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होली पर्व 2014 के अवसर पर हास्य कविता-दिल की सफाई


घर पर आया फंदेबाज और बोला

‘‘दीपक बापू इस बार देश में

बढ़ गयी है बहुत महंगाई,

गरीब तो टूटा है

मध्यम वर्ग वाला भी हो गया गरीब

हमें रंग न खेलकर

समाज सेवा का व्रत लेना है

यही सोच मेरे मन में आई,

आप तो फ्लाप कवि हो

पिटती हैं आपकी अंतर्जाल पर कविता

इसलिये कुछ नया करो

समाज सेवा के लिये बनाओ संस्था

करो आमजन की भलाई।’’

सुनकर हंसे और बोले दीपक बापू

‘‘लगता है होली का मजाक करने आये हो,

हमारे फ्लाप होने का सच

हमारे सामने धरने आये हो,

हमारी पुरानी टोपी

फटी धोती

और पैबंद लगा कुर्ता देखकर

तुम्हें परेशानी होती है,

की नहीं कभी कविता से कमाई

यह देखकर तुम्हारी नीयत पानी पानी होती है,

तुम जानते हो अच्छी तरह

नये ज़माने में समाज सेवा भी

एक तरह से हो गयी धंधा,

लाचारों के नाम पर सजाओ दुकान

कभी हवाई जहाज में करो दौरा

कभी कार में करो खरीददारी

बांट सको तो ठीक

नही हैं अपने काम में लाओ चंदा,

पहले प्रचार में प्रसिद्धि,

फिर उसके नकदीकरण में दिखाओ अपनी सिद्धि,

हमसे यह नहीं हो पायेगा,

पराये धन पर मजे करना हमें ही सतायेगा,

वैसे भी होली हम क्या मनायेंगे,

हालातों कर दिये सभी रंग लगते हैं फीके

किसी पर क्या लगायेंगे,

करेंगे कुछ चिंत्तन

कुछ रचेंगे हास्य कवितायें

देश की तो नहीं कर सकते

अपनी हृदय की ही करेंगे सफाई।

————

 

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

 

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शतरंज और लोकतंत्र-हिन्दी व्यंग्य कविता


कुर्सी के खेल में शहादत भी कभी रंग लाती है,

ज़माने की हमदर्दी बादशाहत भी संग लाती है,

सियासत की चाल शतरंज के खेल जैसी होती,

घोड़ा चले ढाई कदम बादशाह की ताकत ऐसी नहीं होती,

सीधे चलता पैदल वार तिरछा कर वजीर बन जाये,

मात दे बादशाह को तो बाजी एक नज़ीर बन जाये,

ऊंट की तिरछी तो हाथी की सीधी चाल करती हैरान,

हुकुमत का खेल पसंद करते फरिश्ते हों या शैतान,

कहें दीपक बापू बेबस और बेजान राजा बुत जैसा है

उसकी किस्मत की कुंजी मुहरों की चालों में फंसी होती।

—————–

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

 

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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अध्यात्मिक ज्ञान होने पर होली का आनंद अधिक होता है-होली पर्व 2014 के अवसर पर विशेष हिन्दी लेख


      यह हैरानी की बात है कि जिस होली को रंगों का त्यौहार माना जाता है उससे ही अनेक लोग अधिक उत्साह से मनाने की बजाय घर में एकांतवास करते हैं। दरअसल होली पर्व मनाते समय  ऐसी विकृत्तियां तथा भ्रांतियां समाज में  फैलीं कि अनेक लोग धर्मभीरु होने के बावजूद इसे नापसंद करने लगे।  ऐसे अनेक लोग मिल जायेंगे जो होली के दिन स्वयं पर कर्फ्यु लगा देते हैं।  जिन मार्गों पर भीड़ होती है वहां केवल हुडंदगी ही विचरते मिलते हैं या फिर शहर के प्रहरी उन पर नियंत्रण करने के लिये गश्त करते दिखते हैं।  होली के अवसर पर पुलिस वालों को छुट्टी नहीं मिलती क्योंकि प्रशासन इस अवसर पर हुड़दंग के उपद्रव में बदल जाने को लेकर आशंकित रहता है। इतना ही नहीं भारतीय धर्म विचाराधारा के मानने वालों में ही अनेक लोग यह मानते हैं कि होली खेलना अब देह के लिये परेशानी का कारण बन जाता है। रंग और गुलाल मे डला कैमिकल आंखों के लिये हानिकारक है।

      एक समय था जब होली पर दूसरे को अपमानित करने का अवसर माने जाना लगा था।  जबरन चंदा मांगा जाता था। राह चलते हुए राहगीर के पीछे भोंपू बजाकर आतंकित किया जाता था तो अनेक के कंधे पर रखा गमछा या टोपी को कांटे से उठाकर टांग कर चंदा मांगा जाता था।  राह चलते हुए हुड़दंगी गंदी नाली में आदमी को फैंक देते थे।  धीरे धीरे पूरे देश में प्रशासनिक अमला सक्रिय हुआ और ऐसी घटनायें कम होती गयीं।  अब तो बाकायदा पुलिस के जवान भारी पैमाने पर चौराहों पर तैनाते होते हैं।  गश्त करते हैं। फिर समय के साथ शिक्षा का प्रभाव बढ़ा तो इस तरह की घटिया हरकतें कम होती गयीं। इधर संचार माध्यमों ने भी नये रूप लिये तो होली इस मामले में सुखद बनी कि अगर आप घर से बाहर न जाना चाहें तो ढेर सारे चैनल आपको बोर होने से बचाते हैं। इसके बावजूद जिन लोगों के मन में पुरानी स्मृतियां हैं वह होली की औपचारिकता भर निभाते हैं।

      हम ऐसे ही लोगों मे रहे हैं जिनके लिये होली का पर्व ऐसे आंनद का अवसर है जिसमें अध्यात्मिक ज्ञान का प्रभाव है। होलिका अपने भतीजे प्रहलाद को जलाने के प्रयास में स्वयं जल गयी। उसके भाई हिरण्यकश्यप ने अपने ही बेटे प्रहलाद को परमात्मा की भक्ति से रोकने के लिये अनेक प्रयास किये। अंततः अपनी बहिन को सौंपा कि वह भतीजे को जला दे। वह प्रहलाद को जलाने के लिये चली और स्वयं जल गयी। इसी घटना से संदेश सीखने के लिये होलिका दहन किया जाता है। बाद में हिरण्यकश्यप ने अपने उसी बेटे प्रहलाद को एक खंबे से बांध दिया तथा तलवार से मारने के लिये उद्यत हुआ उसी समय  भगवान ने नरसिहरूप में अवतरित होकर प्रहलाद को बचाया तथा हिरण्यकश्यप का वध किया। हिरण्यकश्यप ने उनको याद दिलाया किमुझे तो यह वरदान प्राप्त है कि मैं किसी अस्त्र शस्त्र से नहीं मरूंगा, न दिन को मरूंगा न रात को, न घर के अंदर मरूंगा न बाहर, न मुझे मनुष्य मारेगा न पशु, न जमीन पर मरूंगा न आकाश में तब आप मुझे कैसे मारेंगे?’

      कथा में बताया जाता है कि हिरण्यकश्यम ने यह सवाल उस समय किया जब नरसिंह भगवान ने उसे उठाकर अपनी गोद में वध के लिये जकड़ लिया था।  तक उन्होंने मारने पहले उतर भी दियादेख, न दिल है न रात बल्कि इस समय शाम है, जहां तू है वह महल का अहाता है न तू अंदर है न बाहर है, मेरा चेहरा देख न मैं इंसान हूं न पशु और देख मेरे यह नाखून न यह अस्त्र है न शस्त्र! न तू इस समय जमीन पर है न आकाश में वरन् इस समय तू मेरी जांघों पर है इसलिये तेरा वरदान तुझे को मेरे से नहीं बचा सकता।

      इस कथा से मनोरंजन तो होंता ही है साथ ही इसमें अध्यात्मिक संदेश भी निहित है। इस ंसंसार में शक्तिशाली मनुष्य हमेशा ही यह मानता है कि वह कोई भी तर्क गढ़ सकता है उसका विरोध कोई नहीं कर सकता। ऐसा होता भी है पर जब वह विपरीत समय का शिकार होता है तब उन्हें सच्चाई का पता चलता है। हमारे देश के लोग ऐसी कथाओं से मनोरंजन तो ग्रहण करते हैं पर अध्यात्मिक संदेश से परे हो जाते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि हमारी धार्मिक परंपरा में परमात्मा के अनेक साकार रूप माने गये हैं जिनकी अपनी इच्छा अनुसार हर कोई आराधना करता है। किसी एक आराध्य देव का न होना यहां इस मायने में अच्छा है कि एकरसता का भाव नहीं आता वहीं अनेक होने से यह परेशानी होती है कि सभी लोग अपने ही स्वरूप को श्रेष्ठ बताकर आपस में वाद विवाद करते हैं। भक्ति में अहंकार का स्थान नहीं है पर अपने ही स्वरूप को श्रेष्ठ बताना इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान का अभाव है।  सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे यहां गुरु को भगवान से भी बड़ा माना गया है क्योंकि वह सशरीर ज्ञान देता है पर इसका लाभ उन लोगों ने उठाया जिन्होंने अलग अलग से अपने पंथ स्थापित किये और स्वयंभू भगवान बन गये।  यह गुरु अध्यात्मिक ज्ञान तो देते हैं पर पहचान इनकी चमत्कारों से बनती है। सांसरिक विषयों के कार्य समय आने पर स्वयं होते हैं पर यह गुरु उसका श्रेय स्वयं ले जाते हैं। परमात्मा के स्वरूपों पर इतना विवाद नहीं होता जितना इन पंथों के गुरुओं की वजह होता है। एक पंथ का शिष्य अपने गुरु तो दूसरा अपने की प्रशंसा करता है। यह प्रशंसा विवाद खड़े करती है। जिस तरह हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रहलाद के भक्ति भाव पर प्रहार कर रहा था वह अनैतिक था।  यह बात समझ लेना चाहिये कि किसी की भक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करने की बजाय अपना अंतर्मन देखना चाहिये कि हम कितने सच्चे हैं।

      कहने का अभिप्राय यह है कि होली पर बाहरी रंगों में सराबोर होना ठीक है पर अपने अंदर जो भक्ति का रस है उसके रंग की  पहचान करना चाहिये। इसकी पहचान अध्यात्मिक ज्ञान से ही  हो सकती है। पहले तो भाषा ज्ञान न होने से आम आदमी को गुरु की आवश्यकता होती थी पर अब तो शिक्षा ने अपना बृहद रूप ले लिया है इसलिये  ग्रंथों को गुरु मानकर उनका अध्ययन करना चाहिये। भौतिक उपलिब्धयां इस संसार में सभी को मिलती हैं-किसी को कम किसी को ज्यादा।  मुख्य बात यह है कि सुख का रस कौन कितना पीता है या किसके हृदय का रंग अधिक आकर्षक है, यह देखना चाहिये यह उसके जीवन का अध्ययन कर ही सीखा जा सकता है। ज्ञान प्राप्त कर हृदय में ऐसी रंगीन होली खेली जा सकती है जो बाहर दुर्लभ है।

      बहरहाल इस होली के अवसर पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकों को बधाई।  सभी के लिये प्रगतिमय वातवरण बने ऐसी शुभकामनाये।

दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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रहीम दर्शन पर आधारित हिन्दी चिंत्तन लेख-समाज का दोहन करने वाले वर्तमान धनपति आत्ममंथन करें


      हमारे देश में अगले दो महीनों में लोकसभा चुनाव 2014 संपन्न करने की तैयारी चल रही है। चुनावी राजनीति ने समय के साथ अनेक रूप बदले हैं। वैसे देखा जाये तो राजनीति एक व्यापक अर्थ वाला है जिसे हम राजसी प्रवृत्तियों से संपन्न कर सकते हैं।  चुनाव लड़कर पद पर जाना ही केवल राजनीति नहीं होती वरन् जीवन के समस्त अर्थ कम ही राजनीति के मंत्रों से ही संपन्न किये जाते हैं। यह अलग बात है कि हमारे वर्तमान पेशेवर बुद्धिजीवी इसे केवल चुनावी राजनीति से ही जोड़कर देखते हैं।  वास्तविकता यह है कि चुनावी राजनीति, उद्योग, व्यवसाय, तथा कोई भी अन्य कार्य फल की प्राप्ति के लिये जो बाह्य दृष्टि से  किया जाता है उसे ही राजसी कर्म कहा जाता है। जब हम राजसी पुरुष की बात करें तो उसमें चुनावी राजनेता ही नहीं वरन् उद्योगपति, अध्यात्म से इतर विषयों के साहित्यकार, कलाकार, व्यवसायी, चिकित्सक, इंजीनियर और पत्रकार सभी शामिल है। जहां तक सामूहिक सांसरिक हित की बात हो तो समाज सात्विक लोगों की बजाय राजसी पुरुष से ही अपेक्षा करता है कि वह उसको संबल प्रदान करेंगे।  यही कारण है कि हमारे अध्यात्मिक दर्शन में उन राजसी पुरुषों को सम्मान देने की बात करता है जो अपना दायित्व निभाते हैं।

      वर्तमान समय में हर क्षेत्र में सक्रिय राजसी पुरुषों की छवि अब उतनी आकर्षक नहीं रही जितनी कभी रहा करती थी। इसका कारण यह है कि समाज की अपेक्षा पर अधिकांश राजसी पुरुष खरे नहीं उतर पाये हैं।  हम सभी पर आक्षेप नहीं कर सकते कि वह बुरे हैं क्योंकि अगर ऐसा होता तो हमारा समाज अभी तक ध्वस्त हो गया होता। हालांकि यह भी सच है कि अगर सहृदय राजसी पुरुषों की संख्या अधिक होती तो यह समाज ऐसी दुर्दशा में नहीं आता जैसा कि हम देख रहे हैं। देखा यह गया है कि समाज के सभी क्षेत्रों में जो शिखर पर पहुंचें हैं वह आम इंसान को भेड़ समझते हैं जिसकी भीड़ लगाकर वह आत्मप्रचार कर अपना ही हित साधते हैं। यही कारण है कि उनके प्रति समाज में न केवल असंतोष का भाव है वरन् अनेक निराश लोग तो उनके प्रति वैमनस्य का भाव भी पालने लगे हैं।

कविवर रहीम कहते हैं कि

————-

तासों ही कछु पाइए, कीजै जाकी आस।

रीते सरवर पर गए, कैसे बुझै पियास।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-सूखी तालाब पर जाने से प्यास शांत नहीं होती। उसी व्यक्ति से ही कुछ प्राप्त किया जा सकता है जो दूसरों की आशाओं पर खरा उतरता है।

      आर्थिक उदारीकरण ने राजकीय क्षेत्र का दायरा संकुचित किया है तो निजी क्षेत्र के विस्तार ने चंद धनपतियों की शक्ति इतनी बढ़ा दी है कि समाज की सभी आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, प्रचार, कला तथा खेल पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं पर उनका नियंत्रण हो गया है।  जैसा कि सभी जानते हैं कि धन का मद सबसे अधिक विषाक्त होता है और धनपतियों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह अकारण किसी के साथ आर्थिक गठबंधन नहीं करते। उनको अपनी चाटुकारिता तथा प्रशंसा पसंद होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह किसी कलाकार, खिलाड़ी, समाज सेवक, तथा पत्रकार की सहायता केवल इसलिये नहीं कर सकते कि वह योग्य है वरन् उनका दृष्टिकोण यह रहता है कि वह हमारा स्वयं का हित कितना साध सकता है?

      हमें यह किसी पर आक्षेप नहीं करना पर इतना अवश्य कहना चाहते हैं कि हमारे इस प्रकार के राजसी पुरुषों अपने अधीन रहने वाले प्रचार माध्यमों पर अपनी छवि भले ही देवता जैसी बनायें पर समाज उनका हृदय से सम्मान नहीं करता। आत्ममुग्ध होकर अपने स्वार्थ में लगे राजसी पुरुष भले ही आत्ममुग्ध होकर रहे पर सच यही है कि जब तक कोई किसी का स्वार्थ सिद्ध नहीं करता उसकी प्रशंसा नहीं हो सकती। यह बात सभी प्रकार के राजसी पुरुष समझ लें।

 

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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प्रायोजित नाटक खबर-हिंदी व्यंग्य कविता


नाटक बनते  खबर  या खबर ही नाटक बनती कह नहीं सकते,

पर्दे के नायक दिल देकर बने या बिल लेकर कह नहीं सकते,

कहें दीपक बापू बाज़ार के सौदागरों की मुट्ठी में पूरा जहान है,

कोई दाम देकर  तो कोई दगा देकर खबरों में बना महान है,

पर्दे पर खेल चल रहा है या फिल्म अंदाज लगाना कठिन है,

 खबर जैसी लिखी पटकथा पर करते अभिनेता अभिनय

खिलाड़ी खेलते मगर पहले से तय जीत या हार का दिन है,

हर कोई पैमाना नाप रहा दूसरे की असलियत का

अपने ढोल की  पोल छिपाने में सभी माहिर हैं,

किसी ने मासूम तो किसी ने रोबदार मुखौटा लगाया

डरते हवा के झौंके से उनके कमजोर दिल सब जगह जाहिर है,

न दुनियां अब रंगीन रही न कुछ यहां अजीब लगता है

लोगों के अंदाज कितने सच कितने बनावटी है कह नहीं सकते।

……………………………

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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महंगाई और भलाई-हिंदी व्यंग्य कविता


आम इंसान की सांसों को थाम रही बढ़ती महंगाई,

विकास के स्वर्णिम रथ से बंट रही  गरीब को भलाई।

कहें दीपक बापू सबसे आसान है दिन में देखना सपने,

साकार करना कठिन हो तो लगें भगवान नाम जपने।

रिश्तों की डोर कभी टूटती नहीं यह सच बात है,

मगर मेहमानों की महंगी पड़ ही जाती एक रात है।

जेब में पैसा हो तो आशिक पर इश्क का भूत चढ़ता है,

खाली जेब से होता जब नाकाम दोष माशुका पर मढ़ता है।

दिमाग में सामान खरीदने की सूची बहुत लंबी बसी है,

मुश्किल है कुछ लोगों के हाथ दुनियां की हर शय फसी है।

परिवार और समाज टूटे अब खतरा इंसानी जज्बात पर आ रहा है,

दौलत बसी कुछ घरों में बाहर बेबस आदमी नाखुश गुर्रा रहा है।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

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ज्ञान विज्ञान पर बहस-हिंदी व्यंग्य कविता


कोई समाधि कोई सन्यास ले रहा है पर ज्ञान उनमें लुप्त है,

बात करो पुराने ग्रंथ की तो कहें ज्ञान का रहस्य गुप्त है।

कहें दीपकबापू अपने देश में धर्म का धंधा एकदम चोखा है,

पाखंड होता सर्वशक्तिमान के नाम कौन जानता है धोखा है।

प्रतीक चिन्ह गले में पहने चमकीले वस्त्र साधु बने नायक,

गुरु बनकर पुज रहे कथा वाचक और भजन गायक।

पुराणों में है कहानियां रोज सुनाकर दिल बहलाते हैं,

भक्त करता दान वह दाम की तरह पाते हैं।

भंडारों के पंडालों में प्रसाद खाने की तरह मिलता है,

धर्मभीरु देखकर हैरान उनका ज्ञान हिलता है।

गीता के ज्ञान और विज्ञान पर अक्सर होती है बहस

न कोई समझाये न समझ पाये इंसानों का ज्ञान चक्षु सुप्त है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

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स्वर्ग बसाने का वादा-हिंदी व्यंग्य कविता


लोकतंत्र का खेल है उसके गुण गाते जाओ,

कुर्सी के खेल की धारा में बहस कर शब्द बहाते जाओ।

कहें दीपक दीपक बापू महंगाई कभी कम नहीं होती,

भ्रष्टाचार वह राक्षस है जिसकी आंख कभी नहीं सोती।

देश में हर कदम पर स्वर्ग बसाने का वादा मिलता है,

चालाक लोगों के मजे है भला इंसान सभी जगह पिलता है।

कोई विकास का नारा देता कोई ईमानदार बनकर आता है,

बदलाव के नारे बहुत सुनते पर समाज पीछे ही जाता है।

समाज सेवा में पेशेवरों ने बना लिया है अपना ठिकाना,

चंदे से  अपने घर चलाते मजबूरी उनकी दान करते दिखाना।

आखों से खबरे पढ़ो और देखो कानों से  सुनो फिर भूल जाओ,

दिमाग में ज्यादा देकर अपना रक्तचाप कभी न बढ़ाओ।

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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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बहस में शब्द-हिन्दी व्यंग्य कविता


लोकतंत्र का खेल है उसके गुण गाते जाओ,

कुर्सी के खेल की धारा में बहस कर शब्द बहाते जाओ।

कहें दीपक दीपक बापू महंगाई कभी कम नहीं होती,

भ्रष्टाचार वह राक्षस है जिसकी आंख कभी नहीं सोती।

देश में हर कदम पर स्वर्ग बसाने का वादा मिलता है,

चालाक लोगों के मजे है भला इंसान सभी जगह पिलता है।

कोई विकास का नारा देता कोई ईमानदार बनकर आता है,

बदलाव के नारे बहुत सुनते पर समाज पीछे ही जाता है।

समाज सेवा में पेशेवरों ने बना लिया है अपना ठिकाना,

चंदे से  अपने घर चलाते मजबूरी उनकी दान करते दिखाना।

आखों से खबरे पढ़ो और देखो कानों से  सुनो फिर भूल जाओ,

दिमाग में ज्यादा देकर अपना रक्तचाप कभी न बढ़ाओ।

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हल्के इंसान-हिंदी व्यंग्य कविता


वह ठहरे हल्के इंसान

चेहरे पर रोज नया मुखौटा लगाकर आते हैं,

गंभीरता का करते हैं नाटक

जल्दी ही जोकर हो जाते हैं।

कहें दीपक बापू

वादों पर कभी वह खरे उतर सकते नहीं,

अपने भरोसे पर यकीन खुद करते नहीं,

यह प्रचार का खेल हैं

जहां उनकी काली नीयत भी सुंदर नज़र आती है,

फरेबी अदायें महंगी बिक जाती हैं,

सौदागर बेच रहे बाज़ार में कागजी ख्वाब,

कारिंदों करें कारिस्तानी वह दिखायें रुआब,

सियायत हो या ज़माने का भला

कामयाब खिलाड़ी वही नज़र आते हैं,

वादों से वफादारी निभाने के बजाय

कागजी नाव जो चला पाते हैं।

—————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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सौदागर के कब्जे में है पूरा ज़माना-हिंदी व्यंग्य कविता


खबर को खींचते रबड़ की तरह

उबाऊ बहसों के बीच

पर्दे पर सामानों के विज्ञापन

यूं ही चलाये जाते हैं,

शय खरीदने की सोचें

या करें हम  चिंत्तन यही भूल जाते हैं।

कहें दीपक बापू

बाज़ार के नये उत्पादों को बेचने के लिये

रोज नये नायक चाहिये,

प्रचार में उनके गीत बजवाने के लिये

नये गायक चाहिये,

सौदागर के कब्जे में है पूरा ज़माना,

जिनको आता है बस कमाना,

नित्य नये नये चेहरे रखते सामने

पैसे लेकर बुत करते उनका काम

कोई नाचकर

कोई गाकर

आम इंसानों की जेब

दिल बहलाते हुए खाली किये जाते हैं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Gwalior, madhyapradesh

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राजनीति में राजसी भाव ही से ही सक्रियता संभव-हिंदी चिंत्तन लेख


                        एक बात समझ में नहीं आती कि हमारे भारत में राजनीति का आशय हमेशा ही चुनाव के माध्यम से राजकीय पद प्राप्त करने की प्रक्रिया से ही क्यों जोड़ा जाता है। हम संदर्भ अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से ही ले रहे है क्योंकि वह वर्तमानकाल में अधिक प्रासंगिक लगता है।  अन्ना हजारे कहते हैं कि मेरा आंदोलन गैर राजनीतिक है। अन्ना हजारे से संबंधित कुछ उनके भक्तों ने एक राजनीतिक दल का गठन किया तो कहा गया कि वह राजनीति में आ गये हैं।  ऐसा लगता है कि भारत में पश्चिमी आधार पर चलने वाले चिंत्तक राजनीति शब्द के मायने का  संकीर्ण अर्थ ले रहे हैं। 

            अगर हम श्रीमद्भागवत गीता के कर्म विभाग का अध्ययन करें तो सात्विक, राजस तथा तामस तीन प्रकार के कर्म होते हैं।  सात्विक कर्म में लगे लोगों का एक ही नियम होता है कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ। ऐसे लोग समाज के लिये स्वयं बढ़कर काम नहीं करते पर अगर सामने आ जाये तो मुख नहीं मोड़ते।  अलबत्ता वह समाज में संकट खड़ा नहीं करते इसलिये वह प्रशंसा के पात्र होते हैं। तामसी कर्म में लगे लोगों आलस्य, प्रमाद तथा धीमी गति से काम करने वाले होते हैं इसलिये उनसे भी समाज के परोपकार की आशा करना ही  व्यर्थ है।  सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य राजसी कर्म है जिसकी पहचान है काम, क्रोध, मोह, लोभ, तथा अहंकार  जैसे गुणों के रूप में होती है।  सकारात्मक रूप से यह गुण ही है नकारात्मक रूप से ही इन्हें दुर्गुण कहा जाता है। जिनकी मूल प्रवृत्ति ही राजसी है वह सदा प्रतिफल की आशा से काम करते हैं जो राजसी कर्म की पहचान है।  अपने हितों के मोह में प्रतिफल पाने का लोभ मनुष्य को सक्रिय रखता है। उसके न मिलने पर उसे क्रोध आता ही है। मिल जाये तो वह उससे भरपूर सुविधायें जुटाने की कामना भी वही करता है।  न मिले तो क्रोध और मिल जाये तो अहंकार आता ही है। सात्विक लोग अपनी सुविधानुसार राजसी कर्म करते ही हैं क्योंकि इसके बिना उनका गुजारा नहीं होता। तामसी प्रवृत्ति के लोग भी येनकेन प्रकरेण यह करने के लिये बाध्य होते हैं। किसी भी राजसी कर्म करने के लिये नीतिगत रूप से काम करना ही राजनीति है। कहने का अभिप्राय यह है कि न केवल राज्य कर्म के लिये वरन् व्यक्तिगत राजसी कर्म के लिये भी राजसी प्रवृत्ति में लिप्त होना ही होता है।

            पहले तो हम लोकतंत्र की बात करें जिसमें जिस तरह चुनाव उसका भाग होते हैं। इसी लोकतंत्र में जहां जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकार बनाते है तो ऐसे लोग भी होते है जो अपनी मांगों के लिये आंदोलन चलाते हैं।  यह चुनाव और आंदोलन दोनों ही आज की लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का भाग हैं। अन्ना हजारे स्वयं सात्विक प्रवृत्ति के हैं पर उनकी छवि राजसी कर्मों में श्रेष्ठता के कारण है।  अन्ना हजारे साहब का आंदोलन अब दो भागों में बंट गया है एक चुनाव की तरफ आया तो दूसरा आंदोलन को ही देश के बदलाव का मार्ग मानकर वहीं डटा है।  जहां प्रजा हित का प्रश्न हो वहां राजा को छल कपट, धोखा तथा राजनीतिक स्वार्थपरायणता के लिये तत्पर रहना चाहिये यह राजनीति शास्त्र कहता है।  सात्विक मनुष्य चूंकि यह काम नहीं कर सकते इसलिये ही राज्यकर्म से दूर ही रहते हैं।  अगर राजसी कर्म में कोई श्रेष्ठ व्यक्ति हो तो वह सात्विक से कम नहीं होता मगर शर्त यह है कि उसे अपने काम की प्रकृत्ति का ज्ञान होना चाहिये।  राजसी कर्म करते समय श्रेष्ठ करते समय सात्विक दिखना तो चाहिये पर उससे दूर होना ही लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक हो सकता है।

            अन्ना से अलग हुए लोगों ने चुनाव के क्षेत्र में कदम रखा है। उन्हें सफलता तो मिली है पर वह स्थाई नहीं हो सकती।  आंदोलन चलाना और सरकार चलाने में अंतर होता है। आंदोलन दमदार हो तो सरकार को झुकना पड़ता है पर अगर सरकार दमदार हो तो आंदोलन की हवा भी निकाल सकती है। एक बात तय रही कि राजसी कर्म स्वार्थ से परे नहीं हो सकते। दूसरी बात यह कि राजसी कर्म करते हुए अगर किसी ने अपने लिये संपन्नता नहीं अर्जित की तो उसे समाज बड़ी दयनीय दृष्टि से देखता है।  अन्ना हजारे के चंद भक्त उनसे अलग होकर चुनाव के माध्यम से समाज में बदलाव का जो लक्ष्य सामने रख रहे हैं उनकी नीयत पर हमें संदेह नहीं है पर मुख्य बात यह है कि उनके अनुयायी भी उनकी तरह ही होंगे इस पर संदेह है। कुछ समय के लिये उनको युवाओं का उत्साही वर्ग अवश्य मिल जाये पर कालांतर में राज्य सुख उनको वैसा ही ईमानदार बने रहने देगा इसमें संदेह है जैसा कि प्रारंभ में होंगे।  बहरहाल अभी तो यह कहना कठिन है कि अन्ना हजारे के उनसे अलग हुए पुराने भक्त कि चुनाव के माध्यम से समाज में कितना बदलाव ला पायेंगे पर एक बात तय है कि उन्होंने भारतीय राजनीति को एक नयी दिशा देने का प्रयास तो किया है। आगे देखें क्या होता है। 

 

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

 

 

                        एक बात समझ में नहीं आती कि हमारे भारत में राजनीति का आशय हमेशा ही चुनाव के माध्यम से राजकीय पद प्राप्त करने की प्रक्रिया से ही क्यों जोड़ा जाता है। हम संदर्भ अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से ही ले रहे है क्योंकि वह वर्तमानकाल में अधिक प्रासंगिक लगता है।  अन्ना हजारे कहते हैं कि मेरा आंदोलन गैर राजनीतिक है। अन्ना हजारे से संबंधित कुछ उनके भक्तों ने एक राजनीतिक दल का गठन किया तो कहा गया कि वह राजनीति में आ गये हैं।  ऐसा लगता है कि भारत में पश्चिमी आधार पर चलने वाले चिंत्तक राजनीति शब्द के मायने का  संकीर्ण अर्थ ले रहे हैं। 

            अगर हम श्रीमद्भागवत गीता के कर्म विभाग का अध्ययन करें तो सात्विक, राजस तथा तामस तीन प्रकार के कर्म होते हैं।  सात्विक कर्म में लगे लोगों का एक ही नियम होता है कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ। ऐसे लोग समाज के लिये स्वयं बढ़कर काम नहीं करते पर अगर सामने आ जाये तो मुख नहीं मोड़ते।  अलबत्ता वह समाज में संकट खड़ा नहीं करते इसलिये वह प्रशंसा के पात्र होते हैं। तामसी कर्म में लगे लोगों आलस्य, प्रमाद तथा धीमी गति से काम करने वाले होते हैं इसलिये उनसे भी समाज के परोपकार की आशा करना ही  व्यर्थ है।  सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य राजसी कर्म है जिसकी पहचान है काम, क्रोध, मोह, लोभ, तथा अहंकार  जैसे गुणों के रूप में होती है।  सकारात्मक रूप से यह गुण ही है नकारात्मक रूप से ही इन्हें दुर्गुण कहा जाता है। जिनकी मूल प्रवृत्ति ही राजसी है वह सदा प्रतिफल की आशा से काम करते हैं जो राजसी कर्म की पहचान है।  अपने हितों के मोह में प्रतिफल पाने का लोभ मनुष्य को सक्रिय रखता है। उसके न मिलने पर उसे क्रोध आता ही है। मिल जाये तो वह उससे भरपूर सुविधायें जुटाने की कामना भी वही करता है।  न मिले तो क्रोध और मिल जाये तो अहंकार आता ही है। सात्विक लोग अपनी सुविधानुसार राजसी कर्म करते ही हैं क्योंकि इसके बिना उनका गुजारा नहीं होता। तामसी प्रवृत्ति के लोग भी येनकेन प्रकरेण यह करने के लिये बाध्य होते हैं। किसी भी राजसी कर्म करने के लिये नीतिगत रूप से काम करना ही राजनीति है। कहने का अभिप्राय यह है कि न केवल राज्य कर्म के लिये वरन् व्यक्तिगत राजसी कर्म के लिये भी राजसी प्रवृत्ति में लिप्त होना ही होता है।

            पहले तो हम लोकतंत्र की बात करें जिसमें जिस तरह चुनाव उसका भाग होते हैं। इसी लोकतंत्र में जहां जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकार बनाते है तो ऐसे लोग भी होते है जो अपनी मांगों के लिये आंदोलन चलाते हैं।  यह चुनाव और आंदोलन दोनों ही आज की लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का भाग हैं। अन्ना हजारे स्वयं सात्विक प्रवृत्ति के हैं पर उनकी छवि राजसी कर्मों में श्रेष्ठता के कारण है।  अन्ना हजारे साहब का आंदोलन अब दो भागों में बंट गया है एक चुनाव की तरफ आया तो दूसरा आंदोलन को ही देश के बदलाव का मार्ग मानकर वहीं डटा है।  जहां प्रजा हित का प्रश्न हो वहां राजा को छल कपट, धोखा तथा राजनीतिक स्वार्थपरायणता के लिये तत्पर रहना चाहिये यह राजनीति शास्त्र कहता है।  सात्विक मनुष्य चूंकि यह काम नहीं कर सकते इसलिये ही राज्यकर्म से दूर ही रहते हैं।  अगर राजसी कर्म में कोई श्रेष्ठ व्यक्ति हो तो वह सात्विक से कम नहीं होता मगर शर्त यह है कि उसे अपने काम की प्रकृत्ति का ज्ञान होना चाहिये।  राजसी कर्म करते समय श्रेष्ठ करते समय सात्विक दिखना तो चाहिये पर उससे दूर होना ही लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक हो सकता है।

            अन्ना से अलग हुए लोगों ने चुनाव के क्षेत्र में कदम रखा है। उन्हें सफलता तो मिली है पर वह स्थाई नहीं हो सकती।  आंदोलन चलाना और सरकार चलाने में अंतर होता है। आंदोलन दमदार हो तो सरकार को झुकना पड़ता है पर अगर सरकार दमदार हो तो आंदोलन की हवा भी निकाल सकती है। एक बात तय रही कि राजसी कर्म स्वार्थ से परे नहीं हो सकते। दूसरी बात यह कि राजसी कर्म करते हुए अगर किसी ने अपने लिये संपन्नता नहीं अर्जित की तो उसे समाज बड़ी दयनीय दृष्टि से देखता है।  अन्ना हजारे के चंद भक्त उनसे अलग होकर चुनाव के माध्यम से समाज में बदलाव का जो लक्ष्य सामने रख रहे हैं उनकी नीयत पर हमें संदेह नहीं है पर मुख्य बात यह है कि उनके अनुयायी भी उनकी तरह ही होंगे इस पर संदेह है। कुछ समय के लिये उनको युवाओं का उत्साही वर्ग अवश्य मिल जाये पर कालांतर में राज्य सुख उनको वैसा ही ईमानदार बने रहने देगा इसमें संदेह है जैसा कि प्रारंभ में होंगे।  बहरहाल अभी तो यह कहना कठिन है कि अन्ना हजारे के उनसे अलग हुए पुराने भक्त कि चुनाव के माध्यम से समाज में कितना बदलाव ला पायेंगे पर एक बात तय है कि उन्होंने भारतीय राजनीति को एक नयी दिशा देने का प्रयास तो किया है। आगे देखें क्या होता है। 

 

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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जो इंसान बादशाह बन गया-हिंदी व्यंग्य कविता


हुकुमतों के तख्त पर बैठने वाले

चेहरे रोज नये नये आते हैं,

ज़माना जब पांव तले होने का अहसास ऐसा

उनमें कसाई का चरित्र ही पाते है,

कीचड़ की दुर्गंध क्या समझेंगे

अपने महलों में रहते जो इत्र ही  पाते हैं

कहें दीपक बापू

बादशाह बन गया जो इंसान

सड़कों पर उड़ती धूल नहीं आती आंखों में

खुशकिस्मत होता है वही लाखों में,

आम इंसान की भलाई का दावा

वह चाहे कितना भी करे

अपने तख्त का उसे मित्र ही पाते हैं।

—————–

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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नई अदाओं पर मर मिटना-हिन्दी व्यंग्य कविता


ज़माने को दिखाने के लिये

नये नये स्वांग रचना होता है जरूरी,

नारे लगाते रहो भीड़ में

तख्त पर बैठते ही बना लो वादों से दूरी।

कहें दीपक बापू

नयी नयी अदायें दिखाओ,

पुराने शब्दों की पंक्तियां

नई कहकर सिखाओ,

मुखौटा बदलकर

नया चेहरा दिखाओ,

दौलत चाहे जितनी हो पास

गरीब के बने रहो हमदर्द,

दिल में चाहे अपने सुंदर सपने बसे हो

बेचो बाज़ार में दूसरों का दर्द,

ऊंचाई पर महल भले ही बना लो,

रहने के लिये जमीन पर झौंपड़ी भी तना लो,

दूसरों को आसरे देते रहो

ख्वाहिशें अपनी करते रहो यूं ही पूरी।

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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स्वयं को आम आदमी कहें या जाम आदमी-हिन्दी व्यंग्य लेख


            हमारे देश में आम आदमी होना कभी गौरव की बात समझी नहीं जाती। कोई कितना भी अच्छा  लेखक, कवि, या चित्रकार हो अगर उसके नाम के समक्ष कोई पद, पदवी या प्रकाशन नहीं है तो उसे समाज में आम आदमी ही माना जाता है। अगर वह कहीं अपने रचनाकर्म की बात करे तो उससे  सवाल यही किया जाता है कितुम उसके अलावा क्या करते हो?’

            हमारे समाज की यह वास्तविकता है कि वह राजकीय छवि की ही प्रशंसा करता है।  भगवान श्रीराम राजपद पर बैठे थे उनका राज्य काल इतना प्रशंसनीय रहा कि लोग आज भी उसे याद करते हैं पर जिन बाल्मीकी महर्षि ने उन पर बृहइ  ग्रंथ की रचना के माध्यम से उनको  भगवान के रूप में समाज के सामने प्रतिष्ठत किया उन्हें  कभीं भगवान का दर्जा नहीं मिला।  जिन महर्षि वेदव्यास ने महाभारत ग्रंथ की रचना के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण को भगवत् पर पद प्रतिष्ठत करने के साथ ही श्रीगीता के संदेशों का इस तरह स्थापित किया कि पूरा विश्व उनको मानता है मगर व्यासजी समाज  पूज्यनीय तो बने पर प्रेरक नहीं। कोई व्यक्ति बाल्मीक या वेदव्यास जैसी रचना करने की  दूर यह बात सोच भी नहीं सकता।  जो आम जीवन जी रहा है वह खास बनने के लिये हमेशा बेताब रहता है।

            आम आदमी का भला करना हैका नारा लगाते हुए अनेक लोग खास बन गये। इतने खास कि उन्हें अब आम आदमी की कतार होने का भय लगता है।  उस दिन एक प्रदेश के राज्यमंत्री का समाचार देखा। वह अब चाय बेचता है।  अपना दर्द बयान कर रहा था।  आम से खास बने लोगों के लिये उसके समाचार  डरावना हो सकते हैं। 

            खास आदमी अपना स्तर बनाये रखने के लिये भारी जद्दोजेहद करता है। इसमें उसे आम से खास बनने से अधिक मेहनत करना होती है। 

            बहरहाल अपने दीपक बापू आजकल भारी परेशानी में है।  स्वयं को आम आदमी कहकर अभी तक अपने फ्लाप होने के आरोप से छिपते फिर रहे थे। अब यह मुश्किल हो गया है।

            उस दिन वह एक किराने की दुकान पर गये। वहां से सौ ग्राम शक्कर खरीदी और अपने घर चल दिये। हालांकि उन्होंने शक्कर खरीदने के लिये  अपने घर से पांच किलोमीटर दूर की दुकान चुनी थी ताकि कोई जान पहचान वाला न देख ले। अभी तक समाज में उनकी  छवि मध्य वर्गीय मानी जाती थी,  पर महंगाई ने उनको निम्न वर्ग में पहुंचा दिया था। यह सच्चाई कोई जान न ले इस कारण दीपक बापू किराने का सामान दूर से ही खरीदते हैं।  मगर उनका दुर्भाग्य भी पीछा नहंीं छोड़ता। वह शक्कर खरीद कर पलटे नहीं कि एक कार उनके पास आकर रुकी। आलोचक महाराज उसमें से निकले। बोले-‘‘कार खाली जा रही है। चलो घर तक छोड़ देता हूं। तुम मुझे पांच रुपये दे देना।

            कंगाली में आटा  गीला। चार रुपये की शक्कर खरीदी थी और पांच रुपये का किराया देना पड़े यह दीपक बापू को मंजूर नहीं था। बहरहाल हास्य कवि-भले ही फ्लाप हो-यह सहन नहीं कर सकता कि कोई उसे इस तरह जलील करे। बोले-‘‘नहीं, मै तो पैदल घर से निकला हूं। मुझें अपनी सेहत बनाये रखनी है।

            आलोचक महाराज हंसे-‘‘तुम्हारी सेहत में ऐसा क्या है जिसे बनाये रखना है।  एकदम दुबले पतले कीकट रखे हो। हमें देखो कितने मोटे ताजे हैं।  तुम्हारे पास अभी पांच रुपये नहीं हों तो बाद में दे देना। इतना उधार तो तुम पर रख ही सकता हूं।

            दीपक बापू बोले-नहीं आप जाईये। मेरे पास पांच रुपये का छुट्टा नहीं है।’’

            आलोचक महाराज बोले-‘‘छुट्टा नहीं है, या हैं ही नहीं! जहां तक मेरा अनुमान है कि तुम्हारी जेब में दस दस रुपये के चार, नहीं हो सकता है कि तीन, नहीं नही मुझे लगता है कि  एक दस के नोट से अधिक नहीं हो सकता।  इधर तुम्हारी हास्य कवितायें छोटी पत्रिकाओं में छपती हैं वहां से पैसा मिलता ही नही है।  इधर उधर टाईप कर कमाने का तुम्हारा धंधा भी अब कंप्यूटर की वजह से कम हो गया है।

            दीपक बापू हंसे-‘‘बोले आप हंस लीजिये।  आप को तो बड़े बड़े लोगों का संरक्षण मिला हुआ है। हम तो आम आदमी हैं, ऐसे ही फटेहाल ही ठीक हैं।’’

            इसी बीच दुकानदार को किसी दूसरे ग्राहक को देने के लिये खुले पैसे चाहिये थे। वह दीपक बापू के पास आया और बोला-साहब आपके पास दस रुपये के खुले होंगे। आपने अभी सौ ग्राम शक्कर खरीदी थी। मैंने सोचा आपके पास जरूर खुले पैसे होंगे। मुझे दूसरे ग्राहक को देने हैं।’’

            दीपक बापू चिढ़कर बोले-‘‘नहीं है! जाओ यहां से!

             उसके दूर होते ही आलोचक महाराज कृत्रिम आश्चर्य से बोले-‘‘आम आदमी! तब तो तुमसे डरना पड़ेगा। अरे, तुम्हें मालुम नहीं है आजकल आम आदमी के नाम से बड़ों बड़ों को पसीना आता है।  आम आदमी नाम का एक संगठन जलवे दिखा रहा है। तुम अगर आम आदमी होते तो यहां सौ ग्राम शक्कर खरीदने पांच किलोमीटर चलकर नहीं आते। यह दुकानदार खुद ही सौ ग्राम की बजाय एक किलो शक्कर देने घर आता।’’

            दीपक बोले-एक तो आप हमारी कवितायें छपने के लिये किसी बड़े पत्र या पत्रिका के संपादक से सिफारिश नहीं करते। अब हमारे आम आदमी होने का उपहास तो न उड़ायें जिस पर हम अपनी हास्य कवितायें लिखते हैं।

            आलोचक महाराज बोले-‘‘तुम अब स्वयं को आम आदमी नहीं जाम आदमी कहा करो। तुमने सुना है कि यह बात आम जाम है।  आम आदमी शब्द तो आम की तरह मीठा हो गया है। अपने को आप आदमी कहने से पहले  दमखम रखना वरना…….कहीं तुमने आम आदमी होने का दावा किया और प्रमाणित नहीं कर सके तो कोई मार मारकर जाम आदमी बना देगा।’’

            दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, यही तो हमारे पास एक पदवी थी इसे भी अगर आप खास लोग छीन लेंगे तो बचा ही क्या?’’

            आलोचक महाराज बोले-‘‘भईये देख लो! हम तो तुम्हें आम आदमी नहीं जाम आदमी ही कहेंगे। आम आदमी तो विकास पथर पर चलता है, तुम जाम आदमी की तरह खड़े हो। दूसरी बात अपनी हास्य कविताओं में अब आम आदमी के दर्द पर रोना नहीं क्योंकि अब वह योद्धाओं की पहचान बन गया है।’’

            दीपक बापू   सोचने की मुद्रा में बोले-मगर जाम आदमी शब्द भी नहीं चल पायेगा।  ऐसा करते हैं सामान्य आदमी शब्द चल जायेगा।

            आलोचक महाराज ने पहले आकाश में देखते हुए बोले-देखो भई, आम इंसान शब्द थोड़ा ठंडा है। हास्य कविताओं में नहीं चल पायेगा। जाम आदमी जमेगा।’’

            दीपक बापू बोले-‘‘महाराज आप छोड़ें। आम आदमी शब्द आपको ले जाना है तो ले जायें रहा हमारी हास्य कविताओं के प्रभाव का सवाल! आप परेशान न हों! हमारी हास्य कवितायें आपकी सिफारिश चाहे न पायें पर उनका प्रभाव शब्दों की वजह से हमेशा रहेगा।  हम आम इंसान से ही काम चला लेंगे।

            आलोचक महाराज गुस्से में कार के अंदर चले गये। दीपक बापू परेशान हाल घर की तरफ चल पड़े। सौ ग्राम शक्कर खरीदने की पोल से अधिक उनको इस बात की चिंता थी कि आम आदमी शब्द उनकी लेखनी से दूर जा रहा था।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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