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सुनो सबकी करो मन की


जिनके पास नही कोई ज्ञान
वही पा रहे ज्ञानी का सम्मान
वैद, पुराण और शास्त्र जिन्होंने कभी
समझना तो दूर पढे भी न होंगे
लोगों में करते उनका बखान

कभी सुनकर हैरानी होती है कि
क्या वह सब लिखा है ग्रंथों में
जो सुनते उनका ज्ञान
या कुछ हमसे ही पढने में छूट गया
या चूक गया हमारा ध्यान
कभी कभी तो शक होता है कि
हम कोई और ग्रंथ पढे थे
या तथाकथित ज्ञानियों ने
तथ्य अपने मन से गढे थे
कहीं हम तो नहीं भूल जाते
अपने ही दर्शन का ज्ञान

कहैं दीपक बापू
अपने ही हाथ हैं जिस तरह जगन्नाथ
वैसे ही हमारी बुद्धि है हमारे साथ
किसी के सुने पर इतनी आसान से
यकीन नहीं करते
जब तक जब तक उसकी पुष्टि ना कर लें
खुद ही पढ़कर ग्रंथ करते हैं
प्राप्त करते हैं ज्ञान
कह गए बडे-बुजुर्ग सुनो सबकी
करो वही जो मन रहा है मान
—————-

यह पब्लिक है, सब जानती है


हीरो को जन्म दिन हो तो
सारे चैनल भौंपू हो जाते
बस उसकी आरती सुनाये जाते
चालीस पार हो चुके हों
और बिकती हो खबर बाजार में
तो उसे जवान बताते
और चालीस पार आम आदमी को
स्वस्थ रहने के लिए
गोलियों के ब्रांड
बाल काले रखने के लिए
अनेक तेलों के नाम सुझाते

कहैं दीपक बापू कब तक
जनता को चलाओगे
अधेडावस्था के लोगों को कब तक
नवयोवनाओं की आँखों में बसाओगे
दावा करते हो देश में जागरूकता लाने का
फैलाते हो भ्रम
सच बोलने में आती है शर्म
खुलने लगे हैं कर्म
यह जनता सब जानती है
तुम्हारे सच के पीछे झूठ को जानती है
इसलिए तुम नाम बदलते हो
चेहरे वही पुराने सामने लाते
खबर के नाम पर गाने परोसते
जज्बात के नाम पर हीरो के अलावा
और लोग तुम्हें नहीं सुहाते
पर याद रखना यह पब्लिक है
लोग तुमसे नहीं चलते
वही तुम्हें चलाते
—————————–

चाणक्य नीति:निर्धन के लिए सभाएँ विष समान


१.प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि अलग-अलग होती है, एक ही शरीर जी तीन ढंग से देखते हैं. योगी इसे नश्वर रूप में, भोगी इसे काम वासना के रूप में और सुनार मोम के घडे के रूप रूप में देखता है.

२.दुष्ट और काँटों को दबाने के दो ही उपाय है. पहला उपाय है जूता और दूसरा उपेक्षा अर्थात बगल से बिना देखे निकला जाये.

३.अच्छी और बुरी वस्तु दोनों की अति बुरी होती है. अच्छी बाते और गुण भी कभी विपत्ति का कारण बन जाते हैं. रजा बलि को अत्यादिक दानशीलता के कारण बन्धन में बंधना पडा और अत्यधिक अंहकार के कारण रावण का वध हुआ.

४.निर्धन व्यक्ति के लिए किसी प्रकार की सभाएं विष समान होती हैं. गोष्ठियों में तो धनवान व्यक्ति ही जा सकते हैं. यदि भूल से कोई निर्धन व्यक्ति ऐसे सभा स्थलों में चला भी जाये तो उसकी मूर्खता होगी क्योंकि वहाँ उसे अपमानित होकर ही निकलना पड़ता है.

hasya kavita-दिल और दोस्ती


हमें पूछा था अपने दिल को
बहलाने के लिए किसी जगह का पता
उन्होने बाजार का रास्ता बता दिया
जहां बिकती है दिल की खुशी
दौलत के सिक्कों से
जहाँ पहुंचे तो सौदगरों ने
मोलभाव में उलझा दिया
अगर बाजार में मिलती दिल की खुशी
और दिमाग का चैन
तो इस दुनिया में रहता
हर आदमी क्यों इतना बैचैन
हम घर पहुंचे और सांस ली
आँखें बंद की और सिर तकिये पर रखा
जिस चैन को ढूंढते थक गए थे
आखिर उसने ही उसका पता दिया
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दोस्ती निभाने के वादे
किये नही जाते
निभाए जाते हैं।
जुबान से कहने के
मौक़े आते हैं हर दिन
निभाने के कभी कभी आते हैं।
देखा रोज यह कहने वालों की
भीड़ लगी रहती है कि कोइ
मुसीबत में हमें याद कर लेना
घिरता हूँ जब चारों और से
वही दोस्त सबसे पहले छोड़ जाते हैं
जो हर पल निभाने की कसमें
सबसे ज्यादा खाते हैंदोस्ती निभाने के वा दे
किये नही जाते
निभाए जाते हैं।
जुबान से कहने के
मौक़े आते हैं हर दिन
निभाने के कभी कभी आते हैं।
देखा रोज यह कहने वालों की
भीड़ लगी रहती है कि कोइ
मुसीबत में हमें याद कर लेना
घिरता हूँ जब चारों और से
वही दोस्त सबसे पहले छोड़ जाते हैं
जो हर पल निभाने की कसमें
सबसे ज्यादा खाते हैं
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कोई भी जब मेरे पास
वादों का पुलिंदा लेकर आता है
मैं समझ जाता हूँ
आज मी लुटने का दिन है
पहले सलाम करते हैं
फिर पूछते हैं हालचाल
फिर याद दिलाते हैं
पुरानी दोस्ती का इतिहास
मैं इन्तजार करता हूँ
उनकी फरमाइश सुनने का
वह सुनाते हैं शब्द चुन चुन कर
दावा यह कि केवल तुम अपने हो
इसीलिये कह रहा हूँ
मैं समझ जाता हूँ
आज एक दोस्त अपने से
सबंध ख़त्म होने का दिन है
________________

कार और साईकिल की टक्कर-लघु कहानी laghu katha


वह साइकिल पर अपने एक तरफ गैस का छोटा सिलेंडर बाँध कर जा रहा था. उसके आगे भी हैंडल पर जो समान टंगा था उससे साफ लग रहा था की वह कोई गैस आदि को साफ करने और उनकी मरम्मत करने का काम करता होगा. एक जगह ट्रैफिक जाम था और संभाल कर चलते रहने के बाद भी उसके सिलेंडर का हिस्सा जाम में फंसी कार से टकरा गया. उसे पछतावा हुआ पर यह उसके चेहरे पर आयी शिकन से लग रहा था.

कार के अन्दर से चूड़ीदार पायजामा और सफ़ेद कुरता पहने एक आदमी निकला उसने अपनी कार देखी और उसपर लगे खरोंच के निशान दिखे तो उसे गुस्सा आगया. और उसने साइकिल वाले को पास बुलाया, उसके पास आते ही उसने उसकी गाल पर जोर से थप्पड़ जड़ दिया. उस गरीब की आंखों में पानी भर आया, और अपने गाल पर हाथ रखता हुआ वहाँ से चला गया.

एक सज्जन जो इस घटनाक्रम को देख रहे थे उस साइकिल वाले के पास गए और बोले-‘चलो, पुलिस में रिपोर्ट लिखाओ. उसको अदालत में घसीट कर दिखाएँगे कि किस तरह थप्पड़ मारा जाता है.’

उस साइकिल वाले ने लगभग रोते हुए कहा-.बाबूजी, जाने दीजिये. हम गरीबों की इज्जत क्या है? यह लोग तो ऐसे ही हैं. इन जैसे लोगों के बाप अंधे होकर अंधी कमाई कर रहे हैं और इनसे में गरीब कहाँ तक मुकाबला करूंगा?”

वह चला गया और वह सज्जन उसे जाते देखते रहे . एक दूसरा साइकिल वाला सज्जन भी उनके पास आया और बोला-‘वह सही कह रहा था. इनका कोई क्या कर सकता है.

उन सज्जन ने कहा-‘भाई, हकीकत तो यह है कि इस तरह तो गरीब का सड़क पर चलना मुशिकल हो जायेगा. अगर यह कार वाला मारकर उसे उडा जाता तो कुछ नहीं और उसकी साइकिल से थोडी खरोंच लग गई तो उसने उसे थप्पड़ मारा. इस तरह तो गरीब जब तक लड़ेगा नहीं तो जिंदा नही रह पाएगा.’

वह कार वाला दूर खडा था. दूसरा साइकिल वाला बोला-‘साहब वह गरीब आदमी कहाँ भटकता? आप मदद करते तो आपको भी परेशानी होती. हम तो गरीब लोग हैं, मैं साइकिल पर फल बेचता हूँ पर दिन भर अपमान को झेलता रहता हूँ. हम लोगों को आदत है, यह सब देखने की.’

उन सज्जन ने आसमान की तरफ देखा और गर्दन हिलाते हुए लंबी साँसे लेते हुए कहा -‘लोग समझते नहीं है को जो गरीब काम कर रहे हैं, वह अमीरों पर अहसान करते हैं क्योंकि वह कोई अपराध नहीं करते. शायद यही कारण है कि आजकल कोई छोटा काम करने की बजाय अपराध करना पसंद करते हैं. जो इस हालत में भी छोटा काम कर रहे हैं उन्हें तो सलाम करना चाहिऐ न कि इस तरह अपमानित करना चाहिए. जब तक अमीर लोग गरीब का सम्मान नहीं करेंगे तब तक इस देश में अपराध कम नहीं हो सकता.

वह सज्जन वहाँ से निराशा और हताशा में अपनी गर्दन हिलाते हुए चले गए, पीछे से दूसरा साइकिल वाला उनको जाते हुए पीछे से खडे होकर देखता रहा.

दिल हुआ इधर से उधर-हास्य कविता


अंतरजाल पर एक दूसरे के ब्लोग पर
कमेन्ट लिखते-लिखते
दोनों के दिल मिल गए अपने आप
दोनों युवा थे और कविता लिखने के शौकीन भी
होना था मिलन कभी न कभी
प्रेमी ब्लोगर एक असली नाम से तो
चार छद्म नाम से कमेन्ट लगाता
और प्रेमिका के ब्लोग को हिट कराता
अपना लिखना भूल गया
उसके ब्लोग पर कमेन्ट लगाता
और खुश होता अपने ही आप

एक दिन प्रेमिका ने भेजा सन्देश
‘ कुछ और रचनाएं भी लिखा करो
वरना ब्लोग जगत में बदनाम हो जाओगे
‘केवल कमेन्ट दागने वाला ब्लोगर’कहलाओगे
इससे होगा मुझे भारी संताप

प्रेमिका का आग्रह शिरोधार्य कर
वह लिखने में जुट गया
हो गया मशहूर सब जगह
कमेन्ट लिखने का व्यवहार उसका छूट गया
एक प्रतिद्वंदी ब्लोगर को आया ताव
उसके हिट होने और अपने फ्लॉप होने का
उसके दिल में था घाव
बदला लेने को था बेताब
उसने उसकी प्रेमिका के ब्लोग पर
लगाना शुरू किया कमेन्ट
एक अपने और आठ छद्म नाम से
उसके ब्लोग को हिट कराता
अपनी बेतुकी कवितायेँ करने लगा
उसको हर बार भेंट
प्रेमिका का दिल भी गया पलट
दूसरे में गया दिल गया भटक
पहले ब्लोगर को कमेन्ट देने का
उसका सिलसिला बंद हुआ अपने आप

उधर पहले ब्लोगर ने उसको जब अपने
ब्लोग पर बहुत दिन तक नही देखा
तब उसके ब्लोग का दरवाजा खटखटाया
दूसरे ब्लोगर के कमेन्ट को देखकर
उसे सब समझ में आया
मन में हुआ भारी संताप
उसने भेजा प्रेमिका को सन्देश
‘यह क्या कर रही हो
मुझे लिखने में उलझाकर
तुम कमेन्ट में उलझ रही हो
सच्चे और झूठे प्रेम को तुम
अंतर नही समाज रही
धोखा खाओगी अपने आप’

प्रेमिका ने भेजा सन्देश
‘तुम्हारी रचना से तो उसकी कमेन्ट अच्छी
तुम्हारी रचना दर्द बाँटती हैं
उसकी कवितायेँ दुख के बादल छांटती हैं
अब तो मेरा उस पर ही दिल आ गया
तुम अपना दिल कहीं और लगाना
मत देना अपने को विरह का संताप
सब ठीक हो जायेगा अपने आप

नोट- यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है.

हास्य कविता-बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा


बीस के शेर
पचास में ढ़ेर
जीतते हैं तो फुलाते सीना
हारें तो कहें’समय का फेर’
समझाया था क्यों करते हो
पचास का आयोजन
जब है बीस का भोजन
क्रिकेट कोई दाल होता तो
पानी मिलाकर चला लेते
कुछ खा लेते तो
बाकी भूखे रह जाते माला फेर
बीस ओवर के खेल पर
बहुत खुश हुए थे कि
दुनिया में जीते अपने शेर
पचास ओवर के खेल में
कंगारुओं की फुर्ती से हुए ढ़ेर

कहैं दीपक बापू
लोग पूछ रहें हैं
‘वह मधुर सपना था या
खडा है सामने यह कटु सत्य’
दिन भर पूछने लगे हैं फिर स्कोर
चर्चा करते हैं क्रिकेट की
सांझ हो या भोर
चौबीस साल पुरानी कहानी
फिर सामने आ रही है
जब विश्व विजेता हुए थे
इसी तरह ढ़ेर
अब इस कहानी पर
अगले चौबीस महीने तक भी
नहीं चलेगा खेल
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती
छोटी जीत पर बड़ी हर नहीं फबती
बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा
कितना भी नया हो बीस का ही रहेगा
पोल खुल जायेगी देर-सबेर

चाणक्य नीति:विवशता में करते हैं भक्ति का नाटक


    1.भंवर जब तक कमल दल के बीच रहता है तो उसके फूल का मजा लेता है पर अगर उसे वहां से दूर तौरिया का फूल भी उसे बहुत आनन्द देता. इसी कारण मनुष्य को भूखे रहने की बजाय कुछ खा लेना चाहिए. अगर अपनी मनपसंद का भोजन नहीं मिले तो जो मिले उसे खा लेना चाहिए-भूखा रहना ठीक नहीं है.

    2. जब कोई शक्तिहीन साधू, धनहीन ब्रह्मचारी और रोगी किसी देवता का भक्त बनता है तो उसे ढोंगी कहा जा सकता है. वास्तविकता यह है कि बलवान कभी साधू, धनवान कभी ब्रह्मचारी नहीं बनता. सब लोग विवशता के कारण नाटक करते हैं और कुछ नहीं.

    3. अगर आदमी का स्वयं का मन ठीक है तो उसे भक्ति का पाखंड करने की जरूरत नहीं पड़ती! लोभी को दूसरे के दोषों से क्या? चुगली और परनिन्दा करने वाले को दूसरे के पापों से सत्यवादी को तपस्या से हृदय की स्वच्छता वाले को तीर्थ यात्रा से, सज्जन को दूसरे के गुणों से क्या वास्ता? अगर अपना प्रभाव है तो भूषन से, विधा है तो धन से और अगर अपयश है तो मृत्यु से क्या लाभ?

    4.मनुष्य की चार चीजों की भूख कभी नहीं बुझती. धन, जीवन स्त्री और भोजन. इसके लिए वह हमेशा लालायित रहता है.

विवाद से बचने के लिए व्यंजना विधा में लिखें


हिंदी भाषा में लिखने की तीय विधाएं हैं-शाब्दिक, लाक्षणिक और्र्र व्यंजना. इसमें सबसे बेहतर विधा व्यंजना मानी जाती है और पंचतंत्र की कहानिया इसका सबसे बड़ा अच्छा उदाहरण है. जो लोग व्यंजना विधा के ज्ञाता नहीं है तो यही कहेंगे कि उसमें तो मनुष्यों की कहानिया न होकर पशुओं की हैं. उन्हें पहली बट तो यह समझना चाहिए कि पशु कहानिया नहीं पढते दूसरे कि हमारे दर्शन के अनुसार समस्त जीवों में मूल गुण और स्वभाव एक ही जैसे होते हैं. काम,क्रोध, भोजन ग्रहण, निद्रा और बिमारी आदि सभी में होती है, पर मनुष्य में बुद्धि के साथ और विवेक भी होता है. आदमी जिस तरह प्रसन्न और अप्रसन्न होता है वैसे ही पशु भी होते हैं. पंचतंत्र की कहानिया मनुष्यों को जीवन का स्वरूप समझाने के लिक्ये ही लिखीं गईँ है.

शाब्दिक विधा में हम जिस व्यक्ति के बारे में लिख रहे हैं उसके बारे में सीधा लिख देते हैं. लाक्षणिक में हम उस व्यक्ति के लक्षणों को इंगित करने वाला पात्र गढ़ लेते हैं, और व्यंजना में हम उसके लिए कोई प्रतीक गढ़ते हैं. जैसे कोई पशु, खंबा, ट्यूब लाईट या कोई वाहन आदि. और उस पर लिखते ऐसे है कि पढने वाले को लगे कि किस तरफ इशारा किया जा रहा है. अक्सर लोग व्यंजना में लिखे गए विषयों को समझ नहीं पाते और जो समझते हैं वह ख़ूब मजा लेते हैं. हिंदी में भाषा में उसी लेखक को श्रेष्ठ मना जाता है जो व्यंजना में लिखते हैं. जो इस विधा में लिखते हैं वह निश्चिंत होकर लिखते हैं क्योंकि उन्हें संबंधित व्यक्ति जानते हुए भी कुछ नहीं कह सकता.

मैं व्यंग्य लिखता हूँ तब इसी विधा में लिखने का प्रयास करता हूँ-क्योंकि यह विधा उसकी मूल प्रकृति है. मैं अपनी सफलता और असफलता पर विचार का बोझ अब नहीं उठाता पर मुझे पढने वाले कुछ लोग हैं जो इशारा समझ जाते हैं. कुछ हास्य कवितायेँ जो वाकई काल्पनिक होती हैं और मैं उन पर कोई प्रमाण पत्र नहीं लगाता तो उस पर मेरे एक मित्र मजाक में लिख जाते हैं कि इस पर आपने डिसक्लैमर भी नहीं लगाया और हमारा सीधे नाम भी नहीं लिखा, इसे हम क्या समझें. कुछ में इशारा होता लगता है तो मैं प्रमाणपत्र लगा ही देता हूँ पर पढने वालों की तेज नजरें उसे पढ़ ही लेतीं हैं और वह कह भी जाते हैं कि इस पर क्या जरूरत थी जो डिसक्लैमर लगाया. जब कभी किसी पूरे समूह पर लिख रहे हैं तो यह विधा बहुत काम देती है और व्यंग्य का मतलब भी यही है कि वह व्यंजना विधा में होना चाहिए- नहीं तो उसे हास्य कहा जाता है.

जो लोग डरते हैं या वाद-विवाद से दूर रहना चाहिते हैं उनके लिए यह विधा ब्रह्मास्त्र का काम करती है. मैं इस विधा में लिखने को हमेशा लालायित रहता हूँ क्योंकि इससे आप अपनी बात कह भी जाते हैं और किसी विवाद भी नहीं होता. इसलिये जो लोग डरते हैं या विवाद से बचना चाहते हैं उन्हें इस व्यंजना विधा में काम करना चाहिए. एसा नहीं है कि लोगों को इसकी समझ नहीं है, यह अलग बात है कि अप लिखते किस तरह हैं और आपका प्रभाव कैसा है. मान लीजिये के मैं आज कंगारुओं और शेर के बीच मैच पर लिख दूं तो लोग हाल समझ जायेंगे कि यह भारत और आस्ट्रेलिया के बीच मैच के बारे में लिखा गया है पर उस पर लिखने से कोई प्रभाव नहें छोडेगा क्योंकि उसमें लेखक के लिए विवाद का कोई खतरा नहीं है इसलिये पाठक स्वीकार नहीं करेगा पर जहाँ किसी बड़ी ताक़त पर लिख रहे हैं और प्रतीक का इस्तेमाल करे तो पाठक उसे स्वीकार कर लेगा बशर्ते कि उसकी भाषा और प्रस्तुति प्रभावपूर्ण हो. वैसे आप व्यंजना विधा में लिखे या नहीं पर इस की जानकारी रखना चाहिए तो कई बेहतर सामग्री पढने को मिल जाती हैं जो लिखने का अच्छा अवसर प्रदान करती हैं. मेरा मानना है कि आप तब तक अच्छा नहीं लिख सकते जब तक आप पढेंगे नहीं.

चाणक्य नीति: विधा कामधेनु के समान


1.क्रोध यमराज के समान है, उसके कारण मनुष्य मृत्यु की गोद में चला जाता है।
2.तृष्णा वैतरणी नदी की तरह है जिसके कारण मनुष्य को सदैव कष्ट उठाने पड़ते हैं।

3.विद्या कामधेनु के समान है । मनुष्य अगर भलीभांति शिक्षा प्राप्त करे को वह कहीं भी और कभी भी फल प्रदान कर सकती है।

4.संतोष नन्दन वन के समान है। मनुष्य अगर अपने अन्दर उसे स्थापित करे तो उसे वैसे ही सुख मिलेगा जैसे नन्दन वन में मिलता है।

5. रुप की शोभा गुण है। अगर गुण नहीं है तो रूपवान स्त्री और पुरुष भी कुरूप लगने लगता है।
6. कुल की शोभा शील मैं है। अगर शील नहीं है तो उच्च कुल का व्यक्ति भी नीच और गन्दा लगने लगता है।
7.विद्या की शोभा उसकी सिद्धि में है । जिस विद्या से कोई उपलब्धि प्राप्त हो वही काम की है।
8. धन की शोभा उसके उपयोग में है । धन के व्यय में अगर कंजूसी की जाये तो वह किसी मतलब का नहीं रह जाता है, अत: उसे खर्च करते रहना चाहिऐ

चाणक्य नीति:मन की अग्नि अधिक कष्टकारी


1.ऐसा व्यक्ति अविश्वसनीय होता है जो क्रुद्ध होने पर सारे भेद देता है। ऐसा व्यक्ति कदापि मित्रता के योग्य नहीं होता है। ऐसा व्यक्ति निकृष्ट श्रेणी का होता है और जो भी ऐसे व्यक्ति को मित्र बनाता है वह सदैव धोखा ही खाता है।
2.पार्थिव अग्नि की ज्वाला से भी अधिक दग्ध करने वाली मन की अग्नि होती है, और वह मन और शरीर दोनों को भस्म कर देती है।
पत्नी के वियोग का अग्नि मनुष्य को जलाने वाली होती है, विशेषकर वृद्धावस्था में मिलने वाला यह दर्द अधिक कष्टकारी होता है।

3.अपमान की अग्नि मनुष्य को दग्ध कर देती है। विशेषकर बंधु-बांधवों द्वारा किया गया अपमान तो दिल को जलाकर ही रख देता है। इसी प्रकार कर्जा न अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है। इसी प्रकार कर्जा अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है।

4.दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रों और मूर्खों की सभा से भी जो अपमान होता है वह शरीर को जलाता है।

अपने ही लोगों की वाह-वाही चाहिए


लिपि रोमन
हो गयी है कॉमन
अब इस दुनिया को कुछ नया चाहिए
जिन पर टिकाये बैठे हो
अपनी उम्मीद उस पश्चिम को
अपनी दुकानदारी अब हिंदी में चाहिए
रोमन में हिंदी चलाने की चाहत
रखने वालों से कोई शिकायत नहीं
देवनागरी से रहित होने पर
उनसे हमदर्दी जताना चाहिए
पर रोमन की गठरी सिर पर
रख कर घूमने वालों की दरियादिली
हिंदी भाषा को नहीं चाहिए
कभी हिंदी गरीबों की भाषा कहलाती थी
तब क्यों नहीं उठा था लिपि का सवाल
अब क्यों मच रहा है बवाल
अब ऐसा क्या हो गया कमाल
कि सबको हिंदी ही चाहिए

कहैं दीपक बापू
जब बन रहा था विश्व में
भारत एक आर्थिक महाशक्ति
तब ही हमें मालुम था कि
एक दिन लिपि पर ही होगा हमला
पश्चिम के सिमटते साम्राज्य की
थकी हारी अंग्रेजी और उसकी रोमन लिपि का
उठा लाएंगे इस देश में गमला
भारत के गरीब के जेब में
कुछ आयेगा पैसा
फिर भी रहेगा वह हिंदी से पहले जैसा
उसके जेब से पैसे निकालने के लिए
हिंदी का सहारा चाहिए
उठाएँ रहो रोमन का परचम
हम नहीं रोकेंगे
हम अपनी मातृभाषा को
शब्दों के तोहफे देवनागरी में ही सौंपेंगे
हमें अपने लिखे पर
अपने ही लोगों की वाह-वाही चाहिए

नोट-यह ऐक काल्पनिक हास्य कविता है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है, अगर किसी से इसका विषय मिल जाये तो यह संयोग मात्र होगा

चाणक्य नीति : दुष्टो की संगत विनाश का कारण


1. बुरे व्यवहार करने वाले कर्मचारियों (सहयोगियों ) तथा बुरे स्थान पर रहने वाले दुष्ट लोगों से मित्रता करने वाला मनुष्य का संकट में पड़कर विनाश होना निश्चित है।
2. पत्नी की मृत्यु, अपनों द्वारा अपमान, ऋण की वृद्धि, दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रता, दुष्टों की संगत मनुष्य का शरीर बिना आग के जलाया करती हैं।
3.नदी के किनारे के पेड, दुसरे के घर जाकर बैठने वाली स्त्री बिना मंत्री का राजा यह सब शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
4.निश्चित वस्तु को छोड़कर जो व्यक्ति अनिश्चित की ओर भागता है वह निश्चित से भी हाथ धो बैठता है, अनिश्चित पाने की तो वैसे भी संभावना नहीं रहती।

हास्य कविता -रिश्ता और सामान


रिश्ते की बात करते हुए
वर पक्ष ने जमकर डींग मारीं
‘हमारे पास अपना आलीशान मकान है
अपनी बहुत बड़ी दुकान है
घर में रंगीन टीवी, फ्रिज,ऎसी और
कपडे धोने की मशीन है
रसोई में बनते तमाम पकवान हैं’
रिश्ता तय होते ही अपनी
मांगों की सूची कन्या पक्ष को थमा दीं
जिसमें तमाम तरह का मांगा था सामान
जैसे बेटा बिकाऊ इन्सान है

कन्या के पिता ने रिश्ते से
इनकार करते हुए कहा
‘आपके घर में बहु की कमी थी
वही पूरी करने के लिए मैं अपनी
बेटी का हाथ देने को तैयार था
पर मुझे लगता है कि
उसकी आपको कोई जरूरत नहीं
क्योंकि आपकी प्राथमिकता
गृह लक्ष्मी को घर में जगह देने की बजाय
उसके साथ आने वाला सामान है’
————————

चाणक्य नीति:अन्न,जल और प्रिय वचन हैं असली रत्न


1. हजारों गायों की बीच जिस तरह बछड़ा अपनी मा के पास जाता है वैसे ही मनुष्य का कर्म भी उसी में पाया जाता है जो कर्ता है। कर्ता अपने कर्म का फल भोगे बिना कैसे रह सकता है।
2. गयी हुई संपत्ति, छोड कर गयी पत्नी, छीन गयी भूमि वापस मिल सकती है पर एक बार शरीर गया तो फिर वापस नहीं मिल सकता, अत:उसकी रक्षा करते हुए सदुपयोग करो।
3. एकता में ही भारी शक्ति है। बिखरे हुए हजारों तिनकों को हाथी अपने पैर तले रौंद डालता है पर वह ढाका बनकर उस पर नियन्त्रण करते हैं और उसे अपने इशारों पर चलने कि लिए बाध्य करते हैं। वेग की तलवार की धार भी वर्षां वाले मेघ तृण समूह को काट नहीं सकते।

4. मूर्खों ने ही पाषाण के टुकड़ों को रत्न मान लिया है। वास्तविक रत्न तो अन्न, जल और प्रिय वचन है। इन तीनों रत्नों से अधिक कोई मूल्यवान रत्न नहीं है।

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