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कामेडी बनकर चमकेगा–हास्य कविता


फंदेबाज लेकर अपने भतीजे को
पहुंचा और बोला
‘‘दीपक बापू, मेरा यह भतीजा
खूब लिखता है श्रृंगार रस से सराबोर कवितायें
पर नहीं सुनते पुरुष और महिलायें
आप तो इसे अब
हंसी का कार्यक्रम बतायें
ताकि हम लोग भी कुछ जमाने में इज्जत बनायें’’

उसके भतीजे को ऊपर से नीचे देखा
फिर गला खंखार कर
अपनी टोपी घुमाते बोले दीपक बापू
’’कमबख्त जब भी घर आते हो
साथ में होती बेहूदी समस्यायें
जिनके बारे में हम नहीं जानते
तुम्हें क्या बतायें
रसहीन शब्द पहले सजाओ
लोगों को सुनाते हुए कभी हाथ
तो कभी अपनी कमर मटकाओ
कर सको अभिनय तो मूंह भी बनाओ
चुटकुला हो या कविता सब चलेगा
जीवन के आचरण और चरित्र पर
कहने से अच्छा होगा
अपनी देह के विसर्जन करने वाले अंगों का
इशारे में प्रदर्शन करना
तभी हंसी का माहौन बनेगा
कामेडी बनकर चमकेगा
अपने साथ स्त्री रूप के मेकअप में
कोई पुरुष भी साथ ले जाना
उसकी सुंदरता के पर
अश्लील टिप्पणी शालीनता से करना
जिससे दर्शक बहक जायें
वाह वाह करने के अलावा
कुछ न बोल पायें
किसी के समझ में आये या नहीं
तुम तो अपनी बात कहते जाना
यौवन से अधिक यौन का विषय रखना
चुंबन का स्वाद न मीठा होता है न नमकीन
पर लोगों को फिर भी पंसद है देखना
हंसी की फुहार में भीगने का मन तो
हमारा भी होता है
दिल को नहला सकें हंसी से
पर सूखे शब्द और निरर्थक अदाओं से
कभी दिल खुश नहीं होता
फ़िर भी खुश दिखता है पता नहीं कैसे जमाना
इससे अधिक तुम्हें हम और क्या बताये”

……………………………….
अपने दर्द का बयाँ किससे करें
जबरन सब हँसते को तैयार हैं
ढूंढ रहे हैं सभी अपनी असलियत से
बचने के लिए रास्ते
खोज में हैं सभी कि मिल जाए
अपना दर्द सुनाकर
बन जाए कोई आदमी एक चुटकुला
दिल बहलाने के वास्ते
करते हैं लोग
ज़माने में उसका किस्सा सुनाकर
अपने को खुश दिखाने की कोशिश
इसलिए बेहतर है
खामोशी से देखते जाएँ
अपना दर्द सहते जाएँ
कोई नहीं किसी का हमदर्द
सभी यहाँ मतलब के यार हैं

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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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तीस हजार की सफलता पर सभी का आभार ज्ञापन-संपादकीय


सुनने में आ रहा है कि मनोरंजन के आधार पर वेबसाइटों को पुरस्कार की बात चल रही है। आज शाम को ईमेल खोलते ही पाडकास्ट का जाने क्या मेरे सामने आया और मेरा हाथ क्रास पर चला गया और वह हाथ से निकल गया। सुबह एक ब्लाग पढ़ा था उसमें भी उसकी चर्चा भी थी और एक ब्लाग में मेरी एक कविता का लिंक भी था जिसमें उसके शीर्षक के साथ एक किलो का टैग लगाने की शिकायत भी दर्ज थी।
दरअसल इस पाठ के तीस हजार पाठक संख्या पार करने पर कल कविता लिख कर मैंने गलती की थी। आज यह संपादकीय लिखने का मन ही नहीं कर रहा था क्योंकि हम कोई व्यवसायिक लोग तो हैं नहीं कि लिखना जरूरी है। इसका एक पैसा मिलता नहीं बल्कि गांठ से इंटरनेट कनेक्शन का पैसा और जाता है। हां, अपने गुरूजी के आदेशानुसार जो तस्वीर दिखाई जा रही है उसके पीछे देखने का प्रयास कर रहा हूं। अब समझ में आ गया है कि क्यों ब्लाग लेखकों को एक मजदूर समझा जा रहा है। दरअसल यह गलत फहमी बाहर फैली हुई है कि हिंदी के सभी ब्लाग लेखक पैसा लेकर लिख रहे हैं। हिंदी के चार नियमित फोरमों के अलावा अनेक वेबसाइटों ने हमारे ब्लाग अपने यहां लिंक कर रखे हैं। यह वेब साइटें दूसरी वेबसाईटों को लिंक नहीं करतीं क्योंकि शिकायत करने पर उनके डोमेन छिनने का खतरा रहता है पर ब्लाग को चाहे जैसे लिंक करतीं हैं। इनके साथ लिंक देख कर लोग यह समझते हैं कि उसी वेबसाइट के लिये यह लिखा गया हैं। अभी आम लोगों में यह समझ नहीं है कि यह ब्लाग एक स्वतंत्र लेखक का है। कुछ ब्लाग लेखक पैसा लेकर लिख रहे हैं पर अधिकांश तो फ्री में लिख रहे हैं। जिन्होंने डोमेन लिया है उनमें में भी सक्रिय लोगों ने कमाया है वह भी इतना नहीं कि वह उससे अपने परिवार का खर्चा चला सकें।

ऐसा प्रचार हो रहा है कि ब्लाग लेखक तो फ्री में ब्लाग लिख रहे हैं और हालत यह है कि उनको एक मजदूर की तरह देखा जा रहा है। नारद के एक कर्णधार ने कहा लिखा था कि वेबसाइटों को ब्लाग नहीं माना जा सकता है पर हालत यह है कि अब वेबसाईटों को ही ब्लाग कहकर प्रचारित किया जा रहा है।
बहरहाल इस ब्लाग के साथ मेरी दिलचस्प यादें हैं। मैंने यूनिकोड में सबसे पहले इसी ब्लाग पर क्षणिका लिखी थी और उस पर पहली टिप्पणी मिली थी। दूसरे ब्लाग पर नारद के लिये जद्दोजहद चल रही थी। एक महिला ने दूसरे ब्लाग पर टिप्पणी लिखते हुए पूछा था कि मैं किस फोंट में लिख रहा था-सामान्य देव फोंट में होने के कारण वह उसके पढ़ने में नहीं आ रहा था। मैंने उसे सामान्य हिंदी फोंट में जवाब भेजा तो रोमन में उसने यही सवाल किया। तब मैंने रोमन में ही उसे अपने इसी ब्लाग का पता दिया, पर इसी बीच उसने एक सवाल किया था ‘आप एक पोस्ट लिखने का कितना पैसा लेते हैं।’
मैंने जवाब दिया कि मेरे एक पोस्ट की कीमत दो हजार रुपये है पर मित्रों के लिये यह काम मैं फ्री में कर देता हूं। आप तो यह बताईये करना क्या है? इसी बीच उसका जवाब आया कि ‘वाह, आपका यह ब्लाग तो पढ़ने में आ रहा है।’
मैंने उसे दूसरा ईमेल किया कि वह क्या चाहती है? पर वह फिर नहीं आयी। बात आयी गयी खत्म हो गयी, पर पिछले कुछ दिनों से हुए वाक्यात ये यह लगने लगा है कि कुछ ब्लाग लेखकों को वाकई पैसे देकर लिखवाया जा रहा है। हम छोटे शहर के हैं इसलिये कोई इस बारे में दांवपैंच नहीं जानते इसलिये फ्री में ही लिखे जा रहे हैं। पर कोई बात नहीं! मुख्य विषय लिखना है और उससे भी बड़ा मजा स्वतंत्र लेखन में है। जहां आपको विज्ञापन और धन का विचार आता है वहां गुलाम बनकर रह जाते हैं। मैं पत्रकार रह चुका हूं और सारे छलकपटों के बारे में जानता हूं। पर मेरे संस्कार ऐसे हैं कि मैं स्वयं कर नहीं सकता यही कारण है कि पत्रकारिता जगत से बाहर आ गया। चालाकियों को समझने के लिये अधिक समय नहीं लगता। लिखना मेरा जीवन है इसलिये लिखता हूं-प्रतिदिन आठ सौ पाठ पढ़े जा रहे हैं। हो सकता है कि इसमें कोई धोखा हो पर परवाह किसे है?

यह ब्लाग वर्डप्रेस पर है और इस पर लिखने का मतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर होना। यहां फोरमों से अधिक हिट बाहर से आते हैं। ब्लागस्पाट के ब्लाग के लिये हिंदी फोरमों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। मेरे वर्डप्रेस के तीन ब्लाग हिंदी के सबसे लोकप्रिय फोरम ब्लागवाणी पर नहीं है पर उन पर भी जमकर पाठक आते हैं। हिंदी फोरमों पर यह ब्लाग आते हैं और वहां मेरे मित्र बन गये हैं इसलिये वहां भी जितना समय मिलता है सक्रिय रहता हूं। वहां से अधिक पाठकों की अपेक्षा तो मैं नहीं करता क्योंकि मेरा लक्ष्य आम पाठक तक पहुंचना है। मेरी सबसे बड़ी ताकत ब्लाग मित्र और मेरे पाठक हैंं। यह और ईपत्रिका मेरे प्रारंभ से ही हिट ब्लाग हैं। इसका कारण यह रहा है कि इनको फोरमों पर बाद में ले गया और लिखना पहले ही शुरू कर चुका था। तीस हजार पाठक संख्या पार कर इस ब्लाग ने अपनी ताकत मुझे बता दी और यही मैं ब्लाग मित्रों और पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं। यह ब्लाग आगे चलकर अनेक वेबसाईटों को चुनौती देने वाला है यही कारण कि आलोचक विचलित होकर अनेक ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं जो बेसिर पैर के हैं। शेष फिर कभी। सभी पाठकों और ब्लाग लेखकों का इस अवसर पर आभार ज्ञापित करता हूं और आगे आने वाले संभावित संघर्षों मेंें उनसे सहयोग की अपेक्षा करता हूं। आलोचकों से मेरा साफ कहना है कि आप मेरे लिये कोई आर्थिक मदद का स्त्रोत निर्माण करें फिर मुझे लिखना सिखाये। फोकट में खोपड़ी खाने की आवश्यकता नहीं। आगे चलकर टैग की संख्या हजार भी कर सकता हूं क्योंकि भई हम कोई व्यवसायिक ब्लागर थोड़े ही है। बिना धनार्जन के भला कोई व्यवसाय होता है।

यह आलेख ‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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रहीम के दोहेःपरोपकारी लोग अपने पराये का भेद नहीं करते


रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस दियो शिवि भूप ने, दीन्हो हाड़ दधीच

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस मनुष्य का परोपकार करना है वह जरा भी नहीं हिचकता। वह परोपकार करते हुए यारी दोस्ती का विचार नहीं करते। राजा शिवि ने ने प्रसन्न मुद्रा में अपने शरीर का मांस काट कर दिया तो महर्षि दधीचि ने अपने शरीर की हड्डियां दान में दीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-विश्व का हर बड़ा आदमी परोपकार करने का दावा करता है पर फिर भी किसी का कार्य सिद्ध नहीं होता। अभिनेता, कलाकार, संत, साहुकार तथा अन्य प्रसिद्ध लोग अनेक तरह के परोपकार के दावों के विज्ञापन करते हैं पर उनका अर्थ केवल आत्मप्रचार करना होता है। आजकल गरीबों, अपंगों,बच्चों,बीमारों और वृद्धों की सेवा करने का नारा सभी जगह सुनाई देता है और इसके लिये चंदा एकत्रित करने वाली ढेर सारी संस्थायें बन गयी हैं पर उनके पदाधिकारी अपने कर्मों के कारण संदेह के घेरे में रहते हैं। टीवी चैनल वाले अनेक कार्यक्रम कथित कल्याण के लिये करते हैं और अखबार भी तमाम तरह के विज्ञापन छापते हैं पर जमीन की सच्चाई यह है कि जो परोपकार भी एक तरह से व्यापार हो गया है और इसके माध्यम से प्रचार और आय अर्जित करने की योजनाओं को पूरा किण जाता है।

जिन लोगों को परोपकार करना है वह किसी की परवाह नहीं करते। न तो वह प्रचार करते हैं और न ही इसमें अपने पराये का भेद करते हैं। उनके लिये परोपकार करना एक नशे की तरह होता है। सच तो यह है कि यह मानव जाति अगर आज भी चैन की सांस ले रही है तो वह ऐसे लोगों की वजह से ले रही हैं ऐसे लोग न केवल बेसहारा की मदद करते हैं बल्कि पर्यावरण और शिक्षा के लिये भी निरंतर प्रयत्नशील होते हैं। वरना तो जिनके पास पद, पैसे और प्रतिष्ठा की शक्ति है वह इस धरती पर मौजूद समस्त साधनों का दोहन करते हैं पर परोपकारी लोग निष्काम भाव से उन्हीं संसाधनों में श्रीवृद्धि करते है। जिनका परोपकार करने का संकल्प लेना है उन्हें यह तय कर लेना चाहिए कि वह प्रचार और पाखंड से दूर रहेंगे।

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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