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बाज़ार के शब्द-हिन्दी व्यंग्य कविताये


किताबों में प्रकाशित

समूह में एकत्रित शब्द

हमेशा कुछ बोलते हैं।

पढ़ने वालों ने

कितना पढ़ा

कितना समझा पता नहीं

अर्थ की लाचारी कितना छिपायें

उनके शब्द ही राज खोलते हैं।

कहें दीपक बापू बाज़ार के शब्द

कभी ज्ञानहीन होते हैं,

दाम पाने की नीयत में

बड़े ही दीन होते हैं,

यह अलग बात है कि

हृदय में कामनाओं के साथ

सौदागर अर्थहीन शब्द

प्रचार करते डोलते हैं।

——————-

मन में दबी आशायें

खुली आंखों से सपना

देखंने की आदत

मानव को नशा करने का

आदी बना  देती हैं।

आकाश में उड़ने की

नाकाम कोशिश

पूरी जिंदगी बर्बादी से

सना देती हैं।

कहें दीपक बापू टूटते हुए

दौलत से ऊब रहे हैं,

बोतलों के नशे में डूब रहे हैं,

उनकी लाचारियां

दिवालियों को भी

दौलतमंद बना देती हैं।

———————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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आस्था की आड़ में अभिव्यक्ति की आज़ादी सीमित रखना अनुचित-हिन्दी चिंत्तन लेख


            फ्रांस में शार्ली हेब्दो पत्रिका पर हमले से मध्य एशिया के उन्मादी समूहों को बरसों तक प्रचारात्मक ऊर्जा मिलेगी।  पहले यह ऊर्जा सलमान रुशदी की पुस्तक के बाद उन पर ईरान के एक धार्मिक नेता खुमैनी के फतवे से मिली थी।  इसके बाद मध्य एशिया का धार्मिक उन्माद बढ़ता ही गया।  वह धार्मिक नेता बरसों तक अमेरिका में रहा और उसी ने ही ईरान की राजशाही के बाद धार्मिक ठेकेदार होने के साथ ही वहां के शासन को भी अपने हाथ में ले लिया। प्रत्यक्ष अमेरिका का खुमैनी से कोई संबंध नहीं दिखता था मगर उसके नेतृत्व में उस समय ईरान में राजशाही के विरुद्ध चल रहे लोकतात्रिक आंदोलन से उसकी सहमति थी। राजशाही के पतन के बाद वहां खुमैनी के धार्मिक नेतृत्व में बनी सरकार कट्टरपंथी ही थी। दिखाने के लिये अमेरिका ने ईरान में लोकतंत्र स्थापित किया पर सच यह है कि वहां एक उस व्यक्ति को सत्ता मिली जो बाद में उसका   दुश्मन बना।

            धार्मिक उन्मादी प्रचार के भूखे होते हैं।  जिस तरह चार्ली हेब्दों के कार्टूनिस्टों की हत्या हुई है वह मध्य एशिया के धर्म की ताकत बनाये रखने के लिये की गयी है जो केवल प्रचार से मिलती है।     इस धार्मिक उन्माद का सामना करने के लिये पूरे विश्व में धार्मिक आस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक ही रूप रखना चाहिये।  यह नहीं हो सकता कि एक देश में आस्था के नाम पर किसी धर्म पर कटाक्ष अपराध तो किसी में एक सामान्य प्रक्रिया मानना चाहिये।  हमारे देश में स्थिति यह है कि भारतीय धर्मोंे पर आक्रमण तो एक सामान्य प्रक्रिया और दूसरे धर्म पर कटाक्ष अपराध मानने की प्रचारजीवियों की प्रवृत्ति हो गयी है।  समस्या यह है कि भारतीय धर्म के ठेकेदार भी कर्मकांडों के ही संरक्षक होते हैं और अध्यात्मिक ज्ञान को एक फालतू विषय मानते हैं।  अध्यात्मिक ज्ञानी अंतर्मुखी होते हैं इसलिये कटाक्ष की परवाह नहीं करते कर्मकांडियों बहिर्मुखी होने के कारण चिंत्तन प्रक्रिया से पर होते इसलिये कटाक्ष सहन नहीं कर पाते।  हमारा तो यह मानना है कि विदेशी विचाराधाराओं के मूल तत्वों पर कसकर टिप्पणी हो सकती है और सहज मानव जीवन के लिये  भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा पर चलने के अलावा कोई विकल्प हो ही नहीं सकता, पर यह ऐसी सोच संकीर्ण मानसिकता की मानी जाती है।  हम इस पर बहस कर सकते हैं और कोई कटाक्ष करे तो उसका शाब्दिक प्रतिरोध भी हो सकता है पर कर्मकांडी किसी कटाक्ष को सहन नहीं करना चाहते। वह बहस में किसी अध्यात्मिक ज्ञानी का नेतृत्व स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिये चिल्लाते हैं ताकि शोर हो जिससे वह प्रचार प्रचार पायें।

            फ्रांस की चार्ली हेब्दो पत्रिका पर हमले को सामान्य समझना उसी तरह भूल होगी जैसे सलमान रुशदी की किताब पर ईरान के धार्मिक तानाशाह खुमैनी के उनके खिलाफ मौत की फतवे को मानकर की गयी थी। शिया बाहुल्य होने के कारण ईरान के वर्तमान शासक  मध्य एशिया में प्रभावी गुट के विरोधी हैं पर वह इस हत्याकांड की निंदा नहीं करेंगे क्योंकि कथित धार्मिक आस्था पर आक्रमण पर स्वयं ही हिंसक कार्यवाहियों के समर्थक हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि इस विषय पर मध्य एशिया की विचारधारा पर बने सभी समूह वैचारिक रूप से एक धरातल पर खड़ मिलेंगे।

            इनका प्रतिकार वैचारिक आक्रमण से किया जा सकता है पर अलग अलग देशों  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नियमों में विविधिता है। जहां आस्था के नाम पर छूट है वहां बहस की गुंजायश कम रह जाती है। इसलिये फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों के बुद्धिमान सीधे धार्मिक अंधवश्विास पर आक्रमण करते हैं जबकि एशियाई देशों में  दबी जुबान से यह काम होता है। भारत में तो यह संभव ही नहीं है।  आज भी हमारे देश के बुद्धिजीवी दिवंगत कार्टूनिस्टों की मौत पर सामान्य शोक जरूर जता रहे हैं पर अपने यहां आस्था के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी सीमित रखने का विरोध नहीं कर रहे। शायद उनके लियं यहां भारतीय धर्मों में ही दोष हैं जिन पर गाह बगाहे वह हंसते ही हैं।  कट्टर धार्मिक विचाराधाराओं के विरुद्ध वैचारिक अभियान में पश्चिमी देशों का अनुसरण हमारे देश के बुद्धिजीवी करना ही नहीं चाहते। संभवत भारतीय प्रचार माध्यम सनसनी के सतही आर्थिक लाभ से संतुष्ट हैं और चाहते हैं कि यहां वैचारिक जड़ता बनी रहे।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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कोई पीके ही एलियन के अंधविश्वास पर विश्वास कर सकता है-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन


          हमने पीके फिल्म न देखी है न देखेंगे पर उसे देखने वाले दर्शक जिस तरह बता रहे हैं उसमें हमारी पहली आपत्ति तो धर्म की आड़ में एक प्रेम कहानी थोपने दूसरी गाय को घास खिलाने के विरोध दिखाने की बात पर है। हमने ओ माई गॉड फिल्म में भारतीय धर्म के अंधविश्वास का विरोध करने के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता के विश्वास की स्थापना का प्रयास होने के कारण उसका समर्थन किया था। उसमें युवक युवती की शारीरिक जरूरतों को इंगित करती हुई कहानी नहीं थी।  शिवलिग पर दूध चढ़ाने पर कटाक्ष भी तार्किक ढंग से किया गया था।  कोई बता रहा था कि पीके गाय को घास खिलाने पर भी कटाक्ष किया गया है।  इससे हमारा विरोध है। मुंबईया फिल्म में अधिकतर शराब और शवाब की छाप बदलकर उपभोग करने की प्रवृत्तियां प्रचारित की जाती हैं।  फिल्म में काम करने वालों प्रसिद्ध लोगों  के चरित्र ही नहीं वरन् परिवार भी आदर्श नहीं रह पाते।  उपभोग के प्रेरक कभी योग के संदेशवाहक बने यह अपेक्षा हम नही रखतें है, उनको धर्म कर्म की बातों पर सोच समझकर पटकथायें लिखनी चाहिये। कभी गाय के सामने  रोटी या घास पेश कर उसे खाकर तुप्त होकर सुख उठाना ऐसे लोग नहीं जानते जिन्हें शब्दों और चित्रों का व्यापार करना है।  हम यहां यह भी बता दें पाश्चात्य विचारों में फंस ऐसे लोग यह मानते हैं कि यह संसार केवल मनुष्यों के लिये ही है।  जबकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार यहां पशु पक्षी भी महत्वपूर्ण है।  श्रेष्ठ जीव होने के कारण मनुष्य का यह दायित्व है कि प्रकृति संसाधनों के साथ ही वन, पशु तथा पक्षी संपदा की रक्षा करते हुए विकास करे।

        हम सुबह घर के बाहर चबूतरे पर योग साधना करते हैं तब अक्सर गायें खड़ी होकर देखती रहती हैं।  वह जिस मासूमियत से निहारती है उससे मन द्रवित हो  जाता है उनको रोटी या खाने की दूसरी सामग्री दे ही देते हैं।  खाने के बाद वह एक दृष्टि हम पर डालकर चली जाती हैं तब होठों पर अचानक ही मुस्कराहट आ जाती है।  उस सुख का शब्दों में वर्णन करना कठिन है।  पीके फिल्म हमने नहीं देखी फिर भी इस पर टिप्पणी करना हम उसी तरह नैतिकता का प्रतीक मानते हैं जैसे चलचित्र निर्माता निर्देशक पशु पक्षियों को खिलाये पिलाये बिना ऐसे कर्म में लोगों का मजाक बनाते हैं। इतना ही नहीं भारतीय धर्म ग्रंथों के पढ़े बगैर वह सुनी सुनाई बातों के आधार पर समाज का चरित्र तय कर लेते हैं।

     हमारे एक मित्र ने हमसे कहा-‘चलो, तुम्हें पीके दिखा दूं।’’

    हमने कहा-‘‘पीके हमने देख लिया है। कोई मजा नहीं आता।’’

    वह बोला-‘‘मैं फिल्म पीके की बात कर रहा हूं।’’

    हमने कहा।-‘‘उस पर पैसे खर्च करने से अच्छा है खाने पीने पर ही खर्च करें।’’

     वह बोला-‘‘पैसे मैं खर्च करूंगा।’’

     हमने कहा-‘समय तो खर्च होगा। आंखों को तकलीफ भी होगी। इससे अच्छा है अंतर्जाल पर दो चार बेसिरपैर की कवितायें ही लिखकर जश्न मनायें।’

    वह चला गया पर हम पर तनाव का बोझ डाल गया।  हमारे पास इसके निवारण का  एक ही उपाय रहा  कि कुछ इस पर लिख डालें। वही हम कर रहे हैं।  इस पर कोई कविता समझ में नहीं आ रही। कोई व्यंग्य भी बनाने का सामर्थ्य नहीं लग रहा।

 

चाकलेटी चेहरे वाले

उपभोग जगत में

इस कदर छाये

कभी वस्त्रहीन होकर

कभी सामने पीके आये।

कहें दीपक बापू भाग्य की बात

भांडों का जमाना है,

अपनी अदाओं से

उनको कमाना है,

नशे का विरोध करते हुए

समाज सुधारने के लिये

नारे लगाते

उनका हर कम

अभिनय कहलाता

हम समझायें तो

कहा जाता है यह पीके आये।

——————-

            इस सर्दी में कहीं जाने का मन नहीं कर रहा था।  सोचा किस तरह दिमाग में गर्मी लायें। पीना छोड़ दिया है इसलिये बोतल को हाथ लगा नहीं सकते।  इसलिये ऐसी सोच बना ली जैसे हम पीके आये। तभी यह बिना सिर पैर का लघु व्यंग्य लिख पाये।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
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तत्वज्ञान ही वास्तविक जीव विज्ञान है-हिन्दी चिंत्तन लेख


            हमारे देश में अंग्रेजी विद्वान लार्ड मैकाले की उस शिक्षा पद्धति से छात्रों को अध्ययन कराया जा रहा है जो केवल पूंजीस्वामियों के बंधुआ बनने की योग्यता प्रदान करती है।  उपलब्धि के नाम पर सुविधाओं का उपभोग ही जीवन का लक्ष्य सुझाती है।  इस समय शिक्षा पद्धति में बदलाव बहस चल रही है तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के तत्वों का उसमें समावेश करने का यह कहते हुए विरोध हो रहा है कि इसमें केवल भारतीय धर्म का प्रचार है जिससे देश में रह रहे अन्य विचारधाराओं को मानने वाले आहत हो सकते हैं।

            एक विद्वान ने पाश्चात्य जीव विज्ञान की सीमा बताते हुए कहा था कि उसमें केवल जीव की देह निर्माण और संचालन के सिद्धांत हैं पर मन के साथ बुद्धि तत्वों के सूत्रों का उसमें वर्णन नहीं होता। मन और बुद्धि के ज्ञान के  बिना पाश्चात्य जीव विज्ञान अधूरा है। इसी मन और विज्ञान के सूत्रों पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में विस्तृत प्रकाश डाला गया है जिसके बिना कोई भी शिक्षार्थी पाश्चात्य संस्कारों से पैदा अंधेरे से बाहर निकल नहीं सकता।  भोग का कोई अंत नहीं है। एक वस्तु प्रयास करने पर पाओ दूसरे की आवश्यकता अनुभव होने लगती है। एक बार सुबह खाना खाओ तो दोपहर और उसके बाद शाम के खाने की चिंता भी साथ लग जाती है। भोजन, वस्त्र और भवन के संग्रह को ही श्रेष्ठ व्यक्ति होने का प्रमाण मान लेना अज्ञान के अंधेरे में ही भटकना है।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

——————

सहस्त्रोपृलुत्य दुष्टेभ्यो दुष्करं सम्पदाजर्जनाम्।

उपायेन पदं मूर्धिन न्यास्यतो मतहास्तिनाम्।।

            हिन्दी में भावार्थ-हजारों दुष्टो से उपद्रव को प्राप्त होने से उन पर आक्रमण कर संपत्ति का अर्जन करना कठिन है पर उपाय से तो मतवाले हाथियों के मस्तक पर भी पांव रख दिया जाता है।

वाह्यमानमयःखण्डं स्कन्धनैवापि कृन्ताति।

तदल्पमपि धारावद्धवर्तीप्सितसिद्धये।।

            हिन्दी में भावार्थ-कंधे पर भार के रूप में लदा लोह नहीं काटता पर उससे बना तीखी धारा वाला हथियार कम भारी होने पर भी कष्ट देता है।

            हम अक्सर भारतीय धर्म की रक्षा की बात करते हैं। इतना ही नहीं अनेक उत्साही तो शस्त्र और धन के सामर्थ्य से धर्म के विस्तार की बात करते हैं। उन्हें यह बात समझ लेना चाहिये कि किसी भी समाज की शक्ति उसके सदस्यों की बृहद संख्या नहीं वरन् उनकी कार्य करने की क्षमता है। इस मामले में यहूदियों से सीखा जा सकता है। हिटलर के अनाचारों के बाद वह फिर संगठित हुए और आज इजरायल नाम का एक छोटा राष्ट्र बनाकर पूरे विश्व में प्रभाव रखते हैं।  अपने पड़ौसी देशों की उग्रवादी निर्ममता के विरुद्ध न केवल संघर्षरत हैं वरन् अन्य देशों को भी आतंकवाद से लड़ने में इजरायल सहयोग कर रहा है। वहां की प्रशासन व्यवस्था जनहित के अनुकूल है इसलिये वहां के नागरिक अपने देश के प्रति अत्यंत संवेदनशील रहते हैं।

            हम जब धर्म रक्षा की बात करते हैं तो एक बात याद रखना चाहिये कि मनुष्य अपनी दैहिक आवश्यकताओ के पूर्ण होने के बाद ही मानसिक रूप से दृढ़ हो सकता है। इसके लिये यह जरूरी है कि उसके पास अध्यात्मिक ज्ञान हो।  यह ज्ञान हमारे प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से ही मिल सकता है।

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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गंदगी के ढेर आंखों को दहलाते हैं-2 अक्टूबर महात्मा गांधी जयंती पर भारत स्वच्छता अभियान पर विशेष हिन्दी कविता


हर शहर में

ऊंचे और शानदार भवन

सीना तानकर खड़े हैं।

आंखें नीचे कर देखो

कहीं गड्ढे में सड़क हैं

कहीं सड़कों पर गड्ढे

पैबंद की तरह जड़े हैं।

कहें दीपक बापू खूबसूरत

शहर बहुत सारे कहलाते हैं,

कूड़े के  मिलते ढेर भी

आंखों को दहलाते हैं,

विकास की दर ऊपर

जाती दिखती जरूर है

मुश्किल यह है कि

हमारी सोच स्वच्छ नहीं हो पाती

गंदी सांसों में फेर में  जो पड़े हैं।

—————————-

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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लोकतंत्र में मतदान दलों की होती है महत्वपूर्ण भूमिका-हिन्दी चिंत्तन लेख


     चुनावों में सूक्ष्म प्रेक्षक की भूमिका  निभाते हुए अत्यंत रोचक अनुभव होता है।  दरअसल इस रूप में हाथ से अधिक काम करना  नहीं होता वरन् मतदान केंद्रों पर सतत अपनी आंख जमाये चुनाव प्रक्रिया देखना ही होती है ताकि चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र ढंग से हो सकें।  हमारी नियुक्ति अनेक बार मतदान दलों में पीठासीन अधिकारी तथा मतदान अधिकारी क्रमांक एक में रूप में पहले भी हो चुकी है पर अब सूक्ष्म प्रेक्षक के रूप में जाना ही होता है।  यह अलग बात है कि पीठासीन या मतदान अधिकारी के रूप में दैहिक तथा मानसिक सक्रियता इतनी हो जाती है कि बाकी चीजों पर ध्यान नहीं जाता जबकि सूक्ष्म प्रेक्षक जहां केवल ध्यान का काम है वहां इस बात की गुंजायश हो ही जाती है कि मतदान से इतर बातें भी दृष्टि पथ में आती हैं।

     भारत में इस समय लोकसभा चुनाव 2014 का दौर मध्य स्थिति में पहुंच रहा है। इस चुनावी राजनीति में नेतागणों की सक्रियता पर मतदाता नज़र रखे हुए हैं।  प्रचार माध्यमों में चुनाव को लेकर अनेक प्रकार के समाचार आते रहते हैं पर शायद ही कोई उन लोगों के बारे में सोचता हो जो वास्तव में इस लोकतंत्र में राजनेताओं और मतदाताओं के बीच संपर्क सेतु में अपनी महत्ती भूमिका अदा करते हैं। वह होंते हैं मतदान दल जो हर केंद्र पर तैनात होकर इस लोकतांत्रिक प्रंक्रिया का संचालन करते हैं।

     महत्वपूर्ण बात यह है कि मतदान दल से जुड़े लोग इन चुनावों को जितना नजदीक से देखते हैं दूसरे के लिये वह केवल कल्पना ही  हो सकती है। एक सूक्ष्म प्रेक्षक के रूप में मतदाताओं से जुड़ाव होता ही है ताकि वह निडरता से मतदान कर सकें।  कहा जाता है कि मतदान दल को निष्पक्ष होना चाहिये।  हमने देखा है कि वहां निष्पक्षता या पक्षपात का सवाल ही नहीं रह जाता।  मतदान दल के लोग भले ही सामान्य समय में राजनीतिक विचारधाराओं पर चर्चा करते हों पर वहां सारी सोच हवा हो जाती है क्योंकि उनकी जिम्मेदारी इस तरह की होती है जिसमें मतदान सुचारु रूप से चलाने के अलावा उनको किसी बात का ध्यान करना ही संभव नहीं है।  चुनाव प्रत्याशियों तथा मतदाताओं की संख्या याद रहती है पर न तो किसी का चुनाव चिन्ह याद आता है न ही मतदाताओं के चेहरे पर अधिक दृष्टि रह पाती है।

     सूक्ष्म प्रेक्षक का दायित्व केवल मतदान पर दृष्टि रखना ही होता है इसलिये उसके पास थोड़ी देर अपना ध्यान कहीं अन्यत्र जाना संभव होता है।  शहर और गांव में मतदान की प्रक्रिया में कोई अंतर नहीं होता पर मतदान दलों की स्थितियां अलग हो जाती हैं। शहर में किसी मतदाता से निजी वार्तालाप करने पर विवाद की आशंका रहती है जबकि गांव में ऐसा नहीं होता। पिछले चुनावों में हमने अपने अनुभव पर कुछ नहीं लिखा पर इस बार मतदान थोड़ी धीमी प्रक्रिया से चला इसलिये कई ऐसे पल आये जिस समय हमारी मानवीय संवेदनाओं से  बाहर आकर आनंद दिया तो लिखने का मन किया।

     प्रातः ही मतदान केंद्र के बाहर  एक बच्चा अपने मूंह में अंगूठा डालकर हमारी तरफ देख रहा था।  उसके चेहरे पर छायी मासूमियत ने अभिभूत किया तो हमने उससे कहा-‘‘क्या वोट डालना है?’’

     अंगूठा मूंह में ही डाले उसने अपना ना में सिर हिला दिया।  हमने कहा‘‘यह देखने आये हो कि मतदान प्रारंभ हुआ है या नहीं।’’

उसने ना में सिर हिलाया।

     थोड़ी देर वह अपने दादाजी के साथ आया तो हमने उसे देखकर कहा‘अच्छा, तो दादाजी को साथ लाना था इसलिये ही पहले से जांच करने आये थे।’’

     उसके वृद्ध दादाजी बोले-‘‘हां, यहां से आने के बाद बार बार कह रहा है कि चलो वोट डालो।  बैठने ही नहंी दे रहा था।’’

     पांच छह साल की बच्ची दादी के साथ आयी। उसकी मासूमियत ने हमें आकर्षित् किया।  उसके एक आगे भी एक अन्य मतदाता थी।  हम दरवाजे पर रखी कुर्सी पर ही बैठे थे और बच्ची एकटक घूर रही थी तो हमने उससे कहा-‘‘गुड़िया तुम अपनी दादी के साथ आयी हो या दादी तुम्हारे साथ आयी है। दोनों में से कौन वोट डालेगा?’’

     उसने मासूमियत से दादी की तरफ उंगली उठा दी। उसकी दादी बोली-‘‘सुबह से ही कह रही है कि दादी मुझे वोट डालने ले चलो। कोई काम ही नहीं करने दे रही थी।’’

     सात आठ साल का एक बच्चा लाल रंग की शर्ट और नेकर पहनकर दनादनाता हुआ अपने दादा के आगे चलता हुआ मतदान केंद्र में आ गया।  उसकी मासूमियत देखकर हमने उससे कहा-‘‘क्या दादाजी के बॉडीगार्ड बनकर साथ आये हो?

     लड़के ने दोनों हाथों से अपनी आंखें ढंक ली। उसको संकोच करते देख हमने कहा-‘‘तुम्हारी ड्रेस देखकर यही लग रहा है कि दादाजी की रक्षा के लिये उनके साथ चल रहे हो।’’

     उसके दादाजी बोले-‘‘हां, यह खेत वगैरह में भी मेरे साथ ही चलता है।  शहर जाऊं तो भी साथ चलने की जिद करता है।’’

     एक बीस साल का युवक आया। गांव का होने के बावजूद वह जींस तथा टीशर्ट पहने था।  वह पढ़ा लिखा ही लग रहा था पर जब मतदान अधिकारी के पास वह हस्ताक्षर करने पहुंचा तो बोला-‘‘ मैं अंगूठा लगाऊंगा।’’

     उसका स्वर तल्ख था। हमने उसकी जींस की जेब में रखी पेन देखी थी। हमने हसंते हुए कहा-‘‘अरे भई, आप जैसे स्मार्ट ंयुवक के लिये यह अंगूठा लगाने वाली बात जमती नहीं है। आप तो पेन लेकर हस्ताक्षर करो तो कम से कम हमें इस बात का अफसोस न हो कि स्मॉर्ट लोग भी अंगूठा लगाते हैं।’’

     उसके रूखे चेहरे पर हंसी आ ही गयी और उसने मतदान अधिकारी से पेन लेकर रजिस्टर परदस्तखत कर दिये।

     मतदान समाप्त होने के बाद जब हम अपनी वापसी के लिये वाहन की प्रतीक्षा कर रहे थे तब गांव के वही चेहरे खड़े थे जिनके साथ हमारा मतदान के दौरान संपर्क हुआ था।  उसी लड़के ने अपने गांव का हैंडपंप सुधरवाने के लिये आवेदन लिखवाने का आग्रह किया।  हमारे एक मतदान अधिकारी ने उसे बोलकर लिखवाया। हमने उसकी हस्तलिपि देखकर कहा-‘‘भई  तुम्हारा हस्तलेखन तो इतना सुंदर है फिर क्यों अंगूठा लगाने पर अड़े थे?’’

     वह मुस्कराकर चुप हो गया। उसके दादाजी बोले-‘‘यह ऐसा ही करता है। अपनी पढ़ाई का इससे अहंकार आ गया है।’’

     हमने कहा-‘‘नहीं, यह इसका आत्मविश्वास है कि वह अपना सुंदर हस्तलेखन किसी को दिखाना नहीं चाहता।’’

     जब वहां से चलने को हुए तो वह लड़का बोला-‘‘सर, आपका स्वभाव बहुत अच्छा है।’’

     उसे मालुम नहीं था कि हम सूक्ष्म प्रेक्षक के रूप में वहां आये थे जिनकी नियुक्ति उन मतदान केंद्रों पर होती है जो संवेदनशील माने जाते हैं।  ऐसे केंद्रों पर पहले हुए चुनावों के दौरान हिंसा या गड़बड़ की शिकायत हो चुकी होती है। मूलतः गावों के लोग सीधे सादे और सच्चे  होते हैं पर उनमें कुछ ऐसे भी होते हैं जो सीदे होने के बावजूद अपने को नायक साबित करने के लिये कुछ ऐसी हरकतें इन चुनावों करते हैं जिनसे उनकी दबंग छवि का प्रचार हो।  उनकी गतिविधियों से गांव ही बदनाम हो जाता है।  हमारा स्वाभाविक व्यवहार वहां चालाकी की तरह अपना काम कर मतदान को बोझिल होने से बचाने के साथ ही शांतिपूर्ण चलाने के लिये सहायक हो रहा था।

     आमतौर से वहां किया गया हमारा वार्तालाप हमारी दिनचर्चा का हिस्सा है पर हमने इस तरह का व्यवहार मतदान की प्रक्रिया में सहजता बनाये रखने के लिये किया था। महत्वपूर्ण बात यह कि घर से निकलने और पहुंचने के बीच ज्वलंत राजनीतिक विषय पर किसी से चर्चा नहीं हो पायी। वजह साफ है कि उस समय केवल चुनाव कराने हैं यह सोच हावी थी।  सामग्री लेने और जमा करने के समय अनेक मित्रों से भेंट हुई पर सभी केवल अपने मतदान केंद्र की  चुनावी प्रक्रिया की चर्चा कर रहे थे।  इस तनाव में स्मरणशक्ति इतनी क्षीण हो गयी थी कि घर पर याद आया कि हमारे देश में राजनीतिक दलों के नेता और उनके चुनाव चिन्ह भी होते हैं।

 

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

 

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

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तनाव होने पर भी संयम रखने वाले यशस्वी होते हैं-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख


                        सांसरिक जीवन में उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं। हम जब पैदल मार्ग पर चलते हैं तब कहीं सड़क अत्यंत सपाट होती है तो कहीं गड्ढे होते हैं। कहीं घास आती है तो कहंी पत्थर पांव के लिये संकट पैदा करते हैं।  हमारा जीवन भी इस तरह का है। अगर अपने प्राचीन ग्रंथों का हम निरंतर अभ्यास करते रहें तो मानसिक रूप से परिपक्वता आती है। इस संसार में सदैव कोई विषय अपने अनुकूल नहीं होता। इतना अवश्य है कि हम अगर अध्यात्मिक रूप से दृढ़ हैं तो उन विषयों के प्रतिकूल होने पर सहजता से अपने अनुकूल बना सकते हैं या फिर ऐसा होने तक हम अपने प्रयास जारी रख सकते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि प्रकृति के अनुसार हर काम के पूरे होने का एक निश्चित समय होता है।  अज्ञानी मनुष्य उतावले रहते हैं और वह अपने काम को अपने अनुकूल समय पर पूरा करने के लिये तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठानो के चक्कर पड़ जाते हैं।  यही कारण है कि हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के पाखंडी सिद्ध बन गये हैं। ऐसे कथित सिद्धों की संगत मनुष्य को डरपोक तथा लालची बना देती है जो कथित दैवीय प्रकोप के भय से ग्रसित रहते हैं।  इतना ही नहीं इन तांत्रिकों के चक्कर में आदमी इतना अज्ञानी हो जाता है कि वह तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठान को अपना स्वाभाविक कर्म मानकर करता है।  उसके अंदर धर्म और अधर्म की पहचान ही नहीं रहती।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

———————-

अपां प्रवाहो गांङ्गो वा समुद्रं प्राप्य तद्रसः।

भवत्यपेयस्तद्विद्वान्न्श्रयेदशुभात्कम्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-गंगाजल जब समुद्र में मिलता है तो वह पीने योग्य नहीं रह जाता। ज्ञानी को चाहिये कि वह अशुभ लक्षणों वाले लोगों का आश्रय न ले अन्यथा उसकी स्थिति भी समुद्र में मिले गंगाजल की तरह हो जायेगी।

किल्श्यन्नाप हि मेघावी शुद्ध जीवनमाचरेत्।

तेनेह श्लाध्यतामेति लोकेश्चयश्चन हीयते।।

                        हिन्दी में भावार्थ-बुद्धिमान को चाहे क्लेश में भी रहे पर अपना जीवन शुद्ध रखे इससे उसकी प्रशंसा होती है। लोकों में अपयश नहीं होता।

                        हमारे देश में अनेक ज्ञानी अपनी दुकान लगाये बैठे हैं। यह ज्ञानी चुटकुलों और कहानियों के सहारे भीड़ जुटाकर कमाई करते हैं। इतना ही नहीं उस धन से न केवल अपने लिये राजमहलनुमा आश्रम बनाते हैं बल्कि दूसरों को अपने काम स्वयं करने की सलाह देने वाले ये गुरु अपने यहां सारे कामों के लिये कर्मचारी भी रखते हैं।  एक तरह से वह धर्म के नाम पर कपंनियां चलाते हैं यह अलग बात है कि उन्हें धर्म की आड़ में अनेक प्रकार की कर रियायत मिलती है।  मूल बात यह है कि हमें अध्यात्मिक ज्ञान के लिये स्वयं पर ही निर्भर होना चाहिये। दूसरी बात यह भी है कि ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण भी करना चाहिये।  यही बुद्धिमानी की निशानी है। बुद्धिमान व्यक्ति तनाव का समय होने पर भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता।  यही कारण है कि बुरा समय निकल जाने के बाद वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।  लोग उसके पराक्रम, प्रयास तथा प्रतिबद्धता देखकर उसकी प्रशंसा करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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नारे लगाने वाले बहादुर-छोटी हिन्दी व्यंग्य कवितायें


किसको बढ़ती महंगाई की फिक्र है,

सभी की जुबान पर अपनी कामयाबी का जिक्र है,

जहान की परेशानियों से कुछ लोग बहुत  हैरान है।

कहें दीपक बापू दर्द झेलने वाले

कहीं अपने इलाज की भीख मंागने नहीं जाते

 फिर भी हमदर्दी के सौदागर बेचते अपनी चिंता

 जेब में रखते इनाम

चेहरा ऐसा दिखाते जैसे जहान के गम से वह परेशान है।

————–

न पेड़ लगते न पत्ते लहराते

फिर भी कागजों पर ढेर सारे गुलाब खिल जाते हैं,

यहां कोई फरिश्ता नहीं दिखता

फिर भी नारे लगाने वाले बहादुरों के पीछे

बहुत सारे लोगों के दिल जाते हैं।

कहें दीपक बापू यहां जुबानी जंग लड़ने के

अच्छे दाम लेकर अक्लमंद संभालते मैदान

 कोई मसला नहीं सुलझता यहां

चर्चा यह कि शब्दों से सिंहासन हिल जाते हैं।

——————–

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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होली पर्व 2014 के अवसर पर हास्य कविता-दिल की सफाई


घर पर आया फंदेबाज और बोला

‘‘दीपक बापू इस बार देश में

बढ़ गयी है बहुत महंगाई,

गरीब तो टूटा है

मध्यम वर्ग वाला भी हो गया गरीब

हमें रंग न खेलकर

समाज सेवा का व्रत लेना है

यही सोच मेरे मन में आई,

आप तो फ्लाप कवि हो

पिटती हैं आपकी अंतर्जाल पर कविता

इसलिये कुछ नया करो

समाज सेवा के लिये बनाओ संस्था

करो आमजन की भलाई।’’

सुनकर हंसे और बोले दीपक बापू

‘‘लगता है होली का मजाक करने आये हो,

हमारे फ्लाप होने का सच

हमारे सामने धरने आये हो,

हमारी पुरानी टोपी

फटी धोती

और पैबंद लगा कुर्ता देखकर

तुम्हें परेशानी होती है,

की नहीं कभी कविता से कमाई

यह देखकर तुम्हारी नीयत पानी पानी होती है,

तुम जानते हो अच्छी तरह

नये ज़माने में समाज सेवा भी

एक तरह से हो गयी धंधा,

लाचारों के नाम पर सजाओ दुकान

कभी हवाई जहाज में करो दौरा

कभी कार में करो खरीददारी

बांट सको तो ठीक

नही हैं अपने काम में लाओ चंदा,

पहले प्रचार में प्रसिद्धि,

फिर उसके नकदीकरण में दिखाओ अपनी सिद्धि,

हमसे यह नहीं हो पायेगा,

पराये धन पर मजे करना हमें ही सतायेगा,

वैसे भी होली हम क्या मनायेंगे,

हालातों कर दिये सभी रंग लगते हैं फीके

किसी पर क्या लगायेंगे,

करेंगे कुछ चिंत्तन

कुछ रचेंगे हास्य कवितायें

देश की तो नहीं कर सकते

अपनी हृदय की ही करेंगे सफाई।

————

 

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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अध्यात्मिक ज्ञान होने पर होली का आनंद अधिक होता है-होली पर्व 2014 के अवसर पर विशेष हिन्दी लेख


      यह हैरानी की बात है कि जिस होली को रंगों का त्यौहार माना जाता है उससे ही अनेक लोग अधिक उत्साह से मनाने की बजाय घर में एकांतवास करते हैं। दरअसल होली पर्व मनाते समय  ऐसी विकृत्तियां तथा भ्रांतियां समाज में  फैलीं कि अनेक लोग धर्मभीरु होने के बावजूद इसे नापसंद करने लगे।  ऐसे अनेक लोग मिल जायेंगे जो होली के दिन स्वयं पर कर्फ्यु लगा देते हैं।  जिन मार्गों पर भीड़ होती है वहां केवल हुडंदगी ही विचरते मिलते हैं या फिर शहर के प्रहरी उन पर नियंत्रण करने के लिये गश्त करते दिखते हैं।  होली के अवसर पर पुलिस वालों को छुट्टी नहीं मिलती क्योंकि प्रशासन इस अवसर पर हुड़दंग के उपद्रव में बदल जाने को लेकर आशंकित रहता है। इतना ही नहीं भारतीय धर्म विचाराधारा के मानने वालों में ही अनेक लोग यह मानते हैं कि होली खेलना अब देह के लिये परेशानी का कारण बन जाता है। रंग और गुलाल मे डला कैमिकल आंखों के लिये हानिकारक है।

      एक समय था जब होली पर दूसरे को अपमानित करने का अवसर माने जाना लगा था।  जबरन चंदा मांगा जाता था। राह चलते हुए राहगीर के पीछे भोंपू बजाकर आतंकित किया जाता था तो अनेक के कंधे पर रखा गमछा या टोपी को कांटे से उठाकर टांग कर चंदा मांगा जाता था।  राह चलते हुए हुड़दंगी गंदी नाली में आदमी को फैंक देते थे।  धीरे धीरे पूरे देश में प्रशासनिक अमला सक्रिय हुआ और ऐसी घटनायें कम होती गयीं।  अब तो बाकायदा पुलिस के जवान भारी पैमाने पर चौराहों पर तैनाते होते हैं।  गश्त करते हैं। फिर समय के साथ शिक्षा का प्रभाव बढ़ा तो इस तरह की घटिया हरकतें कम होती गयीं। इधर संचार माध्यमों ने भी नये रूप लिये तो होली इस मामले में सुखद बनी कि अगर आप घर से बाहर न जाना चाहें तो ढेर सारे चैनल आपको बोर होने से बचाते हैं। इसके बावजूद जिन लोगों के मन में पुरानी स्मृतियां हैं वह होली की औपचारिकता भर निभाते हैं।

      हम ऐसे ही लोगों मे रहे हैं जिनके लिये होली का पर्व ऐसे आंनद का अवसर है जिसमें अध्यात्मिक ज्ञान का प्रभाव है। होलिका अपने भतीजे प्रहलाद को जलाने के प्रयास में स्वयं जल गयी। उसके भाई हिरण्यकश्यप ने अपने ही बेटे प्रहलाद को परमात्मा की भक्ति से रोकने के लिये अनेक प्रयास किये। अंततः अपनी बहिन को सौंपा कि वह भतीजे को जला दे। वह प्रहलाद को जलाने के लिये चली और स्वयं जल गयी। इसी घटना से संदेश सीखने के लिये होलिका दहन किया जाता है। बाद में हिरण्यकश्यप ने अपने उसी बेटे प्रहलाद को एक खंबे से बांध दिया तथा तलवार से मारने के लिये उद्यत हुआ उसी समय  भगवान ने नरसिहरूप में अवतरित होकर प्रहलाद को बचाया तथा हिरण्यकश्यप का वध किया। हिरण्यकश्यप ने उनको याद दिलाया किमुझे तो यह वरदान प्राप्त है कि मैं किसी अस्त्र शस्त्र से नहीं मरूंगा, न दिन को मरूंगा न रात को, न घर के अंदर मरूंगा न बाहर, न मुझे मनुष्य मारेगा न पशु, न जमीन पर मरूंगा न आकाश में तब आप मुझे कैसे मारेंगे?’

      कथा में बताया जाता है कि हिरण्यकश्यम ने यह सवाल उस समय किया जब नरसिंह भगवान ने उसे उठाकर अपनी गोद में वध के लिये जकड़ लिया था।  तक उन्होंने मारने पहले उतर भी दियादेख, न दिल है न रात बल्कि इस समय शाम है, जहां तू है वह महल का अहाता है न तू अंदर है न बाहर है, मेरा चेहरा देख न मैं इंसान हूं न पशु और देख मेरे यह नाखून न यह अस्त्र है न शस्त्र! न तू इस समय जमीन पर है न आकाश में वरन् इस समय तू मेरी जांघों पर है इसलिये तेरा वरदान तुझे को मेरे से नहीं बचा सकता।

      इस कथा से मनोरंजन तो होंता ही है साथ ही इसमें अध्यात्मिक संदेश भी निहित है। इस ंसंसार में शक्तिशाली मनुष्य हमेशा ही यह मानता है कि वह कोई भी तर्क गढ़ सकता है उसका विरोध कोई नहीं कर सकता। ऐसा होता भी है पर जब वह विपरीत समय का शिकार होता है तब उन्हें सच्चाई का पता चलता है। हमारे देश के लोग ऐसी कथाओं से मनोरंजन तो ग्रहण करते हैं पर अध्यात्मिक संदेश से परे हो जाते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि हमारी धार्मिक परंपरा में परमात्मा के अनेक साकार रूप माने गये हैं जिनकी अपनी इच्छा अनुसार हर कोई आराधना करता है। किसी एक आराध्य देव का न होना यहां इस मायने में अच्छा है कि एकरसता का भाव नहीं आता वहीं अनेक होने से यह परेशानी होती है कि सभी लोग अपने ही स्वरूप को श्रेष्ठ बताकर आपस में वाद विवाद करते हैं। भक्ति में अहंकार का स्थान नहीं है पर अपने ही स्वरूप को श्रेष्ठ बताना इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान का अभाव है।  सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे यहां गुरु को भगवान से भी बड़ा माना गया है क्योंकि वह सशरीर ज्ञान देता है पर इसका लाभ उन लोगों ने उठाया जिन्होंने अलग अलग से अपने पंथ स्थापित किये और स्वयंभू भगवान बन गये।  यह गुरु अध्यात्मिक ज्ञान तो देते हैं पर पहचान इनकी चमत्कारों से बनती है। सांसरिक विषयों के कार्य समय आने पर स्वयं होते हैं पर यह गुरु उसका श्रेय स्वयं ले जाते हैं। परमात्मा के स्वरूपों पर इतना विवाद नहीं होता जितना इन पंथों के गुरुओं की वजह होता है। एक पंथ का शिष्य अपने गुरु तो दूसरा अपने की प्रशंसा करता है। यह प्रशंसा विवाद खड़े करती है। जिस तरह हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रहलाद के भक्ति भाव पर प्रहार कर रहा था वह अनैतिक था।  यह बात समझ लेना चाहिये कि किसी की भक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करने की बजाय अपना अंतर्मन देखना चाहिये कि हम कितने सच्चे हैं।

      कहने का अभिप्राय यह है कि होली पर बाहरी रंगों में सराबोर होना ठीक है पर अपने अंदर जो भक्ति का रस है उसके रंग की  पहचान करना चाहिये। इसकी पहचान अध्यात्मिक ज्ञान से ही  हो सकती है। पहले तो भाषा ज्ञान न होने से आम आदमी को गुरु की आवश्यकता होती थी पर अब तो शिक्षा ने अपना बृहद रूप ले लिया है इसलिये  ग्रंथों को गुरु मानकर उनका अध्ययन करना चाहिये। भौतिक उपलिब्धयां इस संसार में सभी को मिलती हैं-किसी को कम किसी को ज्यादा।  मुख्य बात यह है कि सुख का रस कौन कितना पीता है या किसके हृदय का रंग अधिक आकर्षक है, यह देखना चाहिये यह उसके जीवन का अध्ययन कर ही सीखा जा सकता है। ज्ञान प्राप्त कर हृदय में ऐसी रंगीन होली खेली जा सकती है जो बाहर दुर्लभ है।

      बहरहाल इस होली के अवसर पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकों को बधाई।  सभी के लिये प्रगतिमय वातवरण बने ऐसी शुभकामनाये।

दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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रहीम दर्शन पर आधारित हिन्दी चिंत्तन लेख-समाज का दोहन करने वाले वर्तमान धनपति आत्ममंथन करें


      हमारे देश में अगले दो महीनों में लोकसभा चुनाव 2014 संपन्न करने की तैयारी चल रही है। चुनावी राजनीति ने समय के साथ अनेक रूप बदले हैं। वैसे देखा जाये तो राजनीति एक व्यापक अर्थ वाला है जिसे हम राजसी प्रवृत्तियों से संपन्न कर सकते हैं।  चुनाव लड़कर पद पर जाना ही केवल राजनीति नहीं होती वरन् जीवन के समस्त अर्थ कम ही राजनीति के मंत्रों से ही संपन्न किये जाते हैं। यह अलग बात है कि हमारे वर्तमान पेशेवर बुद्धिजीवी इसे केवल चुनावी राजनीति से ही जोड़कर देखते हैं।  वास्तविकता यह है कि चुनावी राजनीति, उद्योग, व्यवसाय, तथा कोई भी अन्य कार्य फल की प्राप्ति के लिये जो बाह्य दृष्टि से  किया जाता है उसे ही राजसी कर्म कहा जाता है। जब हम राजसी पुरुष की बात करें तो उसमें चुनावी राजनेता ही नहीं वरन् उद्योगपति, अध्यात्म से इतर विषयों के साहित्यकार, कलाकार, व्यवसायी, चिकित्सक, इंजीनियर और पत्रकार सभी शामिल है। जहां तक सामूहिक सांसरिक हित की बात हो तो समाज सात्विक लोगों की बजाय राजसी पुरुष से ही अपेक्षा करता है कि वह उसको संबल प्रदान करेंगे।  यही कारण है कि हमारे अध्यात्मिक दर्शन में उन राजसी पुरुषों को सम्मान देने की बात करता है जो अपना दायित्व निभाते हैं।

      वर्तमान समय में हर क्षेत्र में सक्रिय राजसी पुरुषों की छवि अब उतनी आकर्षक नहीं रही जितनी कभी रहा करती थी। इसका कारण यह है कि समाज की अपेक्षा पर अधिकांश राजसी पुरुष खरे नहीं उतर पाये हैं।  हम सभी पर आक्षेप नहीं कर सकते कि वह बुरे हैं क्योंकि अगर ऐसा होता तो हमारा समाज अभी तक ध्वस्त हो गया होता। हालांकि यह भी सच है कि अगर सहृदय राजसी पुरुषों की संख्या अधिक होती तो यह समाज ऐसी दुर्दशा में नहीं आता जैसा कि हम देख रहे हैं। देखा यह गया है कि समाज के सभी क्षेत्रों में जो शिखर पर पहुंचें हैं वह आम इंसान को भेड़ समझते हैं जिसकी भीड़ लगाकर वह आत्मप्रचार कर अपना ही हित साधते हैं। यही कारण है कि उनके प्रति समाज में न केवल असंतोष का भाव है वरन् अनेक निराश लोग तो उनके प्रति वैमनस्य का भाव भी पालने लगे हैं।

कविवर रहीम कहते हैं कि

————-

तासों ही कछु पाइए, कीजै जाकी आस।

रीते सरवर पर गए, कैसे बुझै पियास।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-सूखी तालाब पर जाने से प्यास शांत नहीं होती। उसी व्यक्ति से ही कुछ प्राप्त किया जा सकता है जो दूसरों की आशाओं पर खरा उतरता है।

      आर्थिक उदारीकरण ने राजकीय क्षेत्र का दायरा संकुचित किया है तो निजी क्षेत्र के विस्तार ने चंद धनपतियों की शक्ति इतनी बढ़ा दी है कि समाज की सभी आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, प्रचार, कला तथा खेल पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं पर उनका नियंत्रण हो गया है।  जैसा कि सभी जानते हैं कि धन का मद सबसे अधिक विषाक्त होता है और धनपतियों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह अकारण किसी के साथ आर्थिक गठबंधन नहीं करते। उनको अपनी चाटुकारिता तथा प्रशंसा पसंद होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह किसी कलाकार, खिलाड़ी, समाज सेवक, तथा पत्रकार की सहायता केवल इसलिये नहीं कर सकते कि वह योग्य है वरन् उनका दृष्टिकोण यह रहता है कि वह हमारा स्वयं का हित कितना साध सकता है?

      हमें यह किसी पर आक्षेप नहीं करना पर इतना अवश्य कहना चाहते हैं कि हमारे इस प्रकार के राजसी पुरुषों अपने अधीन रहने वाले प्रचार माध्यमों पर अपनी छवि भले ही देवता जैसी बनायें पर समाज उनका हृदय से सम्मान नहीं करता। आत्ममुग्ध होकर अपने स्वार्थ में लगे राजसी पुरुष भले ही आत्ममुग्ध होकर रहे पर सच यही है कि जब तक कोई किसी का स्वार्थ सिद्ध नहीं करता उसकी प्रशंसा नहीं हो सकती। यह बात सभी प्रकार के राजसी पुरुष समझ लें।

 

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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प्रायोजित नाटक खबर-हिंदी व्यंग्य कविता


नाटक बनते  खबर  या खबर ही नाटक बनती कह नहीं सकते,

पर्दे के नायक दिल देकर बने या बिल लेकर कह नहीं सकते,

कहें दीपक बापू बाज़ार के सौदागरों की मुट्ठी में पूरा जहान है,

कोई दाम देकर  तो कोई दगा देकर खबरों में बना महान है,

पर्दे पर खेल चल रहा है या फिल्म अंदाज लगाना कठिन है,

 खबर जैसी लिखी पटकथा पर करते अभिनेता अभिनय

खिलाड़ी खेलते मगर पहले से तय जीत या हार का दिन है,

हर कोई पैमाना नाप रहा दूसरे की असलियत का

अपने ढोल की  पोल छिपाने में सभी माहिर हैं,

किसी ने मासूम तो किसी ने रोबदार मुखौटा लगाया

डरते हवा के झौंके से उनके कमजोर दिल सब जगह जाहिर है,

न दुनियां अब रंगीन रही न कुछ यहां अजीब लगता है

लोगों के अंदाज कितने सच कितने बनावटी है कह नहीं सकते।

……………………………

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

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ज्ञान विज्ञान पर बहस-हिंदी व्यंग्य कविता


कोई समाधि कोई सन्यास ले रहा है पर ज्ञान उनमें लुप्त है,

बात करो पुराने ग्रंथ की तो कहें ज्ञान का रहस्य गुप्त है।

कहें दीपकबापू अपने देश में धर्म का धंधा एकदम चोखा है,

पाखंड होता सर्वशक्तिमान के नाम कौन जानता है धोखा है।

प्रतीक चिन्ह गले में पहने चमकीले वस्त्र साधु बने नायक,

गुरु बनकर पुज रहे कथा वाचक और भजन गायक।

पुराणों में है कहानियां रोज सुनाकर दिल बहलाते हैं,

भक्त करता दान वह दाम की तरह पाते हैं।

भंडारों के पंडालों में प्रसाद खाने की तरह मिलता है,

धर्मभीरु देखकर हैरान उनका ज्ञान हिलता है।

गीता के ज्ञान और विज्ञान पर अक्सर होती है बहस

न कोई समझाये न समझ पाये इंसानों का ज्ञान चक्षु सुप्त है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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हल्के इंसान-हिंदी व्यंग्य कविता


वह ठहरे हल्के इंसान

चेहरे पर रोज नया मुखौटा लगाकर आते हैं,

गंभीरता का करते हैं नाटक

जल्दी ही जोकर हो जाते हैं।

कहें दीपक बापू

वादों पर कभी वह खरे उतर सकते नहीं,

अपने भरोसे पर यकीन खुद करते नहीं,

यह प्रचार का खेल हैं

जहां उनकी काली नीयत भी सुंदर नज़र आती है,

फरेबी अदायें महंगी बिक जाती हैं,

सौदागर बेच रहे बाज़ार में कागजी ख्वाब,

कारिंदों करें कारिस्तानी वह दिखायें रुआब,

सियायत हो या ज़माने का भला

कामयाब खिलाड़ी वही नज़र आते हैं,

वादों से वफादारी निभाने के बजाय

कागजी नाव जो चला पाते हैं।

—————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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राजनीति में राजसी भाव ही से ही सक्रियता संभव-हिंदी चिंत्तन लेख


                        एक बात समझ में नहीं आती कि हमारे भारत में राजनीति का आशय हमेशा ही चुनाव के माध्यम से राजकीय पद प्राप्त करने की प्रक्रिया से ही क्यों जोड़ा जाता है। हम संदर्भ अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से ही ले रहे है क्योंकि वह वर्तमानकाल में अधिक प्रासंगिक लगता है।  अन्ना हजारे कहते हैं कि मेरा आंदोलन गैर राजनीतिक है। अन्ना हजारे से संबंधित कुछ उनके भक्तों ने एक राजनीतिक दल का गठन किया तो कहा गया कि वह राजनीति में आ गये हैं।  ऐसा लगता है कि भारत में पश्चिमी आधार पर चलने वाले चिंत्तक राजनीति शब्द के मायने का  संकीर्ण अर्थ ले रहे हैं। 

            अगर हम श्रीमद्भागवत गीता के कर्म विभाग का अध्ययन करें तो सात्विक, राजस तथा तामस तीन प्रकार के कर्म होते हैं।  सात्विक कर्म में लगे लोगों का एक ही नियम होता है कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ। ऐसे लोग समाज के लिये स्वयं बढ़कर काम नहीं करते पर अगर सामने आ जाये तो मुख नहीं मोड़ते।  अलबत्ता वह समाज में संकट खड़ा नहीं करते इसलिये वह प्रशंसा के पात्र होते हैं। तामसी कर्म में लगे लोगों आलस्य, प्रमाद तथा धीमी गति से काम करने वाले होते हैं इसलिये उनसे भी समाज के परोपकार की आशा करना ही  व्यर्थ है।  सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य राजसी कर्म है जिसकी पहचान है काम, क्रोध, मोह, लोभ, तथा अहंकार  जैसे गुणों के रूप में होती है।  सकारात्मक रूप से यह गुण ही है नकारात्मक रूप से ही इन्हें दुर्गुण कहा जाता है। जिनकी मूल प्रवृत्ति ही राजसी है वह सदा प्रतिफल की आशा से काम करते हैं जो राजसी कर्म की पहचान है।  अपने हितों के मोह में प्रतिफल पाने का लोभ मनुष्य को सक्रिय रखता है। उसके न मिलने पर उसे क्रोध आता ही है। मिल जाये तो वह उससे भरपूर सुविधायें जुटाने की कामना भी वही करता है।  न मिले तो क्रोध और मिल जाये तो अहंकार आता ही है। सात्विक लोग अपनी सुविधानुसार राजसी कर्म करते ही हैं क्योंकि इसके बिना उनका गुजारा नहीं होता। तामसी प्रवृत्ति के लोग भी येनकेन प्रकरेण यह करने के लिये बाध्य होते हैं। किसी भी राजसी कर्म करने के लिये नीतिगत रूप से काम करना ही राजनीति है। कहने का अभिप्राय यह है कि न केवल राज्य कर्म के लिये वरन् व्यक्तिगत राजसी कर्म के लिये भी राजसी प्रवृत्ति में लिप्त होना ही होता है।

            पहले तो हम लोकतंत्र की बात करें जिसमें जिस तरह चुनाव उसका भाग होते हैं। इसी लोकतंत्र में जहां जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकार बनाते है तो ऐसे लोग भी होते है जो अपनी मांगों के लिये आंदोलन चलाते हैं।  यह चुनाव और आंदोलन दोनों ही आज की लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का भाग हैं। अन्ना हजारे स्वयं सात्विक प्रवृत्ति के हैं पर उनकी छवि राजसी कर्मों में श्रेष्ठता के कारण है।  अन्ना हजारे साहब का आंदोलन अब दो भागों में बंट गया है एक चुनाव की तरफ आया तो दूसरा आंदोलन को ही देश के बदलाव का मार्ग मानकर वहीं डटा है।  जहां प्रजा हित का प्रश्न हो वहां राजा को छल कपट, धोखा तथा राजनीतिक स्वार्थपरायणता के लिये तत्पर रहना चाहिये यह राजनीति शास्त्र कहता है।  सात्विक मनुष्य चूंकि यह काम नहीं कर सकते इसलिये ही राज्यकर्म से दूर ही रहते हैं।  अगर राजसी कर्म में कोई श्रेष्ठ व्यक्ति हो तो वह सात्विक से कम नहीं होता मगर शर्त यह है कि उसे अपने काम की प्रकृत्ति का ज्ञान होना चाहिये।  राजसी कर्म करते समय श्रेष्ठ करते समय सात्विक दिखना तो चाहिये पर उससे दूर होना ही लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक हो सकता है।

            अन्ना से अलग हुए लोगों ने चुनाव के क्षेत्र में कदम रखा है। उन्हें सफलता तो मिली है पर वह स्थाई नहीं हो सकती।  आंदोलन चलाना और सरकार चलाने में अंतर होता है। आंदोलन दमदार हो तो सरकार को झुकना पड़ता है पर अगर सरकार दमदार हो तो आंदोलन की हवा भी निकाल सकती है। एक बात तय रही कि राजसी कर्म स्वार्थ से परे नहीं हो सकते। दूसरी बात यह कि राजसी कर्म करते हुए अगर किसी ने अपने लिये संपन्नता नहीं अर्जित की तो उसे समाज बड़ी दयनीय दृष्टि से देखता है।  अन्ना हजारे के चंद भक्त उनसे अलग होकर चुनाव के माध्यम से समाज में बदलाव का जो लक्ष्य सामने रख रहे हैं उनकी नीयत पर हमें संदेह नहीं है पर मुख्य बात यह है कि उनके अनुयायी भी उनकी तरह ही होंगे इस पर संदेह है। कुछ समय के लिये उनको युवाओं का उत्साही वर्ग अवश्य मिल जाये पर कालांतर में राज्य सुख उनको वैसा ही ईमानदार बने रहने देगा इसमें संदेह है जैसा कि प्रारंभ में होंगे।  बहरहाल अभी तो यह कहना कठिन है कि अन्ना हजारे के उनसे अलग हुए पुराने भक्त कि चुनाव के माध्यम से समाज में कितना बदलाव ला पायेंगे पर एक बात तय है कि उन्होंने भारतीय राजनीति को एक नयी दिशा देने का प्रयास तो किया है। आगे देखें क्या होता है। 

 

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

 

 

                        एक बात समझ में नहीं आती कि हमारे भारत में राजनीति का आशय हमेशा ही चुनाव के माध्यम से राजकीय पद प्राप्त करने की प्रक्रिया से ही क्यों जोड़ा जाता है। हम संदर्भ अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से ही ले रहे है क्योंकि वह वर्तमानकाल में अधिक प्रासंगिक लगता है।  अन्ना हजारे कहते हैं कि मेरा आंदोलन गैर राजनीतिक है। अन्ना हजारे से संबंधित कुछ उनके भक्तों ने एक राजनीतिक दल का गठन किया तो कहा गया कि वह राजनीति में आ गये हैं।  ऐसा लगता है कि भारत में पश्चिमी आधार पर चलने वाले चिंत्तक राजनीति शब्द के मायने का  संकीर्ण अर्थ ले रहे हैं। 

            अगर हम श्रीमद्भागवत गीता के कर्म विभाग का अध्ययन करें तो सात्विक, राजस तथा तामस तीन प्रकार के कर्म होते हैं।  सात्विक कर्म में लगे लोगों का एक ही नियम होता है कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ। ऐसे लोग समाज के लिये स्वयं बढ़कर काम नहीं करते पर अगर सामने आ जाये तो मुख नहीं मोड़ते।  अलबत्ता वह समाज में संकट खड़ा नहीं करते इसलिये वह प्रशंसा के पात्र होते हैं। तामसी कर्म में लगे लोगों आलस्य, प्रमाद तथा धीमी गति से काम करने वाले होते हैं इसलिये उनसे भी समाज के परोपकार की आशा करना ही  व्यर्थ है।  सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य राजसी कर्म है जिसकी पहचान है काम, क्रोध, मोह, लोभ, तथा अहंकार  जैसे गुणों के रूप में होती है।  सकारात्मक रूप से यह गुण ही है नकारात्मक रूप से ही इन्हें दुर्गुण कहा जाता है। जिनकी मूल प्रवृत्ति ही राजसी है वह सदा प्रतिफल की आशा से काम करते हैं जो राजसी कर्म की पहचान है।  अपने हितों के मोह में प्रतिफल पाने का लोभ मनुष्य को सक्रिय रखता है। उसके न मिलने पर उसे क्रोध आता ही है। मिल जाये तो वह उससे भरपूर सुविधायें जुटाने की कामना भी वही करता है।  न मिले तो क्रोध और मिल जाये तो अहंकार आता ही है। सात्विक लोग अपनी सुविधानुसार राजसी कर्म करते ही हैं क्योंकि इसके बिना उनका गुजारा नहीं होता। तामसी प्रवृत्ति के लोग भी येनकेन प्रकरेण यह करने के लिये बाध्य होते हैं। किसी भी राजसी कर्म करने के लिये नीतिगत रूप से काम करना ही राजनीति है। कहने का अभिप्राय यह है कि न केवल राज्य कर्म के लिये वरन् व्यक्तिगत राजसी कर्म के लिये भी राजसी प्रवृत्ति में लिप्त होना ही होता है।

            पहले तो हम लोकतंत्र की बात करें जिसमें जिस तरह चुनाव उसका भाग होते हैं। इसी लोकतंत्र में जहां जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकार बनाते है तो ऐसे लोग भी होते है जो अपनी मांगों के लिये आंदोलन चलाते हैं।  यह चुनाव और आंदोलन दोनों ही आज की लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का भाग हैं। अन्ना हजारे स्वयं सात्विक प्रवृत्ति के हैं पर उनकी छवि राजसी कर्मों में श्रेष्ठता के कारण है।  अन्ना हजारे साहब का आंदोलन अब दो भागों में बंट गया है एक चुनाव की तरफ आया तो दूसरा आंदोलन को ही देश के बदलाव का मार्ग मानकर वहीं डटा है।  जहां प्रजा हित का प्रश्न हो वहां राजा को छल कपट, धोखा तथा राजनीतिक स्वार्थपरायणता के लिये तत्पर रहना चाहिये यह राजनीति शास्त्र कहता है।  सात्विक मनुष्य चूंकि यह काम नहीं कर सकते इसलिये ही राज्यकर्म से दूर ही रहते हैं।  अगर राजसी कर्म में कोई श्रेष्ठ व्यक्ति हो तो वह सात्विक से कम नहीं होता मगर शर्त यह है कि उसे अपने काम की प्रकृत्ति का ज्ञान होना चाहिये।  राजसी कर्म करते समय श्रेष्ठ करते समय सात्विक दिखना तो चाहिये पर उससे दूर होना ही लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक हो सकता है।

            अन्ना से अलग हुए लोगों ने चुनाव के क्षेत्र में कदम रखा है। उन्हें सफलता तो मिली है पर वह स्थाई नहीं हो सकती।  आंदोलन चलाना और सरकार चलाने में अंतर होता है। आंदोलन दमदार हो तो सरकार को झुकना पड़ता है पर अगर सरकार दमदार हो तो आंदोलन की हवा भी निकाल सकती है। एक बात तय रही कि राजसी कर्म स्वार्थ से परे नहीं हो सकते। दूसरी बात यह कि राजसी कर्म करते हुए अगर किसी ने अपने लिये संपन्नता नहीं अर्जित की तो उसे समाज बड़ी दयनीय दृष्टि से देखता है।  अन्ना हजारे के चंद भक्त उनसे अलग होकर चुनाव के माध्यम से समाज में बदलाव का जो लक्ष्य सामने रख रहे हैं उनकी नीयत पर हमें संदेह नहीं है पर मुख्य बात यह है कि उनके अनुयायी भी उनकी तरह ही होंगे इस पर संदेह है। कुछ समय के लिये उनको युवाओं का उत्साही वर्ग अवश्य मिल जाये पर कालांतर में राज्य सुख उनको वैसा ही ईमानदार बने रहने देगा इसमें संदेह है जैसा कि प्रारंभ में होंगे।  बहरहाल अभी तो यह कहना कठिन है कि अन्ना हजारे के उनसे अलग हुए पुराने भक्त कि चुनाव के माध्यम से समाज में कितना बदलाव ला पायेंगे पर एक बात तय है कि उन्होंने भारतीय राजनीति को एक नयी दिशा देने का प्रयास तो किया है। आगे देखें क्या होता है। 

 

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

 

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