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गंदगी के ढेर आंखों को दहलाते हैं-2 अक्टूबर महात्मा गांधी जयंती पर भारत स्वच्छता अभियान पर विशेष हिन्दी कविता


हर शहर में

ऊंचे और शानदार भवन

सीना तानकर खड़े हैं।

आंखें नीचे कर देखो

कहीं गड्ढे में सड़क हैं

कहीं सड़कों पर गड्ढे

पैबंद की तरह जड़े हैं।

कहें दीपक बापू खूबसूरत

शहर बहुत सारे कहलाते हैं,

कूड़े के  मिलते ढेर भी

आंखों को दहलाते हैं,

विकास की दर ऊपर

जाती दिखती जरूर है

मुश्किल यह है कि

हमारी सोच स्वच्छ नहीं हो पाती

गंदी सांसों में फेर में  जो पड़े हैं।

—————————-

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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सभी की नीयत में राग है-हिन्दी व्यंग्य काव्य रचनायें


सूरज में जरूरत से ज्यादा आग है,

शीतल है चंद्रमा पर उसमें भी दाग है।

कहें दीपक बापू इंसानों में कभी नहीं हो सकता देवता

सभी की नीयत में छिपा कोई न कोई राग है।

—————

अपने ही जाल में फंसा इंसान वफा का करता वादा,

क्या निभायेगा वह जिसके दिल में मतलब पाने का ही है इरादा।

कहें दीपक बापू कई लोगों ने विज्ञापन से अपनी छवि बनाई है

वह सौदागर सपने के बन जाते न करना उम्मीद उनसे ज्यादा।

————

आलीशान घर है पर उनके दिल में बुझे चिराग हैं,

शहर की उजाड़कर हरियाली पहरे में रखे उन्होंने बाग हैं।

कहें दीपक बापू  किस पर हंसे किस पर रोयें

शेर और हिरण चबा जायें इंसान के वेश में कई नाग हैं।

————–

राजमहलों में आनंद पाने की चाहत सभी पालते हैं,

खुले आसमान के नीचे जंग के मौके सभी टालते हैं।

बादशाहों की खुशफहमी  कि उनके पांव तले खजाना है,

फकीर की मस्ती है उन्हें किसी के पांव नहीं दबाना है

तख्त पर बैठे कई इंसान  हमेशा रहे बेचैन

उनका नाम कागज पर बादशाह की तरह चलता रहा,

कुछ नहीं मिला मेहनत करने पर भी वह भी खुश रहे

कभी की मस्ती कभी दौलतमंदों की हरकतों को हंसते सहा,

बुलंदियों पर पहुंचे जो दूसरों को गिराकर वह खुद भी गिरे,

सहुलियतों का घेरा लगाया मुश्किलों में भी वही घिरे,

कहें दीपक बापू जिंदा रहने के लिये साफ सांस जरूरी

शौहरत के दीवाने ज़माने में फैलाते सोच का जहर

उजाड़ते चमन पर अपनी जिंदगी की आस

गंदी हवाओं पर ही डालते हैं।

—————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

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अपनी कमीज पर सोने का बटन टांकते हैं-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


अपने दोष लोगों को दिखते नहीं

दूसरों के गिरेबां में लोग झांकते हैं,

गैरों धवल कपड़ों पर दाग लगते देखने की चाहत है

अपनी कमीज पर सोने के बटन टांकते हैं।

कहें दीपक बापू हर जगह तमाम विषयों होती बहस

निष्कर्ष कहीं से मिलता नहीं है,

हर कोई जमा है अपनी बात पर

तयशुदा इरादे से हिलता नहीं है,

कान बंद कर लिये अक्लमंदों ने

मौका मिलते ही जुबां से  अपनी अपनी फांकते है।

—————-

जिंदगी का हिसाब जब लगाते हैं तब होता है अहसास

कुछ सपने साकार खुद-ब-खुद साकार होते गये,

कुछ रिश्ते समय ने बदले कुछ मतलब निकलते ही खोते गये।

कहें दीपक बापू  पेटी में खजाना भरने की कोशिश

कभी हमने की नहीं,

इधर से आई माया उधर बह गयी कहीं,

जब भी किया हिसाब दिमाग हमारा गड़बड़ाया,

देना कभी भूले नहीं लेना याद नहीं आया,

रोकड़ बही लिखने का बोझ हम बेकार ढोते रहे।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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लोकतंत्र में मतदान दलों की होती है महत्वपूर्ण भूमिका-हिन्दी चिंत्तन लेख


     चुनावों में सूक्ष्म प्रेक्षक की भूमिका  निभाते हुए अत्यंत रोचक अनुभव होता है।  दरअसल इस रूप में हाथ से अधिक काम करना  नहीं होता वरन् मतदान केंद्रों पर सतत अपनी आंख जमाये चुनाव प्रक्रिया देखना ही होती है ताकि चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र ढंग से हो सकें।  हमारी नियुक्ति अनेक बार मतदान दलों में पीठासीन अधिकारी तथा मतदान अधिकारी क्रमांक एक में रूप में पहले भी हो चुकी है पर अब सूक्ष्म प्रेक्षक के रूप में जाना ही होता है।  यह अलग बात है कि पीठासीन या मतदान अधिकारी के रूप में दैहिक तथा मानसिक सक्रियता इतनी हो जाती है कि बाकी चीजों पर ध्यान नहीं जाता जबकि सूक्ष्म प्रेक्षक जहां केवल ध्यान का काम है वहां इस बात की गुंजायश हो ही जाती है कि मतदान से इतर बातें भी दृष्टि पथ में आती हैं।

     भारत में इस समय लोकसभा चुनाव 2014 का दौर मध्य स्थिति में पहुंच रहा है। इस चुनावी राजनीति में नेतागणों की सक्रियता पर मतदाता नज़र रखे हुए हैं।  प्रचार माध्यमों में चुनाव को लेकर अनेक प्रकार के समाचार आते रहते हैं पर शायद ही कोई उन लोगों के बारे में सोचता हो जो वास्तव में इस लोकतंत्र में राजनेताओं और मतदाताओं के बीच संपर्क सेतु में अपनी महत्ती भूमिका अदा करते हैं। वह होंते हैं मतदान दल जो हर केंद्र पर तैनात होकर इस लोकतांत्रिक प्रंक्रिया का संचालन करते हैं।

     महत्वपूर्ण बात यह है कि मतदान दल से जुड़े लोग इन चुनावों को जितना नजदीक से देखते हैं दूसरे के लिये वह केवल कल्पना ही  हो सकती है। एक सूक्ष्म प्रेक्षक के रूप में मतदाताओं से जुड़ाव होता ही है ताकि वह निडरता से मतदान कर सकें।  कहा जाता है कि मतदान दल को निष्पक्ष होना चाहिये।  हमने देखा है कि वहां निष्पक्षता या पक्षपात का सवाल ही नहीं रह जाता।  मतदान दल के लोग भले ही सामान्य समय में राजनीतिक विचारधाराओं पर चर्चा करते हों पर वहां सारी सोच हवा हो जाती है क्योंकि उनकी जिम्मेदारी इस तरह की होती है जिसमें मतदान सुचारु रूप से चलाने के अलावा उनको किसी बात का ध्यान करना ही संभव नहीं है।  चुनाव प्रत्याशियों तथा मतदाताओं की संख्या याद रहती है पर न तो किसी का चुनाव चिन्ह याद आता है न ही मतदाताओं के चेहरे पर अधिक दृष्टि रह पाती है।

     सूक्ष्म प्रेक्षक का दायित्व केवल मतदान पर दृष्टि रखना ही होता है इसलिये उसके पास थोड़ी देर अपना ध्यान कहीं अन्यत्र जाना संभव होता है।  शहर और गांव में मतदान की प्रक्रिया में कोई अंतर नहीं होता पर मतदान दलों की स्थितियां अलग हो जाती हैं। शहर में किसी मतदाता से निजी वार्तालाप करने पर विवाद की आशंका रहती है जबकि गांव में ऐसा नहीं होता। पिछले चुनावों में हमने अपने अनुभव पर कुछ नहीं लिखा पर इस बार मतदान थोड़ी धीमी प्रक्रिया से चला इसलिये कई ऐसे पल आये जिस समय हमारी मानवीय संवेदनाओं से  बाहर आकर आनंद दिया तो लिखने का मन किया।

     प्रातः ही मतदान केंद्र के बाहर  एक बच्चा अपने मूंह में अंगूठा डालकर हमारी तरफ देख रहा था।  उसके चेहरे पर छायी मासूमियत ने अभिभूत किया तो हमने उससे कहा-‘‘क्या वोट डालना है?’’

     अंगूठा मूंह में ही डाले उसने अपना ना में सिर हिला दिया।  हमने कहा‘‘यह देखने आये हो कि मतदान प्रारंभ हुआ है या नहीं।’’

उसने ना में सिर हिलाया।

     थोड़ी देर वह अपने दादाजी के साथ आया तो हमने उसे देखकर कहा‘अच्छा, तो दादाजी को साथ लाना था इसलिये ही पहले से जांच करने आये थे।’’

     उसके वृद्ध दादाजी बोले-‘‘हां, यहां से आने के बाद बार बार कह रहा है कि चलो वोट डालो।  बैठने ही नहंी दे रहा था।’’

     पांच छह साल की बच्ची दादी के साथ आयी। उसकी मासूमियत ने हमें आकर्षित् किया।  उसके एक आगे भी एक अन्य मतदाता थी।  हम दरवाजे पर रखी कुर्सी पर ही बैठे थे और बच्ची एकटक घूर रही थी तो हमने उससे कहा-‘‘गुड़िया तुम अपनी दादी के साथ आयी हो या दादी तुम्हारे साथ आयी है। दोनों में से कौन वोट डालेगा?’’

     उसने मासूमियत से दादी की तरफ उंगली उठा दी। उसकी दादी बोली-‘‘सुबह से ही कह रही है कि दादी मुझे वोट डालने ले चलो। कोई काम ही नहीं करने दे रही थी।’’

     सात आठ साल का एक बच्चा लाल रंग की शर्ट और नेकर पहनकर दनादनाता हुआ अपने दादा के आगे चलता हुआ मतदान केंद्र में आ गया।  उसकी मासूमियत देखकर हमने उससे कहा-‘‘क्या दादाजी के बॉडीगार्ड बनकर साथ आये हो?

     लड़के ने दोनों हाथों से अपनी आंखें ढंक ली। उसको संकोच करते देख हमने कहा-‘‘तुम्हारी ड्रेस देखकर यही लग रहा है कि दादाजी की रक्षा के लिये उनके साथ चल रहे हो।’’

     उसके दादाजी बोले-‘‘हां, यह खेत वगैरह में भी मेरे साथ ही चलता है।  शहर जाऊं तो भी साथ चलने की जिद करता है।’’

     एक बीस साल का युवक आया। गांव का होने के बावजूद वह जींस तथा टीशर्ट पहने था।  वह पढ़ा लिखा ही लग रहा था पर जब मतदान अधिकारी के पास वह हस्ताक्षर करने पहुंचा तो बोला-‘‘ मैं अंगूठा लगाऊंगा।’’

     उसका स्वर तल्ख था। हमने उसकी जींस की जेब में रखी पेन देखी थी। हमने हसंते हुए कहा-‘‘अरे भई, आप जैसे स्मार्ट ंयुवक के लिये यह अंगूठा लगाने वाली बात जमती नहीं है। आप तो पेन लेकर हस्ताक्षर करो तो कम से कम हमें इस बात का अफसोस न हो कि स्मॉर्ट लोग भी अंगूठा लगाते हैं।’’

     उसके रूखे चेहरे पर हंसी आ ही गयी और उसने मतदान अधिकारी से पेन लेकर रजिस्टर परदस्तखत कर दिये।

     मतदान समाप्त होने के बाद जब हम अपनी वापसी के लिये वाहन की प्रतीक्षा कर रहे थे तब गांव के वही चेहरे खड़े थे जिनके साथ हमारा मतदान के दौरान संपर्क हुआ था।  उसी लड़के ने अपने गांव का हैंडपंप सुधरवाने के लिये आवेदन लिखवाने का आग्रह किया।  हमारे एक मतदान अधिकारी ने उसे बोलकर लिखवाया। हमने उसकी हस्तलिपि देखकर कहा-‘‘भई  तुम्हारा हस्तलेखन तो इतना सुंदर है फिर क्यों अंगूठा लगाने पर अड़े थे?’’

     वह मुस्कराकर चुप हो गया। उसके दादाजी बोले-‘‘यह ऐसा ही करता है। अपनी पढ़ाई का इससे अहंकार आ गया है।’’

     हमने कहा-‘‘नहीं, यह इसका आत्मविश्वास है कि वह अपना सुंदर हस्तलेखन किसी को दिखाना नहीं चाहता।’’

     जब वहां से चलने को हुए तो वह लड़का बोला-‘‘सर, आपका स्वभाव बहुत अच्छा है।’’

     उसे मालुम नहीं था कि हम सूक्ष्म प्रेक्षक के रूप में वहां आये थे जिनकी नियुक्ति उन मतदान केंद्रों पर होती है जो संवेदनशील माने जाते हैं।  ऐसे केंद्रों पर पहले हुए चुनावों के दौरान हिंसा या गड़बड़ की शिकायत हो चुकी होती है। मूलतः गावों के लोग सीधे सादे और सच्चे  होते हैं पर उनमें कुछ ऐसे भी होते हैं जो सीदे होने के बावजूद अपने को नायक साबित करने के लिये कुछ ऐसी हरकतें इन चुनावों करते हैं जिनसे उनकी दबंग छवि का प्रचार हो।  उनकी गतिविधियों से गांव ही बदनाम हो जाता है।  हमारा स्वाभाविक व्यवहार वहां चालाकी की तरह अपना काम कर मतदान को बोझिल होने से बचाने के साथ ही शांतिपूर्ण चलाने के लिये सहायक हो रहा था।

     आमतौर से वहां किया गया हमारा वार्तालाप हमारी दिनचर्चा का हिस्सा है पर हमने इस तरह का व्यवहार मतदान की प्रक्रिया में सहजता बनाये रखने के लिये किया था। महत्वपूर्ण बात यह कि घर से निकलने और पहुंचने के बीच ज्वलंत राजनीतिक विषय पर किसी से चर्चा नहीं हो पायी। वजह साफ है कि उस समय केवल चुनाव कराने हैं यह सोच हावी थी।  सामग्री लेने और जमा करने के समय अनेक मित्रों से भेंट हुई पर सभी केवल अपने मतदान केंद्र की  चुनावी प्रक्रिया की चर्चा कर रहे थे।  इस तनाव में स्मरणशक्ति इतनी क्षीण हो गयी थी कि घर पर याद आया कि हमारे देश में राजनीतिक दलों के नेता और उनके चुनाव चिन्ह भी होते हैं।

 

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

 

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तनाव होने पर भी संयम रखने वाले यशस्वी होते हैं-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख


                        सांसरिक जीवन में उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं। हम जब पैदल मार्ग पर चलते हैं तब कहीं सड़क अत्यंत सपाट होती है तो कहीं गड्ढे होते हैं। कहीं घास आती है तो कहंी पत्थर पांव के लिये संकट पैदा करते हैं।  हमारा जीवन भी इस तरह का है। अगर अपने प्राचीन ग्रंथों का हम निरंतर अभ्यास करते रहें तो मानसिक रूप से परिपक्वता आती है। इस संसार में सदैव कोई विषय अपने अनुकूल नहीं होता। इतना अवश्य है कि हम अगर अध्यात्मिक रूप से दृढ़ हैं तो उन विषयों के प्रतिकूल होने पर सहजता से अपने अनुकूल बना सकते हैं या फिर ऐसा होने तक हम अपने प्रयास जारी रख सकते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि प्रकृति के अनुसार हर काम के पूरे होने का एक निश्चित समय होता है।  अज्ञानी मनुष्य उतावले रहते हैं और वह अपने काम को अपने अनुकूल समय पर पूरा करने के लिये तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठानो के चक्कर पड़ जाते हैं।  यही कारण है कि हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के पाखंडी सिद्ध बन गये हैं। ऐसे कथित सिद्धों की संगत मनुष्य को डरपोक तथा लालची बना देती है जो कथित दैवीय प्रकोप के भय से ग्रसित रहते हैं।  इतना ही नहीं इन तांत्रिकों के चक्कर में आदमी इतना अज्ञानी हो जाता है कि वह तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठान को अपना स्वाभाविक कर्म मानकर करता है।  उसके अंदर धर्म और अधर्म की पहचान ही नहीं रहती।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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अपां प्रवाहो गांङ्गो वा समुद्रं प्राप्य तद्रसः।

भवत्यपेयस्तद्विद्वान्न्श्रयेदशुभात्कम्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-गंगाजल जब समुद्र में मिलता है तो वह पीने योग्य नहीं रह जाता। ज्ञानी को चाहिये कि वह अशुभ लक्षणों वाले लोगों का आश्रय न ले अन्यथा उसकी स्थिति भी समुद्र में मिले गंगाजल की तरह हो जायेगी।

किल्श्यन्नाप हि मेघावी शुद्ध जीवनमाचरेत्।

तेनेह श्लाध्यतामेति लोकेश्चयश्चन हीयते।।

                        हिन्दी में भावार्थ-बुद्धिमान को चाहे क्लेश में भी रहे पर अपना जीवन शुद्ध रखे इससे उसकी प्रशंसा होती है। लोकों में अपयश नहीं होता।

                        हमारे देश में अनेक ज्ञानी अपनी दुकान लगाये बैठे हैं। यह ज्ञानी चुटकुलों और कहानियों के सहारे भीड़ जुटाकर कमाई करते हैं। इतना ही नहीं उस धन से न केवल अपने लिये राजमहलनुमा आश्रम बनाते हैं बल्कि दूसरों को अपने काम स्वयं करने की सलाह देने वाले ये गुरु अपने यहां सारे कामों के लिये कर्मचारी भी रखते हैं।  एक तरह से वह धर्म के नाम पर कपंनियां चलाते हैं यह अलग बात है कि उन्हें धर्म की आड़ में अनेक प्रकार की कर रियायत मिलती है।  मूल बात यह है कि हमें अध्यात्मिक ज्ञान के लिये स्वयं पर ही निर्भर होना चाहिये। दूसरी बात यह भी है कि ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण भी करना चाहिये।  यही बुद्धिमानी की निशानी है। बुद्धिमान व्यक्ति तनाव का समय होने पर भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता।  यही कारण है कि बुरा समय निकल जाने के बाद वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।  लोग उसके पराक्रम, प्रयास तथा प्रतिबद्धता देखकर उसकी प्रशंसा करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

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विज्ञान की तरक्की- हिंदी व्यंग्य कविता


इंसान भेजता रहता है चांद पर अंतरिक्ष यान,

आंकाश के रहस्य की तलाश में है

मगर अपनी धरती के स्वभाव से हो गया है अनजान।

कहें दीपक बापू संसार में विज्ञान की तरक्की बुरी नहीं है

मगर दुःखदायी है बिना इंसानियत के ज्ञान,

पत्थर और लोहे का सामान रंग से चमकता है

आंखों देखती है तो दिल धमकता है,

फिर भी लगता है कहीं खालीपन

क्योंकि होती नहीं अपनी जान की पहचान

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
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सफाई का वादा-हिंदी व्यंग्य कविताएँ


टुकड़ों टुकड़ों में बंटा है समाज,हर इंसान अपनं मतलब के लिये बन जाता बाज़,

छिपा रहा है हर कोई अपने बुरे कारनामो के  राज,

फिर भी मानते हैं सभी

कोई फरिश्ता आसमान से उतरकर आयेगा,

जहान में एकता कायम कर पायेगा।

कहें दीपक बापू मन का वहम है

या खुद को ही धोखा खा देना

यह सोचना कि सर्वशक्तिमान

इंसानों में किसी को अपने जैसा बनायेगा।

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सड़क और उद्यान साफ रहे सभी चाहते हैं,
गंदगी कोई न फैलाये इसके लिये कोई तैयार नहीं है,
गुलाब के फूलों के सभी प्रशंसक हैं,
मगर कांटो जैसा उनका कोई यार नहीं है।
कहें दीपक बापू हम नहीं कर सकते
किसी से सफाई का वादा,
कहीं गंदगी फैलाने का भी नहीं रहता इरादा,
अपनी नाव के खेवनहार खुद ही बने लोग
किसी के सहारे जिंदगी में कोई होता पार नहीं है।
———
लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

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नारे लगाने वाले बहादुर-छोटी हिन्दी व्यंग्य कवितायें


किसको बढ़ती महंगाई की फिक्र है,

सभी की जुबान पर अपनी कामयाबी का जिक्र है,

जहान की परेशानियों से कुछ लोग बहुत  हैरान है।

कहें दीपक बापू दर्द झेलने वाले

कहीं अपने इलाज की भीख मंागने नहीं जाते

 फिर भी हमदर्दी के सौदागर बेचते अपनी चिंता

 जेब में रखते इनाम

चेहरा ऐसा दिखाते जैसे जहान के गम से वह परेशान है।

————–

न पेड़ लगते न पत्ते लहराते

फिर भी कागजों पर ढेर सारे गुलाब खिल जाते हैं,

यहां कोई फरिश्ता नहीं दिखता

फिर भी नारे लगाने वाले बहादुरों के पीछे

बहुत सारे लोगों के दिल जाते हैं।

कहें दीपक बापू यहां जुबानी जंग लड़ने के

अच्छे दाम लेकर अक्लमंद संभालते मैदान

 कोई मसला नहीं सुलझता यहां

चर्चा यह कि शब्दों से सिंहासन हिल जाते हैं।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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हमदर्दी के व्यापारी-हिन्दी व्यंग्य कविता


जहान की चिंत्ताओं का बोझ ढोते दिखते हैं शब्दों के व्यापारी,

बाज़ार में कोई शय नहीं बेचने के लिये वादों से करते छवि भारी,

एक चेहरा बदनामी से पुराना हुआ  फिर नया कोई आ जाता है,

भलाई की दुकान का हक कोई जन्म से कोई कर्म से पाता है,

चतुरों ने  अंग्रेजी सेे सभी को भरमाया फिर हिन्दी से भी कमाया,

लगने लगा जब फैशन पुराना अब हिंग्लिश को जरिया बनाया,

उड़ते हैं आसमान में ज़मीन पर रैंगने वालों के बनते वफादार,

नारे लगाने से  जल्दी पा जाते तख्त फिर बन जाते दागदार,

कहें दीपक बापू  अपने जख्मों का इलाज खुद ही करना सीखो

निभाने आयेंगे बहुत सारे हमदर्द दवा पर होगी उनकी नीयत सारी

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होली पर्व 2014 के अवसर पर हास्य कविता-दिल की सफाई


घर पर आया फंदेबाज और बोला

‘‘दीपक बापू इस बार देश में

बढ़ गयी है बहुत महंगाई,

गरीब तो टूटा है

मध्यम वर्ग वाला भी हो गया गरीब

हमें रंग न खेलकर

समाज सेवा का व्रत लेना है

यही सोच मेरे मन में आई,

आप तो फ्लाप कवि हो

पिटती हैं आपकी अंतर्जाल पर कविता

इसलिये कुछ नया करो

समाज सेवा के लिये बनाओ संस्था

करो आमजन की भलाई।’’

सुनकर हंसे और बोले दीपक बापू

‘‘लगता है होली का मजाक करने आये हो,

हमारे फ्लाप होने का सच

हमारे सामने धरने आये हो,

हमारी पुरानी टोपी

फटी धोती

और पैबंद लगा कुर्ता देखकर

तुम्हें परेशानी होती है,

की नहीं कभी कविता से कमाई

यह देखकर तुम्हारी नीयत पानी पानी होती है,

तुम जानते हो अच्छी तरह

नये ज़माने में समाज सेवा भी

एक तरह से हो गयी धंधा,

लाचारों के नाम पर सजाओ दुकान

कभी हवाई जहाज में करो दौरा

कभी कार में करो खरीददारी

बांट सको तो ठीक

नही हैं अपने काम में लाओ चंदा,

पहले प्रचार में प्रसिद्धि,

फिर उसके नकदीकरण में दिखाओ अपनी सिद्धि,

हमसे यह नहीं हो पायेगा,

पराये धन पर मजे करना हमें ही सतायेगा,

वैसे भी होली हम क्या मनायेंगे,

हालातों कर दिये सभी रंग लगते हैं फीके

किसी पर क्या लगायेंगे,

करेंगे कुछ चिंत्तन

कुछ रचेंगे हास्य कवितायें

देश की तो नहीं कर सकते

अपनी हृदय की ही करेंगे सफाई।

————

 

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

 

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शतरंज और लोकतंत्र-हिन्दी व्यंग्य कविता


कुर्सी के खेल में शहादत भी कभी रंग लाती है,

ज़माने की हमदर्दी बादशाहत भी संग लाती है,

सियासत की चाल शतरंज के खेल जैसी होती,

घोड़ा चले ढाई कदम बादशाह की ताकत ऐसी नहीं होती,

सीधे चलता पैदल वार तिरछा कर वजीर बन जाये,

मात दे बादशाह को तो बाजी एक नज़ीर बन जाये,

ऊंट की तिरछी तो हाथी की सीधी चाल करती हैरान,

हुकुमत का खेल पसंद करते फरिश्ते हों या शैतान,

कहें दीपक बापू बेबस और बेजान राजा बुत जैसा है

उसकी किस्मत की कुंजी मुहरों की चालों में फंसी होती।

—————–

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

 

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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अध्यात्मिक ज्ञान होने पर होली का आनंद अधिक होता है-होली पर्व 2014 के अवसर पर विशेष हिन्दी लेख


      यह हैरानी की बात है कि जिस होली को रंगों का त्यौहार माना जाता है उससे ही अनेक लोग अधिक उत्साह से मनाने की बजाय घर में एकांतवास करते हैं। दरअसल होली पर्व मनाते समय  ऐसी विकृत्तियां तथा भ्रांतियां समाज में  फैलीं कि अनेक लोग धर्मभीरु होने के बावजूद इसे नापसंद करने लगे।  ऐसे अनेक लोग मिल जायेंगे जो होली के दिन स्वयं पर कर्फ्यु लगा देते हैं।  जिन मार्गों पर भीड़ होती है वहां केवल हुडंदगी ही विचरते मिलते हैं या फिर शहर के प्रहरी उन पर नियंत्रण करने के लिये गश्त करते दिखते हैं।  होली के अवसर पर पुलिस वालों को छुट्टी नहीं मिलती क्योंकि प्रशासन इस अवसर पर हुड़दंग के उपद्रव में बदल जाने को लेकर आशंकित रहता है। इतना ही नहीं भारतीय धर्म विचाराधारा के मानने वालों में ही अनेक लोग यह मानते हैं कि होली खेलना अब देह के लिये परेशानी का कारण बन जाता है। रंग और गुलाल मे डला कैमिकल आंखों के लिये हानिकारक है।

      एक समय था जब होली पर दूसरे को अपमानित करने का अवसर माने जाना लगा था।  जबरन चंदा मांगा जाता था। राह चलते हुए राहगीर के पीछे भोंपू बजाकर आतंकित किया जाता था तो अनेक के कंधे पर रखा गमछा या टोपी को कांटे से उठाकर टांग कर चंदा मांगा जाता था।  राह चलते हुए हुड़दंगी गंदी नाली में आदमी को फैंक देते थे।  धीरे धीरे पूरे देश में प्रशासनिक अमला सक्रिय हुआ और ऐसी घटनायें कम होती गयीं।  अब तो बाकायदा पुलिस के जवान भारी पैमाने पर चौराहों पर तैनाते होते हैं।  गश्त करते हैं। फिर समय के साथ शिक्षा का प्रभाव बढ़ा तो इस तरह की घटिया हरकतें कम होती गयीं। इधर संचार माध्यमों ने भी नये रूप लिये तो होली इस मामले में सुखद बनी कि अगर आप घर से बाहर न जाना चाहें तो ढेर सारे चैनल आपको बोर होने से बचाते हैं। इसके बावजूद जिन लोगों के मन में पुरानी स्मृतियां हैं वह होली की औपचारिकता भर निभाते हैं।

      हम ऐसे ही लोगों मे रहे हैं जिनके लिये होली का पर्व ऐसे आंनद का अवसर है जिसमें अध्यात्मिक ज्ञान का प्रभाव है। होलिका अपने भतीजे प्रहलाद को जलाने के प्रयास में स्वयं जल गयी। उसके भाई हिरण्यकश्यप ने अपने ही बेटे प्रहलाद को परमात्मा की भक्ति से रोकने के लिये अनेक प्रयास किये। अंततः अपनी बहिन को सौंपा कि वह भतीजे को जला दे। वह प्रहलाद को जलाने के लिये चली और स्वयं जल गयी। इसी घटना से संदेश सीखने के लिये होलिका दहन किया जाता है। बाद में हिरण्यकश्यप ने अपने उसी बेटे प्रहलाद को एक खंबे से बांध दिया तथा तलवार से मारने के लिये उद्यत हुआ उसी समय  भगवान ने नरसिहरूप में अवतरित होकर प्रहलाद को बचाया तथा हिरण्यकश्यप का वध किया। हिरण्यकश्यप ने उनको याद दिलाया किमुझे तो यह वरदान प्राप्त है कि मैं किसी अस्त्र शस्त्र से नहीं मरूंगा, न दिन को मरूंगा न रात को, न घर के अंदर मरूंगा न बाहर, न मुझे मनुष्य मारेगा न पशु, न जमीन पर मरूंगा न आकाश में तब आप मुझे कैसे मारेंगे?’

      कथा में बताया जाता है कि हिरण्यकश्यम ने यह सवाल उस समय किया जब नरसिंह भगवान ने उसे उठाकर अपनी गोद में वध के लिये जकड़ लिया था।  तक उन्होंने मारने पहले उतर भी दियादेख, न दिल है न रात बल्कि इस समय शाम है, जहां तू है वह महल का अहाता है न तू अंदर है न बाहर है, मेरा चेहरा देख न मैं इंसान हूं न पशु और देख मेरे यह नाखून न यह अस्त्र है न शस्त्र! न तू इस समय जमीन पर है न आकाश में वरन् इस समय तू मेरी जांघों पर है इसलिये तेरा वरदान तुझे को मेरे से नहीं बचा सकता।

      इस कथा से मनोरंजन तो होंता ही है साथ ही इसमें अध्यात्मिक संदेश भी निहित है। इस ंसंसार में शक्तिशाली मनुष्य हमेशा ही यह मानता है कि वह कोई भी तर्क गढ़ सकता है उसका विरोध कोई नहीं कर सकता। ऐसा होता भी है पर जब वह विपरीत समय का शिकार होता है तब उन्हें सच्चाई का पता चलता है। हमारे देश के लोग ऐसी कथाओं से मनोरंजन तो ग्रहण करते हैं पर अध्यात्मिक संदेश से परे हो जाते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि हमारी धार्मिक परंपरा में परमात्मा के अनेक साकार रूप माने गये हैं जिनकी अपनी इच्छा अनुसार हर कोई आराधना करता है। किसी एक आराध्य देव का न होना यहां इस मायने में अच्छा है कि एकरसता का भाव नहीं आता वहीं अनेक होने से यह परेशानी होती है कि सभी लोग अपने ही स्वरूप को श्रेष्ठ बताकर आपस में वाद विवाद करते हैं। भक्ति में अहंकार का स्थान नहीं है पर अपने ही स्वरूप को श्रेष्ठ बताना इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान का अभाव है।  सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे यहां गुरु को भगवान से भी बड़ा माना गया है क्योंकि वह सशरीर ज्ञान देता है पर इसका लाभ उन लोगों ने उठाया जिन्होंने अलग अलग से अपने पंथ स्थापित किये और स्वयंभू भगवान बन गये।  यह गुरु अध्यात्मिक ज्ञान तो देते हैं पर पहचान इनकी चमत्कारों से बनती है। सांसरिक विषयों के कार्य समय आने पर स्वयं होते हैं पर यह गुरु उसका श्रेय स्वयं ले जाते हैं। परमात्मा के स्वरूपों पर इतना विवाद नहीं होता जितना इन पंथों के गुरुओं की वजह होता है। एक पंथ का शिष्य अपने गुरु तो दूसरा अपने की प्रशंसा करता है। यह प्रशंसा विवाद खड़े करती है। जिस तरह हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रहलाद के भक्ति भाव पर प्रहार कर रहा था वह अनैतिक था।  यह बात समझ लेना चाहिये कि किसी की भक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करने की बजाय अपना अंतर्मन देखना चाहिये कि हम कितने सच्चे हैं।

      कहने का अभिप्राय यह है कि होली पर बाहरी रंगों में सराबोर होना ठीक है पर अपने अंदर जो भक्ति का रस है उसके रंग की  पहचान करना चाहिये। इसकी पहचान अध्यात्मिक ज्ञान से ही  हो सकती है। पहले तो भाषा ज्ञान न होने से आम आदमी को गुरु की आवश्यकता होती थी पर अब तो शिक्षा ने अपना बृहद रूप ले लिया है इसलिये  ग्रंथों को गुरु मानकर उनका अध्ययन करना चाहिये। भौतिक उपलिब्धयां इस संसार में सभी को मिलती हैं-किसी को कम किसी को ज्यादा।  मुख्य बात यह है कि सुख का रस कौन कितना पीता है या किसके हृदय का रंग अधिक आकर्षक है, यह देखना चाहिये यह उसके जीवन का अध्ययन कर ही सीखा जा सकता है। ज्ञान प्राप्त कर हृदय में ऐसी रंगीन होली खेली जा सकती है जो बाहर दुर्लभ है।

      बहरहाल इस होली के अवसर पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकों को बधाई।  सभी के लिये प्रगतिमय वातवरण बने ऐसी शुभकामनाये।

दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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रहीम दर्शन पर आधारित हिन्दी चिंत्तन लेख-समाज का दोहन करने वाले वर्तमान धनपति आत्ममंथन करें


      हमारे देश में अगले दो महीनों में लोकसभा चुनाव 2014 संपन्न करने की तैयारी चल रही है। चुनावी राजनीति ने समय के साथ अनेक रूप बदले हैं। वैसे देखा जाये तो राजनीति एक व्यापक अर्थ वाला है जिसे हम राजसी प्रवृत्तियों से संपन्न कर सकते हैं।  चुनाव लड़कर पद पर जाना ही केवल राजनीति नहीं होती वरन् जीवन के समस्त अर्थ कम ही राजनीति के मंत्रों से ही संपन्न किये जाते हैं। यह अलग बात है कि हमारे वर्तमान पेशेवर बुद्धिजीवी इसे केवल चुनावी राजनीति से ही जोड़कर देखते हैं।  वास्तविकता यह है कि चुनावी राजनीति, उद्योग, व्यवसाय, तथा कोई भी अन्य कार्य फल की प्राप्ति के लिये जो बाह्य दृष्टि से  किया जाता है उसे ही राजसी कर्म कहा जाता है। जब हम राजसी पुरुष की बात करें तो उसमें चुनावी राजनेता ही नहीं वरन् उद्योगपति, अध्यात्म से इतर विषयों के साहित्यकार, कलाकार, व्यवसायी, चिकित्सक, इंजीनियर और पत्रकार सभी शामिल है। जहां तक सामूहिक सांसरिक हित की बात हो तो समाज सात्विक लोगों की बजाय राजसी पुरुष से ही अपेक्षा करता है कि वह उसको संबल प्रदान करेंगे।  यही कारण है कि हमारे अध्यात्मिक दर्शन में उन राजसी पुरुषों को सम्मान देने की बात करता है जो अपना दायित्व निभाते हैं।

      वर्तमान समय में हर क्षेत्र में सक्रिय राजसी पुरुषों की छवि अब उतनी आकर्षक नहीं रही जितनी कभी रहा करती थी। इसका कारण यह है कि समाज की अपेक्षा पर अधिकांश राजसी पुरुष खरे नहीं उतर पाये हैं।  हम सभी पर आक्षेप नहीं कर सकते कि वह बुरे हैं क्योंकि अगर ऐसा होता तो हमारा समाज अभी तक ध्वस्त हो गया होता। हालांकि यह भी सच है कि अगर सहृदय राजसी पुरुषों की संख्या अधिक होती तो यह समाज ऐसी दुर्दशा में नहीं आता जैसा कि हम देख रहे हैं। देखा यह गया है कि समाज के सभी क्षेत्रों में जो शिखर पर पहुंचें हैं वह आम इंसान को भेड़ समझते हैं जिसकी भीड़ लगाकर वह आत्मप्रचार कर अपना ही हित साधते हैं। यही कारण है कि उनके प्रति समाज में न केवल असंतोष का भाव है वरन् अनेक निराश लोग तो उनके प्रति वैमनस्य का भाव भी पालने लगे हैं।

कविवर रहीम कहते हैं कि

————-

तासों ही कछु पाइए, कीजै जाकी आस।

रीते सरवर पर गए, कैसे बुझै पियास।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-सूखी तालाब पर जाने से प्यास शांत नहीं होती। उसी व्यक्ति से ही कुछ प्राप्त किया जा सकता है जो दूसरों की आशाओं पर खरा उतरता है।

      आर्थिक उदारीकरण ने राजकीय क्षेत्र का दायरा संकुचित किया है तो निजी क्षेत्र के विस्तार ने चंद धनपतियों की शक्ति इतनी बढ़ा दी है कि समाज की सभी आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, प्रचार, कला तथा खेल पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं पर उनका नियंत्रण हो गया है।  जैसा कि सभी जानते हैं कि धन का मद सबसे अधिक विषाक्त होता है और धनपतियों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह अकारण किसी के साथ आर्थिक गठबंधन नहीं करते। उनको अपनी चाटुकारिता तथा प्रशंसा पसंद होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह किसी कलाकार, खिलाड़ी, समाज सेवक, तथा पत्रकार की सहायता केवल इसलिये नहीं कर सकते कि वह योग्य है वरन् उनका दृष्टिकोण यह रहता है कि वह हमारा स्वयं का हित कितना साध सकता है?

      हमें यह किसी पर आक्षेप नहीं करना पर इतना अवश्य कहना चाहते हैं कि हमारे इस प्रकार के राजसी पुरुषों अपने अधीन रहने वाले प्रचार माध्यमों पर अपनी छवि भले ही देवता जैसी बनायें पर समाज उनका हृदय से सम्मान नहीं करता। आत्ममुग्ध होकर अपने स्वार्थ में लगे राजसी पुरुष भले ही आत्ममुग्ध होकर रहे पर सच यही है कि जब तक कोई किसी का स्वार्थ सिद्ध नहीं करता उसकी प्रशंसा नहीं हो सकती। यह बात सभी प्रकार के राजसी पुरुष समझ लें।

 

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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loksabha election 2014 of india,loksabha chunav 2014,parliamein election 2014 in india,bharate mein loksabha chunav, 

प्रायोजित नाटक खबर-हिंदी व्यंग्य कविता


नाटक बनते  खबर  या खबर ही नाटक बनती कह नहीं सकते,

पर्दे के नायक दिल देकर बने या बिल लेकर कह नहीं सकते,

कहें दीपक बापू बाज़ार के सौदागरों की मुट्ठी में पूरा जहान है,

कोई दाम देकर  तो कोई दगा देकर खबरों में बना महान है,

पर्दे पर खेल चल रहा है या फिल्म अंदाज लगाना कठिन है,

 खबर जैसी लिखी पटकथा पर करते अभिनेता अभिनय

खिलाड़ी खेलते मगर पहले से तय जीत या हार का दिन है,

हर कोई पैमाना नाप रहा दूसरे की असलियत का

अपने ढोल की  पोल छिपाने में सभी माहिर हैं,

किसी ने मासूम तो किसी ने रोबदार मुखौटा लगाया

डरते हवा के झौंके से उनके कमजोर दिल सब जगह जाहिर है,

न दुनियां अब रंगीन रही न कुछ यहां अजीब लगता है

लोगों के अंदाज कितने सच कितने बनावटी है कह नहीं सकते।

……………………………

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

महंगाई और भलाई-हिंदी व्यंग्य कविता


आम इंसान की सांसों को थाम रही बढ़ती महंगाई,

विकास के स्वर्णिम रथ से बंट रही  गरीब को भलाई।

कहें दीपक बापू सबसे आसान है दिन में देखना सपने,

साकार करना कठिन हो तो लगें भगवान नाम जपने।

रिश्तों की डोर कभी टूटती नहीं यह सच बात है,

मगर मेहमानों की महंगी पड़ ही जाती एक रात है।

जेब में पैसा हो तो आशिक पर इश्क का भूत चढ़ता है,

खाली जेब से होता जब नाकाम दोष माशुका पर मढ़ता है।

दिमाग में सामान खरीदने की सूची बहुत लंबी बसी है,

मुश्किल है कुछ लोगों के हाथ दुनियां की हर शय फसी है।

परिवार और समाज टूटे अब खतरा इंसानी जज्बात पर आ रहा है,

दौलत बसी कुछ घरों में बाहर बेबस आदमी नाखुश गुर्रा रहा है।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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