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साईं बाबा के भक्तों की आस्था के विरुद्ध अभियान पर सवाल और बवाल-हिंदी चिंत्तन लेख


             आज तक एक बात समझ में नहीं आई कि धर्म और अध्यात्मिक ज्ञान के बीच कोई संबंध है या नहीं? कुछ कथित धर्म विशेषज्ञ अपने अध्यात्मिक ज्ञानी होने का दावा करते हैं पर प्रवचन सांसरिक विषय पर देते हैं। अनेक कथित धर्मभीरु योद्धा  आध्यात्मिक पुरुष होने का दावा करते हुए समाज में अस्त्रों शस्त्रों की मदद से शांति तथा नैतिकता लाने का प्रयास करते हैं।  अनेक लोग द्रव्यमय यज्ञ को ही धर्म का प्रतीक मानते हैं तो अनेक ज्ञान से ही धर्म की रक्षा करना संभव मानते हैं।  कौन धार्मिक और कौन अध्यात्मिक स्वभाव का है यह पहचान किसी को नहीं रही।  इस भ्रमपूर्ण स्थिति ने समाज में अनेक अनेक उपसमूह बना दिये हैं।  श्रीमद्भागवत् गीता ने गुरु महिमा का वर्णन है पर कथित धर्म के ठेकेदार यह पदवी स्वयंभू  धारण कर अपने शिष्यों का एक प्रथक पंथ बना देते हैं। इन्हीं पंथों के बीच श्रेष्ठता की होड़ समाज में तनाव को जन्म देती है और भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान कहंी एक कोने में पड़ा कराह रहा होता है। यह स्थिति अभी शिरडी के सांई बाबा को भगवान न मानने को लेकर प्रकट हुई है।

            एक कथित धर्म संसद में शिरडी के सांई बाबा की मूर्तियां उन मंदिरों से हटाने का निर्णय लिया गया जहां भगवान के दूसरे रूपों की मूर्तियां स्थिति हैं।  इनमें से कुछ ऐसे मंदिरों से सांई बाबा की मूर्तियां हटाई गईं जहां मंदिर के निर्माण के समय ही स्थापित की गयीं थी। वहां भगवान के विभिन्न स्वरूपों की प्रतिमायें स्थापित तो की गयीं पर उस मंदिर की लोकप्रियता बढ़ाने की दृष्टि से सांई बाबा की मूर्ति भी लगाई गयी।  अब यह कहना कठिन है कि ऐसे मंदिरों की लोकप्रियता किस कारण बढ़ी पर एक बात तय है कि अब हटाने से  विवाद बढ़ेगा।

            हम सांई बाबा के भक्त न भी हों पर अगर हमारे अंदर भारतीय अध्यात्म ज्ञान के प्रति रुझान है तो कभी भी किसी की भक्ति पर आक्षेप करना ठीक नहीं लगता।  भारतीय अध्यात्म ज्ञान की धारा में बहने वाले सकारात्मक विचारक होते हैं। वह अपनी मन की बात कहते हैं पर दूसरे को आघात नहीं पहुंचाते।  दूसरे के दोष निकालकर अपने इष्ट के गुणों का प्रचार करना अहंकार के भाव को दर्शाता है। वैसे भी श्रीमद्भागवत गीता में भक्तों के चार प्रकार बताये गयें हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  इसका मतलब यह है कि अगर हम ज्ञान साधक हैं तो  अन्य तीनों भाव वाले भक्तों की उपस्थिति सहजता से मान्य करनी होगी।

            देश में आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में हमेशा ही एक अंतर्द्वंद्व की स्थिति रही है। इसलिये आर्ती तथा अर्थार्थी भाव वाले भक्त जहां अपने मन की शांति मिलने की आशा होती है वहीं जाते हैं।  इन्हें अध्यात्मिक ज्ञान से अधिक अपने सांसरिक विषयों की चिंता रहती है।  उनकी इस प्रवृत्ति का लाभ उठाने वाले कम नहीं हैं।  इस प्रयास में ऐसे लोग भी शािमल होते हैं जिनके हृदय में माया से मिलने का सपना होता हैै पर मुख से राम का जाप करते हुए मिलते हैं। सांई बाबा भगवान नहीं थे हम यह मानते हैं पर  जो भगवान मानते हैं उनका मन दुखाने वालों को ज्ञानी नहीं कह सकते।  ऐसे लोग वेदों से श्लोक लाकर लोगों के बीच अपनी विद्वता प्रचारित कर रहे हैं पर श्रीमद्भावगत् गीता से मुंह छिपा रहे हैं।  उसमें साफ लिखा है कि कुछ भक्त मुझे सीधा न पूजकर देवताओं और प्रेतों की पूजा करते हैं वह अंततः मेरक  ही भक्त हैं और मैं उनको उनकी इच्छानुसार कुशलक्षेम उपलब्ध करा देता हूं। ऐसे भक्तों को ज्ञानी से कमतर अवश्य माना गया है पर हार्दिक भाव होने पर उनके प्रति भी सद्भाव दिखाना आवश्यक दिखाया गया है।

            चाणक्य कहते हैं कि ज्ञानियों का भगवान सर्वत्र व्याप्त है।  हमारा मानना है कि भगवान भी भक्तों से बनता है।  श्रीकृष्ण भगवान ने स्पष्ट कहा है कि सच्चा भक्त मेरा ही रूप है। ऐसे में ज्ञानियों के लिये भी सांई बाबा भगवान नहीं है पर उनके भक्तों को देखकर यह आभास तो होता ही है उनकी पूजा की निंदा करना अपने अज्ञान का प्रमाण देना है।

            हमारा मानना है कि सांईबाबा की लोकप्रियता उनके ज्ञान के नहीं वरन् सांसरिक विषयों में चमत्कार के कारण बनी है। उनके भक्त भी यही मानते हैं कि हम उनकी पूजा अपने जीवन में चमत्कार की आशा या संभावना से ही कर रहे हैं।  वह फकीर थे पर उनके भक्त ही बताते हैं कि अंतिम समय में उन्होंने अपने सोने के सिक्के अपने एक परम भक्त को सौंपे थे।  इसका मतलब वह भी कहीं न कहीं संग्रह करते थे और यह बात फकीर की उपाधि धारण करने वाले व्यक्ति पर जमती नहीं पर बात आकर वहीं अटकती है  कि उनके भक्तों की भक्ति पर हमला करना ठीक नहीं।  सांईबाबा के विरुद्ध चलाया गया अभियान सात्विक कर्म नहीं है। जो इसे चला रहे उनकी प्रवृत्तियां राजसी हैं और कहीं न कहीं अपना अज्ञात लक्ष्य पूरा करने के लिये प्रयासरत हैं। इस विषय में हिन्दू धर्म से जुड़े बुद्धिमान लोगों का मौन रहना अब ठीक नहीं लगता।  हमने देखा है कि हिन्दू धर्म के स्वतंत्र विचारक इस विवाद से दूर रहना चाहते हैं पर उन्हें यह समझना चाहिये कि सांई बाबा के भक्तों के भाव पर आघात भारतवर्ष की एकता को प्रताड़ित करना होगा।  सांई भक्त भारतीय धर्मों से अलग नहीं है।  वह ऐसा कुछ नहीं कर रहे जिसे भारतीय अध्यात्मिक दर्शन आहत हो जबकि  उनके विरोधी श्रीमद्भागवत गीता और वेदों की चर्चा करते हैं पर आचरण ठीक उसके विपरीत है। हिन्दू धर्म से जुड़े वह विद्वान जिन्हें अपने ज्ञान से दान नहीं चाहिये उन्हें अब अपनी बात स्पष्तः रखनी चाहिये ताकि इस विवाद से समाज में हानि उत्पन्न न हो।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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हिन्दी के अखबार-हिन्दी दिवस पर व्यंग्य कविता (hindi ke akhbar-hindi diwas par vyangya kavita)


अखबार आज का ही है
खबरें ऐसा लगता है पहले भी पढ़ी हैं
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

ट्रेक्टर की ट्रक से
या स्कूटर की बस से भिड़ंत
कुछ जिंदगियों का हुआ अंत
यह कल भी पढ़ा था
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

भाई ने भाई ने
पुत्र ने पिता को
जीजा ने साले को
कहीं मार दिया
ऐसी खबरें भी पिछले दिनों पढ़ चुके
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

कहीं सोना तो
कहीं रुपया
कहीं वाहन लुटा
लगता है पहले भी कहीं पढ़ा है
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

रंगे हाथ भ्रष्टाचार करते पकड़े गये
कुछ बाइज्जत बरी हो गये
कुछ की जांच जारी है
पहले भी ऐसी खबरें पढ़ी
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

अखबार रोज आता है
तारीख बदली है
पर तय खबरें रोज दिखती हैं
ऐसा लगता है पहले भी भी पढ़ी हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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समाज हिन्दी भाषा का महत्व समझे- हिन्दी दिवस पर विशेष चिंतन आलेख (hindi ka mahatva-hindi chitan lekh on hindi divas)


       सुना है अब इंटरनेट में लैटिन के साथ ही देवनागरी में भी खोज सुगम होने वाली है। यह एक अच्छी खबर है मगर इससे हिंदी भाषा के पढ़ने और लिखने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ जायेगी, यह आशा करना एकदम गलत होगा। सच तो यह है कि अगर देवनागरी में खोज सुगम हुई भी तो भी इसी मंथर गति से ही हिंदी लेखन और पठन में बढ़ोतरी होगी जैसे अब हो रही है। हिंदी को लेकर जितनी उछलकूल दिखती है उतनी वास्तविकता जमीन पर नहीं है। सच कहें तो कभी कभी तो लगता है कि हम हिंदी में इसलिये लिख पढ़े रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी हमारे समझ में नहीं आती। हम हिंदी में लिख पढ़ते भी इसलिये भी है ताकि जैसा लेखक ने लिखा है वैसा ही समझ में आये। वरना तो जिनको थोड़ी बहुत अंग्रेजी आती है उनको तो हिंदी में लिखा दोयम दर्जे का लगता है। वैसे अंतर्जाल पर हम लोगों की अंग्रेजी देखने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि लोगों की अंग्रेजी भी कोई परिपक्व है इस पर विश्वास नहीं करना चाहिए-क्योंकि बात समझ में आ गयी तो फिर कौन उसका व्याकरण देखता है और अगर दूसरे ढंग से भी समझा तो कौन परख सकता है कि उसने वैसा ही पढ़ा जैसा लिखा गया था। बहरहाल अंग्रेजी के प्रति मोह लोगों का इसलिये अधिक नहीं है कि उसमें बहुत कुछ लिखा गया है बल्कि वह दिखाते हैं ताकि लोग उनको पढ़ालिखा इंसान समझें।
       ‘आप इतना पढ़ें लिखें हैं फिर भी आपको अंग्रेजी नहीं आती-‘’हिंदी में पढ़े लिखे एक सज्जन से उनके पहचान वाले लड़के ने कहा’‘-हमें तो आती है, क्योंकि अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं न!’
          मध्यम वर्ग की यह नयी पीढ़ी हिंदी के प्रति रुझान दिखाने की बजाय उसकी उपेक्षा में आधुनिकता का बोध इस तरह कराती है जैसे कि ‘नयी भारतीय सभ्यता’ का यह एक  प्रतीक हो। इनमें तो कई ऐसे हैं जिनकी हिंदी तो  गड़बड़ है साथ  ही  इंग्लिश भी कोई बहुत अच्छी  नहीं है।
       जैसे जैसे हिंदी भाषी क्षेत्रों में सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों और महाविद्यालयों के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है-निजी क्षेत्र में अंग्रेजी की शिक्षा का प्रसार बढ़ा है। एक दौर था जब सरकारी विद्यालयों में प्रवेश पाना ही एक विजय समझा जाता था-उस समय निजी क्षेत्र के छात्रों को फुरसतिया समझा जाता था। उस समय के दौर के विद्यार्थियों ने हिंदी का अध्ययन अच्छी तरह किया। शायद उनमें से ही अब ऐसे लोग हैं जो हिंदी में लेखन बेहतर ढंग से करते हैं। अब अगर हिंदी अच्छे लिखेंगे तो वही लोग जिनके माता पिता फीस के कारण अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालयों में नहीं पढ़ा सकते और सरकारी विद्यालयों में ही जो अपना भविष्य बनाने जाते हैं।
       एक समय इस लेखक ने अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध स्तंभकार श्री खुशवंत सिंह के इस बयान पर विरोध करते हुए एक अखबार में पत्र तक लिख डाला‘जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदी गरीब भाषा है।’
       बाद में पता लगा कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा बल्कि उनका आशय था कि ‘हिन्दुस्तान में हिंदी गरीबों की भाषा है’। तब अखबार वालों पर भरोसा था इसलिये मानते थे कि उन्होंने ऐसा कहा होगा पर अब जब अपनी आंखों के सामने बयानों की तोड़मोड़ देख रहे हैं तो मानना पड़ता है कि ऐसा ही हुआ होगा। बहरहाल यह लेखक उनकी आलोचना के लिये अब क्षमाप्रार्थी है क्योंकि अब यह लगने लगा है कि वाकई हिंदी गरीबों की भाषा है। इन्हीं अल्पधनी परिवारों में ही हिंदी का अब भविष्य निर्भर है इसमें संदेह नहीं और यह आशा करना भी बुरा नहीं कि आगे इसका प्रसार अंतर्जाल पर बढ़ेगा, क्योंकि यही वर्ग हमारे देश में सबसे बड़ा है।
       समस्या यह है कि इस समय कितने लोग हैं जो अब तक विलासिता की शय समझे जा रहे अंतर्जाल पर सक्रिय होंगे या उसका खर्च वहन कर सकते हैं। इस समय तो धनी, उच्च मध्यम, सामान्य मध्यम वर्ग तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिये ही यह एक ऐसी सुविधा है जिसका वह प्रयोग कर रहे हैं और इनमें अधिकतर की नयी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित है। जब हम अंतर्जाल की बात करते हैं तो इन्हीं वर्गों में सक्रिय प्रयोक्ताओं से अभी वास्ता पड़ता है और उनके लिये अभी भी अंग्रेजी पढ़ना ही एक ‘फैशनेबल’ बात है। ऐसे में भले ही सर्च इंजिनों में भले ही देवनागरी करण हो जाये पर लोगों की आदत ऐसे नहीं जायेगी। अभी क्या गूगल हिंदी के लिये कम सुविधा दे रहा है। उसके ईमेल पर भी हिंदी की सुविधा है। ब्लाग स्पाट पर हिंदी लिखने की सुविधा का उपयेाग करते हुए अनेक लोगों को तीन साल का समय हो गया है। अगर हिंदी में लिखने की इच्छा वाले पूरा समाज होता तो क्या इतने कम ब्लाग लेखक होते? पढ़ने वालों का आंकड़ा भी कोई गुणात्मक वुद्धि नहीं दर्शा रहा।
       गूगल के ईमेल पर हिंदी लिखने की सुविधा की चर्चा करने पर एक नवयौवना का जवाब बड़ा अच्छा था-‘अंकल हम उसका यूज (उपयोग) नहीं करते, हमारे मोस्टली (अधिकतर) फ्रैंड्स हिंदी नहीं समझते। हिंदी भी उनको इंग्लिश (रोमन लिपि) में लिखना पसंद है। सभी अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं। जो हिंदी वाले भी हैं वह भी इससे नहीं लिखते।’
ऐसे लोगों को समझाना कठिन है। कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी की कितनी भी सुविधा अंतर्जाल पर आ जाये उसका लाभ तब तक नहीं है जब तक उसे सामान्य समाज की आदत नहीं बनाया जाता। इसका दूसरा मार्ग यह है कि इंटरनेट कनेक्शन सस्ते हो जायें तो अल्प धन वाला वर्ग भी इससे जुड़े  जिसके बच्चों को हिंदी माध्यम में शिक्षा मजबूरीवश लेनी पड़ रही है। यकीनन इसी वर्ग के हिंदी भाषा का भविष्य को समृद्ध करेगा। ऐसा नहीं कि उच्च वर्ग में हिंदी प्रेम करने वाले नहीं है-अगर ऐसा होता तो इस समय इतने लिखने वाले नहीं होते-पर उनकी संख्या कम है। ऐसा लिखने वाले निरंकार भाव से लिख रहे हैं पर उनके सामने जो समाज है वह अहंकार भाव से फैशन की राह पर चलकर अपने को श्रेष्ठ समझता है जिसमे हिंदी से मुंह   फेरना एक प्रतीक माना जाता है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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