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पतंजलि योग विज्ञान के साथ श्रीमद्भागवत् गीता का ज्ञान होने पर ही पूर्ण योगी बनना संभव-हिन्दी लेख (patanjali yoga vigyan aur shri madbhagwat gita ka gyan-hindi lekh)


        पतंजलि योग सूत्रों में अनेक प्रकार की ऐसी व्याख्यायें हैं जिनको समझने के लिये सहज भाव और सामान्य बुद्धि के साथ विवेक की आवश्यकता होती है। उन्होंने अपने योग को आठ अंगों में बांटा है-यम, नियम, आसन, प्राणयाम, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें आसन और प्राणायाम में मनुष्य को न केवल अपनी सक्रियता दिखती है बल्कि दूसरों को उसका दर्शक होता देखकर वह प्रसन्न भी होता है। दरअसल यह दो भाग मनुष्य की देह और मन को शुद्ध करते हैं और वह यह मान लेता है कि व न केवल स्वस्थ है बल्कि शक्तिशाली है। यह उसके अल्पज्ञान को दर्शाता है। यह प्रवृत्ति उसे अहंकार की तरफ ले जाती है और अंततः वह पतन की तरफ भी बढ़ सकता है।
       जिस तरह भक्तों के चार प्रकार होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी-उसी तरह योगी भी होते हैं। एक तो वह लोग हैं जो दैहिक आपत्ति आने पर योग साधना इस वजह से करते हैं कि उनकी बीमारियां वगैरह दूर हो जाये, तो दूसरे इस आशय से पहले ही अभ्यास करते हैं कि बीमारियां तथा मानसिक तनाव उनकी देह का वरण न करें। तीसरे वह जो इस उद्देश्य से करते हैं कि देखें इससे क्या लाभ होते हैं। सबसे बड़े ज्ञानी योगसाधक हैं जो इसे जीवन का वैसे ही आवश्यक अंग मानते हुए करते हैं जैसे भोजन, पानी तथा हवा को ग्रहण करना। इसका आशय सीधा यही है कि हम जहां योग साधकों का समूह देखते हैं वहां सभी को सात्विक नहीं मानना चाहिये। उनमे राजस और तामस प्रवृत्ति के लोग भी हो सकते हैं। ऐसे में कुछ लोगों के मन में यह बात आ सकती है कि आखिर पूर्ण योगी की पहचान कैसे करें? कुछ योग साधक यह भी विचार कर सकते हैं कि आखिर कैसे पूर्ण योग की स्थिति प्राप्त करें। वैसे पतंजलि योग विज्ञान का मार्ग अपनाने वाले स्वतः ही श्रीमद्भागवत गीता और कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन करते हैं। उनके अंदर स्वतः ही भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के अध्ययन की प्रेरणा जाग्रत होती है।
            योग साधना से जब देह में स्फूर्ति आती है तब मनुष्य के सामने कोई ऐसा काम करने की इच्छा बलवती होती है जो कि अनोखा हो। अब यहां अनोखा काम करने से आशय यही माना जा सकता है जिससे कि योग साधक की समाज में चर्चा हो। ऐसे में हमें श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना अत्यंत लाभदायक हो सकता है। बिना श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान को धारण किये बिना कोई पूर्ण योगी बन सकता है यह बात संभव नहीं लग सकती। अध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण गीता के सिद्धांत न केवल सांसरिक संघर्षों के जीतने का मार्ग बताते हैं बल्कि संकटों के निवारण तथा दूसरों के जाल में न फंसने की कला भी सिखाते हैं। एक बात निश्चित यह है कि पूर्ण योगी अपना मार्ग और लक्ष्य अपनी शक्ति और काल के अनुसार निर्धारित करते हैं। वह दूसरे के विषयों का अनुकरण न करते हुए अपने ही विषयों का चयन कर कार्य आरंभ करते हैं। जिन योगसाधकों को श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान नहीं है वह अपनी देह की स्फूर्ति के कारण कोई अनोखा काम ढूंढते है ऐसे में सांसरिक चालाकियों में सक्रिय लोग उनको अपने लिये उपयोग कर सकते हैं जो कि कालांतर में योगियों के लिये कष्ट का कारण बन सकता है।
          श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को संबोधित करते हुए कहा है कि
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        अशासत्रविहितं घोरं त्पयंन्ते ये तपो जनाः।
         दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।
        कर्शयन्तः शरीररथं भूतग्राममचेतसः।
        मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यसुरनिश्चयान्।।
    ‘‘जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप करते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त कामना, आसक्ति के साथ बल के अभिमान से भी युक्त है। जो शरीर में स्थित भूतसमुदाय के साथ ही अंतःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाला ही समझो।’
           वर्तमान युग में राजनीति, फिल्म, पत्रकारिता, टीवी, तथा कला के क्षेत्र में न केवल धन है बल्कि प्रतिष्ठा भी मिलती है। ऐसे में अनेक लोग उसमें सक्रिय होने के लिये मोहित हो रहे हैं। राजनीति शब्द तो स्पष्टतः राजस भाव से ओतप्रोत है और उसमें सात्विकता की आशा बहुत करनी चाहिए मगर कला, फिल्म, पत्रकारिता और टीवी में सक्रिय होना भी करीब करीब वैसा ही है। राजस भाव का मतलब केवल राजनीति ही नहीं वरन् जीवन में भी स्वार्थ भाव रखने से है। किसी भले काम को करने के बाद उसके फल में इच्छा रखना तथा अपने हाथ से किये गये दान के पुण्य मिलने की आशा करना मनुष्य मन के राजस्व भाव को ही दर्शाता है। तय बात है कि ऐसे भाव वाले लोग केवल अपने मतलब से ही दूसरों से संपर्क करते हैं। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान रखने वाले लोग जानते हैं कि सांसरिक कर्मों में फल मिलता है पर वह अनिश्चित भी होता है। इतना ही नहीं उनको मनुष्य की पहचान भी होती है पर वह किसी के सामने व्यक्त कर उसे दुःख नहीं देते और यथासंभव बिना किसी भेदभाव और स्वार्थ के दूसरे की सहायता के लिये तत्पर रहते हैं। ज्ञानी लोग किसी भी काम को करते समय उससे संबंधित शास्त्रों का अध्ययन अवश्यक करते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि बिना सोचे समझे कोई काम करना तामस बुद्धि का परिचायक है।
         योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता के साथ कौटिल्य अर्थशास्त्र का भी अध्ययन करना चाहिये। कौटिल्य का अर्थशास्त्र न केवल राजनीति बल्कि जीवन और संसार के कर्म करने के सिद्धांतों का प्रतिपादक है।
          कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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        दुरारोहं पदं राज्ञां सर्वलोकनमस्कृतम्।
        अल्पेनाप्यपचारेण ब्राह्मण्यमिव दुष्यति।
       ‘‘सब लोकों में नमस्कार करने योग्य राजपद पर आरूढ़ होना बड़ा कठिन काम है। थोड़े से ही दुष्कर्म से      ब्राह्मणत्व दुषित हो जाता है।
        आत्मानंच परांश्चैव ज्ञात्वा धीरः समुत्पतेत्।
       एतदेव हि विज्ञानं यदात्मपरवेदनम्।।
        ‘निर्मल बुद्धि से फल के निमित्त प्रयत्न करना चाहिए और यदि वह कुसमय भंग हो जाये तो उसमें देव ही कारण है।
          निष्फलं क्लेशबहुलं सन्वितगधफलमेव च।
        न कर्म कुर्यान्मतिमान्मह्यवैरानुबन्धि च।।
     ‘जो निष्फल, बहुत क्लेश संपन्न, संदिग्ध फल और विशेष वैर का अनुबंध हो बुद्धिमान को वह कर्म कभी नहीं करना चाहिए।
        उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदयायच्छते महान्।
       नचैर्नीचैस्तरां याति निपातभ्यशशकया।।
       ‘‘ऊंचे पद की इच्छा करता हुआ मनुष्य महान हो जाता है पर अपने महापद से गिरने के भय की आशंकासे नीचे आने लगता है। अंततः उसका पतन हो जाता है।
       प्रकृतिव्यसनं यस्मात्तत्प्रशाभ्य समुत्पतेत्।
       अनयापनयाश्चयांच जायते दैवतोऽपि वा।।
      ‘‘प्रकृति के व्यसन को शांत होने के बाद ही आक्रमण करें। प्रकृति की रुष्टता, अनीति, अनादर और दैव के कोप से होती है।’’
      एक बात सत्य है कि योगसाधक न उत्तेजित होते हैं न किसी की चाल में फंसते हैं। उनके अपने उद्देश्य और अभियान होते हैं। जिसमें वह प्राणप्रण से शामिल होकर भी कोई प्रचार नहीं करते। ढेर सारे लोगों की वाहवाही से वह प्रभावित होते हैं न आलोचना से विचलित होते हैं। इस पर अगर वह श्रीमद्भागवत गीता और कौटिल्य का अर्थशास्त्र का ज्ञान प्राप्त करें तो उनको सांसरिक कर्म की समझ आती है और वह अपने अभियान में दृढ़ होते हैं।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप” 
poet,writter and editor-Deepak “BharatDeep”
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अण्णा हज़ारे और स्वामी रामदेव में साम्यता देखना ठीक नहीं-हिन्दी लेख (anan hazare and swami ramdev with bharashtachar virodhi aandolan-hindi lekh)


          अण्णा हज़ारे और बाबा रामदेव में कोई तुलना नहीं हो सकती मगर लोग करना चाहते हैं। इसका कारण केवल यही है कि दोनों ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान छेड़े हुए हैं और कम से कम एक दिन के लिये दोनों साथ एक मंच पर दिखे। हमारे देश के लोगों की मानसिकता है कि वह व्यक्त्तिवों में द्वंद्व देखना चाहते हैं और अगर वह न हो तो फिर अपने ही मस्तिष्क में दोनों में से किसी एक की श्रेष्ठता पर विचार करते हैं। फिर बहसें करते हैं। एक किसी को श्रेष्ठ तो दूसरा किसी को श्रेष्ठ बताता है।
       जब हम छोटे थे तो अक्सर ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी में से ‘बड़ा कौन’ जैसे विषय पर बुजुर्गों की बहस देखा करते थे। वैसे तो हमारा समाज मानता है कि परब्रह्म परमात्मा का ही तीनों रूप है। ब्रह्मा जन्म, विष्णु जीवन तथा शिव शक्ति प्रदान करने वाले भगवत्रूप माने जाते हैं। इसके बावजूद कुछ लोग विष्णु भगवान को ही श्रेष्ठ मानते हैं-इसका कारण यह भी हो सकता है क्योंकि उनकी पत्नी लक्ष्मी को माना जाता है जिसके भक्त सारे संसार में हैं। प्रसंगवश अवतार केवल भगवान विष्णु के ही माने गये हैं। यह बहस अगर हमारे अंदर मौजूद धार्मिक भावना का प्रमाण है तो अध्यात्मिक ज्ञान से पैदल होना भी दर्शाती है। अब देश में बाबा रामदेव तथा अण्णा हज़ारे को लेकर बहस चल रही है। इसका एक कारण यह भी है कि भ्रष्टाचार से त्रस्त देश को अब यह यकीन दिलाया जा रहा है कि उसे अब ईमानदारी के युग में पहुंचा दिया जायेगा। इसके लिये कितने लोग कितने आन्दोलन  चला रहे हैं पर सभी को एक मान लेना भी गलत होगा। लक्ष्य एक है पर मार्ग प्रथक प्रथक हैं उससे भी अधिक संशय इस बात का है कि उनके उद्देश्य क्या हैं?
       इधर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक खेल बनता जा रहा है। ऐसा खेल जिसमें प्रचार माध्यमों का समय विज्ञापन का प्रसारण के साथ अच्छा बीत जाता है। उससे देखकर तो लगता है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी प्रचार के लिये बेचने का साधन बन गया है। यहां हम बाबा रामदेव और अण्णा हज़ारे की प्रशंसा करेंगे कि उन्होंने अपने प्रयासों से समाज में चेतना जगाने का प्रयास किया है पर सवाल यह है कि इसके परिणाम अभी प्रकट नहीं हो रहे।
        बाबा रामदेव ने जब योग शिक्षक के रूप में लोकप्रियता प्राप्त कर ली तो वह उससे प्रथक सांसरिक विषयों पर प्रवचन करने लगे और हमारा मत तो यह है कि योग को छोड़कर सारे विषय राजनीतिक हो चुके हैं। खेल, फिल्म, समाज सेवा, साहित्य, पत्रकारिता, स्वास्थ्य, वकालत, गरीबा का कल्याण, वन तथा पशु संरक्षण तथा ऐसे ढेर सारे विषय हैं जिनमें परिवर्तन बिना राजनीति के नहीं आता। योग सिखाते हुए बाबा रामदेव काला धन तथा भ्रष्टाचार विषय पर बोलने लगे। अब तो वह एक राजनीतिक दल बनाने में जुट गये हैं। बहरहाल उन्होंने भारत स्वाभिमान बचाने के लिये आंदोलन छेड़ा। उससे उनकी लोकप्रियता एक हरफनमौला के रूप में हो गयी जो योग के अलावा सांसरिक विषयों में भी पारंगत हैं। सब ठीक चल रहा था कि महाराष्ट्र के समाज सेवी अण्णा हज़ारे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आमरण अनशन करने दिल्ली आ गये। उनको विशुद्ध रूप से गैर राजनीतिक व्यक्ति माना जाता है इसीलिये उनके आंदोलन के प्रति भी यही लोगों की धारणा बनी। यहां तक कि इस आंदोलन से राजनीतिक हस्तियों को दूर ही रखा गया। ऐसे में अण्णा हजारे रातोंरात देश के नायक बन गये। यह सब प्रचार माध्यमों का कमाल था। कुछ लोगों ने तो ऐसा दिखाया कि बाबा रामदेव महत्वहीन हो गये हैं। इस समय जब भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की बात होती है तो स्वामी रामदेव से कहीं अधिक अन्ना की लोकप्रियता का ग्राफ ऊपर दिखता है। अभी भी कुछ लोग मान रहे हैं कि दोनों महानुभाव एक हैं पर वह बात अब नहीं दिखती।
        जहां तक दोनों के व्यक्तित्व और कृतित्व की बात करें तो बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे के बीच कोई साम्यता नहीं है। 73 वर्षीय अण्णा साहेब बाबा रामदेव से कम से 30 से 35 वर्ष के बीच बड़े होंगे-बाबा रामदेव की सही उम्र का अनुमान नहीं है पर ऐसा लगता है कि वह चालीस से कम ज्यादा होंगे। अण्णा साहेब का योग से कोई वास्ता नहीं है। भले ही वह सामाजिक आंदोलन चलाते रहे हों पर उनके विषय कहीं न कहीं राजनीतिक रूप से प्रभावित रहे हैं। स्वयं वही कहते हैं कि ‘हमने दो सरकारें गिराई हैं।’ उनकी सादगी उनके विरोधियों को राजनीतिक चालाकी भी लग सकती है पर उनके विषय अविवादित हैं। अण्णा साहेब देश में ईमानदारी लाना चाहते हैं और इसके लिये कानून बनवाने का प्रयास कर रहे हैं। बाबा रामदेव भारतीय योग साधना के आधुनिक और प्रसिद्ध शिक्षक हैं जो न केवल व्यक्ति की देह को स्वस्थ रखती है बल्कि चरित्र निर्माण के लिये भी प्रेरित करती है। अगर आप योग साधना की दृष्टि से देखेंगे तो अण्णा हज़ारे तो अनैतिकता से भरे गंदे नाले को बीच में से साफ करने का प्रयास कर रहे हैं जबकि बाबा रामदेव उसी नाले में शुद्ध जल की धारा बहाकर उसमें शुद्ध जल प्रवाहित करना चाहते हैं। सामान्य दृष्टि से देखेंगे तो बाबा रामदेव के प्रयास अधिक सक्रिय नहीं दिखेंगे क्योंकि वह नारे नहीं लगा रहे जिससे लोगों के सामने भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रियता नहीं दिख रही। इसके अलावा बाबा रामदेव अपने विषय में योग भी शामिल करते हैं इसलिये भ्रष्टाचार का विषय मुखर नहीं हो पाता। जबकि अण्णा साहेब केवल इसी विषय पर बोल रहे हैं फिर उनकी धवल छवि के कारण भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा के रूप में दिख रही है।
       अण्णा हज़ारे साहिब सज्जन आदमी हैं पर उनके साथ जुड़े लोगों पर अब प्रश्नचिन्ह लगने लगा है। इसका कारण यह है कि उनके सभी साथी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले हैं या वर्तमान व्यवस्था से जुड़े रहे हैं। ऐसे में अण्णा साहिब का आंदोलन विरोधियों से जुझता दिख रहा है। फिर अण्णा साहेब के पास अपनी धवल छवि के अलावा अन्य कोई हथियार नहीं है जिससे वह समाज में सुधार ला सकें। इसके विपरीत बाबा रामदेव के पास योग जैसा ब्रह्मास्त्र है। अगर बाबा रामदेव का राजनीतिक आंदोलन सफल नहीं भी हुआ तो भी योग के नये सूत्रधार के रूप में उनका नाम सदियों तक पूरी दुनियां में याद रखा जायेगा जबकि आंदोलन का निश्चित परिणाम न मिलने पर अण्णा साहेब की छवि फिर महाराष्ट्र तक ही सिमट जायेगी। अंतिम अंतर यह कि अण्णा साहेब अपने भाषण से अपने अनुयायियों की बुद्धि में चेतना लाकर उसकी देह को संघर्ष के लिये प्रेरित करने वाले व्यक्ति हैं जबकि बाबा रामदेव का प्रयास लोगों को मन और देह की दृष्टि से स्वस्थ बनाकर वैचारिक रूप से शक्तिशाली बनाने का है।
           बाबा रामदेव योग शिक्षक हैं। कहा जाता है कि ‘रमता योगी बहता पानी इनकी माया किसी ने नहीं जानी’। जैसे बाबा रामदेव योग साधना करते रहेंगे वैसे उनका तेज बढ़ता रहेगा। वह आयु को परास्त करेंगे। स्वास्थ की दृष्टि से तो कहना ही क्या? जब कोई उनकी आलोचना करता है तो मन करता है कि उससे पूछा जाये कि ‘क्या, वह वाकई उतना स्वस्थ है जितना रामदेव जी दिखते हैं। क्या वह मधुमेह, कब्ज, हृदय या कमर दर्द के विकार से परेशान नहीं है।’
        कभी कभी तो यह कहने का मन करता है कि जो व्यक्ति स्वस्थ होने के साथ योग साधक भी हों, वही उनको चुनौती दे तो अच्छा रहेगा। विशुद्ध रूप से योग बेचने वाले योगी स्वयं भी महान योगी के पद पर प्रतिष्ठित होते जा रहे हैं और उनकी शक्तियों को कोई योग साधक ही समझ सकता है। अण्णा हज़ारे के कहे अनुसार कानून बन गया तो उनका कार्य खत्म हो जायेगा जबकि बाबा रामदेव का काम तो लंबे समय तक चलने वाला है। मतलब अण्णा हज़ारे का कार्य क्षणिक प्रभाव वाला है जबकि बाबा रामदेव लंबी लड़ाई लड़ने वाले योग योद्धा हैं। वैसे इन दोनों महानुभावों को देखकर कहना पड़ता है कि हमारी धरती वाकई महान है जो हमेशा ही हीरे के रूप में मनुष्य हमारे समाज को सौंपती हैं। इन हीरों की किस्म अलग अलग हो सकती है और श्रेष्ठता के रूप में किसी को मान्यता देना कठिन है।
        एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हम दोनों पर निरंतर दृष्टि गढ़ाये रहते हैं। हमें इस बात में दिलचस्पी है कि आखिर दोनों कैसे अपने अभियानों के बेहतरीन परिणाम प्राप्त करेंगे?
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लेखक संपादक-दीपक “भारतदीप”, ग्वालियर 
writer and editor-Deepak “Bharatdeep” Gwalior
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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