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प्रचार माध्यम पाकिस्तान से बदला लेने की उतावली न मचायें, संघर्ष लंबा खिंच सकता है-हिन्दी लेख


                                     भारत पाकिस्तान सीमा पर चल रहा तनाव लंबा चलने वाला है।  जिस पाकिस्तान का अस्तित्व सत्तर वर्ष से बना हुआ है वह चार पांच दिन में खत्म करना खतरे से खाली भी नहीं है। हमारे यहां एक नेता ने कहा ‘पड़ौसी बदले नहीं जाते। इसका प्रतिवाद तक किसी ने नहीं किया था कि पड़ोसी का मकान खरीद लें तो फिर उसका पड़ौसी खरीददार का पड़ौसी हो जाता है-मतलब पड़ौसी भी बदले जाते हैं।  अब इसका इस्तेमाल अनेक विद्वान भी करने लगे हैं। ऐसा लगता है कि पड़ौसी न बदलने की बात कहने वाले अपने देश को की आर्थिक ताकत को नहीं समझ रहे। अगर पाकिस्तान का पतन हुआ तो हमारे पड़ौसी अफगानितस्तान और ईरान हो जायेंगे।

                पाकिस्तान का निर्माण दो कौमे तो दो राष्ट्र के सिद्धांत पर आधारित है। इा  विचाराधारा का विकास आजादी के बहुत पहले ही हो गया था। विभाजन हुआ पर इस विचाराधारा के पोषक अब भी  भारत में बहुत हैं जो देश के सदियों पुराने निरपेक्ष संस्कृति का दावा तो करते हैं पर पाकिस्तान जो कभी हमारा हिस्सा था यह भूल जाने का नाटक करते हैं-क्योंकि अगर  उन्हें पाकिस्तान की हिन्दूओं के प्रति सहिष्णुता देखने और उस पर बोलने में डर लगता है।  वह अंग्रेजों की खींची गयी लकीर में भारत दर्शन करते हैं और भ्रमित करते हैं।  जैसा कि समाचारों से पता चला है कि पाकिस्तान भारत में ही अनेक बुद्धिजीवियों का प्रायोजन करता है।  हम देखते भी रहे हैं कि कहींे न कहीं पाकिस्तान के शुभचिंत्तक यहां कम नहीं है-जो कभी कभी धमकाते हैं कि यह भारत भी खंड खंड हो सकता है। हम उनको बता देते हैं कि जिस समय 1947 में राष्ट्र बंटा तब भारत की अपनी सेना नहीं थी।  अब भारत दुनियां का एक ताकतवर देश है।  जब तक भारत के रणनीतिकार पाकपरस्तों को लोकतंत्र के नाम पर झेल रहे हैं।  जब सहनशीलता से बाहर हो जायेगा तो वह अन्य उपचार भी कर सकते हैं। अब कोई इंग्लैंड की महारानी या उस समय के सत्तालोलूप नेताओं का समय नहीं है जो देश के टुकड़े कर देगा।  अधिक छोडि़ये कश्मीर का एक इंच जमीन कोई नहीं ले सकता। सब देश लड़ने आ जायें तब भी नहीं-ऐसा तो अब होने से भी रहा।

        इधर हम देख रहे हैं कि कुछ चैनल वाले शहीदों पर विलाप करते हुए लगातार  यह पूछ रहे हैं कि इसका बदला कब लिया जायेगा।  उनका प्रसारण मजाक लगता है।  शहीदों पर बहस करते हैं पर हर मिनट विज्ञापन के लिये अवरोध भी लाते हैं।  अपनी व्यवसायिक लाचारी को वह देशभक्ति तथा जनभावना की आड़ में छिपाने की उनकी चालाकी सभी को दिख रही है। जहां तक पाकिस्तान से निपटने का प्रश्न है। हमारा अनुमान है कि अभी यह संक्षिप्त युद्ध चलता रहेगा।  ईरान और इराक के बीच दस वर्ष तक युद्ध चला था।  अतः ऐसे युद्धों की समय सीमा नहीं होती।  अलबत्ता यह सीमित युद्ध जब तक चलेगा तब तक प्रचार माध्यमों में मुख्य समाचारों में रहेगा। इससे अनेक प्रतिष्ठित लोगों को यह परेशानी आयेगी कि अभी तक जो प्रचार माध्यम उनके हल्के बयानों को भारी महत्व देते हैं वह नहीं हो पायेगा।  इसी बीच भारतीय रणनीतिकार पाक पर विजय या उसके विभाजन से पूर्व यहां उस विचारधारा का प्रवाह भी अवरुद्ध करना चाहेंगेे जिससे आगे कोई खतरा नहीं रहे। हम देख भी रहे हैं कि एक एक कर पाकिस्तान समर्थक उसी तरह सामने आ रहे हैं जैसे राजा जन्मेजय के यज्ञ मेें सांप भस्म होने आ रहे थे। यह देखना दिलचस्प भी है।  हमारा मानना है कि यह निरपेक्ष विचारधारा के नाम पर जो नाटक चलता आया है उसके भारम में खत्म होते ही पाकिस्तान खत्म हो जायेगा।

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                    दीपावली को देशभक्ति के भाव से जोड़कर रोचक बनाने का प्रयास शायद इसलिये हो रहा है क्योंकि पारिवारिक, सामाजिक तथ आर्थिक दबावों के कारण जनसमुदाय उत्साह से नहीं मना रहा है। मतलब हमें विदेश में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के साथ ही आंतरिक राज्य प्रबंध पर भी ध्यान देना होगा जिसमें आर्थिक नीतियां भी शामिल हैं।  क्या दिलचस्प नहंी है एक सड़क पर लगे टोलटेक्स को न्यायालय समाप्त करता है तो प्रचार माध्यम उसे जनता के लिये दिवाली का तोहफा बताते हैं।  यह तोहफा तो सरकारी की तरफ से आना चाहिये था।

मौसम के बदलने, खेतों में आग लगाने तथा दिपावली पर शहरों में सामूहिक रूप से साफ सफाई की वजह से वैसे भी सभी जगह पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है। ऐसे में पटाखों को ही जिम्मेदार मानना क्या ठीक है? जबकि अनेक वाहन तो वैसे भी प्रदूषण फैलाते रहते हैं।

क्रिकेट मैच को नारेबाजी से युद्ध जैसा बनाने की कोशिश-हिन्दी व्यंग्य चिंतन(cricke match like war-hindi vyangya chittan)


भारत में कुछ ज्ञानी बुद्धिजीवी आम बुद्धिजीवियों पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि ‘कुछ लोग चाहते हैं कि उनके यहां पैदा होने वाला बेटा कहीं का कलेक्टर बने भले ही पड़ौसी का लड़का भगतसिंह बन जाये।’
आजादी के बाद देश में एक ऐसा सुविधा भोगी वर्ग बन गया है जो क्रांति, इंकलाब, अभिव्यक्ति की आज़ादी तथा गरीबों का कल्याण की बात करते हुए जमकर नारे लगाता है पर जहां प्रतिरोध सामने आया भाग खड़ा होता है। यह वर्ग अपने आकाओं के लिये भीड़ जुटाता है पर विपत्ति जब सामने खड़ी हो तो उसमें शामिल लोग अपने को लाने वाले ठेकेदार की तरफ सहारे के लिये देखते हैं तो उसे नदारद पाते हैं।
ऐसा कई बार हुआ है और हालत यह है कि अगर कोई सामान्य व्यक्ति जब कोई आदर्श की बात करता है तो ‘‘लोग उससे पूछते हैं कि तू क्या नेता हो रहा है। यह सब बातें कर रहा है पर समय आने पर तू ही सबसे पहले पलटा खायेगा।’’
इधर अपने देश में नेतागिरी, समाज सेवा, क्रिकेट बाजी, फिल्म बाजी और जितने भी आकर्षण पैदा करने वाले काम हैं सभी का व्यवसायीकरण इस तरह हो गया है कि उसमें आदर्श की बातें बेची जाती हैं पर व्यवहार में अपनाई कतई नहीं जाती। अभी भारत में चल रही विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता 2011 में यही हाल दिखाई दिया। प्रचार माध्यम यानि समाचार पत्र पत्रिकाऐं और टीवी चैनल अपने विज्ञापनदाताओं को इस कदर समर्पित हो गये कि क्रिकेट जैसे व्यापार में देशभक्ति बेच डाली।
मोहाली में पीसीबी (पाकिस्तान) और बीसीसीआई (भारत) की टीम के बीच मैच को प्रचार माध्यमों ने महा मुकाबला इस तरह प्रचारित किया कि कई जगह बड़ी स्क्रीन पर मैच दिखाने की मुफ्त व्यवस्था की गयी। ऐसे ही एक सामूहिक केंद्र पर हम मैच देखने गये। यह तो केवल बहाना था दरअसल उस दिन हम लोगों की प्रतिक्रिया देखना चाहते थे। उस केंद्र पर एक टीवी रखा रहता है जो मैच के दिनों में चलता रहता है। हम भी राह चलते हुए कभी कभार पानी आदि पीने के विचार से वहां चले जाते हैं। उस दिन हमारे जाते ही मुल्तान का सुल्तान आउट हो गया।
गनीमत किसी ऐसे आदमी ने नहीं देखा जो हमसे कुछ कहने का साहस रखे कि ‘देखो इनके चरण कमल पड़ते ही मुल्तान का सुल्तान आउट हो गया।’
जिन्होंने देखा उनको पता था कि यह व्यंग्यकार है और कहीं कुछ ऐसा वैसा कह दिया तो अपनी भड़ास ब्लाग पर जाकर निकालेगा। भले ही वह ब्लाग नहीं पढ़ते हों पर यह आशंका उनको रहती है कि कहंी मुफ्त में इसे व्यंग्य की सामग्री उपलब्ध न करायें।
हमने थोड़ी देर मैच देखा फिर लौटे आये। फिर थोड़ी देर बाद गये तो पता लगा कि गंभीर का झटका लगा है। अब हमें खुटका होने लगा कि कहीं यह बीसीसीआई की टीम देश का नाम डुबो न दे। तब हम बाहर चाय की दुकान पर जमे रहे। वहां मैच नहीं दिख रहा था पर इधर उधर से आते जाते लोग बता गये कि युवराज का सिंहासन भी चला गया है। हमने तय किया कि यह मैच नहीं देखेंगे। देखकर क्या तनाव पालना? दरअसल हमें अब क्रिकेट से कोई लगाव नहीं है क्योंकि इसे देखते हुए टीवी पर आंखें खराब करने और रिमोट पर उंगलियां थकाने से इंटरनेट पर व्यंग्य लिखना अच्छा लगता है।
वैसे हम पर भी ‘परोपदेशे कुशल बहुतेरे’ का सिद्धांत लागू होता है। भले ही पाठकों से माफिया, मीडिया तथा मनीपॉवर के इस संयुक्त उपक्रम क्रिकेट खेल से दूर रहने को कहें पर जाल में खुद भी फंस जाते हैं। खुद से ही नजरें चुराकर इस तरह देख तो लेते ही हैं कि‘हम भला कहां मैच देख रहे हैं? सो फिर सामूहिक केंद्र की तरफ चले गये तो देखा लोग वहां से निकल रहे हैं।
हमने एक से पूछा‘क्या बात है, क्या बिजली चली गयी?’
उसने कहा-‘नहीं, क्रिक्रेट का भगवान चला गया। अब तो हो गयी टीम की ऐसी की तैसी? दो सौ रन भी नहीं बनेंगे।
हमने कहा-‘अरे, ऐसा क्यों सोचते हो? अभी तो रैना है देखना दो सौ पचास से ऊपर रन बनेंगे और हम जीतेंगे।’
बिल्कुल तुक्का था पर सही जगह पर जाकर लगा। रैना से आशा गलत नहीं थी पर यह एक अनुमान था। टीम की जीत का विश्वास तो प्रचार माध्यमों की वजह से हो चला था। प्रचार माध्यमों की बातों से अनुमान किया था कि पर्दे के पीछे भी कुछ ताकतें हैं जो भारत में क्रिकेट को जिंदा रखना चाहती हैं।
अगले दिन वह आदमी हमसे मिला तो खुश हो गया और बोला-‘यार, तुम गजब की जानकारी रखते हो। यह तो बताओ कि तुम्हारे ब्लाग का नाम क्या है? मैं अपने लड़के से कहकर उसे देखा करूंगा क्योंकि वह घर पर कंप्यूटर पर काम करता है।’
हमने उससे कहा कि ‘अरे, कोई खास ब्लाग नहीं है। ऐसा ही है।
उसे टरकाना जरूरी था। क्रिकेट में जिस तरह देशभक्ति घुस गयी है उसके बाद किसी से इस विषय पर चर्चा करना ठीक नहीं लगता जब तक वह समान विचार वाला न हो। ऐसे में अपने ब्लाग पर जो हमने लिखा है वह उसे नापसंद भी हो सकता है।
पाकिस्तान को रौंद डालो का नारा खत्म हुआ तो अब आया कि लंकादहन कर डालो।’
पता नहीं किसकी सीता अपहृत हो गयी है। फिर सुना है कि मुंबई में बीसीसीआई की टीम के साथ श्रीलंका की टीम का फायनल मैच देखने के लिये वहां के राष्ट्रपति राजपक्षे आ रहे हैं। गनीमत है उनको हिन्दी नहीं आती भले ही उनका नाम कर्णप्रिय संस्कृतनिष्ठ है। उनको शायद ही कोई बताये कि देखिए यह भारत के हिन्दी प्रचार माध्यम क्या उल्टा सीधा बकवास कर रहे हैं।
लंकादहन सीता हरण का परिणाम था और यकीनन वहां के लोगों से अब हमारा कोई ऐसा धार्मिक या सांस्कृतिक बैर नहीं है। ऐसे में इस तरह धार्मिक प्रतीकों का उपयोग करना अत्यंत निंदनीय लगता है। पाकिस्ताने से साठ साल पुराना बैर है पर श्रीलंका के साथ कोई ऐसा विवाद नहीं रहा जिसे उसके दुश्मन घोषित किया जाये।
पाकिस्तान जब हारने लगा था तब यही प्रचार माध्यम खेल को खेल की तरह देखें का नारा लगाने लगे थे जबकि बैर की आग भी उसीने लगायी थी। अगर श्रीलंका मैच हार गया तो फिर कोई नहीं कहेगा कि ‘हमारी टीम ने लंकादहन कर लिया।’ वजह तब तक तो लोगों की भावनाओं का नकदीकरण तो हो चुका होगा न!
सुनने में आया कि आईसीसी के आदेश पर फायनल मैच में वानखेड़े स्टेडियम में मीडिया का प्रवेश रोक दिया गया। इस पर टीवी चैनलों ने बावेला मचाया। अशोक मल्होत्रा ने राय दी कि ‘तुम प्रचार माध्यम भी क्रिकेट का बहिष्कार कर दो क्योंकि यह तुम्हारे दम पर ही हिट है।’
सच तो यह है कि यही हिन्दी प्रचार माध्यम लोगों को बरगलाकर भीड़ जुटा रहे हैं वरना क्या आईसीसी और क्या बीसीसीआई, कभी भी 2007 के बाद क्रिकेट को इस देश में जिंदा नहीं रख सकते थे। मोहाली के मैच में हमने ब्लाग पर पचास से साठ फीसदी पाठ पठन तथा पाठक संख्या कम दर्ज पाई। इसका मतलब यह कि इंटरनेट पर सक्रिय एक बहुत बड़ा वर्ग क्रिकेट के चक्कर में फंस गया था। यह सब इन्हीं प्रचार माध्यमों का प्रभाव था। आईसीसी ने फायनल में अपने ही अघोषित मित्रों पर पाबंदी लगा दी। प्रचार माध्यम चाहते तो आज ही बदले की कार्यवाही करते हुए क्रिकेट की खबरों से किनारा कर लेते। अशोक मल्होत्रा की सलाह से पहले ही यह काम करते तो आईसीसी वाले पांव छूकर माफी मांग लेते। मगर हुआ क्या? प्रदर्शन करने पहुंच गये। फिर आईसीसी वालों ने यह बैन हटा दिया और उनको अभ्यास के साथ ही मैच देखने की अनुमति दे दी। सो प्रचार माध्यमों ने माफ कर दिया। अपने साथ हुई बदसलूकी भूल गये। आईसीसी वाले जानते हैं कि भारतीय प्रचार माध्यम क्रिकेट की कतरन पर ही जिंदा है। गाहे बगाहे फिल्म वाले भी इन प्रचार माध्यमों के कर्मियों को जलील करते हैं क्योंकि उनकी कतरनें भी समाचारों का हिस्सा बनती हैं। प्रचार तंत्र के मालिकों को कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि उनकी तो हमेशा ही पूजा होती है। जलील तो सामान्य वर्ग के कर्मचारी ही होते हैं। ऐसे में समाचार और विश्लेषण वाचक आक्रामक होने की बात तो कर सकते हैं पर खबरों से किनारा नहीं कर सकते। अगर ऐसा करेंगे तो एक घंटे में पांच मिनट तक ही चल पायेंगे। मालिक अधिक खर्चा नहीं कर सकते। कर्मचारी भगत सिंह की तरह शहीद होने की बात कर सकते हैं पर हो नहीं सकते और मालिक तो सोच भी नहीं सकते क्योंकि वह तो क्रिकेट से जुड़े उसी संयुक्त उपक्रम का हिस्सा हैं जो आज भी अंग्रेजों के मार्ग पर चलता है और बागी को कंगाल बना देता है। सो यह प्रचार माध्यम एक दिन शहीद दिवस पर भगतसिंह को याद कर लेंगें बाकी समय तो क्रिकेट का भगवान ही पूजते रहेंगे जिससे उनको सहारा है जिसके बल्ले से प्रचार कार्यक्रमों की सामग्री मुफ्त में मिलती है।
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श्रीलंका क्रिकेट टीम को लाहौर में मिली सुरक्षा का क्या हुआ-आलेख


मुंबई में जब आतंकियों ने हमला किया तब भारत की सुरक्षा चूक कहकर पाकिस्तान ने बचने की नाकाम प्रयास किया था पर अब लाहौर हमले में वह स्वयं ही सुरक्षा चूक की आरोप में फंस रहा है। देखा जाये तो सुरक्षा ऐजंसियां मुंबई पर हमले को लेकर चैकस थी पर उनका सुरक्षा लक्ष्य किसी एक स्थान, इमारत या व्यक्ति पर केंद्रित नहीं था। इतनी बड़ी विशाल मुंबई मेंं यह संभव भी नहीं है। ऐसे में पाकिस्तान से आये आतंकवादी हजार रास्तों से एक मार्ग चुनकर आये और अपने दृष्टिकोण से लक्ष्य तय किये तो सुरक्षा की चूक जैसी कोई गंभीर बात नहीं मानी जा सकती । लाहौर में सुरक्षा एजेंसियों का लक्ष्य एक ही था कि किसी तरह श्रीलंका की क्रिकेट टीम की रक्षा करना। वह एक ही मार्ग से जाने वाली थी। उसके वाहन नियत थे। आशय यही था कि उसकी रक्षा के लिये कोई बड़ा दायरा नहीं था और उसके लिये बकायदा सुरक्षा कर्मी थे। ऐसे में पूरी दुनियां ही यह पूछेगी कि आखिर वह सुरक्षा व्यवस्था कहां थी। मुंबई के संबंध में कोई देश भारत से यह सवाल नहीं कर सकता क्योंकि सभी जानते हैं कि एक बृहद शहर की और एक क्रिकेट टीम की रक्षा में अंतर होता है।

पाकिस्तान अपनी बचकाना बातों से दुनियां को अब बरगला नहीं सकता। 12 लोग 15 मिनट तक बिना किसी प्रतिरोध के उस स्थान पर गोलीबारी करते हैं जिसकी सुरक्षा के लिये घोषित प्रयास किये गये हैं। पाकिस्तान ने अपने मित्र श्रीलंका को इस बात के लिये आश्वस्त किया होगा कि वह उसके खिलाडि़यों का बाल बांका भी नहीं होने देगा। जहां तक क्रिकेट टीमों की सुरक्षा की बात है तो वह एशियाई देशों में इस कदर की जाती है कि बंदूक लेकर तो दूर उसके खिलाडि़यों तक आटोग्राफ लेने वाले प्रशंसक भी नहीं पहुंच पाते। श्रीलंका की सरकार इस समय जरूर अपने आपको शर्मनाक स्थिति में अनुभव कर रही होगी क्योंकि भारत का दौरा टलने से पाकिस्तान के कंगाल हो रहे क्रिकेट बोर्ड को बचाने के लिये उसने कथित मैत्री निभाने के लिये वहां का दौरा करने का निश्चय किया। श्रीलंका के लोग जरूर वहां की सरकार से पाकिस्तान पर भरोसा करने की वजह पूछना चाहेंगे?

पाकिस्तान एक अव्यवस्थित देश हो चुका है। उसके पांच पुलिस कर्मियों की लाशें सड़कों पर बिछाकर जिस तरह 12 आंतकी उस बस पर 12 मिनट तक गोलीबार करते रहे जिसमें श्रीलंका क्रिकेट टीम के सदस्य सवार थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी फिल्म की शुटिंग चल रही है। एक भी अपराधी न तो मारा गया न ही पकड़ा गया। वहां मुठभेड़ नहीं हुई बस हमला होता रहा। पाकिस्तान का सभ्रांत समाज भी अपना विवेक खोता जा रहा है क्योंकि जिस तरह बिना किसी प्रमाण के भारत पर वहां की सरकार आरोप लगा रही है उस पर उसका यकीन करना यही दर्शाता है। एक बात याद रखने की है कि भारत ने पूरी तरह से मुंबई हमले के प्रमाण जुटाये और फिर पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा किया। दूनियां ने एसे ही यकीन नहीं किया। अमेरिका की एफ.बी.आई. ने कसाब के अलावा उस महिला से भी पूछताछ की जिसने आतंकियों को नाव से उतरते हुए देखा था। भारत की नीयत साफ थी इसलिये से नहीं रोका। एफ.बी.आई. लाहौर हमले की जांच में हाथ शायद ही डाले क्योंकि एक तो वहां कोई अमेरिकी नहीं मरा दूसरा जांच करने पर जब उसके सामने असफल पाकिस्तान का जो चित्र सामने आयेगा उसे वह दुनियां को नहीं बताना चाहेगी। अगर कोई पाकिस्तान में जाकर जांच करेगा तो उसका सबसे पहला सवाल तो यह होगा कि ‘आखिर वह सुरक्षा व्यवस्था कहां थी जो श्रीलंका की क्रिकेट टीम के लिये खासतौर से की गयी थी।’ हो सकता है कि इस जांच में सुरक्षा में लगे लोगों की शामिल होने की तस्वीर सामने आये। वैसे इस हमले के पीछे एक उद्देश्य तो मुंबई हमले की तस्वीर धुंधली करने का प्रयास ही लगता है। पाकिस्तान इस हमले को दिखाकर अपने आपको आतंक पीडि़त साबित करने का प्रयास जिस तरह कर रहा है उससे तो लगता है कि वहां की सेना ने यह अवसर अपने कुठपुतली सरकार को उपलब्ध कराया है। इसमें भी वह सफल नहीं होंगे क्योंकि मुंबई हमले का मामला इससे परिदृश्य में नहीं जा सकता क्योंकि उसमें 183 बेकसूर जानें गयीं थीं। लाहौर हमले में पाकिस्तान के पांच सुरक्षाकर्मी शहीद हुए पर उन पर शायद ही दुनियां इतना गौर करें। उल्टे लोग पूछेंगे कि बाकी लोग कहां थे? यकीनन पाकिस्तान के रणनीतिकारों के पास इसका कोई जवाब नहीं होगा। एक-दो दिन में इस घटना की चर्चा थम जायेगी और फिर पाकिस्तान को मुंबई हमले के मामले का सामना करना ही होगा।
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आपसी संपर्क में लिपि बाधक-आलेख


पिछले दिनों मैंने हिन्दी ब्लोग में पाकिस्तानी ब्लोगरों की चर्चा पढी है. पाकिस्तान के कुछ अंग्रेजी ब्लोगरों की हिन्दी में चर्चा होना तो ठीक है पर उनको पाकिस्तान की जनता के मन का सही वैचारिक प्रतिनिधि मानना ठीक नहीं क्योंकि वहाँ भी बहुत सारे अंतर्विरोध हैं.
अभी भारतीय ब्लोगरों और पाकिस्तानी ब्लोगरों में कोई बृहद स्तर पर संपर्क नहीं हुआ है पर इसकी आगे संभावना बन सकती है। एक दो पाकिस्तानी ब्लोगरों से अंतर्जाल पर संपर्क हुआ है पर वह नियमित नहीं है। भाषा तो नहीं लिपि की समस्या इसमें बाधक है। वह मुझसे अरेबिक लिपि में चाहते हैं और मैं लिख नहीं पाता। रोमन लिपि में हिन्दी या उर्दू पढ़ना है ऐसे ही जैसे हक्लाकर पढ़ना। मैंने दूसरी क्लास तक सिन्धी देवनागरी भाषा में हुई थी. हालांकि मैंने अपना लेखन हिन्दी भाषा में ही शुरू किया पर मेरे एक मित्र हैं वह मुझसे सिन्धी में लिखने का आग्रह करते थे और उन्हीं के सुझाव पर मैंने वर्डप्रेस में सिन्धी देवनागरी का ब्लोग बनाया. उसमें टेग जो लगाए वह पाकिस्तान के कुछ उर्दू, अंग्रेजी और सिन्धी भाषी ब्लोगरों के मिल गए. उनमें कुछ ने संपर्क किया पर वह अधिक चल नहीं पाता क्योंकि लिपि के बहुत बड़ी बाधा है, पर उनके अंग्रेजी ब्लोग पढ़ने में आते है तो समझ पाता हूँ. वैसे मुझे देवनागरी में भारतीयों से भी कमेन्ट मिले हैं.
कल मैंने पाकिस्तानी ब्लोगरों के बारे में एक पोस्ट पढी । वह लेख बहुत अच्छा है पर जिस तरह भारतीय ब्लोगरों को काम आँका जा रहा है वह ठीक नहीं है क्योंकि पाकिस्तानी ब्लोगरों को इस समय विश्व में इतनी अहमियत मिल रही है तो केवल इसलिए कि उनके अन्य प्रचार माध्यम बहुत कमजोर हैं और उनको दबाया जा रहा है। भारत में ऐसा कुछ नहीं है। दूसरा वहाँ विश्व की नजरें लगीं हुईं हैं और इसलिए उनके ब्लोग अंतर्जाल पर खोजे जाते हैं। एक अन्य बात यह कि पाकिस्तान के जिन ब्लोग की चर्चा हो रही हैं वह अंग्रेजी के हैं। पाकिस्तान में उर्दू, सिन्धी और पंजाबी भाषा में भी ब्लोग हैं, और वर्डप्रेस के टेग के जरिये वहाँ जाता हूँ। अंग्रेजी पढ़ सकता हूँ पर लिख नहीं सकता पर रोमन लिपि में संयुक्त बोली(हिन्दी और उर्दू) से संपर्क हो सकता है। इन सबके बीच मेरे दिमाग में ख्याल आता है कि क्या हम ऐसा नहीं कर सकते कि हम उनका उर्दू में लिखा पहले रोमन में करें और फिर हिन्दी में ऐसे ही वह भी करें। हमारे देश में हिन्दी ब्लोग के चार फोरम हैं और उनमें कुछ विशेषज्ञ अगर इस बारे में कुछ जानते हों तो बताएं। हाँ, एक बात बिलकुल साफ है मैं वहाँ के अंग्रेजी ब्लोगरों की बजाय वहाँ के प्रचलित भाषाओं के ब्लोग लेखकों से संपर्क की बात कर रहा हूँ। पहले भी ब्लोगर-इनमें में मैं भी शामिल हूँ- वहाँ के अंग्रेजी ब्लोगरों को वरीयता देते हैं। एक वजह और भी है कि पाकिस्तानी ब्लोगर अपनी बात भारत में पहुंचाना चाहते हैं इसलिए शायद अंग्रेजी में अधिक लिखते हैं और वह कभी यह अपेक्षा भी करते दिखते हैं कि उनके भारत के ब्लोगरों से संपर्क बढ़ें। कम से कम मैंने उनके ब्लोग पर भारत विरोधी या कट्टरपंथ से संबंधित सामग्री नहीं देखी अगर कुछ ब्लोगरों ने रखी हो तो मुझे पता नहीं है।

अपने देश के अंदरूनी हालातों से वह जूझते पाकिस्तानी ब्लोगर मुखर हैं, सच तो यह है कि लोकतंत्र के लिए उनको संघर्ष करना पड़ रहा है, जिसे हम भारतीय ब्लोगर शायद ही अनुभव कर सकें। इसलिए उनका लिखा अगर कहीं छपता है तो आश्चर्य की बात नहीं है।

इसके बावजूद अगर उनकी बात अगर हम अपनी चौपालों पर कर रहे हैं तो क्या हम इस बात पर विचार कर सकते हैं कि स्वाभाविक संपर्क कैसे कायम हो? मैं अपने जिस ब्लोग पर देवनागरी और रोमन दोनों लिपि (सिन्धी भाषा) में अपनी पोस्ट रखता हूँ और वह पाकिस्तान में एक ब्लोग पर लिंक है और पाकिस्तानी ब्लोग में मेरा जिक्र भी किया गया है। हिन्दी के ब्लोगरों के लिए यह सूचना देना जरूरी है कि उनके बीच में सक्रिय दो लोग हैं जिन्होंने पाकिस्तान के ब्लोगरों के ब्लोग पर कमेंट रखें और पाए हैं पर मेरे लिए लिपि की वजह से आगे बढ़ना मुश्किल है। एक बात मुझे लगती है कि आज नहीं तो कल भारत के विशेषज्ञ कोई ऐसा टूल निकल लेंगे और दोनों के बीच जो संपर्क ब्लोगर करेंगे वह और कोई नहीं कर सकता। हो सकता है कि अंग्रेजी के कुछ जानकार लोग वहाँ के ब्लोगरों से संपर्क कर लें पर जब तक यह संपर्क संयुक्त बोली में नहीं होगा तब तक मजा नहीं आएगा-क्योंकि ऐसे में मुझ जैसे अंग्रेजी न जानने वाले या कम जानने वाले ब्लोगर के लिए करने को कुछ अधिक नहीं बचता है।

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