Tag Archives: विचार

आसमान से रिश्ते तय होकर आते हैं-हिन्दी कविताएँ


उधार की रौशनी में
जिंदगी गुजारने के आदी लोग
अंधेरों से डरने लगे हैं,
जरूरतों पूरी करने के लिये
इधर से उधर भगे हैं,
रिश्त बन गये हैं कर्ज जैसे
कहने को भले ही कई सगे हैं।
————–
आसमान से रिश्ते
तय होकर आते हैं,
हम तो यूं ही अपने और पराये बनाते हैं।
मजबूरी में गैरों को अपना कहा
अपनों का भी जुर्म सहा,
कोई पक्का साथ नहीं
हम तो बस यूं ही निभाये जाते हैं।
————–
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

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पहाड़ से टूटे पत्थर-हिन्दी व्यंग्य कविता


पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
———–
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

हैवानों से समझौता-हिन्दी कविता


वह खून की होली खेलकर
लाल क्रांति लाने का सपना दिखा रहे हैं,
भरे पेट उनके रोटी से
खेल रहे हैं
बेकसूरों की शरीर से निकली बोटी से,
हैवानियत भरी सिर से पांव तक उनके
वही गरीबों के मसीहा की तरह नाम लिखा रहे हैं।
———-
गोली का जवाब गोली ही हो सकती है
जानवरों से दोस्ती संभव है,
अकेले आशियाना बनाकर
जीना भी बुरा नहीं लगता
पर हैवानों से समझौता कर
अपनी अस्मिता गंवाना है,
लड़ने के लिये उनको
फिर लाना कोई नया बहाना है,
कत्ल करने के लिये तत्पर हैं जो लोग,
उनको है खूनखराबे का रोग,
कत्ल हुए बिना वह नहीं मानेंगे,
जिंदा रहे तो फिर बंदूक तानेंगे,
सज्जन होते हैं ज़माने में
असरदार उन पर ही मीठी बोली हो सकती है।
————

कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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‘भ्रष्टाचार’ किसी कहानी का मुख्य विषय क्यों नहीं होता -आलेख


स्वतंत्रता के बाद देश का बौद्धिक वर्ग दो भागों में बंट गया हैं। एक तो वह जो प्रगतिशील है दूसरा वह जो नहीं प्रगतिशील नहीं है। कुछ लोग सांस्कृतिक और धर्मवादियों को भी गैर प्रगतिशील कहते हैं। दोनों प्रकार के लेखक और बुद्धिजीवी आपस में अनेक विषयों पर वाद विवाद करते हैं और देश की हर समस्या पर उनका नजरिया अपनी विचारधारा के अनुसार तय होता है। देश में बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकटों पर पर ढेर सारी कहानियां लिखी जाती हैं पर उनके पैदा करने वाले कारणों पर कोई नहीं लिखता। अर्थशास्त्र के अंतर्गत भारत की मुख्य समस्याओं में ‘धन का असमान वितरण’ और कुप्रबंध भी पढ़ाया जाता है। बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकट कोई समस्या नहीं बल्कि इन दोनों समस्याओं से उपजी बिमारियां हैं। जिसे हम भ्रष्टाचार कहते हैं वह कुप्रबंध का ही पर्यायवाची शब्द है। मगर भ्रष्टाचार पर समाचार होते हैं उन पर कोई कहानी लिखी नहीं जाती। भ्रष्टाचारी को नाटकों और पर्दे पर दिखाया जाता है पर सतही तौर पर।

अनेक बार व्यक्तियों के आचरण और कृतित्व पर दोनों प्रकार के बुद्धिजीवी आपस में बहस करते है। अपनी विचारधाराओं के अनुसार वह समय समय गरीबों और निराश्रितों के मसीहाओं को निर्माण करते हैं। एक मसीहा का निर्माण करता है दूसरा उसके दोष गिनाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सतही बहसें होती हैं पर देश की समस्याओं के मूल में कोई झांककर नहीं देखता। फिल्म,पत्रकारिता,नाटक और समाजसेवा में सक्र्रिय बुद्धिजीवियों तंग दायरों में लिखने और बोलने के आदी हो चुके हैं। लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिसमें स्वयं की चिंतन क्षमता तो किसी मेें विकसित हो ही नहीं सकती और उसमें शिक्षित बुद्धिजीवी अपने कल्पित मसीहाओं की राह पर चलते हुए नारे लगाते और ‘वाद’गढ़ते जाते हैं।

साहित्य,नाटक और फिल्मों की पटकथाओं में भुखमरी और बेरोजगारी का चित्रण कर अनेक लोग सम्मानित हो चुके हैं। विदेशों में भी कई लोग पुरस्कार और सम्मान पाया है। भुखमरी, बेरोजगारी,और गरीबी के विरुद्ध एक अघोषित आंदोलन प्रचार माध्यमों में चलता तो दिखता है पर देश के भ्रष्टाचार पर कहीं कोई सामूहिक प्रहार होता हो यह नजर नहंी आता। आखिर इसका कारण क्या है? किसी कहानी का मुख्य पात्र भ्रष्टाचारी क्यों नहीं हेाता? क्या इसलिये कि लोगों की उससे सहानुभूति नहीं मिलती? भूखे,गरीब और बेरोजगार से नायक बन जाने की कथा लोगों को बहुत अच्छी लगती है मगर सब कुछ होते हुए भी लालच लोभ के कारण अतिरिक्त आय की चाहत में आदमी किस तरह भ्रष्ट हो जाता है इस पर लिखी गयी कहानी या फिल्म से शायद ही कोई प्रभावित हो।
भ्रष्टाचार या कुप्रबंध इस देश को खोखला किये दे रहा है। इस बारे में ढेर सारे समाचार आते हैं पर कोई पात्र इस पर नहीं गढ़ा गया जो प्रसिद्ध हो सके। भ्रष्टाचार पर साहित्य,नाटक या फिल्म में कहानी लिखने का अर्थ है कि थोड़ा अधिक गंभीरता से सोचना और लोग इससे बचना चाहते हैं। सुखांत कहानियों के आदी हो चुके लेखक डरते हैं कोई ऐसी दुखांत कहानी लिखने से जिसमें कोई आदमी सच्चाई से भ्रष्टाचार की तरफ जाता है। फिर भ्रष्टाचार पर कहानियां लिखते हुए कुछ ऐसी सच्चाईयां भी लिखनी पड़ेंगी जिससे उनकी विचारधारा आहत होगी। अभी कुछ दिन पहले एक समाचार में मुंबई की एक ऐसी औरत का जिक्र आया था जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती थी। जब भ्र्रष्टाचार पर लिखेंगे तो ऐसी कई कहानियां आयेंगी जिससे महिलाओं के खल पात्रों का सृजन भी करना पड़ेगा। दोनों विचारधाराओं के लेखक तो महिलाओं के कल्याण का नारा लगाते हैं फिर भला वह ऐसी किसी महिला पात्र पर कहानी कहां से लिखेंगे जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती हो।
फिल्म बनाने वाले भी भला ऐसी कहानियां क्यों विदेश में दिखायेंगे जिसमें देश की बदनामी होती हो। सच है गरीब,भुखमरी और गरीबी दिखाकर तो कर्ज और सम्मान दोनों ही मिल जाते हैं और भ्रष्टाचार को केंदीय पात्र बनाया तो भला कौन सम्मान देगा।
देश में विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने समाज को टुकड़ों में बांटकर देखने का जो क्रम चलाया है वह अभी भी जारी है। देश की अनेक व्यवस्थायें पश्चिम के विचारों पर आधारित हैं और अंग्रेज लेखक जार्ज बर्नाड शा ने कहा था कि ‘दो नंबर का काम किये बिना कोई अमीर नहीं बन सकता।’ ऐसे में अनेक लेखक एक नंबर से लोगों के अमीर होने की कहानियां बनाते हैं और वह सफल हो जाते हैं तब उनके साहित्य की सच्चाई पर प्रश्न तो उठते ही हैं और यह भी लगता है कि लोगा ख्वाबों में जी रहे। अपने आसपास के कटु सत्यों को वह उस समय भुला देते हैं जब वह कहानियां पढ़ते और फिल्म देखते हैं। भ्रष्टाचार कोई सरकारी नहीं बल्कि गैरसरकारी क्षेत्र में भी कम नहीं है-हाल ही में एक कंपनी द्वारा किये घोटाले से यह जाहिर भी हो गया है।

आखिर आदमी क्या स्वेच्छा से ही भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित होता है? सब जानते हैं कि इसके लिये कई कारण हैं। घर में पैसा आ जाये तो कोई नहीं पूछता कि कहां से आया? घर के मुखिया पर हमेशा दबाव डाला जाता है कि वह कहीं से पैसा लाये? ऐसे में सरकारी हो या गैरसरकारी क्षेत्र लोगों के मन में हमेशा अपनी तय आय से अधिक पैसे का लोभ बना रहता है और जहां उसे अवसर मिला वह अपना हाथ बढ़ा देता है। अगर वह कोई चोरी किया गया धन भी घर लाये तो शायद ही कोई सदस्य उसे उसके लिये उलाहना दे। शादी विवाहों के अवसर पर अनेक लोग जिस तरह खर्चा करते हैं उसे देखा जाये तो पता लग जाता है कि किस तरह उनके पास अनाप शनाप पैसा है।
कहने का तात्पर्य है कि हर आदमी पर धनार्जन करने का दबाव है और वह उसे गलत मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। जैसे जैसे निजी क्षेत्र का विस्तार हो रहा है उसमें भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। नकली दूध और घी बनाना भला क्या भ्रष्टाचार नहीं है। अनेक प्रकार का मिलावटी और नकली सामान बाजार में बिकता है और वह भी सामाजिक भ्रष्टाचार का ही एक हिस्सा है। ऐसे में भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर उस पर कितना लिखा जाता है यह भी देखने की बात है? यह देखकर निराशा होती है कि विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने ऐसा कोई मत नहीं बनाया जिसमें भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर लिखा जाये और यही कारण है कि समाज में उसके विरुद्ध कोई वातावरण नहीं बन पाया। इन विचाराधाराओं और समूहों से अलग होकर लिखने वालों का अस्तित्व कोई विस्तार रूप नहीं लेता इसलिये उनके लिखे का प्रभाव भी अधिक नहीं होता। यही कारण है कि भ्रष्टाचार अमरत्व प्राप्त करता दिख रहा है और उससे होने वाली बीमारियों गरीबी,बेरोजगारी और भुखमरी पर कहानियां भी लोकप्रिय हो रही हैं। शेष फिर कभी
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कबीर के दोहे: जंग से अधिक मिल बांटकर खाने में होती है साहस की आवश्यकता


कबीर तो सांचै मतै, सहै जू सनमुख वार
कायर अनी चुभाय के, पीछे झखै अपार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि सच्चा वीर तो वह है जो सामने आकर लड़ता है पर जो कायर है वर पीठ पीछे से वार करता है।

तीर तुपक सों जो लड़ैं, सो तो सूरा नाहिं
सूरा सोइ सराहिये, बांटि बांटि धन खांहि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो अस्त्र शस्त्र से लड़ते है। उनको वीर नहीं कहा जा सकता है। सच्चे शूरवीर तो हैं जो आपस में मिल बैठकर खाते हैं। वह जो भी कमाते हैं उसे समान रूप से आपस में बांटते हैं।

वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-शूरवीर हमेशा उसे ही माना जाता है जो अस्त्र शस्त्र का उपयोग करता है। उनमें भी वही वीर है जो सामने से वार करता है पर जो कायर हैं वह पीठ पीछे वार करते हैं। वैसे अस्त्र शस्त्र से लड़ने में भी साहस की आवश्यकता कहां होती है। अगर अस्त्र शस्त्र हाथ में हों तो वेसे भी मनुष्य के मन में दुस्साहस आ ही जाता है और कोई भी उपयोग कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि हथियार रखने से क्या होता है उसे चलाने के लिये साहस भी होना चाहिये-विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर लोहे से बना कोई हथियार मनुष्य के हाथ में हो तो उसमें आक्रामता आ ही जाती है।

असली साहस तो अपने कमाये धन का दूसरे के साथ बांटकर खाने में दिखाना चाहिये। आदमी जब धन कमाता है तो उसके प्रति उसका मोह इतना हो जाता है कि वह उसे किसी को थोड़ा देने में भी हिचकता है। मिलकर बांटने की बात तो छोडि़ये अपनी रोटी का छोटा टुकड़ा देने में भी आदमी की जान जाती है।

हमारे प्राचीन मनीषियों ने दान की महिमा को इसलिये प्रतिपादित किया कि समाज में सामाजिक समरसता का भाव रहे। हमारे अध्यात्म में इतना तक कहा गया है कि किसी को दान देते हुए आंखें नीची करना चाहिये ताकि दूसरे को हमारा अहंकार नहीं दिखाई दे और उसके अंदर अपने प्रति कुंठा भाव न उत्पन्न हो। मगर अब तो समाज कल्याण की बात राज्य के भरोसे छोड़ दी गयी है और वही लोग जन कल्याण के लिये मैदान में उतर रहे हैं जिनको उससे कुछ आर्थिक फायदा है। यह लोग कायर होते हैं क्योंकि दान और कल्याण क लिये प्राप्त धन का वह हरण करते हैं।

कलुषित तरीके से प्राप्त धन का भी वह दान करने का साहस नहीं कर पाते। अपने धन देने में सभी का हृदय कांपने लगता है। सच है कि जो दानी है वही सच्चा शूरवीर है। वह भी सच्चा वीर है जो अस्त्र शस्त्र लेकर कहकर सामने से प्रहार करता है पर आजकल तो कायरों की पूरी फौज है जो पीठ पीछे से वार करती है। चोर और डकैतों द्वारा किये गये और अपराध और निरंतर बम धमाकों की बढ़ती घटनायें इस बात का प्रमाण हैं।

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चाणक्य सन्देश:कभी कभी आडम्बर भी काम आता है


१. राजा, बालक, दुसरे का कुत्ता, मूर्ख व्यक्ति, सांप, सिंह और सूअर इन सात जीवों को सोते हुए से कभी नहीं जगाना चाहिए, इन्हें जगाने से मनुष्य को हानि ही हो सकती है लाभ नहीं। इनके आक्रमण करने से अपनी रक्षा करना कठिन होगा। अत: अच्छा यही है यदि वह सो रहे हैं तो उन्हें सोता छोड़ आगे बढ जाना चाहिए।
२. जो व्यक्ति निस्तेज यानी प्रभावहीन है न तो उसके प्रसन्न होने पर किसी व्यक्ति को अर्थ की प्राप्ति होती है न ही नाराजगी पर किसी सजा का भय ही प्रतीत होता है। जिसकी कृपा होने पर पुरस्कार न मिलता हो और न ही जो किसी को दण्ड देने का अधिकारी हो ऐसा व्यक्ति रुष्ट भी हो जाये तो कोई उसकी चिंता नहीं करता।
३. आज के युग में आडम्बर का अपना अलग ही महत्व है। वह झूठ भी हो तो भी आदमी को कुछ न कुछ लाभ मिल ही जाता है। सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह मुख तो फैला ही देता है जिससे लोग भयभीत होकर पीछे जाते हैं। उसकी फुफकार ही दूसरों को डराने और अपनी रक्षा करने में पर्याप्त होती है। यदि सर्प अपने फन भी न फैलाये तो कोई बच्चा भी मार डालेगा। इसलिये कुछ न कुछ आडम्बर करना हर प्राणी के लिए आवश्यक है

४. संसार के दुखों से दुखित पुरुष को तीन ही स्थान पर थोडा विश्राम मिलता है- वह हैं संतान, स्त्री और साधू
५. राजा की आज्ञा, पंडितों का बोलना और कन्यादान एक ही बार होता है।
६. एक व्यक्ति का तपस्या करना, दो का एक साथ मिलकर पढ़ना, तीन का गाना, चार का मिलकर राह काटना, पांच का खेती करना और बहुतों का मिलकर युद्ध करना
७. पक्षियों में कोआ, पशुओं में कुत्ता और मुनियों में पापी चांडाल होता है पर निंदा करने वाला सबसे बड़ा चांडाल होता है।
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रहीम के दोहे: कितना भी बड़ा ज्ञानी हो उसकी अनुचित बात न माने


अनुचित वचन न मानिए जदपि गुराइसु गाढ़ि
है रहीम रघुनाथ ते सुजस भरत को बाढ़ि


कविवर रहीम कहते हैं कि कोई भी कितना व्यक्ति बड़ा और गूढ़ ज्ञान वाला क्यों न हो उसके अनुचित वचनों को मत मानो क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि वह हमेशा सत्य वचन ही कहता हो। यहाँ यह भी याद रखने वाली है कि भगवान् श्री रामचन्द्र के वचनों से ही भरतको सुयश की प्राप्ति हुई थी।

अब रही मुश्किल पड़ी, गाढे दोउ काम
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलै न राम


कविवर रहीम कहते हैं कि अब तो जीवन में ऐसी कठिनाई आ गयी कि दोनों कार्य दुष्कर हो गए हैं। सत्य बोलने से संसार का काम नहीं चलता और मिथ्या भाषण से भगवान् का मिलना संभव नहीं है।

स्वेट मार्डेन:जीवन में विश्वास ही है यौवन में विश्वास


१.जिनका विकास रुक जाता है, जो बढ़ना बंद कर देते हैं। ठहर जाते हैं। वे जल्दी बूढे हो जाते हैं।
२.नये-नये खेल सीखिए। नई-नई पत्रिकाएँ पढिये। अच्छी पुस्तकों से अधिक-अधिक से ज्ञान बढाते रहिये। कुछ न कुछ लिखिए।
३.संसार में अनेक भाषाएं हैं। नई-नई भाषाएं सीखिए
४.पृथ्वी पर अरबों लोग रहते हैं। लाखों के संपर्क में आप आ सकते हैं, हजारों से अपना व्यवहार कर सकते हैं। नए-नए लोगों से परिचय कर सकते हैं। अपने संपर्क, व्यवहार और परिचय का दायरा बढाते जाएं।

आप ऐसा करते हैं तो आपको जीने का विश्वास होगा-आपको जीवन पर विश्वास है तो आप यौवन में विश्वास करते हैं। फिर आप चिर युवा और चिर सुन्दर हैं और रहेंगे। आप कभी भी बूढे नहीं हो सकते।

कौटिल्य अर्थशास्त्र:शत्रु पर इन्द्रजाल का भी प्रयोग करें


1.विशेष ज्ञान से संपन्न सत्त्वगुण और दैव की अनुकूलता लिए उधोग और सत असत का विचार का शत्रु पर उपाय का प्रयोग करे। चतुरंगिनी सेना को छोड़कर जहाँ कोष और मन्त्र से ही युद्ध होता वही श्रेष्ठ मन्त्र है, जिसमें कोष और मंत्री से ही शत्रु को जीता जा सकता है। * यहाँ आशय यह है कि अगर कहीं शत्रु के की सेनाओं के साथ सीधे युद्ध नहीं हो रहा पर उसकी गतिविधियां ऎसी हैं जिससे देश को क्षति हो रही हो तो वहां धन और अपने चतुर सहयोगियों की चालाकी(मन्त्र) से भी शत्रु को हराया जा सकता है३.साम, दाम, दण्ड, भेद, माया, उपेक्षा, इन्द्रजाल यह सात उपाय विजय के हैं।

संपादकीय अभिव्यक्ति- यहाँ कौटिल्य का आशय यह है साम, दाम, दण्ड और भेद के अलावा माया(छल-कपट और चालाकी) उपेक्षा का भाव दिखाकर और इन्द्रजाल (हाथ की सफाई) द्वारा भी शत्रु को हराया जा सकता है।
2.मंत्री और मित्र राज्य के सहायक हैं पर राज्य के व्यसन से अधिक भारी राजा का व्यसन है।जो राजा स्वयं व्यसन से ग्रस्त न हो वही राज्य के व्यसन दूर कर सकता है। वाणी का दण्ड, कठोरता, अर्थ दूषण यह तीन व्यसन क्रोध से उत्पन्न बताये हैं।जो पुरुष वाणी की कठोरता करता है उससे लोग उतेजित होते हैं, वह अनर्थकारी है, इस कारण ऎसी वाणी न बोले। मधुर वाणी से जगत को अपने वश में करेजो अकस्मात ही क्रोध से बहुत कुछ कहने लगता है उससे लोग विपरीत हो जाते हैं जैसे चिंगारी उड़ाने वाली से अग्नि से लोग उतेजित हो जाते हैं।

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

संत कबीर वाणी:अपनी चित्त वृत्ति को घोड़ी बनाएं


घायल की गति और है, औरन की गति और
प्रेम बाण हिरदै लगा, रहा कबीर ठौर

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो शूरवीर प्रेम में घायल होते हैं उनके तन-मन की गति अन्य लोगों से अलग होती है। हृदय में प्रेम-बाण लग जाने पर प्रेमी अपने स्थान पर ठहर जाता है।
भावार्थ- यहाँ आशय यह है कि जिसको भगवान से प्रेम होता है उसकी दशा सामान्य लोगों से अलग हो जाती है वह तो केवल भगवान की भक्ति में लीन हो जाते हैं। उन्हें तो बस सत्संग और स्मरण में ही मजा आता है।

चित चेतन ताज़ी करै, लौ की करै लगाम
शब्द गुरु का ताजना, पहुचाई संत सुठाम

अपनी चित्त वृत्ति को घोड़ी बनाएं, उस पर ध्यान लगाएं और सदगुरू के शब्द-ज्ञान का कोडा लें। इस प्रकार कुशल संत और साधक भगवान की भक्ति कर अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं।

भावार्थ-आदमी अगर अपने चित्त पर नियंत्रण करना सीख ले तो उसके लिए कोई काम कठिन नहीं है बस इसके लिए भगवान में मन लगा चाहिए। उनका नाम स्मरण अपने आप में बहुत बड़ी शक्ति है और उससे भक्त में बहुत बड़ी शक्ति आती है।

संत कबीर वाणी: पराई स्त्री से प्रेम करना लहसुन खाने के समान


पर नारी का राचना, ज्यूं लहसुन की खान
कोने बैठे खाईये, परगट होय निदान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पराई स्त्री के साथ प्रेम करना, जैसे लहसुन का खाना है. चाहे उसे किसी स्थान में बैठकर खाईये, अंत में वह प्रकट होकर ही रहेगा अर्थात गंध के कारण वह छिपाए नहीं छिपेगा.

पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचे कोय
कबहूँ छेडि न देखिये, हसी हंसी खावे रोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पर नारी पैनी छुरी के समान है, इससे कोई विरला ही बच पाता है, और कभी भी उससे छेड़-छाड़ मत करो, वह हंस-हंस कर या रोकर दोनों प्रकार से खाती है.

निज स्वारथ के कारनै, सेव करे संसार
बिन स्वारथ भक्ति करे, सो भावै करतार

कबीरदास जी कहते है की इस संसार में जो भी सेवा होती है वह बिना कारण नहीं होती, उसके पीछे अपनी कुछ भलाई भी छिपी होती है, परन्तु बिना स्वारथ और निष्काम से जो भक्ति और सेवा होती परमात्मा को वही पसंद है.
नोट-रहीम, चाणक्य, कबीर और कौटिल्य की त्वरित पोस्टें नारद और ब्लोगवाणी पर अभी उपलब्ध हैं, अत: वहाँ देखने का प्रयास करें.

चाणक्य नीति:दानी ही होता है सच्चा शूरवीर


१.अर्थ कार्यों का मूल होता है
राज्यश्री ही राज्यशक्ति के कर्मों का मूल आधार होती  है. लौकिक काम तो धन-धान्य से संपन्न  होते हैं,जैसे पर्वत से नदियाँ निकलकर बहने  लगतीं हैं इसी प्रकार प्रवाहमान धन से समस्त काम होता है. जिस तरह रुका हुआ पानी गंदा हो जाता है वही   धन का भी होता है. इसलिए  धन का  प्रवाह कभी रोकना  नहीं चाहिऐ और उसका व्यय भी करते रहना चाहिए 
२.अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के पास सदभावना की वृति नहीं होती.
अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के मन में उथल-पुथल अधिक होती है और मानसिक अस्थिरता के  कारण  अच्छी   वृतियां  सक्रिय नहीं होतीं. भाग्य के भरोसे रहने वाला  मनुष्य जीवन के भौतिक साधनों का संग्रह करने से वंचित हो जाता है.
३.दान में शूरता दिखाने वाले ही सच्चे वीर होते हैं.
अपने पास जो संपति है उसमें से सुपात्र को दान देने वाले व्यक्ति ही वास्तविक वीर है. सच तो यह है कि हमारे पास संपत्ति या धन है वह किसी के पास जाना ही है. हम जो धन कमाते हैं उसे किसी न किसे रूप में कहीं खर्च अवश्य करते हैं, इस तरह जो धन है वह किसी की धरोहर होती है जो हम किसी को सौप्नते हैं. उसी तरह जो अचल संपतियाँ होती हैं वह भी हमारे बाद किसी न किसी को हस्तांरित होती हैं. आदमी अपने जीवन काल में धन और संपति को अपने सीने से चिपका कर रखना चाहता है, पर जो अपनी धन और संपति को किसी की धरोहर मानकर अपने जीवनकाल में ही सुपात्र को दान देता है उसे वीर ही कहा जाता है. 

चाणक्य नीति:प्रेम और व्यवहार बराबरी वाले से करें


१.पर्वत तो बहुत हैं पर यह आवश्यक नहीं है की सभी पर माणिक्य उपलब्ध हो और यह भी जरूरी नहीं है की प्रत्येक हाथी के मस्तक में गजमुक्ता (एक प्रकार का काला मोती )हो. प्रत्येक वन में चन्दन वृक्ष उपलब्ध हो यह भी जरूरी नहीं है.

संकलन करता का अभिमत-आचार्य चाणक्य के इस कथन को समझें तो यह जरूरी नहीं है कि कुछ लोगों में उनके व्यवसाय, शिक्षा और या किसी अन्य विषय में समानता होते हुए भी गुण एक समान हो. धनी हो पर दानी हो जरूरी नहीं है. ज्ञानी हो तो उसमें विनम्रता भी हो और सुन्दर होने के साथ उसकी वाणी भी मीठी हो यह जरूरी नहीं है. हम अपने पास ऐसे लोग देखते होंगे जिनके पास ऊंची उपाधियाँ और पद हैं पर उनके अनुसार उनमें योग्यता नहीं है और अगर हम उनसे कोई विशेष गुण होने कि अपेक्षा करते हैं तो जरूरी नहीं के वह पूरी हो.

२.मूर्खता कष्टकारी होती है और इसके साथ युवावस्था में भी कष्ट उठाने पड़ते हैं पर सबसे अधिक बुरा है जब किसी व्यक्ति के घर विवशता के के कारण ठहरना पड़े.

३.प्रेम और व्यवहार सदैव ही समान स्तर के व्यक्ति व परिवार से रखना चाहिए, जो व्यक्ति ऐसा नहीं करते उन्हें समाज में अपमान और कष्ट और अपमान झेलने पड़ते हैं.

रहीम के दोहे:घोडा कभी वजीर नहीं बन सकता


रहिमन वे नर मर चुके जे कहूं मांगन जाहिं
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं

अर्थ-कविवर रहिमन कहते हैं कि जो किसी व्यक्ति के समीप कुछ याचना करने के लिए जाते हैं, उस मनुष्य को मृत ही समझो, परन्तु उनसे पहले वे मनुष्य मृत हैं, जिनके मुख से याचक को देखकर इनकार का शब्द निकलता है.

रहिमन सीधी चाल सौं, प्यादा होत वजीर
फरजी साह न हुई सकी, गति टेढी तासीर

अर्थ-कवि रहीम कहते हैं कि सरल गति से चलने से शतरंज के खेल में पैदल चलने वाला प्यादा भी मंत्री बन जाता है, परन्तु वक्र गति से चलने वाला घोडा कभी वजीर नहीं बन सकता.

भावार्थ-सीधा व्यक्ति ,सीधी चाल चलता हुआ ऊंचे मुकाम पर पहुंच जाता है और लोगों में सम्मान अर्जित कर लेता है पर जो छल,कपट और अन्य बुराईयों में लगा रहता है उसे कभी समाज में सम्मान नहीं मिल सकता. भले ही लोग धन, पद और बाहुबल की वजह से डरें पर वह मन से सम्मान नहीं करते.

लेखकीय अधिकार से लिखें अनुयायी बनकर नहीं


इस देश में स्वतंत्रता के बाद विचार और चिंतन के नाम पर तमाम तरह के वाद और नारे दिए गए। जिन पर देश का बौद्धिक और चिन्तक वर्ग कई भागों में बंट गया। सभी ने अपने वाद और नारों के अनुसार किताबे लिखीं, लिखवाईं और बंटवाईं। उन्होने तय किया किया कि लोगों के बच्चे वह पढें जो हम पढ़वाएं। ऐसा हुआ भी पर इस देश में हमारे पुराने महापुरुषों के जीवन चरित्र और संदेशों से भरपूर साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था और लोगों ने मैकाले द्वारा रचित इस शिक्षा प्रणाली से अक्षर ज्ञान तो लिया पर अपने मन और विचारों से अपने प्राचीनतम ज्ञान को विस्मृत नहीं होने दिया। नेताओं और अभिनेताओं द्वारा प्रदत विषयों के साथ लोग उठे-बैठे पर उनको धारण नहीं किया और यही बात इस देश पर बौद्धिक रूप से अपना नियंत्रण करने वालों को अखरी तब उन्होने उन पर अपने मन पसंद के पात्रों को शैक्षिक पुस्तकों में पढ़ने के लिए थोपा। फिर उनसे भी काम नहीं चला तो अब ऐसे पात्र पढ़ने के लिए दिए जा रहे हैं जिनका मापदंड यह है कि वह लोकप्रिय रहें भले ही इसके लिए कोई निर्धारित नियम नहीं है।

मैं बात कर रहा हूँ विचारधाराओं की। दरअसल नारे लगाना अलग चीज है और अपने मान्य दर्शन पर चलना अगला मामला है। वाद और नारों से भीड़ एकत्रित तो हो जाती है इस आशा के साथ कि उसका लाभ होगा पर जब वह अपने अगुआओं को शक्ति तो प्रदान कर देती है पर बाद में पता लगता है कि वास्तविकता कुछ और है।

हमारे देश में राजनीति के सबसे विशारद के रूप में चाणक्य में लिया जाता है और उनके नाम का मोह लोगों के मन में इतना है कि जो भी नेता वयोवृद्ध हो जाता है अपने को इस नाम की उपाधि मिलने पर प्रसन्न होता है। जो सता में आ जाता है तो वह उसे एक तरह से चाणक्य ही कहा जाता है। मगर आप जानते हैं कि चाणक्य ने कभी कोई पद नहीं लिया-कभी सुख सुविधा का पीछा नहीं किया। इधर-उधर से विचारधाराएं लाकर अपने को एक उम्र के बाद चाणक्य कहे जाने पर प्रसन्न होने वाले विचारधाराओं के यह पोषक उसे महान व्यक्तित्व के मार्ग पर चलना तो दूर उस पर एक कदम भी नहीं रखे सके। सच तो यह है कि जब इस देश का समाज शब्दश: उनके मार्ग पर नहीं चलेगा यहाँ कि व्यवस्था नहीं सुधर सकती।

मैं अपने साथियों को जो ब्लोग पर लिख रहे हैं उन्हें इस बात के लिए आगाह कर देना चाहता हूँ कि मैंने अब तक जितना चाणक्य का लिखा हुआ अपने ब्लोगों पर लिखा है वह ज्ञान बघारने के लिए नहीं स्वाध्याय के लिए लिखा है और उसमें अभी तक कहीं भी ऐसे पंक्ति नहीं आयी जिसमें लिखा हो कि राजनीति में किसी पर विश्वास करना चाहिए। इस देश में जो विचारधाराएं हैं वह कहीं न कहीं राजनीति का प्रतिबिम्ब हैं और जो ब्लोगर इससे प्रेरित होकर लिखे रहें हैं उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि
१।क्या वह सही राह पर हैं?
२। क्या वह जिन लोगों का अपनी विचारधारा के आधार पर समर्थन कर रहे हैं वह वाकई उस पर चल रहे हैं
३।क्या उनसे कोई निजी लाभ हैं?
४।क्या वह जिनके समर्थन या विरोध में लिख रहे हैं उस पर उन्होने स्वयं गहनता से विचार किया है।
५।क्या उससे सामान्य व्यक्ति संतुष्ट है।
इस मामले मने अगत लिखने से तत्काल कोई उनको लाभ मिलता है तो जरूर लिखें पर भविष्य में मिलने की उम्मीद में लिखने की बजाय अन्य रुचिकर विषयों पर लिखें. राजनीति में भविष अनिश्चित होता है.यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूं कि मैं किसी को किसी विषय पर लिखने के लिए न तो प्रेरित कर रहा हूँ न रोक रहा हूँ क्योंकि इसका न मुझे अधिकार है न किसी और को। यह आलेख केवल मैं अपने साथ ब्लोगरों से चर्चा और विचार के लिए लिख रहा हूँ। मैं सोचता हूँ कि ब्लोगिंग एक ऐसी विधा है जिसमें अपने विचार स्वतन्त्र रूप का अवसर मिलता है जो कि अब से पहले दुर्लभ था और हम दूसरे के हाथ में मौजूद साधनों पर निर्भर थे। तब हम इस बात का भी विचार करते थे कि उनसे हमारे विचार न मिलते हों तो छपने के लिए मिला लेना चाहिए। इस आदत ने हमारी चिन्त्तन और मनन की प्रक्रिया को पंगु कर दिया है। इसलिए जब ब्लोगर ऐसे विषय को लेते हैं तो उन्हें उस पर गहनता पूर्वक विचार कर फिर लिखना चाहिए। मैं देखता हूँ कि कई लेखक जब लिखते हैं तो साफ लगता है कि उसमें उनका सोच कम विचारधाराओं के स्वयंभू लोगों के नारे अधिक हैं। अपने वैचारिक चिन्त्तन और अनुसंधान का अभाव उनमें साफ नजर आता है। ऐसे में मुझे लगता है कि शायद किसी विचारधारा से प्रतिबद्ध कोई अखबार पढ़ रहा हूँ।

मैं अपने अच्छा लेखक हूँ या नहीं मुझे पढ़ने वाले आप लोग तय करेंगे पर मैं अच्छी और सरस रचनाओं को पढ़ने वाला एक अच्छा पाठक हूँ और मुझे किसी विचारधारा से न तो विरोध हैं न प्रतिबद्धता पर मैं कुछ नया पढ़ना चाहता हूँ। राजनितिक विषयों से मुझे परहेज नहीं है पर मैं चाहता हूँ कि मेरे साथी जब लिखें तो अपने लेखकीय अधिकार से लिखें किसी के अनुयायी या प्रशंसक बनकर नहीं.

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