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कबीर के दोहे-अपने सुंदर और बड़े मकान पर अंहकार न करो


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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कबीर गर्व न कीजिए, ऊंचा देखि आवास
काल परौं भूईं लेटना, ऊपर जमसी घास

भावार्थ-अपना शानदार मकान और शानशौकत देख कर अपने मन में अभिमान मत पालो जब देह से आत्मा निकल जाती हैं तो देह जमीन पर रख दी जाती है और ऊपर से घास रख दी जाती है।
आज के संदर्भ में व्याख्या-यह कोई नैराश्यवादी विचार नहीं है बल्कि एक सत्य दर्शन है। चाहे अमीर हो या गरीब उसका अंत एक जैसा ही है। अगर इसे समझ लिया जाये तो कभी न तो दिखावटी खुशी होगी न मानसिक संताप। सबमें आत्मा का स्वरूप एक जैसा है पर जो लोग जीवन के सत्य को समझ लेते हैं वह सबके साथ समान व्यवहार करते हैं। हम जब किसी अमीर को देखते हैं तो उसको चमत्कृत दृष्टि से देखते हैं और कोई गरीब हमारे सामने होता है तो उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है। यह अज्ञान हमारे लिए कष्टकारक होता है। जब थोडा धन आता है तो मन में अंहकार आ जाता है और अगर नहीं होता तो निराशा में घिर जाते हैं और अपने अन्दर मौजूद आत्मा को नहीं जान पाते। यह आत्मा जब हमारी देह से निकल जाता है तो फिर कौन इस शरीर को पूछता है, यह अन्य लोगों की मृतक देह की स्थिति को देख सीख लेना चाहिये।
कई शानदार मकान बनते हैं पर समय के अनुसार सभी पुराने हो जाते हैं। कई महल ढह गये और कई राजा और जमींदार उसमें रहते हुए पुजे पर समय की धारा उनको बहा ले गयी। इनमें से कई का नाम लोग याद तक नहीं करते। हां, इतिहास उन लोगों को याद करता है जो समाज को कुछ दे जाते हैं। वैसे अपने इहकाल में भी किसी धनी को वही लोग सम्मान देते हैं जो उससे स्वार्थ की पूर्ति करते हैं पर जो ज्ञानी,प्रतिभाशाली और दयालु है समाज उसको वैसे ही सम्मान देता है यह जाने बगैर कि उसका घर कैसा है?
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कबीर के दोहे-दैहिक शिक्षा देने वाले शिक्षक अध्यात्मिक गुरू नहीं कहे जा सकते


पंख होत परबस पयों, सूआ के बुधि नांहि।
अंकिल बिहूना आदमी, यौ बंधा जग मांहि।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं बुद्धिमान पक्षी जिस तरह पंख होते हुए भी पिंजरे में फंस जाता है वैसे ही मनुष्य भी मोह माया के चक्क्र में फंसा रहता है जबकि उसकी बुद्धि में यह बात विद्यमान होती है कि यह सब मिथ्या है।

शब्द गुरु का शब्द है, काया का गुरु काय।
भक्ति करै नित शब्द की, सत्गुरु यौं समुझाय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो गुरु जीवन रहस्यों का शब्द ज्ञान दे वही गुरु है। जो गुरु केवल भौतिक शिक्षा देता है उसे गुरु नहीं माना जा सकता। गुरु तो उसे ही कहा जा सकता है जो भगवान की भक्ति करने का तरीका बताता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वर्तमान शिक्षा पद्धति में विद्यालयों और महाविद्यालयों में अनेक शिक्षक छात्रों को अपनी अपनी योग्यता के अनुसार पाठ्यक्रमों का अध्ययन कराते हैं पर उनको गुरु की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वर्तमान शिक्षा के समस्त पाठयक्रम केवल छात्र को नौकरी या व्यवसाय से संबंधित प्रदान करने के लिये जिससे कि वह अपनी देह का भरण भोषण कर सके। अक्सर देखा जाता है कि उनकी तुलना कुछ विद्वान लोग प्राचीन गुरुओं से करने लगते हैं। यह गलत है क्योंकि भौतिक शिक्षा का मनुष्य के अध्यात्मिक ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता।
उसी तरह देखा गया गया है कि अनेक शिक्षक योगासन, व्यायाम तथा देह को स्वस्थ रखने वाले उपाय सिखाते हैं परंतु उनको भी गुरुओं की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हां, ध्यान और भक्ति के साथ इस जीवन के रहस्यों का ज्ञान देने वाले ही लोग गुरु कहलाते हैं। तात्पर्य यह है कि जिनसे अध्यात्मिक ज्ञान मिलता है उनको ही गुरु कहा जा सकता है। वैसे आजकल तत्वज्ञान का रटा लगाकर प्रवचन करने वाले भी गुरु बन जाते हैं पर उनको व्यापारिक गुरु ही कहा जाना चाहिये। सच्चा गुंरु वह है जो निष्काम और निष्प्रयोजन भाव से अपने शिष्य को अध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है।
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कबीर के दोहे: शब्द हमेशा ही इस अन्तरिक्ष में विचरण करता है


कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार।
साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कटु वचन बहुत बुरे होते हैं और उनकी वजह से पूरा बदन जलने लगता है। जबकि मधुर वचन शीतल जल की तरह हैं और जब बोले जाते हैं तो ऐसा लगता है कि अमृत बरस रहा है।

शब्द न करैं मुलाहिजा, शब्द फिरै चहुं धार।
आपा पर जब चींहिया, तब गुरु सिष व्यवहार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शब्द किसी का मूंह नहीं ताकता। वह तो चारों ओर निर्विघ्न विचरण करता है। जब शब्द ज्ञान से अपने पराये का ज्ञान होता है तब गुरु शिष्य का संबंध स्वतः स्थापित हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- पिछले दिनों समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ कि अब लोगों में अपशब्द बोलना एक तरह से फैशन बनता जा रहा है। लोग अंतर्जाल पर गाली गलौच लिखना एक फैशन बना रहे हैं। यह वर्तमान विश्व समुदाय में अज्ञान और अहंकार की बढ़ती प्रवृत्ति का परिचायक है। पहले तो यह विचार करना जरूरी है कि हमारे शब्दों का प्रभाव किसी न किसी रूप में होता ही है। एक बात यह भी है कि हम जो शब्द बोलते हैं वह समाप्त नहीं हो जाता बल्कि हवा में तैरता रहता है। फिर समय पढ़ने पर वह उसी मुख की तरफ भी आता है जहां से बोला गया था। ऐसे में अगर हम अपने मुख से अपशब्द प्रवाहित करेंगे तो वह लौटकर कभी न कभी हमारे पास ही आने हैं। आज हम किसी से अपशब्द अपने मुख से बोलेंगे कल वही शब्द किसी अन्य द्वारा हमारे लिये बोलने पर लौट आयेगा। इस तरह तो अपशब्द बोलने और सुनने का क्रम कभी नहीं थमेगा।

इसलिये अच्छा यही है कि अपने मुख मधुर और दूसरे को प्रसन्न करने वाले शब्द बोलें जाये। लिखने का सौभाग्य मिले तो पाठक का हृदय प्रफुल्लित हो उठे ऐसें शब्द लिखें। पूरे विश्व समुदाय में गाली गलौच का प्रचलन कोई अच्छी बात नहीं है। ब्रिटेन हो या भारत या अमेरिका इस तरह की प्रवृत्ति ही विश्व में तनाव पैदा कर रही है। हम आज आतंकवाद और मादक द्रव्यों से विश्व समुदाय को बचाने का प्रयास कर रहे हैं पर इसके के लिये यह जरूरी है कि अपने शब्द ज्ञान का अहिंसक उपयोग करें तभी अन्य को समझा सकते हैं।
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भर्तृहरि शतकः बेइज्जत होने पर भी भूख कहाँ मिटती है


राजा भर्तृहरि कहते हैं कि
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भ्रान्तं देशमनेकदुर्गविषमं प्राप्तं न किंचित्फलं त्यकत्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला।
भुक्तं मानिववर्जितं परगुहेध्वाशंक्या काकवततृष्णे दुर्गतिपापकर्मनिरते नाद्यापि संतुष्यसि ।।

हिंदी में भावार्थ- राजा भर्तृहरि कहते हैं कि अनेक दुर्गम और कठिन देशों में गया पर वहां कुछ भी न मिला। अपनी जाति और कुल का अभिमान त्याग कर दूसरों की सेवा की पर वह निष्फल गयी। आखिर में कौवे की भांति भयभीत और अपमानित होकर दूसरों के घरों में आश्रय ढूंढता रहा। अपने मन की तृष्णा यह सब झेलने पर भी शांत नहीं हुई।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- मन की तृष्णा आदमी को हर तरह का अपमान और दुर्गति झेलने को विवश करती है। कहते हैं कि जिसने पेट दिया है वह उसके लिये भोजन भी देगा पर आदमी को इस पर विश्वास नहीं है। इसके अलावा वह केवल दैहिक आवश्यकताओं से संतुष्ट नहीं होता। उसके मन में तो भोग विलास और प्रदर्शन के लिये धन पाने की ऐसी तृष्णा भरी रहती है जो उसे अपने से कम ज्ञानी और निम्न कोटि के लोगों की सेवा करने को विवश कर देती है जिनके पास धन है। वह उनकी सेवा में प्राणप्रण से इस आशा जुट जाता है कि वह धनी आदमी उस पर प्रसन्न होकर धन की बरसात कर देगा।
आदमी अपने से भी अल्प ज्ञानी बाहुबली और पदारूढ़ व्यक्ति के इर्दगिर्द घूमने लगता है कि वह उसका प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचा देगा। किसी भी आदमी की ऐसी तृष्णा शांत नहीं होती। इस दुनियां में हर बड़ा आदमी अपने से छोटे लोगों की सेवा तो लेता है पर अपने जैसा किसी को नहीं बनाता। छोटा आदमी धन और मान सम्मान पाने की इसी तृष्णा की वजह से इधर उधर भटकता है पर कभी उसके हाथ कुछ नहीं आता। मगर फिर भी वह चलता जाता है। उसकी तृष्ण उसे इस अंतहीन सिलसिले से परे तब तक नहीं हटने देती जब तक वह देह धारण किये रहता है।
जीवन के मूल तत्व को जानने वाले ज्ञानी इससे परे होकर विचार करते हैं और इसलिये जो मिल गया उससे संतुष्ट होकर भगवान की भक्ति में लीन हो जाते हैं। वह अपने तृष्णाओं के वशीभूत होकर इधर उधर नहीं भटकते जो कभी शांत ही नहीं होती।
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प्रचार ही होता है प्रमाण पत्र-हास्य व्यंग्य कविताएँ


रोगियों के लिये निशुल्क चिकित्सा शिविर
बहुत प्रचार कर उन्होंने लगाया
पंजीयन के लिये बस
पचास रुपये का नियम बनाया
खूब आये मरीज
इलाज में बाजार से खरीदने के लिये
एक पर्चा सभी डाक्टर ने थमाया
इस तरह अपने लिये उन्होंने
अपने धर्मात्मा होने का प्रमाण पत्र जुटाया
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ऊपर कमाई करने वालों ने
अपने लेने और देने के दामों को बढ़ाया
इसलिये भ्रष्टाचार विरोधी
पखवाड़े में कोई मामला सामने नहीं आया
धर्मात्मा हो गये हैं सभी जगह
लोगों ने अपने को समझाया

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मन के समंदर में लहर और नाव का खेल


मन के समंदर में उठती लहरें
कई नाम है जो नाव की तरह
लहराते निकल जाते हैं
जिसका किनारा आ गया
वह साथ छोड़कर चला गया
वह लहरें भी रूप बदल देती
जिनके साथ वह खेल जाते हैं
एक लहर आती, एक नाव ले आती
उसके रुखसत होने के पहले ही
दूसरी उठती नजर आती
हर किसी का मन है समंदर
सबकी अलग अलग कहानी हैं
कुछ लहरों के साथ ही बहते
तो कुछ दृष्टा बनकर
लहर और नाव का खेल देखते जाते हैं
मन के समंदर में तैरते हैं बस नाम
हाथ में तो सबके किरकिरी नजर आती है
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दीपक भारतदीप

जब क्रिकेट मैच होंगे तब अपने ब्लाग भी फ्लाप होंगेःव्यंग्य



क्रिकेट प्रतियोगिता समाप्त हो चुकी है। मैंने एक भी मैच नहीं देखा पर टीवी पर अनेक बार ऐसा अवसर आ जाता था जब मैं समाचार सुनना चाहता तो सामने इस पर चर्चा चलती मिलती। मैं बहुत बोर होता तब अपने किसी भी ब्लाग पर लिखने के लिये अपना कंप्यूटर खोलकर बैठ जाता। किसी ब्लाग पर जाता तो कोई न कोई ब्लाग लेखक इन मैचों पर पर लिखकर पढ़ने का जायका ही खराब कर देता। मैंने एक भी ऐसा ब्लाग नहीं खोलकर पढ़ा जिसमें इस प्रतियोगिता के मैच या खिलाड़ी के बारे में चर्चा का संभावना होती।

मैंने अपने एक ब्लाग में जिक्र किया था कि जब से यह प्रतियोगिता शुरू हुई तब से मेरे ब्लाग की पाठक संख्या कम हो गयी थी। कहां तो मेरी हास्य कविताएं कुछ हिट ले आतीं और कहां इन मैचों के चलते फ्लाप हो गयी। हिंदी के सभी ब्लाग दिखाने वाले फोरमों पर जाने में ही संकोच होता पर जाना तो पड़ता ही है। अगर किसी दूसरे का पढ़ेंगे नहीं तो लिखेंगे क्या खाक? बहरहाल पिछले दो दिन से लग रहा है कि पाठक संख्या फिर उसी पटरी पर आ रही है। मेरा दीपक बापू कहिन जिस तरह आगे बढ़ रहा था उसके अगल रविवार तक ही बीस हजार पाठक संख्या होने की संभावना थी पर कल और आज उसकी पाठक संख्या दुगनी हो गयी जो कि पहले सामान्य थी और यह उसने यह लक्ष्य आज ही प्राप्त कर दिखाया।
मैं सोच रहा था कि जिस तरह क्रिकेट के चलते पहले जनसामान्य की गतिविधियों में शिथिलता देखी जाती थी वह अब अंतर्जाल पर भी दिख रही है। अंतर्जाल एकदम आधुनिक व्यक्तियों के लिये लिखने और पढ़ने की जगह है और अब इसी वर्ग में ही क्रिकेट देखने वाले अधिक रह गये हैं। मैंने एक अन्य बात भी देखी वह यह कि किसी दिन मैच न हो या अच्छा न हो तो इन ब्लाग पर पाठकों की संख्या बढ़ जाती थी तब मैं कनखियों से टीवी देखकर यह अनुमान करता था कि लोगों का आज के मैच में रुझान नहीं है।
प्रसंग वश याद आया कि जब पिछले साल विश्व कप हो रहा था तब नारद फोरम ने एक अलग कालम क्रिकेट के संबंध में बना दिया था जहां मेरी कृतिदेव और देव में लिखे पाठ बिना पंजीकरण के वहां दिखाये जबकि वह पढ़ने लायक थे ही नहीं। क्योंकि शीर्षक और शूरू की कुछ पंक्तियां मैं यूनिकोड में लिखता था पर बाकी पूरी सामग्री कृतिदेव में होती थी। वहां भारतीय टीम क्या पिटी नारद का कालम पिट गया और प्रतियोगिता से पहले ही उसे नारद से हटा दिया गया। इधर मैने यूनिकोड में लिखना शूरू किया तो पाठक भी बहुत अधिक मिलने लगे। मतलब यह कि आधुनिक लोगों में अभी भी क्रिकेट के प्रति रुझान है और उसकी वजह से अंतर्जाल पर पाठकों की संख्या में कमी आती रहेगी। एक बात मजे की है कि क्रिकेट का प्रत्यक्ष रूप से समर्थन करने वाले बहुत कम ब्लाग लेखक हैं पर लगता है कि कुछ अपने को बुद्धिजीवी सबित करने के लिए विरोध तो करते हैं पर चुपके-चुपके देखते भी हैं वरना इस प्रतियोगिता के दौरान पाठक संख्या कम नहीं होती। इस विषय पर मेरे आलोचनात्मक आलेखों और हास्य कविताओं पर कई लोगों ने क्रिकेट खेल पर अनेक प्रतिकूल टिप्पणियां कीं। इसके बावजूद भी यह एक वास्तविकता है कि एक बहुत बड़ा वर्ग इन मैचों को देखने के लिए टीवी से चिपका रहा। मैं यह दावा कभी नहीं करता कि मैं सही हूं पर अपने सभी ब्लाग पर पाठकों की संख्या देखकर मुझे यही लगता है कि जब क्रिकेट मैच होंगे तब अपने ब्लाग फ्लाप होंगे।

वैसे अंतर्जाल पर मेरा पहला लेखक क्रिकेट पर व्यंग्य करते हुए लिखा गया था और यह विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता शुरू होने से पहले की बात थी। मैंने शुरू के लीग मैचों को न देखने का विचार क्योंकि उस समय मैं अपने ब्लाग बनाने के लिये जूझ रहा था। जिस दिन भारत बंग्लादेश से हारा उस दिन मुझे अगले दिन सुबह इस समाचार का पता लगा। कीनिया को हराया तो मैंने लिखा था कि शेरों ने किया मेमनों का शिकार‘। यह आलेख नारद पर आये पर कोई पढ़ पाया होगा इसमें संदेह है। मैं क्रिकेट से विरक्त वैसे ही हो रहा था और अंतर्जाल पर लिखने का अवसर आने के बाद तो उससे और परे होना ही था पर विश्व कप में हारने के बाद तो एकदम उसके प्रति रुचि समाप्त हो गयी क्योंकि अब ब्लाग पर आगे बढ़ने का अवसर आ रहा था। हो सकता है कि मैं एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैचों में भी अब दिलचस्पी न लूं और यहीं बैठकर अपने पाठ लिखता रहूं यह जानते हुए भी कि वह फ्लाप होंगे।

सब मिल गया फिर उन्हें और क्या चाहिए-हास्य व्यंग्य


वह क्रिकेट खेले और विश्व कप जीतकर प्रतिष्ठा का वह इतना शिखर छू लें-जो एक आदमी के लिए दिवास्वप्न हो। वह चौके-छक्के मैदान पर लगाकर अपना बैंक बेलेंस बढा लें और अपने रहने के लिए महल बना लें जिसमें आधुनिक जीवन व्यतीत करने की सुविधा हो। उन्हें और क्या चाहिए?

वह फिल्मी दुनिया में करतब दिखाते हुए बादशाह बन जाएं। ऐसे व्यक्तित्व के मालिक हों जिसकी कल्पना देवलोक के देवताओ से ही मिलती हो। इस मायावी दुनिया में जो सुख गिनाए जाते हैं वह सब मिल गए हों। अपने और बेटे की प्रसिद्धि और साथ में खुशहाल परिवार। कोई कमी नहीं। रोज किसी अख़बार या टीवी चैनल पर उनके फिल्मों की चर्चा होती हो। खुद काम करें और बाद में अपने बेटों को भी इस लाइन में लाकर अभिनेता या निर्माता बना दें और वह भी चमकता सितारा हो। अगर बच्चे छोटे हों तो भी उनकी चर्चा मीडिया में होती हो उन्हें और क्या चाहिए।

फिर भी उनकी कुछ मजबूरियाँ हैं। उनको धार्मिक दिखना है और समाज के लोगों के सामने उसका प्रदर्शन करना है और ऐसे नहीं किसी एक धर्म का बल्कि दूसरे धर्म का भी सम्मान करते दिखना है। इस देश में धर्म की ताकत को सब जानते हैं। माया नहीं मिली तो भी सर्वशक्तिमान के घर आदमी जाता है और मिल जाती है तो भी धन्यवाद देने जाता है। सर्वशक्तिमान के घर सब मांगने नहीं जाते कुछ तो केवल अपने हृदय का भक्ति भाव अपना कर्तव्य समझ कर उसे व्यक्त करते हैं तो कुछ यह अपने को दिखाने जाते हैं की हम भक्ति करते हैं।

चलिए सब ठीक। पर एक पशु की बलि। ट्वेन्टी-ट्वेन्टी का विश्व कप जीता जो कि एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी उस पर तो कप्तान ने कुछ नहीं किया। तब किसी से मन्नत क्यों नहीं मांगी। उसका महत्त्व नहीं मालुम था। वह तो उचट कर लग गयी। उसमें मेहनत नहीं की। सोचा-‘यह भी कोई टूर्नामेंट है जो मन्नत मांगें।’
उस जीत में उनका कोई योगदान नहीं था। वह तो देश के लाखों क्रिकेट प्रेमियों की दुआएं थी तो सर्वशक्तिमान उनको विश्व का जितवा दिया।उनके अब इस व्यवहार से कम से कम अब तो ऐसा ही लगता है। जब जीतकर लौटे तो लोगों ने सिर आंखों पर बिठा लिया। वह कहीं भी मत्था टेकने नहीं गए क्योंकि उसमें सर्वशक्तिमान की कोई भूमिका उनको नजर नहीं आयी। कोई पशु बलिदान होने से बच गया।
अपने वरिष्ठ खिलाडियों के सन्यास से कमजोर हो रही आस्ट्रेलिया की टीम को हराने के लिए मन्नत मांगी। वह पूरी हो गयी। उसमें साथी खिलाडियों का कोई योगदान नहीं था क्योंकि वह तो मन्नत की वजह से उनमें शक्ति आ गयी थी। मन्नत के लिए जिस पशु का वध होना था उसकी बदकिस्मती से जीते कोई अपनी किस्मत थोडे थी।

किसका नाम लें और किसका नहीं! बडे हो जाते हैं पर चरित्र बौना ही रहता है। जिन्हें नयी पीढी को अपने कर्म पर विश्वास कर आगे बढ़ने का सन्देश देने का जिम्मा है वही उसे अन्धविश्वास के अँधेरे में धकेल रहे हैं। हर तरह के दरबारों में हाजिरी लगाते हैं। संदेह होता है कि भगवान को खुश कर रहे हैं या कोई और लोग हैं जिनको खुश कर अपना काम चला रहे हैं। इधर टूथपेस्ट, साबुन, कार, और गाडी का प्रचार और उधर हर तरह की दरबार में गुहार! यह तालमेल समझ में नहीं आता।

वैसे भी भक्ति कोई दिखाने की नहीं होती-भक्ति का मतलब है एकांत साधना। जो दिखाते हैं वह ढोंग होता है।आजकल लोग शिक्षकों से पढ़ते हैं पर जीवन के लिए कोई गुरु करते नहीं है इसलिए वह क्रिकेट और फिल्म से जुडे लोगों को अपना आदर्श मान लेते है। वह लोग शिखर पर होते हैं और समाज अपने शिखर पुरुषों का ही अनुकरण करता है। इसलिए बडे लोगों के ढोंग भी समाज का हिस्सा बनते जा रहे हैं। लोग इसलिए किसी दरबार में नहीं जाते कि वहाँ अपने भक्ति भाव व्यक्त करना है बल्कि उनका उद्देश्य यह दिखाना होता है कि हम भक्त हैं। ऐसे में किसे दोष दें और किसे नहीं।

तुम वापस ले जाओ यह बोतल-हास्य कविता


पुराने झोले में छिपाकर फंदेबाज
दारू की बोतल लाया
और उसके साथ नमकीन का
लिफाफा भी हाथ में थमाया
और बोला
”दीपक बापू लिखते-लिखते
ब्लोग पर तुम्हें एक वर्ष से
अधिक हो गया पर
फिर भी रहे तुम्हारे ब्लोग फ्लॉप
कल यह पीकर अपने ब्लोगों पर
विचरण करना हो जाओगे टॉप
जब से छोडा है तुमने पीना
मैं अकेला हो गया हूँ
पीने में तो मजा आता नहीं है
तुम फ्लॉप हो इसलिए कभी
तुम्हारा लिखा पढ़ने में भी मजा नहीं आया”

सुनकर हुए हैरान हुए
और अपनी खिसकती नेकर ऊपर खींचते
और अंग्रेजी टोपी साधते हुए
दारू की बोतल की तरफ
पहले ललचाती नजर से देखा
फिर संभाल कर बोले दीपक बापू
”हमारे लिखे में मजा तो
हमें भी नहीं आता
चिंतन लिखने बैठते तो व्यंग्य हो जाता
हास्य लिखने बैठते तो चुटकुला हो जाता
पर लिखने में फिर भी नशा बहुत आया

शराव पीकर अपने से
बहुत किया है खिलवाड़
अपने ही मुहँ से पीया जहर
दिया खून बिगाड़
नशेडी तो बचपन से हैं लिखने के
लेखक तो हैं बस दिखने के
दारू की बोतल का जिन्न अब
हमें लुभा नहीं पाता
अंतर्जाल पर इतना स्वतन्त्र लिखने का
नशा हमसे दूर नहीं हो पाता
हिट और फ्लॉप की फिक्र में
अपना समय कभी नहीं गंवाया
अपने बनाए शिखर पर बैठे तो
फिर किसी दूसरे का शिखर नहीं भाया
न खिलाड़ी हैं न निर्णायक
न गीतकार न गायक
अपनी श्रेणी के लिए कोई शब्द
हमें भी नहीं सूझ पाया
पोस्ट की बोतल में शब्दों की
वही शराब डालते हैं जो खुद पीते हैं
कहीं से कुछ ढूँढने की जरूरत नहीं
वही लिखते जो लम्हें हम जीते हैं
लिखते बहुत लोग हैं
पर उसके नशे में बहुत कम लोग जीते हैं
कोई लिखते-पढ़ते शराब पर लिखी शायरी
कोई पढता-लिखता कामुक डायरी
करते हैं अपनी देह को शिथिल
कहीं थोडी परेशानी आ जाये
घबडा जाता है दिल
कहा है स्वामी समीरानंद ने
दीपक बापू अलख जगायेंगे
भले ही किया होगा मजाक
पर हम जानते हैं
लोग हमसे यही करवाएंगे
फिर किसकी फिक्र में पीयें
हिट और फ्लॉप की फिक्र में क्यों जीयें
अपनी पोस्टें लेकर जंग के लिए
हम कभी नहीं निकलते
जो हिट हैं वह फ्लॉप की फिक्र में
हो जाते हैं दुबले
और जो फ्लॉप हैं वह शर्म के मारे
अपने घर से नहीं निकलते
हमें तो दर्शक दीर्घा में
बैठने का ही लेना है मजा
तुम वापस ले जाओ यह बोतल
हमने बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाया
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तो यह था एक बकरे का बलिदान-हास्य कविता


आया फंदेबाज और बोला
दीपक बापू अंतर्जाल पर
“लिखते-लिखते तुम क्या पाओगे सम्मान
कहीं मन्नत मानो और हो जाओ हिट तो
करना किसी बकरे का बलिदान
आजकल भला मेहनत पर भरोसा कौन करता है
सर्वशक्तिमान भी कुछ लेकर काम करता है
अब छोडो अपनी प्रतिभा पर अभिमान
सिखा रहा है क्रिकेट का कप्तान”

कंप्यूटर पर लिखते-लिखते रुक गए हाथ
टोपी को घुमाकर बोले दीपक बापू
‘समझ गए अखबार पढ़ कर आ रहे हो
हमारा ब्लोग पढ़ते तो कुछ समझ पाते
माया घुमाती है आदमी को ऐसा कि
अच्छे खासे लोग शिकारी हो जाते
हम तो समझे थे कि
आस्ट्रेलिया में किला फतह
खिलाडियों के खेल की वजह से हुआ है
या फिर कोई जुआ हुआ है
पर बात आई समझ में
यमदूत भी रहे होंगे असमंजस में
बकरा रहा होगा कोई क्रिकेट प्रेमी
पापों की वजह से बकरे की योनि मिली होगी
किसी एक पुण्य की वजह से
अपनी मौत चुनने की छूट उसे होगी
माँगा होगा सर्वशक्तिमान से
उसने क्रिकेट के कप्तान के हाथों से
कटने का वरदान
इसीलिए हो गया बलिदान

यमदूतों ने ही की होगी मेहनत
सर्वशक्तिमान का हुक्म बजाना था
क्रिकेट की टीम को जितवाना था
ताकि बकरे को मिला
पूरा हो सके वरदान
कोई हलाल करे उसे क्रिकेट का कप्तान
इतनी मेहनत उन्होने शायद ही किसी
जीव को लाश बनाने पर की होगी
जिसने ऐसी कामना की होगी
अगर क्रिकेट की टीम हार जाती
बकरे की इच्छा अधूरी रह जाती
अब खुला है यह राज जाकर
कैसे चूहे शेर हो गए थे
कंगारू ढेर हो गए थे
यह था एक बकरे का बलिदान
हम क्यों कर रहे थे अपनी जीत पर अभिमान”
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मनुस्मृति:राज्य सभी धर्मों के पालन कराने वाला मध्यस्थ


१.देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त अपराधियों की शक्ति को देखते हुए राज्य को उन्हें उचित दण्ड देना चाहिए। सच तो यह है कि राज्य का दण्ड ही राष्ट्र में अनुशासन बनाए रखने में सहायक तथा सभी वर्गों के धर्म-पालन की व्यवस्था करने वाला मध्यस्थ होता है।
२.सारी प्रजा के रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है। भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा प्रसन्न होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।
३.यदि अपराधियों को सजा देने में राज्य सदैव सावधानी से काम नहीं लेता, तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोंगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बड़ी मछ्ली छोटी मछ्ली को खा जाती है।
४.संसार के सभी स्थावर-जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य का पालने करते और अपने-अपने भोग को भोगने में समर्थ होते हैं ।

अपना तनाव और थकावट बढाते हैं खुद लोग-आलेख


हमारे दर्शन के अनुसार मनुष्य योनि बहुत पुण्य करने पर मिलती है और अगर कोई इस योनि में दान-पुण्य और धर्म का निर्वाह नहीं करेगा तो उसे चौरासी लाख योनियों में भटकना पडेगा। नित-प्रतिदिन चाहे किसी सत्संग में जाये यही सुनने को मिलेगा।

मगर ज़रा समाज की हालत देखिये तो किस हाल में पहुंच गया है। बचपन से लेकर आज तक मैंने यहाँ लोगों के रंग-ढंग देखे हैं उससे मुझे हंसी आती है शायद यही कारण है की कभी गंभीर लेख लिखने बैठता हूँ तो व्यंग्य लिख जाता हूँ। कई लोगों को मैंने अपनी जिन्दगी में सघर्ष करते देखा। अपने परिवार और बच्चों के लिए रोटी जुटाने के लिए उन्होने जमकर संघर्ष किया और फिर लक्ष्मी जी की उन पर कृपा हुई तो सरस्वती ने विदा ले ली। उम्र के उस मोड़ पर उन्हें शराब पीते देखा जिसमें उसे छोडा जाता है।

उस दिन एक सगाई में गया। वहाँ लड़के के नाना को दारू पीते देखा। मेरे दादाजी से उनकी मित्रता थी और कई बार मैं अपने पिताजी के साथ उनके घर गया था। वह व्यापार के लिए बाहर जाते थे और कहीं से कुछ सामान लाते थे जो हमें सौंपते थे। वह शराब आदि नशे से दूर थे यह बात मैंने अपने बडे लोगों के मुख से सुनीं थी। उनको शराब पीता देख कर मैंने लड़के के पिता अपने मित्र से पूछा-”इन्होने कब से पीना शुरू की।”

उसने इधर-उधर देखा और बोला-”तुमने पीना कब बंद किया?”
उस समय मेरे सामने तीन लोग और थे और वहाँ मेरे लिए भी ग्लास तैयार किया गया था और मैंने उसे लेने से इनकार कर दिया। मैंने अपने मित्र से कहा–”अगर तुम यह सोचते हो कि में इसे पीने वाला हूँ तो भूल जाओ। मैंने पांच साल पहले पीना छोड़ दिया है। कभी कभार पी लेता था और वह भी एक वर्ष से बंद है। हाँ, तुम इस बात को टालों मत के तुम्हारे ससुर ने कब से पीना शुरू कर दिया है।”
मेरा मित्र वहाँ से खिसक गया तो एक अन्य दोस्त बोला-”इनको पीते हुए पंद्रह वर्ष हो गए हैं।”

मैंने हिसाब लगाया तो उन्होने पचपन वर्ष की आयु में पीना शुरू किया होगा। मेरा मेजबान मित्र फिर हमारे पास से गुजरा तो मैंने उसे बुलाया और कहा-”पर मेरी उम्र अभी पचपन नहीं हुई है तो पांच वर्ष पहले कैसे हो सकती थी। ऐसा लगता है कि तुम्हारे ससुर को गलत संगत लग गयी है।”

मेरा मित्र बोला ”तुमने अधिक पी ली है।
दूसरे मित्र ने कहा-”यह तो ले ही नहीं रहा है?”
मेरे मित्र ने कहा-”क्यों आज कैसे साधू बन रहे हो।”
मैंने कहा-”आखिर इमेज भी कोई चीज है। तुम खुद नहीं पीते हो और दूसरों को पथभ्रष्ट कर रहे हो। वैसे भी तुम बहुत चालाकी करते रहे हो पर अब नहीं चलेगी।”
वह हंसकर चला गया तो दूसरा मित्र बोला-”तो तुम्हें भी बाकी लोगों की तरह इसके बारे में गलतफहमी है कि यह पीता नहीं है। आओ चलो दिखाऊँ।”
वह मेरे कंधे पर हाथ रख कर बगीचे के पास बनी इमारत के एक कमरे में ले गया। मैंने देखा मेरा मित्र अपने कुछ खास लोगों में एक सज्जन के हाथ से ग्लास लेकर पी रहा था। मैंने अपने दोस्त को खींचा और वापस अपनी टेबल पर आ गया। दरासल मेरा वह मित्र बाहर काम करता था पर अपने अधिकतर रिश्तेदार हमारे शहर में होने के कारण यहीं सगाई कर रहा था।
बाद में मैंने उसे पाउच से कुछ निकाल कर जब धीमा जहर खाते देखा तो मुझे हैरानी हुई। मैंने अपने दूसरे दोस्त से कहाँ-”शराब तो ठीक! यह पाउच तो एकदम जहर जैसा है। कमाल यह लोग इसे खाते कैसे हैं?”

मेरे मित्र ने अपनी जेब से एक पाउच निकला और उसमें से दाने अपनी मुहँ में दाल दिए। और बोला-ऐसे।

शराब और अन्य व्यसन जिस तरह समाज का हिस्सा बन गए हैं उसे देखकर मैं सोचता हूँ कि हम जिस स्वस्थ भारत की बात करते हैं वह एक कल्पना है। लोग शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ दिखते हैं पर क्या वाकई होते हैं।

मैं जब पीता था तो किसी महफ़िल में जाने से पहले पीकर जाता था और वहाँ पीता था तो थोडी पीता था। उसमें भी मैंने कभी किसी से बदतमीजी नहीं की। कई बार लोग महफिलों में उधम मचा देते हैं। शराब पीने से आदमी के खून में तेजी आती है पर उसका फायदा उठाकर लोग बदतमीजी उसी से करते हैं जिससे डरते नहीं है। वरना अपने से ताक़तवर आदमी के आगे वह वैसे ही क्यों मिमियाते हैं जैसे बिना शराब के मिमियाते हैं, हालांकि यह एक अलग विषय है पर हम समाज की रीतियों को चला रहे हैं उसमें शराब और अन्य व्यसन कैसे शामिल किये गए हैं उसका कोई जवाब नहीं दे सकता है।

उस पर जिस तरह पाउचों का सेवन बढ़ रहा है वह आने वाले कॉम को किस हालत में पहुँचायेगा कहा नहीं जा सकता। उस दिन एक लड़का घर आया। वह पाउच खाता है। थोडी देर बैठने के बाद बोला-”मेरे सिर में दर्द हो रहा है। आपके पास कोई गोली है?”
मैंने कहा-”गोली तो नहीं है और होती तो भी देता नहीं। तुम अपनी जींस पर कसकर बंधा हुआ बेल्ट थोडा ढीला कर लो। तुम्हारा सिर दर्द थोडी देर में ख़त्म हो जायेगा नहीं तो फिर तुम्हें दूसरा उपाय बताऊंगा।”

उसने बेल्ट ढीला किया, उसके कुछ देर बाद भी वह बात करता रहा और फिर बोला–”मेरा सिर दर्द कम हो रहा है। पर कमाल है यह आपने सब कैसे सोचा?।”

मैंने उसे कहा-”तुमने मेरे सामने ही तीन पुडिया खाईं है और तुम्हारा कसा हुआ बेल्ट देखर मुझे लगा कि कहीं हवा का चक्कर है। तुम्हें बहुत जल्दी पता लग गया पर मुझे बहुत देर बाद समझ में आयी।”

हम अपने शरीर को निरर्थक कामों में अधिक लगा रहे हैं। शरीर के विकार तो दिखाई देते हैं पर मन के विकार तो कोई ही देख पाता है। अपने शरीर से खिलवाड़ करते लोगों पर मुझे बहुत तरस आता है क्योंकि एक समय मैं भी इस दौर से निकल चुका हूँ। वर्तमान हालत में लोगों पर तनाव अनेक कारणों से बढ़ रहा है पर उससे बचने के लिए जो उपाय करते हैं वह तनाव और बढा देते हैं। जब उस उपाय का असर ख़त्म होता है तो तनाव बढ़ने के साथ थकावट भी बढ़ जाती है।

पर मजबूरियाँ इसकी इजाजत नहीं देतीं=हिन्दी शायरी


कभी सोचते हैं कि दिमाग का बोझ उठाकर
जमीन पर फैंक दें
पर मजबूरियाँ इसकी इजाजत नहीं देतीं

कई जगहों पर खडे होने का मन नहीं करता
उकता जाते हैं मिलने वाले लोगों से
सोचते हैं चले जाएं परे वहाँ से
पर मजबूरियाँ इसकी इजाजत नहीं देतीं

हम बोलते हैं, पर सुनता कोई नहीं
बहरे कानों को सुनाते हैं दुखडा
न देख रही आंखों को दिखा रहे
अपना दिल, जो हो चुका टुकडा-टुकडा
कोई हमदर्दी नहीं दिखा रहा
सोचते हैं अकेले में अपने को समझाएं
पर मजबूरियाँ इसकी इजाजत नहीं देतीं

अपनी मजबूरियों के ढोने की ऐसी आदत है
उतारने पर हल्का हो जाने का डर होता है
उनसे मुक्ति की बहुत चाह है
पर मजबूरियाँ इसकी इजाजत नहीं देतीं

इसलिए महिला दिवस पर कुछ नहीं लिखा-आलेख


आज महिला दिवस है और मैं अपने आसपास देख रहा हूँ की शायद ही कोई महिला हो जिसे यह मालुम हो और अगर मालुम हो तो वह इसके प्रति गंभीर हो। ऐसे में महिला दिवस पर कुछ लिखने से कोई फायदा नजर नहीं आ रहा है। पिछली बार जब पुरुष दिवस था तो मैंने उस पर एक आलेख लिखा था तो उस पर एक महिला ब्लोगर ने टिप्पणी दी कि ” आज पुरुष दिवस पर हमें आपसे सहानुभूति है”। अगर मैं केवल यह भी लिख दूं तो उससे क्या? वैसे भी देखा जाये तो कई जगह पुरुषों को भी सहानुभूति की जरूरत होती है.
आजकल हर विषय पर दिवस मनाया जाता है और लिखने के लिए मसाला मिल जाता है पर वह इतना सामान्य होता है कि लगता है कि कुछ असामान्य लिखा जाये पर उसमें विवाद होने का ख़तरा है तो सोचा कि आज हम भी कुछ नहीं लिख रहे। कोई जरूरी है कि हम हर विषय पर लिखें।

फिर महिलाओं के बिना किसी पुरुष का अस्तित्व कैसे हो सकता है? उसी तरह एक पुरुष के बिना किसी स्त्री का अस्तित्व नहीं हो सकता है। आज टीवी और अखबार पर इस बारे में बहुत कुछ दिखाया जा रहा है। जिन महिलाओं ने अपने क्षेत्र में सफलता हासिल की है उनकी चर्चा है। होना चाहिए भी पर क्या जिन महिलाओं ने अपने घर संभाले उन पर कुछ नहीं लिखना चाहिए। स्त्री-पुरुष पर स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे निर्भर रहते हैं और अगर स्त्री पुरुष की घर में रहकर सेवा करती है तो पुरुष भी बाहर रहकर उसके घर की रक्षा करता है-अगर वह गृहस्वामी होता है स्त्री भी गृहस्वामिनी कहलाती है । आज खास और प्रसिद्ध महिलाओं के नाम लेकर आम महिला को क्या बताया जायेगा?

जो महिलाएं उस आयु में हैं जहाँ कुछ नया करने के लिए नहीं है उनको बताया जायेगा कि देखो ”तुम एक आम औरत हो” और जो नवयौवनाएं हैं उनको बताया जायेगा कि इन जैसा होने का सपना देखो। इस तरह विभिन्न विषयों पर दिवस मनाने की प्रवृति पश्चिम से आई है पर हमारे यहाँ मीडिया को इसे भुनाने का अवसर मिल रहा है। देखा जाये तो परिवार हो या समाज उसमें लिंग और आयु के आधार पर भेद कर नहीं चला जा सकता है-अगर पुरुष भर के बाहर के काम देखता है तो स्त्री घर का। बच्चा छोटा होता है तो माता-पिता उसे पालते हैं और जब बूढे होते हैं तो वह उनको पालता है।
एक तरफ मीडिया व्यक्तिगत रूप से उपलब्धियाँ प्राप्त करने वाली कामकाजी महिलाओं का प्रचार कर रहा है वहीं वह कामकाजी पति-पत्नी के बच्चों के भटकने की शिकायत करता है। कभी कोई ऐसी घटना होती है तो माँ-बाप के कामकाजी होने पर बहस होती हैं पर नतीजा सिफर। कोई स्थाई सन्देश नहीं आता यही वजह है कि हर वर्ष हर दिवस पर चर्चा और वैसी ही जैसी पहले हो चुकी है। सच तो यह है कि जिसके सामने जैसी स्थिति होती है वैसे ही वह चले लगता है। जहाँ पुरुष आय अर्जन के मामले में कमजोर होते हैं वहाँ महिलाएं यह भी मोर्चा संभालतीं हैं और जहाँ पुरुष भरपूर कमा रहा है वहाँ समय होते हुए भी औरतें समाज के लिए कोई काम नहीं करतीं। कहीं औरतें घर संभालने और कमाने के साथ समाज में अपने आसपास के लोगों की निष्काम भाव से मदद करतीं है। वैसे भी गृहस्थ औरतें कुछ ऐसे काम करतीं है जिनको हम कभी समाज सेवा के रूप में नहीं मानते-जैसे पड़ोस में कोई बच्चा बीमार हो तो उसकी माँ के साथ उसे अस्पताल ले जाना। कोई पड़ोस में गरीब बच्चा हो उसको कभी कभी अपने बच्चे के खिलोने देना। मतलब यह कि अपने आसपास के लोगों की मदद करने को भला कौन समाज सेवा मानेगा? उनका नाम तो तभी हो सकता है जब वह किसी ऐसी जगह पर हों जहाँ से प्रचार माध्यम रोज उस पर लिख सकें। महिलाओं की तरक्की से यही आशय प्रचारित करते हुए दिखाया जा रहा है कि वह घर से बाहर कोई उपलब्धि प्राप्त करे। सवाल यह है कि फिर घर कौन संभालेगा। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय महिलाएं जो घर का काम करतीं है उनका अगर भौतिक मूल्य आँका जाये तो वह पुरुषों से कई गुना अधिक है और उसके आधार निष्कर्ष निकाला जाये तो कहा जा सकता है कि जो काम पुरुष कर सकते हैं और उसे महिलाएं कर रहीं है तो वह आम गृहस्थ महिलाओं से कम कमा रहीं है। हालांकि यह फार्मूला उन महिलाओं पर लागू नहीं हो सकता जो बहुत अधिक कमा रही हैं।

सब अपनी जगह ठीक है। अपने परिवार , शिक्षा और आसपास के वातावरण के प्रभाव से सब अपने रास्ते पर चलते हैं। हाँ, जो स्त्री और पुरुष अपनी निजी उपलब्धियों और परिवार के अलग अगर समाज के लिए कुछ करते हैं या उसके कार्य से समाज के लिए कोई सन्देश होता है इतिहास में उसी का नाम दर्ज होता है।निज उपलब्धियों का सुख तो आदमी अपने जीवन में भोगने के साथ प्रचार भी पाता है पर समाज को उससे तथाकथित प्रेरणा के अलावा कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं होता।

बचपन से लेकर आजतक महिलाओं के हाथों से ही मैंने भोजन ग्रहण किया है और अपना जीवन आज भी उनके आधीन पाता हूँ। माँ, बहिनें, पत्नी और अन्य रिश्तेदार महिलाओं ने कितनी बार प्यार किया होगा। इसका कोई हिसाब नहीं है। फिर अपनी संस्कृति में धन्यवाद देने की परंपरा कहाँ है? जब घर-रिश्तेदारी की महिलाओं को कभी धन्यवाद नहीं दिया तो फिर आज महिला दिवस पर किसके लिए लिखें। हाँ मन में कृतज्ञता का भाव रहता है पर उसे व्यक्त करना आसान नहीं होता। घर-गृहस्थी का काम करने वाली महिलाओं को कम नहीं आँका जा सकता क्योंकि उनके कार्य का धनराशि में सत्यापन करना कोई आसान काम नहीं है। इसलिए जब कोई ऐसा सर्वेक्षण मिलेगा तभी कुछ लिखेंगे।

छूकर देखो अपना मन (कविता साहित्य)


मनोरंजन के लिए किसी
दृश्य, वस्तु या आदमी की चाहत
इन्सान को मजबूर करती है
इधर-उधर जाने के लिए
बाजार में कई बुत खडे है
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए

भटकते मन को चैन और खुशी
चंद सिक्के दिला देते हैं
जब ऊब जाये हंसने से
मनोरंजन के लिए दहला भी देते हैं
बिकता है मनोरंजन भी
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए

पर कोई ऐसी चीज नहीं मिलती जो
हर पल मन बहला सके
रोज पनपते दर्द को सहला सके
हालत यह होती की
जितने दर्द हल्का कर पाते
वह नये दर्द में जुड़कर चले आते
फिर चले जाते उन ठिकानों पर
जहाँ सजे हैं बाजार
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए

क्यों नहीं तलाशते
अपने मन में ही मनोरंजन
क्यों जाते उन लोगों के पास
जो बेचते नकली दवा दिल की
फिक्र उनको आदमी की नहीं
होती केवल अपने बिल की
कभी गानों की सजाते झूठी महफ़िल
कभी डर की रचना से बहलाते दिल
पूरी जिन्दगी गुजारते हैं
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए

छूकर देखो अपना मन
तन्हाई में देखो
अपने अन्दर लहलहाता चमन
वहीं राज छिपे हैं उसे बहलाने के लिए
फिर कभी न वहाँ जाओगे
जहाँ सजता है नकली रोशनी में बाजार
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए
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