Tag Archives: hindi sher

पहाड़ से टूटे पत्थर-हिन्दी व्यंग्य कविता


पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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नोटों से भरा है दिल जिनका-हिन्दी कविता (noton se bhara hai dil jinka-hindi poem)


हलवाई कभी अपनी मिठाई नहीं खाते
फिर भी तरोताजा नज़र आते हैं।
बेच रहे हैं जो सामान शहर में
उनकी दवा और सब्जी शामिल हैं जहर में
कहीं न उनके मुंह में भी जाता है
मग़र गज़ब है उनका हाज़मा
ज़हर को अमृत की तरह पचा जाते हैं।
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सुनते हैं हर शहर में
दूध, दही और सब्जी के साथ
ज़हर बिक रहा है,
फिर भी मरने वालों से अधिक
जिंदा लोग घूमते दिखाई दे रहे हैं,
सच कहते हैं कि
पैसे में बहुत ताकत है
इसलिये नोटों से भरा है दिल जिनका
बिगड़ा नहीं उनका तिनका
बेशर्म पेट में जहर भी अमृत की तरह टिक रहा है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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अमृत तो पी गए फ़रिश्ते-व्यंग्य कविताएँ (amrut aur zahar-vyangya kavitaean)


फरिश्तों ने छोड़ दिया दौलत का घर
मासूम इंसानों के लिए.
पर शैतानों ने कर लिया उस पर कब्जा,
दिखाया इंसानियत का जज्बा,
करोडों से भर रहे हैं अपने घर
पाई से जला रहे चिराग जमाने के लिए.
वह भी रखे अपने घर की देहरी पर
अपनी मालिकी जताने के लिए.
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जितनी चमक है उनकी शयों में
जहर उससे ज्यादा भरा है.
अमृत तो पी गए फ़रिश्ते किसी तरह बचाकर
छोड़ दिया अपने हाल पर दुनिया को
उसे पचाकर,
शैतानों ने हर शय को सजाकर,
रख दिया बाज़ार में,
कहते भले हों अमृत उसमें भरा है.
पर वह अब इस दुनिया में कहाँ धरा है.
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

साहब बनने निकलते गुलाम बन जाते-व्यंग्य कविता


साहब जैसी जिंदगी जीने का
सपना लिये निकलते हैं सब
किताबें-दर-किताबें पढ़ते जाते
अपना पसीना बहाते हुए
कागजों के ढेर के ढेर रंगते जाते
फिर नौकरी पाने की कतार में
बड़ी उम्मीद के साथ खडे हो जाते
पता ही नहीं चलता गुलाम बन जाते कब
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साहब क्या जाने गुलाम का दर्द
उनको मालुम रहते अपने हक
याद नहीं रहते फर्ज
उनका किया सब जायज
क्योंकि एक ढूंढो हजार लोग
गुलामी के लिये मिल जातें
साहब बनने की दौड़ में
भला कितने दौड़ पाते
साहब तो टपकते हैं आकाश से
क्या जानेंगे धरती के गुलामों का दर्द
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‘काश! हमारी किस्मत भी परिंदों जैसी होती’-हिन्दी शायरी


ऊपर उठ कर आसमान छू लेने की
चाहत किसमें नहीं होती
पर परिंदों जैसी
किस्मंत सभी की नहीं होती
उड़ते हैं आसमान में
पर उसे छू कर देखने की
ख्वाहिश उनमें नहीं होती
उड़ नहीं सकता आसमान में
फिर भी इंसान की
नजरें उसी पर होती
उड़ते हुए परिंदे
आसमान से जमीन पर भी आ जाते
पर इंसान के कदम जमीन पर होते
पर ख्याल कभी उस पर नहीं टिक पाते
लिखीं गयी ढेर सारी किताबें
आकाश के स्वर्ग में जगह दिलाने के लिए
जिसमें होतीं है ढेर सारी नसीहतें
पढ़कर जिनको आदमी अक्ल बंद होती
अपने पैर में जंजीरें डालकर
आदमी फिर भी कहता है
‘काश हमारी किस्मत भी परिंदों जैसी होती’
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मन के समंदर में तैरते हैं बस नाम-हिन्दी शायरी


मन के समंदर में उठती लहरें
कई नाम है जो नाव की तरह
लहराते निकल जाते हैं
जिसका किनारा आ गया
वह साथ छोड़कर चला गया
वह लहरें भी रूप बदल देती
जिनके साथ वह खेल जाते हैं
एक लहर आती, एक नाव ले आती
उसके रुखसत होने के पहले ही
दूसरी उठती नजर आती
हर किसी का मन है समंदर
सबकी अलग अलग कहानी हैं
कुछ लहरों के साथ ही बहते
तो कुछ दृष्टा बनकर
लहर और नाव का खेल देखते जाते हैं
मन के समंदर में तैरते हैं बस नाम
हाथ में तो सबके किरकिरी नजर आती है
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