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राज्य प्रबंध का समाज में हस्तक्षेप अधिक नहीं होना चाहिये-हिन्दी लेख


                    भारत में सामाजिक, आर्थिक, धाार्मिक, शिक्षा पत्रकारिता, खेल, फिल्म, टीवी तथा अन्य सभी सार्वजनिक विषयों में राज्य का हस्तक्षेप हो गया है।  अनेक ऐसे काम जो समाज को ही करना चाहिये वह राज्य प्रबंध पर निर्भर हो गये हैं। ऐसे में जब कोई राजनीतिक बदलाव होता है तो हर क्षेत्र में उसके प्रभाव देखने को मिलते हैं।  देश में गत साठ वर्षों से राजनीतिक धारा के अनुसार ही सभी सार्वजनिक विषयों तथा उनसे संबद्ध संस्थाओं में राज्य का हस्तक्षेप का हस्तक्षेप हुआ तो विचाराधाराओं के अनुसार ही वहां संचालक भी नियुक्त हुए।  हमारे देश में तीन प्रकार की राजनीतिक विचाराधारायें हैं-समाजवादी, साम्यवादी और दक्षिणपंथी।  उसी के अनुसार रचनाकारों के भी तीन वर्ग बने-प्रगतिशील जनवादी तथा परंपरावादी।  अभी तक प्रथम दो विचाराधारायें संयुक्त रूप से भारत की प्रचार, शिक्षा तथा सामाजिक निर्माण में जुटी रहीं हैं पर परिणाम ढाक के तीन पात।  उल्टे समाज असमंजस की स्थिति में है।

                    पिछले साल हमारे देश में एतिहासिक राजनीतिक परिवर्तन हुआ। पूरी तरह से दक्षिणपंथी संगठन राजनीतिक परिवर्तन के संवाहक बन गये।  भारत में यह कभी अप्रत्याशित लगता  था पर हुआ।  अब दक्षिणपंथी संगठन अपने प्रतिपक्षी विचाराधाराओं की नीति पर चलते हुए वही कर रहे है जो पहले वह करते रहे थे।  प्रतिपक्षी विचाराधारा के विद्वान शाब्दिक विरोध करने के साथ ही  हर जगह अपने मौजूदा तत्वों को प्रतिरोध  के लिये तत्पर बना रहे हैं।

                    इस लेखक ने तीनों प्रकार के बुद्धिजीवियों के साथ कभी न कभी बैठक की है।  प्रारंभ  में दक्षिण पंथ का मस्तिष्क पर  प्रभाव था पर श्रीमद्भागवत गीता, चाणक्य नीति, कौटिल्य, मनुस्मृति, भर्तुहरि नीति शतक, विदुर नीति तथा अन्य ग्रंथों पर अंतर्जाल पर लिखते लिखते अपनी विचाराधारा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से मिल गयी है।  हमें लगता है कि हमारे अध्यात्मिक दर्शन में न केवल आत्मिक वरन् भौतिक विषय में भी ढेर सारा ज्ञान है। पश्चिमी अर्थशास्त्र में दर्शन शास्त्र का अध्ययन नहीं होता और हमारे यहां दर्शन शास्त्र में भी अर्थशास्त्र रहता है।  दक्षिणपंथ की विचाराधारा से यही सोच हमें प्रथक करती है।

          बहरहाल हमारा मानना है कि समाजवाद और साम्यवादियों की विचाराधारा के आधार  पर समाज और उसकी संस्थाओं का राज्य प्रबंध की शक्ति से  ही चलाया गया था।  अब अगर राज्य प्रबंध बदल गया है तो अन्य संस्थाओं में  दक्षिणपंथी विद्वानों का नियंत्रण चाहें तो न चाहें तो होगा तो जरूर।  अध्यात्मिक विचारधारा के संवाहक होने की दृष्टि से हम भी चाहते हैं कि परिवर्तन हो। आखिर समाज और उसके विचार विमर्श तथा शिक्षण की संस्थाओं में जनमानस के दिमाग में परिवर्तन की वही चाहत तो है जो लोगों ने राज्य प्रबंध में बदलाव कर जाहिर की है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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भारतीय मीडिया की #आतंकवाद में बहुत रुचि लाभप्रद नहीं-हिन्दी चिंत्तन #लेख


                लगभग आईएसआईएस नामक एक आंतकी संगठन के समाचार एक विज्ञापन की तरह भारतीय प्रचार माध्यम इस तरह कर रहे हैं जैसे कि उसमें आकाश से उतरे महादानव हों। जिनसे लड़ने के लिये कोई भारत में कोई  पैदा ही नहीं हुआ।  शायद प्रचार प्रबंधकों को लग रहा है कि कथित भारतीय आतंकी सगंठनों के दम पर अब उनकी सनसनी का व्यवसाय चल नहीं पा रहा या फिर ज्यादा नहीं चलेगा। हमारे हिसाब से आईएसआईएस अपने सहधर्मी राष्ट्र की सरकारें से संरक्षित है जो अपने आसपास के कमजोर क्षेत्रों में धार्मिक आधार पर वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। भारतीय प्रचार माध्यम उन देशों के नाम छिपाते हैं क्योंकि इनके स्वामियों के अन्य व्यवसाय उनके शहरों में ही है।

                              प्रचारकों के चेहरे अनेक बार इस तरह झल्लाते दिखते हैं अभी तक आईएसआईएस वाले इस देश में आये क्यों नहीं? दुर्भाग्य से किसी दिन इस संगठन के नाम पर कोई छोटी वारदात भी  हुए उस दिन यह विज्ञापनों के बीच  चिल्लायेंगे-आ गया आ गया आईएसआईएस आ गया। इन प्रचारकों को भारतीय आतंकी संगठन उसके मुकाबले कम क्रूर लगते हैं क्योंकि वह बम विस्फोट कर भाग जाते हैं। आईएसआईएस वाले तो क्रूरता पूर्वक हत्या का सीधा प्रसारण करते है।  भारतीय प्रचार प्रबंधक उसका सतत प्रचार इस आशा से करते लगते हैं कि भविष्य में ऐसे दृश्य यहां हो तो कुछ संवेदनाओं का व्यापार चमकदार हो जाये।  हमारी यह समझायश है कि अनावश्यक रूप से इस संगठन का प्रचार न करें। यह संगठन भारत में सक्रिय होगा या नहीं, यह कहना कठिन है पर कहीं ऐसा न हो जाये कि प्रचार पाने के लिये कुछ खरदिमाग लोग उस जैसे कांड करने लगें। हम भारतीय प्रचार माध्यमों की दो खबरों से बेहद चिढ़ते हैं। एक तो श्रीनगर में हर शुक्रवार को पाकिस्तानी झंडे फहराने दूसरा आईएसआईएस के हत्या के प्रसारण हमें बेहद चिढ़ा देते हैं। इन खबरों की भारत में चर्चा करना  एक तरह से आतंकवाद का विज्ञापन करना है।

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#आईएसआईएस (#isisi)

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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बरसात का मौसम मैंढक की टर्र टर्र-हिन्दी कवितायें


अक्लमंदों को नहीं आता

समाज सुधारने का तरीका

वह नहीं खेद भी जताते।

जात भाषा और धर्म के

नाम पर उठाते मुद्दे

इंसानों में भेद बताते।

कहें दीपक बापू एकता के नाम

चला रहे अपना व्यापार

वही समाज में छेद कराते।

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बरसात का मौसम है

मैंढकों की आवाज

चारों तरफ आयेगी।

कोयल मौन हो गयी

संगीत जैसी सुरीली

आवाज अब नहीं आयेगी।

कहें दीपक बापू शोर कर

छिपाते लोग अपनी कमजोरी,

स्वार्थ से तोड़ते और जोड़ते

प्रेम की डोरी,

झूठ का तूफान उठाते

इस उम्मीद में कि

उनकी सच्चाई दब जायेगी।

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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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कूड़े पर पद्य रचना हो सकती है-हिन्दी कवितायें


सर्वशक्तिमान के दरबार में

अब वह हाजिरी नहीं लगायेंगे,

कूड़े के इर्द गिर्द झाड़ू 

झंडे की तरह लहराकर

प्रतिष्ठा का दान पाकर

शिखर पर चढ़ जायेंगे।

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शहर में कचरा बहुत

उम्मीद है कोई तो आकर

उसे हटायेगा।

कभी अभियान चलेगा

स्वच्छता का

कोई तो झाड़ू झंडे की तरह

लहराता आयेगा।

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पुरानी किताबों में लिखे

शब्दों के अर्थ का व्यापार

वह चमका रहे हैं।

स्वर्ग का सौदा करते

बंदों में सर्वशक्तिमान के दलाल बनकर

 नरक के भय से

वह धमका रहे हैं।

कहें दीपक बापू सांसों से

लड़खड़ाते बूढ़े हो चुके चेहरे

इंसानों में पुराने होने के भय से

खंडहर हो चुके ख्यालों को

नया कहकर चमका रहे हैं।

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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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आदमी चूहे की प्रवृत्ति न रखे-हिन्दी चिंत्तन लेख


                              सब जानते हैं कि लालच बुरी बला है पर बहुत कम लोग हैं जो इस ज्ञान को धारण कर चलते हैं। हम में से अनेक लोगों ने पिंजरे में चूहे को फंसाकर घर से बाहर जाकर छोड़ा होगा।  सभी जानते हैं कि चूहे को पकड़ने के लिये पिंजरे में रोटी का एक टुकड़े डालना होता है।  चूहा जैसे ही उस रोटी के टुकड़े को पकड़ता है वह पिंजरे में बंद हो जाता है। चूहे में वह बुद्धि नहीं होती जिसे प्रकृत्ति ने भारी मात्रा में इंसान को सौंपा है।  फिर भी सामान्य मनुष्य इसका उपयोग नहंी करते।  अनेक लोग यह शिकायत करते हैं कि हमें अमुक आदमी ने ठग लिया है अथवा धोखा दिया है। इस तरह की शिकायत करने वाले लोग इस आशा में रहते हैं कि अपने साथ हुई ठगी या धोखे का बयान दूसरों से करेंगे तो सहानुभूति मिलेगी पर यह नहीं सोचते कि सुनने वाले उन्हीं की बुद्धि पर हंसते हैं-मन में कहते हैं कि यह चूहा बन गया।

                              कहा जाता है कि पशु पक्षियों तथा मनुष्य में भोजन, निद्रा तथा काम की प्रवृत्ति एक जैसी रहती है पर उसके पास उपभोग के  अधिक विकल्प चुनने वाली सक्षम बुद्धि होती है।  यह अलग बात है कि अनेक ज्ञान और योग साधक अपनी बुंिद्ध का उपयोग ज्ञान के साथ करने की योग्यता अर्जित कर लेते हैं जबकि सामान्य मनुष्य उसी तरह ही विषयों के पिंजरे में फंसा रहता है जैसे चूहा रोटी के टुकड़े में ठगा जाता है।  कहा जाता है कि आजकल तो मनुष्य अधिक शिक्षित हो गया है पर हम इसके विपरीत स्थिति देख रहे हैं।  निरर्थक शिक्षा नौकरी की पात्रता तो प्रदान करती है पर जीवन के सत्य मार्ग से विचलित कर देती है।  पढ़े लिखे लोग अशिक्षित लोगों से अधिक ठगी या धोखे का शिकार हो रहे हैं।  हमारे देश में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से जुड़ी शिक्षा को धर्म से जोड़कर शैक्षणिक संस्थानों से दूर रखा गया है पर अनुभव तो यह है कि इसके अभाव में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से पढ़े लोग अनपढ़ लोगों से ज्यादा दूसरों के बहकावे में आ जाते हैं। इसलिये यह भ्रम भी नहीं रखना चाहिये कि आधुनिक शिक्षा से व्यक्ति अध्यात्मिक ज्ञानी हो जाता है।

                              इसलिये जिन लोगों का अपना जीवन सुखद बनाना है वह नित्य भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्यययनर अवश्य करें। जीवन में सांसरिक विषयों के साथ अध्यात्मिक सिद्धांतों के अनुसार संपर्क करने का तरीका चाणक्य और विदुर नीति में अत्यंत सरलता से समझाया गया है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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गरीबी शब्द अब भी बिकता है-हिन्दी व्यंग्य


                              ‘गरीबी’ शब्द अब किसी श्रेणी की बजाय किसी आकाशीय फरिश्ते  का प्रतीक लगता है।  यह फरिश्ता अपनी चादर ओढ़े विचरने वालो  लोगों की तरफ तो नहीं देखता मगर अपना नाम जपने वालों को तख्त की सीढ़ियों पर पहुंचा देता है। जो गरीब इस फरिश्ते को घर में धारण किये हैं उनकी तरफ तो देखता भी नहीं है पर जो उससे हटाने या मिटाने के नारे लगाता है उसे खूब लोकप्रियता इतनी मिल जाती है कि वह दौलत, शौहरत और प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंच जाता है।

                              सामान्य इंसानों में गरीब होना अभिशाप है पर यह उन चालाक लोगों के लिये वरदान बन जाता है जो इस अभिशाप को दूर करने के लिये संघर्ष करने के नाटक रचते हैं।  हमारे देश में तो स्थिति यह है कि अगर कहीं क्रिकेट मैच में जीत पर जश्न मनाया जा रहा हो तो टीवी पर कोई भी कहता है कि ‘‘इससे क्या? पहले देश की गरीबी दूर करो।’’

                              हंसी तो तब आती है जब टीवी चैनलों पर प्रचारक खेल, क्रिकेट, कला या साहित्यक विषय पर चर्चा करते करते देश की गरीबी पर चले आते हैं।  अनेक स्वयंभू समाज सेवक जब इन बहसों के चरम पहुंचते हैं तो केवल गरीबी को दूर करना ही अपना लक्ष्य बताते हैं।

                              अभी डिजिटल इंडिया सप्ताह पर बहस चल रही थी।  यह सभी जानते हैं कि डिजिटल कार्य के लिये शिक्षित होने के साथ ही कंप्यूटर या मोबाइल होना जरूरी है। हमारे देश में करोड़ों लोग इस कार्य से जुड़ भी चुके हैं।  जब डिजिटल सप्ताह की चर्चा चल रही है तब उसके योग्य काम करने वालों की समस्याओं पर चर्चा होना चाहिये न कि उस समय गरीबी का रोना धोना होना चाहिये।  अब यह तो हो नहीं सकता कि पहले सभी को शिक्षित करने के साथ ही उनके कंप्यूटर तथा मोबाइल देने के बाद यह  सप्ताह मनाया जाये। इन टीवी चैनलों से कोई पूछे कि इस देश मेें अनेक गांवों में तो उनका कार्यक्रम भी देखने को नहीं मिलता तो क्या वह अपना प्रसारण बंद कर देंगे?

                              हमारे यह प्रगतिशील और जनवादी सोच इस कदर घुस गयी है कि किसी को विद्वान तब तक नहीं माना जाता जब तक गरीबी या गरीब का हितैषी होने का दावा कोई कर ले। इस सोच का विस्तार इस कदर है कि मजदूर को मजबूर और गरीब को भिखारी की तरह समझा जाता है।  यही कारण है कि मजदूरों को सिंहासन और गरीब को स्वर्ग दिलाने का वादा करने वाले अपना रोजगार  खूब चलाते हैं। यह अलग बात है कि आजकल मजदूर और गरीब यह समझ गये हैं कोई उनको सिंहासन तो क्या जमीन पर बैठने के लिये  चटाई और ही चलने लिये गाड़ी तो क्या साइकिल तक नहीं देगा।

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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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पूंजीपति भारत का स्वदेशी सर्वर बनवायें.डिजिटल इंडिया सप्ताह पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


                  डिजिटल इंडिया सप्ताह में अनेक प्रश्न हम जैसे उन लोगों के मन में आ रहे हैं जो करीब आठ दस वर्ष से अंतर्जाल पर सक्रिय हैं।  भारत के संगठित प्रचार माध्यमों के-टीवी और अखबार-के स्वामी कभी नहीं चाहेंगे कि अंतर्जाल का सामाजिक जनसंपर्क कभी उनका महत्व कम कर दे।  अब तो औ़द्योगिक समूह ही संगठित प्रचार माध्यमों के संचालक होने के साथ ही  टेलीफोन कंपनियों के भी स्वामी है इसलिये यह अपेक्षा करना कि अंतर्जाल को स्वदेशी सर्वर जैसा कोई मील का पत्थर रखना चाहेगा अतिश्योक्ति या आत्ममुग्धता होगी।

                  भारत के पूंजीपतियों की यह प्रवृत्ति है कि  वह सेवक और उपभोक्ता का निर्ममता से दोहन करना ही व्यापार का मूल सिद्धांत मानते हैं।  परंपरागत वस्तुओं के विक्रय विनिमय के आगे उनकी कोई योजना नहीं होती। नयी वस्तु का अविष्कार कर उसके लिये बाज़ार बनाना इनके स्वभाव में नहीं है। इसके अलावा वर्तमान पूंजीपति समूह कभी नहीं चाहता कि कोई उनका नया सदस्य बने।   भारत के वर्तमान पूंजी पुरुष  किसी तकनीकी विशारद  के हाथ स्वदेशी सर्वर होने का सपना भी नहीं देख सकते।  पश्चिम में जहां अपने व्यवसाय के तकनीकी ज्ञान रखने वाले अपनी कपंनी बनाकर स्वामी बनते हैं जबकि भारत कंपनियों के स्वामी बनने के बाद तकनीकी विशारदों को दोयम दर्ज का सेवक मानकर साथ लिया जाता है।  भारत में पूंजीपति होने के लिये तकनीकी ज्ञान, कलाकार होने के लिये कला और पत्रकार होने के लिये लेखक होना जरूरी नहीं है और इस जड़ प्रथा डिजिटल इंडिया के सप्ताह का प्रभाव पहले ही दिन दिखाई देने लगा जब अंतर्जाल और कंप्यूटर के विशारदों से अधिक धन शिखर पर बैठे लोग इसे सफल बनाने के लिये आगे आते दिखे।

      जिन डद्योगपतियों ने डिजिटल सप्ताह में उत्साह दिखाया है उनका लक्ष्य केवल अपनी टेलीफोन कंपनियों के अधिक कमाई जुटाना है न कि भारत में कोई डिजिटल क्रांति लाने का कोई उनका इरादा दिखता है।  अगर होता तो वह भारत में जल्दी कोई स्वदेशी सर्वर स्थापित करने की योजना के प्रति अपना रुझान दिखाते।  हम यहां स्पष्ट कर दें कि हम इंटरनेट पर भी उसी तरह की गुलामी झेल रहे हैं जैसे अंग्रेजों की झेलते थे। हमारे जैसे स्वतंत्र, संगठनहीन तथा मौलिक लेखक की पहचान अधिक नहीं होती इसलिये अधिक लोगों तक बात नहीं पहुंचती पर फिर भी अपना कर्तव्य पूरा करने के साथ यह आशा तो है कि कोई न कोई सामर्थ्यवान उठेगा जो भारतीय सर्वर का सपना पूरा करेगा।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

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Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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भोजन का औषधि की तरह सेवन करें-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


            भोजन के विषय पर हमारे समाज में जागरुकता और ज्ञान का नितांत अभाव देखा जाता है। सामान्य लोग यह मानते हैं कि भोजन तो पेट भरने के लिये है उसका मानसिकता से कोई संभव नहीं है। जबकि हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार उच्छिष्ट और बासी पदार्थ तामसी बुद्धि तथा प्रवृत्ति वाले को प्रिय होते हैं-यह हमारे पावन ग्रंथ में कहा गया है।  हम इसके आगे जाकर यह भी कह सकते हैं कि उच्छिष्ट और बासी पदार्थ के सेवन से बुद्धि और प्रवृत्ति तामसी हो ही जाती है। जिस तरह भारत में बड़ी कंपनियों के आकर्षक पैक में रखे भोज्य पदार्थ हैं उसे हम इन्हीं श्रेणी का मानते हैं।  स्वयं इसका सेवन कभी नहीं किया क्योंकि भगवत्कृपा से घरेलू भोजन हमेशा मिला। बाहर भी गये तो ऐसे स्थानों पर भोजन किया जो घर जैसे ही थे। इसलिये इन दो मिनट में तैयार होने वाले भोज्य पदार्थों के  स्वाद का पता नहीं पर भारतीय जनमानस में उनकी उपस्थिति अब पता लगी जब एक बड़ी उत्पाद कंपनी के भोज्य पदार्थ पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव आया।

           हैरानी है सारे प्रचार माध्यम कागज में बंद बड़ी कंपनियों के भोज्य पदार्थों पर संदेह जता रहे हैं तब भी कुछ लोग उसका सेवन करते हुए कैमरे के सामने कह रहे हैं कि उनके बिना नहीं रह सकते। इनका स्वाद अच्छा है।

       हमारा तो यह भी मानना है कि कुछ दिन में जब बड़ी कंपनियों के भोज्य उत्पाद का विवाद थम जायेगा जब लोग फिर इसका उपयोग पूर्ववत् करने लगेंगे जैसे कि कथित शीतल पेय का करते हैं।

          21 जून पर आने वालेे योग दिवस पर जिन महानुभावों को प्रचार माध्यमों पर चर्चा के लिये आना है वह श्रीमद्भागवत् गीता के संदेशों की चर्चा अवश्य करें।  एक योग साधक  भोजन पेट में दवा डालने की तरह प्रयुक्त करता है। वह स्वादिष्ट नहीं पाचक भोजन पर ध्यान देता है। पता नहीं हमारी यह बात  उन तक पहुंचेगी कि नहीं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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नियमित अभ्यास वाले ही योग पर बोलें तो अच्छा रहेगा-21 जून विश्व योग दिवस पर विशेष लेख


     भारतीय योग संस्थान देश में योग साधना के निशुल्क शिविर लगाता है। इसमें निष्काम भाव से शिक्षक नये लोगों को योगसाधना का अभ्यास बड़े मनोयोग से सिखाते हैं। यह लेखक स्वयं इस संस्थान के शिविर में अभ्यास करता रहा है।  हमारा मानना है कि योग साधना की पूरी प्रक्रिया जो भारतीय योग संस्थान के शिविरों में अपनाई जाती है वह अत्यंत वैज्ञानिक है।  समय समय पर अनेक योग विशारद भी अपना कीमती समय व्यय कर योग साधकों का मार्गदर्शन करते हैं। एक बात तय रही कि भारतीय योग संस्थान से जुड़ा कोई भी साधक यह स्वीकार नहीं कर सकता कि ओम शब्द और सूर्यनमस्कार के बिना कम से कम आज के समय में योग पूर्णता प्राप्त कर सकता है।  सूर्यनमस्कार कोई कठिन आसन है यह भी सहजता से स्वीकार नहीं किया जा सकता।

      21 जून को विश्व में योग दिवस मनाया जा रहा है पर देखा यह जा रहा है कि भारत के प्रचार माध्यम अपनी कथित निष्पक्षता दिखाने के लिये योग विरोधियों को सामने ला रहे हैं। प्रश्न यह है कि इन प्रचार माध्यमों के पास वह कौनसा पैमाना है कि वह किसी एक व्यक्ति को अपने समुदाय का प्रतिनिधि मान लेते हैं।  हमने यह देखा है कि अनेक ऐसे लोग भी इन शिविरों में आते हैं जिन्हें भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा से प्रथक कर देखा जाता है। वह न केवल ओम का जाप करते हैं वरन् सूर्यनमस्कार के साथ ही गायत्री मंत्र, शांति पाठ, महामृत्यंजय पाठ तथा प्रार्थना का गान करते हैं।  जब हम उन्हीं के समुदाय का कोई आदमी  टीवी उनके प्रतिनिधि के रूप में योग साधना का विरोध करते देखते  है तब हमारे मन में यह सवाल आता है कि उसे समूचे समुदाय का स्वर कैसे मान लिया जाये? क्या भारतीय प्रचार माध्यम यह मानते हैं कि सामुदायिक नाम से पहचान तथा किसी समाज विशेष से जुड़ी संस्था से जुड़े होने पर कोई भी अपने लोगों का अघोषित प्रतिनिधि हो जाता है?

   यह सोच प्रचार माध्यमों में कार्यरत लोगों की जड़ प्रकृत्ति की परिचायक है। ऐसे लोग योग पर अधिकार के साथ बोलते जरूर हैं पर उनका स्वयं का  अभ्यास नहीं होता वरन् उनकी योग्यता यह होती है कि येनकेन प्रकरेण वह पर्दे के सामने आ ही जाते हैं। ऐसे लोगों को हमारी सलाह है कि योग करो तो जानो। इस विषय पर बोलने या लिखने का मानस मन पर गहरा प्रभाव तब तक  नहीं होता जब तक वक्ता या लेखक स्वयं योग के समंदर में गहराई में जाकर मोती न चुनकर आया हो।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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पहाड़ से टूटे पत्थर-हिन्दी व्यंग्य कविता


पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

दीपावली (दीवाली) और भारतीय अध्यात्म दर्शन-हिन्दी आलेख (deepawali or diwali and bhartiya adhyatmik darshan-hindi article)


दीपावाली, दिवाली, दीवाली   दीपोत्सव और प्रकाश पर्व के नाम से यह त्यौहार परंपरा हमारे भारत में हर वर्ष सदियों से मनाई जाती रही है। मज़े की बात यह है कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनवास समाप्ति के अवसर पर अयोध्या में आगमन पर उल्लास के रूप में मनाये जाने वाले इस पर्व पर लक्ष्मी की पूजा सर्वाधिक की जाती है और राम चरित्र की चर्चा बहुत कम ही होती है। इसके साथ इस तरह की अन्य मिथक कथायें भी हैं पर मूल रूप से यह श्रीराम के राज्याभिषेक के रूप में माना जाता है। दिपावली, दिवाली दीपोत्सव या प्रकाश पर्व के नाम से मनाऐ जाने वाले इस पर्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि सारे देश में एक ही दिन इसको मनाया जाता है। होली या अन्य पर्वों को पूरे भारत में एक तरह से न मनाकर अलग अलग ढंग से मनाया जाता है। देश ही नहीं वरन् विदेश में भी भगवान श्रीराम और सीता को याद कर लोग आनंदित होते हैं। वैसे देखा जाये तो भगवान श्रीराम के साथ भगवान श्रीकृष्ण भी लोगों के मन के नायक हैं पर उनको भारतीय सीमाओं के बाहर इस तरह याद नहीं किया जाता है। इसलिये ही जब भगवान श्रीराम की बात आती है तो कहा जाता है क वह तो सभी के हृदय के नायक हैं जबकि विश्व को तत्वज्ञान से अवगत कराने वाली श्रीमद्भागवत गीता को प्रकाशित करने वाले भगवान श्रीकृष्ण को इस रूप में स्मरण नहीं किया जाता है। भगवान श्रीराम के बारे में श्रीमद्भागवत गीता में एक जगह श्रीकृष्ण कहते भी हैं कि ‘धनुर्धरों में मैं राम हूं।’
धनुर्धर यानि पराक्रमी। पराक्रम की छबि में सक्रियता है-दूसरी तरह से कहें कि उसमें एक्शन है। एक्शन या सक्रियता को पसंद करने के कारण ही जनमानस में भगवान श्रीराम की छबि अत्यंत व्यापक हैं-हर वर्ग और आयु का मनुष्य उनको अपना आराध्य सहजता से स्वीकार करता है। भारतीय अध्यात्म और दर्शन में भगवान श्रीराम के हाथ से संपन्न अनेक महान कार्यों से तत्कालीन समाज में व्याप्त अन्याय और आतंक के विरुद्ध युद्ध में विजय को इस अवसर पर याद किया जाता है जिसमें अहिल्या उद्धार तथा रावण पर विजय अत्यंत प्रसिद्ध हैं। अधिकतर लोग राम को एक पराक्रमी योद्धा और मर्यादा पुरुषोत्तम होने की वजह से सदियां बीत जाने पर भी याद करते हैं तो जबकि बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि उन्होंनें राजकाज चलाने के लिये भी बहुत प्रकार के आदर्श स्थापित किये थे। बनवास प्रवास के दौरान जब उनके भ्राता श्री भरत परिवार समेत मिलने आये थे तब भगवान श्री राम ने उनसे अनेक प्रश्न किये जिनमें राज्य चलाने की विधि शामिल थी। देखा जाये तो वह सभी प्रश्न राजकाज और परिवार चलाने के संदेश के रूप में भारत को ज्ञान देने के लिये किये गये थे। आज जब लोग राम राज्य की बात करते हैं तो उनको उस प्रसंग का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। भगवान श्रीराम जब 14 वर्ष बनवास काटकर अपने गृह राज्य अयोध्या लोटे तो सभी आमजन प्रसन्न हुए थे। यह उनकी लोकप्रियता का प्रमाण था जिसे बिना सार्वजनिक उपकार की राजनीति किये बिना प्राप्त करना संभव नहीं है। साथ ही यह भी लोग उनके सम्मान के लिये स्वप्रेरित थे न कि प्रायोजित, जैसे कि आजकल के राजाओं के लिये एकत्रित होने लगे हैं।
आज आधुनिक लोकतंत्र में सभी देशों मंें अनेक ऐसे राजनेता काम कर रहे हैं जो राजनीति का कखग भी नहीं जानते बल्कि उनको अपराधियों, पूंजीपतियों तथा बाहुबलियों का मुखौटा ही माना जाना चाहिए। पश्चिमी देशों में कई ऐसे अपराधी गिरोह है जो वहां के राजनेताओं पर गज़ब की पकड़ रखते हैं। उनके पीछे ऐसे शक्तिसमूह हैं जिनके प्रमुख स्वयं अपने को राजकाज में शामिल नहीं कर सकते क्योंकि उनको अपने ही क्षेत्र में वर्चस्व बनाये रखने के लिये सक्रिय रहना पड़ता है। इसलिये वह राजनीति में अपने मुखौटे लाकर सामाजिक प्रभाव बनाये रखते हैं। सच कहें तो आधुनिक लोकतंत्र के नाम पर आर्थिक, धार्मिक, कला, साहित्य तथा समाज के शिखर पुरुष अपराधियों के साथ गठजोड़ कर राज्य को अपने नियंत्रण में कर चुके हैं। राजाओं, सामंतों और जागीरदारों के अत्याचारों की कथायें सुनी हैं पर आज जब पूरे विश्व में राज्य प्रमुखों, राजकीय कर्मियों तथा अपराधियों के वर्चस्व को देखते हैं तो उनकी क्रूरता भी कम नज़र आती है। पुराने समय के राजा लोग सामंतों, जमीदारों, साहुकारों तथा व्यापारियों से कर वसूल करते थे। इतना ही नहीं किसानों से भी लगान वसूल करते थे मगर वह किसी के सामने अपने राज्य या राजकीय व्यवस्था के अपनी आत्मक सहित गिरवी नहीं रखते थे। प्रजाहित में पुराने राजाओं के कामों को आज भी याद किया जाता है। मगर आज पूरे विश्व में हालत है कि चंदा लेकर आधुनिक राजा अपना राज्य, अपनी आत्मा तथा राज्य का हित दांव पर लगा देते हैं। ऐसे में बरबस ही राजा राम की याद आती है।
प्रसंगवश अयोध्या के राम मंदिर की याद आती है। राम के इस देश में अनेक मंदिर हैं। उससे अधिक तो उनका निवास अपने भक्तों के हृदय में है। कहने वाले तो कहते हैं कि न यह वह अयोध्या है न वही जन्म स्थान है जहां राम प्रकट हुए थे। यह गलत भी हो सकता है सही भी, पर सच यह है कि भगवान श्रीराम तो घट घट वासी हैं। उनके भक्त इतने अनन्य हैं कि उनके कल्पित होने की बात कभी स्वीकारी नहीं जा सकती। यही कारण है कि उनका चरित्र अब देश की सीमाओं के बाहर भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
इस दीपावली के अवसर पर अपने सभी ब्लाग लेखक मित्रों तथा पाठकों को हार्दिक बधाई। यह दिपावली सभी के लिये अत्यंत प्रसन्नता लाये यह शुभकामनायें। आध्यात्मिक लोगों के लिये हर पर्व चिंतन और मनन के लिये प्रेरणा देता है। ऐसे में सामान्य लोगों से अधिक प्रसन्नता भी उनको होती है। जहां आमजन अपनी खुशी में खुश होता है तो आध्यात्मिक लोग दूसरों को खुश देकर अधिक खुश होते हैं। यही भाव सभी लोगों को रखना चाहिये जो कि आज के समय की मांग है और जिसके प्रेरक भगवान श्रीराम हैं।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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जिन्दगी मुश्किल बना देते हैं-हिन्दी शायरी (zindagi mushkil bana dete hain-hindi shayari)


जिनको शासन मिला है विरासत में
वह बड़े शासक बनना चाहते हैं,
जो शासित हैं
वह भी शासक बनने का ख्वाब पाले
जिंदगी में लड़े जा रहे हैं,
कमबख्त! जिस जिंदगी को
आसानी से जिया जा सकता है
लोग खुद जंग लड़कर
उसे मुश्किल बना रहे हैं।
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लोग जलाते हैं जो चिराग
वह उसे बुझा देते हैं,
रौशनी के दलाल
अपनी दलाली के लिये
करते हैं अंधेरों का सौदा
रात के अंधेरे में चमकता
कोई तिनका भी राह में दिख जाये
उसे भी पत्थरों के नीचे दबा देते हैं।
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नोटों से भरा है दिल जिनका-हिन्दी कविता (noton se bhara hai dil jinka-hindi poem)


हलवाई कभी अपनी मिठाई नहीं खाते
फिर भी तरोताजा नज़र आते हैं।
बेच रहे हैं जो सामान शहर में
उनकी दवा और सब्जी शामिल हैं जहर में
कहीं न उनके मुंह में भी जाता है
मग़र गज़ब है उनका हाज़मा
ज़हर को अमृत की तरह पचा जाते हैं।
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सुनते हैं हर शहर में
दूध, दही और सब्जी के साथ
ज़हर बिक रहा है,
फिर भी मरने वालों से अधिक
जिंदा लोग घूमते दिखाई दे रहे हैं,
सच कहते हैं कि
पैसे में बहुत ताकत है
इसलिये नोटों से भरा है दिल जिनका
बिगड़ा नहीं उनका तिनका
बेशर्म पेट में जहर भी अमृत की तरह टिक रहा है।
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भूत केवल भारत में नज़र आता है-हास्य कविता (bharat men bhoot-hasya kavita)


पोते ने दादा से पूछा
‘‘अमेरिका और ब्रिटेन में
कोई इतनी भूतों की चर्चा नहीं करता,
क्या वहां सारी मनोकामनाऐं पूरी कर
इंसान करके मरता है,
जो कोई भूत नहीं बनता है।
हमारे यहां तो कहते हैं कि
जो आदमी निराश मरते हैं,
वही भूत बनते हैं,
इसलिये जहां तहां ओझा भूत भगाते नज़र आते हैं।’’

दादा ने कहा-
‘‘वहां का हमें पता नहीं,
पर अपने देश की बात तुम्हें बताते हैं,
अपना देश कहलाता है ‘विश्व गुरु’
इसलिये भूत की बात में जरा दम पाते हैं,
यहां इंसान ही क्या
नये बनी सड़कें, कुऐं और हैंडपम्प
लापता हो जाते हैं,
कई पुल तो ऐसे बने हैं
जिनके अवशेष केवल काग़ज पर ही नज़र आते हैं,
यकीनन वह सब भूत बन जाते हैं।’’
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हिन्दी के अखबार-हिन्दी दिवस पर व्यंग्य कविता (hindi ke akhbar-hindi diwas par vyangya kavita)


अखबार आज का ही है
खबरें ऐसा लगता है पहले भी पढ़ी हैं
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

ट्रेक्टर की ट्रक से
या स्कूटर की बस से भिड़ंत
कुछ जिंदगियों का हुआ अंत
यह कल भी पढ़ा था
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

भाई ने भाई ने
पुत्र ने पिता को
जीजा ने साले को
कहीं मार दिया
ऐसी खबरें भी पिछले दिनों पढ़ चुके
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

कहीं सोना तो
कहीं रुपया
कहीं वाहन लुटा
लगता है पहले भी कहीं पढ़ा है
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

रंगे हाथ भ्रष्टाचार करते पकड़े गये
कुछ बाइज्जत बरी हो गये
कुछ की जांच जारी है
पहले भी ऐसी खबरें पढ़ी
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

अखबार रोज आता है
तारीख बदली है
पर तय खबरें रोज दिखती हैं
ऐसा लगता है पहले भी भी पढ़ी हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।
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