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रात को भोजन करने के पश्चात् मनोरंजन करना बुरा नहीं-मनुस्मृति के आधार पर हिन्दी चिंत्तन लेख


      आमतौर से लोग यह समझते हैं कि भारतीय अध्यात्म दर्शन इंद्रियों पर नियंत्रण करने के लिये हर विषय का त्याग करने की बात करता है। वह मनोरंजन तथा खेल आदि का विरोधी है।  यकीनन यह विचार किसी के भी अज्ञानी होने का ही प्रमाण है।  यह अलग बात है कि जहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन जहां भक्ति तथा ध्यान साधना को एकांत करने की बात कहता है वहीं वह सांसरिक विषयों के साथ निर्लिप्त भाव से  जुड़ने की राय भी देता है।  इस देह की सभी इंद्रियां हमेशा सक्रिय रहती हैं। इंद्रियों का यह स्वभाव है कि वह विभिन्न रसों में लिप्त होने के लिये हमेशा उत्सुक रहती हैं। एकरसता उनको उबा देती है। इसलिये समय और स्थिति कंे अनुसार इंद्रियों पथ बदलना चाहिये पर उनके विषयों से जुड़ने का भी एक समय होता है। हमेशा भक्ति और साधना नहीं हो सकती तो हमेशा मनोरंजन भी नहीं हो सकता।  हमारी देह है तो उसे सांसरिक विषयों से जोड़ना ही पड़ता हैं। प्रातःकाल योग साधना के दौरान आसन, ध्यान, मंत्र जाप तथा पूजा करने से जहां देह, मन और विचारों की शुद्धि होती है वहीं सांयकाल मनोरंजन के दौरान गीत संगीत सुनने से भी मनोविकार दूर होने के साथ ही थकान भी दूर होती है। आदमी की थकी देह में बैठा मन जब मयूर की तरह नाचता है उसमें वह दोपहर अर्थोपार्जन के दौरान एकत्रित विष का नाश होता है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

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तत्र भुजत्वा पुनः किञ्चित्तूर्वघोषैः प्रहर्षितः।

संविशेत्तु यथाकालमत्तिष्ठेच्य यतवलमः।।

                        हिन्दी में भावार्थ-भोजन करने के बाद कुछ समय हृदय को प्रसन्न करने के लिये गीत संगीत सुनने के बाद अपनी थकान दूर करने के लिये शयन करना चाहिये।

                        हमारे यहां भक्ति और साधना के साथ ही मनोरंजन का भी समय तय कर जीवन नहीं बिताया जाता।  प्रातःकाल गीत संगीत के साथ मनोंरजन के नाम पर भक्ति होती है तो सांयकाल भी कहीं भक्ति संगीत के नाम पर मनोरंजन कार्यक्रम होते हैं।  हैरानी तब होती है जब अनेक जगह भक्ति संध्या के नाम पर लगते हैं। भक्ति संध्या अर्थात यह  दो शब्द  ज्ञानसाधकों को हतप्रभ कर देते हैं। तब उनके मन में यह विचार भी आता है कि क्या संध्या को भी भक्ति होती है क्या? हां, इतना अवश्य है कि अनेक अध्यात्मिक ज्ञानी रात्रि शयन से पूर्व ध्यान कर सोने की सलाह देते हैं पर वास्तव में इससे निद्रा अच्छी आती है। ध्यान करने से दिन भर जो मन में एकत्रित विष  नष्ट हो जाता है।  शयन करते समय उन विषयों का विचार नहीं आता पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि भक्ति के नाम पर मनोरंजन कर उस स्थिति को पाया जा सकता है।

                        कहने का अभिप्राय है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन किसी विषय से जुड़ने पर प्रतिबंध लगाने की राय नहीं देता पर समय तथा सीमा के अनुसार काम करने की राय देता है।  प्रातःकाल जहां एकांत साधना जीवन में पवित्रता लाती है वहीं सांयकाल मनोरंजन करना भी मन को प्रसन्नता देता है। यह मनोरंजन भी एकांत में या सीमित समूह में होना चाहिये न कि उसके लिये भारी भीड़ एकत्रित की जाये।  भीड़ में मनोरंजन का लाभ वैसे ही कम होता है जैसे कि सार्वजनिक रूप से भक्ति करने पर मिलता है। किसी भी भाव की सुखद अनुभूति अंदर केवल एकांत में ही जा सकती है भीड़ में मचा शोर मनोरंजन कम तनाव का कारण अधिक होता है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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मंगलयान के लिए मंगल कामनाएं-हिंदी चिंत्तन लेख एवं सम्पादकीय


                        भारतीय वैज्ञानिक आज मंगल पर खोज के लिये एक अंतरिक्ष यान प्रेषित किया गया जो सफल रहा है| इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा का सारा विश्व लोहा मानता है यह अलग बात है कि यहां पूरी सुविधायें न होने से अनेक लोग पलायन कर दूसरे देशों की सेवा करते हैं।  इतना ही नहीं भारतीय प्रचार माध्यम भी विदेशों में काम कर रहे  भारतीय मूल के वैज्ञानिकों का चमत्कृत करने वाला प्रचार करते है।  इससे भारतीय जनमानस के एक बहुत बड़े वर्ग में यह भाव होता है कि हमारे यहां तो विदेशों जैसा विकास हो ही नहीं सकता।  इतना ही नहीं एक वर्ग ऐसा भी है जो किसी वैज्ञानिक उपलब्धि पर यह कहकर फब्ती कसता है कि ऐसे काम की बजाय देश के गरीबों पर पैसा खर्च किया जाता। यह संकीर्ण मानसिकता का प्रमाण है कि अपने देश के वैज्ञानिकों का मनोबल बढ़ाने की बजाय घटाने का प्रयास किया जाये। जिस तरह देश में निराशा का  वातावरण है  उसमें भारतीय वैज्ञानिकेां ने मंगल पर जाने योग्य अंतरिक्ष यान का निर्माण कर लिया इसके लिये वह बधाई के पात्र हैं।

                        जहां तक देश में व्याप्त समस्याओं की बात है तो वह कभी खत्म नहीं होंगी अलबत्ता उन्हें नियंत्रित करने के सरकारी प्रयास होते रहे हैं यही बात महत्वपूर्ण है।  अगर कुछ जनहितैषी विद्वान ऐसी उपलब्धियों की देश में व्याप्त समस्याओं की आड़ में खिल्ली उड़ाते हैं तो उन पर दया ही आती है। वह देश या राष्ट्र के बने रहने के सिद्धांतों को नहीं समझते।  अगर उनकी बात मान ली जाये तो राज्य केवल राजस्व वसूली करे और प्रजा में रोटियां बांटता फिरे।  न सेना की जरूरत न पुलिस की जरूरत, बस सभी तरह रोटियां बांटने वाले दफ्तर खुले होने चाहिये।  ऐसे लोगों के बयान हास्यास्पद होते है।

                        एक राष्ट्र के नियंत्रक को प्रजा का आत्मविश्वास तथा अन्य राष्ट्रों की प्रजा में अपनी छवि बनाये रखने का समान प्रयास करना चाहिये।  जहां तक वैज्ञानिक प्रतिभाओं की बात है तो भारत की छवि उज्जवल है। दूसरी बात यह कि भारत में गरीब अधिक संख्या में है पर यह गरीब देश नहीं कहा जा सकता। देश में कृषि, खनिज तथा वन संपदा का अकूत भंडार है।  समस्या आर्थिक असमान वितरण की है न कि पैसे की कमी की। ऐसा कौनसा देश हैं जहां सारे अमीर है। ढूंढने निकलें तो अमेरिका तक में गरीबी मिल जाती है।  गरीब के हित का ख्याल होना चाहिये पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि उच्च तथा मध्यम वर्ग के लोगों के  आत्मविश्वास बढ़ाने पर पर ध्यान नहीं दें। इस तरह की उपलब्धियां उन लोगों को आत्मविश्वास बढ़ाती हैं, जो राष्ट्र निर्माण के साथ ही उसकी रक्षा के कार्य में तत्पर होते हैं। यह आत्मविश्वास राष्ट्र के लिये अप्रत्यक्ष रूप से फलदायी होता है।  अपने आत्मविश्वास से युवा वर्ग राष्ट्र को स्थिरता और विकास के मार्ग पर ले जाता है। यह ठीक है इससे उनको व्यक्तिगत लाभ होता है और राज्य का भी यही लक्ष्य होता है कि लोग आत्मनिर्भर बने।  प्रजा का निजी लाभ ही राज्य का लाभ होता है। जब हम राष्ट्र की बात करते हैं तो उच्च, मध्यम और गरीब तीनों वर्ग के लोग उसमें शमिल रहते हैं और राज्य का यह काम है कि वह सबका ध्यान रखे।  मंगल मिशन से देश का आत्मविश्वास बढ़ेगा उसके लाभों का रुपयों में आंकलन नहीं किया जा सकता।

                        बहरहाल यह मंगल मिशन कामयाब हो इससे हमें बहुत प्रसन्नता होगी।  देश के आर्थिक तथा वैज्ञानिक रणनीतिकारों ने इस प्रयास में  रुचि लेते हुए  इसमें सहमति दी इसके लिये वह भी बधाई के पात्र हैं।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे वैज्ञानिकों ने कुछ सोच समझकर ही यह मिशन तैयार किया होगा। इसके लिये वह बधाई के पात्र हैं। हमारी कामना है कि वह सफल हों।   

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

विष और अमृत की चाहत -हिंदी व्यंग्य कविता


दूसरे को विष देने के लिये सभी तैयार

पर  हर कोई खुद अमृत चखता है,

घर से निकलता है  अपनी  खुशियां ढूंढने

पूरा ज़माना बड़े जोश के साथ

दूसरों को सताने के लिये

दर्द की पुड़िया भी साथ रखता है।

कहें दीपक बापू

बातें बहुत लोग करते हैं

सभी का भला करने की

मगर आमादा रहते

अपना मतलब निकालने के वास्ते,

जुबां से करते गरीबों की मदद की बात

आंखें उनकी ढूंढती अपनी कमीशने के रास्ते,

बेबसों की मदद का नारा लोग  देते,

पहले अपने लिये दान का चारा लेते,

नाटकीय अंदाज में सभी को रोटी

दिलाने के लिये आते वही सड़कों पर

जिनके घर में चंदे से भोजन पकता है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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नवरात्र के दिन अध्यात्मिक चिंत्तन के लिए महत्वपूर्ण-हिंदी लेख


 

 

                        आज से देश में नवरात्रि महोत्सव प्रारंभ हो गया है। साकार तथा सकाम भक्तों के लिये यह नौ दिन अत्यंत उत्साह के साथ बिताये जाते हैं।  अनेक जगह माता की मूर्तियां स्थापित होने के साथ ही उनकी नित्य प्रातः तथा सायं आरती गायी जाती है। हालांकि इस तरह की परंपरा सदियों से चल रही है पर पिछले बीस वर्षों से राम मंदिर आंदोलन के प्रभाव से इसने व्यापक रूप लिया है। पहले शहरों में कुछ खास स्थानों पर ही माता की मूर्तियां लगती थीं पर राम मंदिर आंदोलन के प्रभाव से लोगों के प्रति धार्मिक पंरपराओं के प्रति जो अधिक उत्साह पैदा हुआ उससे सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रमों में व्यापक भीड़ जुटना प्रारंभ हो गयी।  इतिहास के अनुसार महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने अपने आंदोलन को व्यापक रूप देने के लिये महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी पर उनकी प्रतिमायें स्थापित करने की परंपरा शुरु की। स्वतंत्रता के पश्चात भी यह क्रम चलता रहा और अब तो पूरे भारत के साथ ही  विश्व में भी गणेश जी मूर्ति स्थापित करने के परंपरा देखी जाती हैं।  अगर हम इन एतिहासिक घटनाओं का आंकलन करें तो यह बात समझ में आती है कि भारत में लोग धर्म को लेकर संवेदनशील हैं और इसके सहारे उन्हें किसी भी सार्वजनिक महत्व के कार्यक्रम के लिये अपने साथ उनको सहजता से जोड़ा जा सकता है।  यह अलग बात है कि आजकल इसी धर्म के सहारे अनेक प्रकार के पाखंड चल पड़े हैं।  इतना ही नहीं अनेक लोग तो धर्म के नाम पर अज्ञान का प्रचार कर रहे हैं।

                        आमर्तार से योग तथा ज्ञान साधक निंरकार की उपासना करते हैं फिर भी मंदिरों में जाने से वह परहेज नहीं करते।  इसका कारण यह है कि भगवान की मूतियां चाहे जिस वस्तु की बनी है पर उनमें एक आकर्षण होता है।  उनको देखकर भगवान की उपस्थिति का आभास होता है। ज्ञान साधक यह जानते हैं कि पत्थर, लकड़ी, लोह या मिट्टी के भगवान नहीं होते पर उनसे बनी मूर्तियों में उसकी उपस्थिति की अनुभूति एक सुखद अनुभूति प्रदान करतेी है।   मूर्तियों को देखने से आंनद मिलता  है तो उस पर तर्क वितर्क करना व्यर्थ है।

                        आखिर मंदिरों में जाने पर मन को शांति मिलती क्यों है? कभी इस पर विचार करना चाहिये।  इसके निम्नलिखित कारण हमारी समझ में आते हैं।

                        1-अपने घर और कार्य स्थान पर रहते हुए आदमी को एकरसता का आभास होता है। जिनका योगाभ्यास, ध्यान तथा मंत्र जाप से मन पर निंयत्रण है उनके लिये तो प्रतिदिन पर्व है पर जिनको इस तरह का अभ्यास नहीं है उनका मन उन्हें विचलित करता है-कहीं दूर चलो, कहीं मनोरंजन मिले तो आनंद आये आदि विचार उसके मन में उठते रहते हैं। ऐसे में मंदिर जाने पर आदमी के मस्तिष्क में  नवीनता का आभास होता है।

                        2-दूसरी बात यह है कि अपने घर तथा कार्यस्थल पर हर मनुष्य को प्रतिदिन वही चेहरे मिलते हैं।  दूसरी बात यह कि मार्ग पर चतते और बाज़ार में घूमते हुए उसे भीड़ में उकताहट का अनुभव होता है।  मंदिर में जोने पर उसे नये चेहरे देखने का अवसर तो मिलता ही है वहां भीड़ से परे उसे शांति की अनुभूति होती है।

                        3-महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर और आश्रमों में घर या कार्यालय की अपेक्षा अधिक सफाई रहती है।  घरों में सामान ज्यादा होता है तो कार्यस्थानों पर भी सफाई पूरी तरह नहीं होती। मंदिरों में कोई सामान नहीं होता। जगह खाली मिलती है। घरों में आजकल सामान इतना हो गया है कि बड़े कमरे भी छोटे लगती है।  मंदिर अगर छोटा भी हो तो बड़ा दिखता है। हमारी चक्षु इंद्रियां मंदिर में जाकर इसलिये आनंदा उठा पाती हैं क्योंकि वहां सफाई होती है। यह सफाई हमने स्वयं नहीं की होती बल्कि वहां के सेवादार करते हैं। कहते हैं न हलवाई अपनी मिठाई नहीं खता उसी तरह आदमी को अपनी सफाई से कम दूसरे की सफाई से अधिक आनंद मिलता है।

                        यहां हम तीसरे महत्वपूर्ण तथ्य पर विचार करें।  हमने देखा है कि पार्कों और मंदिरों में भी लोग कचड़ा करने से बाज नहीं आते।  पार्को में सफाई नियमित रूप से नहीं होती। सच बात तो यह है कि जहां पार्क बने हुए हैं उसके लिये हमें भगवान का धन्यवाद करना चाहिये।  न बने होते तो हम क्या कर लेते?  इसके बावजूद लोग वहां जाकर खाने पीने के खाली पैकेट और ग्लास फैंक कर चले आते है।  सभी जानते हैं कि प्लास्टिक कभी नष्ट नहीं होती।  उल्टे वह प्रकृति को नष्ट करती है।  हमने देखा है कि पार्कों में लोग सामूहिक कार्यक्रम कर वहां इतनी गंद्रगी कर आते हैं तब लगता है जैसे कि वास्तव में हमारे देश के अनेक लोगों को जीवन जीने की तमीज नहीं है।  यही हाल मंदिरों का है।  वहां भी लोग लंगर आदि कर कचड़ा डाल देते हैं।  जब तक सफाई न हो तो तब वह मंदिर भी अत्यं दुःखद दृश्य चक्षुओं के समक्ष उपस्थिति करने लगते हैं।  हमें तो लगता है कि इन नवरात्रियों में सार्वजनिक स्थानों पर कचड़ा न करने की शपथ लेने का अभियान चलना चाहिये।

                        चलते चलते पार्कों में अवैध रूप से बनने वाले विभिन्न धर्मो  के पूजा स्थानों के नाम पर अतिक्रमण करने  प्रश्न दिमाग में आ गया है।  हमें याद आ रहा है कि भारत का उच्चतम न्यायालय इस पर संज्ञान ले चुका है। यह स्थिति देश की अनेक कालोनियों में देखी जा सकती है। होता यह है कि जब कालोनी पूरी तरह बसे तब तक कालोनी बसाने वाली एजेंसियां पार्क की जगह खाली छोड़ देती है।  वहां विकास तब तक कोई विकास कार्य नहीं होता जब तब आबादी पर्याप्त न हो जाये।  ऐसे में कथित रूप से  किसी भी धर्म के ठेकेदार वहां धार्मिक स्थान बनाकर पार्क के विकास का दावा करते हैं।  विकास न भी करें तो भी धार्मिक्क  स्थान  दिखाकर यह दावा करते हैं कि उस स्थान  की अतिक्रमण की रक्षा के लिये ऐसा कर रहे हैं। यह अतिक्रमण बाद में कालोनियों के बच्चों के लिये दुःखदायी हो जाता है।  धर्म स्थान पर विराजमान कथित सेवादार उन्हें वहां खेलने नहीं देते।  पार्क में भले ही पेड़ न हो पर खाली जमीन बच्चों के खेलने के काम आती है मगर इस तरह के धर्म स्थान उनके लिये संकट पैदा करते हैं।  आम परिवार के बच्चे किसी बड़े तनाव की आशंका के चलते कुछ कहते नहीं है पर संबंधित धर्म के प्रति उनका मन अप्रसन्नता से भर जाता है।  यह समस्या अनेक लगह है।  कथित धर्म रक्षक भले ही अपने धर्मों को लेकर बड़े प्रसन्न हों पर उनको इस आभास नहीं है कि बच्चों के मन में इससे वितृष्णा का भाव पैदा होता है।  दूसरी बात यह है कि कोई इमारत खड़ी करना महंगा नहीं हैं बल्कि भूखंड महंगा होता है।  यही कारण है कि इन पार्को पर कब्जा कर धर्म रक्षक अपनी पीठ ठोकते हैं।  क्योंकि भूखंड उन्होंने खरीदा नहीं होता और धर्म स्थान के लिये वह आमजनेां से चंदा लेते हैं।  नाम उनका ही होता है। 

                        हमारा मानना है कि वैसे भी धर्म का निर्वाह एकांत का विषय है उसे सार्वजनिक रूप से थोपा नहीं जाना चाहिये। बेहतर यह है कि हम अपने अंदर के विकार बाहर पहले निकाले और बाद में समाज में बदलाव लाने की बात करें।  यह नवरात्रि आत्ममंथन के लिये एक सुअबवसर हो सकता है।

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
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                        आज से देश में नवरात्रि महोत्सव प्रारंभ हो गया है। साकार तथा सकाम भक्तों के लिये यह नौ दिन अत्यंत उत्साह के साथ बिताये जाते हैं।  अनेक जगह माता की मूर्तियां स्थापित होने के साथ ही उनकी नित्य प्रातः तथा सायं आरती गायी जाती है। हालांकि इस तरह की परंपरा सदियों से चल रही है पर पिछले बीस वर्षों से राम मंदिर आंदोलन के प्रभाव से इसने व्यापक रूप लिया है। पहले शहरों में कुछ खास स्थानों पर ही माता की मूर्तियां लगती थीं पर राम मंदिर आंदोलन के प्रभाव से लोगों के प्रति धार्मिक पंरपराओं के प्रति जो अधिक उत्साह पैदा हुआ उससे सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रमों में व्यापक भीड़ जुटना प्रारंभ हो गयी।  इतिहास के अनुसार महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने अपने आंदोलन को व्यापक रूप देने के लिये महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी पर उनकी प्रतिमायें स्थापित करने की परंपरा शुरु की। स्वतंत्रता के पश्चात भी यह क्रम चलता रहा और अब तो पूरे भारत के साथ ही  विश्व में भी गणेश जी मूर्ति स्थापित करने के परंपरा देखी जाती हैं।  अगर हम इन एतिहासिक घटनाओं का आंकलन करें तो यह बात समझ में आती है कि भारत में लोग धर्म को लेकर संवेदनशील हैं और इसके सहारे उन्हें किसी भी सार्वजनिक महत्व के कार्यक्रम के लिये अपने साथ उनको सहजता से जोड़ा जा सकता है।  यह अलग बात है कि आजकल इसी धर्म के सहारे अनेक प्रकार के पाखंड चल पड़े हैं।  इतना ही नहीं अनेक लोग तो धर्म के नाम पर अज्ञान का प्रचार कर रहे हैं।

                        आमर्तार से योग तथा ज्ञान साधक निंरकार की उपासना करते हैं फिर भी मंदिरों में जाने से वह परहेज नहीं करते।  इसका कारण यह है कि भगवान की मूतियां चाहे जिस वस्तु की बनी है पर उनमें एक आकर्षण होता है।  उनको देखकर भगवान की उपस्थिति का आभास होता है। ज्ञान साधक यह जानते हैं कि पत्थर, लकड़ी, लोह या मिट्टी के भगवान नहीं होते पर उनसे बनी मूर्तियों में उसकी उपस्थिति की अनुभूति एक सुखद अनुभूति प्रदान करतेी है।   मूर्तियों को देखने से आंनद मिलता  है तो उस पर तर्क वितर्क करना व्यर्थ है।

                        आखिर मंदिरों में जाने पर मन को शांति मिलती क्यों है? कभी इस पर विचार करना चाहिये।  इसके निम्नलिखित कारण हमारी समझ में आते हैं।

                        1-अपने घर और कार्य स्थान पर रहते हुए आदमी को एकरसता का आभास होता है। जिनका योगाभ्यास, ध्यान तथा मंत्र जाप से मन पर निंयत्रण है उनके लिये तो प्रतिदिन पर्व है पर जिनको इस तरह का अभ्यास नहीं है उनका मन उन्हें विचलित करता है-कहीं दूर चलो, कहीं मनोरंजन मिले तो आनंद आये आदि विचार उसके मन में उठते रहते हैं। ऐसे में मंदिर जाने पर आदमी के मस्तिष्क में  नवीनता का आभास होता है।

                        2-दूसरी बात यह है कि अपने घर तथा कार्यस्थल पर हर मनुष्य को प्रतिदिन वही चेहरे मिलते हैं।  दूसरी बात यह कि मार्ग पर चतते और बाज़ार में घूमते हुए उसे भीड़ में उकताहट का अनुभव होता है।  मंदिर में जोने पर उसे नये चेहरे देखने का अवसर तो मिलता ही है वहां भीड़ से परे उसे शांति की अनुभूति होती है।

                        3-महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर और आश्रमों में घर या कार्यालय की अपेक्षा अधिक सफाई रहती है।  घरों में सामान ज्यादा होता है तो कार्यस्थानों पर भी सफाई पूरी तरह नहीं होती। मंदिरों में कोई सामान नहीं होता। जगह खाली मिलती है। घरों में आजकल सामान इतना हो गया है कि बड़े कमरे भी छोटे लगती है।  मंदिर अगर छोटा भी हो तो बड़ा दिखता है। हमारी चक्षु इंद्रियां मंदिर में जाकर इसलिये आनंदा उठा पाती हैं क्योंकि वहां सफाई होती है। यह सफाई हमने स्वयं नहीं की होती बल्कि वहां के सेवादार करते हैं। कहते हैं न हलवाई अपनी मिठाई नहीं खता उसी तरह आदमी को अपनी सफाई से कम दूसरे की सफाई से अधिक आनंद मिलता है।

                        यहां हम तीसरे महत्वपूर्ण तथ्य पर विचार करें।  हमने देखा है कि पार्कों और मंदिरों में भी लोग कचड़ा करने से बाज नहीं आते।  पार्को में सफाई नियमित रूप से नहीं होती। सच बात तो यह है कि जहां पार्क बने हुए हैं उसके लिये हमें भगवान का धन्यवाद करना चाहिये।  न बने होते तो हम क्या कर लेते?  इसके बावजूद लोग वहां जाकर खाने पीने के खाली पैकेट और ग्लास फैंक कर चले आते है।  सभी जानते हैं कि प्लास्टिक कभी नष्ट नहीं होती।  उल्टे वह प्रकृति को नष्ट करती है।  हमने देखा है कि पार्कों में लोग सामूहिक कार्यक्रम कर वहां इतनी गंद्रगी कर आते हैं तब लगता है जैसे कि वास्तव में हमारे देश के अनेक लोगों को जीवन जीने की तमीज नहीं है।  यही हाल मंदिरों का है।  वहां भी लोग लंगर आदि कर कचड़ा डाल देते हैं।  जब तक सफाई न हो तो तब वह मंदिर भी अत्यं दुःखद दृश्य चक्षुओं के समक्ष उपस्थिति करने लगते हैं।  हमें तो लगता है कि इन नवरात्रियों में सार्वजनिक स्थानों पर कचड़ा न करने की शपथ लेने का अभियान चलना चाहिये।

                        चलते चलते पार्कों में अवैध रूप से बनने वाले विभिन्न धर्मो  के पूजा स्थानों के नाम पर अतिक्रमण करने  प्रश्न दिमाग में आ गया है।  हमें याद आ रहा है कि भारत का उच्चतम न्यायालय इस पर संज्ञान ले चुका है। यह स्थिति देश की अनेक कालोनियों में देखी जा सकती है। होता यह है कि जब कालोनी पूरी तरह बसे तब तक कालोनी बसाने वाली एजेंसियां पार्क की जगह खाली छोड़ देती है।  वहां विकास तब तक कोई विकास कार्य नहीं होता जब तब आबादी पर्याप्त न हो जाये।  ऐसे में कथित रूप से  किसी भी धर्म के ठेकेदार वहां धार्मिक स्थान बनाकर पार्क के विकास का दावा करते हैं।  विकास न भी करें तो भी धार्मिक्क  स्थान  दिखाकर यह दावा करते हैं कि उस स्थान  की अतिक्रमण की रक्षा के लिये ऐसा कर रहे हैं। यह अतिक्रमण बाद में कालोनियों के बच्चों के लिये दुःखदायी हो जाता है।  धर्म स्थान पर विराजमान कथित सेवादार उन्हें वहां खेलने नहीं देते।  पार्क में भले ही पेड़ न हो पर खाली जमीन बच्चों के खेलने के काम आती है मगर इस तरह के धर्म स्थान उनके लिये संकट पैदा करते हैं।  आम परिवार के बच्चे किसी बड़े तनाव की आशंका के चलते कुछ कहते नहीं है पर संबंधित धर्म के प्रति उनका मन अप्रसन्नता से भर जाता है।  यह समस्या अनेक लगह है।  कथित धर्म रक्षक भले ही अपने धर्मों को लेकर बड़े प्रसन्न हों पर उनको इस आभास नहीं है कि बच्चों के मन में इससे वितृष्णा का भाव पैदा होता है।  दूसरी बात यह है कि कोई इमारत खड़ी करना महंगा नहीं हैं बल्कि भूखंड महंगा होता है।  यही कारण है कि इन पार्को पर कब्जा कर धर्म रक्षक अपनी पीठ ठोकते हैं।  क्योंकि भूखंड उन्होंने खरीदा नहीं होता और धर्म स्थान के लिये वह आमजनेां से चंदा लेते हैं।  नाम उनका ही होता है। 

                        हमारा मानना है कि वैसे भी धर्म का निर्वाह एकांत का विषय है उसे सार्वजनिक रूप से थोपा नहीं जाना चाहिये। बेहतर यह है कि हम अपने अंदर के विकार बाहर पहले निकाले और बाद में समाज में बदलाव लाने की बात करें।  यह नवरात्रि आत्ममंथन के लिये एक सुअबवसर हो सकता है।

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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बिना मार खाए पाकिस्तान मानने वाला नहीं-हिंदी लेख सम्पादकीय


    पाकिस्तान एक खत्म हो चुका राष्ट्र है और उनके प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ एक ऐसा लोकतांत्रिक चेहरा हैं जो विश्व को दिखाने भर को है।  उनसे यह आशा करना बेकार है कि पूरे पाकिस्तान पर नियंत्रण कर पायेंगे।  इससे पहले उनकी विरोधी पीपुल्स पार्टी तथा राष्ट्रपति जरदारी को यह श्रेय प्राप्त जरूर हो गया कि उन्होंने वहां की कथित प्रजातांत्रिक व्यवस्था में अपना कार्यकाल पूरा किया जिसका अवसर वहां किसी को नहीं मिला था।  संभव है नवाज शरीफ भी अपना कार्यकाल पूरा करें। शायद नहीं भी कर सकें। इसका कारण यह है कि नवाज शरीफ का रवैया भारत के प्रति अधिक बदला नहीं लगता और कहीं की कोई कारगिल जैसा युद्ध सामने न आ जाये। युद्ध के बाद पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सत्ता का पतन तय है।

           अभी हाल ही में पांच भारतीय सैनिकों की पूंछ जिले में जिस तरह हत्या हुई है उस पर पूरे देश में गुस्सा है और जिस तरह प्रचार माध्यमों ने पाकिस्तानी प्रवक्ताओं के विषैले वचन इस देश के लोगों को सुनने के लिये बाध्य किया है वह भी कम शर्मनाक नहीं है।  आज तो हद ही हो गयी जब  पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के प्रवक्ता ने एक चैनल पर भारत के अंदरूनी मामलों की चर्चा कर जिस तरह अपनी धार्मिक भावनाओं का इजहार किया उसके बाद तो यह आशा करना ही बेकार है कि पाकिस्तान कभी  अपनी विचारधारा बदल सकता है। एक सरकारी प्रवक्ता अपने सरकार की बात अत्यंत सावधानी से बोलता है इसलिये यह मानना गलत होगा कि कोई बात भावावेश में कही गयी होगी।  नवाज शरीफ के मन की बात उनके प्रवक्ता के माध्यम से जिस तरह सामने आयी उससे तो नहीं लगता कि आगे दोनों देशों के संबंध सामान्य  शायद ही रह पायें।

         हालांकि ऊपर हमने यह जरूर लिखा कि  पाकिस्तान के कथित प्रवक्ताओं या रणनीतिकारों को भारतीय चैनल दर्शकों पर थोप रहे हैं पर सच यह भी है इस चर्चा ने हमारे जैसे निष्पक्ष एवं स्वतंत्र  लेखकों को वैचारिक दृष्टिकोण से अत्यंत हैरान कर दिया है।  यह चर्चा सुनते हुए खून जरूर खोलता है पर यह भी सच है कि इससे कुछ ऐसी असलियतों का आभास होता है जिनका पहले अनुमान ही किया जा सकता था। पाकिस्तानी प्रवक्ता अपने धार्मिक एजेंडे को स्पष्ट रूप से बयान कर रहा है और उसका जवाब देने के लिये हम धर्मनिरपेक्ष होने की लाचारी दिखाते हैं।  अगर हम उनके धार्मिक एजेंडे को चुनौती दें तो भारत में लोग नाराज हो सकते हैं।  दूसरी बात यह भी हम देख रहे हैं कि धार्मिक आस्था के नाम ठेस पहुंचाने के नाम पर आजकल जिस तरह दोषारोपण होता है उसके चलते अपने  अलावा किसी अन्य धर्म पर प्रतिकूल बात कहना हमेशा ही विवादास्पद माना जाता है।  पाकिस्तान का निर्माण ही भारतीय धर्मों के मानने वालों के पलायन और तबाही से  हुआ था।  लंबे समय तक हम लोग यह मानते थे कि पाकिस्तान के शासक ही विरोधी हैं पर आम जनता शायद ऐसी न हो  पर जब से आधुनिक प्रचार माध्यमों ने अपना प्रभाव दिखाया है उससे तो यही लगता है कि वहां की जनता में भारत तथा भारतीय धर्मों के विरुद्ध इस तरह विष डाला जा चुका है जिसको निकालना अब आसान नहीं है।  हमने इंटरनेट पर देखा है कि  भारतीय ब्लॉग लेखक कहंी न कहीं पाकिस्तान के लिये दोस्ताना बात कहते हैं पर वहां के ब्लॉग लेखकों ने कभी ऐसा नहीं किया।  दूसरी बात यह भी कि देवनागरी लिपि तथा अरबी लिपि ने ऐसा विभाजन किया है कि अब दोनों के आम लोगों के बीच कभी एका नहीं हो सकता। कम से कम इंटरनेट पर साहित्यक संपर्क तो बन ही नहीं सकता।

      एक बात तय है कि भारत और पाकिस्तान के विभाजन की वह वजहें हमें नहीं लगती जो इतिहास में हमें बतायी जाती हैं।  आज जब प्रचार माध्यम इतने ताकतवर हैं तब हम अनेक राजनीतिक शिखर पुरुषों को लेकर अनेक दर्दनाक टिप्पणियंा आती हैं। कहा जाता है कि पहले के राजनीतिज्ञ आज के राजनीतिज्ञों से बेहतर थे। हम यह नहीं मानते क्योंकि हमारा सवाल यह है कि उस समय क्या प्रचार माध्यम क्या इतने तीव्रगामी थे जो उस समय के राजनीतिज्ञों की श्रेष्ठता स्वीकार की जाये।  हमारा मानना है कि पुराने राजनीतिज्ञों से आज के राजनीतिज्ञ कमतर नहीं है बल्कि अनेक मामलों में पुरानों से अधिक मुखर हैं और सच बात कह ही देते हैं जबकि पुराने दिल की बात दिल ही में रखते थे।  भारत और पाकिस्तान का विभाजन का धार्मिक आधार एक तत्व हो सकता है पर इसका आर्थिक और सांस्कृतिक आधार भी रहा होगा।  अगर हम मान लें कि विभाजन नहीं होता तो भारत की आबादी चीन के बराबर तो होती ही साथ ही क्षेत्रफल भी बढ़ा होता। याद रखें चीन का बढ़ा क्षेत्र तिब्बत पर अनाधिकृत कब्जे के कारण ही दिखता है।  ऐसे यकीनन भारत चीन से कहीं ज्यादा ताकतवर होता। ऐसे में आज चीन से डरने वाले ब्रिटेन और अमेरिका की स्थिति  एशियां इन दो  देशों की ताकत के  आगे क्या होती?  आर्थिक रूप से भारत दोनों देशों से बहुत आगे होता।  दूसरा यह भी कि अंग्रेजों को यह लगा कि कहीं न कहीं भारत के स्वाधीनता आंदोलन में भारतीय धर्मों के लेोगों  का बाहुल्य है और ऐसे में स्वतंत्रता के बाद यहां के धर्म की ताकत अधिक होगी।  उस समय कहीं न कहीं ब्रिटेन और अमेरिका का धार्मिक एजेंडा रहा होगा। तीसरी बात यह है कि उस समय सऊदी अरब से अमेरिका की और ईरान से ब्रिटेन की दोस्ती अच्छी थी जो आज भी कायम है।  पाकिस्तान के रूप में धार्मिक आधार पर एक कॉलोनी इन देशों को दी गयी।  पाकिस्तान एक तरह से उपनिवेश देश ही रहा है। यही कारण है कि आपातकाल में उसके मंत्रिपरिषद की बैठक भी सऊदी अरेबिया में होती है।  एक समाचार पढ़ने को मिला था जिसमें एक भारतीय ईरान में पकड़ा गया पर उसे वापस भारत भेजने की बजाय पाकिस्तान को दिया गया जो वहां जेल में बंद रहा-पता नहीं  वह छूटा या नहीं।  उससे यह तो साफ हो गया कि ईरान भले ही पाकिस्तान का गहरा मित्र न हो पर कम से धार्मिक एकरूपता के कारण भारत से अधिक उसे महत्व देता हैै।  चौथी बात यह कि अगर पाकिस्तान न बनता तो हिन्दी तथा देवनागरी का प्रचार बढ़ता ऐसे में  अंग्रेजी के सहारे भारत को गुलाम बनाये रखने की पश्चिमी देशों  की योजना सफल नहीं होती।

    पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू है जो वहां बोलने वाले बहुत कम है। यह सही है कि सारी भाषायें अरेबिक लिपि की समर्थक हैं। स्वतंत्रता के बाद कुछ भारतीय नेता जब यह आशा कर रहे थे कि एक दिन पाकिस्तान फिर भारत से मिलेगा तब वहां भाषा, धर्म और संस्कृति के नाम पर ऐसी योजना काम रही थी जो कि इस संभावना को सदैव खत्म करने वाली थी और जिसका यहां कोई अनुमान नहीं करता था।  अब सवाल यह है कि आगे क्या होगा?

        पाकिस्तान का खत्म होना ही भारत के हित में हैं।  वहां की अंदरूनी हालात खराब हैं।  हम पाकिस्तान के जिस शिक्षित समाज से यह आशा करते हैं कि वह वहां के लोगों में भारत के प्रति घृणा का भाव खत्म कर सकता है वही घृण फैला रहा है। यहां फिल्म, क्रिकेट, टीवी धारावाहिकों तथा कला क्षेत्रों में पाकिस्तान के लोग कथित मित्रता के नाम पर बुलाये जाते हैं। उनकी मीठी बातें सुनकर भारतीय लोग खुश होते हैं पर दरअसल यह उनका छलावा है।  दूसरी बात यह कि मूल भारतीय अध्यात्म दर्शन की चर्चा देश में होती रहती है। इस चर्चा को सुनते रहने के कारण भारत में हर धर्म से जुड़ा विद्वान सकारात्मक सोच वाला है। भले ही अन्य धर्मों के लोग भारत के मूल दर्शन का अध्ययन न करें पर सुनते सुनते कहीं न कहंीं उन पर सकारात्मक प्रभाव होता है।  अनेक मुस्लिम तथा ईसाई  विचारक कहीं न कहीं भारतीय धर्मो के विषय का अध्ययन करते हैं। मूल बात यह कि यहां सभी धर्मों के लोग देवनागरी लिपि को आत्मसात कर चुके हैं और भारतीय अध्यात्म दर्शन की पुस्तकों का अध्ययन उनके लिये सहज है।  इसलिये वह विचार फैंकते नहीं है जबकि पाकिस्तान में भारतीय धर्मों  को खूंखार और अंधविश्वास वाला प्रचारित किया जाता है।  वहां श्रीमद्भागवत गीता, पतंजलि योग साहित्य, रामायण या वेदों का अध्ययन करने वाला शायद ही कोई हो।  ऐसे में वहां सकारात्मक सोच वाले विद्वानों को होना संभव नहीं है।  पाकिस्तान के नागरिकों के सहधर्मी भारतीय लोगों को उन जैसा मानना एक तरह भद्दा मजाक लगता  है। सच बात तो यह है कि भारत के सभी जाति, भाषा, धर्म तथा क्षेत्रों में पाकिस्तान की उद्दंडता के प्रति आक्रोश है और हमारे देश के प्रचार माध्यम पाकिस्तानियों को लाकर उनका मजाक उड़ा रहे हैं। हालंाकि यह भी सच यह है कि इस तरह की चर्चा में यह साफ हो गया कि भारत में बैठे कुछ लोग अगर पाकिस्तान से दोस्ताना रखने की आशा कर रहे हैं तो वह  गलत हैं। वहां की सेना और राजनेता लातों के भूत हैं बातों से नहंी मानेंगे।  भारतीय जवानों की जिस तरह हत्यायें हो रही हैं वह बेहद गुस्सा दिलाने वाली हैं और न चाहते हुए भी आगे उस पर लातें बरसानी ही पड़ेंगी।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

शराब पीते बच्चों की खबर-लघु हिंदी व्यंग्य


          करीब सौ  बच्चे एक मॉल में शराब की पार्टी में शामिल होने पर पकड़े गये।  यह पार्टी फेसबुक के संपर्कों का उपयोग कर आयोजित की गयी।  पुलिस को पता चला कि अवैध ढंग से यह आयोजन हो रहा है तो वह इन बच्चों का सुधारने के लिये पहुंची।  मॉल के जिस बार में शराब पार्टी थी उसके स्वामी और प्रबंधकों को पुलिस ने पकड़ लिया पर बच्चों के विरुद्ध मामला न दर्ज कर अभिभावकों को  बुलाकर उन्हें सौंपा। हमारे टीवी चैनलों के लिये यह बाल सामग्री अत्यंत उपयोगी थी और तय बात है कि उन्होंने समाज के स्थिति पर किराये के आंसु भी बहाये। चिंता जताई।

            पुलिस ने बच्चों पर प्रकरण दर्ज न कर उनके अभिभावकों को सौंपा यह अच्छी बात है।  तर्क यह दिया कि सभी बालक बालिकायें पंद्रह  से बीस वर्ष तक की आयु वर्ग से संबंधित हैं इसलिये उनके उज्जवल भविष्य की संभावनायें खत्म नहीं की जानी है।  यह तर्क भी ठीक है। प्रचार माध्यमो में-टीवी चैनल और अखबार-कुछ चर्चा सामाजिक अंतर्जालीय संपर्क पर हुई तो कुछ समाज में व्याप्त व्यसनों की बढ़ती प्रवृत्ति  पर भी चिंता जताई गयीं। हिन्दुस्तान बिगड़ रहा है जैसे नारे भी पढ़ने और सुनने  को मिले।  हमने इस घटना के दृश्य टीवी चैनलों पर देखे।  इन दृश्यों में पकड़े गये बच्चों के अभिभावकों में कुछ अपने हाथों से अपनी संतानों पर बरस रहे थे।  इस दृश्य को देखकर हमारे अंदर यह विचार आया कि आखिर यह अभिभावक अपने बच्चों को पीट क्यों रहे हैं? इसकी कुछ वजहें हमारी समझ में आयीं।

            1-अभिभावकों को इस बात का अफसोस था कि बच्चे शराब पीते पकड़े गये न कि इसका कि उनके बच्चे शराब पीते हैं।

            2-पुलिस के हत्थे न चढ़ें इसलिये अपने बच्चों पर हाथ बरसाकर उन्हें बचा रहे थे।

             3-यह बताने के लिये बच्चे बिगड़े जरूर है पर हम तो ठीक प्रकार के अभिभावक हैं।

            यह तीनों बातें कम से कम हमें तो जमती हैं। घर के बच्चे रात को घर से गायब हों और माता पिता उनकी उपस्थिति के स्थान की जानकारी नहीं रखें तो उनको दोषमुक्त नहीं किया जा सकता।  दरअसल हमारे समाज में आज कमाने की प्रवृत्ति ने लोगों को हर तरफ से अंधा कर दिया है।  अभिभावक स्वयं पैसा कहां से कमा रहे हैं यह वह जानते हैं पर खर्च कैसे हो रहा है इस पर अनेक उनकी दृष्टि नहीं जाती क्योंकि पैसा तो उनके पास बाढ़ की तरह चला आता है। चाणक्य कहते हैं कि अधिक धन हो तो उसे निकालना चाहिये।  हमारे लोग यह नहीं मानते तो पैसा स्वयं ही आगे निकलने लगता है।  जिस तरह बाढ़ का पानी अपने किनारे तोड़ता है उसी तरह पैसा भी अपने ही घर उखाड़ता हैं।  धनलोलुपों का  लक्ष्य एक ही है कि अपने बच्चों को इतना कमा कर दें कि आगे की सात पीढ़ियों तक उनका नाम चलता जाये।  आप अगर किसी से पूछें कि ‘‘आप किसके लिये कमा रहे हैं?’’

           वह फट से जवाब देगा कि ‘‘बच्चों के लिये कमा रहा हूं!’’

            हमारे देश के किसी पुराने दार्शनिक का कहना है कि पुत्र अगर सुयोग्य है तो वह स्वयं कमा लेगा। अगर नालायक है तो सब गंवा देगा, इसलिये उतना ही कमाओ जितना आवश्यक हो। बेकार में अपनी जिंदगी क्यों केवल सासंरिक विषयों में बर्बाद हो।  सच बात तो यह है कि बच्चों का नाम लेना तो  बहाना है। लोग अपनी सामाजिक स्थिति में चार चांद लगाने के लिये कमाते हैं।  कुछ लोग अपनी विलासिता के लिये कमाते हैं पर नाम बच्चों का लेते हैं।

       बहरहाल उन बच्चो को अपनी भाग्य समझना चाहिये कि पुलिस ने उन्हें वह सबक सिखाया है जिसकी जिम्मेदारी उनके माता पिता की थी। पुलिस वालों को तारीफ करना चाहिये कि वह अपना सामाजिक दायित्व समझने लगे हैं।  हमारा दर्शन तो कहता है  कि शिक्षा के दौरान विलासित से दूर रहना चाहिये पर मुश्किल यह है कि आधुनिक शिक्षा प्रबंधक शिक्षा के दौरान ही छात्रों  को संपूर्ण व्यक्तित्व का स्वामी बनाने का दावा करते हुए उनको अपनी संस्थाओं के अंतर्गत होने  पर्यटन और पिकनिक कार्यक्रमों में शामिल होने के लिये बाध्य करते हैं।  शिक्षा के लिये निर्धारित पाठ्यक्रम  से अलग अन्य  विषयों की जानकारी देकर शिक्षा के स्वामी और प्रबंधक अपने अधिक से अधिक कुशल शैक्षणिक व्यवसायी होने का प्रमाण देना चाहते हैं।  ऐसे में अभिभावक भी यह सोचते हैं कि हमें क्या चिंता  पूरी फीस दे रहे हैं हमारे बच्चे को तो विद्यालय और महाविद्यालय के शैक्षणिक ठेकेदार अपने आप ही एक आदर्श व्यक्तित्व का स्वामी बना देंगे।  ऐसे में  मद्यपान और ध्रुमपान से संयुक्त ढेर सारे आयोजन होने ही जिसमें नवयुवक शामिल हों।  सौ बच्चों को पकड़कर पुलिस ने उन्हें एक सबक सिखाया पर उसे जीवन भर कितने बच्चे याद रखेंगे या इस घटना से पूरे देश कितने भविष्य में ऐसा न करने या होने देने की छात्र और अभिभावक कसम खायेंगे कहना कठिन है।

 

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

 

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

 

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

विशेष रविवारीय परिशिष्ट-बोधगया में विस्फोट करना घृणित लोगो का काम


       भारत में रविवार अब एक तरह से अवकाश के साथ ही अध्यात्म दिवस भी बन गया है।  पहले सरकारी क्षेत्र बढ़ा था और उसके अधिकांश कर्मचारी रविवार को अवकाश होने से बाज़ार के साथ ही अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों की शोभा बढ़ाते थे। अब निजी क्षेत्र में भी रोजगार पाने वाले लोगों के लिये भी रविवार के दिन ही अवकाश रहता है।  वैसे छात्रों को भी रविवार मिलता है और उनमें कुछ मौज मस्ती करते हैं तो कुछ अकेले या परिवार के साथ ही अध्यात्मिक दिवस मनाते हैं।  यह बात बाज़ार तथा उसके प्रचार प्रबंधक जानते हैं इसलिये ही रविवार को ऐसे विषय चुनते हैं जो ज्वलंत हों। कभी कभार उनको स्वतः ही ऐसे विषय मिल जाते हैं। कभी अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान प्रचार समूहों ने जिस तरह अपने विज्ञापन का समय पास किया उसने उनके सामने किसी विषय को निरंतर ज्वंलत बनाये रखकर उसका व्यवसायिक बनाने की योजना की प्रेरणा प्रस्तुत की।

       अभी केदारनाथ सहित पूरे उत्तराखंड में जो प्रकोप हुआ उससे पूरे दो सप्ताह तक प्रचार समूहों का किसी नवीन विषय की आवश्यकता भी नहीं रही।  यह भी देखा गया है कि अर्थ, धर्म, कला, फिल्म और सार्वजनिक विषयों से जुड़े शिखर पुरुषों ने भी अब रविवार का उपयोग आम आदमी तक पहुंचने के लिये प्रचार के रूप में  करना प्रारंभ कर दिया है।  वैसे देखा जाये तो हमारे देश में  संतों पर अक्सर लोगों के भक्ति भाव का दोहन करने का आरोप लगता है पर सच यह है कि जनसमूहों को प्रभावित करने की उनकी कला का अनुकरण हमारे लोकतांत्रिक देश में गैर धार्मिक लोग भी कर रहे हैं।  रविवार का प्रचार के लिये उपयेाग करने का प्रयास पेशेवर धार्मिक संतों ने ही शुरु किया है।

            जब सभी रविवार का उपयोग इस तरह कर रहे हैं तो वह अपराधी समूह कैसे पीछे रह सकते हैं जो जनता में अपनी हिंसा का प्रचार चाहते हैं।  आज बिहार में बौद्धिगया में एक साथ नौ विस्फोट जिस तरह किये गये उससे लगता है कि जानबूझकर रविवार का दिन चुना गया।  समय भी वह चुना गया जिस समय लोग वहां कम थे।  स्पष्टतः इस विस्फोट से जुड़े अपराधियों का मुख्य ध्येय रविवार को अपराध कर सारे दिन टीवी पर बैठकर उसका प्रचार देखते रहना भी हो सकता है।  समय प्रातः पांच से छह के बीच का चुना गया।  यह समय एकदम नियमित भक्तों का होता है जिनकी संख्या नगण्य ही होती है।  वह भक्त  जिनके मन में भगवान के प्रति इतनी श्रद्धा होती है कि वह प्रातः आने वाली मीठी नींद का त्याग कर देते हैं। यही त्याग उनको सच्चा भक्त बनाता है। हम यह नहीं कहते है कि देर से उठकर भगवान की भक्ति करने वाली कोई भक्त नहीं है। एक ज्ञान साधक के लिये किसी की भक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करना वर्जित है पर जब हम थोड़ा विस्तार से विश्लेषण करते हैं तो कुछ ऐसी टिप्पणियां आ ही जाती हैं जब किसी को थोड़ा बेहतर बताया जाये तो तय बात है कि भले ही सीधी न कहें पर किसी का  कम बेहतर होना स्वतः ही प्रकट हो जाता हैं।  हमारा यह भाव कतई नहीं है कि हम देर उठकर भक्ति करने वालों की आलोचना करें पर इतना तय है कि प्रातः जल्दी उठकर सर्वशक्तिमान की प्रार्थना करने वाला वास्तव में एक सच्चा भक्त है।

     एक बार हम अपने एक मित्र के साथ एक  घर से दूर  एक योग शिविर में गये। शिविर का स्थान एक ऐसी कालोनी में था जहां व्यवसायिक लोग रहते हैं।  शिविर पांच दिनों का था पर हम शनिवार और रविवार को ही  वहां गये। वहीं हमारे एक मित्र के मित्र वहीं  रहते थे।  पहले दिन तो हम दोनों निकल आये पर दूसरे दिन मित्र के मित्र का लड़का मिल गया।  रविवार होने के कारण वह प्रातःकाल की सैर को आठ बजे निकला था।  तब हम शिविर से  बाहर निकलकर आपसी वार्तालाप कर रहे थे। हमारी साधना समाप्त हुए भी करीब एक घंटा बीत चुका था।  वहां नाश्ता तथा वार्तालाप में एक घंटा लग गया था।  बाहर निकले तो वह लड़का हमारे मित्र के पास आया। उसे समझते देर नहीं लगी कि हम यहां योग शिविर में आये हैं।  उसने हमारे मित्र से कहा-‘‘अंकल, अब तो आपका कार्यक्रम समाप्त हो गया है। चलिये हमारे घर, कभी तो आया करिये। आज अवसर है तो आप घर चलें और पापा मम्मी से मुलाकात करिये।  मैं थोड़ा घूमकर आता हूं।’’

  हमारे मित्र ने उसकी बात मान ली और उसके घर तक आये। संयुक्त परिवार होने के कारण बड़ा घर था और उसमें घुसने के लिये दो बड़े लोहे के दरवाजे थे। हमारे मित्र ने अपने लक्ष्य वाले दरवाजे की घंटी बजायी तो कोई बाहर नहीं आया।  हम दरवाजा खोलकर दालान पार करते हुए  मकान के अंदर दरवाजे तक आये। वह भी खुला था। मित्र ने अपने मित्र का नाम लेकर आवाज लगायी। कोई जवाब नहीं आया। फिल्म और धारावाहिकों में हम अनेक वारदातें ऐसी देख चुके हैं कि अंदर घुसने का साहस नहीं हुअता। हमारे मित्र के मित्र का छोटा भाई ऊपर से झांक रहा था। हमने उसे अपने आने का कारण बताया।   तब वह अंदर ही नीचे से उतरकर भाई को बुलाने गया।  इतने में उनके काम करने वाली एक महिला का आना हुआ। हमारे मित्र को अनेक बार आने के कारण वह जानती थी।  उसने कहा कि ‘‘आप अंदर चलिये न! वह लोग अंदर ही सो रहे होंगे।’’

       हम उसके साथ ही अंदर दाखिल हो गये।  उस महिला ने बैडरूम के दरवाजे पर जाकर अपने मालिकों को आवाज दी और हमारे  आने की सूचना भी सुना दी।

          हम शिविर से उस मकान तक भी रुकते रुकते पहुंचे थे। घड़ी में उस समय आठ बजकर चालीस मिनट हुए थे। मतलब हमें बिस्तर छोड़े उस समय तक चार घंटे हो चुके थे। हमारी  दैहिक स्थिति इतनी अच्छी थी कि हम घर न जाकर कहीं दूसरा काम भी कर सकते थे-जैसे खरीददारी वगैरह  या कहीं मंदिर में जाकर घ्यान और पूजा करना! खरीददारी करने की बात बेकार है क्योंकि बाज़ार भी अब ग्यारह बजे से पहले कहां खुलते हैं? किसी के घर प्रातःकाल जाकर उसे  किस तरह उसे तकलीफ दी जा सकती है यह भी हमने उस दिन देखा। मित्र तथा उसकी पत्नी एकदम नींद से उठकर बाहर आये। उन्होंने हमारा स्वागत हृदय से किया इसमें संशय नहीं है क्योंकि हम कोई ऐसे रिश्तेदार नहीं थे जो तकलीफ देने वाले हों।

             वहां से हम दस बजे चाय और नाश्ता कर ही बाहर आये। इसकी कोई आवश्यकता भी हमें नहीं थी पर मेजबान का दिल रखने के लिये उनके पदार्थों को सेवन आधे मन से  स्वीकार करना पड़ा। उसी दौरान उनका छोटा भाई भी मिलने आया जो हमें प्रातःकाल आया देखकर हैरान था।  वह अपनी पत्नी के साथ रविवार का दिन होने के कारण  मंदिर जा रहा था।

                 कहने का अभिप्राय यह है कि प्रातःकाल के समय मनुष्य का मन स्वतः ही पवित्र होता है और अगर वह भगवान की भक्ति में लीन हो तो फिर कभी उस पर संशय करना ही नहीं चाहिए।  जब बौद्धिगया में भगवान बुद्ध के मंदिर पर विस्फोटो का विचार करते हैं तो उन दो लामाओं के घायल होने पर दर्द होता ही है जो प्रातःकाल अपने भगवान की सेवा में लीन थे। यकीनन ऐसे विस्फोट करने और कराने वालों को नीच ही कहा जा सकता है।  अभी इस घटना की जांच चल रही है इसलिये कहना कठिन है इससे किसका लक्ष्य पूरा हुआ पर इतना तय है कि इस घटना को किसी भी  धर्म से जोड़ने को हम गलत मानते हैं। हमारा मानना है कि पहले आतंकवाद के अर्थशास्त्र का पता लगाया जाये।  कुछ विद्वान मानते हैं कि आतंकवाद घटनाओं की आड़ में गंदे और गलत काम करने वाले लोग अपनी सक्रियता बढ़ा देते हैं। उनका लक्ष्य प्रजा, प्रशासन तथा पुलिस का ध्यान भटकाकर अपने दो नंबर का काम करना होता है और वही आतंकवाद के प्रायोजक भी होते  है। विस्फोट करने वाले बिना धन या अन्य लाभ के ऐसा काम करें यह भी जंचता नहीं है।  बहरहाल हम इस घटना से पीड़ित लोगों के स्वस्थ होने का हृदय से कामना करते हैं।

 

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

 

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चारों धामों पर प्रकृति प्रकोप और हिन्दू धर्म की भक्ति की शक्ति-हिन्दी लेख


            उत्तराखंड में बादल फटने से हुई तबाही प्रलय का ही वह रूप है जिसकी चर्चा हमारे अनेक धर्म ग्रंथों में की गयी है। कहा जाता है कि जब धरती पर पाप बढ़ जाते हैं तब प्रथ्वी भगवान के पास जाकर प्रार्थना करती है कि वह स्वयं अवतरित होकर उसके बोझ का हल्का करें।  इस प्रसंग में अनेक कथायें हमारे धार्मिक ग्रंथों में प्रचलित है। इसी तारतम्य में भगवान के चौदह अवतारों की चर्चा भी होती है। 

     उत्तराकांड  प्रलय में जो लोग मर गये उन पर क्या लिखा जाये पर जो बचें हैं उनको यह सदमा कितना सतायेगा यह तो वही समझेंगे जो झेलेंगे। जिन लोगों ने अपने परिवार के सदस्यों को खोया होगा उनके लिये यह यात्रा कभी समाप्त न होने वाली कठिन जीवन यात्रा का प्रारंभ  होने वाली भी सिद्ध हो सकती है।  उनके साथ कभी न मिटने वाला दर्द भी साथ हो सकता है।

       प्रकृति के प्रकोपों का इतिहास उसके जन्म के साथ ही जुड़ा है।  श्रीमद्भागवत गीता में भगवान के मुख से कहा भी कहा गया है कि जब जब संसार में पाप बढ़ते हैं धर्म की स्थापना के लिये मैं अपनी योग माया से प्रकट होता हूं।  एक जगह भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रिय सखा अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते हुए कहते हैं कि मैं इस संसार में विध्वंस के लिये बड़ा हुआ महाकाल हूं 

        उनके इस वाक्यांश पर अभी हाल ही में एक फिल्म बनी थी। उस फिल्म का नाम था ऑ माई गॉड। उसमें एक बीमा कंपनी ने एक अभिदाता को यह कहते हुए बीमा राशि देने से मना कर दिया था कि वह भगवान के प्रकोप से हुई हानि की क्षतिपूर्ति देने के लिये बाध्य नहीं हैं।  यह मामला अदालत में लाया गया। वह एक फिल्मी कथा थी पर उसमें मुख्य पात्र बीमाधारक ने मंदिरों के स्वामियों पर मामला दर्ज कर यह दावा जताने  का प्रयास किया कि वही लोग  उसकी हानि का क्षतिपूर्ति करें।  इस फिल्म पर कुछ धार्मिक लोगों ने किया था पर यह फिल्म श्रीमद्भागवत गीता के साधकों के लिये अत्यंत रुचिकर थी।

        बहरहाल उत्त्राखंड भारत का वह इलाका है जो प्राकृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।  हरियाली तथा जल की बहुतायत की  वजह से वहां ग्रीष्म ऋतु में बाहर के लोगों के लिये पर्यटन की दृष्टि से अनेक महत्वपूर्ण केंद्र बन गये हैं।  वहां ऐसे लोगों के लिये भी कुछ शहरों में पर्यटन केंद्र बन गये है जिनकी धार्मिक विषयों में रुचि नहीं है पर आनंद उठाना चाहते हैं।  इसी प्राचीन काल से   लोगों को आकर्षित करने के लिये अनेक धार्मिक केंद्र बने हुए थे जिससे लोग धर्म निर्वाह  के साथ ही अपने मन को भी शांत रखने का प्रयास कर सकें  इनमें चार धामों की यात्रा तो पुरातन समय से चल रही है।

         जब हम देश में धार्मिक आधार पर व्यवसाय चलने की बात करते हैं तो केवल आनंद के लिये आधुनिककाल में  और प्राचीन समय में  धर्म निर्वाह के लिये बनाये केंद्रों में अंतर सहजता से पता नहीं चलता।  पहले लोगों गंगोत्री, यमनोत्री, बद्रीनाथ तथा केदारनाथ की यात्र अत्यंत श्रद्धाभाव  से करते थे।  अनेक लोग जीवन में एक बार इन चारों धामो की यात्रा कर अपना जीवन धन्य समझते थे। यह भाव लोगों में आया कैसे? तय बात है कि कहीं न कहीं इसके पीछे निष्काम ज्ञानियों के साथ ही व्यवसायिक लाभ उइाने वालों का भी प्रयास रहा होगा।  ठीक उसी तरह जिस तरह अब श्रीनगर, शिमला तथा मनाली जैसे गर्मी में आंनददायी स्थानों के प्रचार के लिये व्यवसायिक लोग प्रयास करते हैं।  यहां यह भी हम समझ लें कि निष्काम ज्ञानियों के प्रचार में व्यवसायिकता का अभाव होता है पर धर्म के प्रति आकर्षण पैदा की शक्ति होती है। इसके बावजूद वह अधिक लोगों को प्रेरित नहीं कर पाते। उनकी गतिविधियों को देखकर व्यवसायिक लोग अपनी योजना बनाते हैं और उनके लक्ष्यों को व्यवसायिक बनाकर अधिक लोगों को आकर्षित कर लेते हैं।  ऐसे में धर्म और उसके व्यवसायक का अंतर पता करना सहज नहीं होता।  यही कारण है कि हम हरिद्वार में अनेक जगह यही नारा पढ़ते हैं कि सारे तीर्थ बार बार, गंगासागर एक बार  इस नारे के यह प्रभाव हुआ है  कि अब अधिकतर लोग हरिद्वार में जाकर गंगास्नान कर अपना जीवन धन्य समझते हैं।  इस स्नान में लोग धार्मिक भाव के साथ नहाने वालों की संख्या कम आनंद उठाने वालों की ज्यादा होती है।

       यहां हम धार्मिक विरोधाभासों पर इससे अधिक चर्चा नहीं कर सकते पर इतना तय है कि समय के साथ अब हरिद्वार को ही सभी तीर्थों में अधिक महत्व का मान लिया है।  इसके बावजूद चारों तीर्थों की परंपरा चलती रही है तो केवल इस कारण कि पर्यटन के व्यवसायियों ने चारों धामों तक की यात्र को पहले  से अधिक सहज बना दिया है। सरकार ने भी सड़कें बनाकर बसों के साथ पुल बनाकर आवागमन से परिवहन को सहज बना दिया है।  इन चारों धामों के लिये हर शहर में चारों धामों को सहजता से कराने का दावा कराने वाले व्यवसायिक संस्थान हर शहर में खुल गये हैं। फिर अपने देश के लोग धर्मभीरु होते ही हैं।  फिर मन कहीं न कहीं भटकने के लिये लालायित होता ही  है।  ऐसे में मनोरंजन के साथ ही अनेक लोग स्वयं को ही  धार्मिक दिखने और दूसरों को दिखाने कें लिये लोग तीर्थयात्राओं पर जाते हैं। जैसा कि गीता में वर्णित है इन लोगों में चार प्रकार के भक्त होते ही होंगे-आर्ती,अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  अधिक संख्या अर्थार्थी दृष्टिकोण वालों की ही होती है।  चारों धामों का प्रचार आज से सदियों पहले ही हुआ है और तय बात है कि व्यवसायिक लोगों का प्रयास आज भी उसे बनाये रखे हुए हैं।

      जहां तक हिन्दू धर्म की बात करें तो उसके चारों दिशाओं में अनेक महत्वपूण्र धार्मिक केंद्र हैं। गंगा यमुना नदियों के नाम अत्यंत्र पवित्र हैं पर नर्मदा, कावेरी तथा क्षिप्रा नदियों केा भी कम धार्मिक महत्व नहीं है। यही कारण है कि चार महाकुंभों में से दो ही गंगा यमुना पर होते हैं तो एक नर्मदा दूसरा क्षिप्रा पर होता है।  तबाही से उत्तराखंड में भारी हानि हुई। इसके दूरगामी प्रभाव होंगे।  वहां के मनोरंजक तथा धार्मिक स्थानों की यात्रा के आधार पर व्यवसायिक करने वाले अनेक लोगों की आय में यकीनन कमी आयेगी।  चारों धामों में यात्रा सुगम नहीं रही और इससे  नव धनाढ्य लोगों का आकर्षण बनाये रखना अब संभव नही है क्योंकि उनके लिये धर्म का भाव आनंद से संयुक्त होने के साथ ही सहज भी होना चाहिये।   दूसरी बात यह कि केदारनाथ धाम में आरती पूजा बंद है।  यह उसके खंडित होने की स्थिति है। चारों धाम एक दूसरे के साथ संबद्ध है और भले ही गंगोत्री, यमनोत्री और बद्रीनाथ सुरक्षित हों पर केदारनाथ धाम के बिना उनको भी खंडित ही माना जा सकता है।  इन चारों धामों की यात्रा एक दो वर्ष तक नही हो पायेगी। इसका मतलब यह है कि सदियों पुरानी निरंतरता का लाभ अब मिलना कठिन है। ऐसे में भी हिन्दुओं के लिये भावनात्मक संकट अधिक नहीं है क्योंकि उसके पास तीर्थों के रूप में अनेक केंद्र पहले से ही हैं।

                    अक्सर अनेक लोग यह आक्षेप करते हैं कि हिन्दूओं का कोई एक स्थान पूज्यनीय है नहीं। उनको कोई एक देवता नहीं है। उन्हें यह समझना होगा कि सनातन धर्म जिसे अब हिन्दू धर्म माना जाता है वह निरंकार की उपासना का प्रेरक है।  इसमें साकार तथा निराकार पूजा को मान्यता दी जाती हैं।  भारत में अनेक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान हैं।  किसी एक स्थान पर संकट  उपस्थित पर  हिन्दू कांपता नहीं है। न ही विलाप करता है।  इतना ही नहीं समय की दृष्टि से हिन्दू अपने धार्मिक स्थानों का निर्माण करते ही रहते हैं।  आज भी वृंदावन, अमरनाथ, उज्जैन, नासिक, इलाहबाद और वाराणसी अपनी धार्मिक आस्था के साथ हिन्दुओं का आत्मविश्वास बनाये रखे हुए हैं।  इसके अलावा दक्षिण में अनेक स्थान हैं जहां हिन्दू धर्म का झंडा लहराता है।  हम यह आशा करते हैं कि बहुत जल्दी इन चारों धर्म की यात्रायें  सहज हो जायेंगी। मूल समस्या पीड़ित लोगों की है। यही दुआ करते हैं कि भगवान सभी को यह शक्ति झेलने की शक्ति प्रदान करे।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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भारतीय योग संस्थान के प्रांतीय शिविरों में सीखने का मौका मिलता है-विशिष्ट हिन्दी रविवारीय लेख


     जब कभी भारतीय योग संस्थान के विशेष शिविरों में जाने का अवसर मिलता है तब हमें यह देखकर प्रसन्नता होती है कि वहां विद्वानों के विचार सुनकर कुछ न कुछ नया विचार मिलता है। दरअसल अगर यह कहें कि कोई नया विचार मिलता है तो स्वयं को अजीब लगता है क्योंकि उनके विचार हमारे दिमाग मेंकहीं न कहीं  हमेशा रहते हैं।  बस, उनको सार्वजनिक रूप से कहने का अवसर नहीं मिलता या हम उनहें  ढूंढते नहीं है।  अपने ब्लॉग पर अक्सर हमने भारतीय योग विद्या के बारे में लिखा है।  उसके लाभों की चर्चा करते हुए हमने अनेक पाठ लिखे हैं।  इन शिविरों में जाने पर हर विचार हमें नया लगता ही है चाहे भले ही वह कभी हमारे अंतर्मन में स्थित होकर विचरता रहा हो।  एक तरह से कहें तो मस्तिष्क में चल रहा विचार जब पुष्ट होता है तो वह नवीन हो जाता है। दूसरी बात यह भी है कि  शब्दों तथा उनको व्यक्त करने की शैली भी उसे नया बना देती है।

 yog sadhana
भारतीय योग संस्थान के विशेष शिविर का दृश्य

          आज हमें अपने ही ग्वालियर शहर के भारतीय योग संस्थान के  दो दिवसीय शिविर में जाने का अवसर मिला।  हम उसमें नियमित रूप से तो शामिल होने में असमर्थ थे पर अपने शिविर के बाहरी साधकों से मिलकर उनको जानने की जिज्ञासा हमें कुछ देर के लिये वहां ले ही गयी।  ऐसे अवसरों पर स्वयं मौन रहकर बहुत सीखा जा सकता है।  सबसे पहले तो उन निष्काम प्रवृत्ति के विद्वानों की सराहना करने का मन करता है जो अपने अनुभव तथा विचार वहां व्यक्त कर रहे थे।  उनके विचार सुनने के साथ ही हम उनके हाव भाव के साथ ही शब्दों पर भी अपना ध्यान रखे हुए थे। 

         आमतौर से पेशेवर धार्मिक तथा योग शिक्षक कामना भाव के कारण पारंगत होकर श्रोताओं को प्रभावित करते हैं पर निष्काम भाव से भी लोगों को प्रभावित किया जा सकता है, यह बात भारतीय योग संस्थान को देखकर सीखी जा सकती है।  भारतीय योग विज्ञान का प्रचार करने की शपथ लेने वाले इन विद्वानों के चेहरे पर तेज टपकता है तो वाणी से निकले शब्द योगरस में नहाये लगते हैं।  वहां मौजूद योग साधकों पर भी दृष्टिपात किया।  भारतीय योग संस्थान में निष्कामी विद्वानों और हमारे बीच तब थोड़ा मार्ग अलग हो जाता है जब हम अपनी गीता ज्ञान की दृष्टि जमाकर विचार करते हैं।  हमारे हिसाब से योगी भी भक्त है जिनके भक्तों की तरह चार प्रकार  होते हैं-ज्ञानी, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा आर्ती।  भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हजारों में कोई एक मुझे भजेगा और उन हजारों में भी कोई मुझे एक पायेगा। फिर वह कहते हैं कि ज्ञानी मेरा ही रूप है और वही मुझे पाता है।  वहां एक विद्वान ने यह भी माना कि हमारा काम है लोगों को बताना। सभी अमल नहीं करेंगे पर कुछ तो उसका असर होगा। 

       वहां लोगों को दो घंटे का मौन रखकर तप करने के लिये कहा गया पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हम तो देरी से पहुंचे थे। वहां लोगों से बात की पर उनके मौन तप के भंग में हमारा कोई योगदान नहीं है क्योंकि वह सभी तो पहले से वार्तालाप में लगे हुए थे। संभव है कुछ लोगों को वह शिविर बोर करने वाला लगे पर इतना तय है कि जिनके मन में योग को लेकर जिज्ञासायें वहां उनके निराकरण के पूरे अवसर हैं।

   अगर योग साधक की अपनी श्रेणी की बात करें तो हम अभी तक स्वयं को अर्थाथी श्रेणी का मानते हैं।  जहां तक प्रचारक के रूप में माने तो वह भी इसी श्रेणी में आता है। इस पर लिखने से हमारे मन की भूख शंात होती है।  यह हम अपने बारे में स्वयं मानते हैं इसका श्रेय श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन को जाता है जिसके प्रति हमारा निष्काम भाव है।  इन शिविरों में जिज्ञासु बनकर जाते हैं। योग साधना की शरण हमने आर्त भाव से ली थी।  जहां तक ज्ञानी का प्रश्न है उसका निर्णय तो हमारे जीवनकाल में तो होना ही नहीं है इसलिये चिंता छोड़ दी है।

         एक महत्वपूर्ण बात यह देखने को मिलती है कि हम जिन विद्वानों को सुनते हैं ऐसा लगता है कि वह हमारे मन की बात कह रहे हैं।  अच्छा लगता इसलिये क्योंकि वह वही बात कह रहे हैं जो हम सुनना चाहते है।  ऐसे में वक्ता और श्रोता का अंतर हमारे अंदर नहीं रहता।  ऐसा लगता है कि हम अपने से ही बात कर रहे हैं। दूसरी बात यह भी लगती है कि निरंतर योग साधना करने वाले अगर किसी दूसरे की बात न भी सुने तो भी उनके अंदर वैसे ही विचार योग साधना करते हुए स्वतः  एक जैस  हो जायेंगे जो अन्य विद्वानों के हैं।  कोई भी  व्यक्ति नियमित योगाभ्यास से क्षेत्रज्ञ बन जाता है।  वह न केवल अपनी देह बल्कि प्रकृति और अंतरिक्ष की संरचना को भी समझ सकता है।  इसलिये नियमित योग साधकों और शिक्षकों के विचार एक ही मार्ग पर आ जाते हैं। 

      हमने अनेक बार लिखा है कि योग तो हर मनुष्य करता है।  अंतर इतना है कि आम मनुष्य चंचल मन, मुख और मस्तिष्क को इंद्रियों के वश में रखकर असहज योग के मार्ग पर चलता है जबकि योग साधक सहज योग की तरफ जाते हैं।  असहज योग के अनेक मार्ग है पर सहज योग का मार्ग एक ही है। कोई आगे चलते हुए किसी पड़ाव पर आया और उसने उस उस स्थान ं का ज्ञान प्राप्त किया। दूसरा पीछे है और जब वह उसी पड़ाव पर आयेगा तो वह भी वैसा ही ज्ञान प्राप्त करता है।  एक ही मार्ग होने के कारण  सहज योगियों के विचारों में साम्यता होती है जबकि असहज योगी अनेक मार्गों के कारण हमेशा ही संशय में पड़े होते हैं।  असहज योगी को पता ही नहीं कि उसकी देह के विकारों का जनक कौन है? इसके लिये वह अनेक तरह के परीक्षण करता फिरता है।  असहज योगियों के बीच बीमारियों की दवाओं और चिकित्सकों के ही चर्चे होते हैं। जबकि सहज योग प्रवृत्ति और निवृत्ति का मार्ग जानते हैं इसलिये पहले तो विकार पैदा होने ही नहीं देते और हो भी जायें तो उनको निकालना भी जानते हैं।

        आखिर में हमें  यह कहना है कि  कि एक विद्वान ने कहा कि हमें योग संस्थान के प्रचार करना चाहिये। भारतीय योग संस्थान की प्रशिक्षण शैली ऐसी है कि किसी साधक को योग साधन करते  देखकर ही पता चल जाता है कि उसने वहीं से सब सीखा है।  सभी को यह बताना चाहिये कि भारतीय योग संस्थान ही इस विषय में सबसे श्रेष्ठ संगठन है।  हमें यह सुनकर हैरानी हुई क्योंकि यह बात तो हमने अनेक पाठों में पहले ही लिखी है।  यही इस बात का प्रमाण है कि सहज योगियों के आपस में बिना मिले भी एक जैसे विचार हो जाते हैं।     

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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देश की मनोदशा पर विचार करना जरूरी-हिंदी लेख


        न्यायविदों, सामाजिक चिंत्तकों और सेवकों के लिये छोटी आयु की बच्चियों के साथ कुकर्म की बढ़ती घटनायें अत्यंत चिंता का विषय है।  अपराधियों का पकड़ा जाना अच्छी बात है पर ऐसे अप्राकृतिक कर्म की बढ़ती निरंतरता इसे महत्वहीन बना देती है। यही कारण है कि जब सुरक्षा करने वाली संस्थायें  यह कहती है कि वह ऐसे अपराधों को रोक नहीं सकती तो न्यायविदों का उससे यह कहना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वह इतना तो पता लगाये कि ऐसा क्यों हो रहा है।  न्यायविदों का यह पूछना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्या लोग पागल हो रहे हैं?
        आर्थिक विकास था भौतिक उत्थान की अंधी दौड़ प्रारंभ हुए पंद्रह वर्ष हो गये हैं।  आर्थिक उदारीकरण के चलते विश्व के सभी देशों में एक समान रूप वाली उपभोग संस्कृति विकसित हो रही है।  यह संस्कृति विश्व की प्राचीन संस्कृतियों के साथ ही मूल मानवीय संस्कारों का विलोपन करने वाली है।  बच्चियों के साथ अप्राकृतिक रूप से अनाचार तथा कुंठावश आत्महत्याओं की घटनायें संस्काहीनता के कारण ही बढ़ रही हैं।
      इसी कारण देश की आर्थिक विकास दर का प्रश्न अब गौण होता जा रहा है। पिछले अनेक वर्षों से स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते आ रहे हैं कि देश में दैहिक विकारों के साथ ही लोगों की बिगडती जा रही है़।  समाज में दैहिक रोगियों के साथ ही मानसिक विकारवान लोगों का संख्या भी बढ़ी है। हमारे देश में  आमतौर से मनोरोगी केवल विक्षिप्त व्यक्ति को ही  माना जाता है। जिसे कुछ भी भान न हो वही पागल केवल मनोचिकित्सा योग्य है, यह सोच आज भी बनी हुई है।  आधुनिक मनोविज्ञान की जानकारी आम लोगों को नहीं है।  उनको यह पता नहीं कि अस्थाई रूप से पागलपन के शिकार अनेक लोग हो रहे है।  कब किसका मस्तिष्क पर से नियंत्रण समाप्त हो सकता है इसका अंदाज किसी को नहीं है।  एक पत्रिका मे छपे एक लेख में हमने स्वास्थ्य विशेषज्ञों के आंकड़े पांच से छह वर्ष पूर्व पढ़े थे।  उसमें देश में मधुमेह से चालीस, उच्चरक्तचाप, से पचास तथा हृदय रोगों से पैतीस  प्रतिशत लोगों के पीड़ित होने की बात कही गयी थी।  उसमें मनोरोगियों की संख्या भी तीस प्रतिशत बताई गयी थी।  उसमें महत्वपूर्ण बात यह कही गयी थी कि समस्या यह  भी है कि अनेक रोगियों को अपने रोग के बारे में पता ही नहीं है।
           हम पिछले अनेक वर्षों से देख  रहे हैं कि मधुमेह, उच्चरक्तचाप तथा हृदय रोगों के परीक्षण के लिये निशुल्क शिविर लगते हैं-क्योंकि इससे चिकित्सकों को अपने मरीज ढूंढने का अवसर मिलता है- पर मनोरोगों के लिये कभी ऐसा कार्यक्रम नहीं होता। इसका कारण यह है कि यह माना जाता है कि मनोरोगी होना केवल पागल होना ही है।  यही कारण है कि कोई भी व्यक्ति मनोरोगों की जांच के लिये तैयार नहीं होगा।  लोग इस खौफ के साये में नहीं जीना चाहेगे कि किसी को उनके मनोरोगी होने का पता लगे। मनोचिकित्सा का कोई बड़ा बाज़ार भी इसी कारण नहीं बन पाया है क्योंकि सभी लोगों को यह लगता है कि वह मानसिक रूप से स्वस्थ हैं।   मधुमेह, उच्चरक्तचाप तथा हृदय रोग की जांच करने के पश्चात् कोई भी आदमी इलाज के लिये तैयार हो जाता है पर मनोरोगी होने की बात कोई भी आदमी बदनामी के भय से  स्वीकार नहीं करना चाहेगा।
       देश में मनोरोगों के बढ़ने की बात स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्वीकार भी करते हैं पर इसके निवारण का कोई बड़ा प्रयास हो भी नहीं रहा।  योग साधन का ज्ञान देने वाले अनेक आचार्य  अपने प्रचार में दैहिक स्वास्थ्य की बात तो करते हैं पर मानसिक रोगों से निजात पाने की बात कहने में उनकी हिचक साफ देखी जा सकती हैं।  उन्हें अपने सामने उपस्थित लोगों के सामने मनोरोगों के निवारण की बात कहते हुए शायद संकोच इसलिये होता है कि कहीं लोग उनसे नाराज न हो जायें।  हालांकि हम यह लेख योग साधना के प्रचार के लिये नहीं लिख रहे। साथ ही यह भी बता दें कि योग साधना से ही कोई ज्ञानी या मानसिक रूप से परिपक्व हो जाये यह जरूरी नहीं है।  हम जिन मनोरोगों की बात कर रहे हैं वह आधुनिक भौतिक साधनों के उपयोग से ही बढ़े है। खासतौर से कंप्यूटर और मोबाइल के उपयोग ने लोगों की दिमागी स्थिति को बिगाड़ दिया है।  कंप्यूटर और मोबाइल के उपयोग के खतरे पश्चिमी स्वास्थ्य विशेषज्ञ पहले ही बता चुके हैं।  कंप्यूटर जहां शहरी सभ्यता तक सीमित है वहीं मोबाइल फोन का जाल तो गांवों तक भी फैल चुका है। कंप्यूटर जहां सीमित रूप से शिक्षित तथा धनी लोगों में अपनी बीमारी फैला रहा है,  तो मोबाइल हर वर्ग में मनोविकार पैदा कर रहा है। इस पर विश्लेषण करना जरूरी है।  मोबाइल के बारे में स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य विशेषज्ञ कह चुके हैं कि उसकी गर्मी मनुष्य के मस्तिष्क को विकृत तक कर सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि  देश में लोगों की मनोदशाओं का भी अध्ययन करना अब आवश्यक है। अप्राकृतिक रूप से किये जा रहे अपराधों से निपटने के लिये यह आवश्यक है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

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हैप्पी न्यू ईयर यानि नव वर्ष पर हिंदी व्यंग्य


               वर्ष 2013 आ गया। अनेक लोगों का कहना है की हम भारतीयों   को यह अंग्रेजी वर्ष नहीं मनाना   चाहिए।   खासतौर से यह बात हिन्दू धर्म को कट्टरता से मानने का दावा करने  वालों  की तरफ से कही  जाती है।  मगर इन लोगों का कोई प्रभाव नहीं होता।  आखिर क्यों?  सच बात तो यह है  कि अनेक लोगों की तरह हम भारतीय अध्यात्मवादी लोग  भी उनकी बात को महत्व देते रहे हैं ।  अब लगने लगा है कि  वेलेन्टाईन डे, क्रिस्मस  और न्यू ईयर जैसे अंग्रेजी पर्व भी अब भारतीय समाज का ऐसा हिस्सा बन  गए हैं, जिन्हें अलग करना अब संभव नहीं है।  दरअसल जिन लोगों ने इन पर्वों को हमेशा ही वक्र दृष्टि से देखते हुए अपने धर्म पर दृढ़ रहने का मत व्यक्त किया है वह सामाजिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं।  उन्होंने धार्मिक रूप से कभी अपने देश का अध्ययन नहीं किया।  हालांकि यह लोग अं्रग्रेजी शैली के समर्थक हैं पर वैसा सोच नहीं है।
         कम से कम एक बात माननी पड़ेगी कि अंग्रेजों ने हमारे समाज को जितना समझा उतने अपने ही लोग नहीं समझ पाये।  इन्हीं अंग्रेजों के अखबार ने एक मजेदार बात कही जो यकीनन हम जैसे चिंतकों के लिये रुचिकर थी।  अखबार ने  कहा कि भारत के धर्म पर आधारित संगठन और उनके शिखर पुरुष अपने भक्तों को वैसे ही अपने साथ जोड़े रखते हैं जैसे कि व्यवसायिक कंपनियां। वह अपने संगठन कंपनियों की तरह चलाते हैं कि उनके भक्त समूह बने रहें।
         हमने उनके नजरिये को सहज भाव से लिया।  हम यह तो पहले से मानते थे कि भारत में धर्म के नाम पर व्यापार होता है पर इससे आगे कभी विचार नहंी किया था।  जब यह नजरिया सामने आया तो फिर हमने उसी के आधार पर इधर उधर नजर दौड़ाई।  तब भारतीय धार्मिक संगठनों में वाकई यह गजब की व्यवसायिक प्रवृत्ति दिखाई दी।  जिस तरह देशी विदेशी कंपनियां अपने उत्पादों के विक्रय करने के लिये नयी पीढ़ी को  विज्ञापनों के  माध्यम से आकर्षित करने के अनेक तरह के उपक्रम करती हैं वैसे ही भारतीय धार्मिक संगठन और उनके शिखर पुरुष भी यही प्रयास करते हैं।  भले ही बड़े व्यवसायिक समूहों ने प्रचार माध्यमों से युवा पीढ़ी में  वेलेन्टाईन डे, क्रिस्मस  और न्यू ईयर जैसे अंग्रेजी पर्व अपने लाभ के लिये प्रचलित करने में योगदान दिया है पर भारतीय धार्मिक संगठन और उनके शिखर पुरुष भी इन्हीं पर्वों का उपयोग अपने भक्त समूह को बनाये रखने के लिये कर रहे हैं।  यही आकर इन्हीं पर्वों के विरोधी सामाजिक संगठन तथा कार्यकताओं के लिये ऐसी मुश्किल खड़ी होती है जिसे पार पाना संभव नहीं है।  अनेक मंदिरों में नर्ववर्ष पर विशेष भीड़ देखी जा सकती है।  इतना ही नही मंदिरों में  खास सज्जा भी देखी जा सकती है।  हम जैसे नियमित भक्त तो दिनों के हिसाब से मंदिरों में जाते रहते हैं-जैसे कि सोमवार को शंकर जी तो शनिवार को नवग्रह और मंगलवार को हनुमान जी-अगर कोई खास सज्जा न भी हो तो भी भक्तों को इसकी परवाह नहीं है।  परवाह तो किसी भक्त को नहीं है पर जो लोग इन मंदिरों के सेवक या स्वामी है उन्हें लगता है कि कुछ नया करते रहें ताकि युवा पीढ़ी उनकी तरफ आकर्षित रहे।  वह समाज में कोई नया भाव पैदा करने की बजाय उसमें मौजूद भाव का ही उपयोग करना चाहते हैं।   इतना ही नही इन मंदिरों में जाने पर केाई परिचित अगर बोले कि हैप्पी न्यू इयर तो भला भगवान की दरबार में हाजिरी का निर्मल भाव लेकर गया कौन भक्त अपने अंदर कटुता का भाव लाना चाहेगा।  इतना ही नहीं कुछ संगठित पंथ तो क्रिसमस, वेलेन्टाईन डे और नववर्ष पर अपने शिखर  पुरुषों को इन पर्वों के अवसर पर खास उपदेश भी दिलवाते हैं।
         हम जैसे अध्यात्मिक व्यक्तियों की दिलचस्पी उन विवादों में नहीं होती जिनके आधार कमजोर हों।  जो सामाजिक कार्यकर्ता इन पर्वों को मनाये जाने का विरोध करते हैं वह अपने जीवन में उस पर अमल कर पाते हों यह संदेहपूर्ण है।  जब कोई समाज से जुड़ा है तो वह अपने बैरी नहंी बना सकता।  मान लीजिये हम नहीं मानते पर अगर कोई कह दे कि हैप्पी क्रिसमस, हैप्पी न्यू ईयर या हैप्पी वेलेन्टाईन डे तो क्या उसे लड़ने लगेंगे।  एक बात निश्चित है कि भारत में धर्म के विषय पर आज भी धार्मिक साधु, संतों और प्रवचको की बात अंतिम मानी जाती है।  सामाजिक कार्यकताओं को  इन पर्वो के विरोधी  अभियान के प्रति उनका समर्थन उस व्यापक आधार पर नहीं मिल पता यही कारण है कि इसमें सफलता नहीं मिलती।  हालांकि कुछ साधु, संत और प्रवचक इन सामाजिक कार्यकर्ताओं की बात का समर्थन करते हैं पर वह इतना व्यापक नहीं है।  चूंकि भारतीय धार्मिक संगठन और शिखर पुरुष भी  एक कंपनी की तरह अपने भक्त बनाये रखने की बाध्यता को स्वीकार करते हैं इसलिये वह उनके  तत्वज्ञान धारण करने की बजाय व्यवसायिक योजनाओं में जुटे रहते हैं।  हमारा मानना है कि केवल तत्वज्ञान के आधार पर हमेशा अपने पास भीड़ बनाये रखना कठिन है  और धार्मिक संगठन तथा उनके शिखर पुरुषों में यही बात आत्मविश्वास कम कर देती है।  यह आत्मविश्वास तब   ऋणात्मक स्तर पर पहुंच जाता है जब तत्वज्ञान को धारण करने से ऐसे पंथ या संगठनों के शिखर पुरुष स्वयं ही दूर होते हैं।  अपना नाम और धन जुटाने के चक्कर मे वह सब ऐसे प्रयास करते हैं जैसा कंपनियां करती है।  यही कारण है कि अंग्रेजी पर्व फिलहाल तो समाज में मनाये ही जा रहे हैं क्योंकि कहीं न कहीं धार्मिक तत्व उन्हें समर्थन दे रहे हैं।
          हमारे एक करीबी  मित्र ने सुबह मिलते ही कहा-’’हैप्पी न्यू ईयर!’’
          वह सब जानता था इसलिये हमने उससे कहा कि ‘‘हमारा नया वर्ष तो मार्च में आयेगा।’’
             वह बोला-‘‘यार, तुम कैसे अध्यात्मिकवादी हो।  कम से कम कुछ उदारता दिखाते हुए बोले ही देते कि ‘‘हैप्पी न्यू ईयर’’
    इससे पहले कि हम कुछ बोलते। एक अन्य परिचित आ गये। वह भी अपना हाथ मिलाने के लिये आगे बढ़ाते हुए बोले-‘‘नव वर्ष मंगलमय हो।’
     हमने हाथ बढ़ाते हुए उनसे कहा‘‘आपको भी नववर्ष की बधाई।’
     वह चले तो हमारे मित्र ने हमसे कहा‘‘उसके सामने तुमने अपना अध्यात्मिक ज्ञान क्यों नहीं बघारा।’’
       हमने अपने मित्र से कहा‘‘अपना अध्यात्मिक ज्ञान बघारने के लिये तुम्हीं बहुत हो।  अगर  इसी तरह हर मिलने वाले से नववर्ष पर बधाई मिलने पर ज्ञान बघारने लगे तो शाम तक घर नहीं पहुंचने वाले।’’
          एक धार्मिक शिखर पुरुष ने वेलेन्टाईन डे को मातृपितृ दिवस मनाने का आह्वान किया था।  अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओ को अच्छी लगी पर अनेक लोगों ने यह सवाल किया कि अगर वेलेन्टाईन डे को समाज से बहिष्कृत करना है तो फिर उसका नाम भी क्यों लिया जाये?  तय बात है कि दिन तो वह होना चाहिये पर हमारे हिसाब से मने।  यह बात तो ऐसे ही हो गयी कि मन में लिये कुछ ढूंढ रहा आदमी किसी व्यवसायिक कंपनी के पास न जाकर हमारी धार्मिक कंपनी की तरफ आये।
        हम जैसे योग साधकों और गीता पाठकों को लगता है कि  ऐसे विवाद किसी समाज की दिशा तय नहीं करते।  फिर यह अपने अध्यात्मिक ज्ञान  और सांसरिक विषयों दक्षता के अभाव के कारण आत्मविश्वास की कमी को दर्शान वाला भी है।  चाणक्य, विदुर, कौटिल्य और भर्तुहरि  जैसे महान दर्शनिकों ने हमारे अध्यात्मिक भंडार  ऐसा सृजन किया जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान दोनों है।   तुलसी, सूर, रहीम और मीरा जैसे महानुभावों ने ऐसी रचनायें दी जिसके सामने  दूसरे देशों का साहित्य असहाय नज़र आता है। यह आत्मविश्वास जिसमें होगा वह अंग्रेजी पर्वो के इस प्रभाव से कभी परेशान नहीं होगा।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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