असंतुलन की समस्या से उपजा परिणाम मानते है। लड़की की एकतरफ प्यार में हत्या हो या बलात्कार कर उसे तबाह करने की घटना, समाज में लड़कियों की खतरनाक होती जा रही स्थिति को दर्शाती हैं। इस पर चिंता करने वाले कन्या भ्रूण हत्या के परिणामों को अनदेखा करते हैं।

इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन करीब बीस-तीस साल पुराना हो गया है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश के गर्भ में भ्रुण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य लोगों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। भारत के भी निजी चिकित्सकालयों में भी यही उद्देश्य कहते हुए इस मशीन की स्थापना की गयी। यह बुरा नहीं था पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या का फैशन प्रारंभ हुआ उसने समाज में लिंग अनुपात की  स्थिति को बहुत बिगाड़ दिया। फैशन शब्द से शायद कुछ लोगों को आपत्ति हो पर सच यह है कि हम अपने धर्म और संस्कृति में माता, पिता तथा संतानों के मधुर रिश्तों की बात भले ही करें पर कहीं न कहीं भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की वजह से उनमें जो कृत्रिमता है उसे भी देखा जाना चाहिए। अनेक ज्ञानी लोग तो अपने समाज के बारे में साफ कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को हथियार की तरह उपयोग करना चाहते हैं जैसे कि स्वयं अपने माता पिता के हाथों हुए। मतलब दैहिक रिश्तों में धर्म या संस्कृति का तत्व देखना अपने आपको धोखा देना है। जिन लोगों को इसमें आपत्ति हो वह पहले कन्या भ्रुण हत्या के लिये तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करते हुए उस उचित ठहरायें वरना यह स्वीकार करें कि कहीं न कहीं अपने समाज के लेकर हम आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे हैं।

जब कन्या भ्रुण हत्या का फैशन की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा क्योंकि समाज में लड़कियों की संख्या कम हो जायेगी तो उनके दावेदार लड़कों की संख्या अधिक होगी नतीजे में न केवल लड़कियों के प्रति बल्कि लड़कों में आपसी विवाद में हिंसा होगी। इस चेतावनी की अनदेखी की गयी। दरअसल हमारे देश में व्याप्त दहेज प्रथा की वजह से लोग परेशान रहे हैं। कुछ आम लोग तो बड़े आशावादी ढंग से कह रहे थे कि ‘लड़कियों की संख्या कम होगी तो दहेज प्रथा स्वतः समाप्त हो जायेगी।’

कुछ लोगों के यहां पहले लड़की हुई तो वह यह सोचकर बेफिक्र हो गये कि कोई बात नहीं तब तक कन्या भ्रुण हत्या की वजह से दहेज प्रथा कम हो जायेगी। अलबत्ता वही दूसरे गर्भ में परीक्षण के दौरान लड़की होने का पता चलता तो उसे नष्ट करा देते थे। कथित सभ्य तथा मध्यम वर्गीय समाज में कितनी कन्या भ्रुण हत्यायें हुईं इसकी कोई जानकारी नहीं दे सकता। सब दंपतियों के बारे में तो यह बात नहीं कहा जाना चाहिए पर जिनको पहली संतान के रूप में लड़की है और दूसरी के रूप में लड़का और दोनों के जन्म के बीच अंतर अधिक है तो समझ लीजिये कि कहीं न कहंी कन्या भ्रुण हत्या हुई है-ऐसा एक सामाजिक विशेषज्ञ ने अपने लेख में लिखा था। अब तो कई लड़किया जवान भी हो गयी होंगी जो पहली संतान के रूप में उस दौर में जन्मी थी जब कन्या भ्रुण हत्या के चलते दहेज प्रथा कम होने की आशा की जा रही थी। मतलब यह कि यह पच्चीस से तीस साल पूर्व से प्रारंभ  सिलसिला है और दहेज प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। हम दहेज प्रथा समाप्ति की आशा भी कुछ इस तरह कर रहे थे कि शादी का संस्कार बाज़ार के नियम पर आधारित है यानि धर्म और संस्कार की बात एक दिखावे के लिये करते हैं। अगर लड़कियां कम होंगी तो अपने आप यह प्रथा कम हो जायेगी, पर यह हुआ नहीं।

इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये हैं पर सच कोई स्वीकार नहीं कर रहा। इस कारण लड़कों से रोजगार के अवसरों में भी आकर्षण शब्द गायब हो गया है। लड़कियों के लिये वर ढूंढना इसलिये भी कठिन है क्योंकि रोजगार के आकर्षक स्तर में कमी आई है। अपनी बेटी के लिये आकर्षक जीवन की तलाश करते पिता को अब भी भारी दहेज प्रथा में कोई राहत नहीं है। उल्टे शराब, अश्लील नृत्य तथा विवाहों में बिना मतलब के व्यय ने लड़कियों की शादी कराना एक मुसीबत बना दिया है। इसलिये योग्य वर और वधु का मेल कराना मुश्किल हो रहा है।

फिर पहले किसी क्षेत्र में लड़कियां अधिक होती थी तो दीवाने लड़के एक नहीं  तो दूसरी को देखकर दिल बहला लेते थे। दूसरी नहीं तो तीसरी भी चल जाती। अब स्थिति यह है कि एक लड़की है तो दूसरी दिखती नहीं, सो मनचले और दीवाने लड़कों की नज़र उस पर लगी रहती है और कभी न कभी सब्र का बांध टूट जाता है और पुरुषत्व का अहंकार उनको हिंसक बना देता है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराध कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है।

              हम जब स्त्री को अपने परिवार के पुरुष सदस्य से संरक्षित होकर राह पर चलने की बात करते हैं तो नारीवादी बुद्धिमान लोग उखड़ जाते हैं। उनको लगता है कि अकेली घूमना नारी का जन्मसिद्ध अधिकार है और राज्य व्यवस्था उसको हर कदम पर सुरक्षा दे तो यह एक काल्पनिक स्वर्ग की स्थिति है। यह नारीवादी बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच वह नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं  बैठ सकते क्योंकि जब नारियों के प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना अस्तित्व खोने को आतुर है।

 

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior,madhya Pradesh

 

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

 

 

 

%d bloggers like this: