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पहाड़ से टूटे पत्थर-हिन्दी व्यंग्य कविता


पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

समाज हिन्दी भाषा का महत्व समझे- हिन्दी दिवस पर विशेष चिंतन आलेख (hindi ka mahatva-hindi chitan lekh on hindi divas)


       सुना है अब इंटरनेट में लैटिन के साथ ही देवनागरी में भी खोज सुगम होने वाली है। यह एक अच्छी खबर है मगर इससे हिंदी भाषा के पढ़ने और लिखने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ जायेगी, यह आशा करना एकदम गलत होगा। सच तो यह है कि अगर देवनागरी में खोज सुगम हुई भी तो भी इसी मंथर गति से ही हिंदी लेखन और पठन में बढ़ोतरी होगी जैसे अब हो रही है। हिंदी को लेकर जितनी उछलकूल दिखती है उतनी वास्तविकता जमीन पर नहीं है। सच कहें तो कभी कभी तो लगता है कि हम हिंदी में इसलिये लिख पढ़े रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी हमारे समझ में नहीं आती। हम हिंदी में लिख पढ़ते भी इसलिये भी है ताकि जैसा लेखक ने लिखा है वैसा ही समझ में आये। वरना तो जिनको थोड़ी बहुत अंग्रेजी आती है उनको तो हिंदी में लिखा दोयम दर्जे का लगता है। वैसे अंतर्जाल पर हम लोगों की अंग्रेजी देखने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि लोगों की अंग्रेजी भी कोई परिपक्व है इस पर विश्वास नहीं करना चाहिए-क्योंकि बात समझ में आ गयी तो फिर कौन उसका व्याकरण देखता है और अगर दूसरे ढंग से भी समझा तो कौन परख सकता है कि उसने वैसा ही पढ़ा जैसा लिखा गया था। बहरहाल अंग्रेजी के प्रति मोह लोगों का इसलिये अधिक नहीं है कि उसमें बहुत कुछ लिखा गया है बल्कि वह दिखाते हैं ताकि लोग उनको पढ़ालिखा इंसान समझें।
       ‘आप इतना पढ़ें लिखें हैं फिर भी आपको अंग्रेजी नहीं आती-‘’हिंदी में पढ़े लिखे एक सज्जन से उनके पहचान वाले लड़के ने कहा’‘-हमें तो आती है, क्योंकि अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं न!’
          मध्यम वर्ग की यह नयी पीढ़ी हिंदी के प्रति रुझान दिखाने की बजाय उसकी उपेक्षा में आधुनिकता का बोध इस तरह कराती है जैसे कि ‘नयी भारतीय सभ्यता’ का यह एक  प्रतीक हो। इनमें तो कई ऐसे हैं जिनकी हिंदी तो  गड़बड़ है साथ  ही  इंग्लिश भी कोई बहुत अच्छी  नहीं है।
       जैसे जैसे हिंदी भाषी क्षेत्रों में सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों और महाविद्यालयों के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है-निजी क्षेत्र में अंग्रेजी की शिक्षा का प्रसार बढ़ा है। एक दौर था जब सरकारी विद्यालयों में प्रवेश पाना ही एक विजय समझा जाता था-उस समय निजी क्षेत्र के छात्रों को फुरसतिया समझा जाता था। उस समय के दौर के विद्यार्थियों ने हिंदी का अध्ययन अच्छी तरह किया। शायद उनमें से ही अब ऐसे लोग हैं जो हिंदी में लेखन बेहतर ढंग से करते हैं। अब अगर हिंदी अच्छे लिखेंगे तो वही लोग जिनके माता पिता फीस के कारण अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालयों में नहीं पढ़ा सकते और सरकारी विद्यालयों में ही जो अपना भविष्य बनाने जाते हैं।
       एक समय इस लेखक ने अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध स्तंभकार श्री खुशवंत सिंह के इस बयान पर विरोध करते हुए एक अखबार में पत्र तक लिख डाला‘जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदी गरीब भाषा है।’
       बाद में पता लगा कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा बल्कि उनका आशय था कि ‘हिन्दुस्तान में हिंदी गरीबों की भाषा है’। तब अखबार वालों पर भरोसा था इसलिये मानते थे कि उन्होंने ऐसा कहा होगा पर अब जब अपनी आंखों के सामने बयानों की तोड़मोड़ देख रहे हैं तो मानना पड़ता है कि ऐसा ही हुआ होगा। बहरहाल यह लेखक उनकी आलोचना के लिये अब क्षमाप्रार्थी है क्योंकि अब यह लगने लगा है कि वाकई हिंदी गरीबों की भाषा है। इन्हीं अल्पधनी परिवारों में ही हिंदी का अब भविष्य निर्भर है इसमें संदेह नहीं और यह आशा करना भी बुरा नहीं कि आगे इसका प्रसार अंतर्जाल पर बढ़ेगा, क्योंकि यही वर्ग हमारे देश में सबसे बड़ा है।
       समस्या यह है कि इस समय कितने लोग हैं जो अब तक विलासिता की शय समझे जा रहे अंतर्जाल पर सक्रिय होंगे या उसका खर्च वहन कर सकते हैं। इस समय तो धनी, उच्च मध्यम, सामान्य मध्यम वर्ग तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिये ही यह एक ऐसी सुविधा है जिसका वह प्रयोग कर रहे हैं और इनमें अधिकतर की नयी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित है। जब हम अंतर्जाल की बात करते हैं तो इन्हीं वर्गों में सक्रिय प्रयोक्ताओं से अभी वास्ता पड़ता है और उनके लिये अभी भी अंग्रेजी पढ़ना ही एक ‘फैशनेबल’ बात है। ऐसे में भले ही सर्च इंजिनों में भले ही देवनागरी करण हो जाये पर लोगों की आदत ऐसे नहीं जायेगी। अभी क्या गूगल हिंदी के लिये कम सुविधा दे रहा है। उसके ईमेल पर भी हिंदी की सुविधा है। ब्लाग स्पाट पर हिंदी लिखने की सुविधा का उपयेाग करते हुए अनेक लोगों को तीन साल का समय हो गया है। अगर हिंदी में लिखने की इच्छा वाले पूरा समाज होता तो क्या इतने कम ब्लाग लेखक होते? पढ़ने वालों का आंकड़ा भी कोई गुणात्मक वुद्धि नहीं दर्शा रहा।
       गूगल के ईमेल पर हिंदी लिखने की सुविधा की चर्चा करने पर एक नवयौवना का जवाब बड़ा अच्छा था-‘अंकल हम उसका यूज (उपयोग) नहीं करते, हमारे मोस्टली (अधिकतर) फ्रैंड्स हिंदी नहीं समझते। हिंदी भी उनको इंग्लिश (रोमन लिपि) में लिखना पसंद है। सभी अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं। जो हिंदी वाले भी हैं वह भी इससे नहीं लिखते।’
ऐसे लोगों को समझाना कठिन है। कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी की कितनी भी सुविधा अंतर्जाल पर आ जाये उसका लाभ तब तक नहीं है जब तक उसे सामान्य समाज की आदत नहीं बनाया जाता। इसका दूसरा मार्ग यह है कि इंटरनेट कनेक्शन सस्ते हो जायें तो अल्प धन वाला वर्ग भी इससे जुड़े  जिसके बच्चों को हिंदी माध्यम में शिक्षा मजबूरीवश लेनी पड़ रही है। यकीनन इसी वर्ग के हिंदी भाषा का भविष्य को समृद्ध करेगा। ऐसा नहीं कि उच्च वर्ग में हिंदी प्रेम करने वाले नहीं है-अगर ऐसा होता तो इस समय इतने लिखने वाले नहीं होते-पर उनकी संख्या कम है। ऐसा लिखने वाले निरंकार भाव से लिख रहे हैं पर उनके सामने जो समाज है वह अहंकार भाव से फैशन की राह पर चलकर अपने को श्रेष्ठ समझता है जिसमे हिंदी से मुंह   फेरना एक प्रतीक माना जाता है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

पुरानों की मजाक उड़ाकर सफलता ढूंढते नये कलाकार


उस दिन मैं एक टीवी चैनल पर लाफ्टर शो में एक पाकिस्तानी कलाकार के प्रदर्शन को देखकर यह सोच रहा था कि अब हमारे देश में हास्य के नाम पर पुराने कलाकारों की मजाक उडाना कार्यक्रमों की सफलता के लिए जरूरी होता जा रहा है। उस हास्य कलाकार ने उस दिन शास्त्रीय संगीत को अपना लक्ष्य बना लिया था और यकीनन वह जिस तरह पेश कर रहा था उससे जाहिर हो रहा था कि वह शास्त्रीय सगीत का क ख, भी नहीं जानता होगा और न कभी ऐसे कार्यक्रमों में गया होगा। बोलना सीखते ही भारत चला आया होगा जहाँ के सीरियल निर्माताओं और निर्देशकों को अपने देश में हास्य कलाकारों के नाम पर बदतमीजी करने वाले लोग चाहिए।

सबसे पहले उसने बिना किसी नाम लिए एक शराबी का काल्पनिक किस्सा सुनाया जो कि एक शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में पीकर गया। वहाँ कोई महिला शास्त्रीय संगीत पेश कर रही थी और बहुत देर तक ‘पिया’शब्द ही दोहराती रही। इससे वह क्षुब्ध हो गया. और चिल्लाने लगा-”पिया, तो क्या, अपने बाप का पिया, तुमने मेरा पूरा नशा उतर दिया। पर कोई बात नहीं ऐसे समय के लिए मैं सौ ग्राम हमेशा अपने पास रखता हूँ।”

दूसरा उसने पाकिस्तान के गजल गायक गुलाम अली पर सुनाया। कहने लगा कि”गुलाम अली साहब अपना तानपूरा अपने साथ साइड में ऐसे रखते हैं जैसे किसी का उठाकर लाये हों। गाते हैं तो लगता है कि श्रोताओं की कोई उनको कोई परवाह ही नहीं है अपने अपने आप में ही मस्त रहते हैं। बार-बार कहते हैं’क्या गजल है, क्या गजल है’ अरे भाई हम कहते हैं कि तुम सुनाओ तो ही गजल हम तय करेंगे कि वह कैसी है। ”

उसने भारत के किसी कलाकार का नाम नहीं लिया यह उसकी व्यावसायिक चतुराई का प्रतीक है और पाकिस्तान के कलाकार का नाम लिया और सोचा कि अपने देश के कलाकार का मजाक उडाने का अधिकार है। मैं यहाँ किसी प्रकार से उसके पाकिस्तानी होने को लेकर आपति नहीं उठा रहा क्योंकि इससे मूल विषय का कोई संबंध नहीं है। मैं तो इन नये कलाकारों की बात कर रहा हूँ जिनके पास अपनी कोई कला और उसकी शैली नहीं है। यही कारण है कि उनकी कोई अपनी छबि नहीं है. मीडिया जबरदस्ती कुछ लोगों को स्तर बताता है पर मैं उनकी चर्चा कहीं भीड़ में नहीं सुनता. अभी एक फिल्म में मनोजकुमार की मजाक उडाई गयी उस पर उन्हें दुख पहुंचा तब बस एक खबर देकर सब चैनल चुप बैठ गए और किसी ने कोई टिप्पणी नहीं की और अब उसके हीरो के क्रिकेट मैच देखने पर बोर्ड के एक अधिकारी ने जब इस पर आपति उठाई तो सब जगह हो-हल्ला मच गया जैसे कोई बहुत बड़ी खबर है. सच तो यह है कि पिछले दिनों रिलीज फिल्में जनता के मन में नहीं बैठ पायीं हैं जैसा कि मीडिया वाले चाहते थे।

इन कलाकारों के चेहरे और प्रदर्शन केवल दूसरों की मजाक उडाने पर टिके हैं. इसका कारण यह है कि आजकल फिल्मों और सीरियलों के लिए जो लेखक लिए जाते हैं उनसे क्लर्क की तरह काम लिया जाता है. वैसे आप निर्माता और निर्देशकों की बात माने तो इस देश में लेखकों की कमी है. ऐसा है नहीं. इन निर्माता निर्देशकों को मालुम ही नहीं कि हिन्दी भाषा में लेखकों की कमी नहीं है पर अपनी रचनाएं आवेदन की तरह लेकर उनके पास फिरने वाले नहीं है और जो उनके पास लेखन का काम मांगने आते है वह अधिक सम्मान न मिलने से क्लर्क की तरह काम करते हैं इसलिए फिल्मों के डायलाग और विषय वस्तू अब प्रभावशाली नहीं बन पाती। यही कारण है कि भव्य साईट और महंगी स्टार कास्ट की बावजूद फिल्में और सीरियल ओंधी मुहँ गिरते हैं। शायद इसलिए ही नये कलाकारों से इसलिए पुरानों का मजाक उडा कर काम चला रहे हैं पर उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि वह शो पीस की तरह है उनके आकर्षण को देखकर देखकर और सुनकर अगले ही क्षण भूल जाते हैं सम्मान तो दूर सराहते तक नहीं हैं जबकि मनोज कुमार हो या गुलाम अली अपने फन के वजह से आज भी लोगों में सम्मान का भाव रखते हैं।

संत कबीर वाणी: माया के होते नौ-नौं हाथ


कोटि करम लगे रहै, एक क्रोध की लार
किया कराया सब गया, जब आया हँकार

रेशम के कीडे द्वारा जैसे अत्यंत लंबा रेशम का धागा बँटा जाता है, उसी प्रकार एक क्रोध ही करोडों पाप कर्मों को उत्पन्न करता है। जब मनुष्य को अंहकार आ जाता है तो उसके पुण्य, तप, ज्ञान, गुण आदि सभी नष्ट हो जाते हैं।

माया माथै सींगड़ा, लम्बे नौ-नौ हाथ
आगे भारे सींगड़ा, पाछै मारै लात

माया के माथे पर मद और अंहकार रुपी, लोभ और अज्ञान रूपी सींग होते हैं जो नौ-नौ हाथ लम्बे होते हैं। आते समय वह सींग मारती और जाते समय लात मारती है।

बहस तो ज्ञानियों के बीच होना चाहिए


बहस और तर्क विद्वानों के बीच होना चाहिए। विद्वान का मतलब यह कि जिस विषय पर बहस हो उसमें उसने कहीं न कहीं शिक्षा और उपाधि प्राप्त की हो या उसने उस विषय को इस तरह पढा हो कि उसे उसके संबंध में हर तथ्य और तत्व का ज्ञान हो गया हो। हमारे देश में हर समय किसी न किसी विषय पर बहस चलती रहती है और उसमें भाग लेने वाले हर विषय पर अपने विचार देते हैं जैसे कि उस विषय का उनको बहुत ज्ञान हो और प्रचार माध्यमों में उनका नाम गूंजता रहता है। उनकी राय का मतलब यह नहीं है कि वह उस विषय में पारंगत हैं। उनको प्रचार माध्यमों में स्थान मिलने का कारण यह होता है कि वह अपने किसी अन्य कारण से चर्चित होते हैं, न कि उस विषय के विद्वान होने के की वजह से ।

स्वतंत्रता के बाद इस देश में सभी संगठनों, संस्थाओं और व्यक्तियों की कार्यशैली का एक तयशुदा खाका बन गया है जिससे बाहर आकर कोई न तो सोचना चाहता है और न उसके पास ऐसे अवसर हैं। धर्म, विज्ञान, अर्थशास्त्र, साहित्य, राजनीति, फिल्म और अन्य क्षेत्रों में बहुत लोग सक्रिय हैं पर प्रचार माध्यमों में स्थान मिलता है जिसके पास या तो कोई पद है या वह उन्हें विज्ञापन देने वाला धनपति है या लोगों की दृष्टि में चढ़ा कोई खिलाडी या अभिनेता है-यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि उसे उस विषय का ज्ञान हो जिस पर वह बोल रहा हो। इसी कारण सभी प्रकार की बहस बिना किसी परिणाम पर समाप्त हो जाती हैं या वर्षों तक चलती रहती हैं। जैसे-जैसे इलेक्ट्रोनिक प्रचार माध्यमों का विस्तार हुआ है और बहस भी बढने लगी है और कभी-कभी तो लगता है कि प्रचार माध्यमों को लोगों की दृष्टि में अपना प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखने के लिए विषयों की जरूरत है तो उनमें अपना नाम छपाने के लिए उन्हें यह अवसर सहजता से प्रदान करते हैं।

अन्य विषयों पर बहस होती है तो आम आदमी कम ही ध्यान देता है पर अगर धर्म पर बहस चल रही है तो वह खिंचा चला आता है। धर्म में भी अगर भगवान् राम श्री और श्री कृष्ण का नाम आ रहा तो बस चलता-फिरता आदमी रूक कर उसे सुनने, देखने और पढने के लिए तैयार हो जाता है। मैं कुछ लोगों की इस बात से सहमत हूँ कि भगवान श्री राम और श्री कृष्ण इस देश में सभी लोगों के श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक हैं। लोग उनके प्रति इतने संवेदनशील होते हैं कि उनकी निन्दा या आलोचना से उन्हें ठेस पहुँचती हैं। इसके बावजूद कुछ लोग प्रचार की खातिर ऐसा करते हैं और उसमें सफल भी रहते हैं।

धर्म के संबंध में सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं किया गया पर इसके बावजूद इन्हें श्रद्धा भाव से पढने वालों की कमीं नहीं है। यह अलग बात है कि कोई कम तो कोई ज्यादा पढता है। फिर कुछ पढने वाले हैं तो ऐसे हैं जो इसमें ऐसी पंक्तियों को ढूंढते हैं जिसे उनकी आलोचना करने का अवसर मिले। वह पंक्तिया किस काल और संदर्भ में कही गयी हैं और इस समय क्या भारतीय समाज उसे आधिकारिक रुप से मानता है या नहीं, इस बात में उन्स्की रूचि नहीं होती। मुझे तो आश्चर्य तो तब होता है कि ऐसे लोग अच्छी बातों की चर्चा क्यों नहीं करते-जाहिर है कि उनका उद्देश्य ही वही होता है किसी तरह नकारात्मक विचारधारा का प्रतिपादन करें। मजे की बात तो यह है कि जो उनका प्रतिवाद करने के लिए मैदान में आते हैं वह भी कोई बडे ज्ञानी या ध्यानी नहीं होते हैं केवल भावनाओं पर ठेस की आड़ लेकर वह भी अपने ही लोगों में छबि बनाते हैं-मन में तो यह बात होती है कि सामने वाला और वाद करे तो प्रतिवाद कर अपनी इमेज बनाऊं।

मतलब यह कि धर्म मे विषय में ज्ञान का किसी से कोई वास्ता नहीं दिखता। एक मजेदार बात और है कि अगर किसी ने कोई संवेदनशील बयान दिया है प्रचार माध्यम भी उसके समकक्ष व्यक्ति से प्रतिक्रिया लेने जाते हैं बिना यह जाने कि उसे उस विषय का कितना ज्ञान है। भारत के प्राचीन ग्रंथों के कई प्रसिद्ध विद्वान है जो इस विषय के जानकार हैं पर उनसे प्रतिक्रिया नहीं लेने जाता जबकि उनके जवाब ज्यादा सटीक होते, पर उससे समाचारों का वजन नही बढ़ता यह भी तय है क्योंकि लोगों के दिमाग में भी यही बात होती है कि प्रतिक्रिया देने का हक केवल पद, पैसा और प्रतिष्ठा से संपन्न लोगों को ही है पंडितों (यहाँ मेरा आशय उस विषय से संबधित ज्ञानियों और विद्वानों से है जो हर वर्ग और जाति में होते हैं) को नहीं। वाद, प्रतिवाद और प्रचार के यह धुरी समाज कोई नयी चेतना जगाने की बजाय लोगों की भावनाओं का दोहन या व्यापार करने के उद्देश्य पर ही केंद्रित है।

इसलिये जब ऐसे मामले उठते हैं तब समझदार लोग इसमें रूचि कम लेते हैं और असली भक्त तो बिल्कुल नहीं। इसे उनकी उदासीनता कहा जाता है पर मैं नहीं मानता क्योंकि प्रचार की आधुनिक तकनीकी ने अगर उसके व्यवसाय से लगे लोगों को तमाम तरह की सुविधाएँ प्रदान की हैं तो लोगों में भी चेतना आ गयी है और वह जान गए हैं कि इस तरह के वाद,प्रतिवाद और प्रचार में कोई दम नहीं है।

विवाद से बचने के लिए व्यंजना विधा में लिखें


हिंदी भाषा में लिखने की तीय विधाएं हैं-शाब्दिक, लाक्षणिक और्र्र व्यंजना. इसमें सबसे बेहतर विधा व्यंजना मानी जाती है और पंचतंत्र की कहानिया इसका सबसे बड़ा अच्छा उदाहरण है. जो लोग व्यंजना विधा के ज्ञाता नहीं है तो यही कहेंगे कि उसमें तो मनुष्यों की कहानिया न होकर पशुओं की हैं. उन्हें पहली बट तो यह समझना चाहिए कि पशु कहानिया नहीं पढते दूसरे कि हमारे दर्शन के अनुसार समस्त जीवों में मूल गुण और स्वभाव एक ही जैसे होते हैं. काम,क्रोध, भोजन ग्रहण, निद्रा और बिमारी आदि सभी में होती है, पर मनुष्य में बुद्धि के साथ और विवेक भी होता है. आदमी जिस तरह प्रसन्न और अप्रसन्न होता है वैसे ही पशु भी होते हैं. पंचतंत्र की कहानिया मनुष्यों को जीवन का स्वरूप समझाने के लिक्ये ही लिखीं गईँ है.

शाब्दिक विधा में हम जिस व्यक्ति के बारे में लिख रहे हैं उसके बारे में सीधा लिख देते हैं. लाक्षणिक में हम उस व्यक्ति के लक्षणों को इंगित करने वाला पात्र गढ़ लेते हैं, और व्यंजना में हम उसके लिए कोई प्रतीक गढ़ते हैं. जैसे कोई पशु, खंबा, ट्यूब लाईट या कोई वाहन आदि. और उस पर लिखते ऐसे है कि पढने वाले को लगे कि किस तरफ इशारा किया जा रहा है. अक्सर लोग व्यंजना में लिखे गए विषयों को समझ नहीं पाते और जो समझते हैं वह ख़ूब मजा लेते हैं. हिंदी में भाषा में उसी लेखक को श्रेष्ठ मना जाता है जो व्यंजना में लिखते हैं. जो इस विधा में लिखते हैं वह निश्चिंत होकर लिखते हैं क्योंकि उन्हें संबंधित व्यक्ति जानते हुए भी कुछ नहीं कह सकता.

मैं व्यंग्य लिखता हूँ तब इसी विधा में लिखने का प्रयास करता हूँ-क्योंकि यह विधा उसकी मूल प्रकृति है. मैं अपनी सफलता और असफलता पर विचार का बोझ अब नहीं उठाता पर मुझे पढने वाले कुछ लोग हैं जो इशारा समझ जाते हैं. कुछ हास्य कवितायेँ जो वाकई काल्पनिक होती हैं और मैं उन पर कोई प्रमाण पत्र नहीं लगाता तो उस पर मेरे एक मित्र मजाक में लिख जाते हैं कि इस पर आपने डिसक्लैमर भी नहीं लगाया और हमारा सीधे नाम भी नहीं लिखा, इसे हम क्या समझें. कुछ में इशारा होता लगता है तो मैं प्रमाणपत्र लगा ही देता हूँ पर पढने वालों की तेज नजरें उसे पढ़ ही लेतीं हैं और वह कह भी जाते हैं कि इस पर क्या जरूरत थी जो डिसक्लैमर लगाया. जब कभी किसी पूरे समूह पर लिख रहे हैं तो यह विधा बहुत काम देती है और व्यंग्य का मतलब भी यही है कि वह व्यंजना विधा में होना चाहिए- नहीं तो उसे हास्य कहा जाता है.

जो लोग डरते हैं या वाद-विवाद से दूर रहना चाहिते हैं उनके लिए यह विधा ब्रह्मास्त्र का काम करती है. मैं इस विधा में लिखने को हमेशा लालायित रहता हूँ क्योंकि इससे आप अपनी बात कह भी जाते हैं और किसी विवाद भी नहीं होता. इसलिये जो लोग डरते हैं या विवाद से बचना चाहते हैं उन्हें इस व्यंजना विधा में काम करना चाहिए. एसा नहीं है कि लोगों को इसकी समझ नहीं है, यह अलग बात है कि अप लिखते किस तरह हैं और आपका प्रभाव कैसा है. मान लीजिये के मैं आज कंगारुओं और शेर के बीच मैच पर लिख दूं तो लोग हाल समझ जायेंगे कि यह भारत और आस्ट्रेलिया के बीच मैच के बारे में लिखा गया है पर उस पर लिखने से कोई प्रभाव नहें छोडेगा क्योंकि उसमें लेखक के लिए विवाद का कोई खतरा नहीं है इसलिये पाठक स्वीकार नहीं करेगा पर जहाँ किसी बड़ी ताक़त पर लिख रहे हैं और प्रतीक का इस्तेमाल करे तो पाठक उसे स्वीकार कर लेगा बशर्ते कि उसकी भाषा और प्रस्तुति प्रभावपूर्ण हो. वैसे आप व्यंजना विधा में लिखे या नहीं पर इस की जानकारी रखना चाहिए तो कई बेहतर सामग्री पढने को मिल जाती हैं जो लिखने का अच्छा अवसर प्रदान करती हैं. मेरा मानना है कि आप तब तक अच्छा नहीं लिख सकते जब तक आप पढेंगे नहीं.

अपने ही लोगों की वाह-वाही चाहिए


लिपि रोमन
हो गयी है कॉमन
अब इस दुनिया को कुछ नया चाहिए
जिन पर टिकाये बैठे हो
अपनी उम्मीद उस पश्चिम को
अपनी दुकानदारी अब हिंदी में चाहिए
रोमन में हिंदी चलाने की चाहत
रखने वालों से कोई शिकायत नहीं
देवनागरी से रहित होने पर
उनसे हमदर्दी जताना चाहिए
पर रोमन की गठरी सिर पर
रख कर घूमने वालों की दरियादिली
हिंदी भाषा को नहीं चाहिए
कभी हिंदी गरीबों की भाषा कहलाती थी
तब क्यों नहीं उठा था लिपि का सवाल
अब क्यों मच रहा है बवाल
अब ऐसा क्या हो गया कमाल
कि सबको हिंदी ही चाहिए

कहैं दीपक बापू
जब बन रहा था विश्व में
भारत एक आर्थिक महाशक्ति
तब ही हमें मालुम था कि
एक दिन लिपि पर ही होगा हमला
पश्चिम के सिमटते साम्राज्य की
थकी हारी अंग्रेजी और उसकी रोमन लिपि का
उठा लाएंगे इस देश में गमला
भारत के गरीब के जेब में
कुछ आयेगा पैसा
फिर भी रहेगा वह हिंदी से पहले जैसा
उसके जेब से पैसे निकालने के लिए
हिंदी का सहारा चाहिए
उठाएँ रहो रोमन का परचम
हम नहीं रोकेंगे
हम अपनी मातृभाषा को
शब्दों के तोहफे देवनागरी में ही सौंपेंगे
हमें अपने लिखे पर
अपने ही लोगों की वाह-वाही चाहिए

नोट-यह ऐक काल्पनिक हास्य कविता है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है, अगर किसी से इसका विषय मिल जाये तो यह संयोग मात्र होगा

हास्य कविता -धूल का प्रतिरोध


बहुत दिन बाद ऑफिस में
आये कर्मचारी ने पुराना
कपडा उठाया और
टेबल-कुर्सी और अलमारी पर
धूल हटाने के लिए बरसाया
धूल को भी ग़ुस्सा आया
और वह उसकी आंखों में घुस गयी
क्लर्क चिल्लाया तो धूल ने कहा
‘धूल ने कहा हर जगह प्रेम से
कपडा फिराते हुए मुझे हटाओ
मैं खुद जमीन पर आ जाऊंगी
मुझे इंसानों जैसा मत समझो
कि हर अनाचार झेल जाऊंगी
इस तरह हमले का मैंने हमेशा
प्रतिकार किया है
बडों-बडों के दांत खट्टे किये हैं
जब भी कोई मेरे सामने आया ‘
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श्रीगीता का ज्ञान


बचपन से ही पढते आ रहे
भक्ति भाव से श्रीगीता
फिर भी नही लगता आया हमें ज्ञान
पता नहीं लोग पढते हैं या नहीं
समझ से परे लगता उनका बखान

श्रीगीता का यही संदेश समझ में आता है
‘कर्म जैसा ही फल होगा
निष्काम भक्ति से परमात्मा प्रसन्न होंगे
करेंगे जीवात्मा का कल्याण’
ईश निंदा हेतु किसी के शीश पर प्रहार
करने का हमने नहीं देखा उसमें ज्ञान
परमात्मा द्वारा स्वत: ही
निंदकों के लिए किया गया है
कीट योनि में भेजने का विधान
कैसे ले सकता है यह जिम्मा कोई इन्सान

कहैं दीपक बापू
हो सकता है हमसे श्रीगीता का श्लोक
आख़िर हम हैं इन्सान और यह है भूलोक
न देवता हैं, न निवास है स्वर्ग लोक
गलतियों के पुतले हैं, देह का नहीं अभिमान
हम तो इतना जानते
युद्ध से विरक्त हो रहे अर्जुन को
वीरता दिखाने के लिए प्रेरित करते हुए भी
दिया था श्री कृष्ण जी ने अहिंसा का संदेश
सबके कर्मों का फल देने का
अपने पास ही रखा विधान
फिर भी महाज्ञानी होने का दवा नहीं करते
हम संशय से जूझ रहे हैं
ढूंढते हैं कोई ज्ञानी-ध्यानी
जो इस विषय पर हमें दे ज्ञान
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चाणक्य नीति:आडम्बर का अपना अलग ही महत्व


  • राजा, बालक, दुसरे का कुत्ता, मूर्ख व्यक्ति, सांप, सिंह और सूअर इन सात जीवों को सोते हुए से कभी नहीं जगाना चाहिए, इन्हें जगाने से मनुष्य को हानि ही हो सकती है लाभ नहीं। इनके आक्रमण करने से अपनी रक्षा करना कठिन होगा। अत: अच्छा यही है यदि वह सो रहे हैं तो उन्हें सोता छोड़ आगे बढ जाना चाहिए।
  • जो व्यक्ति निस्तेज यानी प्रभावहीन है न तो उसके प्रसन्न होने पर किसी व्यक्ति को अर्थ की प्राप्ति होती है न ही नाराजगी पर किसी सजा का भय ही प्रतीत होता है। जिसकी कृपा होने पर पुरस्कार न मिलता हो और न ही जो किसी को दण्ड देने का अधिकारी हो ऐसा व्यक्ति रुष्ट भी हो जाये तो कोई उसकी चिंता नहीं करता।
  • आज के युग में आडम्बर का अपना अलग ही महत्व है। वह झूठ भी हो तो भी आदमी को कुछ न कुछ लाभ मिल ही जाता है। सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह मुख तो फैला ही देता है जिससे लोग भयभीत होकर पीछे  जाते हैं। उसकी फुफकार ही दूसरों को डराने और अपनी रक्षा करने में पर्याप्त होती है। यदि सर्प अपने फन भी न फैलाये तो कोई बच्चा भी मार डालेगा। इसलिये कुछ न कुछ आडम्बर करना हर प्राणी के लिए आवश्यक है
  • स्वार्थी की नम्रता दिखावे की


    नमन नवां तो क्या हुआ, सुधा चित्त न ताहिं

    पारधिया दूना नवेँ, चीता चोर समान

    जिसके हृदय में सरलता और सहजता का भाव उसकी नम्रता और झुकना भी किस काम का? यूँ तो शिकारी भी शिकार करते समय झुक जाता है परन्तु अपने बाणों से मृग को मार देता है। उसी प्रकार स्वार्थ सिद्धि के स्वार्थी व्यक्ति झुक-झुक कर अपना काम निकलता है।

    लेखकीय अभिमत-हमने जीवन में कई बार देखा होगा कि कुछ लोग व्यवहार में सीमा से अधिक नम्रता दिखाते हैं और वह अपना काम जब निकाल जाते हैं और फ़िर पलट कर भी नहीं देखते तब हमें उनकी वास्तविकता का पत लगता है पर  हम कर कुछ नही सकते। इसलिये जो सीमा से अधिक विनम्रता दिखाते हैं, उनसे सतर्क रहना चाहिये।

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