Tag Archives: हिन्दू धर्म संदेश

पतंजलि योग साहित्य-तप, स्वाध्याय तथा भक्ति हैं क्रियायोग (patanjali yoga sahitya-tap, swadhayay tathaa bhakti is kriya yog)


तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधान क्रियायोगः।।
हिन्दी में भावार्थ-
तप, स्वाध्याये तथा ईश्वर के प्रति प्राण केंद्रित करना तीनों ही क्रियायोग हैं।
समाधिभावनार्थः क्लेशतनुरणर्थश्च।।
हिन्दी में भावार्थ-
समाधि में प्राप्त सिद्धि से अज्ञान तथा अविद्या के कारण होने वाले क्लेशों का नाश होता है।
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशा।।
हिन्दी में भावार्थ-
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश यह पांचों क्लेश है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योग साधना के आठ भाग हैं जिसमें समाधि का अत्यंत महत्व है। समाधि ध्यान का वह चरम शिखर है जहां मनुष्य इस दैहिक संसार से प्रथक ईश्वरीय लोक में स्थित हो जाता है। उसका अपने अध्यात्म से इस तरह योग या जुड़ाव हो जाता है कि उसकी देह में स्थित इंद्रिया निष्क्रिय और शिथिल हो जाती हैं और जब योगी समाधि से वापस लौटता है तो उसके लिये पूरा संसार फिर नवीन हो जाता है क्योंकि वह मन के सारे विकारों से निवृत होता है।
योगासन तथा प्राणायाम के बाद परम पिता परमात्मा के प्रति ध्यान लगाना भी योग हैं और इनको क्रियायोग कहा जाता है। इसमे सिद्धि होने पर किसी विषय का अध्ययन न करने या उसमें जानकारी का अभाव होने पर भी उसको जाना जा सकता है। ऐसे में अविद्या और अज्ञान से उत्पन्न क्लेश नहीं रह जाता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि योग साधना की सीमा केवल योगासन और प्राणायाम तक ही केंद्रित नहीं है बल्कि ध्यान और समाधि भी उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा है। मनुष्य का अपना संकल्प भी इसमें महत्व रखता है।
सच तो यह है कि मनुष्य मन के इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक तो है सहज योग जिसमें मनुष्य स्वयं संचालित होता है। दूसरा है असहज योग जिसमें मनुष्य अज्ञान तथा अविद्या के कारण इधर उधर प्रसन्नता तलाश करते हुए केवल तनाव ही पाता है। पूर्ण रूप से योग साधना का ज्ञान प्राप्त करने वाले मनुष्य तत्व ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तब उनका प्रयोजन इस नश्वर संसार से अधिक नहीं रह जाता है। योगासन तथा प्राणायाम करने वाले कुछ लोग अपने आपको सिद्ध समझने लगते हैं और तब वह दूसरों को चमत्कार दिखाकर अपनी दुकानें जमाते हैं। दरअसल वह योग का पूर्ण रूप नहीं जानते। जिन लोगों को योग साधना का पूर्ण ज्ञान होता है वह समाधि के द्वारा सिद्ध तो प्राप्त करते हैं पर उसकी आड़ में कोई धंधा नहीं करते क्योंकि उनके लिये इस संसार में कोई भी कार्य चमत्कार नहीं रह जाता।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
http://deepkraj.blogspot.com

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संत कबीर दर्शन-सामूहिक भक्ति और भजन दिखावा है (samuhik bhakti ek dikhava-sant kabir darshan)


ऊजल पहिनै कापड़ा, पान सुपारी खाय।
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय।।
संत कबीर कहते हैं कि जो उजले कपड़े पहनने के साथ ही पान सुपारी खाकर दिखावा करते हैं और गुरु की भक्ति नहीं करते वह बहुत तकलीफ के साथ मुत्यु को प्राप्त होते हैं।
दुनियां सेती दोसती, होय भजन में भंग।
एका एकौ राम सों, कै साधुन के संग।।
संत कबीर कहते हैं कि दुनियां के लोगों के साथ मित्रता करने से भक्ति में बाधा आती है। एक अकेले ही भगवान राम की भक्ति तथा साधुओं की संगत करने पर ही मन को शांति मिलती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आधुनिक युग ने भारत में जीवन के मायने ही बदल दिये हैं। मित्रता के नाम पर अनेक लोग कुसंगत में फंसकर जीवन तबाह करते हैं तो अनेक लोग समूहों में मिलकर भगवान भजन का आयोजन कर अपने धार्मिक होने की दिखावा करते हैं। स्थिति यह है कि अनेक लोग अपने यहां शादी विवाह के अवसर पर परंपरागत गीत गायन के स्थान पर भजन जागरण करते हैं और इस अवसर पर शराब तंबाकू का खुलकर सेवन होता है। कई बार तो हंसी आती है कि भक्ति को लेकर लोग समझते क्या हैं? वह भगवान को भक्ति दिखा रहे हैं या लोगों को बता रहे हैं या अपने आपको ही स्वयं के भक्त होने का विश्वास दिला रहे हैं। अब तो हर मौके पर सामूहिक भजन कार्यक्रम करने की ऐसी परंपरा शुरु हो गयी है कि देखकर लगता है कि पूरा देश ही भक्तमय हो रहा है। उस हिसाब से देश में नैतिकता तथा आचरण के मानदंड बहुत ऊंचे दिखना चाहिये पर ऐसा है नहीं।
दरअसल देश में बढ़ते धन ने लोगों को बावला बना दिया है और धनी लोग अपनी छबि धार्मिक बनाये रखने के लिये ऐसे आयोजन करते हैं जिससे समाज में भले आदमी की छबि बने रहे। उसी तरह कुछ बाहुबली लोगों से पैसा वसूल कर भी अनेक प्रकार के सामूहिक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं कि लोग उनकी छबि को साफ सुथरा समझें। सच तो यह है कि धर्म साधना एकांत का विषय है और इसमें जो समूह बनाकर भजन करते हैं या कार्यक्रमों में शामिल होते हैं वह सिवाय पाखंड के कुछ नहीं करते। दूसरों को नहीं अपने आपको धोखा देते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
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धर्म संदेश-पौराणिक ग्रंथों का केवल सार ग्रहण करें


हमारे प्राचीन ग्रथों में जीवन से संबंधित बहुत सारा ज्ञान वर्णित है। उसमें से बहुत सारा समय के साथ अप्रासंगिक हो चुका है और वर्तमान समय में उनको दोहराने की आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि जहां तक हो सके मनुष्य अपने विवेक से काम ले और जहां वह काम न करे वह शास्त्रों की मदद ले। प्रकृति ने मनुष्य को सबसे बुद्धिमान जीव बनाया है इसलिये उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने विवेक से काम करते हुए न केवल अपना बल्कि अपने ऊपर आश्रित जीवों की भी सहयता में अपना समय व्यतीत करे। हो इसका उल्टा रहा है। अनेक लोगों ने प्राचीन ग्रंथों के श्लोक आदि रट लिये हैं जिनका अर्थ वह हिन्दी में कर अपने आपको विद्वान साबित करते हैं। जबकि व्यवहार में न तो वह उस ज्ञान का धारण किये लगते हैं और न कभी उनको अपने विवेक का उपयोग्र करते हुए देखा गया है। ऐसे में भर्तृहरि महाराज का यह संदेश बहुत महत्वपूर्ण है कि इन शास्त्रों से सार ग्रहण करना चाहिए।
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अनन्तशास्त्रं बहुलाश्चय विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षरमिवाम्बुपमध्यात्
हिन्दी में भावार्थ-
शास्त्र और विद्या अनंत है। शास्त्रों में बहुत कुछ लिखा गया है। मनुष्य का जीवन संक्षिप्त है। उसके पास समय कम है जबकि जीवन में आने वाली बाधायें बहुत हैं। इसलिये उसे शास्त्रों का सार ग्रहण कर वैसे ही जीवन में आगे बढ़ना चाहिये जसे कि दूध में से हंस पानी को अलग ग्रहण करता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में जीवन दर्शन का रहस्य और ज्ञान का भंडार समेटे अनेक वेद, पुराण और उपनिषदों के साथ ही अनेक महापुरुषों की पुस्तकें हैं। हमारे देश पर प्रकृति की ऐसी कृपा रही है कि हर काल में एक अनेक महापुरुष एक साथ उपस्थित रहते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में ज्ञान का अपार भंडार भरा पड़ा है पर उसमें कथा और उदाहरणों से विस्तार किया गया है। मूल ज्ञान अत्यंत संक्षिप्त है और उसके निष्कर्ष भी अधिक व्यापक नहीं है। अतः ऐसे बृहद ग्रंथों को पढ़ने में समय लगाना एक सामान्य व्यक्ति के लिये संभव नहीं पर अनेक विद्वानों ने इसमें डुबकी लगाकर इन व्यापक ग्रंथों का सार समय समय पर प्रस्तुत किया है। इतना ही नहीं कुछ विद्वानों ने तो लोगों के हृदय में महापुरुष की उपाधि प्राप्त कर ली।
वैसे वेद, पुराण, और उपनिषदों के साथ अन्य अनेक पावन ग्रंथों का ज्ञान और सार तत्व श्रीमद्भागवत गीता में मिल जाता है। अगर जीवन में शांति और सुख प्राप्त करना है तो उसमें वर्णित ज्ञान को ग्रहण करना ही श्रेयस्कर है। वैसे प्राचीन ग्रंथों की कथायें और उदाहरण सुनने में बहुत अच्छे लगते हैं और समय हो तो सत्संग में जाकर उनका भी श्रवण करना अच्छी बात है। जहां समय का अभाव हो वहां श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन अत्यंत फलदायी है। अगर श्रीगीता का अध्ययन और श्रवण करेंगे तो हंस के समान वैसे ही ज्ञान प्राप्त करेंगे जैसे वह दूध से पानी अलग कर ग्रहण करता है। एक बात निश्चित है कि उसका ज्ञान न तो गूढ़ है न कठिन जैसा कि कहा जाता है। उसे ग्रहण करने के लिये उसे पढ़ते हुए यह संकल्प धारण करना चाहिये कि उस ज्ञान को हम धारण कर जीवन में अपनायेंगे तभी उसे समझा जा सकता है।

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भर्तृहरि नीति शतक-जिनका मन घोड़े की तरह दौड़े उनको प्रसन्न रखना कठिन


आम आदमी की जिंदगी हमेशा ही कठिन होती है पर आजकल के समय में तो लगभग दुरूह हो गयी है। बढ़ती महंगाई, हिंसा, तथा भ्रष्टाचार ने आम आदमी को त्रस्त कर दिया है। ऐसे में हर आम इंसान सोचता है कि वह बड़े आदमी की चमचागिरी कर जीवन में शायर कोई उपलब्धि प्राप्त कर ले। इस भ्रम में अनेक लोग बड़े लोगों की चाटुकारिता लगते हैं, मगर फायदा उसी को होता है जो दौलतमंदों के तलवे चाटने की हद तक जा सकता है। सच तो यह है कि कोई आदमी कितना भी दौल्त, शौहरत या पद की ऊंचाई पर पहुंच जाये पर उसकी मानसिकता छोटी रहती है। ऐसे में उनकी चमचागिरी से सभी को कुछ हासिल नहीं होता इसलिये जहां तक हो सके अपने अंदर आत्मविश्वास लाकर जीवन में संघर्ष करना चाहिए।

दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं
तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः

जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदं
सखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः
।।
हिंदी में भावार्थ- जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है। हमारी अभिलाषायें और आकांक्षायें की तो कोई सीमा ही नहीं है। सभी के मन में बड़ा पद पाने की लालसा है। इधर शरीर बुढ़ापे की तरह बढ़ रहा होता है। मृत्यु पीछे पड़ी हुई है। इन सभी को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि भक्ति और तप के अलावा को अन्य मार्ग ऐसा नहीं है जो हमारा कल्याण कर सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों के मन में धन पाने की लालसा बहुत होती है और इसलिये वह धनिकों, उच्च पदस्थ एवं बाहुबली लोगों की और ताकते रहते हैं और उनकी चमचागिरी करने के लिये तैयार रहते हैं। उनकी चाटुकारिता में कोई कमी नहीं करते। चाटुकार लोगांें को यह आशा रहती है कि कथित ऊंचा आदमी उन पर रहम कर उनका कल्याण करेगा। यह केवल भ्रम है। जिनके पास वैभव है उनका मन भी हमारी तरह चंचल है और वह अपना काम निकालकर भूल जाते हैं या अगर कुछ देते हैं तो केवल चाटुकारिता  के कारण नहीं बल्कि कोई सेवा करा कर। वह भी जो प्रतिफल देते हैं तो वह भी न के बराबर। इस संसार में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर उसके मद में डूबने से बच पाते हैं।  अधिकतर लोग तो अपनी शक्ति के अहंकार में अपने से छोटे आदमी को कीड़े मकौड़े जैसा समझने लगते हैं और उनकी चमचागिरी करने पर भी कोई लाभ नहीं होता।  अगर ऐसे लोगों की निंरतर सेवा की जाये तो भी सामान्य से कम प्रतिफल मिलता है।
सच तो यह है कि आदमी का जीवन इसी तरह गुलामी करते हुए व्यर्थ चला जाता हैं। जो धनी है वह अहंकार में है और जो गरीब है वह केवल बड़े लोगों की ओर ताकता हुआ जीवन गुंजारता है। जिन लोगों का इस बात का ज्ञान है वह भक्ति और तप के पथ पर चलते हैं क्योंकि वही कल्याण का मार्ग है।इस संसार में प्रसन्नता से जीने का एक ही उपाय है कि अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए ही जीवन भर चलते रहें।  अपने से बड़े आदमी की चाटुकारिता से लाभ की आशा करना अपने लिये निराशा पैदा करना है।

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मनु स्मृति-गंदे स्थानों पर पैदा होने वाले पदार्थ खाने से बुद्धि भ्रष्ट होती है (bhojan aur buddhi-manu smriti)


लशुनं, गुंजनं चैव पलाण्डूंु कचकानि च।
अभ्याक्षाणि द्विजातीनामेध्यप्रवानि।
हिन्दी में भावार्थ-
लहसून, शलजम, प्याज, कुकरमुत्ता तथा अन्य ऐसे खाद्य पदार्थ जो गंदे स्थानों पर पैदा होते हैं, उनका सेवन करने से बुद्धि भृष्ट होती है। अतः इनके प्रयोग से बचना चाहिए।
लोहितान् वृक्षनिर्यासान् वश्चनप्रभवांस्तथा।
शेतुं गव्यं य पीयुषं प्रयत्नेन विवर्जयवेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
लाल रंग वाले पेड़ों का गोंद, वृक्षों में छिद्र करने से निकलने वाला द्रव्य तथा लेस वाले फल तथा हाल ही में बच्चे को जन्म देने वाली गाय के दूध का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे अकाल मृत्यु की संभावना रहती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम यह तो जानते हैं कि ‘स्वस्थ शरीर में ही प्रसन्न मन का निवास होता है’, तो हमें यह भी समझना चाहिए कि शीरर में मौजूद तत्व ही हमारी बुद्धि का संचालन करते हैं। हम पचने योग्य वस्तु का भक्षण करें यह बात स्वीकार्य है पर यह भी याद रखना चाहिये कि उनका बुद्धि पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी देखना चाहिए। अक्सर हम कहते हैं कि हमें यह पच जाता है या वह पच जाता है पर रक्त कणों में सम्मिलित उन खाद्य पदार्थों से आये जीवाणु किस मानसिकता के हैं यह भी देखना ठीक है।
देखा जाये तो मांस खाने से भी कोई मर नहीं जाता और लोग उसे पचा भी लेते हैं पर उससे आए विषाणु किस तरह मन को विकृत करते हैं यह उन लोगों की मानसिकता देखकर समझा जाता है जो इसका सेवन करते हैं। शराब तथा अन्य व्यसन करने वाले भी सभी कोई तत्काल नहीं मर जाते पर धीरे धीरे उनका दिमागी संतुलन बिगड़ने लगता है और उसका दुष्प्रभाव उनके जीवन में देखने को मिलता है।
प्याज और लहसुन को स्वास्थय के लिये अच्छा मानाा जाता है पर उनसे निर्मित होने वाली मानसिकता विकृत होती है शायद यही कारण है कि अनेक लोग इनके सेवन से बचते हैं। उसी तरह मांस खाना भी बहुत बुरा जाता है। वैसे मांस खाने वाले सभी उसे पचा लेते हैं पर प्रश्न यह है कि उसके साथ आये  विषैले विषाणु जो रक्त में घुलकर कलुषित मनुष्य की मानसिकता का निर्माण करते हैं उनका अध्ययन अभी तक नहीं किया गया है।
श्री मद्भागवत गीता में कहा गया है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते है।’ उसी तरह यह भी एक महावत है कि ‘जैसा खायें अन्न वैसा हो जाये मन’। अन्न खाने से आशय केवल उसके अच्छे या बुरे होने सा नहीं है बल्कि वह किस कमाई से खरीदा गया और कहां पैदा हो यह भी महत्वपूर्ण है। श्री मद भागवत गीता में भोजन के तीन प्रकार-सात्विक, राजसी तथा तामसी-बताये गये हैं। उनका अर्थ और भाव समझ कर खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

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