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नापसंद लेखक, पसंदीदा आशिक-हिन्दी हास्य कविता (rejected writer-hindi hasya kavita)


आशिक ने अपनी माशुका को
इंटरनेट पर अपने को हिट दिखाने के लिये लिए
अपने ब्लाग पर
पसंद नापसंद का स्तंभ
एक तरफ लगाया।
पहले खुद ही पसंद पर किल्क कर
पाठ को ऊपर चढ़ाता था
पर हर पाठक मूंह फेर जाता था
नापसंद के विकल्प को उसने लगाया।
अपने पाठों पर फिर तो
फिकरों की बरसात होती पाया
पसंद से कोई नहीं पूछता था
पहले जिन पाठों को
नापसंद ने उनको भी ऊंचा पहुंचाया।
उसने अपने ब्लाग का दर्शन
अपनी माशुका को भी कराया।
देखते ही वह बिफरी
और बोली
‘‘यह क्या बकवाद लिखते हो
कवि कम फूहड़ अधिक दिखते हो
शर्म आयेगी अगर अब
मैंने यह ब्लाग अपनी सहेलियों को दिखाया।
हटा दो यह सब
नहीं तो भूल जाना अपने इश्क को
दुबारा अगर इसे लगाया।’’

सुनकर आशिक बोला
‘‘अरे, अपने कीबोर्ड पर
घिसते घिसते जन्म गंवाया
पर कभी इतना हिट नहीं पाया।
खुद ही पसंद बटन पर
उंगली पीट पीट कर
अपने पाठ किसी तरह चमकाये
पर पाठक उसे देखने भी नहीं आये।
इस नपसंद ने बिना कुछ किये
इतने सारे पाठक जुटाये।
तुम इस जमाने को नहीं जानती
आज की जनता गुलाम है
खास लोगों के चेहरे देखने
और उनका लिखा पढ़ने के लिये
आम आदमी को वह कुछ नहीं मानती
आम कवि जब चमकता है
दूसरा उसे देखकर बहकता है
पसंद के नाम सभी मूंह फुलाते
कोई नापसंद हो उस पर मुस्कराते
पहरे में रहते बड़े बड़े लोग
इसलिये कोई कुछ नहीं कर पाता
अपने जैसा मिल जाये कोई कवि
उस अपनी कुंठा हर कोई उतार जाता
हिट देखकर सभी ने अनदेखा किया
नापसंद देखकर उनको भी मजा आया।
ज्यादा हिट मिलें इसलिये ही
यह नापसंद चिपकाया।
अरे, हमें क्या
इंटरनेट पर हिट मिलने चाहिये
नायक को मिलता है सब
पर खलनायक भी नहीं होता खाली
यह देखना चाहिये
मैं पसंद से जो ना पा सका
नापसंद से पाया।’’

इधर माशुका ने सोचा
‘मुझे क्या करना
आजकल तो करती हैं
लड़कियां बदमाशों से इश्क
मैंने नहीं लिया यह रिस्क
इसे नापसंद देखकर
दूसरी लड़कियां डोरे नहीं डालेंगी
क्या हुआ यह नापसंद लेखक
मेरा पसंदीदा आशिक है
इसमें कुछ बुरा भी समझ में नहीं आया।’
……………………………..

यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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हिंदी

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चीजें बेच सके बाज़ार में वही है असली इश्क -हास्य व्यंग्य कविताएँ


उनके कान खुले हैं
पर सुनते हैं कि नहीं कैसे बताएं
क्योंकि उनको सुनाया कई बार है दर्द अपना
पर कभी ऐसा नहीं हुआ कि वह कोई दवा लाएं
————————–
इश्क तो असल अब वही है
जिसके नाम पर कोई उत्पाद
बाज़ार में बिकता है
औरत हो या मर्द
असल में जज्बातों खरीददार होता है बाज़ार में
भले ही माशूक और आशिक के तौर पर दिखता है
————————–
शब्द बिके नहीं बाज़ार में
तो पढ़े भी नहीं जाते
बिकने लायक लिखें तो
समझने लायक नहीं रह जाते
शब्दों के सौदागरों बनते हैं हमदर्द
पर दिल में उनके जज़्बात कभी
पहुँच नहीं पाते
नहीं बनी कोई ऐसी तराजू
जिसमें शब्दों को तौल पाते
—————————–

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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चतुराई से मुट्ठी में कर लो-हास्य कविता


हाथ में डंडे और मुहँ में नारे
चले हैं संस्कृति बचाने बिचारे
ऐसा लगता है सच्चे हितचिन्तक हैं
सारे समाज की रक्षा के लिए
जंग लड़ने निकले हैं सारे के सारे

संस्कृति और संस्कारों की
पहचान नहीं जानते
अपने अन्दर होना चाहिए
धैर्य के संस्कार
यह भी नहीं मानते
ज़रा ज़रा सी बात पर भौहें तानते
पर समाज बचाने के नाम पर
जुलूस बनाकर चले जाते भ्रम के मारे

बाजार का विस्तार
पूरी दुनिया में सब तरफ हुआ
जजबातों का व्यापार सब जगह
खुले आम हुआ
जिसका नाम विज्ञापन से नहीं होता
विरोधी के कर्मों से सबकी जुबान पर होता
जुलूस होता एक तरफ
दूसरी तरफ लोग जाते सारे

कहैं दीपक बापू
जिससे नफरत हो उससे मुहँ फेर लो
लोगों के मन तुम्हारे काबू में
कभी आ नहीं सकते
जो अक्ल से पैदल उसे समझा नहीं सकते
नाम लेकर तुम अपनी नापसंद का
नाम खुले आम क्यों करते
अपने लोगों के मन में ही
खुशियों की सौगात क्यों नहीं भरते
शहरों पर कब्जे अब अस्त्र-शस्त्र से नहीं
धन की ताकत और अक्ल से सब करते
अगर चाहते हो जंग जीतना तो
अपने मन के किले मजबूत करो
अक्ल के अस्त्र-शस्त्र का लगाओ भण्डार
चतुराई से अपनी मुट्ठी में कर लो लोग सारे
प्यार के भ्रम में वह भटके
मोबाइल के एस एम् एस में अटके
तुम शाश्वत प्रेम का मतलब उन्हें समझाओ
वह हैं अपने मन के अँधेरे के मारे
—————————————————-

मजदूरों के पसीने के बिना महल नहीं बन पाते-कविता


अपने लिए नहीं मांगते सिंहासन
दो पल की रोटी की खातिर
मजदूर इधर से उधर जाते
अपने पसीने की धारा में
अपना पूरा जीवन गुजारते
नहीं किसी का खून चूसने जाते
नहीं करते चोरी
न करते लूट
इसलिए रोज चैन की नींद सो जाते

जिनका जीवन बीतता है रोज
छल कपट के साथ
दौड़ते जाते माया के पीछे
फिर भी नहीं आती वह हाथ
दिन में चैन नहीं है
रात को नींद नही
वह गरीब मजदूर को नहीं सह पाते

ऊंचे महलों में भी जिनको सुख नसीब नही
थाली में सजे पकवान
पर पेट में जाने का उनकों रास्ता नहीं
मजदूर के तिनकों के घरोंदों को
भी देखते तिरछी नजर से
उसकी रोटी के सूखे टुकड़े को
देख कर उनके पेट जलते
क्योंकि सुख का मतलब वह नहीं समझ पाते

शायद इसलिए जब भी
होता है कहीं हंगामा
मजदूर बनता है निशाना
दुनिया के लोग भले ही अमीरों के
स्वांग पर करते हैं नजर
पर मजदूर के सच की अग्नि की
आंच भी नहीं झेल पाते
कोई नहीं होता हमदर्द पर फिर भी
मजदूर जिए जाते
यह जिन्दगी सर्वशक्तिमान की देन है
यही सन्देश फैलाते जाते
अमीरों के चौखट पर
हाजिर करने वाले बहुत होते पर
पर मजदूरों के पसीने के बिना
कभी किसी के महल नहीं बन पाते
————————————–

वादे करने और भूलने का सिलसिला


पूरे करने होते काम तो
वादे किए ही क्यों जाते
खाने के लिए कसम होतीं हैं
कोई रिश्ते निभाए नहीं जाते
एक दिन हाथ जोड़कर
मिल जाता है बरसों के लिए सिंहासन
इसलिए वादे कर भी
कभी काम नहीं किए जाते
चार दिन पैदल चलकर
कई बरस हो जाता है महल में बसेरा
फ़िर क्यों दें लोगों के घर का फेरा
जिनसे वादे किए नहीं
उन्हें ही साथ लिया जाता है
जिनसे किए उन्हें भूल जाते
कमाल का है हमारा देश
याददाश्त कमजोर होती है आदमी की
पर यहाँ तो उसे भी नहीं पाते
बरसों के वादे करने और भूलने का
अंतहीन सिलसिला कहीं थमते नहीं पाते

कौन चाहेगा चेतना की ज्योति जगाना


वादे कर भूल जाना
अपने कहे से पलट कर
कुछ और करते जाना
क्यों नहीं किसी को अच्छा लगेगा
जब सिंहासन की सीढ़ी
झूठ के सहारे टिकी हो
हमदर्दी के व्यापार में
दिल से कोई क्यों ईमानदारी दिखायेगा
जब भरोसे की छाप पर
धोखे की चीज बिकी हो
जब ठगे जाने के लिए लोग
रोज मिल जाते हैं
तब चतुरों की गली में कौन चाहेगा जाना
जब भीड़ ने तय कर लिया है
भेड़ की तरह चलाने का
कौन चाहेगा
चेंतना की ज्योति जगाना

दिल हुआ इधर से उधर-हास्य कविता


अंतरजाल पर एक दूसरे के ब्लोग पर
कमेन्ट लिखते-लिखते
दोनों के दिल मिल गए अपने आप
दोनों युवा थे और कविता लिखने के शौकीन भी
होना था मिलन कभी न कभी
प्रेमी ब्लोगर एक असली नाम से तो
चार छद्म नाम से कमेन्ट लगाता
और प्रेमिका के ब्लोग को हिट कराता
अपना लिखना भूल गया
उसके ब्लोग पर कमेन्ट लगाता
और खुश होता अपने ही आप

एक दिन प्रेमिका ने भेजा सन्देश
‘ कुछ और रचनाएं भी लिखा करो
वरना ब्लोग जगत में बदनाम हो जाओगे
‘केवल कमेन्ट दागने वाला ब्लोगर’कहलाओगे
इससे होगा मुझे भारी संताप

प्रेमिका का आग्रह शिरोधार्य कर
वह लिखने में जुट गया
हो गया मशहूर सब जगह
कमेन्ट लिखने का व्यवहार उसका छूट गया
एक प्रतिद्वंदी ब्लोगर को आया ताव
उसके हिट होने और अपने फ्लॉप होने का
उसके दिल में था घाव
बदला लेने को था बेताब
उसने उसकी प्रेमिका के ब्लोग पर
लगाना शुरू किया कमेन्ट
एक अपने और आठ छद्म नाम से
उसके ब्लोग को हिट कराता
अपनी बेतुकी कवितायेँ करने लगा
उसको हर बार भेंट
प्रेमिका का दिल भी गया पलट
दूसरे में गया दिल गया भटक
पहले ब्लोगर को कमेन्ट देने का
उसका सिलसिला बंद हुआ अपने आप

उधर पहले ब्लोगर ने उसको जब अपने
ब्लोग पर बहुत दिन तक नही देखा
तब उसके ब्लोग का दरवाजा खटखटाया
दूसरे ब्लोगर के कमेन्ट को देखकर
उसे सब समझ में आया
मन में हुआ भारी संताप
उसने भेजा प्रेमिका को सन्देश
‘यह क्या कर रही हो
मुझे लिखने में उलझाकर
तुम कमेन्ट में उलझ रही हो
सच्चे और झूठे प्रेम को तुम
अंतर नही समाज रही
धोखा खाओगी अपने आप’

प्रेमिका ने भेजा सन्देश
‘तुम्हारी रचना से तो उसकी कमेन्ट अच्छी
तुम्हारी रचना दर्द बाँटती हैं
उसकी कवितायेँ दुख के बादल छांटती हैं
अब तो मेरा उस पर ही दिल आ गया
तुम अपना दिल कहीं और लगाना
मत देना अपने को विरह का संताप
सब ठीक हो जायेगा अपने आप

नोट- यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है.

हास्य कविता-बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा


बीस के शेर
पचास में ढ़ेर
जीतते हैं तो फुलाते सीना
हारें तो कहें’समय का फेर’
समझाया था क्यों करते हो
पचास का आयोजन
जब है बीस का भोजन
क्रिकेट कोई दाल होता तो
पानी मिलाकर चला लेते
कुछ खा लेते तो
बाकी भूखे रह जाते माला फेर
बीस ओवर के खेल पर
बहुत खुश हुए थे कि
दुनिया में जीते अपने शेर
पचास ओवर के खेल में
कंगारुओं की फुर्ती से हुए ढ़ेर

कहैं दीपक बापू
लोग पूछ रहें हैं
‘वह मधुर सपना था या
खडा है सामने यह कटु सत्य’
दिन भर पूछने लगे हैं फिर स्कोर
चर्चा करते हैं क्रिकेट की
सांझ हो या भोर
चौबीस साल पुरानी कहानी
फिर सामने आ रही है
जब विश्व विजेता हुए थे
इसी तरह ढ़ेर
अब इस कहानी पर
अगले चौबीस महीने तक भी
नहीं चलेगा खेल
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती
छोटी जीत पर बड़ी हर नहीं फबती
बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा
कितना भी नया हो बीस का ही रहेगा
पोल खुल जायेगी देर-सबेर

अपने ही लोगों की वाह-वाही चाहिए


लिपि रोमन
हो गयी है कॉमन
अब इस दुनिया को कुछ नया चाहिए
जिन पर टिकाये बैठे हो
अपनी उम्मीद उस पश्चिम को
अपनी दुकानदारी अब हिंदी में चाहिए
रोमन में हिंदी चलाने की चाहत
रखने वालों से कोई शिकायत नहीं
देवनागरी से रहित होने पर
उनसे हमदर्दी जताना चाहिए
पर रोमन की गठरी सिर पर
रख कर घूमने वालों की दरियादिली
हिंदी भाषा को नहीं चाहिए
कभी हिंदी गरीबों की भाषा कहलाती थी
तब क्यों नहीं उठा था लिपि का सवाल
अब क्यों मच रहा है बवाल
अब ऐसा क्या हो गया कमाल
कि सबको हिंदी ही चाहिए

कहैं दीपक बापू
जब बन रहा था विश्व में
भारत एक आर्थिक महाशक्ति
तब ही हमें मालुम था कि
एक दिन लिपि पर ही होगा हमला
पश्चिम के सिमटते साम्राज्य की
थकी हारी अंग्रेजी और उसकी रोमन लिपि का
उठा लाएंगे इस देश में गमला
भारत के गरीब के जेब में
कुछ आयेगा पैसा
फिर भी रहेगा वह हिंदी से पहले जैसा
उसके जेब से पैसे निकालने के लिए
हिंदी का सहारा चाहिए
उठाएँ रहो रोमन का परचम
हम नहीं रोकेंगे
हम अपनी मातृभाषा को
शब्दों के तोहफे देवनागरी में ही सौंपेंगे
हमें अपने लिखे पर
अपने ही लोगों की वाह-वाही चाहिए

नोट-यह ऐक काल्पनिक हास्य कविता है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है, अगर किसी से इसका विषय मिल जाये तो यह संयोग मात्र होगा

हास्य कविता -हिट- फ्लॉप के चक्कर में मत पडो


वह प्रतिदिन हिट होने के
नुस्खे सबको बताएं
और शब्दों के डाक्टर कहलाये
मरीज पढ़ते नुस्खा जब तक
डाक्टर साहब हिट की
सीढियाँ दनादन चढ़ जाएँ

यह कैसा खेल है
हिट और फ्लॉप का
जरा लोगों को समझाए
चार लाईन की रचना शिखर पर
परचम फहराये
कोई शीर्षक लेकर ही
चौपाल में छाये
शब्दों के भण्डार भरे हैं
जिनके निज-पत्रक संग्रहालय में
उनके तो ताले ही न खुल पायें

कहें दीपक बापू
मत पडो हिट और फ्लाप के
चक्कर में तुम
अपने शब्दों को यूँ लुटाये जाओ
जज्बातों से पैदा
दिल से लिखे
उम्मीदों से सजे शब्द
लोगों के सिर पर
फूल की तरह बरसाओ
आज का लिखा कल भी
पढा जाये
ऎसी रचना कर जाओ
एक दिन के लिए लिखा
दुसरे दिन नहीं पढा जायेगा
इसीलिये सदाबहार लिख जाओ
हिट जो होते हैं
वह फिक्र से घिरे रहते हैं
तुम फ्लाप होकर बेफिक्र हो
अपनी रचना करते जाओ
लोग तथाकथित हिट से
जब फुर्सत पाएं
तुम्हारा लिखा पढ़ते जाएँ

समस्याओं के जंगल में आन्दोलन


लोग भीड़ में जाकर
जुलूस सजाते हैं
चीख-चिल्लाकर नारे लगाते हैं
और फिर आश्वासन और वादों का
पुलिंदा लेकर वापस आते हैं
कई बरस से चल रहा है
आंदोलनों का सिलसिला
पर फिर भी किसी को कुछ नहीं मिला
समस्याओं के रोग नित बढते जाते हैं

अभी तक इतने आश्वासनों, वादों और
घोषणाओं के पुलिंदे बंट चुके हैं कि
उनेमें कोई तोहफे होते तो
सब जगह इन्द्रपुरी जिसे दृश्य होते
पर फिर जुलूस के लिए
कहाँ से लोग जुटाए जाते
कमरे के बाहर की राजनीति तो
दिखाई देती है
पर अन्दर के सौदे कौन देखे
इसलिये लोग जहाँ से चलते हैं
फिर लॉट कर वहीं अपने को पाते हैं
समस्याओं के इस जंगल में
आंदोलन रेंगने वाले कीड़े की
तरह शोभा पाते हैं

कविता -रामजी तो घट-घट में बसते हैं


एक ढोंगी साधु ने भक्त से कहा
‘तुम हमें दक्षिणा दो तो
हम तुम्हें ऐसा  मंत्र बतायेंगे
कि जब भी तुम राम को पुकारोगे
वह तुम्हारे पास चले आयेंगे
सब संकट हर जायेंगे
तुम्हारी सारी मनोकामना पूरी कर जायेंगे’
भक्त  ने हंसकर  कहा
‘महाराज, आप भले ही दक्षिणा ले लो
पर मंत्र की हमें  नहीं है जरूरत
रामजी तो मेरे घट में ही बसते हैं
संकट हरेंगे तो तब देते हों जब
मांगते है जब उनसे तो बस
यही कि हमें अपनी भक्ति दें 
उससे तो हम वैसे ही इस
जीवन की वैतरणी पार कर जायेंगे

हास्य कविता -धूल का प्रतिरोध


बहुत दिन बाद ऑफिस में
आये कर्मचारी ने पुराना
कपडा उठाया और
टेबल-कुर्सी और अलमारी पर
धूल हटाने के लिए बरसाया
धूल को भी ग़ुस्सा आया
और वह उसकी आंखों में घुस गयी
क्लर्क चिल्लाया तो धूल ने कहा
‘धूल ने कहा हर जगह प्रेम से
कपडा फिराते हुए मुझे हटाओ
मैं खुद जमीन पर आ जाऊंगी
मुझे इंसानों जैसा मत समझो
कि हर अनाचार झेल जाऊंगी
इस तरह हमले का मैंने हमेशा
प्रतिकार किया है
बडों-बडों के दांत खट्टे किये हैं
जब भी कोई मेरे सामने आया ‘
—————

रामजी लगायेंगे बेडा पार-कविता


विश्वास धारण कर हृदय में
रामजी करेंगे बेड़ा पार
जलमार्ग हो या थल मार्ग या
करना हो आकाश में
बिना पंख विचरण
कोई अगर बाधा होगी तो
हृदय से स्मरण कर नाम का
हो जाओगे उसके पार
उनकी भक्ति में शक्ति अपार
पर आएगा आड़े तुम्हारा अंहकार

तुम चाहोगे कि
काम सब रामजी करें
नाम तुम्हारा हो
दूसरों के यकीन और भक्ति की
परवाह नहीं
बढाना चाहते अपना व्यापार
दिखाते है लोगों को सपने
लक्ष्य का पता नहीं अपने
रामजी के नाम से बड़ा नामा
क्या करेंगे लोगों का भला
उनकी नजर में है बसता है अपना ही परिवार

रामजी ने कहा
‘मुझसे बडे हैं भक्त मेरे
बिना लालच और लोभ
मेरी भक्ति के भाव में पडे’
ऐसे भक्तों की शक्ति अपार
जिनका कुछ लोग भी करते व्यापार
जो अभक्ति में देखते फ़ायदा
वह भी लेते रामजी का नाम कई बार

कहैं दीपक बापू
सच और झूठ का पता तो रामजी जाने
पर हम तो उनकी शक्ति को माने
भक्त तो नाम लेते हैं
अभक्त भी लगाते पुकार
पर उनसे भी क्या कहें
कहीं एक क्षण भी हृदय से याद किया
तो हो जाएगा उनका बेड़ा पार
रामजी की माया है अपरंपार
अपने भक्तों के दें भक्ति
और अभक्तों को माया के चक्कर में
ऐसा फंसायें कि घूमें बेकार
इस धरती पर ही स्वर्ग बसाने के चाह
अपनी देह के अमर होने का भ्रम
व्यापार ही जिनका धर्म
भक्तों की भावनाओं बेखबर
जिन्होंने तय कर लिया है कि
अपनी दैहिक शक्ति का प्रदर्शन दिखाएँगे
रामजी के अलावा उन्हें
कौन समझा सकता है कि
यकीन कर लो
कुछ पल हृदय से भक्ति कर लो
रामजी तुम्हारा भी बेड़ा पार लगाएंगे

—————————-

हास्य कविता -नैतिकता की दुहाई देना बेकार


अपराधियों के पुलिस मुठभेड में
मारे जाने के समाचार प्रचार
माध्यमों मे छा जाते
पर उनके हाथों मारे गए
बेकसूर लोगों को भूल जाते
शायद अपराधियों के हाथ में
शक्ति के स्त्रोत होने का ही यह
परिणाम है कि हर दिन
अपराधों के बढते ग्राफ पर
हायतौबा मचाने वाले
रात को उनके गले मिलने जाते
उनकी ह्त्या की शिकार देहों की रूहें
उनका पीछा नहीं छोड़ेंगी
यह लोग समझ नहीं पाते हैं
————————–

अपराधियों ने प्रचार माध्यमों की
वजह से ही हीरो की छबि पायी है
आज कोई दान, पुण्य और परोपकार
करने पर इज्जत नहीं पाता
लोग में जो डर और आतंक फैला दे
वही हीरो कहलाता
जिसने तलवार उठायी
उसने ही दमदार की छबि पायी
लोग खुद ही देते हैं उनको प्रोत्साहन
नैतिकता और मान-मर्यादा की

बेकार है देना दुहाई
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