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काली नीयत के तोहफे-हिंदी कविता


तोहफे देने वालों की
नीयत पर भला कौन शक करता है,
बंद हो जाते हैं अक्ल के दरवाजे
इंसान हाथ में लेते हुए आहें भरता है।
कहें दीपक बापू
आम आदमी के दिल से खेलने का
तरीका है तोहफे देना
जिसे पाने की करता है वह जद्दोजेहद
खोने की बात सोचने से भी डरता है।
——–
तोहफों का जाल बुनते हैं वह लोग
जिनके दिल मतलबी ओर तंग हैं,
कहें दीपक बापू
नीयत है जिनकी काली
बाहर दिखाते  वह तरह तरह के रंग हैं
——————
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश

Deepak raj kureja “”BharatDeep””

Gwalior madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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अब महान झगडा -व्यंग्य


फिल्म,खेल,कला और साहित्य का कोई देश नहीं होता-ऐसा जुमला हमारे देश के मूर्धन्य बुद्धिजीवी और लेखक मानते हैं पर अवसर पाते ही वह इनसे देशभक्ति के जज्बात जोड़ने से बाज नहीं आते। यह अवसर होता है जब कोई पश्चिम से किसी को पुरस्कार या सम्मान मिलता है या नहीं मिलता है। मिल जाये तो वाह वाह हो जाती है। देश का गौरव और सम्मान बढ़ने पर प्रसन्नता व्यक्त की जाती है और न मिले तो पश्चिमी देशों की उन संस्थाओं को कोसा जाता है जो इनको प्रदान करती है।
असल में बात यह हुई कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने अब तक दुनियां के महानतम बल्लेबाजों की सूची जारी की उसमें पहले दस में कोई भारतीय खिलाड़ी शामिल नहीं है। अपने प्रचार माध्यम उस सूची को पहले बीस तक ले गये क्योंकि बीसवें नंबर पर भारत के महानतम बल्लेबाज सुनील गावस्कर का नाम है-1983 में जीते गये इकलौते विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में वह भारतीय टीम के वह भी सदस्य था इसलिये उनकी महानता पर कोई संदेह नहीं है। बीस के बाद उनकी नजर 26 वें नंबर पर गयी जहां उस बल्लेबाज का नाम था जिसे भारतीय प्रचार माध्यम दुनियां के क्रिकेट का भगवान घोषित कर चुके हैं। हाय! यह क्या गजब हो गया। भारतीय प्रचार माध्यमों की हवा खराब हो गयी। इस देश की जनता का भ्रम टूट न जाये इसलिये उसे बनाये रखने के लिये उन्होंने बहस शुरु कर दी है और उस सूची को नकार ही दिया।

यह होना ही था। ईमानदारी की बात यह है कि ज्ञानी लोग खेल वगैरह में देशप्रेम जैसी बात जोड़ने का समर्थन नहीं करते। दूसरी बात यह है कि जिस भगवान के किकेट अवतार को भारतीय प्रचार माध्यम जिस तरह अपने व्यवसायिक मजबूरियों के चलते अभी तक ढो रहे हैं उसके खेल पर अपने देश में ही लोग सवाल उठाते हैं। इसमें भी एक मजेदार बात यह है कि जिन बीस भारतीय बल्लेबाजों के नाम है उनमें एक ही भारतीय है बाकी विदेशी है। इसलिये भारतीय लोग उस सूची को नकारने से तो रहे। वजह यह है कि इस देश के लोग यह जानते हुए भी कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ दूर के ढोलों पर ही अधिक यकीन करते हैं और यह प्रवृति प्रचार माध्यमों ने बढ़ाई हैं कमी नहीं की।

पहले 19 खिलाड़ी विदेशी महान होंगे इस बात पर इस देश के लोग यकीन कर लेंगे क्योंंकि वह देख रहे हैं कि जिस तरह इस देश के कथित कलाकार, खिलाड़ी, लेखक, पत्रकार तथा अन्य विशेषज्ञ विदेशी पुरस्कारों और सम्मानों के लिये मरे जाते हैं उस हिसाब से वहां योग्यता और तकनीकी के ऊंचे मानदंड होंगे। तय बात है कि 19 खिलाड़ी महान ही होंगे तभी तो उनको घोषित किया गया है। भारतीय प्रचार माध्यम क्रिकेट का गुणगान तो खूब करते हैं पर यह सच छिपा जाते हैं कि 1983 के बाद विश्व क्रिकेट के नाम यहां कुछ नहीं आया। फिर उनके ,द्वारा सुझाये गये महानतम बल्लेबाज की महानता का हाल यह है कि आजकल कई लोग चाहते हैं कि वह क्रिकेट से हट जाये मगर नहीं जनाब!

वह हर बार विश्व कप क्रिकेट कप का सपना दिखाता है पर वह पूरा नहीं होता। दावा यह है कि 19 साल से क्रिकेट खेल रहा है पर भई उसने कितने विश्व क्रिकेट जिताये मालुम नहीं। यह सही है कि महानतम की सूची में उस महानतम बल्लेबाज से पहले भी कई ऐसे बल्लेबाज हैं जिन्होंने अपने देश को विश्व कप नहीं जितवाया पर इसका दूसरा पक्ष यह भी कि उनमें अधिकतर के समय में विश्व कप होता भी नहीं था पर उन्होंने किकेट के विकास में वाकई उस समय योगदान दिया जब उसमें पैसा नहीं था। वैसे प्रचार माध्यम एक नहीं अपने तीन बल्लेबाजों के महानतम न होने पर नाराज है पर 26वें नंबर पर अपने अवतारी बल्लेबाज के होने पर अधिक बवाल मचा रहे हैं जिसका क्रिकेट के विकास में नहीं बल्कि उसके दोहन में अधिक योगदान रहा है।
यार, यहां भी इतने पुरस्कार मिलते हैं पर अपने देश के गुणी लोगों को पता नहीं वह हमेशा छोटे नजर आते हैं। हमारे यहां हर साल ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाता है पर प्रचार माध्यम उसका समाचार देकर फिर मूंह फेर लेते हैं पर अगर अमेरिका की कोई संस्था- जिसका नाम तक हम लोग नहीं जानते-अगर किसी को मिल जाये तो बस वह यहां भगवान बना दिया जाता है।

इसका परिणाम यह हुआ है कि जिन संस्थाओं को अपना नाम इस देश में नाम करना होता है वह यहां के किसी ऐसे अज्ञात आदमी को पुरस्कार देती है जिसने अपने जीवन में एकाध कोई किताब लिखी हो। हमारे यहां जिन लोगों को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलता है उन्होंनें कई किताबें लिखी होती हैं पर उनको प्रचार माध्यम पहचानते तक नहीं पर कोई एक पुस्तक लिखकर विदेश से पुरस्कार प्राप्त कर ले तो उसे बरसों तक ढोते हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जोकरों को पुरस्कार मिला हो। विदेशों से पुरस्कार विजेता तो ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि वह हर विषय में जानते हों। कई बार तो वह अपने देश के संवदेनशीन मामलों में ऐसे बोलते हैं जैसे कि देश के विरोधी बोल रहे हों। तब यह भी संदेह होता है कि कहीं ऐसे लोगों को बकवास करने के लिये ही तो कहीं इस आश्वासन पर तो विदेशों में सम्मान या पुरस्कार नहीं दिये जाते कि अपने देश के लोगों को भावनात्मक रूप से आहत करते रहना।

हिंदी फिल्मों का हाल देखिये। विदेशी पुरस्कारों के लिये सभी दौड़ते फिरते हैं। हालत यह है कि अगर कहीं फिल्म पुरस्कार के नामांकित हो जाये तो उसका जीभर के प्रचार कर लिया जाता है जैसे कि वह मिल ही गया हो-हालांकि यह उनको पता होता है कि वह नहीं मिलेगा शायद इसलिये प्रचार की सारी कसर नामांकन से इनाम बंटने की बची की अवधि में ही कर लेते हैं। इन हिंदी फिल्म वालों से पूछिये कि जब हिंदी फिल्मों या टीवी सीरियलों के लिये इनाम वितरण होता है तब क्या देश की गैर हिंदी फिल्मों को कभी वह इनाम देते हैं जैसा कि वह अमेरिका में अंग्रेजी फिल्मकारों के बीच सम्मान चाहते हैं। सच तो यह है कि हमारे देश के दक्षिण भाषी फिल्मकारों की बनी अनेक फिल्मों का हिंदी में पुर्नफिल्मांकन प्रस्तुत किया जाता है जो बहुत सफल रहती हैं। दक्षिण का फिल्म उद्योग हिंदी से तकनीकी,कला,कहानी,संगीत और पटकथा में अधिक सक्षम माना जाता है। फिर भी कभी आपने सुना है कि किसी दक्षिण भारतीय फिल्म को हिंदी फिल्म समारोह में कभी देश सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित किया गया हो। अपनों को सम्मान देने की बजाय दूसरों से इनाम पाने की चाहत ने गुणीजनों को पतन की गर्त में पहुंचा दिया है। सच तो यह है कि दक्ष हिंदी के लेखकों से तारतम्य के अभाव में हिंदी फिल्म उद्योग पैसा होते हुए भी लाचारगी की की स्थिति में हैं और उसकी अधिकांश फिल्में हालीवुड या दक्षिण भारतीय फिल्मों की नकल होती है। अपने ही हिंदी भाषी लेखकों,कलाकारों,गायकों, और संगीतकारों को कभी प्रोत्साहित न करने वाले हिंदी फिल्म उद्योग को विदेशों में सम्मान की आशा करना ही हास्यास्पद लगता है।

जी हां, सच यही है कि महानतम उस आदमी को कहा जाता है जो न केवल अपने जीवन में सफलता प्राप्त करे बल्कि दूसरों को भी ऐसी सफलता पाने में योगदान दे। भारत में एक ही महानतम क्रिकेट खिलाड़ी हुआ है वह कपिल देव क्योंकि उसके नाम पर एक विश्व कप हैं। हमारे महानतम हाकी खिलाड़ी स्व. ध्यानचंद के बाद वही एक लगते हैं महान जैसे। स्व. ध्यानचंद जी इसलिये महान नहीं थे कि हिटलर उनसे प्रभावित हुआ था बल्कि उन्होंने भारत को ओलंपिक में स्वर्ण पदक जितवाया था इसलिये महान कहे गये। इतना ही नहीं वह अपने खेल से अपनी टीम को प्रेरणा देते थे। सो प्रचार माध्यम यह समझ लें कि वह जिन खिलाडि़यों के महानतम न होने पर विलाप कर रहे हैं उस पर देश के लोगों की हमदर्दी उनके साथ नहीं है बल्कि उनके कार्यक्रम एक लाफ्टर शो की तरह दिख रहे हैं। वह अपने बताये माडलों को विश्व का महानतम बताने के लिये जूझ रहे हैं और यह पश्चिम वाले हैं गाहे बगाहे उन पर आघात कर जाते हैं।
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कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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रिश्ते हो जाते हैं बासी-हिन्दी शायरी


कभी कभी मन को घेर लेती है उदासी
दिन भर गुजरता है
जाने पहचाने लोगों के बीच
फ़िर भी अजनबीपन का अहसास साथ रहता है
जुबान से निकलते जो शब्द निकलते हैं
आदमी के दिल से उपजे नही लगते
उनका अंदाज़-ऐ-बयाँ साफ़ कहता है
सुबह जो बनते हैं रिश्ते
दोपहर तक हो जाते हैं बासी

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आंखों से परे का आकर्षण-हास्य व्यंग्य


पता नहीं कब कैसे इस देश में यह परंपरा शुरू हुई कि बाहर से जब तक आदमी प्रमाण पत्र नहीं मिले उसे घर में भी सम्मान नहीं मिलता। यहाँ कुछ लोकोक्तियाँ प्रचलित हैं जैसे-घर का ज्ञानी बैल सामान ,दूसरे गाँव का सिद्ध, और अपने घर में तो हर आदमी शेर होता है,आदि आदि। यह अपने देश के लोगों की मूल प्रवृतियों का परिचायक है। कितना भी अच्छा करो पर जब तक विदेश से कोई प्रमाणपत्र न मिले तब तक यहाँ किसी को सम्मानीय नहीं माना जा सकता।
हालांकि लोगों को समझाने के लिए यह भी कहा गया है कि दूर के ढोल सुहानी-यानी परे लगने वाली सभी शये आकर्षक लगती हैं। आजकल तो कई शहरों में कचडे के रंग बिरंगे डिब्बे भी दिखते हैं। दूर से देखने पर ऐसे दिखते हैं कि वहां कोई खानपान की दुकान होगी। पास जाने पर पता लगता है कि वह तो कचडे का डिब्बा है। बहरहाल यह लोगों की आदत हो गयी है कि कहीं भी जाकर अपने लिए ढोल बजवा लो तभी यहाँ आपको सम्मान मिलेगा। अपने देश के लोगों की आदत देखकर तो यही लगता है कि अगर दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी जी अगर अंग्रेजों को खिलाफ विजय दर्ज नहीं की होती तो शायद ही इसे देश के लोग उनका लोहा मानते हुए उनके अनुयायी बनते। उनका जीवन सदैव संघर्षमय रहा। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने संघर्ष अपनी आत्मा की आवाज पर शुरू किया था। उनकी कथनी और करनी में कभी कोई अंतर नहीं रहा पर लोगों ने उनसे कुछ और नहीं सीखा सिवाय इसके कि यहाँ लोकप्रिय होने के लिए विदेश में नाम कमाओ चाहे जिस तरह। उन्होंने अपने आन्दोलन के दौरान जो श्रम किया वह किसी के बूते का नहीं है-खासतौर से इस सुविधाभोगी युग में तो कतई नहीं। पर हाँ उन जितना तो नहीं पर उनकी तरह नाम कमाने की ललक कई महानुभावों में है।
लोगों की मानसिकता शायद इसी तरह की है कि वह दूसरे देशों या समाजों से सम्मानित होने पर ही लोहा मानते हैं। यही कारण है कि अधिकतर लब्ध प्रतिष्ठत लोग अपने लिए विदेश से कोई न कोई प्रमाण पत्र जुटाते हैं। इसके अलावा जिन महानुभावों को लगता है कि यहाँ नाम करने के लिए मेहनत करने की जगह सीधे विदेश से कोई सम्मान प्राप्त कर लो और वह सफल भी होते हैं। वैसे तो पहले विदेशी यहाँ सौ फीसदी विश्वसनीय माने जाते थे पर जब से फिक्सिंग वगैरह की बात चली है तो ऐसा भी लगता है कि विदेशी भी जरूर अपने लोगों को यहाँ प्रतिष्ठत करने के लिए कोई पुरस्कार दे सकते हैं। कुछ लोग अब जाकर ऐसे संशय उठाते हैं कि क्योंकि कुछ प्रतिभाशाली लोगों का यहाँ नाम इसलिए हुआ है कि वह विदेश से सम्मानित हैं। इनमें कुछ लेखक और चित्रकार हैं जो पहले विदेश में सम्मानित हुए तब यहाँ ऐसे चर्चित हुए कि प्रचार माध्यम उनकी बातें प्रकाशित ऐसे करते हैं जैसे कि वह ब्रह्म वाक्य हो।
अमेरिका की अनेक पत्रिकाएँ अपने यहाँ विश्व के प्रभावशाली,सैक्सी,धनी, विद्वान तथा अन्य अनेक तरह की सूचियां छपते हैं जिसमें स्त्री पुरुष दोनों के नाम होते हैं। इसमें अगर किसी भारतीय का नाम होता है तो अपने प्रचार मध्य उछाले लगते हैं। दूसरे से लेकर दसवें तक हो तो भी उछालते हैं और पहले पर हो तो कहना ही क्या? लगता है कि भारत की वजह से उन्होंने तमाम तरह की श्रेणियां भी बना दीं हैं। किसी की आँखें सेक्सी तो किसी की टांगें तो किसी की आवाज को सेक्सी घोषित कर देते हैं। अनेक लोग समाज सेवा और अपने प्रभाव की कारण भी चर्चित होते हैं।
इनमें जो नाम होते हैं उनमें कई लोगों का नाम चचित भी नहीं होता क्योंकि जन सामान्य उनका कोई सीधे सरोकार नहीं होता पर जो उनके ‘प्रभाव क्षेत्र’ में होते हैं वह आम आदमी का ही नही बल्कि समाज और देश का भविष्य तय करते हैं। कई लोगों को गलतफ़हमी होती है कि अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशो के राज प्रमुख दुनिया से सबसे ताक़तवर और प्रभावशाली लोग हैं उन्हें ऎसी रिपोर्ट बडे ध्यान से पढ़ना चाहिए। आखिर वह अपने राष्ट्र प्रमुखों को प्रभावशाली क्यों नहीं मानते जबकि विश्व में उनको सबसे ताक़तवर माना जाता है। आजकल भारत पर उनको अधिक ही मेहरबानी हैं और यहाँ के अभिनेता और अभिनेत्रियों के नाम भी इन आलीशानों की सूची में शामिल करते हैं।

हमारे देश में अगर आप किसी व्यक्ति से प्रभावशाली लोगों के बारे में सवाल करेंगे तो वह अपने विचार के अनुसार अलग-अलग तरह के प्रभाव के रुप बताएंगे। हाँ यहाँ उन लोगों को जरूर प्रभावशाली माना जाता है जो घरेलू हितों के लिए सार्वजनिक काम में पहुँच बनाकर करा लाते हैं। आम आदमी की दृष्टि में प्रभाव का सीधा अर्थ है ‘पहुंच’। लोगों के निजी और सार्वजानिक कामों में कठिनाई और लंबी प्रक्रिया के चलते इस देश में उसी व्यक्ति को प्रभावशाली माना जाता रहा है जो अपनी पहुँच का उपयोग कर उसे करा ले आये। इस कारण दलाल टाईप के लोग भी ‘प्रभावशाली ‘ जैसी छबि बना लेते हैं। अब जैसे-जैसे निजीकरण बढ़ रहा है वैसे ही उन लोगों की भी पूछ परख बढ़ रही है जो धनाढ्य लोगों के मूंह लगे हैं, क्योंकि वह भी अपने यहाँ लोगों को नौकरी पर लगवाने और निकलवाने की ताक़त रखने लगे हैं। हर जगह तथाकथित रुप से प्रभावशाली लोगों का जमावड़ा है और तय बात है कि वहाँ चाटुकारिता भी है। इसके बावजूद उनको सम्मानीय नहीं माना जाता क्यों कि इसके लिए उनके पास विदेश से प्रमाण पत्र के रूप में कोई सम्मान नहीं होता।

प्रभावशीलता और चाटुकारिता का चोली दामन का साथ है। सही मायने में वही व्यक्ति प्रभावशाली है जिसे आसपास चाटुकारों का जमावड़ा है-क्योंकि यही लोगों वह काम करके लाते हैं जो प्रभावी व्यक्ति स्वयं नहीं कर सकता है। वैसे भी हमारे देश में बचपन से ही अपने छोटे और बड़े होने का अहसास इस तरह भर दिया जाता है कि आदमी उम्र भर इसके साथ जीता है और इसी कारण तो कई लोग इसलिये प्रभावशाली बन जाते हैं क्योंकि वह लोगों के ऐसे छोटे-मोटे कुछ पैसे लेकर करवा देते हैं जो वह स्वयं ही करा सकते हैं-जिसे दलाल या एजेंट काम भी कहा जाता है और लोग उनका इसलिये भी डरकर सम्मान करते हैं कि पता नहीं कब इस आदमी में काम पड़ जाये। मजे की बात यह है कि घर का आदमी ही बाहर का मुश्किल काम कराकर लाये तो उसे “पहुँच” वाला नहीं माना जाता जब तक बाहर सम्मानित न हो जाए।
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इसलिए अपने मोहरे पिटवा रहे हैं-व्यंग्य कविता


इंसानों से नहीं होती अब वफादारी
फिर भी जमाने से चाहते हैं प्यार
हो गये हैं दीवानों से
लगाते हैं एक दूसरे पर इल्जाम
खेल रहे हैं दुनिया भर के ईमानों से
अपने तकदीर की लकीर बड़ी नहीं कर सकते
इसलिए एक दूसरे की थूक से मिटा रहे हैं
तय कर लिया है खेल आपस में
जंग करते शतरंज की तरह
इसलिए अपने मोहरे पिटवा रहे हैं
जीतने वाले की तो होती चांदी
हारने वाले को भी मिलता है इनाम
नाम के लिए सभी मरे जा रहे हैं
सजाओं से बेखबर कसूर किये जा रहे हैं
कभी भेई टूट सकता है क़यामत का कहर
पर इंसान जिए जा रहे हैं अक्ल के परदे बंद कर
भीड़ दिखती हैं चारों तरफ पर
शहर फिर भी लगते हैं वीरानों से

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अपने पर मर मिटने वालों की कमी नहीं -हास्य कविता


पूरी उम्र फिक्र करते रहे
कयामत के खौफ और इंतजार की
पर वह नहीं आयी
आंखें तब खुलीं जब
फिक्र ही कयामत लायी
……………………………
उनका ‘बेफिक्र रहो’ कहने से ही

अपनी फिक्र बढ़ जाती है

क्योंकि फिर उनको हमारी याद नहीं आती

उनकी बेफिक्री बहुत डराती है

उनके लिये यह दो लफ्ज हैं

जिसकी जगह उनके दिल में ही नहीं होती

ऐसे में फिर फिक्र कहां दूर हो पाती है
…………………………

लोग कुछ इस तरह किये जाते हैं

जैसे दुनियां में उनके नाम के ही

सभी जगह कसीदे पढे जाते हैं

आत्म मुग्ध लोगों की कमी नहीं

इस जमाने में

तारीफ़ के काबिल लोग

इसलिये किसी के मूंह से

अपने लिये कुछ अच्छे शब्द सुनने को

तरस जाते हैं

शायद इसलिये ही

चमक रहे आकाश में कई नाम

गरीब लोगों की भलाई के सहारे

फ़िर भी गरीबी से सभी हारे

क्योंकि भलाई एक नारा है

जिसके पांव ज़मीं पर नज़र नहीं आते हैं
———————–

उनका दिल समंदर है

इसलिये ही ज़माने भर का माल

उनके घर के अंदर है

ज़माने भर की भलाई का ठेका लेते हैं

सारी मलाई कर देते हैं फ़्रिज़

छांछ पिला देते हैं अपने ही गरीब चाकरों को

जो उनकी नज़र में पालतू बंदर हैं
———————–

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रहीम के दोहे: मनुष्य को उसके कर्म नचाते हैं


ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गात
अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ

कविवर रहीम कहते हैं कि जैसे नट कठपुतली को नचाता है वैसे ही मनुष्य को उसके कर्म नाच करने के लिऐ बाध्य करते हैं। जिन्हें हम अपने हाथ समझते हैं वह भी अपने नियंत्रण में नही होते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जब मैं रहीम के दोहे देखता हूं तो सोचता हूं कि इस संत ने जीभर कर जीवन का आनंद लिया होगा। किसी प्रकार के भ्रम में नहीं जीना ही मनुष्य की पहचान है और रहीम हमेशा सत्य के साथ जिये। सामान्य आदमी कितना भ्रम में जीता है यह उनके दोहे पढ़कर समझा जा सकता है। सभी लोग और आपको कर्ता समझते है जबकि सभी जीवों का शरीर पांच तत्वों से बना वह पुतला है जिसमें तीन प्रकृतियां-मन, बुद्धि और अहंकार -अपना काम करती हैं। आंख है तो देखेगी, कान है तो सुनेंगे, नाक है तो सूंघेगी, पांव है तो चलेंगे और हाथ हैं तो हिलेंगे। मन विचार करता है, बुद्धि योजना बनाती है और अहंकार उकसाता है। हम सोचते हैं कि हम करते हैं जबकि हम तो एक तरह से सोये हुए हैं। अपने आपको देखते ही नहीं। हमारी आत्मा तो परमार्थ से प्रसन्न होती है पर हम अपने कर्मों के अधीन होकर स्वार्थ में लगे रहते हैं जबकि यह काम तो हमारी इंद्रियां तब भी करेंगी जब इन पर नियंत्रण करेंगे। मतलब हम जो कर रहे हैं वह तो करेंगे ही पर जो हमें करना चाहिए परमार्थ वह करते नहीं। सत्संग और भक्ति केवल दिखावे की करते है। कुल मिलाकर कठपुतली की तरह नाचते रहते हैं।
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कैसा विश्वास जगाते हैं


अपने विश्वास पर बहुत इतराते हैं
पर चंद अल्फाज़ ही उन्हें डराते हैं
अपनी ही पढी किताब से
निकले अल्फाज़ से वह
जमाने को रौशन करने का
करते हैं दावा
पर दूसरे की किताब में
लिखे शब्द से घबडाते हैं
दुनिया में प्यार का सन्देश फैलाने की
करते हैं बात
पर सर्वशक्तिमान का डर फैलाते हैं
दिल में ही रहता है डर और प्यार
और वह डराकर लोगों के
दिल में प्यार जगाते हैं
चंद अल्फाजों से जो टूट जाये विश्वास
उसे ही लोगों के दिलों में जगाते हैं
———————————

कुछ लोगों के लिए समाज सेवा फैशन है


आखिर समाज सेवा है क्या? उसका स्वरूप क्या है? यह आज तक कोई नहीं समझ पाया। हमें तो अपने धर्म ग्रंथों से यही सन्देश पाया है की सहृदय, दयालु, परोपकारी और दानशील बनो-अब यह पता नहीं है की इससे समाजसेवा होती है की नहीं।

आए दिन कहीं न कहीं सुंदरी प्रतियोगिता होती है तो कहीं नाच-गाने के कार्यक्रमों को ही प्रतियोगिता के रूप में पेश किया जाता है जिसके विजेता अपना अगला कार्यक्रम ‘समाज सेवा” बताते हैं। कई बडे लोग अपने नाम के आगे समाज सेवी का परिचय लगवाते हैं तो कुछ बुद्धिजीवी भी और कुछ नहीं तो अपने नाम के आगे ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ शब्द लगवाकर अपने को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। कहा जाता है जो कुछ नहीं कर सकता वह राजनीति में चला जाता है और जो नहीं कर सकता वह समाज सेवा में चला जाता है। सबसे बड़ी बात तो यह हो गई है की अब समाज सेवा के लिए धन जुटाने हेतु प्रतिष्ठित खेलों के मैच और नाच-गाने के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाने लगे हैं-उनसे कितनी सेवा होती है कभी पता ही नहीं चलता।

वैसे किसी गरीब की आर्थिक सहायता करना, असहाय बीमार की सेवा सुश्रुपा करना और जिन्हें विद्या की आवश्यकता है पर वह प्राप्त करने में असमर्थ हैं उनका मार्ग प्रशस्त करना ऐसे कार्य हैं जो हर समर्थ व्यक्ति को करना चाहिए। इसे दान की श्रेणी में रखा जाता है और यह समर्थ व्यक्ति का दायित्व है कि वह करे। इतना ही नहीं करने के बाद उसका प्रचार न करे क्योंकि यह अहंकार की श्रेणी में आ जायेगा और उस दान का महत्व समाप्त हो जायेगा। कहते भी हैं कि नेकी कर और दरिया में डाल। अगर हम अपनी बात को साफ ढंग से कहें तो उसका आशय यही है कि व्यक्ति की सेवा तो समझ में आती है पर समाज सेवा एक ऐसा शब्द है जो कतिपय उन कार्यों से जोडा जाता है वह किये तो दूसरों के जाते हैं पर उसमें कार्यकर्ता की अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढाने में सहायक होते है- और कहीं न कहीं तो इसके लिए उनको आर्थिक फायदा भी होता है।

आजकल टीवी और अखबारों में तथाकथित समाज सेवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम आते रहते हैं। अगर उनकी कुल गणना की जाये तो शायद हमारे समाज को विश्व का सबसे ताक़तवर समाज होना चाहिऐ पर ऐसा है नहीं क्योंकि उनसे कोई व्यक्ति लाभान्वित नहीं होता जो समाज की एक भौतिक और वास्तविक इकाई होता है। समाज सेवा बिना पैसे के तो संभव नहीं है और समाज सेवा के नाम पर कई लोगों ने इसलिए अपनी दुकाने खोल रखीं है ताकि धनाढ्य वर्ग के लोगों की धार्मिक और दान की प्रवृति का दोहन किया जा सके। कई लोग समाज सेवा को राजनीति की सीढियां चढ़ने के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। आजकल समाज सेवा की नाम पर जो चल था है उसे देखते हुए तो अब लोग अपने आपको समाज सेवक कहलाने में भी झिझकने लगे हैं। समाज सेवा एक फैशन हो गया है।

एक आदमी उस दिन बता रहा था कि सर्दी के दिनों में एक दिन वह एक जगह से गुजर रहा था तो देखा एक कार से औरत आयी और उसने सड़क के किनारे सो रहे गरीब लोगों में कंबल बांटे और फुर्र से चली गयी। वहाँ कंबल ले रहे एक गरीब ने पूछा’आप कौन हैं, जो इतनी दया कर रहीं है?’

उसने हंसकर कहा-‘मैं कोई दया नहीं कर रहीं हूँ। ईश्वर ने जो दिया है उसे ही बाँट रही हूँ। मैं तो कुछ भी नहीं हूँ। यह सब भगवान की रची हुई माया है।’

उस आदमी ने वहाँ खडे होकर यह घटना देखी थी। उसका कहना था कि ‘कंबल भी कोई हलके नहीं रहे होंगे।’
ऐसे अनेक लोग है जो सच में समाज सेवा करते हैं पर प्रचार से दूर रहते हैं. कुछ धनी लोग दान करना चाहते हैं पर नाम नहीं देना चाहते इसलिए वह बिचोलियों का इस्तेमाल करते हैं जो समाजसेवा की आड़ में उनके पास पहुच जाते हैं, और चूंकि उनका मन साफ होता है इसलिए कोई सवाल जवाब नहीं करते-पर इससे तथाकथित समाज सेवियों की बन आती है।

आज के ही अखबार में पढा कि एक गरीब लड़की के इलाज के लिए पैसे देने की पेशकश लेकर एक आदमी उनके दफ्तर में पहुंच गया पर उसने शर्त रखी कि वह उसका नाम नहीं बताएँगे। उस अखबार ने भी उसकी बताई राशि तो छाप दी पर नाम नहीं लिखा। अब चूंकि वह एक प्रतिष्ठित अखबार है तो वह रकम वहाँ तक पहुंच जायेगी पर कोई तथाकथित समाज सेवी संस्था होती तो हो सकता है उसके लोग उसमें अपनी भी जुगाड़ लगाते। मैंने पहले ही यह बात साफ कर दी थी की व्यक्ति की सेवा तो समझ में आती है समाज सेवा थोडा भ्रम पैदा करती है। व्यक्ति की अपनी जरूरतें होती हैं और उसको समाज से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता।

अब तो कई बार समाज सेवा शब्द भी मजाक लगने लगता है जब उसके नाम पर संगठन बनाए जाते हैं और कहीं तो आन्दोलन भी चलते हैं। आन्दोलन शब्द ही राजनीति से जुडा है पर उसमें विवाद होते हैं उसकी वजह से सामाजिक आन्दोलन के नेता अपने को सामाजिक कार्यकर्ता ही कहते हैं। यह अलग बात है की सुविधानुसार वह करते तो किसी न किसी तरह वह सुर्खियों में बने रहते हैं। सच तो यह है समाज सेवा अभी तक साफ सुथरा शब्द है इसलिए कई लोग इसकी आड़ में अपनी छबि चमकाते हैं। ऐसा नहीं है की देश में गरीबों और निराश्रितों की सेवा करने वाले संगठन नहीं है पर वह इस प्रचार से दूर रहते हुए अपने काम करते हैं और जो प्रचार करते हैं वह व्यक्ति की सेवा कम अपने नाम के लिए ज्यादा काम करते हैं। उनका लक्ष्य समाज सेवा यानि आत्म प्रचार और विज्ञापन है।

ऐसे लोग कहाँ से लायेंगे-हास्य कविता


गुरूजी ने चेले से कहा
‘लोग रामजी का नाम तो
चाहे जब लेते हैं
अपने मन में रावण जैसे
चरित्र को ही जगह देते हैं
रामजी के मंदिर तो बहुत हैं
पर हमें तो सभी जगह
रावण का अस्तित्व नजर आता
समझ में नहीं आता आगे हम कहाँ जायेंगे”

चेले ने कहा
‘गुरूजी मुझसे कह दिया पर
कहीं और मत कहना
गजब हो जायेगा वरना
आपके प्रवचनों में तो
बस अपने घर से
पत्नी द्वारा सताए
और मार-मारकर भगाए
कुछ आदमी ही आते हैं
पत्नी भक्त तो अपने पड़ोस वाले
गुरु के दर्शन करने जाते हैं
अगर आपकी बात
आपके भक्तों को पता चली तो
सब वहीं डेरा जमायेंगे
वह ढूंढते हैं उस किसी कुशल रावण को
जो उनको ऐश करा सके
कहते आप ज़रूर हैं पर
आपने भी रावण कहां देखा है
फ़िर भला उसका
पता हम किस किसको बताएँगे
वैसे तो भक्ति की आड़ में कई
अपने धंधे चल रहे हैं
पर कलियुग में कहीं
सतयुग जैसा खेल शुरू भी करें
तो रावण तो कई मिल जायेंगे
इस युग में कोई असली तो क्या
नकली जंग भी संभव नहीं
पर फिरौती देकर अपनी भार्या को छुडायें
ऐसे लोग कहाँ से लायेंगे
आप चाहे रावण को कितना भी याद रखो
पर लोगों को रामजी का नाम ही जपायेंगे
नहीं तो आप और आपके गुरुभक्त चेले
बुरी तरह पछताएँगे
जो धंधे चल रहे हैं वह भी बंद हो जायेंगे.’

ढूंढ नही पाता अपना वजूद


अपनी जरूरतों को पूरा करते हुए
कर्ज के पहाड़ पर चढा गया
ब्याज की सीढियों पर
आसमान की तरह बढ़ता गया
अब वही पहाड़ उसके सिर पर पढा है
उसका सिर सीढियों में तस्वीर की तरह मढा है
आंखों से ढूंढ नहीं पाता अपना वजूद
कानों से सुन नहीं पाता मरदूद
आवाज गयी है ग़मों में डूब
वह खडा किसी फ़रिश्ते के इन्तजार में
जो भी गुजरा उसके पास से
वह शख्स उसके सामने से
देखे बगैर बढ़ता गया
—————————————-

कहीं लगते हैं कर्ज के मेले
कही दिखते हैं मर्ज दूर करने के ठेले
होर्डिंग पर लिखे आकर्षक नाम
पढ़ने में कितने भी अच्छे लगें
दूर रहना उनसे तू अलबेले
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मैं अभद्र शब्द लिखूंगा तुम खंडन कर देना


पहला ब्लोगर घर के दरवाजे से बाहर निकल ही रहा था की दूसरा ब्लोगर वहाँ पहुंच गया। उसे देखकर वह गया और उसे खींचकर घर से दूर ले गया और बोला-”तुम यहाँ क्यों आये? तुम्हारे बारे में अपने घर में मैंने बताया है कि मित्र हो कोई ब्लोगर नहीं।”

दूसरा ब्लोगर बोला-”यार तुम भी मेरी तरफ डरपोक हो,अपने घरवालों से घबडाते हो।”
पहला ब्लोगर”-नहीं मैं तुमसे अधिक डरपोक हूँ, बताओ क्यों आये हो?”
दूसरा ब्लोगर-यार बहुत दिन से ब्लोगिंग नहीं की, और घर पर कभी मेरे बच्चे अब मुझे बैठने नहीं देते, और कुछ न कुछ सीखने के नाम पर उससे चिपके रहते हैं और जब कुछ कहता हूँ तो उनकी मान लड़ने आ जाती है। उससे भी बचता हूँ तो उधार वापस मांगने वाले आ जाते हैं। मैंने सोचा तुम्हारे घर पर ही ब्लोगिंग कर लूं। इससे हम दोनों को फायदा होगा। पर जाने दो यार! तुम घर पर मुसीबत में न आ जाओ इसलिए जाता हूँ।

पहला ब्लोगर बोला-”हाँ जाओ, पर मैं किसी डर के कारण तुमको जाने के लिए नहीं कह रहा हूँ, तुम्हारी ब्लोगिंग से मुझे खतरे हैं इसलिए तुम्हें अपने घर पर इसकी इजाजत नहीं दे सकता।”

“क्या ख़तरा है? मैं कोई पोस्ट थोडे ही लिखता हूँ। कमेन्ट ही तो लिखनी है। बहुत दिन से मेरे दोस्त याद कर रहे होंगे।”दूसरा बोला।
”कमेन्ट! तुम कमेन्ट लिखते हो। ताज्जुब है?”पहले ने हैरान होने का नाटक करते हुए कहा।

”और क्या लिखता हूँ?”दूसरे ने कहा।
”मेरे ख्याल से उसे अभद्र शब्दों का पिटारा कहना चाहिए। नहीं, तुम जाओ। यहाँ मुझे फंसा दोगे।”पहले ने कहा।

दूसरे ने कहा-”नही यार, तुम मुझे गलत मत समझो। गाली देकर दिर माफ़ी भी तो मांग लेता हूँ। वैसे तुम्हारे पास आने का एक और भी कारण था। मैं अपने ईमेल का पासवर्ड भी भूल गया हूँ। सोचा तुम्हारे ईमेल पर ही काम कर लूं।”
”तब तो बिलकुल नहीं।”पहले ब्लोगर ने कहा–”तुम जैसे आदमी को अपने ईमेल का इस्तेमाल करने जैसे बेवकूफी नहीं करूंगा। कहीं तुने अंट-शंट लिख दिया तो क्या जवाब दूंगा। ईमेल तो साफ पढ़ने में आता है।”

”कोई बात नहीं, वैसे तो कोई ब्लोगर इतनी खोजबीन नहीं करता और कोई करे भी तो खंडन कर देना। मैं अभद्र शब्द लिखूं तुम अपनी तरफ से खंडन कर देना.” दूसरे ब्लोगर ने कहा।

”नहीं, बिलकुल नहीं!” पहेल ब्लोगर ने कहा
”यार, तुमने वाकई सही कहा था मुझसे अधिक डरपोक हो। मैं कई बार ऐसा कर चुका हूँ, पहले जो चाहे लिख देता हूँ फिर कहीं माफ़ी मांगता हूँ कहीं नहीं। अब इसके तुम्हारा क्या जाता है? मैं अंट-शंट लिख दूं तो तुम खंडन कर देना.”

पहले ब्लोगर ने आँखे तरेरते हुए कहा-”मैं अंट-शंट लिखने और कहने में डरपोक हूँ पर सुनने और पढ़ने में बिलकुल नहीं समझे। एक बात तुम्हारी गलती माफ़ कर चुका हूँ पर अब उम्मीद नहीं करना।”

दूसरा बोला-”यार गुस्सा क्यों करते हो अब मैं जा रहा हूँ, पर हाँ इस ब्लोग मीट पर जरूर लिखना। वैसे मैंने सोचा कि तुमने काम करने दिया तो ठीक और नहीं तो ब्लोगर मीट तो हो ही जायेगी।

वह चला गया तो पहला ब्लोगर सोच में पड़ गया कि ‘यह भला कि भला यह किस तरह की ब्लोगर मीट थी। फिर उसे याद आया कि उसने यह तो बताया ही नहीं कि इस ब्लोगर मीट पर कविता लिखना है कि नहीं। फिर टी किया कि इस बार हास्य आलेख ही लिख देता हूँ, अगली बार पूछ लूंगा। वह अपनी होठों में बुदबुदाया’मैं अंट-शंट लिख दूं तुम खंडन कर देना.

नोट-यह मेरा हास्य आलेख स्वरचित और काल्पनिक है और किसी घटना और व्यक्ति से इसका कोई संबन्ध नहीं है और अगर किसी की खुराफात से मेल खा जाये तो वही जिम्मेदार है क्योंकि इन पंक्तियों का लेखक किसी ऐसे ब्लोगर से मिला ही नहीं जो अभद्र शब्द लिखता हो।

गरीबी अपना वजूद नहीं खोती


देश में कई लोग अभी भी
टाँगे और बैलगाडी चलाते
कई जगह हाथ रिक्शा भी
खींचे हुए गरीब पसीना बहाते
कई लोगों ने उनकी तस्वीर कैनवास पर
उतारकर जमाने भर को दिखाई
और खूब ख्याति पाई
भले ही गरीब को निजात नहीं दिलाते
पर बडे हमदर्द कहलाते

कुछ ने लिखे लंबे-लंबे उपन्यास
कोई आयेगा पढ़कर
करेगा तुम्हारी मदद दिलाई आस
लिखने वालों के नाम पर ढेर सारे
इनाम आ जाते
पर गरीब फिर भी गरीब रह जाते

शायद बनाने वाले ने गरीब
बनाये इसलिए कि
अमीरों के काम आ सकें
और उनकी गरीबी पर
दिखाई हमदर्दी पर
बुद्धिमान अपना बाजार सजा सकें
इसलिए गरीबी हटाओ के नारे से
गूंजता है धरती और आकाश
गरीब होता दर-ब-दर
पर वह अपना वजूद नहीं खोती
वहाँ राज्य करती है
जहाँ गरीब अपना वजूद ढूँढने जाते

शब्द का भी होता है नकाब-hindi poem


अपने चरित्र पर लगे काले दागों से
जो लोग घबडाते हैं
वही अपना सच छुपाने के लिए
शब्दों का नकाब लगाते हैं
यूं तो शब्द सौन्दर्य की रचना
उनके लिए खेल होता है
पर उनके अर्थों में ढूंढो तो
खोखले भाव सहजता से
सामने आते हैं
शब्दों के नकाब में उनके सच को
पकड़ने के लिए दिल की नहीं
होती है दिमाग की जरूरत
क्योंकि उनके शब्द भावना से नहीं
निज स्वार्थ के लिए रचे जाते हैं
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किसी के ख्यालों में खो जाना
किसी के वादों में बहकना
किसी के इरादों के साथ बह जाना
क्या कहलाता है प्यार
जिसमें कुछ पल का भटकने की
सजा भी मिल सकती है
जिन्दगी में हर कदम पर बारंबार
कोई एक पहचान खोये
दूसरा उस पर थोपे अपना नाम
बराबरी की शर्त पूरी
नहीं करता ऐसा प्यार
एक खेलता है
दूसरा देखता है
वासना में लिपटा बदन मचले
कहलाता नहीं प्यार
दिल में भोगने की चाहत पूरी करना
जिस्म में जलती आग बुझाना तो
सभी चाहते हैं
पर त्याग और यकीन पर खरे उतरें
कुछ पाने की चाह न हो
तभी कहलाता है प्यार
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झूठ को सच जैसा सजाता है विज्ञापन


गुलाब का फूल कभी नहीं करता
अपनी  सुगंध का  विज्ञापन
उसकी सुगंध से महकता है
अपने आप ही घर का आंगन
कमल का फूल कभी अपने गुणों का
बखान नहीं करता
आदमी की आँखों को
वैसे ही लगता है मनभावन
जिनमें भाव की गहराई  नहीं
ऐसी तुकबंदी को कितना भी सुनाओ
नहीं पहुंच पाती कानों से आगे
दिल को छू लें ऐसे शब्दों से सजे
गीत जब भी कानों में गूंजें
अच्छे लगे
बसंत हो या सावन
शायद इसलिए अब जज्बात
कहीं अँधेरे में खोये लगते हैं
जो सच में खूबसूरत है चेहरे
कहीं सोये लगते हैं
लोग ज्ञान और श्रद्धा में
रमने की बजाय
आत्मविज्ञापन में भटकते हैं
सच कितना भी खूबसूरत हो
लोगों के सामने नहीं आता
झूठ को ही सजा लेता है
एकदम सच जैसा विज्ञापन

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