Tag Archives: हिन्दी कविता

सिक्कों के खेल में-हिन्दी कविता


इश्क आसान है
अगर दिल से करना जानो तो
जिस्म से ज्यादा रूह को मानो तो
जहां कुछ पाने की ख्वाहिश पाली दिल में
सौदागरों के चंगुल में फंस जाओगे।
कहें दीपक बापू
कोई दौलत पाता है,
कोई उसे गँवाता है,
सिक्कों के खेल में
किसका पेट भरता है,
आम इंसान की ज़िंदगी
कभी कहानी नहीं बनती
चाहे जीता या मरता है,
किसी को होंठों से चूमना,
हाथ पकड़कर साथ साथ घूमना,
दिल का दिल से मिले होने का सबूत नहीं है,
जज़्बात बाहर दिखाये कोई ऐसा भूत नहीं,
इंसान के कायदे अलग हैं,
जिंदगी के उसूल अलग हैं,
करीब से जब जान लोगे
तभी सारे जहां पर हंस पाओगे।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com
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कहीं धीमा चलना है कहीं तेज़-हिन्दी कविता


ज़िंदगी के रास्ते
कहीं समतल हैं
कहीं टूटे हैं पुल 
कहीं कीचड़ है
कभी धीमा चलना है
कभी तेज चलना है।
हम मंज़िल तय कर सकते हैं
हालतें तय करती हैं
हमारी सवारी का साधन
जहां हमने तय किया
जज़्बातों के सहारे चलने का
वहाँ हादसों का खतरा है,
सच यह है
इंसान के हाथ में कुछ नहीं है
सिवाय खुद को काबू रखने के,
बेकाबू लोगों को गड्ढों में गिरते हमने देखा है।
————–
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

नये चेहरे की तलाश-हिन्दी कविता (search of new face-hindi poem)


जमाने को रास्ता बताने के लिए
हर रोज एक नया चेहरा क्यों चाहिए,
इंसानों को इंसानों से बचाने के लिए
रोज किसी नए चौकीदार का पहरा क्यों चाहिए,
यकीनन इस धरती पर लोग
कभी भरोसे लायक नहीं रहे
वरना कदम दर कदम
धोखे से बचने के लिए एक ईमानदार क्यों चाहिए।
——————
आओ
बेईमानों की भीड़ में
कोई ऐसा आदमी ढूंढकर
पहरे पर लगाएँ,
जिसकी ईमानदारी के चर्चे बहुत हों,
धोखा दिया हो
मगर कभी पकड़ा नहीं गया हो।
पुराने बदनाम हैं
इसलिए उसका चेहरा भी नया हो।

________________

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
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पद में मदांध आदमी-हिन्दी कविता


उसने कहा
‘हम जमाने को बदल देंगे।’
हम मुस्करा दिये।
उसने कहा
‘हम हर इंसान को खुश कर देंगे।’
हम मुस्करा दिये।
उसने कहा
‘बस, एक बार पद पर बैठ जाने दो
हम अपनी ताकत दिखा देंगे।’
हम मुस्करा दिये।

बोलने में ताकत कहां लगती है
मगर जब करने की ताकत आती है
तो फिर दिखाता कौन कहां है
पद में मदांध आदमी
एक शब्द बोलने पर भी
कत्ल कर सकता है
इस ख्याल ने डरा दिया
बस, हम यूं ही मुस्करा दिये।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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आसमान से रिश्ते तय होकर आते हैं-हिन्दी कविताएँ


उधार की रौशनी में
जिंदगी गुजारने के आदी लोग
अंधेरों से डरने लगे हैं,
जरूरतों पूरी करने के लिये
इधर से उधर भगे हैं,
रिश्त बन गये हैं कर्ज जैसे
कहने को भले ही कई सगे हैं।
————–
आसमान से रिश्ते
तय होकर आते हैं,
हम तो यूं ही अपने और पराये बनाते हैं।
मजबूरी में गैरों को अपना कहा
अपनों का भी जुर्म सहा,
कोई पक्का साथ नहीं
हम तो बस यूं ही निभाये जाते हैं।
————–
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

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‘काश! हमारी किस्मत भी परिंदों जैसी होती’-हिन्दी शायरी


ऊपर उठ कर आसमान छू लेने की
चाहत किसमें नहीं होती
पर परिंदों जैसी
किस्मंत सभी की नहीं होती
उड़ते हैं आसमान में
पर उसे छू कर देखने की
ख्वाहिश उनमें नहीं होती
उड़ नहीं सकता आसमान में
फिर भी इंसान की
नजरें उसी पर होती
उड़ते हुए परिंदे
आसमान से जमीन पर भी आ जाते
पर इंसान के कदम जमीन पर होते
पर ख्याल कभी उस पर नहीं टिक पाते
लिखीं गयी ढेर सारी किताबें
आकाश के स्वर्ग में जगह दिलाने के लिए
जिसमें होतीं है ढेर सारी नसीहतें
पढ़कर जिनको आदमी अक्ल बंद होती
अपने पैर में जंजीरें डालकर
आदमी फिर भी कहता है
‘काश हमारी किस्मत भी परिंदों जैसी होती’
———————————–

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चाणक्य नीति:सात को जगाएं और सात को नहीं


१.विद्यार्थी, नौकर, राहगीर, भूखा, भय से ग्रस्त, भंडारी तथा द्वारपाल सो रहे है तो उन्हें जगाना चाहिऐ, क्योंकि इनका कर्तव्य जागने पर ही पूरा होता है।
२.राजा, बालक, दूसरे का कुता, मूर्ख व्यक्ति, सांप, व्याघ्र और सूअर इन सात सोते हुओंको कभी भी नहीं जगाना चाहिए। इनके जागने से मनुष्य को हानि ही होगी। इनके आक्रमण से रक्षा करना कठिन होता है । अत: अच्छा यही है की यह सो रहे हों तो इन्हें जगाना नहीं चाहिए।
३.अपने आचरण के बिना ज्ञान व्यर्थ है और अज्ञानी मनुष्य को तो जीवन ही व्यर्थ है। सेनापति के बिना सेना व्यर्थ है और पति के बिना पत्नी का जीवन व्यर्थ है।
४.सदगुणरहित व्यक्ति की सुन्दरता व्यर्थ है। दुराचारी पुरुष का अच्छे वंश में उत्पन्न होना, आजीविका सुलभ न करने वाली विद्या और उपभोग में न आने वाला धन व्यर्थ है। इनकी कोई उपयोगिता होने के कारण महत्त्व नहीं रहता।

सब रंग देखो दृष्टा बनकर


नाम है हीरो
बहादुरी में जीरो
पर्दे पर बडों-बडों की करते छुट्टी
लोगों को पिलाते बहादुरी की घुट्टी
पर पर्दे के पीछे छोटे विलेन भी
अपने मुताबिक उनको नचवाते
चाहे जहाँ चाहे जैसा
नृत्य और गीत गंवाते
उनके इशारे ऐसे होते की
साइड रोल में आ जाता हीरो
जो पूछो कोई सवाल तो
परदे पर मजबूरों और गरीबों के
लिए जोर से गरजने वाला
मजबूरी जताता है हीरो
देखने वाले रहें भ्रम में
पर पढ़ने वाले जानते हैं
कौन है पर्दे का कौन है और
कौन है पर्दे के पीछे का हीरो
———————————
छोटे पर्दे पर भी
नजर आते है तमाम विरोधाभासी दृश्य
देखकर हैरान होता है मन
कोई हीरो कहता है ‘संतुष्ट नहीं हो जाओ’
कोई संत कहैं’संतोष है सबसे बड़ा धन’
बच्चे ने पूछा अपने दादा से
‘आप ही करो हमारी शंका का निवारण
राम को माने या देखें रावण
जंग में कूदें या ढूंढें अमन’
दादा ने कहा
‘हीरो तो पैसा लेकर बोलता है
संत सच्चा है तो ग्रंथों से
रहस्य खोलता है
इस रंग बदलती दुनिया में
सब रंग देखो दृष्टा बनकर
तो दिल और दिमाग में रहेगा अमन
नीयत में हो तो जिन्दगी में खिलेगा
सच का चमन

सुनो सबकी करो मन की


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जिनके पास नही कोई ज्ञान
वही पा रहे ज्ञानी का सम्मान
वैद, पुराण और शास्त्र जिन्होंने कभी
समझना तो दूर पढे भी न होंगे
लोगों में करते उनका बखान

कभी सुनकर हैरानी होती है कि
क्या वह सब लिखा है ग्रंथों में
जो सुनते उनका ज्ञान
या कुछ हमसे ही पढने में छूट गया
या चूक गया हमारा ध्यान
कभी कभी तो शक होता है कि
हम कोई और ग्रंथ पढे थे
या तथाकथित ज्ञानियों ने
तथ्य पाने मन से गढे थे
कहीं हम तो नहीं भूल जाते
अपने ही दर्शन का ज्ञान

कहैं दीपक बापू
अपने ही हाथ हैं जिस तरह जगन्नाथ
वैसे ही हमारी बुद्धि है हमारे साथ
किसी के सुने पर इतनी आसान से
यकीन नहीं करते
जब तक जब तक उसकी पुष्टि ना कर लें
खुद ही पढ़कर ग्रंथ
प्राप्त करते हैं ज्ञान
कह गए बडे-बुजुर्ग सुनो सबकी
करो वही जो मन रहा है मान
—————-

विरोधाभास में जीते लोग


NARAD:Hindi Blog Aggregatorअपनों से दूर होते लोग
रिश्तो की डोर को तोड़ते लोग
करते हैं प्यार की बात
समाज मैं एकता की पहल
जोड़ नहीं पाते घर के दिल
तोड़ नही पाते अपने दायरे
करते है दुनिया में शांति की बात
मन मन में लेकर अशांति
जो पास नहीं है उसे बांटने की बात
केवल शब्द ही तो खर्च करना है
जो धन संचय किया
उसे कोई नहीं बाँटता
छिपाने के लिए
लगाता है पूरी ताक़त
अपनी जिन्दगी लगाता है
घर का खजाना भरने में
नारे लगाते है
गरीबी हटाने के लोग
————————
कहने के लिए कुछ भी कहना है
कौन याद रखता है कि
हमने कब कहा क्या था
जो कहा उस राह कौन चलना है
ऐसे ही विरोधाभास में जीते लोग
सवाल सब करते है
जवाब से करते परहेज
अपने शब्द बाण से
दुसरे को घायल करते
अपने घायल होने पर
कराहते लोग
कथनी और करनी में
नहीं रखते अंतर तो
क्यों हैरान होते लोग
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