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लोग अपने से बात करते हुए पाठ अंतर्जाल पर पढ़ना चाहते हैं-संपादकीय


आज यह ब्लाग/पत्रिका की पाठ पठन/पाठक संख्या एक लाख को पार कर गयी। इस ब्लाग/पत्रिका के साथ इसके लेखक संपादक के दिलचस्प संस्मरण जुड़े हुए हैं। यह ब्लाग जब बनाया तब लेखक का छठा ब्लाग था। उस समय दूसरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर यूनिकोड में न रखकर सामान्य देव फोंट में रचनाएं लिख रहा था। वह किसी के समझ में नहीं आते थे। ब्लाग स्पाट के हिंदी ब्लाग से केवल शीर्षक ले रहा था। इससे हिन्दी ब्लाग लेखक उसे सर्च इंजिन में पकड़ रहे थे पर बाकी पाठ उनकी समझ में नहीं आ रहा था। यूनिकोड में रोमन लिपि में लिखना इस लेखक के लिये कठिन था। एक ब्लाग लेखिका ने पूछा कि ‘आप कौनसी भाषा में लिख रहे हैं, पढ़ने में नहीं आ रहा।’ उस समय इस ब्लाग पर छोटी क्षणिकायें रोमन लिपि से यूनिकोड में हिन्दी में लिखा इस पर प्रकाशित की गयीं। कुछ ही मिनटों में किसी अन्य ब्लाग लेखिका ने इस पर अपनी टिप्पणी भी रखी। इसके बावजूद यह लेखक रोमन लिपि में यूनिकोड हिंदी लिखने को तैयार नहीं था। बहरहाल लेखिका को इस ब्लाग का पता दिया गया और उसने बताया कि इसमें लिखा समझ में आ रहा है। उसके बाद वह लेखिका फिर नहीं दिखी पर लेखक ने तब यूनिकोड हिन्दी में लिखना प्रारंभ किया तब धीरे धीरे बड़े पाठ भी लिखे।

उसके बाद तो बहुत अनुभव हुए। यह ब्लाग प्रारंभ से ही पाठकों को प्रिय रहा है। यह ब्लाग तब भी अधिक पाठक जुटा रहा था जब इसे एक जगह हिन्दी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों का समर्थन नहीं मिलता था। आज भी यहां पाठक सर्वाधिक हैं और एक लाख की संख्या इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी अपनी गति से अंतर्जाल पर बढ़ रही है। मुख्य बात है विषय सामग्री की। इस ब्लाग पर अध्यात्मिक रचनाओं के साथ व्यंग, कहानी, कवितायें भी हैं। हास्य कवितायें अधिक लोकप्रिय हैं पर अध्यात्मिक रचनाओं की तुलना किसी भी अन्य विधा से नहीं की जा सकती। लोगों की अध्यात्मिक चिंतन की प्यास इतनी है कि उसकी भरपाई कोई एक लेखक नहीं कर सकता। इसके बाद आता है हास्य कविताओं का। यकीनन उनका भाव आदमी को हंसने को मजबूर करता है। हंसी से आदमी का खून बढ़ता है। दरअसल एक खास बात नज़र आती है वह यह कि यहां लोग समाचार पत्र, पत्रिकाओं तथा किताबों जैसी रचनाओं को अधिक पसंद नहीं करते। इसके अलावा क्रिकेट, फिल्म, राजनीति तथा साहित्य के विषय में परंपरागत विषय सामग्री, शैली तथा विधाओं से उन पर प्रभाव नहीं पड़ता। वह अपने से बात करती हुऐ पाठ पढ़ना चाहते हैं। अंतर्जाल पर लिखने वालों को यह बात ध्यान रखना चाहिये कि उनको अपनी रचना प्रक्रिया की नयी शैली और विधायें ढूंढनी होंगी। अगर लोगों को राजनीति, क्रिकेट, फिल्म, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विषयों पर परंपरागत ढंग से पढ़ना हो तो उनके लिये अखबार क्या कम है? अखबारों जैसा ही यहां लिखने पर उनकी रुचि कम हो जाती है। हां, यह जरूर है कि अखबार फिर यहां से सामग्री उठाकर छाप देते हैं। कहीं नाम आता है कहीं नहीं। इस लेखक के गांधीजी तथा ओबामा पर लिखे गये दो पाठों का जिस तरह उपयेाग एक समाचार पत्र के स्तंभकार ने किया वह अप्रसन्न करने वाला था। एक बात तय रही कि उस स्तंभकार के पास अपना चिंतन कतई नहीं था। उसने इस लेखक के तीन पाठों से अनेक पैरा लेकर छाप दिये। नाम से परहेज! उससे यह लिखते हुए शर्म आ रही थी कि ‘अमुक ब्लाग लेखक ने यह लिखा है’। सच तो यह है कि इस लेखक ने अनेक समसामयिक घटनाओं पर चिंतन और आलेख लिखे पर उनमें किसी का नाम नहीं दिया। उनको संदर्भ रहित लिखा गया इसलिये कोई समाचार पत्र उनका उपयोग नहीं कर सकता क्योंकि समसामयिक विषयों पर हमारे प्रचार माध्यमों को अपने तयशुदा नायक और खलनायकों पर लिखी सामग्री चाहिये। इसके विपरीत यह लेखक मानता है कि प्रकृत्तियां वही रहती हैं जबकि घटना के नायक और खलनायक बदल जाते हैं। फिर समसामयिक मुद्दों पर क्या लिखना? बीस साल तक उनको बने रहना है इसलिये ऐसे लिखो कि बीस साल बाद भी ताजा लगें-ऐसे में किसी का नाम देकर उसे बदनाम या प्रसिद्ध करने
से अच्छा है कि अपना नाम ही करते रहो।
मुख्य बात यह है कि लोग अपने से बात करते हुऐ पाठ चाहते हैं। उनको फिल्म, राजनीति, क्रिकेट तथा अन्य चमकदार क्षेत्रों के प्रचार माध्यमों द्वारा निर्धारित पात्रों पर लिख कर अंतर्जाल पर प्रभावित नहीं किया जा सकता। अपनी रचनाओं की भाव भंगिमा ऐसी रखना चाहिये जैसी कि वह पाठक से बात कर रही हों। यह जरूरी नहीं है कि पाठक टिप्पणी रखे और रखे तो लेखक उसका उत्तर दे। पाठक को लगना चाहिये कि जैसे कि वह अपने मन बात उस पाठ में पढ़ रहा है या वह पाठ पढ़े तो वह उसके मन में चला जाये। अगर वह परंपरागत लेखन का पाठक होता तो फिर इस अंतर्जाल पर आता ही क्यों? अपने मन की बात ऐसे रखना अच्छा है जैसे कि सभी को वह अपनी लगे।
इस अवसर पर बस इतना ही। हां, जिन पाठकों को इस लेखक के समस्त ब्लाग/पत्रिकाओं का संकलन देखना हो वह हिन्द केसरी पत्रिका को अपने यहां सुरक्षित कर लें। इस पत्रिका के पाठकों के लिये अब इस पर यह प्रयास भी किया जायेगा कि ऐसे पाठ लिखे जायें जो उनसे बात करते हुए लगें।

लेखक संपादक दीपक भारतदीप,ग्वालियर 

आयु के अनुसार होता है मनोरंजन का स्वरूप-आलेख (age fector and entertainment-hindi article)


वह कौनसी संस्कृति और संस्कार है जिसके नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया है जिसे बचाने के लिये इतने सारे बुद्धिजीवी लगे हुए हैं। सविता भाभी नाम की वेबसाईट और सच का सामना नाम का एक धारावाहिक इतने खतरनाक नहीं हो सकते कि वह भारतीय संस्कृति को नष्ट कर दें। भारतीयों की ताकत उनका ध्यान है जो वह अध्यात्मिक ज्ञान से अर्जित करते हैं। भारत के प्राचीन ग्रंथों में कहीं इसकी चर्चा नहीं है कि जुआ, अश्लीलता या यौन विषयों पर प्रतिबंध लगाया जाये।
हमारे प्राचीन ग्रंथ आत्मनियंत्रण का संदेश देते हैं पर यह अपेक्षा नहीं करते कि राज्य इसके लिये कार्यवाही करे। इन्हीं ग्रंथों में योग साधन, प्राणायम, ध्यान और मंत्रों की विधियां बतायी गयी हैं जिनसे शरीर और मन पर नियंत्रण रखा जा सकता है। इस देश के अधिकतर लोग आत्मनिंयत्रण के द्वारा ही जीवन व्यतीत करते हैं और इसी कारण ही भारतीय समाज विश्व का सबसे योग्य समाज भी माना जाता है। तीन प्रकार की प्रवृत्तियों के लोग-सात्विक, राजस और तामस-इस धरती पर हमेशा रहेंगे यह बात बिल्कुल स्पष्ट है। आचार विचार, रहन सहन, और खान पान के आधार आदमी की प्रवृत्तियां निर्धारित करती हैं और वह इन्हीं से पहचाना भी जाता है।
आदमी के अपराधों से निपटने का काम राज्य का है और सामान्य आदमी को स्वयं पर ही नियंत्रण रखना चाहिये। दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है या कह रहा है इससे अधिक आदमी अगर स्वयं पर ध्यान दे तो अच्छा है-यह हमारे ग्रंथों का स्पष्ट मत है।

समाज को संभालने का काम गुरु करें यह भी स्पष्ट मत है। फिर फिल्मों, धारावाहिकों, किताबों और वेबसाईटों का प्रभाव हमेशा क्षणिक रहता है उनमें इतनी ताकत नहीं है कि वह पूरा समाज बिगाड़ सकें-कम से कम भारतीय समाज इतना कमजोर नहीं है। यह समाज जीवन के सत्य और रहस्यों को जानता है जो समय समय पर महापुरुष इसे बता गये हैं। इसके बावजूद इस समाज को कमजोर मानने वाले भ्रम में हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह भ्रम उस बौद्धिक समाज को है जो शरीरिक श्रम से परे है। शारीरिक से परे आदमी को भय, आशांकायें और संदेह हमेशा घेरे रहते हैं। यही चंद लोग ऐसी फिल्मों, वेबसाईटों,धारवाहिकों और साहित्य से चिपका रहता है जो आदमी के मन में पहले सुख और बाद में संताप पैदा करता है। जो श्रम करने वाले लोग हैं ऐसा वैसा सब देखकर भूल जाते हैं पर बुद्धिजीवियों के चिंतन की सुई वहीं अटकी रहती है-यह तय करने में कि समाज इससे बिगड़ेगा कि बनेगा!
खासतौर से जिनकी उम्र बढ़ी हो गयी है या फिर जिनको समाज सुधारने का ठेका मिल गया है वह ऐसे सभी स्तोत्रों पर पर प्रतिबंध की मांग करते हैं जिनसे युवा मन विचलित होने की आशंका रहती है।

यह समस्या तो पूरे समाज में है। हर बुढ़े को आजकल के युवा असंयमित दिखते हैं तो हर बुढ़िया को युवती अहंकारी नजर आती है। बुढ़ापे में आदमी का अहंकार अधिक बढ़ जाता है और वह पुजना चाहता है। हम बरसों से सुन रहे हैं कि ‘जमाना बिगड़ गया है।’ हम छोटे थे तो समझते थे कि ‘वास्तव में जमाना बिगड़ गया होगा। अब देखते हैं तो सोचते हैं कि जमाना ठीक कब था। कहते हैं कि घोर कलियुग है पर बताईये सतयुग कब था? रावण त्रेतायुग में हुआ और कंस द्वापर में हुआ। अगर वह युग ठीक था तो फिर उनमें ऐसे दुराचारी कहां से आ गये? कुछ लोग कहते हैं कि उस समय आम आदमी में धर्म की भावना अधिक थी। अब क्या कम है? आम आदमी तो आज भी भला है-उसकी चर्चा अधिक नहीं होती यह अलग बात है। फिर आजकल के प्रचार माध्यम सनसनी फैलाने के लिये खलपात्रों में ही अच्छाई ढूंढते नजर आते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बुढ़ापे में जमाना सभी को भ्रष्ट नजर आता है।
जहां तक यौन और अश्लील साहित्य का सवाल है तो वह चालीस सालों से हम बिकते देख रहे हैं। वह बिकता भी खूब था। अनेक लोग पढ़ते थे पर फिर भी चालीस सालों में ऐसा नहीं लगता कि उससे जमाना बिगड़ गया। उम्र के हिसाब से आदमी चलता है। अनेक युवाओं ने ऐसा साहित्य पढ़ा पर अब उनमें से कई ऐसे भी हैं जो मंदिरों में दर्शन करने के लिये जाते हैं। युवा मन हिलोंरे मारता है। वह ऐसा देखना चाहता है जो नया हो। उस समय हर कोई हर युवा अपने हमउम्र विपरीत लैंगिक संपर्क बढ़ाना चाहता है। युवावस्था में विवाह होने पर जीवन साथी के प्रति दैहिक आकर्षण चरम पर पहुंच जाता है। समय के साथ वह कम होता जाता है पर प्रेम यथावत रहता है क्योंकि मन में तब एक स्वाभाविक प्रेम की ग्रंथि है जो एक दूसरे को बांधे रहती है। यह व्यक्तिगत संपर्क कभी समाज के लिये देखने की चीज नहीं होता बल्कि सभी लोग अपनी बात ढंके रहते हैं पर दूसरे के घर में झांकने की उनके अंदर एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो हर मनुष्य मनोरंजन पैदा करती है।
आदमी में मन है तो उसे मनोरंजन की आवश्यकता होती है। मनोरंजन का स्वरूप आयु के अनुसार तय होता है। युवावस्था में यौन विषय नवीनतम और आकर्षक लगता है तो अधेड़ावस्था में दौलत और शौहरत का नशा चढ़ जाता है। बुढ़ापे में जब शरीर के अंग शिथिल होते हैं तब सम्मान पाने का लोभ आदमी में पैदा होता है। ऐसे में आदमी दूसरे की निंदा और आत्मप्रवंचना कर अपने आपको दिलासा देता है कि वह अपना सम्मान बढ़ा रहा है। ऐसे में युवाओं के मनोरंजन के साधन उनको भारी तकलीफ देते हैं भले ही अपनी युवावस्था में वह भी उनमें लिप्त रहे हों।

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कोई व्यक्ति या समूह किसी दूसरे को हानि नहीं पहुंचा रहा है तो उसे अपनी आयु के अनुसार मनोरंजन प्राप्त करने का अधिकार है। यह समाज की एक सहज प्रक्रिया होना चाहिये। युवाओं के मन को किस प्रकार का मनोरंजन चाहिये यह तय करने का अधिकार उनको है न कि अधेड़ और बूूढ़े इसका निर्धारण करें। यहां यह भी याद रखने लायक बात है कि बड़ी आयु के लोग ही छोटी आयु के लोगों में संस्कार भरने का प्रयास करते हैं। इसलिये गुरु भी कहलाते हैं। यह उनकी जिम्मेदारी है कि वह उनकी मन के पर्वत को मजबूत बनायें जिससे निकलने वाली मनोरंजन की नदी विषाक्त न हो भले ही वह यौन साहित्य वाले शहर से निकलती हो। इसकी बजाय उनको जबरन रोकने की चाहत एक मजाक ही है। सच तो यह है कि कभी कभी तो यह लगता है कि कुछ उत्पाद इसलिये ही लोकप्रिय हो जाते हैं कि उनका विरोध अधिक होता है। यह विरोध प्रायोजित लगता है। वेबसाईट पर प्रतिबंध और धारावाहिक के विरोध के बाद उनकी सार्वजनिक चर्चा अधिक होना इस बात का संदेह भी पैदा करती है। इस तरह के विरोध युवाओं की तरफ से नहीं होते जो इस बात का प्रमाण है कि वह उनके लिये मनोरंजन का साधन हैं पर वह इससे विचलित हो जायेंगे यह भी नहीं सोचना चाहिये। चलते रहना इस दुनियां का नियम है।
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जिंदगी में ‘शार्टकट’ रास्ता मत ढूंढो यार-vyangya kavita


जीवन में कामयाबी के लिये
शार्टकट(छौटा रास्ता) के लिये
मत भटको यार
भीड़ बहुत है सब जगह
पता नहीं किस रास्ते
फंस जाये अपनी कार
तब सोचते हैं लंबे रास्ते
ही चले होते तो हो जाते पार
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धरती की उम्र से भी छोटी होती हमारी
फिर भी लंबी नजर आती है
जिंदगी में कामयाबी के लिये
छोटा रास्ता ढूंढते हुए
निकल जाती है उमर
पर जिंदगी की गाड़ी वहीं अटकी
नजर आती है
…………………..
जिंदगी मे दौलत और शौहरत
पाने के वास्ते
ढूंढते रहे वह छोटे रास्ते
खड़े रहे वहीं का वहीं
नाकाम इंसान की सनद
बढ़ती रही उनके नाम की तरफ
आहिस्ते-आहिस्ते

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संत कबीर के दोहे:त्रिगुणी मायावृक्ष के नीचे सब ले रहे साँस


संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि
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तीन गुनन की बादरी, ज्यों तरुवर की छाहिं
बाहर रहे सौ ऊबरे, भींजैं मंदिर माहिं

तीन गुणों वाली माया के नीचे ही सभी प्राणी सांस ले रहे हैं। यह एक तरह का वृक्ष है जो इसकी छांव से बाहर रहेगा वही भक्ति की वर्षा का आनंद उठा पायेगा।

जिहि सर घड़ा न डूबता, मैंगल मलि मलि न्हाय
देवल बूड़ा कलस सौं, पंछि पियासा जाय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जहां कभी सर और घड़ा नहीं डूबता वहां वहां मस्त हाथी नहाकर चला जाता है। जहां कलसी डूब जाती है वहां से पंछी प्यासा चला गया।

संपादकीय व्याख्या-यहां भक्ति और ज्ञान के बारे में कबीरदास जी ने व्यंजना विद्या में अपनी बात रखी है। वह कहते हैं कि प्रारंभ में आदमी का मन भगवान की भक्ति में इतनी आसानी से नहीं लगता। उसे अपने अंदर दृढ़ संकल्प धारण करना पड़ता है। ज्ञान और भक्ति की बात सुनते ही आदमी अपना मूंह फेर लेता है क्योंकि उसका मन तोत्रिगुणी माया में व्याप्त होता है। यह विषयासक्ति उसे भक्ति और ज्ञान से दूर रहने को विवश करती है ऐसे वह भगवान का नाम सुनते ही कान भी बंद कर लेता है। जब उसका मन भक्ति और ज्ञान में रमता है तब वही आदमी संपूर्ण रूप से उसके आंनद में लिप्त हो जाता है-अर्थात जहां सिर रूपी घड़ा नहीं डूबता था ज्ञान प्राप्त होने पर वहां लंबा-चौड़ा हाथी नहाकर चला जाता है। जिसे ज्ञान नहीं है वह हमेशा ही प्यासा रहता है। माया के फेरे में ही अपना जीवन गुजार देता है। इस त्रिगुणी माया की छांव में जो व्यक्ति बैठा रहेगा वह भक्ति कभी नहीं प्राप्त कर सकता है।
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भर्तृहरि नीति शतक-कर्मकांड निभाने से कोई लाभ नहीं होता


राजा भर्तृहरि कहते हैं कि
किं वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तरैः
स्वर्गग्रामकुटीनिवाफलदैः कर्मक्रियाविर्भमैः।
मुक्तवैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानल्र
स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणगव्त्तयः

हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मृतियों और पुराणों को पढ़ने, बृहद शस्त्रों के श्लोक रटने, किसी स्वर्ग जैसे ग्राम में फल देने वाले कर्मकांड एक तरह से पाखंड हैं उनके निर्वहन से क्या लाभ? संसार में दुःखों का भार हटाने और परमात्मा का दिव्य पद पाने के लिये केवल उसका स्मरण करना ही पर्याप्त है। उसके अलावा सभी कुछ व्यापार है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने मन को शांति देन का इकलौता मार्ग एकांत में परमात्मा की हृदय से भक्ति करना ही है। चाहे कितने भी द्रव्य से संपन्न होने वाले यज्ञ कर लें और अनेक ग्रंथ पढ़कर उसकी सामग्री पढ़कर दूसरों का सुनाने से कोई लाभ नहीं हैं। हम अपनी शांति प्राप्त करने के लिये सत्संगों और आश्रमों में पाखंडी गुरूओं के पास जाते हैं। इनमें कई कथित साधुओं और संतों ने पंच सितारे होटलों की सुविधाओं वाले आश्रम बना लिये हैं जहां रहने का दाम तो दान के नाम वसूल किया जाता है। ऐसे संत और साधु कर्मकांडों में लिप्त होने का ही संदेश देते हैं। अधिकतर साधु संत सकाम भक्ति के उपासक हैं। वह अपने पैर पुजवाते हैं। कहते तो वह भी भगवान का स्मरण करने को हैं पर साथ में अपनी किताबें और मंत्र पकड़ाते हैं। उनके बताये रास्ते से सच्चे मन से भक्ति नहीं होती बल्कि शांति खरीदने के लिये हम उनको पैसे देकर अपने घर आते हैं। परंतु मन की शांति कहीं बाजार में मिलने वाली वस्तु तो है नहीं और फिर हमारा मन अशांत होकर भटकने लगता है।

ईश्वर की भक्ति से ही मन को शांति मिलती है और उसके लिये यह आवश्यक है कि मन को कुछ पल सांसरिक मार्ग से हटाया जाये और उसका एक ही उपाय है कि एकांत में बैठकर उसका ध्यान करें। बाकी तो अपने देश में धर्म के नाम पर व्यापार है और जितने भी कर्मकांड हैं वह तो केवल व्यापार के लिये हैं और उनसे काल्पनिक स्वर्ग पाने का विचार ही बेकार है।
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इन्सान जमीन पर कटते रहे-व्यंग्य कविता


लुटता रहा पूरा शहर
मगर लोग देखते रहे।
‘खराब ज़माना आ गया है’
एक दूसरे से बस यही कहते रहे।

‘बचाने के लिये जंग कर
जान गंवाने या
शरीर पर जख्म लेने से
अच्छा अमन है’
यही सोचकर आपस में हंसते रहे।

फिर भी
आसमान की तरफ देखकर
वहां से किसी फरिश्ते के जमीन पर आकर
खुद को बचाने की उम्मीद में
इंसान खामोशी से जमीन पर कटते रहे।।

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हिंदी साहित्य,मनोरंजन,हिंदी शायरी,शेर,समाज

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सुनकर आग लगने की खबर, तैयार हो जाते रहबर-व्यंग्य कविता



सुनकर कहीं भी आग लगने की खबर
तैयार हो जाते हैं रहबर
साथ में ले जाते हैं
छपे बयानों का पुलिंदा
देखते हैं पहले कितने मरे कितने बचे जिंदा
फिर करते हैं अपनी बात
पानी की बोतल भी चलते हैं साथ लिए।
आग बुझाने के मतलब से नहीं
बल्कि गले की प्यास बुझाने के लिए।
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कहीं भी हो हादसा
वह पकडते हैं वही रास्ता
प्रचार में चमकने के अलावा
उनका कोई दूसरा नहीं होता वास्ता।
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यह इंसानी फितरत ही है कि
हादसों में भी जाति और धर्म ढूंढने लगे हैं।
रहबरों ने भी तय कर लिया है
वह इधर जायेंगे, उधर नहीं
जहां आसार हो दौलत और शौहरत मिलने
वहीं बांटते और बेचते हैं हमदर्दी
कौन कहता है कि रहबर जगे हैं।

………………………
हवा की पहचान-हिंदी शायरी
——————

रेत से भरा हो या पानी से

सागर में लहरें उठाये बगैर

हवा कहर नहीं बरपा सकती.

न जलते होते जिंदगी के चिराग

तो उनको बुझाकर

बिखेरते हुए अँधेरा

अपनी ताकत कैसे दिखाती

नहीं तपता सूरज तो

पानी आकाश से कैसे बरसाती

जिंदगी की सांसों को बहाती हैं इसलिए हवा

कि पत्थरों के आसरे वह

अपनी पहचान बना नहीं सकती..
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कबीर के दोहे: शब्द हमेशा ही इस अन्तरिक्ष में विचरण करता है


कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार।
साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कटु वचन बहुत बुरे होते हैं और उनकी वजह से पूरा बदन जलने लगता है। जबकि मधुर वचन शीतल जल की तरह हैं और जब बोले जाते हैं तो ऐसा लगता है कि अमृत बरस रहा है।

शब्द न करैं मुलाहिजा, शब्द फिरै चहुं धार।
आपा पर जब चींहिया, तब गुरु सिष व्यवहार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शब्द किसी का मूंह नहीं ताकता। वह तो चारों ओर निर्विघ्न विचरण करता है। जब शब्द ज्ञान से अपने पराये का ज्ञान होता है तब गुरु शिष्य का संबंध स्वतः स्थापित हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- पिछले दिनों समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ कि अब लोगों में अपशब्द बोलना एक तरह से फैशन बनता जा रहा है। लोग अंतर्जाल पर गाली गलौच लिखना एक फैशन बना रहे हैं। यह वर्तमान विश्व समुदाय में अज्ञान और अहंकार की बढ़ती प्रवृत्ति का परिचायक है। पहले तो यह विचार करना जरूरी है कि हमारे शब्दों का प्रभाव किसी न किसी रूप में होता ही है। एक बात यह भी है कि हम जो शब्द बोलते हैं वह समाप्त नहीं हो जाता बल्कि हवा में तैरता रहता है। फिर समय पढ़ने पर वह उसी मुख की तरफ भी आता है जहां से बोला गया था। ऐसे में अगर हम अपने मुख से अपशब्द प्रवाहित करेंगे तो वह लौटकर कभी न कभी हमारे पास ही आने हैं। आज हम किसी से अपशब्द अपने मुख से बोलेंगे कल वही शब्द किसी अन्य द्वारा हमारे लिये बोलने पर लौट आयेगा। इस तरह तो अपशब्द बोलने और सुनने का क्रम कभी नहीं थमेगा।

इसलिये अच्छा यही है कि अपने मुख मधुर और दूसरे को प्रसन्न करने वाले शब्द बोलें जाये। लिखने का सौभाग्य मिले तो पाठक का हृदय प्रफुल्लित हो उठे ऐसें शब्द लिखें। पूरे विश्व समुदाय में गाली गलौच का प्रचलन कोई अच्छी बात नहीं है। ब्रिटेन हो या भारत या अमेरिका इस तरह की प्रवृत्ति ही विश्व में तनाव पैदा कर रही है। हम आज आतंकवाद और मादक द्रव्यों से विश्व समुदाय को बचाने का प्रयास कर रहे हैं पर इसके के लिये यह जरूरी है कि अपने शब्द ज्ञान का अहिंसक उपयोग करें तभी अन्य को समझा सकते हैं।
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भर्तृहरि शतकः बुढ़ापे में भले काम की आदत नहीं पड़ सकती


भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुजं यावच्च दूरे जरा यावच्चेंिद्रयशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान् संदीप्ते भवने तु कुपखननं प्रत्युद्यम कीदृशः

हिंदी में भावार्थ- जब शरीर स्वस्थ है, वृद्धावस्था परे है, इंद्रियां सही ढंग से काम कर रही हैं और आयु भी ढलान पर नहीं है विद्वान और ज्ञानी लोग तभी तक अपनी भलाई का काम प्रारंभ कर देते हैं। घर में आग लगने पर कुंआ खोदने का प्रयास करने से कोई लाभ नहीं होता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भर्तृहरि महाराज का यहां आशय यह है कि जब तक हम शारीरिक रूप से सक्षम हैं तभी तक ही अपने मोक्ष के लिये कार्य कर सकते हैं। इसके लिये आवश्यक है कि प्रारंभ से ही मन, वचन, और शरीर से हम भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा रखें। कुछ लोग यह कहते हैं कि अभी तो हम सक्षम हैं इसलिये भगवान की भक्ति क्यों करें? जब रिटायर हो जायेंग्रे या बुढ़ापा आ जायेगा तभी भगवान की भक्ति करेंगे। सच बात तो यह है कि भगवान की भक्ति या साधना की आदत बचपन से ही न पड़े तो पचपन में भी नहीं पड़ सकती। कुछ लोग अपने बच्चों को इसलिये अध्यात्मिक चर्चाओंे में जाने के लिये प्रेरित नहीं करते कि कहीं वह इस संसार से विरक्त होकर उन्हें छोड़ न जाये जबकि यह उनका भ्रम होता है। सच बात तो यह है कि भारतीय अध्यात्म ज्ञान किसी भी आदमी को जीवन से सन्यास होने के लिये नहीं बल्कि मन से सन्यासी होने की प्रेरित करता है। सांसरिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए उसके फल की कामना से परे रहना कोई दैहिक सन्यास नहीं होता।

हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तो यह कहता है कि आदमी अपने स्वभाव वश अपने नित्यप्रति के कर्तव्य तो वैसे ही करता है पर भगवान की भक्ति और साधना के लिये उसे स्वयं को प्रवृत्त करने के लिये प्रयास करना होता है। एक तो उसमें मन नहीं लगता फिर उससे मिलने वाली मन की शांति का पैमाना धन के रूप में दृश्यव्य नहीं होता इसलिये भगवान की भक्ति और साधना में मन लगाना कोई आसान काम नहीं रह जाता। बुढ़ापे आने पर जब इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं तब मोह और बढ़ जाता है ऐसे में भक्ति और साधना की आदत डालना संभव नहीं है। सच बात तो यह है कि योगसाधना, ध्यान, मंत्रजाप और भक्ति में अपना ध्यान युवावस्था में ही लगाया जाये तो फिर बुढ़ापे में भी बुढ़ापे जैसा भाव नहीं रहता। अगर युवावस्था में ही यह आदत नहीं डाली तो बुढ़ापे में तो नयी आदत डालना संभव ही नहीं है।
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3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

इंटरनेट पर शब्द ही चेहरा बनेंगे-संपादकीय


लिखने वाला हर व्यक्ति साहित्यकार नहीं माना जाता। एक तो क्लर्क होते हैं जो पत्र वगैरह लिखते हैं और उसमें उनके विषय के अनुसार कुछ न कुछ मौलिक होता है। उसी तरह लोग एक दूसरे को पत्र लिखते हैं और वह भी कई बार बेहतर शब्दों का उपयोग करने के बावजूद साहित्यकार नहीं कहलाते। उसी तरह ईमेल और उसके विस्तार ब्लाग पर लिखने वाले सभी लोग साहित्यकार नहीं बन जायेंगे। हां, दूसरा यह भी सच है कि ब्लाग पर लिखने वाले साहित्यकार अवश्य आयेंगे।
आखिर किसी विषय को साहित्य कब कहा जाता है? साहित्य उसी रचना को कहा जाता है जो अनाम व्यक्तियों को दृष्टिगत सार्वभौमिक विषय पर लिखी जाती है और उसमें किसी को संबोधित नहीं किया जाता है। जहां किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को ध्यान में रखकर लिखा गया भले ही उसमें किसी को संबोधन न हो फिर भी वह साहित्य नहीं है। उसी तरह चाहे भले ही किसी पाठ का विषय सार्वभौमिक हो पर अगर वह किसी व्यक्तिविशेष को संबोधित हो तो भी वह साहित्य नहीं है।
आशय यह है कि मौलिक रूप से किसी व्यक्ति द्वारा लिखा गया आलेख, कहानी, कविता और व्यंग्य अगर सार्वभौमिक लक्ष्य के साथ सभी व्यक्तियों के पढ़ने के लिये लिखा गया है वही साहित्य है।
अंतर्जाल पर ब्लाग कोई अलग से विधा नहीं है। जिस तरह कंप्यूटर कलम, टेबल, अलमारी,कागज,दराज तथा लिखने पढ़ने वाली अन्य वस्तुओं का एक समूह है उसी तरह ब्लाग उसमें एक लिफाफे की तरह है। अब इस लिफाफे का उपयोग कौन कैसे करता है वही उसकी भूमिका और स्वरूप को तय करेगा।
अब इसमें यह भी हो सकता है कि क्लर्क की तरह लिफाफा भेजने वाला कहीं कविता लिखकर प्रकाशित कर देगा तो कहीं अपने रिश्तेदारों और मित्रों को पत्र-ईमेल और उसका विस्तार पटल ब्लाग-के रूप में लिखने वाला भी आगे चलकर समाज से सरोकार लिखने वाले विषयों की तरफ उन्मुख होगा तो वह भी साहित्यकार बन जायेगा।
इधर हिंदी ब्लाग जगत काफी दिलचस्प दौर में पहुंच रहा है। कई ऐसे लेखक और लेखिकायें जो आज से दो वर्ष पहले तक ऐसे लिखते थे जैसे कि उनको कुछ नहीं आता। उस समय यह संभावना नहीं लगती थी कि वह कोई सार्थक लेखन कर पायेंगे पर अपने अभ्यास से वह अब चमत्कृत करने लगे हैं। उनका अभ्यास अब भी जारी है। अब वह गंभीर विषय लिखने का प्रयास कर रहे हैं उसमें शब्दों और वाक्यों को हिंदीमय बनाने में वह जोरदार प्रयास कर रहे हैं। नियमित टिप्पणीकार भी उनके पाठों पर गंभीर रूप से लिखने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि ब्लाग लेखकों का एक मित्र समूह अब तैयारी कर रहा है वैश्विक काल में प्रवेश कर रही हिंदी को नया स्वरूप देने का। इनमें से अधिकतर इस लेखक के मित्र हैं और अनेक बार अपनी टिप्पणियां कर प्रभावित करते रहे हैं। इनमें से एक ने तो लिखा था कि ‘अंतर्जाल पर हिंदी को स्थापित करने में आपका योगदान याद रखने लायक होगा’।
उसकी इस टिप्पणी से से लेखक डर गया था था। इस लेखक आखिर इस ब्लाग जगत में कितने मित्र हैं? यह लेखक उन पर लिखना चाहता है पर कुछ कहना कठिन है। इसमें संदेह नहीं है कि उनकी मित्रता और स्नेह ने मुझे प्रेरित किया पर उनके नामों को लेकर हमेशा संशय में बना रहता है। अगर शब्दों को चैहरा माना जाये तो ऐसा लगता है कि वह तीन या चार होंगे। हां, यह सच है कि जहां व्यक्ति आपको नहीं दिखता वहां शब्द ही चैहरा हो जाता है। अगर आप अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तो शब्दों से चैहरे को देखने का अभ्यास प्रारंभ कर दीजिये।
एक महिला लेखिका आजकल बहुत आक्रामक और दिलचस्प लिखने लगी हैं। उन्होंने लक्ष्य कर रखा है कुछ बड़े ब्लाग लेखकों को! वह पहले कवितायें लिखती थीं। ऐसा लगता था कि जैसे कौने में बैठी कोई मासूम महिला कविता लिखने का अभ्यास कर रही है। उनकी कवितायें पढ़कर हंसी आती थी पर अब उनका लिखा अब पढ़ने में यह लेखक चूकता नहीं है। दरअसल जो सार्वभौमिक विषय पर लिखने वाले लेखक (साहित्यकार!) हैं ब्लाग पर चटखारे लेकर लिखे गये पाठों पर अपनी दृष्टि अवश्य डालते हैं बनिस्बत अन्य सामग्री के। इसलिये ब्लाग पर वाद विवाद कर लिखी गयी सामग्री हिंदी के फोरमों पर अधिक हिट पाती है।
आज इस लेखक ने अपने वर्डप्रेस के पर स्टेटकांउटर लगाया। ऐसा पहले भी लगाया था पर गलत ढंग से तब ऐसा लगता था कि वह सही जानकारी नहीं दे रहा है पर अब ढंग से लगाया तो पता लगा कि रिपोर्ट सही है और वास्तव में वहां हिट अधिक हैं। वर्डप्रेस के ब्लाग की अपेक्षा कर मैं ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर लिख रहा था पर मजा नहीं आ रहा। वहां पर हिट के लिये ब्लागवाणी पर निर्भर रहना पड़ता है और फिर लक्ष्य केवल ब्लाग लेखक ही रह जाते हैं। इस लेखक ने ब्लागवाणी से वर्डप्रेस के सारे ब्लाग हटा लिये थे और सोचा कि ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर लिखने के बाद यहां पाठ लाया जायेगा पर लगता है अब बदलाव करना पड़ेगा। गूगल की पैज रैंक के अनुसार इस लेखक के तीन ब्लाग हिट हैं और इनमें दो वर्डप्रेस पर हैं। पहले लगता था कि कोई ऐजेंसी हिट कर भ्रमित कर रही है पर आज लगा कि वाकई वह ब्लाग हिट हैं। उस दिन इस लेखक का कंप्यूटर ठीक करने आये एक इंजीनियर ने बताया था कि वह हिंदी पढ़ने के लिये वेब दुनियां पर जाता है। इधर यह भी देखा जा रहा है कि वेबदुनियां से अच्छी संख्या में पाठक आ रहे हैं। इसलिये अपने हिट ब्लाग पर नियमित रूप से लिखने का प्रयास करना ही श्रेयस्कर होगा। वैसे भी यह ब्लाग पाठक संख्या पचास हजार पार करने वाला है और यह इस मामूली लेखक के लिये एक उपलब्धि तो होगी। इस अंतर्जाल पर इस लेखक के बीस लिफाफे यानि ब्लाग हैं। इस हिट ब्लाग पर अब नियमित रूप से लिखने का प्रयास होगा।
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मनुस्मृतिः गुरु शिष्य के बीच से बिल्ली निकल जाये तो विद्याध्ययन नहीं करना चाहिये


द्वावेव वर्णयेन्नित्यमनध्यायो प्रयत्नतः।
स्वाध्यायभूमिंचाशुद्धामात्मानं चाशुचिंतद्विजः।।
हिंदी में भावार्थ-
जो स्थान पवित्र और शुद्ध नहीं है वहां अध्ययन नहीं करना चाहिये। उसी तरह स्वयं शुद्ध हुए बिना भी व्यक्ति को अध्ययन नहंी करना चाहिये। शुद्ध और पवित्र स्थान पर स्वयं शुद्ध भाव से संपन्न व्यक्ति ही विद्या सही तरह से प्राप्त कर सकता है।
पशुमण्डुकमर्जारश्वसर्पनकुलाखुभिः।
अंतरागमने विद्यादनाध्यायमहर्निशमम्।।
हिंदी में भावार्थ-
चूहा, बिल्ली,श्वान,गाय,मेढक,नेवला और सांप अगर गुरु और शिष्य के बीच उस समय निकल जायें जब विद्याध्ययन चल रहा हो तो उसे उस दिन बंद कर देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में विद्यालयों की जो दशा है उसे सभी जानते है। देश में बहुत कम विद्यालय ऐसे होंगे जो अपने यहां साफ सफाई का का ध्यान रखते होंगे। सरकारी क्षेत्र के हों या निजी क्षेत्र के विद्यालय उनके साफ सफाई का ख्याल बहुत ही कम रखा जाता है। आज की वर्तमान पीढ़ी पर उसकी शिक्षा को लेकर तमाम तरह के कटाक्ष किये जाते हैं पर इस बात पर कितने लोग ध्यान दे रहे हैं कि उनको शिक्षा दिये जाने वाले स्थान कितने साफ सुथरे हैं। गांवों मेें चले जाईये तो विद्यालयों के नाम बड़े आकर्षक होते हैं पर उनके जर्जर भवनों की हालत और वहां व्याप्त गंदगी को देखें तो अपनी व्यवस्था को कोसना पड़ता है पर उसकी जिम्मेदारी लेने वाले लोग भी हमारे बीच में से ही होते है। वह नन्हें नन्हें मासूम बालक बालिकायें शिक्षा प्राप्त करते हैं पर पास ही व्याप्त गंदगी का उन पर क्या मानसिक दुष्प्रभाव पड़ता है इस पर कोई विचार नहीं करता।
निजी क्षेत्र के विद्यालय भी कम अव्यवस्था वाले नहीं है। उनके विद्यालयों के नाम भले ही आकर्षक हों पर उनका लक्ष्य केवल पैसा कमाना होता है। यह मानसिक अपवित्रता किस तरह बालक बालिकाओं को शिक्षित कर पायेगी यह भी विचार का विषय है? वह किताबों का अध्ययन कर अक्षरज्ञान तो प्राप्त कर लेते हैं पर नैतिक ज्ञान-जो कि पढ़ाने से अधिक शिक्षकों तथा प्रबंधकों के आचरण से आता है-उनमें नहीं स्थापित हो पाता। यही बालक-बालिकायें जब समाज और राष्ट्र के उच्च पद पर पहुंचते हैं तो फिर उनका लक्ष्य भी केवल धनार्जन करना ही रह जाता है।
अगर देश के विद्यालयों और महाविद्यालयों में ही पवित्रता और साफ सफाई की व्यवस्था रखी जाये तो शायद अपने देश को उस नैतिक संकट से मुक्त किया जा सकता है जिसके लिये विश्व भर में बदनामी हो रही है। देशभक्ति और समाज सेवा के गीत सुनाने से व्यक्ति कर्तव्यनिष्ठ नहीं हो जाता बल्कि बचपन से उसे अपने आचरण और व्यवहार से सिखाना पड़ता है। यह नैतिक दायित्व माता पिता के साथ ही गुरुजन और शिक्षा प्रबंधकों का है जिसे पूरा करना आवश्यक है।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग ‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

‘विषाद’ का प्रतिकार ‘सहजता’ से ही संभव -आलेख


वह एक ब्लाग पर टिप्पणी थी। उसमें कोई ऐसी बात नहीं कही गयी जिस पर बावेला मचायें। टिप्पणीकार की नीयत पर भी कोई संदेह नहीं था। वह भारतीय समाज में एकता के लिये प्रतिबद्ध दिख रहा था इसमें संदेह नहीं है। कभी कभी लगता है कि यह वही ब्लाग लेखक हो सकता है जिसके पाठ से प्रभावित होकर इस लेखक ने लिखना प्रारंभ किया था। अपने ही धर्म के प्रवर्तक के एक अंग्रेजी कार्टून के विरोध में कुछ लोगों ने प्रदर्शन किया था और उसने उसी पर ही ईमानदारी से एक बढ़िया व्यंग्य लिखा था। उसने अपने धर्म के ठेकेदारों पर कटाक्षा किया था। शायद वही ऐसा ब्लागर हो सकता है। दावे से यह कहना कठिन है कि यह वही ब्लाग लेखक है पर उसकी नेकनीयती पर संदेह करना अपने आपको धोखा देना है। उसने एक ब्लाग पर टिप्पणी की थी।
उसकी टिप्पणियों के बाकी अंशों से कोई मतलब नहीं है पर उसके श्रीगीता के प्रति किये गये उद्गार से इस लेखक को असहमति-याद रखें कि विरोध नहीं- थी। उसने दूसरे ब्लाग लेखक के पाठ पर टिप्पणी की थी। उस पाठ में एक धार्मिक पुस्तक को लेकर चर्चा थी। उस पाठ मेंे कुछ कतिपय लोगों द्वारा एक धार्मिक पुस्तक की व्याख्या अपने स्वार्थ से करने की आलोचना थी और उस ब्लाग लेखक ने उसी पर अपनी सदाशयता से टिप्पणी की थी।
उसने अपनी टिप्पणी में दो अन्य धर्मों की पुस्तकों के साथ श्रीगीता का भी उल्लेख करते हुए लिखा था कि यह सभी धार्मिक पुस्तकों इसलिये लिखी गयी क्योंकि उस समय लोगों के पास समय था। इन पुस्तकों का अधिक महत्व नहीं है।
उसकी इस टिप्पणी से लेखक के अधरों पर बरबस ही मुस्कान आ गयी। उस भावुक ब्लागर ने भले ही सदायशता से टिप्पणी की पर कहीं न कहीं उसका अज्ञान श्रीगीता के प्रति साफ दिख रहा था। अगर वह श्रीगीता के अलावा किसी अन्य धर्म ग्रंथ की बात करता तो शायद उसे समझा जा सकता था।
हम यहां धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र की विचारधाराओं से हटकर विचार करें तो लगेगा कि इस देश में लोगों की आदत हो गयी है कि केवल नारों के आधार पर ही बहस और टिप्पणियां करते हैं। वह टिप्पणीकार भी उस बुद्धिजीवी समाज से है जो केवल चर्चा करने के लिये चर्चा करता है। यहां हमें किसी बुद्धिजीवी का समाज देखकर उस पर टिप्पणी नहीं करना क्योंकि श्रीगीता को मानने वाला इंसान अगर समदर्शी नहीं हुआ तो उसका ज्ञान व्यर्थ होगा। हां, श्रीगीता के प्रति उसका जो भाव है वह देश के बुद्धिजीवी समाज का ही प्रतीक है और इस बात को कोई मतलब नहीं है कि उनमें कौन श्रीगीता का मानता है और कौन नहीं।
बाकी धर्मों की पुस्तकों पर यह लेखक टिप्पणी नहीं करता क्योंकि उनको इसने पढ़ा नहीं है पर श्रीगीता के बारे में यह कहना पड़ता है कि लाख सिर पटक लो। पढ़ो या नहीं। पढ़ो तो समझो, नहीं समझो तो अपनी मर्जी के मालिक हो। इस दुनियां में झगड़े चलते रहे हैं और चलते रहेंगे। मगर श्रीगीता में जीवन और सृष्टि के संबंध में जो ज्ञान और विज्ञान का रहस्य उद्घाटित किया गया है वह कभी बदल नहीं सकता। सच बात तो यह है कि श्रीगीता को मानने का दावा करने वाले ही उसके बारे में उतना ही जानते हैं जिससे दूसरे को बता कर अपने ज्ञानी होने का प्रभाव जमा सकें। श्रीगीता की पुस्तक और उसके संदेश आश्रमों के दरवाजे या दीवारों पर प्रकाशित करने से अगर उसके स्वामियों को आ जाता तो वह उनको बनाते ही नहीं। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता के ज्ञान का केवल अपने भक्तों में प्रचार करने की आज्ञा दी है मगर उसे सरेराह सुनाकर कथित धर्म के ठेकेदार इसी बात का प्रमाण देते हैं कि उनके पास केवल संदेश नारों के रूप में है धारण किये हुए ज्ञान की तरह नहीं।
एक मजे की बात दूसरी भी है। अगर अन्य धर्मग्रंथों के साथ श्रीगीता का नाम लेकर हल्की प्रतिकूल बात कहने को लोग यह मान लेते हैं कि चलो उसने हमारी श्रीगीता की अकेले आलोचना नहीं की। ऐसे में दो बातें प्रमाणित होती हैं-
1. लोग श्रीगीता के समर्थक हैं पर उसके ज्ञान से अनजान है इसलिये चुनौती नहीं दे पाते।
2. दूसरा यह कि पूरा समूह ही ऐसा हो गया है कि ‘चलो हमारे थप्पड़ मारा तो क्या हुआ पड़ौसी को भी तो मारा’।
दूसरा कारण पूरे समाज को इंगित कर दिया गया है वरना उस टिप्पणीकर्ता ब्लाग लेखक का ऐसा कोई उद्देश्य नहीं था-यह उसकी सदाशयता को देखकर कही जा सकती है।
विश्व भर में तनाव बढ़ता जा रहा है। विभिन्न धर्मों के नाम पर लिखी गयी बृहद पुस्तकों को पढ़ना सामान्य आदमी के लिये कठिन है इसलिये वह उनके पढ़ने वाले कथित ज्ञानियों के दरवाजे पर हाजिरी लगाता है और वह उसे सर्वशक्तिमान की पहचान और स्वर्ग का पता देने के बहाने अपने हित दो तरह से साधते हैं।
1.अपने लिये दान दक्षिणा जुटाते हैं
2.अपनी छबि सिद्ध की बनाकर लोगों के अपना नाम करना चाहते हैं।
हमारे देश में तो इतनी धार्मिक पुस्तकें हैं कि कोई भी अच्छा खासा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि उसने सब कुछ पढ़ लिया। अब आप कहेंगे कि तब क्या किया जाये?
सारी धार्मिक पुस्तकों का सार श्रीगीता में है। उसे एक बार पढ़ लें तो फिर अन्य ज्ञान की पुस्तकें पढ़ने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। हां, मनोरंजन की पुस्तकें पढ़ सकते हैं, कार्यक्रम देख सकते हैं पर उनमें लिप्त नहीं होना-यही संदेश श्रीगीता से निकलता है।
आखिर बात यह है कि आजकल जब बीमार आदमी डाक्टर के पास जाता है तो वह कहता है कि ‘तुम्हारी बीमारी की जड़ तनाव है!’
बीमार उसके हाथ से लिखा पर्चा हाथ में लेता है तो डाक्टर कहता है कि‘यह दवायें समयानुसार लेना। हा, पर ठीक तब ही हो पाओगे जब तनाव मुक्त रहोगे। ‘टैंशन मत पालो। हमेशा रिलैक्स रहो तभी इजीनैस फील कर पाओगे।’
श्रीगीता का पहला अध्याय ही ‘विषाद योग’ है और फिर सहज योग की स्थापना करते हुए अन्य अध्याय हैं। ‘विषाद’ का प्रतिकार ‘सहजता’ से करने के लिये कोई अन्य धर्मपुस्तक है क्या? अगर है तो क्या वह इतनी छोटी और संक्षिप्त संदेशों से सुसज्जित है जिसे आम आदमी पढ़ सके क्योंकि आजकल लोगों के फुरसत ही कहां है? दूसरी बात यह कि श्रीगीता फुरसत में नहीं लिखी गयी। उसके संदेश इसलिये भी संक्षिप्त हैं क्योंकि उसके कुछ ही देर बाद महाभारत का युद्ध शुरु होने वाला था और भगवान श्रीकृष्ण में ही इतना सामथर््य था जो संक्षिप्त ढंग से प्रभावी बात कह सकें। कोई बात विस्तार से कहकर उसे उलझाने का न तो उनका इरादा हो सकता था न वक्त ही था।
बात से बात निकलती है। उस टिप्पणीकर्ता ब्लाग लेखक की सदाशयता के प्रति कोई संदेह नहीं होते हुए भी इस लेखक द्वारा ऐसा लिखना इसलिये जरूरी लगा क्योंकि आमतौर से ऐसी बातें होती हैं तब लोगों को समझाना ही पड़ता है कि ‘श्रीगीता’ में सारे संसार के सत्य का उद्घाटित करने वाला ज्ञान और विज्ञान है। हो सकता है कि अन्य धर्म ग्रंथों में भी हो पर श्रीगीता में उनका सार भी है। यह आलेख अपनी बात दूसरे पर लादने के लिये नहीं लिखा गया बल्कि अपनी कहने के लिये लिखा गया है और ऐसी हल्की टिप्पणियोें या अन्य प्रतिकूल वक्तव्यों से कभी विचलित होकर उग्र नहीं होना चाहिये श्रीगीता यही संदेश देती है।
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बहस की बजाय लोग लड़ना चाहते हैं -आलेख


बहस होना जरूरी है क्योंकि किसी भी सामाजिक,आर्थिक और धार्मिक विषय पर प्रस्तुत निष्कर्ष अंतिम नहीं होता। दूसरे निष्कर्ष की संभावना तभी बनती है जब उस पर कोई बहस हो। बस इसमें एक पैंच फंसता है कि आखिर यह बहस किन लोगों के बीच होना चाहिये और किनके साथ करना चाहिये। सच बात तो यह है कि बहस से बचना संकीर्ण मानसिकता का प्रमाण है। साामजिक, अर्थिक और धार्मिक समूहों के ठेकेदार बहसों से इसलिये बचना चाहते हैं क्योंकि इससे उनके वैचारिक ढांचे की पोल खुलने और उससे उनके अनुयायियों के छिटकने का भय व्याप्त हो जाता है तो अनुयायी इसलिये बिदकते हैं क्योंकि उनको अपने ठेकेदारों के बहस में परास्त होने से कमजोर पड़ने पर जो उनसे सुरक्षा मिलने का जो भाव बना हुआ है वह समाप्त होने की आशंका हो जाती है-जिसे ‘सामाजिक सुरक्षा’ भी कहा जा सकता है जिसके होने का भ्रम हर व्यक्ति में यह ठेकेदार बनाये रखते हैं।

इंटरनेट पर भटकते हुए ही कुछ ब्लाग के पाठों पर दृष्टि गयी। एक पर फिल्म को लेकर बहस थी तो दूसरे पर किसी धर्म विशेष पर चर्चा करते हुए टिप्पणियां भी बहुत लिखी हुई थी। फिल्म वाले विषय वाला ब्लाग हिंदी में था और धर्म वाला अंग्रेजी में। जिस तरह की बहस धर्म वाले विषय पर थी वैसी हिंदी में संभव नहीं है और जिस तरह की हिंदी वाले ब्लाग पर थी वैसी सतही बहस अंग्रेजी वाले नहीं करते। दरअसल भारतीय समाज में असहिष्णुता का जो भाव है उसे देखते हुए धार्मिक विषय पर बहस करना खतरनाक भी है और इसलिये लोग फिल्मों के काल्पनिक विषयों पर ही बहस करते हैं-अब वह स्लमडाग हो या गुलाल या कोई अन्य।

भारतीय समाज की असहिष्णुता की रक्षा के लिये आस्था और विचारों की रक्षा के लिये अनेक तरह के नियम बनाये गये हैं। किसी धर्म, जाति,भाषा या क्षेत्र के नाम वैचारिक आपत्तियां उठाना एक तरह से प्रतिबंधित है। आप यहां झूठी प्रशंसा करते जाईये तो समदर्शी भाव के लिये आपको भी प्रशंसा मिलती रहेगी। बहरहाल अंग्रेजी ब्लाग का विषय था कि ‘यूरोप को किस तरह किसी धर्म ने बचाया’। इस अंग्रेजी ब्लाग को एक हिंदी ब्लाग लेखक ने अपने पाठ में प्रस्तुत करते हुए यह मत व्यक्त किया कि किस तरह अंग्रेजी में जोरदार बहस होती है। उन्होंने इस तरह की बहस हिंदी ब्लाग जगत में न होने पर निराशा भी जताई। उनको टिप्पणीकारों ने भी जवाब दिया कि किस तरह हिंदी में पाठक और लेखक कम हैं और यह भी कि हिंदी के ब्लाग लेखक भी कम प्रतिभाशाली नहीं है आदि। मुद्दा हिंदी और अंग्रेजी ब्लाग की पाठक और लेखकों की संख्या नहीं है बल्कि एक इस आधुनिक समय में भी बहस से बचने की समाज प्रवृत्ति है जिस पर विचार किया जाना चाहिये। इसके चलते हमारे समाज के सहिष्णु होने का दावा खोखला लगता है।

एक तरफ हम कहते है कि हमारा समाज सहिष्णु हैं और वह बाहर से आये विचारों, परंपराओं और शिक्षा को अपने यहां समाहित कर लेता है। एक तरह से वह स्वतः प्रगतिशील है और उसे किसी प्रकार के सहारे की आवश्यकता नहीं है दूसरी ओर हम लोगों की आस्था और विश्वास पर बहस इसलिये नहीं होने देते कि इससे उनको मानने वालों की भावनायें आहत होंगी। अब सवाल यह है कि धर्म,जाति,भाषा और व्यक्तियों के नाम पर जो विचारधारायें हैं वह स्वतः ही भ्रामक अवधाराणाओं पर आधारित हों तो उस टीक टिप्पणी करें कौन? जो उनको मानने वाले समूह हैं उसके सदस्य तो कूंऐं की मैंढक की तरह उन्हीं विचारों के इर्द गिर्द घूमना चाहते हैं-यह उनकी खुशी कहें या समाज में बने रहने की मजबूरी यह अलग से चर्चा का विषय है। दूसरा कोई टिप्पणी करे तो उसके विरुद्ध समूहों के ठेकेदार आस्था और विश्वास को चोट पहुंचाने का आरोप लगाकर उसके पीछे पड़ जाते हैं। इसका आशय यह है कि उन समूहों में बदलाव लाना प्रतिबंधित है। इसलिये बहस नहीं हो पाती। उसे रोका जाता है। इसके बावजूद भारतीय विचारधारायें बहुत उदार रही हैं। उन पर बहस होती है पर उसमें भी बहुत भ्रम है। धर्म और अध्यात्म ज्ञान को मिलाने की वजह से यह कहना कठिन हो जाता है कि हम अपनी बात किसके समर्थन में रखें। देखा जाये तो इस विश्व में जितनी भी धार्मिक विचारधारायें उनमें चमत्कारेां की प्रधानता है और इसलिये लोग यकीन करते हैं। इन यकीन करने वालों में दो तरह के होते हैं। एक तो वह लोग होते हैं जिनकी सोच यह होती है कि ‘ऐसा हो सकता है कि वह चमत्कार हुआ हो‘। दूसरों की सोच यह होती है कि ‘अगर कहीं उन चमत्कारों पर कहीं शक जताया या प्रश्न उठाया तो हो सकता है कि समाज उनको नास्तिक समझ कर उसके प्रति आक्रामक रुख न अपना ले इसलिये हां जी हा ंजी कहना इसी गांव में रहना की नीति पर चलते रहो। यानि भय ही चमत्कारों से बनी इन धार्मिक विचाराधाराओं का संवाहक है और उनको मानने वाले अनुयायी भी उसी भय के सहारे उनको प्रवाहमान बनाये रखना चाहते हैं।

ऐसे में जो लोग धार्मिक विषयों पर बहस चाहते हैं उनको इस देश में ऐसी किसी बहस की आशा नहीं करना चाहिये-खासतौर पर तब जब बाजार के लिये वह लाभ देने का काम करती हैं। ऐसे में कुछ लेखक हैं जो व्यंजना विधा में लिखते हों या फिर बिना किसी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र का नाम लिये अपने विचार रखते हैं। हालांकि ऐसे में बहस किसी दिशा में जाती नहीं लगती पर विचारों की गति बनाये रखने के लिये ऐसा करना आवश्यक भी लगता है।

ऐसे में बहस करने वाले विशारद भी क्या करें? वह फिल्मों के विषयों पर ही बहस करने लगते हैं। भारत इतना बड़ा देश है पर उसमें किसी क्षेत्र विशेष पर बनी फिल्म को पूरे देश की कहानी मान लिया जाता है। इस देश में इतनी विविधता है कि हर पांच कोस पर भाषा बदलती है तो हर एक कोस पर पानी का स्वाद बदल जाता है इसलिये कोई जगह की कहानी दूसरी जगह का प्रतीक नहीं मानी जा सकी। मगर फिर भी लोग है कि बहस करते हैं। इसमें कोई दोष नहीं है क्योंकि बहस ही लोगों की जींवत और सहिष्णुता की भावना का प्रतीक होती है। अभी स्लम डाग पर एकदम निरर्थक बहस देखी गयी। एक बड़े शहर की किसी झुग्गी की काल्पनिक कहानी-जिसमें काल्पनिक करोड़पति दिखाया गया है-देश के किसी अन्य भाग का प्रतीक नहीं हो सकती। मगर इस पर बहस हुई। बाजार ने इसे खूब भुनाया। प्रचार माध्यमों ने अधिकतर समय और हिस्सा इस पर खर्च कर अपनी निरंतरता बनाये रखी। अब कोई गुलाल नाम की फिल्म है। कुछ लोग उस पर आपत्तियां जता रहे हें तो कुछ लोग उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। इन पंक्तियों ने तो यह दोनों ही फिल्में नहीं देखी और न देखने का इरादा ही है क्योंकि उनमें क्या है यह इधर उधर पढ़कर जान लिया।

कहने का तात्पर्य यह है कि जिन वास्तविक विषयों पर बहस होना चाहिये उन पर आस्था और विश्वास के नाम पर ताला लगा दिया गया है। बुद्धिजीवियों को एक तरह चेतावनी दी जाती है कि वह किसी की भावनाओं से खिलवाड़ न करें। मध्यम श्रेणी के व्यवसायों में लगे बुद्धिजीवी जिनके पास न तो समाज को सुधारने की ताकत है और न ही वह उनके साथ है ऐसे में फिल्मों के विषयों पर ही बहस करते हैं। बुद्धिजीवियों को अपने मानसिक विलास के लिये कोई विषय तो चाहिये जिस पर चर्चा कर वह अपने ज्ञान का परीक्षण कर सकें। इसलिये वह ऐसे विवादास्पद विषयों पर लिखने और बोलने से बचते हैं जिससे उनको विरोध का सामना करना पड़े। जाति,धर्म,भाषा और क्षेत्रों के नाम पर बने समूहों की ताकत बहुत अधिक इसलिये है क्योंकि उनको धनपतियों का पूरा समर्थन प्राप्त है। यह केवल भारत मेें नहीं बल्कि पूरे विश्व में है। अंग्रेजों की फूट डालों और राज करो की नीति अब पूरे विश्व के ताकतवर लोगों की नीति बन गयी है। फिर भारत तो संवेदनशील देश है। ऐसे में यहां के बुद्धिजीवियों को फूंक फूंककर कदम रखने पड़ते हैं। ऐसे में काल्पनिक विषयों पर खुली बहस की जा सकती है और वास्तविक विषयों पर बिना नाम लिये ही अपनी बात कहना सुविधाजनक लगता है हालांकि विषय के निष्कर्ष किसी दिशा में नहीं जाते पर अपना मन तो हल्का हो ही जाता है।
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बहुत हैं लोग इस जहाँ में झूठे आंसू बहाने वाले -हिंदी गज़ल


बहुत लोग है इस जहां में झूठे आंसू बहाने वाले
वैसे ही उनके साथ होते,नकली हमदर्दी दिखाने वाले
दूसरों के क्या समझेंगे, अपने ही जज्बात नहीं समझते
निगाहें बाहर ही ठहरीं होतीं, अंदर लगे दिल पर ताले
ताकत पाने की चाहत में सभी ने खुद को किया लाचार
हैरान होते हैं वह लोग,बैठे जमाने के लिये जो दर्द पाले
घाव होने पर लोग आंसू बहाते और भरते सिसकियां
सूख तो फिर टकराते उसी पत्थर से, जिसने जख्म कर डाले
जंग की तरह जिंदगी जीने के आदी हो गये है दुनियां के लोग
अमन का पैगाम क्या समझेंगे, सभी है बेदर्द दिल वाले

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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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श्रीलंका क्रिकेट टीम को लाहौर में मिली सुरक्षा का क्या हुआ-आलेख


मुंबई में जब आतंकियों ने हमला किया तब भारत की सुरक्षा चूक कहकर पाकिस्तान ने बचने की नाकाम प्रयास किया था पर अब लाहौर हमले में वह स्वयं ही सुरक्षा चूक की आरोप में फंस रहा है। देखा जाये तो सुरक्षा ऐजंसियां मुंबई पर हमले को लेकर चैकस थी पर उनका सुरक्षा लक्ष्य किसी एक स्थान, इमारत या व्यक्ति पर केंद्रित नहीं था। इतनी बड़ी विशाल मुंबई मेंं यह संभव भी नहीं है। ऐसे में पाकिस्तान से आये आतंकवादी हजार रास्तों से एक मार्ग चुनकर आये और अपने दृष्टिकोण से लक्ष्य तय किये तो सुरक्षा की चूक जैसी कोई गंभीर बात नहीं मानी जा सकती । लाहौर में सुरक्षा एजेंसियों का लक्ष्य एक ही था कि किसी तरह श्रीलंका की क्रिकेट टीम की रक्षा करना। वह एक ही मार्ग से जाने वाली थी। उसके वाहन नियत थे। आशय यही था कि उसकी रक्षा के लिये कोई बड़ा दायरा नहीं था और उसके लिये बकायदा सुरक्षा कर्मी थे। ऐसे में पूरी दुनियां ही यह पूछेगी कि आखिर वह सुरक्षा व्यवस्था कहां थी। मुंबई के संबंध में कोई देश भारत से यह सवाल नहीं कर सकता क्योंकि सभी जानते हैं कि एक बृहद शहर की और एक क्रिकेट टीम की रक्षा में अंतर होता है।

पाकिस्तान अपनी बचकाना बातों से दुनियां को अब बरगला नहीं सकता। 12 लोग 15 मिनट तक बिना किसी प्रतिरोध के उस स्थान पर गोलीबारी करते हैं जिसकी सुरक्षा के लिये घोषित प्रयास किये गये हैं। पाकिस्तान ने अपने मित्र श्रीलंका को इस बात के लिये आश्वस्त किया होगा कि वह उसके खिलाडि़यों का बाल बांका भी नहीं होने देगा। जहां तक क्रिकेट टीमों की सुरक्षा की बात है तो वह एशियाई देशों में इस कदर की जाती है कि बंदूक लेकर तो दूर उसके खिलाडि़यों तक आटोग्राफ लेने वाले प्रशंसक भी नहीं पहुंच पाते। श्रीलंका की सरकार इस समय जरूर अपने आपको शर्मनाक स्थिति में अनुभव कर रही होगी क्योंकि भारत का दौरा टलने से पाकिस्तान के कंगाल हो रहे क्रिकेट बोर्ड को बचाने के लिये उसने कथित मैत्री निभाने के लिये वहां का दौरा करने का निश्चय किया। श्रीलंका के लोग जरूर वहां की सरकार से पाकिस्तान पर भरोसा करने की वजह पूछना चाहेंगे?

पाकिस्तान एक अव्यवस्थित देश हो चुका है। उसके पांच पुलिस कर्मियों की लाशें सड़कों पर बिछाकर जिस तरह 12 आंतकी उस बस पर 12 मिनट तक गोलीबार करते रहे जिसमें श्रीलंका क्रिकेट टीम के सदस्य सवार थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी फिल्म की शुटिंग चल रही है। एक भी अपराधी न तो मारा गया न ही पकड़ा गया। वहां मुठभेड़ नहीं हुई बस हमला होता रहा। पाकिस्तान का सभ्रांत समाज भी अपना विवेक खोता जा रहा है क्योंकि जिस तरह बिना किसी प्रमाण के भारत पर वहां की सरकार आरोप लगा रही है उस पर उसका यकीन करना यही दर्शाता है। एक बात याद रखने की है कि भारत ने पूरी तरह से मुंबई हमले के प्रमाण जुटाये और फिर पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा किया। दूनियां ने एसे ही यकीन नहीं किया। अमेरिका की एफ.बी.आई. ने कसाब के अलावा उस महिला से भी पूछताछ की जिसने आतंकियों को नाव से उतरते हुए देखा था। भारत की नीयत साफ थी इसलिये से नहीं रोका। एफ.बी.आई. लाहौर हमले की जांच में हाथ शायद ही डाले क्योंकि एक तो वहां कोई अमेरिकी नहीं मरा दूसरा जांच करने पर जब उसके सामने असफल पाकिस्तान का जो चित्र सामने आयेगा उसे वह दुनियां को नहीं बताना चाहेगी। अगर कोई पाकिस्तान में जाकर जांच करेगा तो उसका सबसे पहला सवाल तो यह होगा कि ‘आखिर वह सुरक्षा व्यवस्था कहां थी जो श्रीलंका की क्रिकेट टीम के लिये खासतौर से की गयी थी।’ हो सकता है कि इस जांच में सुरक्षा में लगे लोगों की शामिल होने की तस्वीर सामने आये। वैसे इस हमले के पीछे एक उद्देश्य तो मुंबई हमले की तस्वीर धुंधली करने का प्रयास ही लगता है। पाकिस्तान इस हमले को दिखाकर अपने आपको आतंक पीडि़त साबित करने का प्रयास जिस तरह कर रहा है उससे तो लगता है कि वहां की सेना ने यह अवसर अपने कुठपुतली सरकार को उपलब्ध कराया है। इसमें भी वह सफल नहीं होंगे क्योंकि मुंबई हमले का मामला इससे परिदृश्य में नहीं जा सकता क्योंकि उसमें 183 बेकसूर जानें गयीं थीं। लाहौर हमले में पाकिस्तान के पांच सुरक्षाकर्मी शहीद हुए पर उन पर शायद ही दुनियां इतना गौर करें। उल्टे लोग पूछेंगे कि बाकी लोग कहां थे? यकीनन पाकिस्तान के रणनीतिकारों के पास इसका कोई जवाब नहीं होगा। एक-दो दिन में इस घटना की चर्चा थम जायेगी और फिर पाकिस्तान को मुंबई हमले के मामले का सामना करना ही होगा।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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