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कमीज और कफन में कमीशन-हिन्दी कविता (kamij aur kafan mein commision-hindi pooem


जिंदगी में दोस्ती और रिश्तों के चेहरे बदल जाते हैं,
कुदरत के खेल देखिये, नतीजे सभी में वही आते हैं।
कमीज पर क्या, कफन में भी कमीशन की चाहत है,
दवाई लेने के इंतजार मे खड़े, कब हम बीमारी पाते हैं।
हमारी खुशियों ने हमेशा जमाने को बहुत सताया है,
गम आया कि नहीं, यही जानने लोग घर पर आते हैं।
कहें दीपक बापू, भरोसा और वफा बिकती बाज़ार में
इंसानों में जिंदा रहे जज़्बा, यही सोच हम निभाये जाते हैं।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

‘भ्रष्टाचार’ किसी कहानी का मुख्य विषय क्यों नहीं होता -आलेख


स्वतंत्रता के बाद देश का बौद्धिक वर्ग दो भागों में बंट गया हैं। एक तो वह जो प्रगतिशील है दूसरा वह जो नहीं प्रगतिशील नहीं है। कुछ लोग सांस्कृतिक और धर्मवादियों को भी गैर प्रगतिशील कहते हैं। दोनों प्रकार के लेखक और बुद्धिजीवी आपस में अनेक विषयों पर वाद विवाद करते हैं और देश की हर समस्या पर उनका नजरिया अपनी विचारधारा के अनुसार तय होता है। देश में बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकटों पर पर ढेर सारी कहानियां लिखी जाती हैं पर उनके पैदा करने वाले कारणों पर कोई नहीं लिखता। अर्थशास्त्र के अंतर्गत भारत की मुख्य समस्याओं में ‘धन का असमान वितरण’ और कुप्रबंध भी पढ़ाया जाता है। बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकट कोई समस्या नहीं बल्कि इन दोनों समस्याओं से उपजी बिमारियां हैं। जिसे हम भ्रष्टाचार कहते हैं वह कुप्रबंध का ही पर्यायवाची शब्द है। मगर भ्रष्टाचार पर समाचार होते हैं उन पर कोई कहानी लिखी नहीं जाती। भ्रष्टाचारी को नाटकों और पर्दे पर दिखाया जाता है पर सतही तौर पर।

अनेक बार व्यक्तियों के आचरण और कृतित्व पर दोनों प्रकार के बुद्धिजीवी आपस में बहस करते है। अपनी विचारधाराओं के अनुसार वह समय समय गरीबों और निराश्रितों के मसीहाओं को निर्माण करते हैं। एक मसीहा का निर्माण करता है दूसरा उसके दोष गिनाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सतही बहसें होती हैं पर देश की समस्याओं के मूल में कोई झांककर नहीं देखता। फिल्म,पत्रकारिता,नाटक और समाजसेवा में सक्र्रिय बुद्धिजीवियों तंग दायरों में लिखने और बोलने के आदी हो चुके हैं। लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिसमें स्वयं की चिंतन क्षमता तो किसी मेें विकसित हो ही नहीं सकती और उसमें शिक्षित बुद्धिजीवी अपने कल्पित मसीहाओं की राह पर चलते हुए नारे लगाते और ‘वाद’गढ़ते जाते हैं।

साहित्य,नाटक और फिल्मों की पटकथाओं में भुखमरी और बेरोजगारी का चित्रण कर अनेक लोग सम्मानित हो चुके हैं। विदेशों में भी कई लोग पुरस्कार और सम्मान पाया है। भुखमरी, बेरोजगारी,और गरीबी के विरुद्ध एक अघोषित आंदोलन प्रचार माध्यमों में चलता तो दिखता है पर देश के भ्रष्टाचार पर कहीं कोई सामूहिक प्रहार होता हो यह नजर नहंी आता। आखिर इसका कारण क्या है? किसी कहानी का मुख्य पात्र भ्रष्टाचारी क्यों नहीं हेाता? क्या इसलिये कि लोगों की उससे सहानुभूति नहीं मिलती? भूखे,गरीब और बेरोजगार से नायक बन जाने की कथा लोगों को बहुत अच्छी लगती है मगर सब कुछ होते हुए भी लालच लोभ के कारण अतिरिक्त आय की चाहत में आदमी किस तरह भ्रष्ट हो जाता है इस पर लिखी गयी कहानी या फिल्म से शायद ही कोई प्रभावित हो।
भ्रष्टाचार या कुप्रबंध इस देश को खोखला किये दे रहा है। इस बारे में ढेर सारे समाचार आते हैं पर कोई पात्र इस पर नहीं गढ़ा गया जो प्रसिद्ध हो सके। भ्रष्टाचार पर साहित्य,नाटक या फिल्म में कहानी लिखने का अर्थ है कि थोड़ा अधिक गंभीरता से सोचना और लोग इससे बचना चाहते हैं। सुखांत कहानियों के आदी हो चुके लेखक डरते हैं कोई ऐसी दुखांत कहानी लिखने से जिसमें कोई आदमी सच्चाई से भ्रष्टाचार की तरफ जाता है। फिर भ्रष्टाचार पर कहानियां लिखते हुए कुछ ऐसी सच्चाईयां भी लिखनी पड़ेंगी जिससे उनकी विचारधारा आहत होगी। अभी कुछ दिन पहले एक समाचार में मुंबई की एक ऐसी औरत का जिक्र आया था जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती थी। जब भ्र्रष्टाचार पर लिखेंगे तो ऐसी कई कहानियां आयेंगी जिससे महिलाओं के खल पात्रों का सृजन भी करना पड़ेगा। दोनों विचारधाराओं के लेखक तो महिलाओं के कल्याण का नारा लगाते हैं फिर भला वह ऐसी किसी महिला पात्र पर कहानी कहां से लिखेंगे जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती हो।
फिल्म बनाने वाले भी भला ऐसी कहानियां क्यों विदेश में दिखायेंगे जिसमें देश की बदनामी होती हो। सच है गरीब,भुखमरी और गरीबी दिखाकर तो कर्ज और सम्मान दोनों ही मिल जाते हैं और भ्रष्टाचार को केंदीय पात्र बनाया तो भला कौन सम्मान देगा।
देश में विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने समाज को टुकड़ों में बांटकर देखने का जो क्रम चलाया है वह अभी भी जारी है। देश की अनेक व्यवस्थायें पश्चिम के विचारों पर आधारित हैं और अंग्रेज लेखक जार्ज बर्नाड शा ने कहा था कि ‘दो नंबर का काम किये बिना कोई अमीर नहीं बन सकता।’ ऐसे में अनेक लेखक एक नंबर से लोगों के अमीर होने की कहानियां बनाते हैं और वह सफल हो जाते हैं तब उनके साहित्य की सच्चाई पर प्रश्न तो उठते ही हैं और यह भी लगता है कि लोगा ख्वाबों में जी रहे। अपने आसपास के कटु सत्यों को वह उस समय भुला देते हैं जब वह कहानियां पढ़ते और फिल्म देखते हैं। भ्रष्टाचार कोई सरकारी नहीं बल्कि गैरसरकारी क्षेत्र में भी कम नहीं है-हाल ही में एक कंपनी द्वारा किये घोटाले से यह जाहिर भी हो गया है।

आखिर आदमी क्या स्वेच्छा से ही भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित होता है? सब जानते हैं कि इसके लिये कई कारण हैं। घर में पैसा आ जाये तो कोई नहीं पूछता कि कहां से आया? घर के मुखिया पर हमेशा दबाव डाला जाता है कि वह कहीं से पैसा लाये? ऐसे में सरकारी हो या गैरसरकारी क्षेत्र लोगों के मन में हमेशा अपनी तय आय से अधिक पैसे का लोभ बना रहता है और जहां उसे अवसर मिला वह अपना हाथ बढ़ा देता है। अगर वह कोई चोरी किया गया धन भी घर लाये तो शायद ही कोई सदस्य उसे उसके लिये उलाहना दे। शादी विवाहों के अवसर पर अनेक लोग जिस तरह खर्चा करते हैं उसे देखा जाये तो पता लग जाता है कि किस तरह उनके पास अनाप शनाप पैसा है।
कहने का तात्पर्य है कि हर आदमी पर धनार्जन करने का दबाव है और वह उसे गलत मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। जैसे जैसे निजी क्षेत्र का विस्तार हो रहा है उसमें भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। नकली दूध और घी बनाना भला क्या भ्रष्टाचार नहीं है। अनेक प्रकार का मिलावटी और नकली सामान बाजार में बिकता है और वह भी सामाजिक भ्रष्टाचार का ही एक हिस्सा है। ऐसे में भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर उस पर कितना लिखा जाता है यह भी देखने की बात है? यह देखकर निराशा होती है कि विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने ऐसा कोई मत नहीं बनाया जिसमें भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर लिखा जाये और यही कारण है कि समाज में उसके विरुद्ध कोई वातावरण नहीं बन पाया। इन विचाराधाराओं और समूहों से अलग होकर लिखने वालों का अस्तित्व कोई विस्तार रूप नहीं लेता इसलिये उनके लिखे का प्रभाव भी अधिक नहीं होता। यही कारण है कि भ्रष्टाचार अमरत्व प्राप्त करता दिख रहा है और उससे होने वाली बीमारियों गरीबी,बेरोजगारी और भुखमरी पर कहानियां भी लोकप्रिय हो रही हैं। शेष फिर कभी
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

साहित्य लेखन एकांत में करना चाहिये-प्रातःकालीन संपादकीय


साहित्य लेखन का कार्य नितांत अकेले में ही बढि़या प्रकार से किया जा सकता है-इसमें कोई संदेह नहीं है। मुझे याद है कि एक संपादक को मैंने अपनी एक कहानी दी थी। वह एक सीमित दायरे में बिकने वाली पत्रिका का संपादक था। उसने मुझे कहानी में कुछ परिवर्तन करने का कहा। मैंने उसे थोड़ा बहुत करके दिया पर वह उससे संतुष्ट नहीं हुआ। बाद में उसने स्वयं ही परिवर्तन किये। तब मैंने उससे कहा कि-‘आप यह कागज मुझे वापस कर दें मैं इसको सही ढंग से लिखकर आपके पास लाऊंगा।’

उसने मुझे वह कागज वापस कर दिये। तय बात थी कि मैं उसके पास फिर वह कागज वापस लेकर जाने वाला नहीं था। यही बात मेरे साथ ब्लाग जगत में हुई। यहां पहले एक लोकप्रिय फोरम था जहां सभी के हिंदी ब्लाग दिखते थे और वहां लेखक ही एक दूसरे को टिप्पणियां देते। फिर उसकी जगह दूसरा फोरम आया तो वहां भी यह प्रक्रिया जारी रही। टिप्पणी के चक्कर में अच्छे खासे लेखक की क्या हालत है यह मैं समझ सकता हूं। कुछ टिप्पणीकर्ताओं का व्यवहार तो संपादकों की तरह हो रहा था। इसलिये मैंने वापस कागज मांगने की तरह आज मैंने अपने वर्डप्रेस के सभी ब्लाग वर्तमान के लोकप्रिय फोरम से बाहर निकलवा लिये। ब्लाग लेखकों से यह एक तरह से किनारा करने जैसा है। दरअसल मुझे बहुत दिन से लग रहा था कि मेरा ध्यान भटक रहा है और उस पर नियंत्रण नहीं हो रहा। मेरे वर्डप्रेस के ब्लाग जबरदस्त हिट ले रहे हैं और ऐसा लगता है कि आम पाठक में उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है पर मैं वैसा नहीं लिख रहा जैसा कि लिखना चाहिये।

बार बार मन ब्लागवाणी के हिट पर चला जाता जहां से कोई अधिक समर्थन मिलने की आशा नहीं थी। फिर अनेक ब्लाग लेखक-जो ब्लाग स्पाट पर लिखते हैं और वर्डप्रेस के बारे में उनका ज्ञान अधिक नहीं है-तमाम तरह की टीका टिप्पणी करने लगे थे। एक ने तो बकायदा पाठ छाप दिया और वहां अनेक बुद्धिमान उसका समर्थन कर आये। इनमें तो एक ऐसे सज्जन भी थे जो वर्डप्रेस पर सक्रिय हैं वह उसमें एक तरह से मेरी शिकायत कर रहे ोि जैसे कि उस पाठ का लेखक मेरे पर नियंत्रण कर लेगा।

हिंदी ब्लाग जगत के कुछ अतिसक्रिय लोग अपने आप को हर पाठ का भाग्यनियंता समझने लगे थे। एक दूसरे की छीछालेदारी कर हिट पाते हैं। मेरे मन में सभी के प्रति सहृदयता का भाव रहा है और उन पर अगर कुछ लिखा तो केवल दोस्त समझकर लिखा पर पता नहीं वह क्या समझ रहे थे? ऐसा लग रहा था उनकी वजह से मैं और मेरी वजह से वह रास्ते से भटक रहे थे। ऐसे में अपने वर्डप्रेस के ब्लाग के साथ न्याय नहीं कर पा रहा था।

हां, पाठकों एक बात बता दूं अब मेरे इन वर्डप्रेस के ब्लाग पर टिप्पणियां नहीं होंगी क्योंकि वह लिखने वाले ब्लागर अब इससे दूर हो गये हैं। मेरे ब्लाग स्पाट के ब्लाग अभी ब्लागवाणी पर हैं पर मैं उन पर वैसे भी अधिक नहीं लिखता। वह एक जरिया है जो हिंदी ब्लाग जगत से संपर्क बनाये रखने का। जिस तरह से मैं वर्डपे्रस पर लिखता हूं वैसा उन पर नहीं लिखता। कारण यह है कि वर्डप्रेस से अधिक पाठक मिलते हैं और यही लालच इस पर लिखने को प्रेरित करता है। मेरे मित्र ब्लाग लेखकों को शायद यह पता नहीं चल पायेगा कि मैंने अपने ब्लाग ब्लागवाणी से हटवा लिये हैं पर फिर भी कुछ चाहने वाले हैं जो नारद और चिट्ठाजगत पर आकर यह बात जान जायेंगे।

अब सबसे बड़ी अच्छी बात यह है कि आम पाठक के लिये लिखने में कोई बाधा नहीं आयेगी। मैं भले ही महापुरुषों के संदेश लिखता हूं पर इसका मतलब यह नहीं कि कोई ज्ञानी हूं। फिर जानता हूं कि इस देह में पांच तत्वों के साथ तीन प्रकृतियों-मन,बुद्धि और अहंकार-का भी अपना काम होता है। उन पर नियंतत्रण पाना आसान नहीं है। इसलिये यही तरीका अच्छा लगा कि वहां से अपने ब्लाग हटवा कर इन पर अपने पाठ लिखूं। ब्लागवाणी वालों ने इतनी सहजता ने ब्लाग हटवाये इसके लिये उनकी प्रशंसा तो करना ही चाहिये। वैसे उनके लिये भी अच्छा ही हुआ। वहां मेरे सभी ब्लाग पर पाठकों की संख्या इतनी कम होती है कि उनको भी संकोच होता होगा कि इसके इतने ब्लाग रखने से क्या लाभ? शायद थोड़ा सम्मान करते होंगे इसलिये यह ब्लाग हटाने के लिये नहीं कहा। मेरा संदेश मिलते ही सहजता से हटा दिये। इसके लिये उनको धन्यवाद! आशा करता हूं कि अब जब मुक्त भाव से इन पर लिखूंगा तो अच्छा ही लिखूंगा। साहित्य लेखन एकांत में करना चाहिये इस बात की एक बार पुष्टि हो गयी है। वैसे हिंदी ब्लाग जगत के सभी लोग सहृदय है पर चूंकि अंतर्जाल पर एक दूसरे से व्यक्तिगत रूप से परिचित नहीं होते इसलिये जो लिखा है उसी पर ही आदमी की पहचान स्थापित करते हैं जिससे कई तरह के दिमाग में की तरह के भ्रम पैदा होते हैं और यह केवल मैं ही समझ पाता हूं क्योंकि लिखने साथ अध्ययन का होना भी जरूरी है। जहां तक संबंध हैं वह बदलते रहते हैं एक दो पाठ पर उनमें बिगाड़ नहीं आना चाहिये पर चूंकि मुझे लगा कि ध्यान भटक रहा है इसलिये ही ब्लागवाणी से अस्थाई रूप से यह ब्लाग हटवा लिये।

यह आलेख ‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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सही पता बताने वाले बहुत कम हैं-हिंदी शायरी


निभाने के वादे तो बहुत उन्होंने किये

पर जब आया मौका साथ देने का

कई बहाने सुना दिये

हम आसरा फिर भी करते रहे

यही सोचकर कि कभी तो

उनके बहाने खत्म हो जायेंगे

और वह काम आयेंगे

इस इंतजार में कितने बरस गुजार दिये
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आहिस्ता चलो

राहों पर फिसलन बहुत है

गिरने पर संभालने वाले कम हैं

अपनी मंजिल और राहों को खुद चुनो

भटकाने वाले बहुत हैं

सही पता बताने वाले बहुत बहुत कम हैं
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बिना शीर्षक का एक आलेख


हिंदी में ब्लाग लेखन एक ऐसी विद्या बनने जा रहा है जिस पर सबकी दृष्टि है। मुझे तो कभी कभी लगता है कि हिंदी-अंग्रेजी टूल आने के बाद अब इसका पढ़ने का क्षेत्र व्यापक होता जा रहा है जिसका अभी अनुमान करना मुश्किल है। ऐसे में जिन ब्लाग लेखकों की मौलिकता प्रभावपूर्ण होगी वह निश्चित रूप से विश्व में प्रसिद्ध प्राप्ति करेंगे। इनाम या सम्मान मिलना एक अलग विषय है।

ब्लागवाणी पर हिट पाने का मोह अच्छे खासे लेखक को एक लिपिक बना कर रख देता है। ब्लागवाणी वह फोरम जहां हिंदी के सारे ब्लाग एक जगह देखे और पढ़े जा सकते हैं। कुछ ब्लाग लेखक अपने ऐसे पाठ लिखते हैं जिसमें उनका कोई मौलिक चिंतन नहीं होता-बाहर के कुछ लेखकों की ब्लाग विरोधी टिप्पणियां यहां लिखते हैं। ऐसे लेखक जो स्वयं अच्छा लिख सकते हैं पर वह भी हिट के चक्कर में ऐसे कथित बड़े लेखकों की रचनाएं ले आते हैं जिन्हें केवल खास वर्ग में भी इसलिये जाना जाता है क्योंकि वह अखबार पढ़ते हैं जिनसे यह पता चलता है कि वह लेखक हुए हैं-फिर उन लेखकों ने कोई ब्लाग देखा हो यह भी प्रमाणित नहीं होता। हिंदी एक व्यापक भाषा है इसलिये कई प्रदेशों के लेखकों का दायरा वहीं सिमट जाता है पर उनकी अखिल भारतीय छवि बनाने के प्रयास में अनेक ब्लाग लेखक एक लिपिक की तरह अपने पाठ तैयार कर आते है।

मुद्दा ब्लाग लेखन का है। अंतर्जाल पर स्वतंत्र लेखन किसी को पसंद नहीं आयेगा। खासतौर से उन लोगों को जो अपने लेखन की मौलिकता और रुचिकर होने से अधिक इनाम और सम्मान पाने के लिऐ अधिक चर्चित हैं। एक नहीं अनेक लेखकों का संदर्भ देते हुए ब्लाग लेखन पर प्रतिकूल टिप्पणियां लिखी जा रहीं है। अगर उनका आशय समझें तो यही है कि भई हमने इतना लिखा है उसको पढ़ो यहां लिखे को कौन पढ़ सकता है। जाहिर है कुछ पुराने लेखकों के लिए यहां लिखना कठिन है और लिखें भी तो यहां अब उनके लिये अलग से इनाम की कोई संभावना नहीं है। उनको या तो पुरस्कार मिल चुके हैं या फिर मिलने वाले हैं।

आज एक ब्लाग लेखक एक नामी लेखक के हवाले से यही कह रहे थे कि भई ब्लाग लिखना ठीक नहीं है। अपनी राय तो उन्होंने दी नहीं वरना कुछ लिखते। उसमें वह लिख रहे थे कि कुछ ब्लाग लेखक इस बात पर उग्र हो जायेंगे। हमारे समझ में नहीं आया कि भई क्यों कोई उग्र हो जायेगा? हां अगर किसी के हास्य को भी उग्रता कहने लगो तो कुछ कहना कठिन है।

ऐसे गाहे बगाहे कुछ ब्लाग लेखक अपने पाठ लिख लाते हैं जिनका उद्देश्य केवल ब्लागवाणी पर हिट पाना है। ऐसा लगता है कि ब्लागवाणी पर हिट लेकर कुछ लोग पुरुस्कार पाने का ख्वाब देख रहे हैं। यही कारण है कि वह भ्रमित होते जा रहे हैं। मैंने हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाये जाने पर एक नहीं अनेक ऐसे पाठ देखे हैं जिनमें ब्लाग लेखकों को हतोत्साहित करने के प्रयास होते हैं। यह प्रयास केवल ब्लाग लिखने से रोकने तक ही सीमित नहीं है वरन् इनाम विनाम घोषित कर भी यह प्रयास हो रहा है। यह मैंने जनवरी में देखा है। जैसे ही कुछ कथित इनाम और सम्मान की घोषणा हुई वैसे ही एक से बढ़कर एक पाठ आने लगे और जैसे ही उनकी घोषणा हुई तो सब जगह सन्नाटा छा गया है। आज कितने कम ब्लाग लिखे जा रहे हैं इस पर लोग अपने पाठोें पर चिंता जता रहे हैं। मुझे लगता है कि कुछ ब्लाग लेखक दूसरे ब्लाग लेखकों को हतोत्सहित कर अपने लिये पुरस्कारों की जमीन बनाना चाहते हैं-जितने कम होंगे उतने ही अधिक चमकेंगे। अधिक देर तक उनके पाठ इन फोरमों पर के मुख्य पृष्ठ पर बने रहेंगे।

एक मजे की बात यह है कि इस तरह लिखने वाले अधिकतर वेब साइट लेखक है या ईपत्रिकाओं के संपादक। यहां मैं बता दूं कि तकनीकी रूप से सभी ब्लाग ही हैं पर जिन्होंने अपनी वेबसाइट के लिये व्यय किया है इसलिये उनके अंदर अति आत्मविश्वास है कि हम जो भी कहेंगे लोग उस पर यकीन कर लेंगे। मुझे तो हंसी इस बात की है कि अब ब्लाग लेखकों को ई-पत्रिकाऐं अपने लिये संकट मानने लगी हैं। कोई साफ कह नहीं रहा पर उनके तौर तरीके देखकर लगता है कि ब्लाग लेखकों की बढ़ती लोकप्रियता देखकर उनको भय लगने लगा है कि कहीं यह सम्मानों की दौड़ में उनको पीछे न छोड़ दें।

ब्लाग यानि क्या है। कागज का एक रजिस्टर। जिस पर कोई भी लिख सकता है। अब यह रजिस्टर हमारे घर में होता है तो कापी होती है। कहीं अगर किसी सरकारी या गैर सरकारी दफ्तर में इसका नाम बदल जाता है। व्यापारी के यहां खाता बही होती है। अगर यही छपा हुआ हुआ हो तो किताब बन जाता है। जहां तक इनाम और सम्मान का प्रश्न है तो यह लोग क्यों घबड़ाते हैं? इनके संपर्क सूत्र इतने व्यापक हैं कि कोई उनकों चुनौती नहीं दे सकता। इनाम और सम्मान उनके इर्द-गिर्द घूमते रहेंगे। हां, यह एक बात लगती है कि यह नहीं चाहते होंगे कि उन जैसे व्यापक संपर्क सूत्रों वाले ब्लाग लिखकर उनको चुनौती देने लगें।

हां, यह भी सच है कि यह ब्लाग लेखक कई प्रकार के प्रचार और प्रकाशन माध्यमों के लिये चुनौती बनने वाला है। अगर कहीं प्रिंट का सामान सस्ता हो गया तो यहां के ब्लाग निकालकर लोग किताब की तरह पढ़ने लगेंगे। मेरे 20 ब्लाग@पत्रिकाएं नहीं 20 किताबें हो जायेंगी। अगर मैं अपने ब्लाग लेखक मित्रों की प्रशंसा को सही मान लूं तो यकीन करिये लोगों को इतना सस्ता लेखक और कहां मिलेगा? कई ईपत्रिकाओं के संपादक अपने आपको हिंदी का कर्णधार समझते होंगे पर ब्लाग@पत्रिकाओं की उनके समक्ष चुनौती है यह भी सच है। मैंने चार दिन तक कुछ नहीं लिखा पर इस दौरान मेरे ब्लाग पर 2000 हजार व्यूज थे। इसे देखकर मैं सप्ताह भर और खामोश रहना चाहता था पर लगा कि यार ब्लाग लेखक मित्र चिंतित होंगे इसलिये उतर आया लिखने पर। तीन दिन तो बाहर था पर दो दिन तक बिजली की परेशानी थी पर इस दौरान मैंने फोरमों पर देखा तो ब्लाग कम लिखे जाते लगे तो चिंता हुई। कुछ लेखक बहुत गजब के हैं पर समय के साथ जब वह अपने मौलिक चिंतन में गहराई लायेंगे तब वह और अधिक ख्याति अर्जित करेंगे।

मैं अपने सभी साथी ब्लाग लेखकों को कहना चाहता हूं कि त्वरित हिट की परवाह मत करो। यहां के हिट दूरगामी परिणाम का द्योतक नहीं है। शुरू मेें पाठक हिंदी देखकर खुश होकर पढ़ेगें पर जैसे ही हिंदी में लिखे पाठों की संख्या बढ़ेगी वह विषय देखकर आपका लिखा पढ़ेगा-संभव है तब वह आपके ब्लाग को आइकोन बनाये। मेरा एक मित्र है जो ब्लाग बना चुका है पर अभी उस पर लिखा नहीं है। मैंने आज उससे कहा कि वह जैसे ही पहला पाठ लिखेगा उस पर मैं समीक्षा लिखूंगा। वह गजब का लेखक है और मेरा दावा है कि वह अगर लिखेगा तो कई लोगों की छुट्टी कर देगा। मैंने उससे कहा था कि यार, मैं तो नहीं हिट हो पाया पर मैं चाहता हूं कि किसी हिट ब्लाग लेखक का मित्र कहलाने से भी गौरव कम नहीं होता। अगर वह लिखता रहा होता तो इस देश का नामी गिरामी लेखक होता। नामी गिरामी नहीं होने मतलब यह नहीं होता कि कोई अच्छा लेखक नहीं है। मैं हमेशा कहता हूं कि लेखक कभी बड़ा और छोटा नहीं होता। हां, कम या अधिक प्रसिद्ध हो सकता है। ऐसे में सभी ब्लाग लेखक अपने अंदर आत्मविश्वास लायें और अपने पाठों के मूल्यांकन भविष्य को सौंप दें। अगर आप हिंदी में लिख रहे हैं तो आपको प्रतीक्षा करनी होगी। शर्त यही है कि अपने पाठों में मौलिकता और रुचि वाले विषयों पर ही लिखें। चार लाईन की क्षणिका भी लिखें तो कोई बात नहीं है क्योंकि मुख्य है कथ्य-ब्लाग लिखने के लिये तैयार मेरे मित्र और गुरू ने यही बात मुझसे आज कही थी। इस पाठ को अधिक हिट न मिलें इसलिये इस पाठ का शीर्षक भी कम आकर्षक लिखूंगा ताकि मेरे मित्र तो पढ़ लें और आम पाठक के लिये यह किसी भी मतलब का नहीं है। यह अलग बात है कि उनमें भी कुछ ऐसे पाठक हैं जो मेरा लिखा पढ़ने से चूकते नहीं है।

धुरविरोधी और आदिविद्रोही-व्यंग्य


लोकतंत्र में विरोध का बहुत महत्व है, यही कारण है कि जिनको सत्ता नसीब नहीं होती वह मुखर होकर विरोध करते है। देश के हर क्षेत्र में राजनीति प्रवेश कर गयी है इसलिये सभी जगह लोकतंत्र और विरोध दोनों ही चलते रहते हैं। जो किसी कारण वश प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं आते वह नारे और वाद के स्वरूप बनाकर अपने क्षेत्रों में राजनीतिक शब्दों के सहारे राजनीति-राजनीत का खेल खेलने लगते हैं। स्वाभाविक रूप से कई क्षेत्रों में मठाधीश है तो उनके विरोधी भी हैं। कुछ लोग अपने को धुरविरोधी कहलाना चाहते हैं। बरसों तक अपने साथ यह संज्ञा जोड़े रहते हैं। उन्हें इसमें मजा आता है। उस क्षेत्र के मठाधीशों से पीडित लोग इन्हीं धुरविरोधी स्वरूपधारी लोगों के पास जाकर अपना दुखड़ा रोते हैं। यह धुरविरोधी उन मठाधीशों के विरुद्ध नारे लगाकर खामोश हो जाते हैं।

मेरा एक लेखक मित्र है पर मै कहीं का मठाधीश नहीं हूं फिर भी मेरा विरोध करता रहता है। उससे त्रस्त होता हूं पर दूसरे लोग कहते हैं कि-‘वह तो इधर-उधर से टीप कर लिखता है।’

मेरी एक पत्रिका में कहानी छपी ‘रोशनी बेचने वाला’ छपी थी। जब मैं यह कहानी लिख रहा था तो इतने मनोयोग से लिख रहा था कि मेरे मस्तिष्क की सारी इंद्रियां सक्रिय थीं और बिल्कुल आखिर में याद आया कि यह तो प्रेमचंद की कहानी ‘टार्च बेचने वाला’ का आधुनिक संस्करण लगती है। मैंने बेहिचक इस बात की चर्चा कहानी में कर दी। लोगों ने पढ़ी और उनको याद आया कि वाकई यह कहानी उससे मिलती जुलती है, मेरे उल्लेख ने मुझे लोगों की दृष्टि में उठा दिया। एक दिन उस लेखक के साथ एक मित्र था और मैं उसके पास गया तो उसने मुझे देखते ही कहा-‘‘वाह यार, क्या कहानी लिखते हो। यकीन नहीं होता। अगर तुम उसमें अधिक साहित्यक भाषा का उल्लेख करते तो मुझे लगता कि तुमने कहीं इसकी तरह से चुराई होगी। तुम उसे कहीं बड़े अखबार मे भेजो। मैंने इतनी जोरदार कहानी कहीं नहीं पढ़ी है।  सच कहूं तो प्रेमचंद के स्तर से कम मैं उसे नहीं मानता।’

इससे पहले मैं उससे कुछ कहता वह लेखक मित्र बोल पड़ा-‘‘यार, इतनी मत उड़ाओ इस बिचारे की। वरना लिखना ही बंद कर देगा। कहां प्रेमचंद की कहानी और कहां इसकी।’

मगर वह मित्र भी कम नहीं था। उसने कहा-‘तुमने उसे पढ़ा है?’
उसने कहा-‘मेरे पास अपने काम से फुरसत नहीं मिलती। इसकी कहानी कैसे पढ़ूंगा?’
बहरहाल दोनों में बहस होने लगी। मैंने ही दोनों को शांत करवाया। बाद में वह मित्र मुझसे अकेले में बोला-‘‘एक बात याद रखना मैं बहुत दिन से तुम्हें ढूंढ रहा था यही बात कहने के लिये। मगर उससे कभी तुम्हारी तारीफ सहन ही नहीं होती। वह तुम्हारा धुरविरोधी है।’

मैने हंसकर कहा-‘‘ हां, जब लिखता हूं तो उसका ध्यान जरूर रखता हूं कि कहीं उसे आलोचना का अवसर न मिले। यह अलग बात है कि वह पढ़ता ही नहीं है।’
अंतर्जाल पर जब लिखना शुरू किया तो कोई धुरविरोधी नाम के ब्लाग लेखक थे। मैं आया तो मेरे कई ब्लाग पर उन्होंने अपनी टिप्पणियां दीं। अचानक ही कुछ हुआ कि उन्होंने अपना ब्लाग बंद कर सन्यास लेने की घोषणा शुरू कर दी। मैं उनका ब्लाग कभी नहीं पढ़ पाया क्योंकि अभी मैं हिंदी ब्लाग जगत में समझ ही नहीं पाया था कि टिप्पणियों से ब्लाग पर पहुंचा जा सकता है। तमाम तरह के वाद-विवादों के बीच उनकी विदाई हो गयी। विदाई गीत भी लिखे गये। मैंने उनकी टिप्पणियां देखीं तो पाया कि समाज की व्यवस्था से वह अंसतुष्ट थे और मेरे जो पाठ उस व्यवस्था पर कटाक्ष करते थे उस पर ही उनकी टिप्पणियां थीं। मैं उनकी टिप्पणियों से प्रभावित था मगर इसका दूसरा पक्ष भी था। धुरविरोधी के समर्थक जिस धारा के थे वह भी मुझे कोई प्रिय नहीं लगती थी। केवल विरोध करने की बात मेरे समझ से परे होती है। समाज के नये स्वरूप की संरचना की योजना न होने पर विरोधी केवल धुरविरोधी ही हो पाते हैं। उस समय हिंदी ब्लाग जगत में  मैं नया था पर धुरविरोधी के समर्थकों के ब्लाग लेखकों के पाठों   में कई तरह की वैचारिक चुनौतियां होतीं थीं। मैंने उनका प्रतिवाद करने की दृष्टि से एक नहीं तीन जगह कवितायें लिखीं। दो छद्म नाम से थीं। हुआ यूं कि मेरे वास्तविक नाम पर तो मित्रों की  प्रतिक्रिया आई पर दो छद्म ब्लाग पर अलग अलग विपरीत टिप्पणियां आईं वह भी कविताओं के रूप में। एक छद्म नाम से दूसरी असली नाम से। छद्म नाम था आदिविद्रोही। मैंने तय किया कि पहले इस छद्म नाम से निपटूं। उसकी टिप्पणी पर उसके नाम को क्लिक किया तो उसका ब्लाग मिल गया। वहां धुरविरोधी की टिप्पणी भी थी जिनके हिंदी ब्लाग जगत से जाने को लेकर विदाई गीत लिखे जा रहे थे। बहरहाल उस दिन ब्लाग की टिप्पणियों से लिखने वाले के ब्लाग पर जाने का ज्ञान हुंआ। दूसरा यह  कि आदिविद्रोही कौन है मैं समझ गया। आदिविद्रोही ने एक पोस्ट ही लिखी थी और उसमें उसने अपने आने की घोषणा की थी। बाद में उसने दूसरे ब्लाग लेखकों के पाठों पर धमकाने वाले भी कमेंट लिखे। पहली और दूसरी प्रतिकूल टिप्पणी करने वाला एक ही व्यक्ति था। मतलब मुझे एक ही व्यक्ति से भिड़ना था। फिर मुझे ख्याल आया कि यह तो मेरा छद्म ब्लाग है। दिलचस्प बात यह है कि मेरे एक मित्र ब्लाग ने एक ही दिन तीनों कविताओं को अपने यहां लिंक दिया था और इसलिये वह लोग एकदम हमलावर हो गये थे। बहरहाल उस दिन गुस्सा पी गया जो बाद में कई पाठों को लिखने के लिए ऊर्जा के रूप में काम आया।

धुरविरोधी की इस हिंदी ब्लाग जगत से विदाई नहीं होगी यह मैं जानता था क्योंकि मुझे लगा कि यह उनका अपने छद्म ब्लाग से छुटकारा पाने का एक नाटक है। बाद में मेरा यह अनुमान सही निकला। आजकल वह अपने वास्तविक नाम से लिख रहे हैं-उनके अच्छे लेखक होने पर भी किसी को संदेह नहीं है। आदिविद्रोही ने घोषणा नहीं की पर फिर उसका ब्लाग यहां दिखाई नहीं दिया। मैंने उस पर अनेक बार व्यंग्य लिखे पर वह कभी नहीं देख पाया। मेरे कई पाठों का नायक  आदिविद्रोही होता है और वह जबरदस्त हिट लेतीं हैं। न केवल ब्लाग लेखकों  में बल्कि पाठकों में भी उनको बहुत रुचि से पढ़ा जाता है।  मैं उसे धुरविरोधी का शिष्य कहता हूं और उसने एक टिप्पणी से वह दिया जो कोई नहीं दे सकता। ब्लाग पर मेरी सबसे पहले जबरदस्त हिट पाठ को मैं कभी नहीं भूलता जिसका  शीर्षक है‘इस ब्लाग मीट पर हास्य कविता मत लिखना’। उसके बाद व्यंग्य लिखना शुरू किया तो फिर रुका नहीं । हां, अब अगर यह वही लोग हैं जो मैं समझ रहा हूं तो उनसे मेरा झगड़ा नहीं है और वह दोनों भी मेरे प्रति कोई दुर्भाव रखते नह दृष्टिगोचर नहीं होते। धुरविरोधी की अनुकूल और आदिविद्रोही की प्रतिकूल टिप्पणियां मुझे भूलती नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों अब उन प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते है जो वह दूसरों के सामने चुनौती के रूप में पेश करते थे।

कुछ दृश्य निगाहों से पढ़े जाते हैं-हिंदी शायरी


कुछ दृश्य इस तरह सामने आते हैं
कि शब्द हो जाते  खामोश
निगाहों से वह पढ़े जाते हैं
लिखकर कोई क्या बतायेगा
तस्वीरों में चेहरे
सारा माजरा बयां कर जाते हैं
जो देखकर भी न समझे
वह पढ़कर भी क्या समझेंगे
हृदय में बसता हो जीवन
संवेदनाओं की बहती हो जब पवन
चक्षुओं से देखकर ही
स्पर्श अनुभव किये जाते हैं
जागते हुए भी सोते हैं कई लोग
उनको समझाने से मतलब बेमानी हो जाते हैं

……………………..
दीपक भारतदीप

बड़ी मछली का छोटी पर शासन तो फिर भी रहा


कार्ल मार्क्स ने कहा था कि इस दुनियां को सबसे बड़ा सच रोटी है। आर्थिक ढंग से सोचने वालो ने उनकी इस खोज को एक नई खोज मानते हुए उनकी पूंजी किताब  को गरीबों और मजदूरों का पवित्र ग्रंथ मान लिया । अगर उनकी दृष्टि को देखें तो आदमी जीवन केवल खाने के लिये है और उसके बाद उसे और कुछ नहीं करना चाहिए। खेलो तो रोटी के लिये, लिखो तो रोटी के लिये, गाओ तो रोटी के लिये।  हम अपने प्राचीनतम अध्यात्मिक ज्ञान  की दृष्टि से देखे तों वह माया को सर्वोपरि मानते हैं। यही कारण है कि भारतीय जनमानस में उनका विचार कभी लोकप्रिय नहीं हो पाया।
भारतीय अमीर हो या गरीब,  बूढ़ा हो या जवान स्त्री हो या पुरुष इस बात की परवाह नहीं करते कि भगवान ने उनको क्या दिया है और अपनी सामर्थ्यानुसार  उसकी आराधना करते है।  इसके बावजूद कुछ लोग मायावी विचारों को  अपना आधार बनाकर समाज कल्याण  का काम करते हैं तो केवल इसलिये कि इस धरती पर सत्य के साथ माया को भी  रहना ही है। ऐसे में कुछ लोग हैं जो अपनी रोजी रोटी कमाते हुए बिना किसी की परवाह किये हंुए भक्ति में लगे रहते हैं।  वह किसी प्रकार वैचारिक वाद-विवाद में नहीं पड़कर अपनी एकांत साधना में लगे रहते है।

आजादी के बाद बहुत समय तक यह देश शांति से चलता रहा पर जैसे ही बाजार में आधुनिक और सुविधाजनक सामग्रियों का प्रचलन बढ़ा तो  लोगों के जीवन स्तर का स्वरूप भी बदला और उपभोग की आधुनिक सुविधाओं से जहां परिश्रम की भावना में कमी आयी तो स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं ने भी अपना दायरा बढ़ा लिया । ऐसे माया का स्वरूप इस तरह बदल गया कि कहना मुश्किल  है कोई विचारधारा उसका  इस रूप में उसका प्रतिकार कर  सकती है।।  आप पूरे संसार में देख लें गरीबों और किसानों के लिये बहुत सारे अच्छे काम हो रहे है पर फिर भी उनकी परेशानियां कम नहीं हो रहीं है। इसकी वजह यह है कि कार्ल मार्क्स ने और कुछ किया हो या नहीं पर एक वैचारिक अविष्कार तो लोगों को शासन करने के इच्छुक लोगों को  दे ही दिया  कि गरीबों और मजदूरों के हित की बात किये बिना आप यहां लोकप्रिय हो नही  सकते-यानि आप नारे लगाकर शासन करते रहो। अब कोई भी किसी भी विचारधारा को मानने वाला हो वह समाज के निचले तबके के कल्याण की बात अव’य करता है। पूरे विश्व में दबा कुचला समाज कहीं न कही जरूर है। उनके इतिहास भी सब जगह ऐक जैसे है। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है  यह नियम केवल समंदर पर लागू नहीं होता बल्कि आकाश और धरती पर भी लागू होता है। जंगल और शहर  पर भी इसका प्रभाव एक समान परिलक्षित होता है।  किसी भी समंदर या तालाब में देख लें-वहां बड़ी मछलियां संख्या में कम होती हैं पर छोटी मछलियां अधिक होने के बावजूद उनका शिकार बनतीं हैं। जंगल में एक शेर होता है(अब होता है कि नहीं यह जानकारी मुझे भी नहीं-क्योंकि उसकी उपस्थिति मैने केवल चिडियाघर में देखा है) पर बाकी छोटे जानवर उसका शिकार  बनते है। कुल मिलाकर छोटे लोगों की संख्या अधिक होती है पर शासन तो बड़े लोगों का ही होता है।

ऐसे में जब शासन  की बात हो और उसके लिये  छोटे आदमी के सहयोग की  आवश्यकता पड़ती है  तो बडे लोगों के पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं रहता कि वह छोटे आदमी के कल्याण की बात करें और उसका सहारा लेकर फिर उस पर शासन चलायें। फिर शासन  जो होता है वह आप देख ही रहे है। शासन  हमेशा छोटे पर होता है और यह   हमारी शिकायत कि छोटों पर ही क्यों सारे नियम  लागू होते हैं कोई मायने नहीं रखता। छोटे होते ही शासित होने के लिये है। हां इस बात पर जरूर संतोष करना चाहिए कि कम से कम छोटे लोगों की दुहाई देकर ही तो यह शासन बनाया जाता है और कम से कम एक दिन तो ऐसा आता है कि जब  हमें अपने पक्ष में बोलता हुआ कोई दिखता है और वह  भी कौन जो समाज में बडा आदमी है। बड़े आदमी छोटे आदमी के हित की बात तो करते हैं यही संतोष का विषय है। कार्ल मार्क्स की विचारधारा आने से पहले  कोई ऐसा नहीं करता था।
 
कार्ल मार्क्स ने दुनियां के जिस मायारूपी सत्य को बताया  उसे हमारे देश के लोग बहुत समय से जानते है।  रोटी यानि माया देह के लिये जरूरी है  फिर भी एक मन है जिसमें इस माया को हराने की क्षमता है अगर उस पर नियंत्रण किया जा सकता है और अगर वह  अनियंत्रित है तो फिर रोटी भी उसका पेट नहीं भर सकती। गरीबों के मसीहा बहुत बन गये है पर अपने मन में दूसरों पर शासन करने की भूख शांत करने के लिये। कहते हैं कि आज की दुनियां विकसित है पर उसका मतलब क्या है? क्या रोटी से पेट भरने की बाद क्या आदमी की भूख खत्म हो जाती है और क्या जिनको आधी रोटी मिलती है वह रात को चैन की नीद सोते नहीं  है?

सच तो यह है कि भारतीय अध्यात्म द्वारा उदघाटित जीवन रहस्यों से छिपने के लिये माया रूपी राक्षस को खड़ा किया गया है ताकि बड़े लोगों का छोटे लोगों पर शासन चलता रहे। अगर सब लोग योगी और ज्ञानी हो जायेंगे तो फिर माया के शिखर पर बैठे लोग किस पर शासन करेंगे। इसलिये ऐसी विचाराधाराओं का विकास किया गया जिससे वह छोटा आदमी दिगभ्रमित होता रहे और कल्पित सुखों की तलाश में भटकता रहे ताकि उस पर नियंत्रण किया जा सके। जितनी तेजी से आधुनिक साधनों का विकास हुआ लोगों में उपभोग की प्रवृति बढ़ी है और वह अध्यात्म से परे हुए  है और इसी कारण आर्थिक और सामाजिक शिखर पर बैठे लोगों को शासन करने की सुविधा मिल गयी है। हां अब उनको गरीबों, मजदूरों, किसानों और शोषितों के हित की बात तो करनी ही पड़ती है। (क्रमशः)

सच के परे बहस बेकार-कविता


औरत पर अनाचार का प्रश्न
उठता है कई बार
अभी तक अनुत्तरित है एक प्रश्न
कौन करता है उस पर वार

दुनियां में पुरुष प्रधान समाज
वही परिवार का मुखिया कहलाता है
पर बाहर शेर की तरह दहाड़ने वाला
क्या अपने घर में भी चीख पाता है
अपने दबंग होने के अहसास से
जमाने भर को डराने वाला
क्या घर में अपना रौब रख पाता है
क्या वही करता है स्त्री पर प्रहार

स्त्री को पर्दे में
रहने के लिये बाध्य करने वाला
पुरुष अपने घर में स्त्री द्वारा ही
स्त्री का सताने का
अपने ऊपर लेकर इल्जाम
एक स्त्री की करतूत को
क्या छिपा  नहीं जाता
सारे आरोप अपने ऊपर लेकर
क्या उसे बचा नहीं जाता 
एक स्त्री की करतूत को
पर्दे में क्या छिपा  नहीं  जाता
मान जाता सबके सामने अपनी हार

पुरुष को स्नेह, प्रेम और ममता
देने वाली ममतामयी स्त्री
अपनी बेटी और बेटे में
क्या भेद नहीं कर जाती
फिर जमाने से छिपाती
अपनी बेटी पर लाज की
चादर ओढ़ने वाली
क्या परायी की बेटी 
पर अनाचार नहीं करवाती
अपने पुत्र को क्या
उसके खिलाफ नहीं उकसाती
जब ढहता कोई घर
तब पुरुष पर हंसता जमाना
मजबूरी है पुरुष की
अपने घर की स्त्री की लाज बचाना
और झेलना जमाने के प्रहार

जमाने को दोष देकर
टाल रहे है सब सवालों के जवाब
औरत की भलाई पर बहस करने वाले
नारों की डोली में शब्दों की दुल्हन को
उठा लेकर चल रहे हैं कहार
आज के वार्ताकार हों या चित्रकार
सच से परे करते बहस बेकार

………………………….
 

चाणक्य नीति:भगवान् की कृपा हो तो तीनों लोक घर समान


१।किसी भी कार्य करने से पहले यह देखना चाहिए की उसका प्रतिफल क्या मिलेगा? यदि प्राप्त लाभ से अधिक परिश्रम करना पड़े तो वह करना ही बेकार है। माला गूंथने, चन्दन घिसने से या ईश्वर का स्तुति का स्वयं गान करने से किसी मनुष्य का कल्याण नहीं हो जाता। यह कार्य तो कोई भी कर सकता है। वैसे जिनका यह व्यवसाय है उन्हें ही वैसा करना शोभा देता है।
२.जिस व्यक्ति के परमपिता विष्णु की कृपा दृष्टि है हो जाती है उसके लिए तीनों लोक अपने ही घर के समान है। जिस पर प्रभु का स्नेह रहता है उसके सब कार्य स्वयं सिद्ध जाते हैं।
३.कलियुग में दस हजार वर्ष व्यतीत होने पर भगवान विष्णु पृथ्वी को त्याग देते हैं। पांच हजार वर्ष के बाद गंगाजल पृथ्वी को छोड़ देता है और ढाई हजार वर्ष व्यतीत होने पर ग्राम देवता पृथ्वी का त्याग कर देते हैं।
4.हर मनुष्य को सभी विधाओं में निपुण होना चाहिऐ। बडे लोगों से विनम्रता, विद्वानों से श्रेष्ठ और मधुर ढंग से वार्तालाप का तरीक सीखना चाहिए। जुआरियों से झूठ बोलना और कुशल स्त्रियों से चालाकी का गुण सीखना चाहिए।

रहीम के दोहे:परिश्रम कर भोजन ग्रहण करें


चाह गयी चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह
जिनको कछु न चाहिए। वे साहन के साह

कविवर रहीम का कहना है कि इस संसार में जिसकी चिंताएं और आकांक्षाएं ख़त्म हो गयीं है। वह निश्चित और बेफिक्र है वह तो मालिकों का भी मालिक है।
चारा चारा जगत में, छाला हित कर लेय
ज्यों रहीम आता लगे, त्यों मृदंग स्वर देय

कविवर रहीम कहते हैं कि भोजन ही इस विश्व में सबको प्यारा है, अत: दूसरों की भूख के लिए कष्ट सहन करना चाहिए। जिस प्रकार मृदंग की थाप पर लगा आटा मधुर स्वर उत्पन्न करता है उसी प्रकार परिश्रम करें भले ही हाथों में छालें हो जाएं।

विश्वास की सजा धोखा कर दे जाते-कविता साहित्य


शादी में शराब पीकर
नृत्य करते हुए
ऊपर गालिया दागते हुए
लोग बन्दर जैसे नजर आते
और बन्दर कहो तो चिढ जाते
किससे कहें अपने मन की बात
इंसानों के भेष में में सांप-बिच्छू , भेडिये
और सियार हमारे सामने आते

किताबों पढ़कर चंद शब्द लेकर
चल रहे हैं साथ लेकर उपाधियों के झुंड
दिखते हैं नरमुंड
बोलते हैं प्यार से जैसे अपने हों
दिखाते हैं ऐसे सच जो सिर्फ सपने हों
मौका पाते ही पीठ में चुरा घोंप जाते

कितनी बार तो निकला होगा
लहू हमारी पीठ से
जब भी पाला पडा किसी ढीठ से
अब तो चेहरे पर नकाब लगाकर
वह कत्ल नहीं करते
मुट्ठी में सब बंद है सब फैसले उनके
बिना जिरह के ही फ़ैसले करते
विश्वास करने की सजा
धोखा कर दे जाते

चाणक्य नीति:मनुष्य को हर विधा में पारंगत होना चाहिए


१.।इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी विशेष अंग में विष होता है-जैसे सर्प के दांतों में मक्खी के मस्तिष्क में और बिच्छू की पुँछ में-पर इन सबसे अलग दुर्जन और कपटी मनुष्य के हर अंग में विष होता है। उसके मन में विद्वेष,वाणी में कटुता और कर्म में नीचता का व्यवहार जहर बुझे तीर की तरह दूसरे को त्रास देते हैं।

२.औषधि, धर्म,धन, धान्य, और गुरु के मार्गदर्शन वाक्य-इन पांच वस्तुओं का संग्रह अवश्य करें। जो व्यक्ति इनका संचय नहीं करता वह अपने जीवन की सार्थक नहीं बना सकता। लेकिन इन पांच वस्तुओं का उपयोग भी बहुत सोच समझ कर करना चाहिऐ वरना हानि भी हो सकती है।

३.हर मनुष्य को सभी विधाओं में निपुण होना चाहिऐ। बडे लोगों से विनम्रता, विद्वानों से श्रेष्ठ और मधुर ढंग से वार्तालाप का तरीक सीखना चाहिए। जुआरियों से झूठ बोलना और कुशल स्त्रियों से चालाकी का गुण सीखना चाहिए।
४.मनुष्य को ऐसे कर्म करना जिससे उसकी कीर्ति सब और फैले। विद्या, दान, तपस्या, सत्य भाषण और धनोपार्जन के उचित तरीकों से कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है।

5.अपना जीवन शांतिपूर्वक बिताने के लिए हर मनुष्य को धर्म-कर्म का अनुष्ठान करते रहना चाहिऐ। वह घर मुर्दाघर के समान हैं जहाँ धर्म-कर्म या यज्_ंज-हवन नहीं होता। जहाँ वेद शास्त्रों का उच्चारण नहीं होता, विद्वानों का सम्मान नहीं होता और यज्_ंज-हवन से देवताओं का पूजन नहीं होता ऐसे घर, घर न रहकर शमशान के समान होता है।

विकास और विनाश-लघुकथा


गरीब किसान अपने खेत में हल जोत रहा था. उसी समय एक खूबसूरत चेहरे वाला सूट-बूट पहने एक शख्स उसके सामने आकर खडा हो गया और बोला-”मैं विकास हूँ और तुम्हें भी विकसित करना चाहता हूँ. यह लो कुछ पैसे और अपनी जमीन मुझे दे दो.
किसान ने कहा-”नहीं, यह मेरे बाप-दादों की जमीन है और मैं इसे किसी को नहीं दे सकता.
विकास ने कहा-”देखो मैं पूरे विश्व में फ़ैल रहा हूँ तुम अपने इलाके को पिछडा क्यों रखा चाहते हो, तुम यह जमीन मुझे दे दो. यहाँ तमाम तरह के कारखाने, इमारत, मनोरंजनालय और तरणताल खुलने वाले हैं. तुम और तुम्हारे बच्चों का भविष्य सुधर जायेगा. उनको नौकरी मिलेगी और उनकी जवानी बहुत ऐसे मजे लेते हुए गुजरेगी जैसी तुमने सोची भी नहीं होगी.

किसान सोच में पढ़ गया तो वह बोला-”सृष्टि का नियम है मैं हर जगह जाता हूँ. अभी तुमसे बडे प्यार से कह रहा हूँ, पैसे भी दे रहा हूँ और नहीं मानोगे तो इससे भी जाओगे और तुम्हारे बच्चों का भविष्य भी नहीं बन पाएगा.यहाँ मेरा आना तय है और उसे तुम रोक नहीं सकते.

किसान ने इधर-उधर देखा और पैसे लेते हुए बोला-अब मैं फिर कब आऊँ आपसे मिलने?”
वह कुटिलता से बोला-”एक साल बाद. अभी तो यह पैसा तुम्हारे पास है, जब यह ख़त्म हो जाये तब आना. यह लो और भी पैसा तुम अपना मकान भी खाली कर दो. मैं तुम्हें एक साल बाद अच्छा मकान भी दूंगा.”

एक साल बाद जब अपने पैसे ख़त्म होने के बाद लौटा तो उसने देखा वहाँ सब बदला हुआ था. वह सब वहाँ वह सब था जो विकास ने उसे बताया था. वह पता करता हुआ उसकी कोठी के पास पहुंचा और दरबान से कहा’-मुझे साहब से मिलना है.”

दरबान ने कहा-साहब से क्या तुम्हारी मुलाक़ात तय है तो दिखाओ कोई कागज़, ऐसे अन्दर नहीं जाने दिया जा सकता.”
इतने में उसने देखा कि कार में वही विकास बैठकर बाहर आ रहा है. जैसे ही कर बाहर आयी वह उसके सामने खडा हो गया. विकास बाहर निकला और चिल्लाया-”तुम्हें मरना है?”
किसान बोला-”आपने मुझे नहीं पहचाना. मैं हूँ किसान. आपको यह जमीन दी थी.”
विकास बोला-तो? मैंने तुम्हें पैसे दिए थे. हट जाओ यहाँ से.’
विकास कार में बैठ गया तो किसान उसकी कार के सामने आने की करने लगा पर वह उसे धकियाते हुए निकला गया. कार के पहिये की चोट खाकर वह किसान गिर पडा. एक आदमी ने आकर उसे उठाया. वह आदमी पायजामा कुर्ता पहने हुए था. उसने रोते हुए किसान को उठाया. किसान ने पूछा-”आप कौन?

उसने कहा-”विकास?’
किसान ने पूछा-” वह कौन था”
आदमी ने कहा-‘विनाश! पर अपना नाम विकास बताता है. मैं तुम्हें अपने घर पहुंचा दूं. तुम्हारी मरहम पट्टी करवा दूं. चिंता न करो मैं पैसे खर्च करूंगा.”
किसान ने कहा-”नहीं मैं खुद चला जाऊंगा.’
किसान वहाँ से चला और कहता जा रहा था”विनाश और विकास’

असल पर नक़ल का राज-हास्य कविता


आँख के अंधे अगर हाथी को
पकड कर उसके अंगों को
पकड लें
अपने बुद्धि के अनुसार
उसके अंगों का बयान
कुछ का कुछ कर लें
तो चल भी सकता है
पर अगर अक्ल के अंधे
रबड़ के हाथी को पकड़ कर
असल समझने लगें तो
कैसे हजम हो सकता है

कभी सोचा भी नहीं था कि
नक़ल इतना असल हो जायेगा
आदमी की अक्ल पर
विज्ञापन का राज हो जायेगा
हीरा तो हो जायेगा नजरों से दूर
पत्थर उसके भाव में बिकता नजर आएगा
कौन कहता है कि
झूठ से सच हमेशा जीत सकता है
छिपा हो परदे में तो ठीक
यहाँ तो भीड़ भरे बाजार में
सच तन्हाँ लगता है
इस रंग-बिरंगी दुनिया का हर रंग भी
नकली हो गया है
काले रंग से भी काला
आदमी के मन का लगता है

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