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इसका नाम ही क्रिकेट है-हिन्दी व्यंग्य लेख


उफ! यह क्रिकेट है! इस समय क्रिकेट खेल को देखकर जो विवाद चल रहा है उसे देखते हुए दिल में बस यही बात आती है कि ‘उफ! यह क्रिकेट है!
इस खेल को देखते हुए अपनी जिंदगी के 25 साल बर्बाद कर दिये-शायद कुछ कम होंगे क्योंकि इसमें फिक्सिंग के आरोप समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपने के बाद मन खट्टा हो गया था पर फिर भी कभी कभार देखते थे। इधर जब चार वर्ष पूर्व इंटरनेट का कनेक्शन लगाया तो फिर इससे छूटकारा पा लिया।
2006 के प्रारंभ में जब बीसीसीआई की टीम-तब तक हम इसे भारत की राष्ट्रीय टीम जैसा दर्जा देते हुए राष्ट्रप्रेम े जज्बे के साथ जुड़े रहते थे-विश्व कप खेलने जा रही थी तो सबसे पहला व्यंग्य इसी पर देव फोंट में लिखकर ब्लाग पर प्रकाशित किया था अलबता यूनिकोड में होने के कारण लोग उसे नहीं पढ़ नहीं पाये। शीर्षक उसका था ‘क्रिकेट में सब कुछ चलता है यार!’
टीम की हालत देखकर नहंी लग रहा था कि वह जीत पायेगी पर वह तो बंग्लादेश से भी हारकर लीग मैच से ही बाहर आ गयी। भारत के प्रचार माध्यम पूरी प्रतियोगिता में कमाने की तैयारी कर चुके थे पर उन पर पानी फिर गया। हालत यह हो गयी कि उसकी टीम के खिलाड़ियों द्वारा अभिनीत विज्ञापन दिखना ही बंद हो गये। जिन तीन खिलाड़ियों को महान माना जाता था वह खलनायक बन गये। उसी साल बीस ओवरीय विश्व कप में भारतीय टीम को नंबर एक बनवाया गया-अब जो हालत दिखते हैं उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है क्योंकि क्रिकेट के सबसे अधिक ग्राहक (प्रेमी कहना मजाक लगता है) भारत में ही हैं और यहां बाजार बचाने के लिये यही किया गया होगा। उस टीम में तीनों कथित महान खिलाड़ी नहीं थे पर वह बाजार के विज्ञापनों के नायक तो वही थे। एक बड़ी जीत मिल गयी आम लोग भूल गये। कहा जाता है कि आम लोगों की याद्दाश्त कम होती है और क्रिकेट कंपनी के प्रबंधकों ने इसका लाभ उठाया और अपने तीन कथित नायकों को वापसी दिलवाई। इनमें दो तो सन्यास ले गये पर वह अब उस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में खेलते हैं। अब पता चला है कि यह प्रतियोगिता तो ‘समाज सेवा’ के लिये आयोजित की जाती है। शुद्ध रूप से मनोरंजन कर पैसा बटोरने के धंधा और समाज सेवा वह भी क्रिकेट खेल में! हैरानी होती है यह सब देखकर!
आज इस बात का पछतावा होता है कि जितना समय क्रिकेट खेलने में बिताया उससे तो अच्छा था कि लिखने पढ़ने में लगाते। अब तो हालत यह है कि कोई भी क्रिकेट मैच नहीं देखते। इस विषय पर देशप्रेम जैसी हमारे मन में भी नहीं आती। हम मूर्खों की तरह क्रिकेट देखकर देशप्रेम जोड़े रहे और आज क्रिकेट की संस्थायें हमें समझा रही हैं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। यह अलग बात है कि टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाओं जब भारत का किसी दूसरे देश से मैच होता है तो इस बात का प्रयास करते हैं कि लोगों के अंदर देशप्रेम जागे पर सच यह है कि पुराने क्रिकेट प्रेमी अब इससे दूर हो चुके हैं। क्रिकेट कंपनियों की इसकी परवाह नहीं है वह अब क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की आड़ में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव के दर्शक ढूंढ रहे हैं। इसलिये अनेक जगह मुफ्त टिकटें तथा अन्य इनाम देने के नाम कुछ छिटपुट प्रतियोगितायें होने की बातें भी सामने आ रही है। बहुत कम लोग इस बात को समझ पायेंगे कि इसमें जितनी बड़ी राशि का खेल है वह कई अन्य खेलों का जन्म दाता है जिसमें राष्टप्रेम की जगह राष्ट्रनिरपेक्ष भाव उत्पन्न करना भी शामिल है।
कभी कभी हंसी आती है यह देखकर कि जिस क्रिकेट को खेल की तरह देखा वह खेलेत्तर गतिविधियों की वजह से सामने आ रहा है। यह क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में ऊपर क्या चल रहा है यह तो सभी देख रहे हैं पर जिस तरह आज के युवा राष्ट्रनिरपेक्ष भाव से इसे देख रहे हैं वह चिंता की बात है। दूसरी बात जो सबसे बड़ी परेशान करने वाली है वह यह कि इन मैचों पर सट्टे लगने के समाचार भी आते हैं और इस खेल में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव पैदा करने वाले प्रचार माध्यम यही बताने से भी नहीं चूकते कि इसमें फिक्सिंग की संभावना है। सब होता रहे पर दाव लगाने वाले युवकों को बर्बाद होने से बचना चाहिेए। इसे मनोंरजन की तरह देखें पर दाव कतई न लगायें। राष्ट्रप्र्रेम न दिखायें तो राष्ट्रनिरपेक्ष भी न रहे। हम तो अब भी यही दोहराते हैं कि ‘क्रिकेट में सब चलता है यार।’

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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क्रिकेट मैच में रीटेक-हास्य व्यंग्य


वह अभिनेता अब क्रिकेट टीम का प्रबंधक बन गया था। उसकी टीम में एक मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी भी था जो अपनी बल्लेबाजी के लिये प्रसिद्ध था। वह एक मैच में एक छक्के की सहायता से छह रन बनाकर दूसरा छक्का लगाने के चक्कर में सीमारेखा पर कैच आउट हो गया। अभिनेता ने उससे कहा-‘ क्या जरूरत थी छक्का मारने की?’
उस खिलाड़ी ने रुंआसे होकर कहा-‘पिछले ओवर में मैने छक्का लगाकर ही अपना स्कोर शुरु किया था।
अभिनेता ने कहा-‘पर मैंने तुम्हें केवल एक छक्का मारकर छह रन बनाने के लिये टीम में नहीं लिया है।’
दूसरे मैच में वह क्रिकेट खिलाड़ी दस रन बनाकर एक गेंद को रक्षात्मक रूप से खेलते हुए बोल्ड आउट हो गया। वह पैवेलियन लौटा तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या मैंने तुम्हें गेंद के सामने बल्ला रखने के लिये अपनी टीम में लिया था। वह भी तुम्हें रखना नहीं आता और गेंद जाकर विकेटों में लग गयी।’
तीसरे मैच में वह खिलाड़ी 15 रन बनाकर रनआउठ हो गया तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या यार, तुम्हें दौड़ना भी नहीं आता। वैसे तुम्हें मैंने दौड़कर रन बनाने के लिये टीम में नहीं रखा बल्कि छक्के और चैके मारकर लोगों का मनोरंजन करने के लिये टीम में रखा है।’
अगले मैच में वह खिलाड़ी बीस रन बनाकर विकेटकीपर द्वारा पीछे से गेंद मारने के कारण आउट (स्टंप आउट) हो गया। तब अभिनेता ने कहा-‘यार, तुम्हारा काम जम नहीं रहा। न गेंद बल्ले पर लगती है और न विकेट में फिर भी तुम आउट हो जाते हो। भई अगर बल्ला गेंद से नहीं लगेगा तो काम चलेगा कैसे?’
उस खिलाड़ी ने दुःखी होकर कहा-‘सर, मैं बहुत कोशिश करता हूं कि अपनी टीम के लिये रन बनाऊं।’
अभिनेता ने अपना रुतवा दिखाते हुए कहा-‘कोशिश! यह किस चिड़िया का नाम है? अरे, भई हमने तो बस कामयाबी का मतलब ही जाना है। देखो फिल्मों में मेरा कितना नाम है और यहां हो कि तुम मेरा डुबो रहे हो। मेरी हर फिल्म हिट हुई क्योंकि मैंने कोशिश नहीं की बल्कि दिल लगाकर काम किया।’
उस क्रिकेट खिलाड़ी के मूंह से निकल गया-‘सर, फिल्म में तो किसी भी दृश्य के सही फिल्मांकन न होने पर रीटेक होता है। यहां हमारे पास रीटेक की कोई सुविधा नहीं होती।’
अभिनेता एक दम चिल्ला पड़ा-‘आउठ! तुम आउट हो जाओ। रीटेक तो यहां भी होगा अगले मैच में तुम्हारे नंबर पर कोई दूसरा होगा। नंबर वही खिलाड़ी दूसरा! हुआ न रीटेक। वाह! क्या आइडिया दिया! धन्यवाद! अब यहां से पधारो।’
वह खिलाड़ी वहां से चला गया। सचिव ने अभिनेता से कहा-‘आपने उसे क्यों निकाला? हो सकता है वह फिर फार्म में आ जाता।’
अभिनेता ने अपने संवाद को फिल्मी ढंग से बोलते हुए कहा-‘उसे सौ बार आउट होना था पर उसकी परवाह नहीं थी। वह जीरो रन भी बनाता तो कोई बात नहीं थी पर उसने अपने संवाद से मेरे को ही आउट कर दिया। मेरे दृश्यों के फिल्मांकन में सबसे अधिक रीटेक होते हैं पर मेरे डाइरेक्टर की हिम्मत नहीं होती कि मुझसे कह सकें पर वह मुझे अपनी असलियत याद दिला रहा था। नहीं! यह मैं नहीं सकता था! वह अगर टीम में रहता तो मेरे अंदर मेरी असलियत का रीटेक बार बार होता। इसलिये उसे चलता करना पड़ा।’
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

आखिर क्रिकेट किसका खेल होने वाला है


आखिर यह क्रिकेट खेल किसका होने जा रहा है। आज भी खिलाडियों की बोली लगी जिसमें विदेशी भी शामिल थे। क्या यह खेल है या उसका व्यवसाय? मुझे इन ख़बरों में दिलचस्पी केवल इसलिए है क्योंकि क्रिकेट का मैं शौकीन रहा हूँ। कौन खिलाड़ी कितने में बिका और किसने खरीदा यह उनका निजी व्यवसायिक मामला है पर आखिर यह लोगों के जजबातों के दोहन पर ही होने वाला है।

जजबातों के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। अभी तक यही हो रहा है कि अगर मध्यप्रदेश की टीम किसी दूसरे प्रदेश के विरुद्ध खेल रही हो तो अपने प्रदेश के जीतने की कामना करता हूँ और अगर देश की टीम किसी दूसरे के खिलाफ खेल रही हो तो सारे देशवासियों के साथ मैं भी अपने देश के जीतने की कामना करता हूँ।यह सब स्वाभाविक है पर अब जिस तरह टीमें बन रही हैं उनमें विदेशी खिलाडियों को भी शामिल कर रहे हैं क्या हमारे देश के दर्शक उसे स्वीकार कर लेंगे? अभी तक देश और प्रदेश की टीम की साथ सहानुभूति इसलिए होती थी क्योंकि उसमें सब अपने लोग थे। जहाँ तक मेरा विचार है लोगों के मन में १९८३ में विश्व कप में क्रिकेट जीतने के बाद रुझान बढ़ा था क्योंकि अपने देश की टीम और उसके सदस्य भी देश के ही थे और जजबात स्वाभाविक रूप से बहना ही थे। आखिर विदेशी खिलाडियों के साथ वैसे जजबात कैसे जुड़ सकते हैं? क्या यह मान लिया गया है कि लोगों में इस तरह के कोई जजबात होते ही नहीं उन्हें तो केवल खेल देखने और गाने सुनने से मतलब है।

हालांकि जो टीमें बनीं है उसमें हमारे प्रदेश के क्या स्थिति है हमें नहीं मालुम पर जिस तरह खबरें देख रहा हूँ मुझे नहीं लगता कि हमारे जजबातों को जगाने वाली कोई टीम हो। कभी कभी सोचता हूँ कि क्या मेरा इस खेल से कोई वास्ता नहीं है क्योंकि यह तो कोई और बात हो रही है या कोई अलग तरह का क्रिकेट है। फिर सोचता हूँ कि खिलाड़ी तो वही हैं जिन्हें मैं रोज देखता हूँ। आखिर क्रिकेट के नाम पर भला कौनसा नया तमाशा होने वाला है? सबसे बड़ी चिंता है कि इस व्यवासायिक क्रिकेट ने कहीं वर्तमान स्वरूप पर विपरीत प्रभाव डाला तो फिर आम लोग इसमें दिलचस्पी लेना काम कर देंगे। मैंने अपने एक लेख में कपिल देव के लिए लिखा था कि उन्हें लोगों के जजबातों का दोहन करने के लिए सभी देशों की अलग टीमें बनवाकर प्रतियोगिता कराना चाहिऐ तभी लोग उसने जुडेंगे पर वह चन्द विदेशी खिलाडियों को बुलाकर रह गए और उनका शो जनचर्चा का विषय नहीं बन पाया जिससे वह आगे नहीं जा सके। अब तो भारतीय टीम में नये चेहरे लाकर कपिल देव की संस्था के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती पेश कर दी गयी है। वह समय था जब भारतीय टीम के पुराने खिलाडियों से ऊबे लोग कपिल देव की तरफ किसी नये करिश्में की उम्मीद कर रहे थे।

अब देखना यह है कि आगे किस तरह यह तमाशा शुरू होगा। आखिर यह क्रिकेट किसका खेल होने वाला है यह समय ही बताएगा। टीमों की स्थिति को देखकर तो नहीं लगता कि लोगों का झुकाव कोई अधिक होगा। फिर यह आखिर किसके लिए हो रहा है।

कौन जीता कौन हारा-आलेख


हरभजन सिंह को मैच की पचास फीसदी कमीशन काटने के सजा देकर बरी कर दिया गया है और देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे कि कोई कारूँ का खजाना देश के हाथ लग गया है. उनको यह सजा अपशब्द कहने पर दी गयी है. जिस नस्लवाद के आरोप से उनको बरी किया गया है वह वैसे भी भारतीयों पर फिट नहीं बैठता क्योंकि यह गोरों का मुल्क नहीं है-बल्कि इसका पूरा विश्व ही उपहास की दृष्टि से देख रहा था.

अब सवाल यह है कि आस्ट्रेलिया के उस होग को क्यों माफ़ किया गया जिस पर भारतीय खिलाडियों ने गाली देने का आरोप लगाया था? उसे भारतीयों ने क्यों माफ़ किया? क्या उसे सजा दिलवाना जरूरी नहीं था? क्या यह सन्देश विश्व में नहीं गया कि गोरों को गाली देने का अधिकार है पर भारतीयों को नहीं?

बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता की बात और लोगों के गले उतर जाये पर अपने तो नहीं उतरी. कहीं ऐसा तो नहीं नस्लवाद के कथित आरोप को भयानक मानकर यह मान लिया गया कि इससे तो गाली की सजा ही हरभजन सिंह दिलवाकर बरी करवाया जाये. होग ने जो गलियाँ दी थी क्या वह इसलिए इतनी हल्की थी क्योंकि पश्चिम में वह नस्लवाद से कम मानी जातीं है. हरभजन सिंह ने बन्दर शब्द का प्रयोग किया था इसे पश्चिम में नस्लवाद माना जाता है भारत में नहीं. होग ने जो गालिया दीं होंगी उन्हें भारत में बहुत गंभीर माना जाता है. अगर यहाँ आप किसी के लिए बन्दर लिख दें तो वह हंसकर चुप हो जायेगा और कोई गाली दें तो पलटकर जवाव देगा. मतलब यह है कि इस मामले में तो हमें गोरे ही एक बार विजेता नजर आ रहे हैं.

अब इस देश का कुछ हाल ऐसा ही है कि आस्कर अवार्ड में भारत की फिल्म पीटकर आती है तो भी उसे हाथोहाथ उठा लिया जाता है. कुछ ऐसा ही ऐसा लग रहा है.

क्रिकेट और गंभीर अफरातफरी


आखिर वहाँ हुआ क्या होगा? लोग भूल गए पर उन्हें फिर याद दिलाया गया कि झगडे करने वाले खिलाडी ने माफ़ी मांग ली है। सवाल यह है की क्या वाकई झगडा हुआ होगा या फिर यह कोई नही परंपरा क्रिकेट में शुरू हुई है जैसे हिन्दी फिल्मों के हीरो हीरोइन अपनी फिल्म हिट करने के लिए ”अफैयर’ का प्रचार मीडिया में कराते हैं, और अब क्रिकेट के खिलाड़ी भी मैदान में कुछ ऐसी हरकतें करते हैं जो कि दर्शकों को नागवार गुजरें और अखबारों और टीवी पर सुर्खियाँ बने। जिस तरह फिल्म के रिलीज होने के कुछ समय बाद हीरो-हीरोइन अपने अफैयर का खंडन करते हैं या किसी दूसरे से अफैयर का प्रचार करते हैं, वैसे ही खिलाड़ी भी मैच या सीरिज ख़त्म होते ही सारी तोहमत मीडिया पर जड़ देते हैं। फर्क यह है कि फिल्मी कलाकारों के साथ किसी देश के जजबात जुडे नहीं होते इसलिए वह अपने आप को भलेमानस साबित करने के लिए माफ़ी-वाफी जैसे चक्कर में नहीं पड़ते जबकि खिलाडियों को अपने देश के मान-सम्मान के साथ अपने छबि और आई.सी.सी.आई के डंडे का भय भी होता है सो कभी सफाई कभी माफ़ी से काम चलाना होता है।

अपने कप्तान ने कहा-‘अगर ऐसा नहीं होता तो आप लोगों को मजा कैसे आता है। शांति से क्रिकेट हो तो भी मजा नहीं आता।’ अगर अपने देश का कप्तान ऐसा कहे तो कोई टेंशन नहीं होना चाहिए पर फिर उसने मागी क्यों मांगी? अब सवाल आता है कि आखिर उस दिन हुआ क्या जो कि टीवी और अखबारों में वह वाद-विवाद सुर्खियों में आ गया।
ज़रा दिमाग में जोर डाला। मैंने पहले अखबार में पढा था कि जब बिना आवाज वाली फिल्में बनतीं थीं तब कलाकार शुटिंग में वह डायलाग नहीं बोलते थे जो वास्तव में लिख कर फिल्म पर आते थे, बल्कि आपस में हँसी मजाक करते हुए शुटिंग करते थे क्योंकि दर्शकों के सामने तो वह आता तो था नहीं । यह रिवाज कुछ समय तक सवाक फिल्मों में भी चला क्योंकि आवाज की रिकार्डिंग बाद में होती थी। अब उस दिन क्या हुआ होगा, इस पर विचार करते हैं।

बल्लेबाज गेंद को पुश करने के बाद दूसरे सिरे पर जाना चाहता था गेंदबाज ने अपने कुहनी अडा दी। बल्लेबाज रुक गया और बोला होगा-”क्या कर रहे हो यार?”
गेंदबाज ने कहा होगा-”यार, तुम्हारे यहाँ के कुछ मीडिया वाले कह रहे हैं कि सब कुछ शांति से चल रहा है, कुछ गर्मी लाओ। अच्छा अब तुम अपने चेहरे पर गुस्से के भाव लाओ ताकि टीवी पर लोगों को लगे कि बहुत झगडा हो रहा है।”
बल्लेबाज बोला होगा-” तुम तो हो अफरातफरी वाले। सब चल जायेगा। मैं हूँ बहुत गंभीर। यार तुम क्यों मेरी इमेज खराब करना चाहते हो। तुम्हें कोई और नहीं मिला। अरे इस काम के लिए इतने सारे युवाओं का राजा हैं। धुनाई करने वाला हैं। इस रोल में वह दोनों फिट बैठते, कहाँ मुझे कामेडी रोल में घसीट रहे हो।”
गेंदबाज ने कहा होगा-”अरे सब तरह के रोल करना सीखो। तुम्हारे यहाँ लाफ्टर शो होते हैं और उसके लिए नये क्रिकेट खिलाड़ी की जरूरत पड़ेगी। तुम्हारे यहाँ एक सिद्ध बाबा टाईप क्रिकेटर हैं न!यही कर छाया हुआ है कि नहीं।”

तब तक अंपायर आया होगा-”तुम, लोग धन्धेबाजी की बात यहीं करोगे या खेलोगे भी। चलो तुम्हारा यह मिलन समारोह हो गया और टीवी पर सब आ गया, अब खेलो।”
उधर से गेंदबाज का कप्तान भी आया और उसने बोला होगा-”यह तुम लोगों ने क्या गंभीर अफरातफरी मचा रखी है। यार, पोल खुल जायेगी। चलो खेलो।”

उधर टीवी और अखबार वाले इस गंभीर अफरातफरी पर अपने समाचार दे रहे थे।लोग सोच रहे थे’ आखिर हुआ क्या’। तमाम तरह के चर्चे थे सब तरफ । बिचारे गभीर खिलाडी से ऐसी अफरातफरी। वह गेंदबाज है ही ऐसा। उधर गेंदबाज के साथी उससे लड़ रहे थे। तुमने गलत खिलाडी चुना इस रोल के लिए। इसलिए तुम्हारा अफरातफरी वाला शो फ्लॉप हो गया।

गेंदबाज सोच में पड़ गया होगा। शाम को पार्टी में मिले। बल्लेबाज से गेंदबाज ने कहा होगा-”यार, वैरी सोरी। मैं तुमसे माफ़ी मांगता हूँ।”
बल्लेबाज बोला होगा-”यार देखो यहाँ कोई शो मत करना।”
गेंदबाज ने कहा होगा-”नहीं, पहले तुम मुझे माफ़ करो।’
‘बल्लेबाज ने पीछा छुडाने की गरज से कहा होगा-”किया! किया!अब मैं चलूँ।”
शुक्रिया-”गेंदबाज खुश होकर जाने लगा होगा और फिर रुक गया होगा-‘पर यह बताओ, मैंने किया क्या था?”
बल्लेबाज ने कहा होगा-”पहले यह याद करो कि किसने करवाया था। यार, मेरा पीछा छोडो। मैं बहुत गंभीर आदमी हो तुम अफरातफरी करने वाले। मुझे तो याद नहीं आ रहा कि किस वजह से तुम्हें माफी दे रहा हूँ। पर तुम ही याद कर लो कि माफी क्यों मांग रहे हो।”

बल्लेबाज चला गया तो गेंदबाज भी सोच में पड़ गया कि आखिर ऐसी कौनसी गंभीर अफरातफरी हुई थी।

नोट-यह व्यंग्य काल्पनिक है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है और अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो यह संयोग होगा।

गुरु-चेला और क्रिकेट


गुरु चेले जंगल से निकल कर शहर के मुख्य बाजार में आये, तो देखा सब जगह लोग मूर्तियों की तरह खडे थे. बाजार में सब दुकानों के बाहर लोग खडे थे और टीवी की तरफ घूर कर देख रहे थे.

गुरु ने चेले से पूछा-”यह क्या बात है लोग क्या कर रहे हैं.”
चेले ने कहा-”गुरु जी, सब क्रिकेट मैच देख रहे हैं.
गुरु जी ने कहा-”पिछली बार आये तो यह बीमारी कम थी, क्या फिर यह वाइरस फ़ैल गया. जाओ पता करो. देखते हैं कि कुछ इसका इलाज हो सकता है. मैं तब तक यहाँ पेड़ के नीचे बैठकर आराम करता हूँ.
‘कौनसा पेड़ गुरूजी-‘चेले ने पूछा
गुरूजी ने इधर-उधर देखा-‘यहाँ एक पेड़ था न! मैं उसके नीचे आकर बैठता था. लगता है काट दिया. चलो वह दुकान बंद है वहीं बैठकर आराम करता हूँ तब तक तुम पीछे वाली लाइन से जल्दी चाय ले आओ.’

चेला चला गया और गुरूजी वहीं विराजमान हो गए. थोडी देर बार चेला लौट आया और बोला-”गुरूजी चाय वाला बोला इस समय मैच चल रहा है और अपने बल्लेबाज धुआंधार खेल रहे हैं, थोडी देर बाद आना.”

गुरूजी-”पिछली बार तो कह रहा था की क्रिकेट मैच नहीं देखूंगा. फिर उसने देखना शुरू कर दिया.”

चेला-”गुरूजी!ट्वंटी-ट्वंटी विश्व कप में टीम जीतकर आ गयी है इसलिए उसने दोबारा देखना शुरू कर दिया है.”
गुरूजी-”ठीक है! थोडी देर बाद चले जाना. वह चाय अच्छी बनता है इसलिए उसके नखरे झेल लेते हैं.
थोडी देर बाद चेला लौट आया और बोला-”चाय वाले का मूड खराब हो गया. अपने खिलाडी की सेंचुरी नहीं हो पायी. कहा रहा है की मूड खराब हो गया घर जा रहा हूँ.”
गुरूजी बोले-”ठीक है. अब फिर यह वाइरस फ़ैल गया और मुझे पहले ही लग रहा था कि यह बीमारी फिर फैलेगी. फिफ्टी-फिफ्टी गयी तो ट्वंटी-ट्वंटी फ़ैली और साथ में फिफ्टी-फिफ्टी भी लाई. चलो कहीं और चलते हैं.”

क्रिकेट में संयत व्यवहार रखना आवश्यक


भारत और आस्ट्रेलिया की बीच हाल ही में संपन्न श्रंखला में आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी साइमंड पर भारतीय दर्शकों द्वारा नस्लभेदी टिप्पणियों और श्रीसंत के व्यवहार की बहुत चर्चा रही है. वैसे देखा जाये तो इन दोनों मामलों में कोई दम नहीं है क्योंकि इस मामले में आस्ट्रेलिया के खिलाडी अधिक बदनाम रहे हैं. मैदान के बाहर भले ही वह अन्य देशों के खिलाडियों से मित्रवत व्यवहार करते हैं पर मैदान पर उनके बुर व्यवहार की सभी देशों के खिलाड़ी करते हैं और कई बार उन्हें सचिन, सौरभ और द्रविड़ जैसे खिलाडियों के साथ बदतमीजी करते देखा गया है. उनके क्षेत्र रक्षकों द्वारा बल्लेबाजों का ध्यान भंग किया जाता ताकि वह अपनी एकाग्रता खो बैठे और उसमें वह सफल भी रहते हैं.

अब पोंटिंग अगर भारतीय खिलाडियों के व्यवहार से क्षुब्ध होकर यह कह रहे हैं कि मैच रेफरी या आई सी सी आई ऐसे मामलों का नोटिस क्यों नहीं ले रही तो उन्हें यह बताना जरूरी है कि ऐसे मामलों में इन सबकी दया दृष्टि उनके देश पर ही रही है. अगर कुछ नये भारतीय खिलाड़ी उनके साथ ऐसे व्यवहार कर रहे हैं तो इसके लिए वह और उनकी टीम ही जिम्मेदार है जो कई सालों से विश्व विजेता है और उनसे नये खिलाडी प्रेरणा लेते हैं. मतलब ऐसे मामलों में वह उनके गुरु हैं और यह उनके चेले गुरु दक्षिणा में वही व्यवहार लौटा रहे हैं. प्रतिपक्षी बल्लेबाज पर फबती कसने के मामले में ऐसा कोई देश नही है जिसके खिलाड़ी अनौपचारिक रूप से आस्ट्रेलिया की शिकायत न करते हों . पोंटिंग ने भी अभी अखबार वालों के सामने ही कहा है पर उसकी शिकायत नहीं की है. पाकिस्तानी और श्रीलंकाई खिलाडियों से तो उनके झगडे तक नौबत आ जाती हैपर पुराने भारतीय खिलाड़ी उन्हें झेलते रहे पर नये भारतीय खिलाड़ी उन्हें अब पलट कर जवाब देने लगे हैं तो बुरा लग रहा है.

वैसे भारतीय खिलाडियों को अपना व्यवहार सौम्य रखना चाहिए क्योंकि इस तरह बुरा व्यवहार करने से उन पर भी तनाव आयेगा और उनके खेल पर ही बुरा असर पडेगा. अगर आस्ट्रेलिया के खिलाडी को टिप्पणी करते हैं तो उसकी लिखित शिकायत करें पर स्वयं कोई ऐसा व्यवहार न करें जिससे उनका और देश का नाम खराब हो. आस्ट्रेलिया वाले इतने सालों से यही कर रहे हैं भारत के महान खिलाडियों ने उनको अपने खेल से ही जवाब दिया है. यह क्रिकेट खेल है इसमें हार जीत तो चलती रहेगी पर व्यवहार से अगर छबि एक बार खराब होती है तो फिर नहीं बनती और भारतीय खिलाडियों की छबि व्यवहार के मामले में उज्जवल है. जहाँ तक सायमंड्स पर दर्शकों द्वारा नस्लभेदी टिप्पणियों का सवाल है तो इतने सारे दर्शकों में कुछ शरारती तत्व हो सकते हैं जो देश का नाम बदनाम करना चाहते है पर अधिकतर दर्शक तो ऐसा करने की सोच भी नही सकते. वैसे भी क्रिकेट को भद्रजनों का खेल कहा जाता है और मैदान पर खिलाडियों और दर्शकों के संयत व्यहार करना चाहिए

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