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श्रीमद्भागवत् गीता में ज्ञान और विज्ञान से सतर्त संपर्क रखने का संदेश-श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष लेख


            आज पूरे देश में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनायी जा रही है। हमारे धार्मिक परंपराओं में भगवान श्रीराम तथा श्रीकृष्ण के चरित्र का बहुत बड़ा स्थान है। हमारे देश में इन दोनों की मान्यता का क्षेत्र इतना व्यापक है कि देश की भूगौलिक तथा एतिहासिक विभिन्नता का कोई प्रभाव इनकी लोकप्रियता पर नहीं पड़ता। हर जगह भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के नाम पर अनेक पर्व मनाये जाते हैं। उनका रूप भिन्न हो सकता है पर भक्तों की  आस्था या विश्वास में कोई अंतर नहीं रहता।  महाराष्ट्र में लोग हांडी फोड़ने के सामूहिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं तो वृंदावन में मंदिरों की उत्कृष्ट सजावट का दर्शन करने भक्तगण एकतित्र होते हैं। उत्तर भारत में कहीं भगवान के मंदिरों में छप्पन भोग सजते हैं तो कहीं भजन संगीत के कार्यक्रम होते हैं।

            जैसा कि श्रीमद्भागवत गीता में भक्तों के चार प्रकार -आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी-बताये गये हैं। जहां अन्य भक्त भगवान के रूप का चित्त में स्मरण करते हैं वहीं ज्ञानी और साधक उनके संदेशों पर चिंत्तन करते हैं। वृंदावन में उनकी बाल लीलाओं पर भक्त चर्चा करते हैं पर ज्ञान साधकों के लिये कुरुक्षेत्र के महाभारत युद्ध के दौरान उनकी भूमिका का चिंत्तन रोमांच पैदा करता है। जहां उन्होंने गीता के माध्यम से उस अध्यात्मिक ज्ञान की स्थापना की जो आज भी विद्वानों को आकर्षित करता है वही ज्ञान साधकों में जीवन में आत्मविश्वास से रहने की कला प्रदान की।  यह अलग बात है कि जिस श्रीमद्भावगत गीता के ज्ञान की शक्ति पर हमारा देश जिस श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान की वजह से विश्व का अध्यात्मिक गुरु कहलाया उसे पवित्र मानकर लोगों ने सजा तो लिया पर उसके ज्ञान को समझने का प्रयास कितने करते हैं यह अलग से सर्वेक्षण करने का विषय है।

            श्रीमद्भागवत् गीता में ज्ञान के साथ विज्ञान को भी अपनाने की बात कही गयी है। इसका मतलब साफ है कि व्यक्ति को संसार में होने वाले भौतिक परिवर्तनों तथा उत्पादित सामानों के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिये।  उसमें यह स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य यदि योगाभ्यास करे तो वह अत्यंत शक्तिशाली हो जाता है।  जैसा कि हम जानते हैं कि शक्तिशाली व्यक्ति में ही संयम और आत्मविश्वास होता है। जिस व्यक्ति में भय, संशय, और अज्ञान है वह स्वयं ही संकट में रहने के साथ ही दूसरों के लिये भी समस्या खड़ी करता है।

            हमने देखा है कि अक्सर कथित रूप से विभिन्न धर्मों की रक्षा करने वाले ठेकेदार अनेक प्रकार के खतरनाक उपाय करते हैं। इतना ही नहीं ऐसे लोग अपने समूहों को पहनावे, खान पान, रहन सहन और मनोरंजन के नाम पर कथित रूप से अश्लीलता, व्यसन, तथा अपराध से बचने के लिये प्रतिबंध के दायरे में लाने का प्रयास करते हैं।  उन्हें लगता है कि वह लोगों को पहनावे और खानपान के विषयों पर दबाव डालकर धर्म को बचा सकते हैं।  यकीनन वह अज्ञानी है। अज्ञान से भय और भय से क्रूरता पैदा होती है।   हम पूरे विश्व में धर्म के नाम पर जो हिंसक संघर्ष देख रहे हैं वह अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव का परिणाम है। इसका मतलब यह कथित धर्म रक्षक यह मानते हैं कि वह उनके समुदाय के लोग केवल देह से ही मनुष्य हैं और बुद्धि से उनको प्रशिक्षित करने का माद्दा धर्म के शाब्दिक प्रचार में हो ही नहीं सकता। वह इस संसार के गुण, कर्म और फल के आपसी संबंध को नहीं देख पाते।  उनके लगता है कि उनके धर्म समूह पर निंयत्रण केवल अस्त्र शस्त्र और दैहिक दंड से ही हो सकता है। सामान्य मनुष्य सीमित क्षेत्र में अपने परिवार के हितों तक ही सक्रिय रहता है जबकि  अतिवाद अपना क्षेत्र व्यापक कर प्रचार कर समाज सेवक की स्वयंभू की उपाधि धारण करते  जो अंततः उनको धन भी दिलाने का काम भी करती है।

            धर्म के नाम पर संघर्ष होने पर उनसे जुड़े समूहों के सामान्य लोगों को सबसे अधिक हानि होती है।  हमने देखा है कि मध्य एशिया में धर्मों के उपसमूहों के बीच भी भारी संघर्ष चल रहा है।  वहां के हिंसक दृश्य जब टीवी या समाचार पत्रों में देखने को मिलते हैं तब देह में सिहरन पैदा होती है।  हम अपने पड़ौस में देख रहे हैं जहां धर्म के नाम पर देश की नीति अपनायी गयी है। वहां भी भारी हिंसा होती रहती है।  हमारे देश में हालांकि उस तरह का वातावरण नहीं है पर फिर भी कुछ लोग धर्म के नाम पर वाचाल कर ऐसी बातें कहते हैं जिनसे विवाद खड़े  होते हैं।  खासतौर से जिनके पास पद, पैसा और प्रचार शक्ति है वह तो इस तरह मानते हैं कि वह एक तरह से धर्म विशेषज्ञ हैं और चाहे जैसी बात कह देते हैं।  खासतौर से श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान पर कुछ विद्वान बोलते हैं तो यह देखकर आश्चर्य होता है उनकी भाव भंगिमा कभी यह प्रमाणित नहीं करती कि वह उसके संदेशा के मार्ग का अनुसरण भी कर रहे हैं।

            श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने पर अनेक रोचक अनुभव होते हैं। एक तो यह कि इस संसार चक्र के मूल तत्व समझ में आने लगते हैं तो दूसरा यह कि हर बार कोई न कोई श्लोक इस तरह सामने आता है जैसे कि वह पहली बार आया हो। निष्कार्म कर्म और निष्प्रयोजन दया का अर्थ भी समझना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि होती है। कर्म, अकर्म, और विकर्म का भेद अत्यंत रुचिकर है।  हम यहां श्रीमद्भागवत गीता पर चर्चा करने बैठें तो कई पृष्ट कम पड़ जायें और उसका ज्ञान आत्मसात हो जाये चंद पंक्तियों में अपनी कही जा सकती है।  गीता के ज्ञान का भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों में ही प्रचार करने का आदेश दिया है।  यह बात भारतीय विचारधारा को श्रेष्ठ बनाती है  जबकि पाश्चात्य विचाराधाराओं के ग्रंथों के  सृजक अपने अनुयायियों को अभक्तों को भी भक्त बनाकर उनमें अपनी सामग्री का प्रचार करने का आदेश देते हैं।

            यह आश्चर्य ही है कि आज भी पूरे विश्व में श्रीमद्भागवत गीता ऐसे होती है जैसे कि नवीनतमत रचना है। हम जैसे ज्ञान साधकों के लिये श्रीमद्भागवत गीता ऐसा बौद्धिक आधार है जिस पर जीवन सहजभाव से टिकाया जा सकता है। ऐसे ग्रंथ के सृजक भगवान श्रीकृष्ण को हृदय से नमन।  इस पर ब्लॉग लेखकों तथा पाठ के पाठकों को हार्दिक बधाई। जय श्रीकृष्ण।

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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बोतल में खुशी कि तलाश-हिंदी कविता


मयखानों में भीड़ लगी है,

जैसे भीड़ अभी नींद से जगी है,

लगता है सारा जहान ही

बोतल में खुशियां तलाश रहा है,

एकता की मिसाल मिलती वहां

किसी ने खूब कहा है।

कहें दीपक बापू

कतरा कतरा हलक से उतरती मय

ऐसा शैतान पैदा करती

बात करता  जो फरिश्तों जैसी

मगर  दिल में जिसके

बदनीयती जगह बना लेती है,

नशेड़ी सच बोलता है

किस मूर्ख ने कहा है,

वहम है कि मय पीने से

गम दूर होता है

सच यह है

उतरती शराब से

बढ़ जाता है वह दर्द

जो होशहवास में सहा है,

जिसे कोई काम करना नहीं आता

पीने लग जाता है

कोई गम कोई खुशी की

वजह झूठी बता रहा है।

————–

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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खजाने की चिंता और चिंत्तन-हिन्दी लेख


                        एक संत ने एक सपना देखा कि एक पुराने महल में पंद्रह फुट नीचे  एक हजार टन सोना-जो एक एक स्वर्गीय राजा का है जिसे अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था-दबा हुआ है।  उसने अपनी बात जैसे तैसे भारतीय पुरातत्व विभाग तक पहुंचायी।  पुरातत्व विभाग ने अपनी सांस्कृतिक खोज के तहत एक अभियान प्रारंभ किया।  पुरातत्वविद् मानते हैं कि उन्हें सोना नहीं मिलेगा। मिलेगा तो इतने बड़े पैमाने पर नहीं होगा।  अलबत्ता कोई प्राचीन खोज करने का लक्ष्य पूरा हो सकता है, यही सोचकर पुरातत्व विभाग का एक दल वहां खुदाई कर रहा है।

                        यही एक सामान्य कहानी अपने समझ में आयी पर सोना शब्द ही ऐसा है कि अच्छे खासे आदमी को बावला कर दे। सोने का खजाना ढूंढा जा रहा है, इस खबर ने प्रचार माध्यमों को अपने विज्ञापन प्रसारण के बीच सनसनीखेज सामग्री प्रसारण का वह  अवसर प्रदान किया है जिसकी तलाश उनको रहती है।  भारत में लोगों वेसे काम अधिक होने का बहाना करते हैं पर ऐसा कोई आदमी नहीं है जो टीवी पर खबरें देखने में वक्त खराब करते हुए  इस खबर में दिलचस्पी न ले रहा हो। व्यवसायिक निजी चैनलों ने भारतीय जनमानस में इस कदर अपनी पैठ बना ली है कि इसके माध्यम से कोई भी विषय सहजता से भारत के आम आदमी के लिये ज्ञेय बनाया जा सकता है।  इस पर खजाना वह भी सोने का, अनेक लोगों ने दांतों तले उंगली दबा रखी है। टीवी चैनलों ने लंबी चौड़ी बहसें चला रखी हैं।  सबसे बड़ी बात यह कि संत ने सपना देखा है तो तय बात है कि बात धर्म से जुड़नी है और कुछ लोगों की आस्थायें इससे विचलित भी होनी है।  सोना निकला तो संत की वाह वाह नहीं हुई तो, यह बात अनेक धर्मभीरुओं को डरा रही है कि इससे धर्म बदनाम होगा।

                        कहा जाता है कि संत त्यागी हैं। यकीनन होंगे। मुश्किल यह है कि वह स्वयं कोई वार्तालाप नहीं करते और उनका शिष्य ही सभी के सामने दावे प्रस्तुत करने के साथ ही विरोध का प्रतिकार भी कर रहा है। इस पर एक टीवी पर चल रही बहस में एक अध्यात्मिक रुचि वाली संतवेशधारी महिला अत्यंत चिंतित दिखाई दीं। उन्हें लग रहा था कि यह एक अध्यात्मिक विषय नहीं है और इससे देश के भक्तों पर धर्म को लेकर ढेर सारा भ्रम पैदा होगा।

                        एक योग तथा ज्ञान साधक के रूप में कम से कम हमें तो इससे कोई खतरा नहीं लगता।  सच बात तो यह है कि अगर आप किसी को निष्काम कर्म का उपदेश दें तो वह नहीं समझेगा पर आप अगर किसी को बिना या कम परिश्रम से अधिक धन पाने का मार्ग बताओ तो वह गौर से सुनेगा।  हमारे देश में अनेक लोग ऐसे हैं जिनके मन में यह विचार बचपन में पैदा होता है कि धर्म के सहारे समाज में सम्मान पाया जाये।  वह कुछ समय तक भारतीय ज्ञान ग्रंथों का पठन पाठन कर अपनी यात्रा पर निकल पड़ते हैं। थोड़े समय में उनको पता लग जाता है कि इससे बात बनेगी नहीं तब वह सांसरिक विषयों में भक्तों का मार्ग दर्शन करने लगते है। कुछ चमत्कार वगैरह कर शिष्यों को संग्रह करना शुरु करते हैं तो फिर उनका यह क्रम थमता नहीं।  अध्यात्मिक ज्ञान तो उनके लिये भूली भटकी बात हो जाती है।  लोग भी उसी संत के गुण गाते हैं जो सांसरिक विषयों में संकट पर उनकी सहायता करते हैं।  यहां हम एक अध्यात्मिक चिंतक के रूप में बता दें कि ऐसे संतों के प्रति हमारे मन में कोई दुर्भाव नहीं है। आखिर इस विश्व में आर्त और अर्थाथी भाव के भक्तों को संभालने वाला भी तो कोई चाहिये न! जिज्ञासुओं को कोई एक गुरु समझा नहीं सकता और ज्ञानियों के लिये श्रीमद्भागवत गीता से बड़ा कोई गुरु होता नहीं। आर्ती और अर्थार्थी भक्तों की संख्या इस संसार में सर्वाधिक होती है। केवल भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व में धर्म के ठेकेदारों का यही लक्ष्य होते है। केवल भारतीय धर्म हीं नहीं बल्कि विदेशों में पनपे धर्म भी इन ठेकेदारों के चमत्कारों से समर्थन पाते हैं। जब अंधविश्वास की बात करें तो भारत ही नहीं पूरे विश्व में ऐसी स्थिति है।  जिन्हें यकीन न हो वह हॉलीवुड की फिल्में देख लें। जिन्होंने भूतों और अंतरिक्ष प्राणियों पर ढेर सारी फिल्में बनायी हैं। दुनियां के बर्बाद होने के अनेक संकट उसमें दिखाये जाते हैं जिनसे नायक बचा लेता है। ऐसे संकट कभी प्रत्यक्ष में कभी आते दिखते नहीं।

                        हम संतों पर कोई आक्षेप नहीं करते पर सच बात यह है कि जब वह सांसरिक विषय में लिप्त होते हैं तो उनका कुछ पाने का स्वार्थ न भी हो पर मुफ्त के प्रचार का शिकार होने का आरोप तो उन पर लगता ही है। दूसरी बात यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान साधक स्पष्टतः उनकी छवि को संदेह की नजरों से देखने लगते है।  विदेशी लोग भारत के बारे में कह करते थे  कि यहां हर डाल पर सोने की चिड़िया रहती है।  जब हम मार्ग में गेेंहूं के खेत लहलहाते देखते हैं तो लगता है कि यहां खड़ी फसलें देखकर ही उन्होंने ऐसा कहा होगा।  हो सकता है यह हमारा पूर्वाग्रह हो क्योंकि हमें गेंहूं की रोटी ही ज्यादा पसंद है।  उससे भूख शांत होती है। दूसरी बात यह भी है कि सेोने से कोई अधिक लगाव नहीं रहा।  गेंहूं की रोटी लंबे समय तक पेट में रहती है और दिल में संतोष होता है। संतोषी आदमी को सोना नहीं सुहाता।  मुश्किल यह है कि सोना प्रत्यक्ष पेट नहीं भर पाता।

                        कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने। भारत में सोने की कोई खदान हो इसकी जानकारी हमें नहीं है।  सोना दक्षिण अफ्रीका में पैदा होता है।  तय बात है कि सदियों से यह विदेश से आयातित होता रहा है।  सोना यहां से दूर रहा है इसलिये भारत के लोग उसके दीवाने रहे हैं।  जिस गेंहूं से पेट भरता है वह उनके लिये तुच्छ है।  एक हजार टन सोना कभी किसी राजा के पास रहा हो इस पर यकीन करना भी कठिन है। हीरे जवाहरात की बात समझ में आती है क्योंकि उनके उद्गम स्थल भारत में हैं।  अनेक प्राचीन ग्रंथों में स्वर्णमय हीरे जवाहरात जड़े मुकुटों तथा सिंहासन  की बात आती है पर उनके सोने की परत चढ़ी रही होती होगी या रंग ऐसा रहा होगा कि सोना लगे।  असली सोना यहां कभी इतना किसी व्यक्ति विशेष के पास रहा होगा यह यकीन करना कठिन है।

                        भारत में लोगों के अंदर संग्रह की प्रवृत्ति जबरदस्त है।  कुछ समझदार लोग कहते हैं कि अगर सोने का आभूषण तीन बार बनवाने के लिये किसी एक आदमी के पास ले जायें तो समझ लो पूरा सोना ही उसका हो गयां।  इसके बावजूद लोग हैं कि मानते नहीं। अनेक ढोंगी तांत्रिक तो केवल गढ़ा खजाना बताने के नाम पर धंधा कर रहे हैं। इतना ही नहीं अनेक ठग भी सोना दुगंना करने के नाम पर पूरे गहने ही महिलाओं के हाथ से छुड़ा लेते है।  बहरहाल खुदाई पूरी होने पर सोना मिलेगा या नहीं यह तो भविष्य ही बतायेगा पर टीवी चैनलों में विज्ञापन का समय समाचार तथा बहस के बीच खूब पास हो रहा है।

                        आखिर में हमारा हलकट सवाल-अरे, कोई हमें बतायेगा कि श्रीमद्भागवत गीता के बहुमूल्य ज्ञान के खजाने से अधिक बड़ा खजाना कहां मिलेगा।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

रोटी पर राजनीति-हिंदी व्यंग्य कविता


दूसरे को विष देने के लिये सभी तैयार

पर  हर कोई खुद अमृत चखता है,

घर से निकलता है  अपनी  खुशियां ढूंढने

पूरा ज़माना बड़े जोश के साथ

दूसरों को सताने के लिये

दर्द की पुड़िया भी साथ रखता है।

कहें दीपक बापू

बातें बहुत लोग करते हैं

सभी का भला करने की

मगर आमादा रहते

अपना मतलब निकालने के वास्ते,

जुबां से करते गरीबों की मदद की बात

आंखें उनकी ढूंढती अपनी कमीशने के रास्ते,

बेबसों की मदद का नारा लोग  देते,

पहले अपने लिये दान का चारा लेते,

नाटकीय अंदाज में सभी को रोटी

दिलाने के लिये आते वही सड़कों पर

जिनके घर में चंदे से भोजन पकता है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

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मनोरंजन के लिए-हिंदी व्यंग्य कविता


देश में तरक्की बहुत हो गयी है

यह सभी कहेंगे,

मगर सड़कें संकरी है

कारें बहुत हैं

इसलिये हादसे होते रहेंगे,

रुपया बहुत फैला है बाज़ार में

मगर दौलत वाले कम हैं,

इसलिये लूटने वाले भी

उनका बोझ हल्का कर

स्वयं ढोते रहेंगे।

कहें दीपक बापू

टूटता नहीं तिलस्म कभी माया का,

पत्थर पर पांव रखकर

उस सोने का पीछा करते हैं लोग

जो न कभी दिल भरता

न काम करता कोई काया का,

फरिश्ते पी गये सारा अमृत

इंसानों ने शराब को संस्कार  बना लिया,

अपनी जिदगी से बेजार हो गये लोगों ने

मनोरंजन के लिये

सर्वशक्तिमान की आराधना को

खाली समय

पढ़ने का किस्सा बना लिया,

बदहवास और मदहोश लोग

आकाश में उड़ने की चाहत लिये

जमीन पर यूं ही गिरते रहेंगे।

—————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

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मनोरंजन के बाज़ार में बिकती सनसनी-हिंदी व्यंग्य कविता


किसी की कामयाबी पर

कौन जश्न मनाता है,

एक दूसरे की तबाही पर ही

सभी को मजा लेना आता है।

कहें दीपक बापू

दिल बहलाने के लिये

चाहिये लोगों को कोई न कोई बहाना,

चलते को गिराकर

अपनी ताकत का अहसास कराते हैं सभी

वक्त खराब करना लगता है

किसी गिरे इंसान को ऊपर उठाना,

बिक जाती है मनोरंजन के बाज़ार में

इसलिये सरलता से सनसनी,

बनते घर की कोई खबर नहीं,

टूटते पर सभी की भोहें तनी,

कुदरत ने इंसान को दिये

हंसने के कई तरीके

मगर उसे दूसरों के रोने पर ही

जश्न मनाना आता है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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