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क्रांति का इंतजार-हिंदी कविता


सावधान!
क्रांति आ रही है
डरना नहीं
तुम्हें कुछ नहीं होगा
क्योंकि तुम आदमी हो
तुम्हारे पास खोने के लिये कुछ नहीं है,
मगर खुश भी न होना
तुम्हारे लिये पाने को भी कुछ नहीं ह
—————-
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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पहाड़ से टूटे पत्थर-हिन्दी व्यंग्य कविता


पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
———–
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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विदुर नीति-धनी के भाग्य में गरीब जैसी भूख नहीं होती (vidur niti-garib aur amir ki bhookh)


सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्र भुंजते सदा।
क्षुत् स्वादुताँ जनयति सा चाढ्येषु सुदुर्लभा।।
हिंदी में भावार्थ-
निर्धन पुरुष सदा ही स्वादिष्ट भोजन करते हैं, क्योंकि भूख उनके भोजन में स्वाद उत्पन्न करती है और ऐसी भूख धनियों के लिये दुर्लभ है।
प्राषेण श्रीमतां भोक्तं शक्तिनं विद्यते।
जीर्वन्यपि हि काष्ठानि दरिद्राणां महीपते।।
हिंदी में भावार्थ-
इस दुनियां में धनियों में भोजन करने की शक्ति नहीं होती जबकि गरीब तो लकड़ी भी पचा जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि जितना शरीर को चलायेंगे उतना ही वह चलेगा। वर्तमान समय में भौतिक सुख साधनों की अति उपलब्धता ने धनी लोगों को शारीरिक परिश्रम से परे कर दिया है और इसलिये उनको बीमारियां भी अधिक होती हैं। अगर ध्यान से देखें तो पता लगेगा कि देश में अमीर लोगों की संख्या भी बढ़ी है- भले ही गरीबों की तुलना में वह कम है-उतनी ही बीमारों की संख्या भी बढ़ी है। हर शहर में फाइव स्टार होटलों की तरह दिखने वाले अस्पताल बने दिख जायेंगे। मधुमेह, उच्चरक्तचाप, हृदय रोग तथा कब्जी जैसी बीमारियां राजयोग मानी जाती हैं और अधिकतर अस्पतालों में इन्हीं के इलाज करने वाले बोर्ड पढ़े जा सकते हैं। उनमें गरीबों को होने वाली बीमारियों की चर्चा कम ही होती है।

वैसे यह भी माया का खेल है कि जिनको भूख लगती है उनके लिये खाना मिलता नहीं क्योंकि वह गरीब परिश्रम से जीविका कमाते हैं और सभी जगह शारीरिक परिश्रम को हेय दृष्टि से देखते हुए उनको कम धन ही दिया जाता है। इसके विपरीत दिमागी श्रम वालों को भुगतान अधिक किया जाता है पर फिर उनको भूख नहीं लगती। शरीर का यह नियम है कि जितना अन्न जल ग्रहण करो उतना ही विसर्जन करो। इस नियम के विपरीत चलना अपने को बीमार बनाना है और इसका इलाज केवल परिश्रम या व्यायाम से ही हो सकता है। दवाईयों का सेवन तो अपने दिमाग को संतोष देने के लिये है। .
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विदुर नीति- भविष्य के लिए घातक विकास से दूर रहें (vidur niti-bhavishya aur vikas)


न वृद्धिबंहु मन्तव्या या वृद्धि क्षयमावहेत्।
क्षयोऽपि बहु मन्तव्यो यः क्षयो वृद्धिमावहेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो विकास या वृद्धि अपने लिये भविष्य में घातक होने होने की आशंका हो उससे अधिक महत्व नहीं देना चाहिये। साथ ही अगर ऐसा पतन या कमी हो रही हो जिससे हमारा अभ्युदय होने की संभावना है तो उसका स्वागत करना चाहिये।
द्वेषो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डित।
प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेष्ये पापानि चैव ह।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य के हृदय में अगर किसी के प्रति द्वेष भाव का निर्माण होता है तो-भले ही वह साधु या विद्वान हो-उसमें दोष ही दोष दिखाई देते हैं। उसी तरह अगर किसी के प्रति स्नेह या प्रेम पैदा हो तो-चाहे भले ही वह दुष्ट और पापी हो- उसमें गुण ही गुण दिखाई देते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक दृष्टा की तरह अगर हम अपने भौतिक स्वरूप देह का अवलोकन करें तो पायेंगे कि सारी दुनियां के प्राणी एक समान हैं पर कुछ लोग ऐसे हैं जिनके प्रति हमारे मन में प्यार या स्नेह होता है उनके दोषों पर हमारा ध्यान नहीं जाता। उसी तरह जिनके प्रति द्वेष या नाराजी है उनमें कोई गुण हमें दिखाई नहीं देता-कभी कभी ऐसा होता है कि उनका कोई गुण हमारे दिमाग में आता भी है तो उसे अपने चिंतन से जबरन दूर हटाने का प्रयास करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि हमारा मन और मस्तिष्क हमारी पूरी देह पर नियंत्रण किये रहता है। इसका आभास तभी हो सकता है जब योग साधना और ध्यान के द्वारा हम अपने अंदर बैठे दृष्टा के दृष्टिकोण को आत्मसात करें।
नीति विशारद विदुर यह भी कहते हैं कि हमें अपने आसपास हो रहे भौतिक तत्वों में विकास या वृद्धि बहुत अच्छी लगती है पर उनमें से कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो भविष्य में हमारे लिये घातक हों उसी तरह उनमें पतन या कमी ऐसी भी हा सकती है जो अच्छा परिणाम देने वाली हो। अतः अपने अंदर समबुद्धिरूप से विचार करने की शक्ति विकसित करना चाहिये।
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ब्रेकिंग न्यूज (हास्य व्यंग्य)


चंदा लेकर समाज सेवा करने वाली उस संस्था के समाजसेवी बरसों तक अध्यक्ष रहे। पहले जब वह युवा थे तब उनके बाहूबल की वजह से लोग उनको चंदा खूब देते थे। समाज सेवा के नाम पर वह कहीं मदद कर फोटो अखबारों में छपवाते थे। वैसे लोगों को मालुम था कि समाज सेवा तो उनका बहाना है असली उद्देश्य कमाना है मगर फिर भी कहने की हिम्मत कोई नहीं करता था और हफ्ता वसूली मानकर दान देते थे। समाजसेवी साहब अब समय के साथ वह बुढ़ाते जा रहे थे और इधर समाज में तमाम तरह के दूसरे बाहूबली भी पैदा हो गये थे तो चंदा आना कम होता जा रहा था। समाजसेवी के चेले चपाटे बहुत दुःखी थे। उनकी संस्था के महासचिव ने उनसे कहा कि ‘साहब, संस्था की छबि अब पुरानी पड़ चुकी है। कैसे उसे चमकाया जाये यह समझ में नहीं आ रहा है।’

सहसचिव ने कहा कि -‘इसका एक ही उपाय नजर आ रहा है कि अपने संगठन में नये चेहरे सजाये जायें। अध्यक्ष, सचिव और सहसचिव रहते हुए हमें बरसों हो गये हैं।

महासचिव घबड़ा गया और बोला-‘क्या बात करते हो? तुम समाजसेवी साहब को पुराना यानि बूढ़ा कह रहे हो। अरे, हमारे साहब कोई मुकाबला है। क्या तुम अब अपना कोई आदमी लाकर पूरी संस्था हड़पना चाहते हो?’
समाज सेवी ने महासचिव को बीच में रोकते हुए कहा-‘नहीं, सहसचिव सही कह रहा है। अब ऐसा करते हैं अपनी जगह अपने बेटों को बिठाते हैं।
महासचिव ने कहा-‘पर मेरा बेटा अब इंजीनियर बन गया है बाहर रहता है। वह भला कहां से आ पायेगा?
सहसचिव ने कहा-‘मेरा बेटा तो डरपोक है। उसमें किसी से चंदा वसूल करने की ताकत नहीं है। फिर लिखते हुए उसे हाथ कांपते हैं तो खाक लोगों को रसीद बनाकर देगा?’
समाजसेवी ने कहा-‘ इसकी चिंता क्यों करते हो? मेरा बेटा तो बोलते हुए हकलाता है पर काम तो हमें ही करना है। हां, बस नाम के लिये नया स्वरूप देना है।’
सहसचिव ने कहा-‘पर लोग तो आजकल सब देखते हैं। प्रचार माध्यम भी बहुत शक्तिशाली हैं। किसी ने संस्था के कार्यकलापों की जांच की तो सभी बात सामने आ जायेगी।’

समाजसेवी ने कहा-‘चिंता क्यों करते हो? यहां के सभी प्रचार माध्यम वाले मुझे जानते हैं। उनमें से कई लोग मुझसे कहते हैं कि आप अब अपना काम अपने बेटे को सौंपकर पर्दे के पीछे बैठकर काम चलाओ। वह चाहते हैं कि हमारी संस्था पर समाचार अपने माध्यमों में दें लोग पूरानों को देखते हुए ऊब चूके हैं। उल्टे प्रचार माध्यमों को तो हमारी संस्था पर कहने और लिखने का अवसर मिल जायेगा। इसलिये हम तीनों संरक्षक बना जाते हैं और अपनी नयी पीढ़ी के नाम पर अपनी जिम्मेदारी लिख देते है। अरे, भले ही महासचिव का लड़का यहां नहीं रहता पर कभी कभी तो वह आयेगा। मेरा लड़का बोलते हुए हकलता है तो क्या? जब भी भाषण होगा तो संरक्षक के नाम पर मैं ही दे दूंगा। सहसचिव के लड़के का लिखते हुए हाथ कांपता है तो क्या? उसके साथ अपने क्लर्क भेजकर काम चलायेंगे लोगों को मतलब नयी पीढ़ी के नयेपन से है। काम कैसे कोई चलायेगा? इससे लोग भी कहां मतलब रखते हैं? जाओ! अपनी संस्था के सदस्यों को सूचित करो कि नये चुनाव होंेगे। हां, प्रचार माध्यमों को अवश्य जानकारी देना तो वह अभी सक्रिय हो जायेंगे।’

सहसचिव ने कहा-‘यह नयी पीढ़ी के नाम जिम्मेदारी लिखने की बात मेरे समझ में तो नहीं आयी।’
महासचिव ने कहा-‘इसलिये तुम हमेशा सहसचिव ही रहे। कभी महासचिव नहीं बना पाये।’
समाजसेवी ने महासचिव को डांटा-‘पर तुम भी तो कभी अध्यक्ष नहीं बन पाये। अब यह लड़ना छोड़ो। अपनी नयी पीढ़ी को एकता का पाठ भी पढ़ाना है भले ही हम आपस में लड़ते रहे।’
सहसचिव ने कागज उठाया और लिखने बैठ गया। महासचिव ने फोन उठाया और बात करने लगा-‘यह टूटी फूटी खबर है ‘मदद संस्था में नयी पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपी जायेगी।’
समाजसेवी ने पूछा-‘यह टूटी फूटी खबर क्या है?‘
महासचिव ने कहा-‘ब्रेकिंग न्यूज।’
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संत कबीर के दोहे: जीवन ऐसे ही जैसे समुद्र में नाव


अहं अगनि हिरदै, जरै, गुरू सों चाहै मान
जिनको जम नयौता दिया, हो हमरे मिहमान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब किसी मनुष्य में अहंकार की भावना जाग्रत होती है तो वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहता है। ऐसी प्रवृत्ति के लोग अपने देह को कष्ट देकर विपत्तियों को आमंत्रण भेजते हैं और अंततः मौत के मूंह में समा जाते हैं।

कबीर गर्व न कीजिये, रंक न हंसिये कोय
अजहूं नाव समुद्र में, ना जानौं क्या होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी उपलब्धियौं पर अहंकार करते हुए किसी निर्धन पर हंसना नहीं चाहिए। हमारा जीवन ऐसे ही जैसे समुद्र में नाव और पता नहीं कब क्या हो जाये।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अहंकार आदमी का सबसे बड़ा शत्रू होता है। कुछ लोग अपने गुरू से कुछ सीख लेकर जब अपने जीवन में उपलब्धियां प्राप्त कर लेते हैं तब उनमें इतना अहंकार आ जाता है कि वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहते हैं। वैसे आजकल के गुरू भी कम नहीं है वह ऐसे ही शिष्यों को सम्मान देते हैं जिसके पास माल टाल हो। यह गुरू दिखावे के ही होते हैं और उन्होंने केवल भारतीय अध्यात्म ग्रंथों की विषय सामग्री को रट लिया होता है और जिसे सुनाकर वह अपने लिये कमाऊ शिष्य जुटाते हैं। गरीब भक्तों को वह भी ऐसे ही दुत्कारते हैं जैसे कोई आम आदमी। कहते सभी है कि अहंकार छोड़ दो पर माया के चक्कर में फंस गुरू और शिष्य इससे मुक्त नहीं हो पाते। ऐसे में यह विचार करना चाहिए कि हमारा जीवन तो ऐसे ही जैसे समुद्र के मझधार में नाव। कब क्या हो जाये पता नहीं। माया का खेल तो निराला है। खेलती वह है और मनुष्य सोचता है कि वह खेल रहा है। आज यहां तो कल वहां जाने वाली माया पर यकीन नहीं करना चाहिए। इसलिये अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति को सम्मान देने का विचार मन में रखें तो बहुत अच्छा।

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कुछ लोग खो गए इस शहर की भीड़ में-व्यंग्य कविता


अपने कुछ लोग खो गए
इस शहर की भीड़ में
उनके पते लिखे हैं
बहुत से कागजों पर
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में

किसे ढूंढें और क्यों
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
किसी से मिलने की वजह
चाहिए हमको
जाएं मिलने तो वह भी
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
समय निकला जाता है
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में

अपने ही जाल में उलझे लोग
फुरसत नहीं पाते
जीवन की इस भागमभाग से
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
कब ले सकते हैं दिल से काम
नहीं आता समझ में
खोये हुए है लोग
अपनी समस्याओं की भीड़ में

हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
जो छोड़ नहीं पाते उसको
डरते हैं अपनी तन्हाई से
जीतने की क्या सोचेंगे वह
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
अकेले में अपने पहचाने का डर
उनके मन में रहता है
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में

अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
वहाँ हाँफते और कांपते
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
कभी हमारे तन्हाई पर भी
हँसते हैं दूसरों के साथ
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
पर हम भी हँसते हैं
साथी है हमारी यह तन्हाई
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में

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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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संत कबीर संदेशः भक्ति कभी निष्फल नहीं जाती


भक्ति बीज पलटै नहीं जो जुग जाय अनन्त
ऊंच नीच घर अवतरै, हो संत का अन्त

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य द्वारा की गयी निष्काम भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। भक्त चाहे जिस जाति या वर्ण को हो और लोग उनमें भी ऊंच नीच का भेद भले ही करें पर परमात्मा का हर सच्चा भक्त तो संत ही होता है।

भक्ति भाव भादौं नदी, सबै चली घहराय
सरिता सोई सराहिये, जेठ मास ठहराय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो लोग भादों में बहने वाली नदी की तरह केवल विशेष समय पर ही भक्ति करते हैं उनको भक्त नहीं माना जा सकता। जो लोग हर समय भक्ति में लीन रहते हैं वही सच्चे भक्त है क्योंकि वह उसी नदी की तरह पूज्यनीय हैं जो जेठ माह में जल प्रदान करती है जब प्रथ्वी पर जल की कमी हो जाती है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कई लोग ऐसे हैं जो अपनी मनोकामनायें लेकर धार्मिक स्थलों पर जाते हैं। वह यह प्रण करते हैं कि अमुक काम होने पर वह फिर आयेंगे। या फिर घर बैठे ही तय करते हैं कि यह इच्छा पूरी हो जाये तो अमुक धार्मिक स्थान पर जाकर दर्शन करेंगे। यह भक्ति नहीं बल्कि अपने आपको ही धोखा देना है। इस मायावी संसार में अगर मनुष्य ने जन्म लिया है तो उसे अनेक काम तो स्वतः ही पूरे हो जाते हैं क्योंकि करतार तो कोई और है पर मनुष्य अपने होने का भ्रम पाल लेता है। ऐसी कामनायें और इच्छा पूरी होने पर वह दर्शन करने ऐसे जाता है जैसे कि वह परमात्मा को फल दे रहा हो। ऐसी भक्ति केवल नाटक बाजी तो आजकल अधिक देखने को मिलती है। यह भक्ति नहीं है क्योंकि कामनाओं का क्या? एक पूरी होती है तो दूसरे जन्म लेती है। भक्ति तो निष्काम होती है और आदमी का समय अच्छा या बुरा हो वह उसे नहीं छोड़ता।
उसी तरह मनुष्य भले ही जात पांत या धर्म का भेद करता है पर जो भी परमात्मा की निष्काम भक्ति करता है वह संत है।
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संत कबीर सन्देश:अपनी योग्यता सभी जगह न प्रकट करें


हीरा तहां न खोलिए,जहां खोटी है हाट
कसि करि बांधो गठरी, उठि चालो बाट

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि अगर अपनी गांठ में हीरा है तो उसे वहां मत खोलो जहां बाजार में खोटी मनोवृत्ति के लोग घूम रहे हैं। उस हीरे को कसकर अपनी गांठ में बांध लो और अपने मार्ग पर चले जाओ।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीर दास जी ने यह बात व्यंजना विद्या में कही हैं। इसका सामान्य अर्थ तो यह है कि अपनी कीमती वस्तुओं का प्रदर्शन वहां कतई मत करो जहां बुरी नीयत के लोगों का जमावड़ा है। दूसरा इसका गूढ़ आशय यह है कि अगर आपके पास अपना कोई ज्ञान है तो उसे सबके सामने मत बघारो। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आपकी बात सुनकर अपना काम चलायेंगे पर आपका नाम कहीं नहीं लेंगे या आपके ज्ञान का मजाक उड़ायेंगे क्योंकि आपके ज्ञान से उनका अहित होता होगा। अध्यात्म ज्ञान तो हमेशा सत्संग में भक्तों में ही दिया जाना चाहिए। हर जगह उसे बताने से सांसरिक लोग मजाक उड़ाने लगते हैं। समय पास करने के लिये कहते हैं कि ‘और सुनाओ, भई कोई ज्ञान की बात’।
अगर कोई तकनीकी या व्यवसायिक ज्ञान हो तो उसे भी तब तक सार्वजनिक न करें जब तक उसका कोई आर्थिक लाभ न होता हो। ऐसा हो सकता है कि आप किसी को अपने तकनीकी और व्यवसायिक रहस्य से अतगत करायें और वह उसका उपयोग अपने फायदे के लिये कर आपको ही हानि पहुंचाये।
इतना ही नहीं कई जगह हम अपनी किसी खास योग्यता या विशेषता के बारे में लोगों को अहंकार में आकर बता देते हैं परिणाम यह होता है कि लोग उससे संबंधित काम बिना किसी लाभ के लिये कहने को कहने लगते हैं और मना करने पर उनसे बैर हो जाता है और फिर अनावश्यक रूप अपनी बदनाम होती है।
अक्सर आदमी सामान्य बातचीत में अपने जीवन और व्यवसाय का रहस्य उजागर कर बाद में पछताते हैं। कबीरदास जी के अनुसार अपना कीमती सामान और जीवन के रहस्यों को संभाल कर रखते हुए किसी के सामने प्रदर्शित करना चाहिए।
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टंकी पर चढने का रिवाज पुराना हो ग्या-हास्य कविता


टंकी पर चढ़ गया आशिक
यह कहते हुए कि
‘जब तक माशुका शादी के लिये
राजी नहीं होगी
वह नीचे नहीं आयेगा
अधिक देर लगी तो कूद जायेगा’

शोर मच गया चारों तरफ
भीड़ में शामिल माशुका पहले घबड़ायी
और और बोली
‘आ जा नीचे ओ दीवाने
मैंने अपनी शादी का कार्ड भी छपवा लिया है
देख इसे
पर ऐसा तभी होगा, जब तू नीचे आयेगा’

वह दनदनाता नीचे आया
माशुका के हाथ से लिया कार्ड
उसमें दूल्हे की जगह
किसी और का नाम था
आशिक चिल्लाया
‘यह तो धोखा है
मैं चलता हूं फिर ऊपर
अब तो मेरा शव ही नीचे आयेगा‘

वह खड़े लोगों ने उसे पकड़ लिया तो
माशुका ने कहा
‘ऐ आशिक
बहुत हो गया है
इश्क में टंकी पर चढ़कर
वहां से कूदने के नाटक का रिवाज
नहीं चलता आज
चढ़े बहुत हैं ऊपर
पर नीचे कोई नहीं आया
भले ही किसी ने नहीं मनाया
नशा उतर गया तो सभी नीचे आये
कर अब कोई नया ईजाद तरीका
तभी तू अशिकों के इतिहास में
अपना नाम लिखा पायेगा

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संत कबीर संदेशः तंबाकू के सेवन से हृदय में मलिनता उत्पन्न होती है


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि
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हुक्का तो सोहै नहीं, हरिदासन के हाथ
कहैं कबीर हुक्का गहै, ताको छोड़ो साथ

इसका आशय यह है कि परमात्मा के सच्चे भक्तों के हाथ में हुक्का शोभा नहीं देता। जो व्यक्ति हुक्का पीते हैं उनका साथ ही छोड़ देना चाहिये।
भौंडी आवै बास मुख, हिरदा होय मलीन
कहैं कबीरा राम जन, मांगि चिलम नहिं लीन

आशय यह है कि जो चिलम आदि का सेवन करते हें उनके मूंह से गंदी बास आती है और उनका हृदय भी मलिन होता है। उनकी संगत न करना चाहिये और न उनसे ऐसी व्यसनों की सामग्री मांगना चाहिये।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-चाहे कितना भी कोई अपनी भक्ति का दिखावा करे पर अगर वह तंबाकू, सिगरेट और चिलम का सेवन करता है तो उसका विश्वास नहीं करना चाहिये। अब तो लोगों के लिये भक्ति भी एक तरह का फैशन हो गया है। कहीं भी किसी जगह धार्मिक मेले में जाईये वहां तंबाकू के पाउच बिकते मिल जायेंगे। वहां लोग खरीद कर उसका सेवन करते हैं। वह भले ही कहते हों कि वह तो भगवान के भक्त है पर अपने मन को खुश करने के लिये जब उनको तंबाकू वाले व्यसन जैसे सिगरेट या पाउच की जरूरत पड़ती है तो इसका आशय यह है केवल भक्ति से उनको राहत नहीं मिलती। यह उनकी मानसिक कमजोरी का परिचायक है। जो परमात्मा की सच्ची भक्ति करते हैं उनको ऐसी चीजों की आवश्यकता नहीं होती। वह तो भक्ति से ही अपने मन को सदैव प्रसन्न रखते हैं।

श्रीगीता में कहा गया है कि गुण ही गुणों को बरतते हैंं। जो लोग तंबाकू आदि का सेवन करते हैं तो उनके मूंह से बदबू आती है। इसका आशय यह है कि वह बदबू उनके शरीर में बैठी है और मन और मस्तिष्क को प्रभावित कर रही है। ऐसे में विचारों के केंद्र बिंदू मस्तिष्क में अच्छे विचार कैसे आ सकते हैं। क्या हम कहीं किसी गंदी गली से निकलते हैं तो हमारे मूंह में क्रोध या नाराजगी के भाव नहीं आते? फिर जो मस्तिष्क उस गंदी बदबू को झेल रहा है कैसे अच्छे विचार कर सकता है। इसलिये ऐसे लोगों के साथ भी नहीं रहना चहिये क्योंकि वह किसी तरह से सहायक नहीं होते।
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दर्द और मदद की कोई जाति नहीं होती-लघु कहानी


वह हादसे में घायल होकर सड़क पर गिर पड़ा ह था। उसके चारों और लोग आकर खड़े हो गये। वह चिल्लाया-‘मेरी मदद करो। मुझे इलाज के लिये कहीं ले चलो।’
लोग उसकी आवाज सुन रहे थे पर बुतों की तरह खड़े थे। उनमें चार अक्लमंद भी थे। एक ने कहा-‘पहले तो तुम अपना नाम बताओ ताकि धर्म,जाति और भाषा से तुम्हारी पहचान हो जाये।

वह बोला-‘मुझे इस समय कुछ याद आ नहीं आ रहा है। मैं तो केवल एक घायल व्यक्ति हूं और अपने होश खोता जा रहा हूं। मुझे मदद की जरूरत है।
एक अक्लमंद बोला-‘नहीं! तुम्हारो साथ जो हादसा हुआ है वह केवल तुम्हारा मामला नहीं है। यह एक राष्ट्रीय मसला है और इस पर बहस तभी हो पायेगी जब तुम्हारी पहचान होगी। तुम्हारा संकट अकेले तुम्हारा नहीं बल्कि तुम्हारे धर्म, जाति और भाषा का संकट भी है और तुम्हें मदद का मतलब है कि तुम्हारे समाज की मदद करना। इसके लिये तुम्हारी पहचान होना जरूरी है।’

यह सुनते हुए उस घायल व्यक्ति की आंखें बंद हो गयीं। कुछ लोगों ने उसकी तरफ मदद के लिये हाथ बढ़ाने का प्रयास किया तो उनमें एक अक्लमंद ने कहा-‘नहीं, जब तक यह अपना नाम नहीं बताता तब तक इसकी मदद करो। हम मदद करें पर यह तो पता लगे कि किस धर्म,जाति और भाषा की मदद कर रहे हैं। ऐसी मदद से क्या फायदा जो किसी व्यक्ति की होती लगे पर उसके समाज की नहीं।

उसी भीड़ को चीरता हुए एक व्यक्ति आगे आया और उस घायल के पास गया और बोला-‘चलो घायल आदमी! मैं तुम्हें अपनी गाड़ी में बिठाकर अस्पताल लिये चलता हूं।’
उस घायल ने आंखें बंद किये हुए ही उस आदमी के कंधे पर हाथ रखा और उठ खड़ा हुआ। अक्लमंद ने कहा-‘तुम इस घायल की मदद क्यों कर रहे हो? तुम कौन हो? क्या इसे जानते हो?’

उस आदमी ने कहा-‘मैं हमदर्द हूं। कभी मैं भी इसी तरह घायल हुआ था तब सारे अक्लमंद मूंह फेर कर चले गये थे पर तब कोई हमदर्द आया था जो कहीं इसी तरह घायल हुआ था। घायल की भाषा पीड़ा है और जाति उसकी मजबूरी। उसका धर्म सिर्फ कराहना है। इसका इलाज कराना मुझ जैसे हमदर्द के लिये पूजा की तरह है। अब हम दोनों की पहचान मत पूछना। घायल और हमदर्द का समाज एक ही होता है। आज जो घायल है वह कभी किसी का हमदर्द बनेगा यह तय है क्योंकि जिसने पीड़ा भोगी है वही हमदर्द बनता है। भलाई और मदद की कोई जाति नहीं होती जब कोई करने लगे तो समझो वह सौदागर है।’
ऐसा कहकर उसको चला गया।
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रहीम सन्देश: दिल से काम करें तो इन्सान क्या भगवान बस में होते हैं


रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय

कविवर रहीम के मतानुसार मन लगाकर कोई काम कर देखें तो कैसे सफलता मिलती है। अगर अच्छी नीयत से प्रयास किया जाये तो नर क्या नारायण को भी अपने बस में किया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-लोग बहुत जल्दी सफलता हासिल करना चाहते हैं। काम में मन कम उससे होने वाली उपलब्धि पर अधिक दृष्टि रखते हैं यही कारण है कि उनको सफलता नहीं मिलती। भक्ति हो या सांसरिक काम उसमें मन लगाकर ही आदमी कोई उपलब्धि प्राप्त कर सकता है। अधिकतर लोग अपना काम करते हुए केवल इस बात की चिंता करते हैं कि उससे उनको क्या मिलेगा? जो भक्ति करते हैं वह सोचते हैं कि भगवान बस तत्काल उनका काम बना दें। मन भक्ति में कम अपने काम में अधिक होता है। न उनको इससे भक्ति का लाभ होता है और न काम बनने की संभावना होती है। भक्ति में काम का भाव और जो काम है उससे करने की बजाय भगवान की भक्ति में लगने से दोनों में उनकी सफलता संदिग्ध हो जाती है और फिर ऐसा करने वाले लोग अपनी नाकामी का दोष दूसरों को देते हैं।

अगर मन लगाकर भक्ति या सांसरिक काम किया जाये तो उसमें सफलता मिलती है। आदमी क्या भगवान भी बस में किये जा सकते हैं।
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रहीम संदेशः राम का नाम मूंह में धोखे से भी आ जाये तो मिलती है परमगति


रहिमन धोखे भाव से, मुख से निकले राम
पावत पूरन परम गति, कामादिक कौ धाम

कविवर रहीम कहते हैं कि अगर धोखे से भी किसी के मुख में राम का नाम आ जाये तो उसे परमगति प्राप्त होती है भले ही वह व्यक्ति काम के धाम का रहने वाला हो।

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि
जहां काम आवै सुई, कहा करै तलवारि

कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े आदमी को देखकर छोटे की अपेक्षा न करें क्योंकि समय का पता नहीं कब किसकी आवश्यकता पड़ जाये। जहां सुई की आवश्यकता होती है वहां तलवार काम नहीं आती-यह बात ध्यान में रखना चाहिये।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भगवान की भक्ति का भाव अगर एक बार भी हृदय में उपस्थित हो जाये तो आदमी को महान सुख की प्राप्त होती है। रहीम जी का यह कहना कि एक बार भी धोखे से मूंह में राम का नाम आ जाये तो आदमी को परमगति प्राप्त होती है-एकदम सत्य है। उनका आशय यही है कि आदमी कभी एक बार भी हृदय से भगवान का नाम स्मरण करे तो उसे पुण्य प्राप्त होता है। वैसे लेने को तो कई लोग राम का नाम लेते हैं पर वह उनके हृदय से नहीं निकलता। उनके लिये यह केवल एक शब्द है नाम नहीं। मुख से राम शब्द निकलने का तात्पर्य यही है कि वह हृदय से निकलकर आता हो। राम के नाम की महिमा अपरंपार है इसे वही समझ सकते हैं जो उनकी भक्ति करते हैं।

अक्सर हमारे सामने कोई विशिष्ट व्यक्ति आता है तब हम अपने पास मौजूद स्थित सामान्य आदमी की अपेक्षा कर देते हैं यह सोचकर कि उसका कोई महत्व नहीं हैं। देखा जाये तो यहां कोई न विशिष्ट है न सामान्य। हर व्यक्ति की समयानुसार उपयोगिता होती है। जिन्हें हम विशिष्ट समझकर उनकी सेवा जीवन भर करते हैं वह हमारे किसी काम के नहीं होते जबकि जो छोटे लोग हैं उनमें हमारा प्रतिदिन काम पड़ता है। कथित विशिष्ट लोग तो कई बार काम की मना भी कर देते हैं और कई विशिष्ट तो हमारे साथ इसलिये संपर्क रखते हैं कि वह समाज में अपनी विशिष्टता का बोध सभी लोगों को कराते रहें कि देखो हमारे पीछे बहुत से लोग हैं-हमारा जीवन हमेशा छोटी घटनाओं और कर्मों के साथ ही आगे बढ़ता है जिसमें छोटे आदमी की आवश्यकता ही अधिक होती है। इसलिये किसी के साथ व्यवहार करते उसे छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिये।
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संत कबीर संदेशः राम नाम का महत्व जाने बिना जपने से लाभ नहीं (ram nam ka mahatva-kabir ke dohe)


राम नाम जाना नहीं, जपा न अजपा जाप
स्वामिपना माथे पड़ा, कोइ पुरबले पाप

संत कबीरदास जी कहते हैं कि राम नाम को महत्व जाने बिना उसे जपना तो न जपने जैसा ही है क्योंकि जब तक मस्तिष्क पर देहाभिमान की छाया है तब तक अपने पापों से छुटकारा नहीं मिल सकता।

कबीर व्यास कथा कहैं, भीतर भेदे नाहिं
औरों कूं परमोधतां, गये मुहर का माहिं

कबीरदास जी का यह आशय है कि सभी को वेदव्यास रचित ग्रथों का ाान देने वाले स्वयं ही आत्मा और परमात्मा का भेद नहीं जानते इसलिये उनकी बातों का प्रभाव श्रोताओं पर नहीं होता। वह दूसरों को उपदेश तो बहुत देते हैं परंतु स्वयं धन एकत्रित कर पतन की गर्त में गिर जाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-राम का नाम जपने वाले ढेर सारे हैं पर वह केवल दिखावा करते हैं। राम के नाम का महत्व समझे बिना उसे जपना न जपने के ही बराबर है। भगवान श्रीराम के चरित्र को मन में धारण कर उन पर निरंतर मनन और चिंतन करने से राम के नाम का महत्व समझा जा सकता है। नित्य एकाग्रचित होकर उनका जाप किया जाये तो स्वयं ही मन के विकास दूर होने लगते हैं। यदि राम का नाम वाणी से जपते रहें और मन में माया के विचारों का चक्र घूमता रहे तो इसका आशय यह है कि राम का नाम धारण नहीं किया गया। कई लोग ऐसे हैं जो केवल राम का नाम दिखावे के लिये जगते हैं । आखें बंद कर राम का नाम जपते हुए एक आंख खोलकर देखते हैं कि उनके आसपास क्या हो रहा है? ऐसे लोग दूसरों को नहीं बल्कि अपने आपको धोखा देते हैं।

वेद व्यास रचित महाग्रंथों की कथायें कहने वाले अनेक लोग हैं जो लोगों के बीच जाकर कथित रूप से धर्म प्रचार करते हैं पर यह उनका धार्मिक अभियान नहीं बल्कि व्यवसाय होता है। आत्मा और परमात्मा के भेद को वह बयान जरूर करते हैं पर एक तोते की तरह, जबकि तत्व ज्ञान को वह धारण नहीं किये होते। कहने को किसी ने अपनी पीठ बना ली है पर वह अपने और परिवार के लिये संपत्ति बनाने के अलावा उनका कोई उद्देश्य नहीं होता। ऐसे लोगों को सुनना तो चाहिये पर उनका सुनकर स्वयं अपना ध्यान और मनन कर ज्ञान को धारण करें तो ठीक रहेगा। उनको गुरु न मानकर अपने स्वाध्याय को अपना गुरु बनायें।

कोई ढोंगी हो या पाखंडी यह तो समझ में आ जाता है पर उन पर अधिक विचार न कर हमें अपना ध्यान अपने इष्ट के स्मरण और ध्यान पर लगाना चाहिये। आत्मिक शांति के लिये भक्ति मन में होना आवश्यक है और उसका दिखावा करने का भाव जब हमारे अंदर आता है तो समझ लें कि हमारे किये कराये पर पानी फिर रहा है। यह एकांत साधना है और इस पर किसी से अधिक चर्चा करना ठीक नहीं है। अंदर अपने इष्ट का ध्यान कर जो आनंद प्राप्त होता है उसकी तो बस अनुभूति ही की जा सकती है।

आज रामनवमी के अवसर पर समस्थ पाठकों, ब्लाग लेखक मित्रों और सहृदय धार्मिक सज्जनों को बधाई। यह पर्व समस्त समाज के जीवन में खुशियां बिखेरे ऐसी कामना सभी को करना चाहिये।

संपादक-दीपक भारतदीप
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