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फरिश्तों का राज, प्रजा इंसान-हिन्दी लधु कथा व्यंग्य (farishton ka rajya, praja insan-hindi laghkatha vyangya)


          एक इंसान ने पर्वत की ऊंचाई की तरफ कई पत्थर उछाल कर फैके। उस पर्वत पर फरिश्तों का समूह बैठता था जो नीचे रहने वाले इंसानों के भाग्यविधाता थे। यह अलग बात है कि वह जुटाता ते मक्खन खाने का सामान था पर नीचे इंसानों के पास सूखी रोटी भेजता था ।
          उस इंसान ने कई पत्थर फैंके तो एक पत्थर फरिश्तों की सभा के बीच गिर ही गया। इस पर वहां हाहाकार मच गया। हमेशा वाह वाह सुनने और गपशप के आदी फरिश्तों को ऐसे पत्थर झेलने की आदत नहीं थी। उनको यह पता था कि नीचे से किसी इंसान की इतनी न हिम्मत है न औकात कि उन पर पत्थर तो क्या लकड़ी का टुकड़ा भी फैंक सके। इंसान को भूखा रखा तो ठीक और रोटी का झूठा टुकड़ा तो भी ठीक! अगर वह फरिश्ता जाति का नहीं है तो जिंदा क्या मरा क्या?
           पत्थर के टुकड़े इस तरह गिरना वहां सनसनीखेज खबर जैसा था। सारे फरिश्ते टीवी के सामने चिपक गये कि देखें आगे क्या होता है? यहां तक कि इंसानों में भी ब्रेकिंग खबर फैल गयी तो वह भी ऊपर ताक रहे थे कि कहीं से कोई फरिश्ता तो पत्थर की चोट खाकर नीचे तो नहीं टपक रहा।
          फरिश्तों ने आकाश की तरफ देखा। वहां ऐसा कोई संकेत मौजूद नहंी था कि पत्थर वहां से फैंका गया हो। फरिश्तों ने जांच शुरु की। खुफिया एजेंसी के मुखिया को तलब किया गया। फरिश्तों के प्रधान ने इस पर चिंता जताई। खुफिया संस्था के मुखिया ने बताया कि यह अंतरिक्ष के जीवों की साजिश का परिणाम है। कुछ एलियन धरती पर घूमते हैं तो कभी पर्वत पर भी चले आते हैं। इनमें कोई मौका मिलते ही पत्थर फैंक गया होगा।
           जांच जारी थी कि एक पत्थर फिर आ गिरा। अब नीचे झांका गया तो एक आदमी पर्वत की तरफ पत्थर उछाल रहा था।
          एक फरिश्ते ने जाकर अपने प्रधान को बताया कि-‘‘साहब, एक इंसान हमारी तरफ पत्थर फैंक रहा है। वह कह रहा है कि ‘तुम फरिश्ते इसलिये कहलाते हो क्योंकि मेरे जैसे इंसान नीचे रहते हैं। अगर हम न हों तुम फरिश्ते नहीं कहला सकते। आखिर हमारी तरह तुम्हें भी तो दो पांव, दो हाथ, दो आंख, एक नाक, एक मुख और दो कान हैं। अब तुम कर्तव्य विमुख हो रहे हो। हमारे साथ न्याय नहंी कर रहे हो’ इसलिये हम तुम्हें पहाड़ से उतारकर अपनी जमात में बिठायेंगे।’’
            फरिश्तों के प्रधान ने अपने सचिव से कहा-‘‘जाओ, उसे लाकर कहीं अपने पर्वत पर बसा दो। अपनी बिरादरी में शामिल करने से वह हमारी लिये वफादार हो जायेगा।’’
           सचिव ने कहा-‘‘महाराज! इस तरह हम अनेक इंसानों को ऊपर ला चुके हैं। सभी के सभी हरामखोर हैं। हमने जब उनसे कहा कि इस इंसान को रोको तो कोई मधुमेह की बीमारी का बहाना कर घर में घुस गया तो कोई दिल के दौरे की नाम लेकर अस्पताल में दाखिल हो गया। अब यह इंसान यहां मत लाईये।’
          फरिश्तों के प्रधान ने कहा‘‘मूर्ख! यह बगावत रोकने का तरीका है। इस समय वह एक इंसान पत्थर फैंकता रहा तो दूसरे भी फैंकने लगेंगे। धरती पर बरसों में कोई एक क्रांतिकारी पैदा होता है। जो इंसान पहले आये वह सब बूढें हो गये हैं। यह जवान है इसलिये उसे बुलाकर बसा लो। सुरा, सुंदरी और संपत्ति की चाशनी में डुबो दो। फिर कोई दूसरा करता है तो यह उसे कुचलने के काम आयेगा।’
           सचिव उस इंसान को पर्वत पर ले आया। एक फरिश्ते ने उससे कहा कि ‘‘अब तुम हमारे आदमी हो। यहां कोई बगावत मत करना।’
           उस इंसान ने कहा-‘मेरा काम हो गया। अब क्या मैं पागल हूं कि बगावत करूंगा। इस पर्वत पर और नीचे प्रचार में मेरा नाम आ गया। यहां सुरा और सुंदरी के साथ संपत्ति मिलेंगे। तब काहे की बगावत!’’
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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इन्सान और सर्वशक्तिमान-हास्य व्यंग्य (bhagvan aur insan-hindi hasya vyangya


सर्वशक्तिमान ने एक नया इंसान तैयार किया और उसे धकियाने से पहले उसके सभी अंगों का एक औपचारिक परीक्षण किया। आवाज का परीक्षण करते समय वह इंसान बोल पड़ा-‘महाराज, नीचे सारे संसार का सारा ढर्रा बदल गया है और एक आप है कि पुराने तरीके से काम चला रहे हैं। अब आप इंसानों का भी पंख लगाना शुरु कर दीजिये ताकि कुछ गरीब लोग धनाभाव के कारण आकाश में उड़ सकें। अभी यह काम केवल पैसे वालों का ही रह गया।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘पंख दूंगा तो गरीब क्या अमीर भी उड़ने लगेंगे। बिचारे एयरलाईन वाले अपना धंधा कैसे करेंगे? फिर पंख देना है तो तुम्हें इंसान की बजाय कबूतर ही बना देता हूं। मेरे लिये कौनसा मुश्किल काम है?
वह इंसान बोला-‘नहीं! मैं इंसान अपने पुण्यों के कारण बना हूं इसलिये यह तो आपको अधिकार ही नहीं है। जहां तक पंख मिलने पर अमीरों के भी आसमान में उड़ने की बात है तो आपने सभी को चलने और दौड़ने के लिये पांव दिये हैं पर सभी नहीं चलते। नीचे जाकर आप देखें तो पायेंगे कि लोग अपने घर से दस मकान दूर पर स्थित दुकान से सामान खरीदने के लिये भी कार पर जाते हैं। ऐसे लोगों पर आपकी मेहरबानी बहुत है और पंख मिलने पर भी हवाई जहाज से आसमान में उड़ेंगे। मुद्दा तो हम गरीबों का है!’

सर्वशक्तिमान ने कहा-‘वैसे तुम ठीक कहते हो कि पांव देने पर भी इंसान अब उसका उपयोग कहां करता है पर फिर भी पंख देने से तुम पक्षियों का जीना हराम कर दोगे। अभी तो तुम उड़ते हुए पक्षी को ही गुलेल मारकर नीचे गिरा देते हो। फिर तो तुम चाहे जब आकाश में उड़ाकर पकड़ लोगे।’

उस इंसान ने कहा-‘ऐसा कर तो इंसान आप का ही काम हल्का करता है। वरना तो आपका यह प्रिय जीव इंसान हमेशा हीं संकट में रहेगा। इनकी संख्या इतनी बढ़ जायेगी कि इंसान भाग भाग कर आपके पास जल्दी आता रहेगा।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘अरे चुप! बड़ा आये मेरा काम हल्का करने वाले। वैसे ही तुम लोगों की वजह से हर एक दो सदी में अहिंसा का संदेश देने वाला कोई खास इंसान जमीन पर भेजना पड़ता है। वैसे तुम इंसानों ने वहां पर्यावरण इतना बिगाड़ दिया है कि नाम मात्र को पशु पक्षी भेजने पड़ते हैं। अधिक भेजे तो उनके लिये रहने की जगह नहीं बची है। सच तो यह है मुझे सभी प्रकार के जीव एक जैसे प्रिय हैं इसलिये सोचता हूं कि कुछ पशु पक्षी वहां मेरा दायित्व निभाते रहें। वह बिचारे भी मेरे नाम पर शहीद कर दिये जाते हैं इस कारण उनको अपने पास ही रखना पड़ता है। कभी सोचता हूं कि उनको दोबारा नीचे भेजूं पर फिर उन पर तरस आ जाता है। वैसे मैंने तुम इंसानों को इतनी अक्ल दी है कि बिना पंख आकाश में उड़ने के सामान बना सको।’
वह इंसान बोला-‘वह सामान तो बहुत है पर वहां पेट्रोल की वजह से एयर लाईनों में किराये बढ़े गये हैं और उसमें अमीर ही उड़ सकते हैं या आपके ढोंगी भक्त! गरीब आदमी का क्या?’

सर्वशक्तिमान ने कहा-‘गरीब आदमी जिंदा तो है न! अगर उसे पंख लगा दिये तो भी उड़ नहीं सकेगा। अभी गरीब आदमी को कहीं बैल की तरह हल में जोता जाता है और कहीं उसे घोड़े की जगह जोतकर रिक्शा खिंचवाया जाता है। अगर पंख दिये तो उसे अपने कंधे पर अमीर लोग ढोकर ले जाने पड़ेंगे। इंसान को इंसान पर अनाचार करने में मजा आता है और इस तरह तो गरीब पर अनाचार की कोई सीमा ही नहीं रहेगी। वैसे तुम क्यों फिक्र कर रहे हो।
वह इंसान बोला-‘महाराज, मैं तो बस जिंदगी भर आकाश में उड़ना चाहता हूं।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘अब तो बिल्कुल नहीं। तुम इंसानों को अक्ल का खजाना दिया है पर तुम उसका इस्तेमाल पांव से चलने पर भी नहीं कर पाते तो उड़ते हुए तो वैसे ही वह अक्ल कम हो जाती है। इतनी सारी दुर्घटनाओं के शिकार असमय ही यहां चले आते हैं और जब तक उनके दोबारा जन्म का समय न आये तब तक उनको भेजना कठिन है। उनसे पूरा पुराना अभिलेखागार भरा पड़ा है। अगर तुमको आकाश में उड़ने के लिये पंख दिये तो फिर ऐसे अनेक पुराने अभिलेखागार बनाने होंगे। अब तुम जाओ बाबा यहां से! कुछ देर बाद कहोगे कि सांप की तरह विष वाले दांत दे दो। अमीर तो अपनी रक्षा कर लेता है गरीब कैसे करेगा? जबकि उससे अधिक विष अंदर रहता ही है भले दांत नहीं दिये पर उसने तुम इंसान कहां चूकते हो।’
सर्वशक्तिमान ने उस जीव को नीचे ढकेल दिया।
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स्वाइन फ्लू का इलाज-हास्य कविताएँ (swine flu ka ilaj-hasya kavita


उसने चैराहे पर मजमा लगा लिया।
‘आईये भद्रजनो, दुनियां की सबसे खतरनाक बीमारी ‘स्वाईन फ्लू’ का सही तरह से दलाज करने वाली दवाई खरीदे। यह विदेश से आयी है और इसकी दवा भी वहीं से खासतौर से मंगवाई है।’
लोगों की भीड़ जमा हो गयी। वह बोलता जा रहा था-‘यह बीमारी आ रही है। सभी एयरपोर्ट पर पहुंच गयी है। इसे रोकने की कितनी भी कोशिश करो। जब यहां पहुंचे जायेगी तब इसका मिलना मुश्किल होगी। पचास रुपये की शीशी खरीद लीजिये और निश्चित हो जाईये।’
एक दर्शक ने पूछा-‘तपेदिक की दवा हो तो मुझे दे दो! मुझे इस बीमारी ने परेशान किया है। बहुत इलाज करवाया पर कोई लाभ नहीं हुआ।’
‘हटो यहां से! क्या देशी बीमारियों का नाम लेते हो। अरे यह स्वाइन फ्लू खतरनाक विदेशी बीमारी है। तुम अभी इसे जानते नहीं हो।’ वह फिर भीड़ की तरह मुखातिब होकर बोला-हां! तो मैं कह रहा था…………………’’
इतने में दूसरा बोला-‘इसका नाम टीवी पर रोज सुन रहे हैं, पर मलेरिया का कोई इलाज हो तो बताओ। मेरे दोस्त को हो गयी है। वह भी इलाज के लिये परेशान है।’
वह बोला-‘हटो यहां से! देसी बीमारियों का मेरे सामने नाम मत लो।’

वह बोलता रहा। आखिर में उसने अपनी पेटी खोली। लोगों ने दवाई खरीदी। कुछ चलते बने। एक आदमी ने उत्सकुता से उससे पूछा-‘पर यह स्वाईन फ्लू बीमारी होती कैसे है और इसके लक्षण क्या हैं?
उसने कहा-‘पहले दवाई खरीद लो तो समझा देता हूं।’
उस आदमी ने पचास रुपये निकाल कर बढ़ाये और दवाई की शीशी हाथ में ली। उसने अपनी पेटी बंद की और चलने लगा। उस आदमी ने कहा-‘भई, मैंने इस बीमारी के बारे में पूछा था कि यह होती कैसे है और इसके लक्षण क्या हैं? उसका उत्तर तो देते जाओ।’
उसने कहा-‘जाकर टीवी पर सुन लेना। मेरा काम स्वाईन फ्लू की दवाई बेचना है। बीमारी का प्रचार करने का काम जिसका है वही करेंगे।’
वह चला गया और सवाल पूछने वाला आदमी कभी शीशी को कभी उसकी ओर देखता रहा।
………………………….

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इन्टरनेट स्वयंबर-हास्य व्यंग्य


उस सुंदरी ने तय किया कि वह उसी लड़के से पहले प्रेम लीला कर बाद में विवाह करेगी जो इंटरनेट पर व्यवसाय करते हुए अच्छा कमा रहा होगा। एक सहेली ने मना किया और कहा-‘अरे, भई हमें नहीं लगता है कि कोई लड़का इंटरनेट पर काम करते हुए अच्छा कमा लेता होगा अलबत्ता जो कमाते होंगे वह शायद ही अविवाहित हों।’
सुंदरी ने कहा-‘तुम जानती नहीं क्योंकि तुम्हारे पास इंटरनेट की समझ है ही क्हां? अरे, जिनको कंप्यूटर की कला आती है उनके लिये इंटरनेट पर ढेर सारी कमाई के जरिये हैं। मैं कंप्यूटर पर काम नहीं कर पाती इसलिये सोचती हूं कि कोई इंटरनेट पर कमाई करने वाला लड़का मिल जाये तो कुछ शादी से पहले दहेज का और बाद में खर्च का जुगाड़ कर लूं।’

उसकी वह सहेली तेजतर्रार थी-सुंदरी को यह पता ही नहीं था कि उसका चचेरा भाई इंटरनेट पर उसे बहुत कुछ सिखा चुका था। वह कुछ फोटो उसके घर ले आई और उस सुंदरी को दिखाने लगी। उस समय उसके पास दूसरी सहेली भी बैठी थी जो इंटरनेट के बारे में थोड़ा बहुत जानती थी और उसके बारे में बताने ही उसके घर आयी थी। पहली सहेली ने एक फोटो दिखाया और बोली-‘यह हिंदी में कवितायें लिखता हैं। इसका ब्लाग अच्छा है। ब्लाग पर बहुत सारे विज्ञापन भी दिखते हैं। तुमने तो अखबारों में पढ़ा होगा कि हिंदी में ब्लाग लेखक बहुत अच्छा कमा लेते हैं।’
दूसरी सहेली तपाक से बोली उठी-‘अखबारों में बहुत छपता है तो हिंदी के ब्लाग लेखक भी रोज अब भी हिंदी ब्लाग से कमाने के नये नुस्खे छापते हैं पर उन पर उनके साथी ही टिपियाते हैं कि ‘पहला हिंदी ब्लाग लेखक दिखना बाकी है जो लिखने के दम पर कमा रहा हो’, फिर इस कवि का क्या दम है कि कमा ले। गप मार रहा होगा।’
पहली सहेली ने कहा-‘पर यह स्कूल में शिक्षक है कमाता तो है।’
सुंदरी उछल पड़ी-‘मतलब यह शिक्षक है न! इसका मतलब है कि इंटरनेट पर तो शौकिया कवितायें लिखता होगा। नहीं, मेरे लिये उसके साथ प्रेम और शादी का प्रस्ताव स्वीकार करना संभव नहीं होगा।’
सहेली ने फिर दूसरा फोटो दिखाया और कहा-‘यह ब्लाग पर कहानियां लिखता हैं!’
सुंदरी इससे पहले कुछ कहती उसकी दूसरी सहेली ने पूछ लिया-‘हिंदी में कि अंग्रेजी में!’
पहली ने जवाब दिया-‘हिंदी में।’
अब तक सुंदरी को पूरा ज्ञान मिल गया था और वह बोली-‘हिंदी में कोई कमाता है इस पर यकीन करना कठिन है। छोड़ो! कोई दूसरा फोटो दिखाओ।’
पहली सहेली ने सारे फोटो अपने पर्स में रखते हुए कहा-‘यह सब हिंदी में ब्लाग लिखते हैं इसलिये तुम्हें दिखाना फिजूल है। यह फोटो स्वयंबर अब मेरी तरफ से रद्द ही समझो।’
वह जब अपने पर्स में फोटो रख रही थी तो उसमें रखे एक दूसरे फोटो पर उसका हाथ चला गया जिसे उसने अनावश्यक समझकर निकाला नहीं था। उसने सभी फोटो सही ढंग से रखने के लिये उसे बाहर निकाला। दूसरी सहेली ने उसके हाथ से वह फोटो ले लिया और कहा-‘यह फोटो पर्स में क्यों रखे हुए थी।’
पहली ने कहा-‘यह एक अंग्रेजी के ब्लाग लेखक का है।’
सुंदरी और दूसरी सहेली दोनों ही उस फोटो पर झपट पड़ी तो वह दो टुकड़े हो गया पर इसका दोनों को अफसोस नहीं था। सुंदरी ने कहा-‘अरे, वाह तू तो बिल्कुल शादियां कराने वाले मध्यस्थों की तरह सिद्धहस्त हो गयी है। बेकार का माल दिखाती है और असली माल छिपाती है। अब जरा इसके बारे में बताओ। क्या यह अपने लिये बचा रखा है?’
पहली सहेली ने कहा-‘नहीं, जब मैं इंटरनेट से तुम्हारे लिये फोटो छांट रही थी तब इसके ब्लाग पर नजर पड़ गयी और पता नहीं मैंने कैसे और क्यों इसका फोटो अपने एल्बम मेें ले लिया? इसलिये इसको बाहर नहीं निकाला।’
सुंदरी ने पूछा-‘पर यह है कौन? यह तो बहुत सुंदर लग रहा है। आह…. अंग्रेजी का लेखक है तो यकीनन बहुत कमाता होगा।’
पहली ने कहा-‘मेरे जान पहचान के हिंदी के ब्लाग लेखक हैं जो व्यंग्य वगैरह लिखते हैं पर फ्लाप हैं वह कहते हैं कि ‘सभी अंग्रेजी ब्लाग लेखक नहीं कमाते।’
दूसरी सहेली ने कहा-‘हिंदी का ब्लाग लेखक क्या जाने? अपनी खुन्नस छिपाने के लिये कहता होगा। मैंने बहुत सारे हिंदी ब्लाग लेखकों की कवितायें और कहानियां पढ़ी हैं। बहुत बोरियत वाली लिखते हंै। तुम्हारा वह हिंदी ब्लाग लेखक अपने को आपको तसल्ली देता होगा यह सोचकर कि अंग्रेजी वाले भी तो नहीं कमा रहे। पर तुम यह बताओ कि यह फोटो किस अंग्रेजी ब्लाग लेखक का है और वह कहां का है।’
दूसरी सहेली ने कहा-‘इसका पता ही नहीं चल पाया, पर यह शायद विदेशी है। इसकी शादी हो चुकी है।’
सुंदरी चिल्ला पड़ी-‘इतना बड़ा पर्स तो ऐसे लायी थी जैसे कि उसमें इंटरनेट पर लिखने वाले अंग्रेजी के ढेर सारे लेखकों के फोटो हों पर निकले क्या हिंदी के ब्लाग लेखक। उंह….यह तुम्हारा बूता नहीं है। बेहतर है तुम मेरे लिये कोई प्रयास न करो।’
दूसरी सहेली ने कहा-‘तुम्हारे फोटो में मैंने एक देखा था जो तुमने नहीं दिखाया। वह शायद चैथे नंबर वाला फोटो था। जरा दिखाना।’
पहली सहेली ने कहा-‘वह सभी हिंदी के ब्लाग लेखकों के हैं।’
‘जरा दिखाना’-दूसरी सहेली ने कहा।
पहली सहेली ने फिर सारे फोटो निकाले और उनके हाथ में दे दिये। दूसरी सहेली ने एक फोटो देखकर कहा-‘तुम इसे जानती हो।’
दूसरी सहेली ने कहा-‘हां, यह मेरे चचेरे भाई का फोटो है। भला लड़का है यह एक कंपनी में लिपिक है। फुरसत में ब्लाग पर लिखता है। ’
दूसरी सहेली ने कहा-‘यह लिखता क्या है?’
पहली सहेली ने कहा-‘यह कभी कभार ही लिखता है वह भी कभी हिंदी ब्लाग से कमाने के एक हजार नुस्खे तो कभी रुपये बनाने के सौ नुस्खे।’
सुंदरी ने पूछा-‘खुद कितने कमाता है।’
पहली ने कहा-‘यह तो मालुम नहीं पर कभी कभार इसकी तन्ख्वाह के पैसे खत्म हो जाते हैं तो इंटरनेट का बिल भरने के लिये यह मुझसे पैसे उधार ले जाता है।’
सुंदरी ने कहा-‘वैसे तुम अगर स्वयं प्रयास न कर सको तो अपने इस चचेरे भाई से पूछ लेना कि क्या कोई इंटरनेट पर अंग्रेजी में काम करने वाला कोई लड़का हो तो मुझे बताये। हां, तुम हिंदी वाले का फोटो तो क्या उसका नाम तक मेरे सामने मत लेना।’
पहली सहेली ने ने स्वीकृति में गर्दन हिलायी और वहां से चली गयी। इस तरह ब्लाग लेखकों का फोटो स्वयंबर समाप्त हो गया।
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नोट-यह व्यंग्य काल्पनिक तथा इसका किसी व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है और किसी से इसका विषय मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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स्वर्ग पाने के लिए संघर्ष-हिंदी लघुकथा


वहां सीधा शिखर था जिस पर आदमी सीधे स्वर्ग में पहुंच सकता था। शर्त यही थी कि उस शिखर पर बने उसी मार्ग से पैदल जाये तभी स्वर्ग का दरवाजा दिखाई देगा। ऐसा कहा जाता था कि उसी मार्ग से -जहां तक पहुंचना आसान नहीं था- जाने पर ही स्वर्ग का दरवाजा दिखाई देता है। उस शिखर पर कोई नहीं चढ़ सकता था। आसपास गांव वालों ने कभी कोशिश भी नहीं की क्योंकि उस शिखर पर चढने के लिये केवल जो इकलौता चढ़ाई मार्ग था उस तक पहुंचने के लिये बहुत बड़ी सीढ़ी चाहिये थी जो उनके लिये बनाना मुमकिन नहीं था। उसके बाद ही उसकी चढ़ाई आसान थी। उन ग्रामीणों ने अनेक लोगों को उनकी लायी सीढ़ी से ऊपर इस आशा में पहुंचाया था कि उसके बाद वह स्वयं भी चढ़ जायेंगे पर सभी लोग ऊपर पहुंचते ही सीढ़ी खींच लेते थे और ग्रामीण निराश हो जाते थे।
एक दिन एक बहुत धनीमानी आदमी सीधे स्वर्ग जाने के लिये वहां आया। उसके पास बहुत बड़ी सीढ़ी थी। इतनी लंबी सीढ़ी टुकड़ों में बनवायी और फिर वहां तक लाने के जाने के लिये उसने बहुत सारे वाहन भी मंगवाये। वहां पहुंचकर उसने उस सीढ़ी के सारे टुकड़े जुड़वाये। । वहां लाकर उसने गांव वालों से कहा-‘तुम लोग इसी सीढ़ी को पकड़े रहो। मैं तुम्हें पैसे दूंगा।’
गांव वालों ने कहा कि -‘पहले भी कुछ लोग आये और यहां से स्वर्ग की तरफ गये पर लौटकर मूंह नहीं दिखाया। इसलिये पैसे अग्रिम में प्रदान करो।’
उसने कहा कि‘पहले पैसे देने पर तुमने कहीं ऊपर चढ़ने से पहले ही गिरा दिया तो मैं तो मर जाऊंगा। इसलिये ऊपर पहुंचते ही पैसे नीचे गिरा दूंगा।’
तब एक वृद्ध ग्रामीण ने उससे कहा-‘मैं तुम्हारे साथ सीढ़ी चढ़ूंगा। जब तुम वहां उतर जाओगे तो पैसे मुझे दे देना मैं नीचे आ जाऊंगा।’
उस धनीमानी आदमी ने कहा-‘पर अगर तुम वहां उतर गये तो फिर नीचे नहीं आओगे। वैसे ही तुम मेरी तरह बूढ़े हो और स्वर्ग पाने का लालच तुम्हारी आंख में साफ दिखाई देता है। कहीं तुम उतर गये तो मुझे स्वर्ग जाने का दरवाजा नहीं मिलेगा। मैंने पढ़ा है कि आदमी को अकेले आने पर ही वहां पर स्वर्ग का दरवाजा मिलता है।
दूसरे ग्रामीण ने कहा-‘नहीं, यह हमारा सबसे ईमानदार है और इसलिये वैसे भी इसको स्वर्ग मिलने की संभावना है क्योंकि उस स्वर्ग के लिये कुछ दान पुण्य करना जरूरी है और वह कभी इसने नहीं किया। आप तो हमें दान दे रहे हो और इसलिये स्वर्ग का द्वारा आपको ही दिखाई देगा इसको नहीं। इसलिये यह पैसे लेकर वापस आ जायेगा।’
उस धनीमानी आदमी ने कुछ सोचा और फिर वह राजी हो गया।
जब वह वृद्ध ग्रामीण उस धनीमानी आदमी के पीछे सीढ़ी पर चढ़ रहा था तब दूसरा ग्रामीण जो सिद्धांतवादी था और उसने सीढ़ी पकड़ने से इंकार कर दिया था, वह उस वृद्ध ग्रामीण से बोला-‘शिखर यह हो या कोई दूसरा, उस पर केवल ढोंगी पहुंचते हैं। तुम इस आदमी को पक्का पाखंडी समझो। कहीं यह तुम्हें ऊपर से नीचे फैंक न दे। वैसे भी जो लोग यहां से गये हैं वह अपनी सीढ़ी भी खींच लेते हैं ताकि कोई दूसरा न चढ़ सके। यही काम यह आदमी भी करेगा।’
एक अन्य ग्रामीण ने कहा-‘यह आदमी भला लग रहा है, फिर बूढ़ा भी है। इसलिये सीढ़ी नहीं खींच पायेगा। फिर जब पैसे नीचे आ जायेंगे तब हम भी जाकर देखेंगे कि स्वर्ग कैसा होता है।’
वृद्ध ग्रामीण और वह धनीमानी आदमी सीढ़ी पर चलते रहे। जब वह धनीमानी आदमी ऊपर पहुंचा तो उसने तत्काल उस सीढ़ी को हिलाना शुरु किया तो वह वृद्ध ग्रामीण चिल्लाया‘यह क्या क्या रहे हो? मैं गिर जाऊंगा।’
वह धनीमानी आदमी बोला-‘तुम अगर बच गये तो यहां आने का प्रयास करोगे। यह सीढ़ी मुझे ऊपर खींचनी है ताकि कोई दूसरा न चढ़ सके। यह भी मैं किताब में पढ़कर आया हूं। तुम पैसे लेने के लिये ऊपर आओगे पर फिर तुम्हें नीचे फैंकना कठिन है। इसलिये भाई माफ करना अपने स्वर्ग के लिये तुम्हें नीचे पटकना जरूरी है बाकी सर्वशक्तिमान की मर्जी। वह बचाये या नहीं।’
बूढ़ा चिल्लाता रहा पर धनीमानी सीढ़ी को जोर से हिलाता रहा। जिससे वह नीचे गिरने लगा तो सीढ़िया पकड़े ग्रामीणों ने उसे बचाने के लिये वह सीढ़ी छोड़ दी और धनीमानी ने उसे खींच लिया। वह ग्रामीण नीचे आकर गिरा। गनीमत थी कि रेत पर गिरा इसलिये अधिक चोट नहीं आयी।’
वह चिल्ला रहा था‘सर्वशक्तिमान उसे स्वर्ग का रास्ता मत दिखाना। वह ढोंगी है।’
दूसरे समझदार वृद्ध ग्रामीण ने कहा-‘तुम लोग भी निरे मूर्ख हो। आज तक तुम्हें यह समझ में नहीं आयी कि जितने भी स्वर्ग चाहने वाले यहां आये कभी उन्होंने अपनी सीढ़ी यहां छोड़ी या हमें पैसे दिये? दरअसल ऊपर कुछ नहीं है। मेरे परदादा एक बार वहां से घूम आये थे। वह एक धनीमानी आदमी को लेकर वहां गये जो चलते चलते मर गया। मेरे परदादा ने यह बात लिख छोड़ी है कि उस शिखर पर स्वर्ग का कोई दरवाजा वहां नहीं है जहां यह रास्ता जाता है। बल्कि उसे ढूंढते हुए भूखे प्यासे लोग चलते चलते ही मर जाते हैं और हम यहां भ्रम पालते हैं कि वह स्वर्ग पहुंच गये। कुछ तो इसलिये भी वापस लौटने का साहस नहीं करते क्योंकि उनको लगता है कि हमारा पैसा नहीं दिया और हम उनको मार न डालें।’

चोट खाने और पैसा न मिल पाने के बावजूद वह वृद्ध ग्रामीण उस समझदार से कहने लगा-‘तुम कुछ नहीं जानते। ऊपर स्वर्ग का दरवाजा है। आखिर लोग यहां आते हैं। जब ऊपर पहुंचकर लौटते ही नहीं है तो इसका मतलब है कि स्वर्ग ऊपर है।’
एक अन्य ग्रामीण बोला-‘ठीक है। इंतजार करते हैं कि शायद कोई भला आदमी यहां आये और हमें सीढ़ी नसीब हो।’
समझदार ग्रामीण ने कहा-‘भले आदमी को तो स्वर्ग बिन मांगे ही मिल जाता है इसलिये जो यहां स्वर्ग पाने आता है उसे ढोंगी ही समझा करो।’
मगर ग्रामीण नहीं माने और किसी भले आदमी की बाट जोहने लगे।
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ब्रेकिंग न्यूज (हास्य व्यंग्य)


चंदा लेकर समाज सेवा करने वाली उस संस्था के समाजसेवी बरसों तक अध्यक्ष रहे। पहले जब वह युवा थे तब उनके बाहूबल की वजह से लोग उनको चंदा खूब देते थे। समाज सेवा के नाम पर वह कहीं मदद कर फोटो अखबारों में छपवाते थे। वैसे लोगों को मालुम था कि समाज सेवा तो उनका बहाना है असली उद्देश्य कमाना है मगर फिर भी कहने की हिम्मत कोई नहीं करता था और हफ्ता वसूली मानकर दान देते थे। समाजसेवी साहब अब समय के साथ वह बुढ़ाते जा रहे थे और इधर समाज में तमाम तरह के दूसरे बाहूबली भी पैदा हो गये थे तो चंदा आना कम होता जा रहा था। समाजसेवी के चेले चपाटे बहुत दुःखी थे। उनकी संस्था के महासचिव ने उनसे कहा कि ‘साहब, संस्था की छबि अब पुरानी पड़ चुकी है। कैसे उसे चमकाया जाये यह समझ में नहीं आ रहा है।’

सहसचिव ने कहा कि -‘इसका एक ही उपाय नजर आ रहा है कि अपने संगठन में नये चेहरे सजाये जायें। अध्यक्ष, सचिव और सहसचिव रहते हुए हमें बरसों हो गये हैं।

महासचिव घबड़ा गया और बोला-‘क्या बात करते हो? तुम समाजसेवी साहब को पुराना यानि बूढ़ा कह रहे हो। अरे, हमारे साहब कोई मुकाबला है। क्या तुम अब अपना कोई आदमी लाकर पूरी संस्था हड़पना चाहते हो?’
समाज सेवी ने महासचिव को बीच में रोकते हुए कहा-‘नहीं, सहसचिव सही कह रहा है। अब ऐसा करते हैं अपनी जगह अपने बेटों को बिठाते हैं।
महासचिव ने कहा-‘पर मेरा बेटा अब इंजीनियर बन गया है बाहर रहता है। वह भला कहां से आ पायेगा?
सहसचिव ने कहा-‘मेरा बेटा तो डरपोक है। उसमें किसी से चंदा वसूल करने की ताकत नहीं है। फिर लिखते हुए उसे हाथ कांपते हैं तो खाक लोगों को रसीद बनाकर देगा?’
समाजसेवी ने कहा-‘ इसकी चिंता क्यों करते हो? मेरा बेटा तो बोलते हुए हकलाता है पर काम तो हमें ही करना है। हां, बस नाम के लिये नया स्वरूप देना है।’
सहसचिव ने कहा-‘पर लोग तो आजकल सब देखते हैं। प्रचार माध्यम भी बहुत शक्तिशाली हैं। किसी ने संस्था के कार्यकलापों की जांच की तो सभी बात सामने आ जायेगी।’

समाजसेवी ने कहा-‘चिंता क्यों करते हो? यहां के सभी प्रचार माध्यम वाले मुझे जानते हैं। उनमें से कई लोग मुझसे कहते हैं कि आप अब अपना काम अपने बेटे को सौंपकर पर्दे के पीछे बैठकर काम चलाओ। वह चाहते हैं कि हमारी संस्था पर समाचार अपने माध्यमों में दें लोग पूरानों को देखते हुए ऊब चूके हैं। उल्टे प्रचार माध्यमों को तो हमारी संस्था पर कहने और लिखने का अवसर मिल जायेगा। इसलिये हम तीनों संरक्षक बना जाते हैं और अपनी नयी पीढ़ी के नाम पर अपनी जिम्मेदारी लिख देते है। अरे, भले ही महासचिव का लड़का यहां नहीं रहता पर कभी कभी तो वह आयेगा। मेरा लड़का बोलते हुए हकलता है तो क्या? जब भी भाषण होगा तो संरक्षक के नाम पर मैं ही दे दूंगा। सहसचिव के लड़के का लिखते हुए हाथ कांपता है तो क्या? उसके साथ अपने क्लर्क भेजकर काम चलायेंगे लोगों को मतलब नयी पीढ़ी के नयेपन से है। काम कैसे कोई चलायेगा? इससे लोग भी कहां मतलब रखते हैं? जाओ! अपनी संस्था के सदस्यों को सूचित करो कि नये चुनाव होंेगे। हां, प्रचार माध्यमों को अवश्य जानकारी देना तो वह अभी सक्रिय हो जायेंगे।’

सहसचिव ने कहा-‘यह नयी पीढ़ी के नाम जिम्मेदारी लिखने की बात मेरे समझ में तो नहीं आयी।’
महासचिव ने कहा-‘इसलिये तुम हमेशा सहसचिव ही रहे। कभी महासचिव नहीं बना पाये।’
समाजसेवी ने महासचिव को डांटा-‘पर तुम भी तो कभी अध्यक्ष नहीं बन पाये। अब यह लड़ना छोड़ो। अपनी नयी पीढ़ी को एकता का पाठ भी पढ़ाना है भले ही हम आपस में लड़ते रहे।’
सहसचिव ने कागज उठाया और लिखने बैठ गया। महासचिव ने फोन उठाया और बात करने लगा-‘यह टूटी फूटी खबर है ‘मदद संस्था में नयी पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपी जायेगी।’
समाजसेवी ने पूछा-‘यह टूटी फूटी खबर क्या है?‘
महासचिव ने कहा-‘ब्रेकिंग न्यूज।’
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इस तरह अपमान करना कोई कठिन काम नहीं था-आलेख


अमेरिका के राष्ट्रपति पर इराक के एक पत्रकार द्वारा जूता फैंके जाने की घटना को लेकर कुछ लोग जिस तरह उसकी प्रशंसा कर रहे हैं वह हास्यास्पद है। सबसे अजीब बात यह है कि अनेक देशों के पत्रकार उसका समर्थन कर रहे हैं। वह यह भूल रहे हैं कि उसने अपने ही देश के लोगो को धोखा दिया है। वह एक पत्रकार के रूप में उस जगह पर गया था किसी आंदोलनकारी के रूप में नहीं। इतना ही नहीं वहां इराक के प्रधानमंत्री भी उपस्थित थे और वह पत्रकार किसी स्वतंत्रता आंदोलन का प्रवर्तक नहीं था। अगर वह पत्रकार नहीं होता तो शायद इराक के सुरक्षाकर्मी ही उसे अंदर नहीं जाने देते जो कि उसके देश के ही थे।
आज के सभ्य युग में प्रचार माध्यमों में अपना नाम पाने के लिये उससे जुड़+े लोगों को सभी जगह महत्व दिया जाता है और इस पर कोई विवाद नहीं है। टीवी चैनलों के पत्रकार हों या अखबारों के उन जगहों पर सम्मान से बुलाये जाते हैं जहां कहीं विशिष्ट अतिथि इस उद्देश्य से एकत्रित होते हैं कि उनका संदेश आम आदमी तक पहुंचे। कहीं कोई विशेष घटना होती है तो वहां पत्रकार सूचना मिलने पर स्वयं ही पहुंचते हैं। कहीं आपात स्थिति होती है तो उनको रोकने का प्रयास होता है पर वैसा नहीं जैसे कि आदमी के साथ होता है। पत्रकार लोग भी अपने दायित्व का पालन करते हैं और विशिष्ट और आम लोगों के बीच एक सेतु की तरह खड़ होते हैंं। ऐसे में पत्रकारों का दायित्व बृहद है पर अधिकार सीमित होते हैं। सबसे बडी बात यह है कि उनको अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से परे होना होता है। अगर वह ऐसा नहीं कर पाते तो भी वह दिखावा तो कर ही सकते है। अमेरिका के राष्ट्रपति का विरोध करने के उस पत्रकार के पास अनेक साधन थे। उसका खुद का टीवी चैनल जिससे वह स्वयं जुड़ा है और अनेक अखबार भी इसके लिये मौजूद हैं।

ऐसा लगता है कि अभी विश्व के अनेक देशों के लोगों को सभ्यता का बोध नहीं है भले ही अर्थ के प्रचुर मात्रा में होने के कारण उनको आधुनिक साधन उपलब्ध हो गये हों। जब इराक मेंे तानाशाही थी तब क्या वह पत्रकार ऐसा कर सकता था और करने पर क्या जिंदा रह सकता था? कतई नहीं! इसी इराक में तानाशाही के पतन पर जश्न मनाये गये और तानाशाह के पुतलों पर जूते मारे गयेै। यह जार्ज बुश ही थे जिन्होंने यह कारनामा किया। जहां तक वहां पर अमेरिका परस्त सरकार होने का सवाल है तो अनेक रक्षा विद्वान मानते हैं कि अभी भी वहां अमेरिकी हस्तक्षेप की जरूरत है। अगर अमेरिका वहां से हट जाये तो वहां सभी गुट आपस मेंे लड़ने लगेंगे और शायद इराक के टुकड़े टुकड़े हो जाये। अगर उनके पास तेल संपदा न होती तो शायद अमेरिका वहां से कभी का हट जाता और इराक में आये दिन जंग के समाचार आते।
अमेरिका के राष्ट्रपति जार्जबुश कुछ दिन बाद अपने पद से हटने वाले हैं और इस घटना का तात्कालिक प्रचार की दृष्टि से एतिहासिक महत्व अवश्य दिखाई देता है पर भविष्य में लोग इसे भुला देंगे। इतिहास में जाने कितनी घटनायें हैं जो अब याद नहीं की जाती। वह एक ऐसा कूड़ेदान है जिसमें से खुशबू तो कभी आती ही नहीं इसलिये लोग उसमें कम ही दिलचस्पी लेते हैं और जो पढ़ते है उनके पास बहुत कुछ होता है उसके लिये। घटना वही एतिहासिक होती है जो किसी राष्ट्र, समाज, व्यक्ति या साहित्य में परिवर्तन लाती है। इस घटना से कोई परिवर्तन आयेगा यह सोचना ही मूर्खता है। कम से कम उन बुद्धिजीवियों को यह बात तो समझ ही लेना चाहिये जो इस पर ऐसे उछल रहे हें जैसे कि यहां से इस विश्व की कोई नयी शुरुआत होने वाली है।

चाहे कोई भी लाख कहे एक पत्रकार का इस तरह जूता फैंकना उचित नहींं कहा जा सकता जब वह वाकई पत्रकार हो। अगर कोई आंदोलनकारी या असंतुष्ट व्यक्ति पत्रकार के रूप में घूसकर ऐसा करता तो उसकी भी निंदा होती पर ऐसे में कुछ लोग उनकी प्रशंसा करते तो थोड़ा समझा जा सकता था।

पत्रकार के परिवार सीना तानकर अपने बेटे के बारे में जिस तरह बता रहे थे उससे लगता है कि उनको समाज ने भी समर्थन दिया है और यह इस बात का प्रमाण है कि वहां के समाज में अभी सभ्य और आधुनिक विचारों का प्रवेश होना शेष है। समाचारों के अनुसार मध्य ऐशिया के एक धनी ने उस जूते की जोडी की कीमत पचास करोड लगायी है पर उसका नाम नहीं बताया गया। शायद उस धनी को यह बात नहीं मालुम कि पत्रकार ने अपने ही लोगों के साथ धोखा किया है। वैसे भी कोई धनी अमेरिका प्रकोप को झेल सकता है यह फिलहाल संभव नहीं लगता। अमेरिका इन घटनाओं पर आगे चलकर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करता है यह अलग बात है पर कुछ दिनों में उसी पत्रकार को अपने देश में ही इस विषय पर समर्थन मिलना कम हो जायेगा। अभी तो अनेक लोग इस पर खुश हो रहे हैं देर से ही सही उनके समझ में आयेगी कि इस तरह जूता फैंकना कोई बहादुरी नहीं है। किसी भी व्यक्ति के लिये प्रचार माध्यम से जुड़कर काम के द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त करने कोई कठिन काम नहीं है इसलिये उसे धोखा देकर ऐसा हल्का काम करने की आवश्यकता नहीं है। कुछ समय बाद क्या स्थिति बनती है यह तो पत्रकार और उसके समर्थकों को बाद में ही पता चलेगा। मेहमान पर इस तरह आक्रमण करना तो सभी समाजों में वर्जित है और समय के साथ ही लोग इसका अनुभव भी करेंगे।
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जहां ख्वाहिश है महल पाने की-हिंदी शायरी


चले थे हम अपने इस अनजान पथ पर
न मंजिल का पता था
न मकसद का
लोगों ने किये कई सवाल
जिनका जवाब नहीं था
क्योंकि जहां जिंदगी चलती है
दौलत कमाने के वास्ते
वहां बिकते है सभी रास्ते
जहां चाहता है इंसान शौहरत अपने लिये
वहां तैयार हो जाता है समझौतों के लिये
जहां ख्वाहिश है महल पाने की
वहां भला कौन करता है फिक्र करता जमाने की
जिसके दिल में ख्याल है
खुली आंखों से देखना जिंदगी को
वह जमाने से अलग हो जाते
चलते लगते हैं सबके साथ रास्ते पर
पर जमीन की हर चीज में अपन ख्याल नहीं लगाते
पत्थर और पैसों में जज्बात ढूंढने वाले
भला कब खुश रह पाते
हमने भी देख लिया
छूकर हर शय को
जिन पर मर मिटता है जमाना
कोशिश करता है हर चीज में खुद ही समाना
चमकती लगी हर शय
जिसमें दिल लगा लिया लोगों ने
हम दूर होकर चलते रहे अपने रास्ते पर
क्योंकि उनमें धड़कनों और जज्बातों का अहसास न था

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दर्द और मदद की कोई जाति नहीं होती-लघु कहानी


वह हादसे में घायल होकर सड़क पर गिर पड़ा ह था। उसके चारों और लोग आकर खड़े हो गये। वह चिल्लाया-‘मेरी मदद करो। मुझे इलाज के लिये कहीं ले चलो।’
लोग उसकी आवाज सुन रहे थे पर बुतों की तरह खड़े थे। उनमें चार अक्लमंद भी थे। एक ने कहा-‘पहले तो तुम अपना नाम बताओ ताकि धर्म,जाति और भाषा से तुम्हारी पहचान हो जाये।

वह बोला-‘मुझे इस समय कुछ याद आ नहीं आ रहा है। मैं तो केवल एक घायल व्यक्ति हूं और अपने होश खोता जा रहा हूं। मुझे मदद की जरूरत है।
एक अक्लमंद बोला-‘नहीं! तुम्हारो साथ जो हादसा हुआ है वह केवल तुम्हारा मामला नहीं है। यह एक राष्ट्रीय मसला है और इस पर बहस तभी हो पायेगी जब तुम्हारी पहचान होगी। तुम्हारा संकट अकेले तुम्हारा नहीं बल्कि तुम्हारे धर्म, जाति और भाषा का संकट भी है और तुम्हें मदद का मतलब है कि तुम्हारे समाज की मदद करना। इसके लिये तुम्हारी पहचान होना जरूरी है।’

यह सुनते हुए उस घायल व्यक्ति की आंखें बंद हो गयीं। कुछ लोगों ने उसकी तरफ मदद के लिये हाथ बढ़ाने का प्रयास किया तो उनमें एक अक्लमंद ने कहा-‘नहीं, जब तक यह अपना नाम नहीं बताता तब तक इसकी मदद करो। हम मदद करें पर यह तो पता लगे कि किस धर्म,जाति और भाषा की मदद कर रहे हैं। ऐसी मदद से क्या फायदा जो किसी व्यक्ति की होती लगे पर उसके समाज की नहीं।

उसी भीड़ को चीरता हुए एक व्यक्ति आगे आया और उस घायल के पास गया और बोला-‘चलो घायल आदमी! मैं तुम्हें अपनी गाड़ी में बिठाकर अस्पताल लिये चलता हूं।’
उस घायल ने आंखें बंद किये हुए ही उस आदमी के कंधे पर हाथ रखा और उठ खड़ा हुआ। अक्लमंद ने कहा-‘तुम इस घायल की मदद क्यों कर रहे हो? तुम कौन हो? क्या इसे जानते हो?’

उस आदमी ने कहा-‘मैं हमदर्द हूं। कभी मैं भी इसी तरह घायल हुआ था तब सारे अक्लमंद मूंह फेर कर चले गये थे पर तब कोई हमदर्द आया था जो कहीं इसी तरह घायल हुआ था। घायल की भाषा पीड़ा है और जाति उसकी मजबूरी। उसका धर्म सिर्फ कराहना है। इसका इलाज कराना मुझ जैसे हमदर्द के लिये पूजा की तरह है। अब हम दोनों की पहचान मत पूछना। घायल और हमदर्द का समाज एक ही होता है। आज जो घायल है वह कभी किसी का हमदर्द बनेगा यह तय है क्योंकि जिसने पीड़ा भोगी है वही हमदर्द बनता है। भलाई और मदद की कोई जाति नहीं होती जब कोई करने लगे तो समझो वह सौदागर है।’
ऐसा कहकर उसको चला गया।
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न्यायपति ने पूछा-‘यह ब्लागर कौन है-हास्य कविता


नरक और स्वर्ग में मची थी उथल.पुथल
सब कर्मचारी थे परेशान
बढ़ता जा रहा था दिन-ब-दिन काम
धरती पर बढते पापों की वजह से
बहुत अधिक लोग भोगने आ रहे थे
अपने बुरे कर्मों का फल

आखिर सबने की न्यायपति से गुहार
‘‘अब जगह बहुत कम
धरती पर पुण्य नाम को नहीं बचा
कौन अब स्वर्ग जाता है
पूरा पडा खाली
इसलिए वहां अपने लिये जगह बनवाओ
खाली करा लो एक दो तल
या फिर ब्लोग की तरह पापों की कुछ
श्रेणियां बना दो
और उनको पुण्य की श्रेणियों में रखवा दो
ताकि कुछ भले लोग स्वर्ग में जाकर भोगें फल’’

न्यायपति ने बैठक की आहूत
जिसमें पहुंचे धरती से भी
नरक में जगह न मिलने की
वजह से बेदखल भूत
न्यायपति ने कहा
पहले तो यह बताओ
ब्लोगर कौनसा जीव है
जिसका पहले कभी नाम सुना नहीं है
नरक्.और स्वर्ग की लिस्ट मुझे जबानी याद है
उसमें इसका नाम नहीं है
उसका कर्म पाप है या पुण्य
कहीं दंडसंहिता में उसका विधान नहीं है
कैसे तय करें फल या कुफल’’
धरती से आये एक भूत ने कहा
‘‘महाराज मैं कई ब्लोगरों को जानता हूं
दिन भर उनके ब्लोग पर विचरण करने जाता हूं
कभी गुस्से में तो कभी प्रेम से
पोस्ट लिखते हैं
कभी प्रेम से कमेन्ट भी रखते हैं
पाप और पुण्य में तो तब लिखोगे
जब उनमें कामना होती
वह तो निष्काम कर्म किये जा रहे हैं
किसी को नहीं मिल रहा कोई फल
पर श्रेणियां बना लेते हैं
मैं पता करता हूं क्या
कोई वह कोई पाप.पुण्य की
श्रेणियां बनाने मे भी रहें है क्या सफल’’

न्यायपतिपति ने कहा
‘‘ठीक है पता कर आओ
पाप की श्रेणियों का
फिर से तय करो मापदंड
कुछ लोग स्वर्ग में जायें
और कुछ लोग भोगें यहाँ दंड का फल
जैसा तुमने सुनाया उससे तो
अगर ब्लोगर निष्काम कर्म करते हैं तो
स्वर्ग में हीं जाकर भोगेंगे फल’’

वह भूत चला गया तो
दूसरा भूत बोला
‘‘आप किस चक्कर में पड गये महाराज
वह एक ब्लोगर था
मैं आधी रात को उसके ब्लोग पर
विचरण कर रहा था
और वह सोते हुए भी वहां
अपनी देह छोड़ यह देखने आ गया
कि कोई कमेन्ट तो नहीं लगा गया
इतने में आयी आपकी पुकार
मैं निकला तो इसकी रूह भी लिंक हो गयी
अब तो यह अपना काम कर गया
आपने तो उसकी श्रेणी को स्वर्ग की बना दिया
यह अब वहीं जायेगा
आप का कहा तो ब्लोग पर
लगाई कमेन्ट की तरह है
जिसे वापस आप भी नहीं ले सकते
और यह डीलीट करेगा नही
बिना पाप श्रेणी का कर्म किये
यहां का हाल देखने में रहा सफल
अब लिखेगा पोस्ट
हमें बना देगा भूत से घोस्ट
इसका ब्लोग हिट होकर चल देगा कल’’

न्यायपति ने हैरान होकर कहा
‘‘पहले क्यों नहीं बताया
तुम्हारी वजह से ही
हमें चलाने में वह रहा सफल’

भूत ने कहा
‘‘आपकी मार्गदर्शिका में
सबसे निपटने की तरीके हैं
पर इस नये जीव ब्लोगर के बारे में
कुछ नहीं कहा
हम तो उतना ही चलें
जितनी भरी चाबी अपने
सब जीव तो धरती पर पैदा होते हैं
पर लगता है यह अन्तरिक्ष से उतरा है
आप इसके लिए कोई प्रोविजन करो
वरना इतने सारे ब्लोगर होते जा रहें है
धरती पर
कि स्वर्ग का भी भर जायेगा हर तल’
……………………………………

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टोपी के व्यापार का शुभारंभ-हास्य व्यंग्य


दीपक बापू बाहर जाने के लिये बाहर निकल रहे थे तो बा (गृहस्वामिनी) ने कहा-‘अभी बिजली नहीं आयी है इसलिये सर्वशक्तिमान के दरबार में दर्शन करने जा रहे हो नहीं तो अभी तक कंप्यूटर पर अपनी आखें झौंक रहे थे।’
दीपक बापू ने कहा-‘कैसी बात करती हो। लाईट चली गयी तो चली गयी। मैं तो पहले ही कंप्यूटर को पर्दा गिराने (शट डाउन) का संदेश भेज चुका था। अपने नियम का मैं पक्का हूं। सर्वशक्तिमान की कृपा है कि मैं ब्लाग लिख पा रहे हूं।
बा ने कहा-‘फंदेबाज बताता रहता है कि तुम्हारे हिट होने के लिये वह कई जगह मन्नतें मांगता है। तुम्हारे फ्लाप शो से वह भी दुःखी रहता है।
दीपक बापू ने कहा-‘तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गयी। न वह पढ़ने में न लिखने में। आ जाता है फालतू की बातें करने। हमने कभी अपने फ्लाप रहने की परवाह नहीं की जो वह करता है। जिनके दोस्त ऐसे ही हों वह भला हिट ब्लागर बन भी कैसे सकता है।’

इतने में फंदेबाज ने दरवाजे पर दस्तक दी। दीपक बापू ने कहा-‘और लो नाम शैतान का। अच्छा खासा सर्वतशक्तिमान के दरबार में जा रहा था और यह आ गया मेरा समय खराब करने। साथ में किसी को लाया भी है।’
फंदेबाज उस आदमी को लेकर अंदर आया और बोला-‘दीपक बापू कहीं जा रहे थे क्या? लगता है घर में लाईट नहीं हैं वरना तुम इस तरह जाते नहीं।’
दीपक बापू ने कहा-‘ अब तुम कोई फालतू बात तो करना नहीं क्योंकि हमारे पास समय कम ही है। बताओ कैसे आये? आज हमारा हास्य कविता लिखने का कोई विचार नहीं है।’
फंदेबाज अपने साथ लाये आदमी की तरफ हाथ उठाते हुए बोला-‘ यह मेरा दोस्त टोपीबाज है। इसने कई धंधे किये पर हिट नहीं हो सका। आपको तो परवाह नहीं है कि हिट हैं कि फ्लाप पर हर आदमी फ्लाप होने का दर्द नहीं झेल सकता। इसे किसी तोते वाले ज्योतिषी ने बताया है कि टोपी के धंधे में इसे सफलता मिलेगी। इसलिये इसने झगड़ेबाज की जगह अपना नाम टोपीबाज कर लिया। यह धंधे के हिसाब से अपना नाम बदलता रहता है। यह बिचारा इतने धंधे कर चुका है कि अपना असली नाम तक भूल गया है। अब आप इसके धंधे का शुभारंभ करो। तोते वाले ज्योतिषी ने इसे बताया था कि किसी फ्लाप लेखक से ही उसका शुभारंभ करवाना। लोग उससे सहानुभूति रखते हैं इसलिये तुम्हें लाभ होगा।’

दीपक बापू ने उस टोपीबाज की तरफ दृष्टिपात किया और फिर अपनी टोपी पर दोनों हाथ लगाकर उसे घुमाया और हंसते हुए बोले-‘चलो! यह नेक काम तो हम कर ही देते हैं। वहां से कोई चार छहः टोपी खरीदनी है। इसकी दुकान से पहली टोपी हम खरीद लेंगे। वह भी नगद। वैसे तो हमने पिछली बार छहः टोपी बाजार से उधार खरीदी थी पर वह चुकायी नहीं। जब उस बाजार से निकलते हैं तो उस दुकान वाले रास्ते नहीं निकलते। कहीं उस दुकान वाले की नजर न पड़ जाये। अगर तुम्हारी दुकान वहीं है तो भैया हम फिर हम नहीं चलेंगे क्योंकि उस दुकानदार को देने के लिये हमारे पास पैसा नहीं है। वैसे सर्वशक्तिमान ने चाहा तो इसके यहां से टोपी खरीदी कहीं फलदायी हो गयी तो शायद कोई एकाध ब्लाग हिट हो जाये।
फंदेबाज बोला-‘अरे, तुम समझे नहीं। यह किसी टोपी बेचने की दुकान नहीं खोल रहा बल्कि यह तो ‘इसकी टोपी उसके सिर’ वाली लाईन में जा रहा है। हां, शुभारंभ आपसे करना चाहता है। आप इसे सौ रुपये दीजिये आपको अंतर्जाल का हिट लेखक बना देगा। इसके लिये वह घर पर बैठ कर अंग्रेजी का मंत्र जपेगा अब उसमें इसकी ऊर्जा तो खत्म होगी तो उसके लिये तो कुछ पैसा तो चाहिये न!
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, ऐसे व्यापार करने से तो न करना अच्छा। यह तो धोखा है, हम तो कभी हिट लेखक नहीं बन सकते। कहीं ठगीबाजी में यह पकड़ लिया गया तो हम भी धर जिये जायेंगे कि इसके धंधे का शुभारंभ हमने किया था।
फंदेबाज ने कहा-‘तुम्हें गलतफहमी हो गयी है कि इसे सौ रुपये देकर हिट लेखक बन जाओगे और यह कोई अंग्रेजी का मंत्र वंत्र नहीं जपने वाला। सौ रुपये नहीं यह तो करोड़ों के वारे न्यारे करने वाला है। यह तो आपसे शुरूआत है। इसलिये टोकन में सौ रुपये मांग रहा हूं। ऐसे धंधे में कोई पकड़ा गया है आजतक। मंत्र का जाप तो यह करेगा। कुछ के काम बनेंेगे कुछ के नहीं। जिनके बनेंगे वह इसका गुण गायेंगे और जिनके नहीं बनेंगे वह कौन शिकायत लेकर जायेंगे?’
दीपक बापू ने कहा-‘क्या तुमने हमें बेवकूफ समझ रखा है। ठगी के धंधे का शुभारंभ भी हम करें क्योंकि एक फ्लाप लेखक हैं।’
फंदेबाज ने कहा-‘तुम भी चिंता मत करो। कई जगह तुम्हारे हिट होने के लिये मन्नतें मांगी हैं। जब हिट हो जाओगे तो तुमसे किसी और बड़े धंधे का शुभारंभ करायेंगे।’
दीपक बापू ने आखें तरेर कर पूछा-‘तो क्या लूटपाट के किसी धंधे का शुभारंभ करवायेगा।’
बा ने बीच में दखल दिया और बोली-‘अब दे भी दो इस बिचारे को सौ रुपये। हो सकता है इसका ध्ंाधा चल निकले। कम से कम फंदेबाज की दोस्ती का तो ख्याल करो। हो सकता है अंग्रेजी के मंत्रजाप करने से आप कंप्यूटर पर लिखते हुए हिट हो जाओ।’
दीपक बापू ने सौ का नोट टोपीबाज की तरफ बढ़ा दिया तो वह हाथ जोड़ते हुए बोला-‘आपके लिये तो मैं सचमुच में अंग्रेजी में मंत्र का जाप करूंगा। आप देखना अब कैसे उसकी टोपी उसके सिर और इसकी टोपी उसके सिर पहनाने का काम शुरू करता हूं। घर घर जाकर अपने लिये ग्राहक तलाश करूंगा। कहीं न कहीं कोई समस्या तो होती है। सभी की समस्या सुनकर उनके लिये अंग्रेजी का मंत्र जपने का आश्वासन दूंगा जो अच्छी रकम देंगे उनके लिये वह जपूंगा और जो कम देंगे उनका फुरसत मे ही काम करूंगा।’
बा ने कहा-‘महाराज, आप हमारे इनके लिये तो आप जरूर अंग्रेजी का मंत्र जाप कर लेना। अगर हिट हो गये तो फिर आपकी और भी सेवा कर देंगे। आपका नाम अपने ब्लाग पर भी चापेंगे (छापेंगे)
अपना काम निकलते ही फंदेबाज बोला-‘अच्छा दीपक बापू चलता हूं। आज कोई हास्य कविता का मसाला मिला नहीं। यह दुःखी जीव मिल गया। अपने धंधे के लिये किसी फ्लाप लेखक की तलाश में था। यह पुराना मित्र है मैंने सोचा तुमसे मिलकर इसका काम करा दूं।’
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, इतने करोड़ो के बजट वाला काम शुरू किया है और दो लड्डे भी नहीं ले आये।’
फंदेबाज ने झुककर बापू के मूंह के पास अपना मूंह ले जाकर कहा-‘यह धंधा किस तरह है यह बताया था न! इसमेें लड्डू खाये जाते हैं खिलाये नहीं जाते।’
वह दोनो चले गये तो बा ने दोनों हाथ उठाकर ऊपर की तरफ हाथ जोड़कर कहा-‘चलो इस दान ही समझ लो। हो सकता है उसके अंग्रेजी का मंत्र से हम पर कृपा हो जाये।’
दीपक बापू ने कहा-‘यह दान नहीं है क्योंकि यह सुपात्र को नहीं दिया गया। दूसरा कृपा तो सर्वशक्तिमान ही करते हैं और उन्होंने कभी कमी नहीं की। हम तो उनकी कृपा से ब्लाग लिख रहे हैं उसी से हीं संतुष्ट हैं। फ्लाप और हिट तो एक दृष्टिकोण है। कौन किसको किस दृष्टि से देखता है पता नहीं। फिर अंतर्जाल पर तो जिसका आभास भी नहीं हो सकता उसके लिये क्या किसी से याचना की जाये।’
बा ने पूछा-‘पर यह मंत्र जाप की बात कर रहा था। फिर धंधे की बात कर रहा था समझ में नहीं आया।’
दीपक बापू ने कहा-‘इसलिये तो मैंने उसे सौ रुपये दे दिये कि वह तुम्हारी समझ में आने से पहले निकल ले। क्योंकि अगर तुम्हारे समझ में आ जाता तो तुम देने नहीं देती और बिना लिये वह जाता नहीं। समझ में आने पर तुम फंदेबाज से लड़ बैठतीं और वह पैसा लेकर भी वह अपना अपमान नहीं भूलता। फिर वह आना बंद कर देता तो यह कभी कभार हास्य कविताओं का मसाला दे जाता है उससे भी हाथ धो बैठते। यह तो सौ रुपये का मैंने दंड भुगता है।’
इतने में लाइट आ गयी और बा ने कहा-‘लो आ गयी बिजली! अब बैठ जाओ। फंदेबाज ने कोई मसाला दिया हो तो लिख डालो हास्य कविता।’
दीपक बापू ने कहा-‘अब तो जा रहे सर्वशक्तिमान के दरबार में। आज वह कोई मसाला नहीं दे गया बल्कि हमारी हास्य कविता बना गया जिसे दस को सुनायेगा। अभी तक हमने उसकी टोपी उड़ायी है आज वह उड़ायेगा।
…………………………………

पास के विद्वान भी बैल बन जाते-हास्य कविता


आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू मैं
हीरो का ब्लाग पढ़कर आया
हिंदी तो ढंग से पढ़ना नहीं आती
पर उसका अंग्रेजी ब्लाग पर पढ़कर
मैंने अपने भतीजे से टिप्पणी लिखवाई
पहली बार अंतर्जाल पर मौज मनाई
सैंकड़ों लोगों के नाम लिखे थे नीचे
मैंने कर दिया सबको पीछे
तुम इसलिये फ्लाप हो
क्योंकि कुछ बनने से पहले ही अपना ब्लाग बनाया’

नाक पर चश्मा लटकाकर
उसे घूरते हुए देखने लगे
जैसे अभी खा जायेंगे
फिर सोचकर बोले
‘दोष तुम्हारा नहीं हमारा है
बात करते हैं तुमसे इसलिये
क्योंकि अकेला होना हमें नहीं गवारा है
तुम्हारे लिये तो वही हिट है
जिसको समझने में तुम्हारी बुद्धि अनफिट है
दूर बैठा कितना भी ढोल है
तुम्हें सुहावना लगेगा
बाहर से लगता है आकर्षक
अंदर जिसमें पोल है
वही तुमको फलता लगेगा
दूर होते तुमसे तो
कुछ हम भी तुमको ऊंचे नजर आते
पास के विद्वान भी घर में बैल बन जाते
जो दृश्य आंख से आगे न जाता हो
जो स्वर कान से पार न पाता हो
जिसका स्पर्श ही तुम्हारे लिए अंसभव
वही तुमको भाता है
मेरे पास हो इसलिये तुम्हारे लिए
अपना यह प्रपंच नहीं रचाया
दुनियां भर में फैले गुणवान और विद्वानों से
बन जायें संपर्क इसलिये यह ब्लाग बनाया
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धुरविरोधी और आदिविद्रोही-व्यंग्य


लोकतंत्र में विरोध का बहुत महत्व है, यही कारण है कि जिनको सत्ता नसीब नहीं होती वह मुखर होकर विरोध करते है। देश के हर क्षेत्र में राजनीति प्रवेश कर गयी है इसलिये सभी जगह लोकतंत्र और विरोध दोनों ही चलते रहते हैं। जो किसी कारण वश प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं आते वह नारे और वाद के स्वरूप बनाकर अपने क्षेत्रों में राजनीतिक शब्दों के सहारे राजनीति-राजनीत का खेल खेलने लगते हैं। स्वाभाविक रूप से कई क्षेत्रों में मठाधीश है तो उनके विरोधी भी हैं। कुछ लोग अपने को धुरविरोधी कहलाना चाहते हैं। बरसों तक अपने साथ यह संज्ञा जोड़े रहते हैं। उन्हें इसमें मजा आता है। उस क्षेत्र के मठाधीशों से पीडित लोग इन्हीं धुरविरोधी स्वरूपधारी लोगों के पास जाकर अपना दुखड़ा रोते हैं। यह धुरविरोधी उन मठाधीशों के विरुद्ध नारे लगाकर खामोश हो जाते हैं।

मेरा एक लेखक मित्र है पर मै कहीं का मठाधीश नहीं हूं फिर भी मेरा विरोध करता रहता है। उससे त्रस्त होता हूं पर दूसरे लोग कहते हैं कि-‘वह तो इधर-उधर से टीप कर लिखता है।’

मेरी एक पत्रिका में कहानी छपी ‘रोशनी बेचने वाला’ छपी थी। जब मैं यह कहानी लिख रहा था तो इतने मनोयोग से लिख रहा था कि मेरे मस्तिष्क की सारी इंद्रियां सक्रिय थीं और बिल्कुल आखिर में याद आया कि यह तो प्रेमचंद की कहानी ‘टार्च बेचने वाला’ का आधुनिक संस्करण लगती है। मैंने बेहिचक इस बात की चर्चा कहानी में कर दी। लोगों ने पढ़ी और उनको याद आया कि वाकई यह कहानी उससे मिलती जुलती है, मेरे उल्लेख ने मुझे लोगों की दृष्टि में उठा दिया। एक दिन उस लेखक के साथ एक मित्र था और मैं उसके पास गया तो उसने मुझे देखते ही कहा-‘‘वाह यार, क्या कहानी लिखते हो। यकीन नहीं होता। अगर तुम उसमें अधिक साहित्यक भाषा का उल्लेख करते तो मुझे लगता कि तुमने कहीं इसकी तरह से चुराई होगी। तुम उसे कहीं बड़े अखबार मे भेजो। मैंने इतनी जोरदार कहानी कहीं नहीं पढ़ी है।  सच कहूं तो प्रेमचंद के स्तर से कम मैं उसे नहीं मानता।’

इससे पहले मैं उससे कुछ कहता वह लेखक मित्र बोल पड़ा-‘‘यार, इतनी मत उड़ाओ इस बिचारे की। वरना लिखना ही बंद कर देगा। कहां प्रेमचंद की कहानी और कहां इसकी।’

मगर वह मित्र भी कम नहीं था। उसने कहा-‘तुमने उसे पढ़ा है?’
उसने कहा-‘मेरे पास अपने काम से फुरसत नहीं मिलती। इसकी कहानी कैसे पढ़ूंगा?’
बहरहाल दोनों में बहस होने लगी। मैंने ही दोनों को शांत करवाया। बाद में वह मित्र मुझसे अकेले में बोला-‘‘एक बात याद रखना मैं बहुत दिन से तुम्हें ढूंढ रहा था यही बात कहने के लिये। मगर उससे कभी तुम्हारी तारीफ सहन ही नहीं होती। वह तुम्हारा धुरविरोधी है।’

मैने हंसकर कहा-‘‘ हां, जब लिखता हूं तो उसका ध्यान जरूर रखता हूं कि कहीं उसे आलोचना का अवसर न मिले। यह अलग बात है कि वह पढ़ता ही नहीं है।’
अंतर्जाल पर जब लिखना शुरू किया तो कोई धुरविरोधी नाम के ब्लाग लेखक थे। मैं आया तो मेरे कई ब्लाग पर उन्होंने अपनी टिप्पणियां दीं। अचानक ही कुछ हुआ कि उन्होंने अपना ब्लाग बंद कर सन्यास लेने की घोषणा शुरू कर दी। मैं उनका ब्लाग कभी नहीं पढ़ पाया क्योंकि अभी मैं हिंदी ब्लाग जगत में समझ ही नहीं पाया था कि टिप्पणियों से ब्लाग पर पहुंचा जा सकता है। तमाम तरह के वाद-विवादों के बीच उनकी विदाई हो गयी। विदाई गीत भी लिखे गये। मैंने उनकी टिप्पणियां देखीं तो पाया कि समाज की व्यवस्था से वह अंसतुष्ट थे और मेरे जो पाठ उस व्यवस्था पर कटाक्ष करते थे उस पर ही उनकी टिप्पणियां थीं। मैं उनकी टिप्पणियों से प्रभावित था मगर इसका दूसरा पक्ष भी था। धुरविरोधी के समर्थक जिस धारा के थे वह भी मुझे कोई प्रिय नहीं लगती थी। केवल विरोध करने की बात मेरे समझ से परे होती है। समाज के नये स्वरूप की संरचना की योजना न होने पर विरोधी केवल धुरविरोधी ही हो पाते हैं। उस समय हिंदी ब्लाग जगत में  मैं नया था पर धुरविरोधी के समर्थकों के ब्लाग लेखकों के पाठों   में कई तरह की वैचारिक चुनौतियां होतीं थीं। मैंने उनका प्रतिवाद करने की दृष्टि से एक नहीं तीन जगह कवितायें लिखीं। दो छद्म नाम से थीं। हुआ यूं कि मेरे वास्तविक नाम पर तो मित्रों की  प्रतिक्रिया आई पर दो छद्म ब्लाग पर अलग अलग विपरीत टिप्पणियां आईं वह भी कविताओं के रूप में। एक छद्म नाम से दूसरी असली नाम से। छद्म नाम था आदिविद्रोही। मैंने तय किया कि पहले इस छद्म नाम से निपटूं। उसकी टिप्पणी पर उसके नाम को क्लिक किया तो उसका ब्लाग मिल गया। वहां धुरविरोधी की टिप्पणी भी थी जिनके हिंदी ब्लाग जगत से जाने को लेकर विदाई गीत लिखे जा रहे थे। बहरहाल उस दिन ब्लाग की टिप्पणियों से लिखने वाले के ब्लाग पर जाने का ज्ञान हुंआ। दूसरा यह  कि आदिविद्रोही कौन है मैं समझ गया। आदिविद्रोही ने एक पोस्ट ही लिखी थी और उसमें उसने अपने आने की घोषणा की थी। बाद में उसने दूसरे ब्लाग लेखकों के पाठों पर धमकाने वाले भी कमेंट लिखे। पहली और दूसरी प्रतिकूल टिप्पणी करने वाला एक ही व्यक्ति था। मतलब मुझे एक ही व्यक्ति से भिड़ना था। फिर मुझे ख्याल आया कि यह तो मेरा छद्म ब्लाग है। दिलचस्प बात यह है कि मेरे एक मित्र ब्लाग ने एक ही दिन तीनों कविताओं को अपने यहां लिंक दिया था और इसलिये वह लोग एकदम हमलावर हो गये थे। बहरहाल उस दिन गुस्सा पी गया जो बाद में कई पाठों को लिखने के लिए ऊर्जा के रूप में काम आया।

धुरविरोधी की इस हिंदी ब्लाग जगत से विदाई नहीं होगी यह मैं जानता था क्योंकि मुझे लगा कि यह उनका अपने छद्म ब्लाग से छुटकारा पाने का एक नाटक है। बाद में मेरा यह अनुमान सही निकला। आजकल वह अपने वास्तविक नाम से लिख रहे हैं-उनके अच्छे लेखक होने पर भी किसी को संदेह नहीं है। आदिविद्रोही ने घोषणा नहीं की पर फिर उसका ब्लाग यहां दिखाई नहीं दिया। मैंने उस पर अनेक बार व्यंग्य लिखे पर वह कभी नहीं देख पाया। मेरे कई पाठों का नायक  आदिविद्रोही होता है और वह जबरदस्त हिट लेतीं हैं। न केवल ब्लाग लेखकों  में बल्कि पाठकों में भी उनको बहुत रुचि से पढ़ा जाता है।  मैं उसे धुरविरोधी का शिष्य कहता हूं और उसने एक टिप्पणी से वह दिया जो कोई नहीं दे सकता। ब्लाग पर मेरी सबसे पहले जबरदस्त हिट पाठ को मैं कभी नहीं भूलता जिसका  शीर्षक है‘इस ब्लाग मीट पर हास्य कविता मत लिखना’। उसके बाद व्यंग्य लिखना शुरू किया तो फिर रुका नहीं । हां, अब अगर यह वही लोग हैं जो मैं समझ रहा हूं तो उनसे मेरा झगड़ा नहीं है और वह दोनों भी मेरे प्रति कोई दुर्भाव रखते नह दृष्टिगोचर नहीं होते। धुरविरोधी की अनुकूल और आदिविद्रोही की प्रतिकूल टिप्पणियां मुझे भूलती नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों अब उन प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते है जो वह दूसरों के सामने चुनौती के रूप में पेश करते थे।

पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया-हास्य कविता


बगल में अखबार दबाकर
घर आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापु तुमने
पहले अखबारों  और अब ब्लाग पर
क्रिकेट पर ही लिखना शुरू किया
फिर क्यों अब मूंह फेर लिया
देखो क्रिकेट में फिल्म के एक्शन का
मजा भी आ रहा है
पहले पिटा  हीरो
अब पीटकर बाहर जा रहा है
क्यों नहीं तुम भी देखा करते
बैट-बाल के खेल में
मारधाड़ की भी मजा क्यों नहीं लिया करते
ऐसे क्रिकेट से क्यों किनारा किया’

सुनकर पहले हैरान हुए फिर बोले
‘‘हम फिल्म के वक्त फिल्म और
क्रिकेट के वक्त क्रिकेट देख करते हैं
यह टू-इन-वन मजा तुम ही लो
हमें तो अब इससे दूर ही समझ लो
हमने पहले भी कहा था
क्रिकेट अब कम खेली जायेगी
पर उससे पहले उसकी पटकथा लिखा जायेगी
फिल्म वालों ने लिया है मोर्चा
क्रिकेट को चमकान का
तो उनकी कला यहां भी नजर आयेगी
आस्ट्रेलिया में किया था जिसने हीरो को रोल
उसे अब विलेन बनाकर पेश किया
उस समय के विलेन को दे रहे थें जो गालियां
अब बजा रहे उनके लिये तालियां
यह हीरो-हीरोइन भला कब  डायरेक्टर के
 हुक्म के बिना एक्शन के कब होते है
जरूर लिखी होगी किसे ने पटकथा
जो झगड़े की फोटो कैमरे से लेने में रोकते हैं
झगड़ा करने वाले खिलाड़ी
बाद में ऐसे होकर मिलते हैं
जैसे कोई बढिया अभिनय किया
कह तो रहे है सभी
पर किसने देखा यह कि 
थप्पड़ मारने वाले ने अपना कितना नुक्सान किया
हमने ने देखा न मैच न झगड़ा
पर एक बात मानते हैं कि
क्रिकेट मैच में एक्शन का सीन लिखकर
पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया
………………………


मशहूर होने से शऊर नहीं आ जाता-हास्य व्यंग्य


मशहूर होने की ललक सबमें होती है और इसके लिये आदमी अपने स्वार्थ के काम भी इस तरह करते हैं कि जैसे वह परमार्थ का कर रहे हैं। और नहीं तो कई काम ऐसे जिन्होंने किए ही नहीं अपने नाम से बताकर आत्मप्रवंचना करते हैं। दूसरों का कम बिना किसी स्वार्थ के करना या अपनी जिंदगी में ही कुछ ऐसा करना जो दूसरे न करते हों यह कोई नहंी करता।  मतलब यह है कि मशहूर होने का आशय यह कतई नहीं है कि जीने का भी शऊर हो।

हमारी मुलाकात एक मशहूर आदमी से हुई दूसरे सज्जन के घर हुई थी। उस दिन वह सज्जन एक आम और खास आदमी के एक साथ मेजबान बने थे। हम बिना बुलाये गये थे और वह मशहूर आदमी विशेष आमंत्रित थे।

हम जब पहुंचे तो मेजबान ने हमें देखते ही मूंह बना लिया-‘‘यार, तुम्हें भी अभी आना था! कल आ जाते। खैर आ ही गये तो रुक जाओ, और मेरी मदद करना। आखिर इतना मशहूर आदमी हमारे घर आ रहा है।’’

हमने कहा-‘ठीक है। अब बताओं हम क्या करें?‘

वह बोले-‘‘आज ड्राइंग रूम में न बैठकर इधर बाहर कुर्सी पर बैठ जाओ।’

हम वहीं बैठ गये। वह मशहूर आदमी आया। पूरा घर उसके स्वागत के लिए बाहर उमड़ पड़ा। हम अपनी कुर्सी से उठकर वहीं डटे रहे। सम्मान के लिये आगे नहीं गये क्योंकि मेजबान ने हमसे ऐसा कोई आग्रह नहीं किया था। उन मशहूर आदमी को अंदर ले जाया गया। पूरे घर में हलचल मची थी। कोई शरबत बना रहा था तो कोई पानी ला रहा था। उन पर मनमोहक शब्द वर्षा हो रही थी।

हम दृष्टा बन कर डट गये। देखें आखिर क्या होता है? इतने में वह मेजबान सज्जन आये और बोले-‘‘आओ, जरा तुम बैठकर उनसे बात करो। मै थोड़ा अपने आपको  अकेला महसूस कर रहा हूं।’’

हम समझ गये कि वह भले ही स्वयं भी प्रसिद्ध है पर बोलने को शऊर उनमे भी  नहीं है। बहरहाल हम ड्राइंग रूम में जाकर उस मशहूर आदमी के सामने बैठ गये। वह मेजबान हमारा परिचय कराते हुए बोले-‘यह हमारे मित्र हैं। अच्छे लेखक हैं।’’

उन मशहूर सज्जन ने खीसें निपोरते हुए पूछा-‘क्या लिखते हो?’

हमने कहा-‘अधिक कुछ नहीं बस कभी कभार व्यंग्य लिखते है। अधिक मशहूर नहीं है।’

वह हंसकर बोले-‘चिंता मत करो। कभी हो जाओगे। हां, हम पर व्यंग्य लिखने का दुस्साहस नहीं करना।’

हमने हंसते हुए कहा-‘‘आप तो बहुत गंभीर आदमी हैं। चिंतक और विचारशील हैं। आप पर तो कभी अच्छा आलेख लिखना चाहिए पर हमें लिखना नहीं आता।’

वह एकदम गंभीर होकर बोले-‘वह भी आ जायेगा। कभी हमसे मिलना तो फिर तुम्हें मिलकर अपने बारे में बतायेंगे फिर हम पर लिखना।’’

हमने देखा कि  मेजबान उन मशहूर आदमी के स्वागत के लिए परिवार के महिलाएं और बच्चे इधर-उधर  भागमभाग कर रहे थे और हमें इसीलिये वहंा बिठा गये थे कि हम उनको बातचीत में व्यस्त रख सकें।

इतनी सी बात के बाद दोनों तरफ खामोशी छा गयी। हमने सोचा-‘कौन अपने को इनसे कोई जुगाड़ लगानी है जो अधिक चाटुकारिता करें।’

जब मेजबान अंदर आये तो खामोशी देखकर उनसे बोले-‘हां साहब, आप आये तो हमारा घर पवित्र हो गया।’

हमने देखा कि मशहूर आदमी का उस पर कोई प्रभाव नहंी हुआ वह बोले-‘सुनो यह अधिक तामझाम कर हमें बहलाओ नहीं। साफ-साफ बताओं हमारे पैसे कब लौटा रहे हो। यह तो तुमने हमें बुलाया पर हम तो खुद भी आते। आखिर पैसे का मामला है इसमें कोई समझौता नहीं हो सकता।’

मेजबान का मूंह उतर गया और बोले-‘‘अभी तो यह मकान बनाया है। मैने पहले ही बता दिया था कि कम से कम दो वर्ष लगेंगे। फिर उन लोगों ने जितना ब्याज बताया था उसक दूना ले रहे हैं। मेरी तो आपसे सीधे बातचीत हुई थी पर अब वह आपके लोग मुझे तंग कर रहे हैं।’’

मशहूर सज्जन रुखे स्वर में बोले-‘ तुम्हें पता है कि हम अपना काम स्वयं तो देखते नहीं। उन्हीं लोगों पर निर्भर है तो हम तो उनकी बात ही मानेंगे। हां यह मुझे अब ध्यान आया कि तुमने दो साल कहे थे। अभी कितना समय हुआ है?’

‘उसने कहा अभी तो 11 महीने हुए हैं।’’ मेजबान सज्जन ने कहा।

अब मशहूर आदमी ठंडे हुए और बोले-‘‘हो सकता है उन लोगों से कोई कागज पत्र पढ़ने में गलती हुई हो, पर तुमने छह महीने का ब्याज नहीं दिया है वह तो तय हुआ था कि हर महीने दोगे।’’

मेजबान सज्जन ने कहा-‘‘आपके लोग मान कहां रहे हैं। वह तो ब्याज अधिक लगा रहे हैं। जितना आपसे तय हुआ था उससे दूना लगा रहे हैं।’’

मशहूर आदमी ने कहा-‘‘ठीक है जितनी मेरे से बात हुई थी उतना दे दो फिर मैं उनको समझा दूंगा। नहीं तो वह फिर तुम पर गुस्सा कर बैठेंगे।’’

मेजबान अंदर गये और नोटों की गड्डी ले आये और उनको थमा दी। उसके बाद वह चले गये तो मेजबान ने चैन की सांस ली। फिर हमसे बोले-‘यार, अच्छा ही हुआ तुम थे। वरना जाने क्या-क्या सुनाता?’’

हमने कहा-‘पर यह मशहूर आदमी तो नैतिकता और परोपकार की बातें करता है। अगर मैं गलती पर नहीं हूं तो यह आदमी सूदखोरी का विरोध भी करता है।’’

मेजबान ने कहा-‘‘यार, जो जिस बात के लिये मशहूर हो समझो उस काम का   उसे शऊर भी हो यह जरूरी नहीं है।  इनका सच वही है जो तुमने देखा पर किसी से कहोगे भी तो कौन मानेगा?’’

हम भी उठकर चलने को हुए और कहा-‘‘अभी नहीं तो कभी इस पर लिखेंगे तो सही।’
उसने कहा-‘क्या लिखोगे?’

हमने कहा-‘‘मशहूर होने से शऊर नही आ जाता।’’


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