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कभी हिंदी अपनी कभी पराई-१४ सितम्बर हिंदी दिवस पर कविता


बड़ी हस्ती है जिनकी

पर्दे पर आते हैं तो

अंग्रेजी में गरियाते हैं।

पीछे जाकर

आ जाते असलियत पर

एक दूसरे को

हिन्दी में लतियाते हैं।

कहें दीपक बापू बुद्धि का रिश्ता

जब बुद्धि से नहीं रखना हो

तब पराई भाषा से

शब्द निकालना आसान है

मगर जब समझाना

मुश्किल हो गरीब को

तब वह हिन्दी में बतियाते हैं।

—————————- 

 

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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साईं बाबा के भक्तों की आस्था के विरुद्ध अभियान पर सवाल और बवाल-हिंदी चिंत्तन लेख


             आज तक एक बात समझ में नहीं आई कि धर्म और अध्यात्मिक ज्ञान के बीच कोई संबंध है या नहीं? कुछ कथित धर्म विशेषज्ञ अपने अध्यात्मिक ज्ञानी होने का दावा करते हैं पर प्रवचन सांसरिक विषय पर देते हैं। अनेक कथित धर्मभीरु योद्धा  आध्यात्मिक पुरुष होने का दावा करते हुए समाज में अस्त्रों शस्त्रों की मदद से शांति तथा नैतिकता लाने का प्रयास करते हैं।  अनेक लोग द्रव्यमय यज्ञ को ही धर्म का प्रतीक मानते हैं तो अनेक ज्ञान से ही धर्म की रक्षा करना संभव मानते हैं।  कौन धार्मिक और कौन अध्यात्मिक स्वभाव का है यह पहचान किसी को नहीं रही।  इस भ्रमपूर्ण स्थिति ने समाज में अनेक अनेक उपसमूह बना दिये हैं।  श्रीमद्भागवत् गीता ने गुरु महिमा का वर्णन है पर कथित धर्म के ठेकेदार यह पदवी स्वयंभू  धारण कर अपने शिष्यों का एक प्रथक पंथ बना देते हैं। इन्हीं पंथों के बीच श्रेष्ठता की होड़ समाज में तनाव को जन्म देती है और भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान कहंी एक कोने में पड़ा कराह रहा होता है। यह स्थिति अभी शिरडी के सांई बाबा को भगवान न मानने को लेकर प्रकट हुई है।

            एक कथित धर्म संसद में शिरडी के सांई बाबा की मूर्तियां उन मंदिरों से हटाने का निर्णय लिया गया जहां भगवान के दूसरे रूपों की मूर्तियां स्थिति हैं।  इनमें से कुछ ऐसे मंदिरों से सांई बाबा की मूर्तियां हटाई गईं जहां मंदिर के निर्माण के समय ही स्थापित की गयीं थी। वहां भगवान के विभिन्न स्वरूपों की प्रतिमायें स्थापित तो की गयीं पर उस मंदिर की लोकप्रियता बढ़ाने की दृष्टि से सांई बाबा की मूर्ति भी लगाई गयी।  अब यह कहना कठिन है कि ऐसे मंदिरों की लोकप्रियता किस कारण बढ़ी पर एक बात तय है कि अब हटाने से  विवाद बढ़ेगा।

            हम सांई बाबा के भक्त न भी हों पर अगर हमारे अंदर भारतीय अध्यात्म ज्ञान के प्रति रुझान है तो कभी भी किसी की भक्ति पर आक्षेप करना ठीक नहीं लगता।  भारतीय अध्यात्म ज्ञान की धारा में बहने वाले सकारात्मक विचारक होते हैं। वह अपनी मन की बात कहते हैं पर दूसरे को आघात नहीं पहुंचाते।  दूसरे के दोष निकालकर अपने इष्ट के गुणों का प्रचार करना अहंकार के भाव को दर्शाता है। वैसे भी श्रीमद्भागवत गीता में भक्तों के चार प्रकार बताये गयें हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  इसका मतलब यह है कि अगर हम ज्ञान साधक हैं तो  अन्य तीनों भाव वाले भक्तों की उपस्थिति सहजता से मान्य करनी होगी।

            देश में आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में हमेशा ही एक अंतर्द्वंद्व की स्थिति रही है। इसलिये आर्ती तथा अर्थार्थी भाव वाले भक्त जहां अपने मन की शांति मिलने की आशा होती है वहीं जाते हैं।  इन्हें अध्यात्मिक ज्ञान से अधिक अपने सांसरिक विषयों की चिंता रहती है।  उनकी इस प्रवृत्ति का लाभ उठाने वाले कम नहीं हैं।  इस प्रयास में ऐसे लोग भी शािमल होते हैं जिनके हृदय में माया से मिलने का सपना होता हैै पर मुख से राम का जाप करते हुए मिलते हैं। सांई बाबा भगवान नहीं थे हम यह मानते हैं पर  जो भगवान मानते हैं उनका मन दुखाने वालों को ज्ञानी नहीं कह सकते।  ऐसे लोग वेदों से श्लोक लाकर लोगों के बीच अपनी विद्वता प्रचारित कर रहे हैं पर श्रीमद्भावगत् गीता से मुंह छिपा रहे हैं।  उसमें साफ लिखा है कि कुछ भक्त मुझे सीधा न पूजकर देवताओं और प्रेतों की पूजा करते हैं वह अंततः मेरक  ही भक्त हैं और मैं उनको उनकी इच्छानुसार कुशलक्षेम उपलब्ध करा देता हूं। ऐसे भक्तों को ज्ञानी से कमतर अवश्य माना गया है पर हार्दिक भाव होने पर उनके प्रति भी सद्भाव दिखाना आवश्यक दिखाया गया है।

            चाणक्य कहते हैं कि ज्ञानियों का भगवान सर्वत्र व्याप्त है।  हमारा मानना है कि भगवान भी भक्तों से बनता है।  श्रीकृष्ण भगवान ने स्पष्ट कहा है कि सच्चा भक्त मेरा ही रूप है। ऐसे में ज्ञानियों के लिये भी सांई बाबा भगवान नहीं है पर उनके भक्तों को देखकर यह आभास तो होता ही है उनकी पूजा की निंदा करना अपने अज्ञान का प्रमाण देना है।

            हमारा मानना है कि सांईबाबा की लोकप्रियता उनके ज्ञान के नहीं वरन् सांसरिक विषयों में चमत्कार के कारण बनी है। उनके भक्त भी यही मानते हैं कि हम उनकी पूजा अपने जीवन में चमत्कार की आशा या संभावना से ही कर रहे हैं।  वह फकीर थे पर उनके भक्त ही बताते हैं कि अंतिम समय में उन्होंने अपने सोने के सिक्के अपने एक परम भक्त को सौंपे थे।  इसका मतलब वह भी कहीं न कहीं संग्रह करते थे और यह बात फकीर की उपाधि धारण करने वाले व्यक्ति पर जमती नहीं पर बात आकर वहीं अटकती है  कि उनके भक्तों की भक्ति पर हमला करना ठीक नहीं।  सांईबाबा के विरुद्ध चलाया गया अभियान सात्विक कर्म नहीं है। जो इसे चला रहे उनकी प्रवृत्तियां राजसी हैं और कहीं न कहीं अपना अज्ञात लक्ष्य पूरा करने के लिये प्रयासरत हैं। इस विषय में हिन्दू धर्म से जुड़े बुद्धिमान लोगों का मौन रहना अब ठीक नहीं लगता।  हमने देखा है कि हिन्दू धर्म के स्वतंत्र विचारक इस विवाद से दूर रहना चाहते हैं पर उन्हें यह समझना चाहिये कि सांई बाबा के भक्तों के भाव पर आघात भारतवर्ष की एकता को प्रताड़ित करना होगा।  सांई भक्त भारतीय धर्मों से अलग नहीं है।  वह ऐसा कुछ नहीं कर रहे जिसे भारतीय अध्यात्मिक दर्शन आहत हो जबकि  उनके विरोधी श्रीमद्भागवत गीता और वेदों की चर्चा करते हैं पर आचरण ठीक उसके विपरीत है। हिन्दू धर्म से जुड़े वह विद्वान जिन्हें अपने ज्ञान से दान नहीं चाहिये उन्हें अब अपनी बात स्पष्तः रखनी चाहिये ताकि इस विवाद से समाज में हानि उत्पन्न न हो।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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आधुनिक लोकतंत्र से मेल करती धार्मिक संस्थायें-हिन्दी चिंत्तन लेख


            भारत में अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार भक्ति के साकार और निराकार दो रूप माने गये हैं।  इसका कारण यह है कि निरंकार की भक्ति केवल ज्ञानी कर सकते हैं जबकि सामान्य मनुष्य साकार भक्ति से ही सहजता का अनुभव करता है।  हालांकि भ्रमवश कहा जाता है कि भारतीय धर्म मूर्तिपूजा के समर्थक हैं पर अध्यात्मिक साधक यह जानते हैं कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन किसी भी अन्य की अपेक्षा कहीं अधिक परिपूर्ण है इसी कारण ही उसमें दोनों धाराओं को समान महत्व दिया गया है।

            बहरहाल साकार भक्ति करने वालों की इंद्रियां बाहर अधिक सक्रिय रहती हैं जिसका लाभ व्यवसायिक लोग आसानी से उठाते हैं।  यही कारण है कि हमारे समाज में सदियों से धार्मिक कार्यक्रमों की भी दो धारायें चलती आयी हैं एक तो एकांत साधना और दूसरा सत्संगहै-यानी सामूहिक रूप से साधना जिसे पेशेवर लोग संचालित करते हुए समाज में श्रेष्ठ कहलाने के साथ ही धन भी प्राप्त करते हैं।  हम यहां किसी के पेशेवर होने पर आक्षेप नहीं कर रहे क्योंकि कहीं न कहीं यह लोग भी जाने  अनजाने भारतीय अध्यात्म दर्शन की वह धारा प्रवाहित करते रहे जिससे वह अभी तक बहता चला आ रहा है।

            हम तो इसी पेशेवर धार्मिक धारा के उस पक्ष पर चर्चा कर रहे हैं जो वाकई दिलचस्प है।  जब हम छोटे थे तो संतों के साथ महाराज, गुरुजी तथा स्वामी जी जैसी उपाधियां लगी देखते थे।  उस समय महाराज शब्द राजाओं के लिये प्रयुक्त होता था और अधिकतर सामूहिक धार्मिक धारा के वाहक यही उपाधि ग्रहण करते थे। अब लोकतंत्र आ गया है तो सरकार शब्द अधिक लोकप्रिय हो गया है।  अनेेक नये धार्मिक शिखर पुरुषों के शिष्य उनके साथ सरकार शब्द का प्रयोग करते हैं।  पहले राजाओं के दरबार होते थे हमारे पेशेवर संत भी लगाते थे। हमारे लोकतंत्र में भारतीय संसद का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। उसकी लोकप्रियता देखकर अब धार्मिक पेशेवर अपने सम्मेलनों को संसद कहने लगे हैं।  इतना ही नहीं अनेक कथित महापुरुष तो अब अपना जन्मदिन भी मनाने लगे हैं ताकि अपने शिष्यों के समूह का प्रदर्शन कर समाज में अपना प्रभाव बनाया जा सके।

            ब्रिटेन की एक संस्था ने भारतीय धार्मिक संस्थाओं के बारे में कहा था कि वह व्यवसायिक कंपनियों की तरह चलती हैं। उस समय कुछ लोगों ने विवाद खड़ा किया पर सच यही है कि हमारे देश में पेशेवर धारा की धार्मिक संस्थाओं ने  जिस तरह अपने संगठन का संचालन किया है वह बिना प्रबंध कौशल के संभव नही है। यह अलग बात है कि कोई इसे स्वीकार नहीं कर सकता। सच बात तो यह है कि हिन्दी पत्र पत्रिकाओं की लोकप्रियता अब नहीं बढ़ रही है तो इसका कारण इन्हीं धार्मिक संस्थाओं के प्रकाशन है जो समर्पित शिष्यों के माध्यम से आमजन के पास पहुंचती है। कहा जाता है कि  अनेक धार्मिक शिखर पुरुषों की  संस्थायें छद्म रूप से अपने टीवी चैनल भी चला रही हैं।

            हम यह तत्वज्ञान की चर्चा नहीं कर रहे पर इतना मानते हैं कि इस तरह के व्यवसायिक प्रयास आमजन के हृ  दय तक नहीं पहुंच पाते।  आमजन एकांत में स्वाध्याय या चिंत्तन करना नहीं चाहते पर अध्यात्मिक की भूख भी उनको लगती है। इसलिये वह इन पेशेवर धार्मिक गुरुओं के पास चला जाता है। वहां कथा के दौरान नृत्य, संगीत और भजन सुनकर भी उसे कुछ देर स्वयं ही इर्दगिर्द बुने सांसरिक जाल से मुक्ति मिल जाती है। यह एक तरह से मनोरंजन का रूप ही होता है।  योग विज्ञान की दृष्टि से इस तरह का परिवर्तन भी क्षणिक रूप से ही सही लाभदायक तो होता ही है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
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