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पिछड़ता सर्वशक्तिमान अमेरिका-हिन्दी लेख (america behind world level-hindi article)


कोई व्यक्ति कद काठी में ऊंचा हो, अपनी मांसपेशियों से शक्तिशाली दिखता हो, उसने सुंदर वस्त्र पहन रखे हों पर अगर उसके चेहरे पर काले धब्बे हैं आंखों में हमेशा ही निराशा झलकती है और बातचीत में निर्बुद्धि हो तो लोग उसके सामने आलोचनात्म्क बात न कहें पर पीठ पीछे उसके दुर्गुणों की व्याख्या करते है। तय बात है कि उसके शक्तिशाली होने के बावजूद लोग उसे पंसद नहंी करते। यही स्थिति समाजों, समूहों और राष्ट्रों की होती है।
न्यूज वीक पत्रिका के अनुसार दुनियां का सर्वशक्तिमान अमेरिका अब सर्वश्रेष्ठता में 11 वें स्थान पर खिसक गया है। भारत इस मामले में 78 वें नंबर पर है इसलिये उस पर हम हंस नहीं सकते पर जिन लोगों के लिये अमेरिका सपनों की दुनियां की बस्ती है उनके लिये यह खबर निराशाजनक हो सकती है। इस तरह की गणना शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर तथा राजनीतिक वातावरण के आधार पर की गयी है। यकीनन यह सभी क्षेत्र किसी भी देश के विकास का प्रतिबिम्ब होते हैं। हम जब अपने देश की स्थिति पर नज़र डालते हैं तो उसमें प्रशंसा जैसा कुछ नज़र नहीं आता। घोषित और अघोषित रूप से करोड़पति बढ़े हैं पर समाज के स्वरूप में कोई अधिक बदलाव नहीं दिखता।
सड़क पर कारें देखकर जब हम विकास होने का दावा करते हैं तो उबड़ खाबड़ गड्ढों में नाचती हुईं उनकी मुद्रा उसकी पोल खोल देती है। स्वास्थ्य का हाल देखें, अस्पताल बहुत खुल गये हैं पर आम इंसान के लिये वह कितने उपयोगी हैं उसे देखकर निराशा हाथ लगती है। आम इंसान को बीमार होने या घायल होने से इतना डर नहीं लगता जितना कि ऐसी स्थिति में चिकित्सा सहायता न मिल पाने की चिंता उसमें रहती है।
कहने का अभिप्राय यह है कि विकास का स्वरूप हथियारों के जखीरे या आधुनिक सुविधा के सामानों की बढ़ोतरी से नहीं है। दुनियां का शक्तिशाली देश होने का दावा करने वाला अमेरिका दिन ब दिन आर्थिक रूप से संकटों की तरफ बढ़ता दिखाई देता है मगर शायद उसके भारतीय समर्थक उसे समझ नहीं पा रहे। दूसरी बात हम यह भी देखें कि अधिकतर भारतीयों ने अपनी वहां बसाहट ऐसी जगहों पर की है जहां उनके लिये व्यापार या नौकरी के अवसरों की बहुतायत है। यह स्थान ऐसे क्षेत्रों में हैं जहां अर्थव्यवस्था और शिक्षा के आधुनिक केंद्र है। अमेरिका भारत से क्षेत्रफल में बढ़ा है इसलिये अगर कोई भारतीय यह दावा करता है कि वह पूरे अमेरिका के बारे जानता है तो धोखा दे रहा है और खा भी रहा है, क्योंकि यह लोग यहां रहते हुए भी पूरे भारत को ही लोग नहीं जान पाते और ऐसे ही दूरस्थ स्थानों के बारे में टिप्पणियां करते हैं तब अमेरिका के बारे में उनका ज्ञान कैसे प्रमाणिक माना जा सकता है।
इसके बावजूद कुछ भारतीय हैं जिनका दूरस्थ स्थानों मे जाना होता है और वह अपनी बातों के इस बात का उल्लेख करते हैं कि अमेरिका में कई ऐसे स्थान हैं जहां भारत जैसी गरीबी और पिछड़ेपन के दर्शन होते हैं। फिर एक बात दूसरी भी है कि जब हमारे देश में किसी अमेरिकन की चर्चा होती है तो वह शिक्षा, चिकित्सा, राजनीति, व्यापार या खेल क्षेत्र में शीर्ष स्तर पर होता है। वहां के आम आदमी की स्थिति का उल्लेख भारतीय बुद्धिजीवी कभी नहीं करते। जबकि सत्य यह है अपने यहां आकर संपन्न हुए विदेशियों से अमेरिकी नागरिक बहुत चिढ़ते हैं और उन पर हमले भी होते हैं इसके समाचार कभी कभार ही मिलते हैं।
इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय बुद्धिजीवी अमेरिका को स्वर्ग वैसे ही दिखाया जाता रहा है जैसे कि धार्मिक लोग अपने अपने समूहों को दिखाते हैं।
अमेरिका के साथ कनाडा का भी बहुत आकर्षण भारत में दिखाया जाता है जबकि यह दोनों इतने विशाल देश है कि इनके कुछ ही इलाकों में भारतीय अधिक तादाद में हैं और जहां उनकी बसाहट है उसके बारे में ही आकर्षण जानकारी मिल पाती है। जहां गरीबी, भ्रष्टाचार, अशिक्षा, स्वास्थ्य चिकित्साओं का अभाव तथा बेरोजगारी है उनकी चर्चा बहुत कम होती है।
इस विषय पर एक जोरदार चर्चा देखने को मिली।
अमेरिका से लौटे एक आदमी ने अपने मित्र को बताया कि ‘मैं अपने अमेरिका के एक गांव में गया था और वहां भारत की याद आ रही थी। वहां भी बच्चे ऐसे ही घूम रहे थे जैसे यहां घूमते हैं। वह भी शिक्षा का अभाव नज़र आ रहा था।’
मित्र ने पूछा-‘पर वह लोग तो अंग्रेजी में बोलते होंगे।’
मित्र ने कहा-‘हां, उनकी तो मातृभाषा ही अंग्रेजी है।’
तब वह आदमी बोला-‘अरे, यार जब उनको अंग्रेजी आती है तो अशिक्षित कैसे कहे जा सकते हैं।’
दूर के ढोल सुहावने होते हैं और मनुष्य की संकीर्णता और अज्ञान ही इसका कारण होता है। अमेरिका हो या भारत मुख्य समस्या प्रचार माध्यमों के रवैये से है जो आम आदमी को परिदृश्य से बाहर रखकर चर्चा करना पसंद करते हैं। अनेक लोग अमेरिकी व्यवस्था पर ही भारत को चलाना चाहते हैं और चल भी रहा है, ऐसे में जिन बुराईयों को अपने यहां देख रहे हैं वह वहां न हो यह संभव नहीं है। कुछ सामाजिक विशेषज्ञ तो सीधे तौर पर भौतिक विकास को अपराध की बढ़ती संख्या से जोड़ते हैं। हम भारत में जब विकास की बात करते हैं तो यह विषय भी देखा जाना चाहिये।
आखिरी बात यह कि दुनियां का सर्वशक्तिमान कहलाने वाला अमेरिका जब सामाजिक विकास के स्तंभ कहलाने वाले क्षेत्रों में पिछड़ गया है तो हम भारत को जब अगला सर्वशक्तिमान बनाने की तरफ बढ़ रहे हैं तो यकीनन इस 78 वें स्थान से भी गिरने के लिये तैयार होना चाहिए।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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आधुनिक लोकतंत्र के सिद्ध-हिन्दी व्यंग्य (adhunik loktantra ke siddh-hindi vyangya


फिलीपीन के राजधानी मनीला में एक बस अपहरण कांड में सात यात्री मारे गये और दुनियां भर के प्रचार माध्यम इस बात से संतुष्ट रहे कि बाकी को बचा लिया गया। इस बस का अपहरण एक निलंबित पुलिस अधिकारी ने किया था जो बाद में मारा गया। पूरा दृश्य देखकर ऐसा लगा कि जैसे तय कर लिया गया था कि दुनियां भर के प्रचार माध्यमों को सनसनी परोसनी है भले ही अंदर बैठे सभी यात्रियों की जान चली जाये जो एक निलंबित पुलिस अधिकारी के हाथ में रखी एक 47 के भय के नीचे सांस ले रहे थे। एक आसान से काम को मुश्किल बनाकर जिस तरह संकट से निपटा गया वह कई तरह के सवाल खड़े करता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ ने कहा था कि ‘लोकतंत्र में क्लर्क राज्य करते हैं।’ यह बात उस समय समझ में नहीं आती जब शैक्षणिक काल में पढ़ाई जाती है। बाद में भी तभी समझ में आती है जब थोड़ा बहुत चिंतन करने की क्षमता हो। वरना तो क्लर्क से आशय केवल फाईलें तैयार करने वाला एक लेखकर्मी ही होता है। उन फाईलों पर हस्ताक्षर करने वाले को अधिकारी कहा जाता है जबकि होता तो वह भी क्लर्क ही है। अगर एडमस्मिथ की बात का रहस्य समझें तो उसका आशय फाईलों से जुड़े हर शख्स से था जो सोचता ही गुलामों की तरह है पर करता राज्य है।
अपहर्ता निलंबित पुलिस अधिकारी ने अपनी नौकरी बहाल करने की मांग की थी। बस में पच्चीस यात्री थे। उसमें से उसने कुछ को उसने रिहा किया तो ड्राइवर उससे आंख बचाकर भाग निकला। उससे दस घंटे तक बातचीत होती रही। नतीजा सिफर रहा और फिर फिर सुरक्षा बलों ने कार्यवाही की। बस मुक्त हुई तो लोगों ने वहां जश्न मनाया। एक लोहे लंगर का ढांचा मुक्त हो गया उस पर जश्न! जो मरे उन पर शोक कौन मनाता है? उनके अपने ही न!
संभव है पुलिस अधिकारी की नाराजगी को देखते हुए कुछ बुद्धिजीवी उसका समर्थन भी करें पर सवाल यहां इससे निपटने का है।
अपहर्ता ने बस पकड़ी तो उससे निपटने का दायित्व पुलिस का था मगर उसकी मांगें मानने का अधिकार तो नागरिक अधिकारियों यानि उच्च क्लर्कों के पास ही था। आखिर उस अपहर्ता से दस घंटे क्या बातचीत होती रही होगी? इस बात को कौन समझ रहा होगा कि एक पूर्व पुलिस अधिकारी के नाते उसमें कितनी हिंसक प्रवृत्तियां होंगी। चालाकी और धोखे से उसका परास्त किया जा सकता था मगर पुलिस के लिये यह संभव नहीं था और जो नागरिक अधिकारी यह कर सकते थे वह झूठा और धोखा देने वाला काम करने से घबड़ाते होंगे।
अगर नागरिक अधिकारी या क्लर्क पहले ही घंटे में उससे एक झूठ मूठ का आदेश पकड़ा देते जिसमें लिखा होता कि ‘तुम्हारी नौकरी बहाल, तुम्हें तो पदोन्नति दी जायेगी। हमने पाया है कि तुम्हें झूठा फंसाया गया है और ऐसा करने वालों को हमने निलंबित कर दिया है। यह लो उनके भी आदेश की प्रति! तुम्हें तो फिलीपीन का सर्वोच्च सम्मान भी दिया जायेगा।’
उसके निंलबन आदेश लिखित में थे इसलिये उसे लिखा हुआ कागज देकर ही भरमाया जा सकता था। जब वह बस छोड़ देता तब अपनी बात से पलटा जा सकता था। यह किसने कहा है कि अपनी प्रजा की रक्षा के लिये राज्य प्रमुख या उसके द्वारा नियुक्त क्लर्क-अजी, पद का नाम कुछ भी हो, सभी जगह हैं तो इसी तरह के लोग-झूठ नहीं बोल सकते। कोई भी अदालत इस तरह का झूठ बोलने पर राज्य को दंडित नहीं  कर सकती। पकड़े गये अपराधी को उल्टे सजा देगी वह अलग विषय है।
हम यह दावा नहीं करते कि अपराधी लिखित में मिलने पर मान जाता पर क्या ऐसा प्रयास किया गया? कम से कम यह बात तो अभी तक जानकारी में नहीं आयी।
किसी भी राज्य प्रमुख और उसके क्लर्क को साम, दाम, दण्ड और भेद नीति से काम करने का प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है। अपनी प्रजा के लिये छल कपट करना तो राष्ट्रभक्ति की श्रेणी में आता है। मगर यह बात समझी नहीं गयी या कुछ होता दिखे इस प्रवृत्ति के तहत दस घंटे तक मामला खींचा गया कहना कठिन है।
बात केवल फिलीपीन की नहीं  पूरी दुनियां की है। सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की है। नीतिगत निर्णय क्लर्क-जिनको हस्ताक्षर करने का अधिकार है उन क्लर्कों को अधिकारी कह कर बुलाया जाता है-लेते हैं। सजायें अदालतें सुनाती हैं। ऐसे में आपात स्थिति में संकट के सीधे सामने खड़ा पुलिस कर्मी दो तरह के संकट में होता है। एक तो यह कि उसके पास सजा देने का हक नहीं है। गलत तरह का लिखित आश्वासन देकर अपराधी को वह फंसा नहीं सकता क्योंकि वह उस पर यकीन नहीं करेगा यह जानते हुए कि कानून में उसके पास कोई अधिकारी नहीं है और बिना मुकदमे के दंड देने पर पुलिस कर्मचारी खुद ही फंस सकता हैै।
ऐसे में आधुनिक लोकतंत्र में क्लर्कों का जलजला है। संकट सामने हैं पर उससे निपटने का उनका सीधा जिम्मा नहीं है। मरेगा तो पुलिस कर्मचारी या अपराधी! इसलिये वह अपनी कुर्सी पर बैठा दर्शक की तरह कुश्ती देख रहा होता है। बात करने वाले क्लर्क भी अपने अधिकार को झूठमूठ भी नहीं छोड़ सकते। वह कानून का हवाला देते हैं ‘हम ऐसा नहीं कर सकते।’
जहां माल मिले वहां कहते हैं कि ‘हम ही सब कर सकते हैं’
पूरी दुनियां में अमेरिका और ब्रिटेन की नकल का लोकतंत्र है। वहां राज्य करने वाले की सीधी कोई जिम्मेदारी नहीं है। यही हाल अर्थव्यवस्था का है। कंपनी नाम का एक दैत्य सभी जगह बन गया है जिसका कोई रंग रूप नहीं है। जो लोग उन्हें चला रहे हैं उन पर कोई प्रत्यक्ष आर्थिक दायित्व नहीं है। यही कारण है कि अनेक जगह कंपनियों के चेयरमेन ही अपनी कंपनी को डुबोकर अपना घर भरते हैं। दुनियां भर के क्लर्क उनसे जेबे भरते हैं पर उनका नाम भी कोई नहीं ले सकता।
ऐसे में आतंकवाद एक व्यापार बन गया है। उससे लड़ने की सीधी जिम्मेदारी लेने वाले विभाग केवल अपराधियों को पकड़ने तक ही अपना काम सीमित रखते हैं। कहीं अपहरण या आतंक की घटना सामने आये तो उन्हें अपने ऊपर बैठे क्लर्कों की तरफ देखना पड़ता है जो केवल कानून की किताब देखते हैं। उससे अलग हटकर वह कोई कागज़ झूठमूठ भी तैयार नहीं कर सकते क्योंकि कौन उन पर सीधे जिम्मेदारी आनी है। जब घटना दुर्घटना में बदल जाये तो फिर डाल देते हैं सुरक्षा बलों पर जिम्मेदारी। जिनको रणनीति बनानी है वह केवल सख्ती से निपटने का दंभ भरते हैं। ऐसे में इन घटनाओं में अपनी नन्हीं सी जान लेकर फंसा आम इंसान भगवान भरोसे होता है।
मनीला की उस अपहृत बस में जब सुरक्षा बल कांच तोड़ रहे थे तब देखने वालों को अंदर बैठे हांगकांग के उन पर्यटकों को लेकर चिंता लगी होगी जो भयाक्रांत थे। ऐसे में सात यात्री मारे गये तो यह शर्मनाक बात थी। सब भी मारे जाते तो भी शायद लोग जश्न मनाते क्योंकि एक अपहृता मरना ही उनके लिए खुशी की बात थी। फिर अंदर बैठे यात्री किसे दिख रहे थे। जो बचे वह चले गये और जो नहीं बचे उनको भी ले जाया गया। आज़ाद बस तो दिख रही है।
अब संभव है क्लर्क लोग उस एतिहासिक बस को कहीं रखकर वहां उसका पर्यटन स्थल बना दें। आजकल जिस तरह संकीर्ण मानसिकता के लोग हैं तुच्छ चीजों में मनोरंजन पाते हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि यकीनन उस स्थल पर भारी भीड़ लगेगी। हर साल वहां मरे यात्रियों की याद में चिराग भी जल सकते हैं। उस स्थल पर नियंत्रण के लिये अलग से क्लर्कों की नियुक्ति भी हो सकती है। कहीं  उस स्थल पर कभी हमला हुआ तो फिर पुलिस आयेगी और कोई एतिहासिक घटना हुई तो उसी स्थान पर एक ही साल में दो दो बरसियां मनेंगी।
आखिरी बात यह कि अर्थशास्त्री एडस्मिथ अमेरिका या ब्रिटेन का यह तो पता नहीं पर इन दोनों  में से किसी एक का जरूर रहा था और उसने इन दोनों की स्थिति देखकर ही ऐसा कहा होगा। अब जब पूरे विश्व में यही व्यवस्था तो कहना ही पड़ता है कि गलत नहीं कहा होगा। आधुनिक लोकतंत्र में क्लर्क ही सिद्ध होते हैं।

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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महंगाई का अर्थशास्त्र-हिन्दी व्यंग्य (black economics-hindi satire article)


किसी भी देश की मुद्रा पर अर्थशास्त्र में अनेक बातें पढ़ने को मिलती हैं पर उसके संख्यांक पर कहीं अधिक पढ़ने को नहीं मिलता अर्थात मुद्रा एक से लेकर एक हजार तक के अंक में छापी जाये या नहीं इस पर अधिक चर्चा नहीं मिलती। हम सीधी बात कहें तो डालर या सौ रुपये से ऊपर हो या नहीं इस पर अर्थशास्त्री अधिक विस्तार से विचार नहीं रखते। वजह शायद यह है कि आधुनिक अर्थशास्त्र की संरचना भी पुरानी है और तब शायद यह मुद्दा अधिक विचार योग्य नहीं था। इसलिये नये संदर्भ ंअब अर्थशास्त्र में जोड़ा जाना आवश्यक लगता है। हम बात कर रहे हैं भारत के सौ रुपये के ऊपर से नोटों की जिनका प्रचलन ऐसी समस्यायें पैदा कर रहा है जिनकी जानकारी शायद अर्थ नियंत्रण कर्ताओं को नहीं है। कभी कभी तो लगता है कि काली अर्थव्यवस्था के स्वामी अपने काला अर्थशास्त्र भी यहां चलाते हैं।
कुछ समय पूर्व योग शिक्षक स्वामी रामदेव ने बड़े अंक वाली मुद्रा छापने का मसला उठाया था पर उसे भारतीय प्रचार माध्यमों ने आगे नहीं बढ़ाया। एक दौ टीवी चैनल ने इस पर चर्चा की तो अकेले बाबा रामदेव के मुकाबले अनेक वक्ता थे जो भारत में पांच सौ और हजार के नोटों के पक्षधर दिखाई दिये क्योंकि वह सभी बड़े शहरों के प्रतिबद्ध तथा पेशेवर विद्वान थे जो संभवत प्रचार माध्यमों द्वारा इसी अवसर के लिये तैयार रखे जाते हैं कि कब कोई बहस हो और उनसे मनमाफिक बात कहलवाई जाये। यही हुआ भी! एक ऐसे ही विद्वान ने कहा कि ‘बड़े अंक की मुद्रा से उसे ढोने में सुविधा होती है और महंगाई बढ़ने के कारण रुपये की कीमत गिर गयी है इसलिये हजार और पांच सौ के नोट छापने जरूरी है।’
हैरानी होती है यह देखकर कि एक बहुत ही महत्व के मुद्दे पर कथित बुद्धिजीवी खामोश हैं-शायद कारों में घूमने, ऐसी में बैठने वाले तथा होटलों में खाना खाने वाले यह लोग नहीं जानते कि छोटे शहरों और गांवों के लिये आज भी हजार और पांच सौ का नोट अप्रासंगिक है। अनेक वस्तुऐं महंगी हुईं है पर कई वस्तुऐं ऐसी हैं जो अभी भी इतनी सस्ती हैं कि पांच सौ और हजार के नोट उससे बहुत बड़े हैं। टीवी, फ्रिज, कार, कंप्यूटर खरीदने में पांच सौ का नोट सुविधाजनक है पर सब्जियां तथा किराने का सामान सीमित मात्रा में खरीदने पर यह नोट बड़ा लगता है। दूसरा यह भी कि जिस अनुपात में आधुनिक सामानों के साथ उपभोक्ता वस्तुओं में मूल्य वृद्धि हुई है उतनी सेवा मूल्यों में नहीं हुई। मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि बहुंत कम होती है तथा लघू तथा ग्रामीण व्यवसायों में भी कोई बजट इतना बड़ा नहीं होता। वहां अभी भी सौ रुपये तक का नोट भी अपनी ताकत से काम चला रहा है तब पांच सौ तथा हजार के नोट छापना एक तरह से अर्थशास्त्र को चुनौती देता लगता है।
साइकिल के दोनों पहियों में हवा आज भी एक रुपये में भरी जाती है तो दुपहिया वाहनों के लिए दो रुपये लगते हैं। बढ़ती महंगाई देखकर यह विचार मन में आता है कि कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को हजार और पांच सौ नोटों के प्रचलन योग्य बनाने का प्रयास तो नहीं हो रहा है। कभी कभी तो लगता है कि जिन लोगों के पास पांच सौ या हजार के नोट बहुत बड़ी मात्रा मैं है वह उसे खपाना चाहते हैं इसलिये बढ़ती महंगाई देखकर खुश हो रहै हैं क्योंकि उसकी जावक के साथ आवक भी उनके यहां बढ़ेगी। दूसरी बात यह भी लगती है कि शायद पांच सौ और हजार नोटों की वजह से पांच तथा दस रुपये के सिक्के और नोट कम बन रहे हैं। इससे आम अर्थव्यवस्था में जीने वाले आदमी के लिये परेशानी हो रही है। आम व्यवस्था इसलिये कहा क्योंकि हजार और पांच सौ नोट उसके समानातंर एक खास अर्थव्यवस्था का प्रतीक हैं इसलिये ही अधिक रकम ढोने के लिये जो तर्क दिया जा रहा है जो केवल अमीरों के लिये ही सुविधाजनक है।
अनेक जगह कटे फटे पुराने नोटों की वजह से विवाद हो जाता है। अनेक बार ऐसे खराब छोटे नोट लोगों के पास आते हैं कि उनका चलना दूभर लगता है। उस दिन एक दुकानदार ने इस लेखक के सामने एक ग्राहक को पांच का पुराना नोट दिया। ग्राहक ने उसे वापस करते हुए कहा कि ‘कोई अच्छा नोट दो।’
दुकानदार ने उसके सामने अपनी दराज से पांच के सारे नोट रख दिये और
कहा कि ‘आप चाहें इनमें से कोई भी चुन लो। मैंने ग्राहकों को देने के लिये सौ नोट कमीशन देकर लिये हैं।’
वह सारे नोट खराब थै। पता नहीं दुकानदार सच कहा रहा था या झूठ पर पांच के वह सभी नोट बाज़ार में प्रचलन योग्य नहीं लगते थे। पुरानी मुद्रा नहीं मुद्रा को प्रचलन से बाहर कर देती है-यह अर्थशास्त्र का नियम है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि नयी मुद्रा पुरानी मुद्रा को प्रचलन में ला देती है पर इसके पीछे तार्किक आधार होना चाहिए। ऐसे पुराने और फटे नोट बाज़ार में प्रचलन में रहना हमारी बैकिंग व्यवस्था के लिये बहुत बड़ी चुनौती है।
हम यहां बड़ी मुद्रा के प्रचलन का विरोध नहीं कर रहे पर अर्थनियंत्रणकर्ताओं को छोटे और बडे नोटों की संरचना के समय अर्थव्यवस्था में गरीब, अमीर और मध्यम वर्ग के अनुपात को देखना चाहिए। वैसे यहां इस बात उल्लेख करना जरूरी है कि जितने भी विकसित और शक्तिशाली राष्ट्र हैं उनकी मुद्रा का अंतिम संख्यांक सौ से अधिक नहीं है। इसलिये जो देश को शक्तिशाली और विकसित बनाना चाहते हैं वह यह भी देखें कि कहंी यह बड़ी मुद्रा असंतुलन पैदा कर कहीं राष्ट्र को कमजोर तो नहीं कर देगी। कहीं हम आधुनिक अर्थशास्त्र को पढ़कर कहीं काला अर्थशास्त्र तो नहीं रचने जा रहे यह देखना देश के बुद्धिमान लोगों का दायित्व है।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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किसे धन्यवाद दूं साधु या शैतान को-हिन्दी हास्य कविता


गुरुजी ने अपने शिष्य को
उसके घर पहुंचने का संदेश भिजवाया,
तब वह बहुत घबड़ाया
अपनी पत्नी, बेटी और बहु से बोला
‘अरे भई,
बड़ी मुद्दत बाद वह वक्त आया
जब मेरे गुरुजी ने मेरे शहर आकर
घर पहुंचने का विचार बताया,
सब तैयारी करो,
स्वागत में कोई कमी न रह जाये,
इतने बड़े शिखर पर पहुंचा
उनकी कृपा से ढेर सारे फल पाये,
अब गुरु दक्षिणी चुकाने का समय आया।’
सुनकर बहु बोली
’लगता है ससुर जी आप न अखबार पढ़ते
न ही टीवी अच्छी तरह देखते,
आजकल के गुरु हो गये ऐसे
जो अपने ही शिष्यों के घरों की
महिलाओं पर कीचड़ फैंकते,
तौबा करिये,
बाहर जाकर ही गुरु दक्षिणा भरिये,
जवानी होती दीवानी,
बुढ़ापे में आदमी हो गुरु, हो जाता है रोमानी,
गेरुऐ पहने या सफेद कपड़े,
गुरुओं के चर्चित हो रहे लफड़े,
शैतान से बच जाते हैं क्योंकि
उससे बरतते पहले ही सुरक्षा
फिर वह पहचाना जाता है,
जरूरत है साधु से बचने की जो
शैतानी नीयत से आता है,
ऐसा मेरे पिता ने बताया।’

बहु के समर्थन में सास और
ननद ने भी अपना सिर हिलाया
तब ससुर बोले
‘चलो बाहर ही जाकर
उनके दर्शन करके आता हूं
पर तुम्हारी एकता देखकर सोचता हूं कि
किसे धन्यवाद दूं
साधु या शैतान को
किसने सास बहु और ननद-भाभी को
किसी विषय पर सहमत बनाया।’
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नकली मुस्कराहट बेचने वाले-हिन्दी व्यंग्य कविता


हादसे हों या खुशी के मौके

बाजार के सौदागरों के हाथ

लड्डू ही आते हैं,

क्योंकि कफन हो या लिबास

वही से लोग लाते हैं।

चीजों के साथ जज़्बात भी

कहीं मोल मिलते हैं तो

कहीं किराये पर

इसलिये कृत्रिम मुस्कराहट बेचने वाले

आंसु भी बेचते नज़र आते हैं।
उन्होंने अपने अभिनय से

कर ली दुनियां अपनी मुट्ठी में

पर अपना ही सच भूल जाते हैं।

बोलते अपनी जुबां से, वह जो भी शब्द,

करता है उसे कोई दूसरा कलमबद्ध,

दूसरों के इशारे पर बढ़ाते कदम,

उनके चलने को होता बस, एक वहम,

पर्दे पर हों या पद पर

अपने ही अहसासों को भूल जाते हैं,

फुरसत में भी आजादी से  सांस लेना मुश्किल

बस, आह भरकर रह जाते हैं।

जमाना उनको बना रहा है अपना प्रिय

जो दिखावटी प्रेम का अभिनय किस जाते हैं।

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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सच कटु तो सपने रंगीन-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ


जिंदगी का सच कटु होता जितना

इंसान का सपना उतना ही रंगीन हो जाता है।

रंगीले इंसानों के लिये

जिंदगी की  कड़वाहट में है मनोरंजन

इसलिये सोच से बने अफसानों में

हर रंग सराबोर हो जाता है।

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अमीर के बच्चे ने

गरीबों के दर्द पर

तो गरीब के बच्चे ने अमीरी के ख्वाब पर लिखा।

किन हालातों पर रोयें, किन पर हंसे

इंसानों के नजरिये में ही फर्क दिखा।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान और ज्योतिष ज्ञान-हिन्दी आलेख (shri madbhagvat geeta ka gyan aur jyotish-hidni article)


भारतीय ज्योतिष विज्ञान का विरोध किसलिये हो रहा है। चंद ज्योतिषी इस आड़ में यहां के लोगों को मूर्ख बना रहे हैं और हम यह जानते हैं। इसे बार बार दोहराने से क्या मतलब है? यहां के लोगों को बेवकूफ समझते हैं और अंग्रेजी शिक्षा पाने के बाद कुछ कथित विद्वान समझते हैं कि यह देश मूर्खों का है। कुछ लोग तो पाश्चात्य सभ्यता में ऐसे रम गये लगते हैं और उनको यह लगता है कि ‘हमारे अलावा यह सब मूर्ख बसते हैं।’
सूर्य ग्रहण या चंद्रग्रहण क्या आता है भारतीय टीवी चैनल चंद ज्योतिषियों को लेकर बैठ जाते हैं। फिर शुरु होती है बहस। ज्योतिष पर ही बहस हो तो ठीक, पर वहां तो श्रीगीता मद्भागवत का विषय भी छा जाता है। श्रीमद्भागवत गीता वास्तव में अद्भुत ग्रंथ है। आप रोज पढ़िये समझ में तब तक नहीं आयेगा जब तक भक्ति भाव के साथ ही ज्ञान प्राप्ति की प्यास मन में नहीं होगी। जब समझ में आयेगा तो फिर आप किसी से बहस नहीं करेंगे। कोई अन्य एक बार करेगा पर फिर दूसरी बार सोचेगा भी नहीं। अगर आप श्रीगीता से लेकर बोल रहे हैं और अगले को चुप नहीं करा पाये तो समझ लीजिये कि आपको अभी सिद्धि नहीं मिली। मगर यह ज्योतिषी अपने व्यवसायिक हितों के लिये अनावश्यक रूप से श्रीमद्भागवत गीता को बीच में लाते हैं।
दरअसल भारतीय अध्यात्म पर हमले करने के लिये विरोधी लोगों को केवल तोते से ज्योतिष बताकर पैसे एैंठने वाले ही दिखते हैं। उस दिन तो हद ही हो गयी। एक साथ दो चैनलों पर सूर्य ग्रहण के बाद बहस चल रही थी। एक दक्षिण का तर्कशास्त्री एक ही समय दो चैनलों पर दिखाई दे रहा था। नाम से गैर हिन्दू धर्म का प्रतीत होने वाला वह शख्स तर्कशास्त्री कैसे था यह तो नहीं मालुम-वह अपने को नास्तिक बता रहा था- पर वह एक जगह भविष्यवक्ता और दूसरी जगह तंत्र मंत्र वाले से जूझता दिखा-दोनों बहसें पहले से ही कैमरे में दर्ज की गयी थी।
भविष्यवक्ता से उस कथित तर्कशास्त्री बहस पहले सीधे हुई थी। उसमें उसने अपनी जन्मतिथि बताई तो भविष्यवक्ता ने उससे कहा कि ‘तुम्हारा घरेलू जीवन तनाव से भरा है।’
उसने इंकार किया और तब उसकी पत्नी से फोन पर पूछा गया तो वह भी ज्योतिषी की बात से असहमत हुई। बात आयी गयी खत्म होना चाहिये थी पर नहीं! अगले दिन फिर वह तर्कशास्त्री आया और आरोप लगाया कि ज्योतिषी उसकी जन्मतिथि पूछने के बाद फोन करने गया था, और वहीं से किसी से पूछकर भविष्य बताया। चैनल में काम करने वाली एक महिला तकनीशियन ने उसे बताया था कि ज्योतिषी का एक एस. एम. एस आया था। ज्योतिषी अब फोन पर बात करते हुए बता रहा था कि ‘उस समय तो मेरा फोन ही बंद था।’
चैनल की महिला तकनीशियन ने बताया कि यह संदेश बहस समाप्ति के बाद ही आया था। बहस का ओर छोर नहीं मिल रहा था।
यही तर्कशास्त्री उसी समय एक दूसरे चैनल पर एक तांत्रिक से उलझा हुआ था। तांत्रिक कह रहा था कि मैं तीन मिनट में तुम्हें बेहोश कर दूंगा। तांत्रिक को अवसर दिया गया पर वह ऐसा नहीं कर सका। इस दौरान वह संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण करता रहा। अब कौन कहे कि कहां ज्योतिष और कहां यह तंत्र मंत्र! मगर चूंकि भारतीय अध्यात्म को निशाना बनाना है तो ऐसे अनेक विषय मिल ही जाते हैं।
इस पूरी बहस में हमें हंसी आयी। ऐसा लगता है कि श्रीमद्भागवत गीता की तरह ज्योतिष भी एक ऐसा विषय है जो चाहे जितना पढ़ लो समझ में नहीं आ सकता जब तक अपने रक्त में समझदार तत्व प्रवाहित न हो रहे हों। इसी बहस में एक ज्योतिष पढ़ चुकी महिला कह रही थी कि मुझे ज्योतिष में विश्वास नहीं है। यहां तक कि मैं अपना भविष्यफल जानने की कोशिश नहीं करती।’
इसलिये हमें यह लगा कि ज्योतिष भी श्रीगीता की तरह सभी के समझ में न आने वाला विषय हो सकता है। आखिरी ज्योतिष पढ़ चुकी एक महिला कह रही है तो यही समझा जा सकता है।
बहरहाल हमें यह लगा कि इस आड़ के भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का मजाक उड़ाने का प्रयास हो रहा है। ज्योतिष विषय पर टीवी पर ही एक विद्वान द्वारा दी गयी जानकारी हमें अच्छी लगी। उसने बताया कि ज्योतिष के छह भाग हैं जिनमें एक ही भाग ऐसा है जिसमें समय समय पर पूछने पर भविष्य बताया जाता है। उन्होंने बताया कि गणितीय गणना भी ज्योतिष का भाग है जिसके आधार पर हमारे पुराने विद्वानों ने सूरज, चंद्रमा तथा अन्य ग्रहों का पता लगाया था।
वैसे पता नहीं कैसे लोग कहते हैं कि ग्रहों का असर नहीं होता? इस विषय पर हमारा आधुनिक तर्कशास्त्रियों से मतभेद है। सूर्य जब दक्षिणायन होता है तो ठंड पड़ती है। यह ठंड आदमी को शरीर को कंपकंपा देती है और यकीनन उसकी मनस्थिति बिगड़ती है। आधुनिक विज्ञानी एक तरफ कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग रहता है तब यह कैसे संभव है कि गर्मी फैला रहे सूर्य में जल रहा शरीर अपना ठंडा दिमाग रख सके। श्रीगीता के ‘गुण ही गुण बरतते हैं’ के सिद्धांत को हमने अपनी देह पर लागू होते देखा है। जब परेशान होते हैं तब सूर्य, चंद्रमा और आकाश की स्थिति को देखकर लगता है कि यह सभी ग्रहों का असर है। जब यह बदलेंगे तो हमारी मानसिकता भी बदलेगी। एक सम्मानित वैज्ञानिक भी वहां आये थे-यकीनन वह बहुत महान हैं पर उनको ग्रहण के अवसर पर ही लाया जाता है। हमने कभी किसी ग्रहण के अवसर पर एक कार्यक्रम में उनको कहते सुना था कि ‘हम यह तो पता नहीं लगा सके कि धरती से बाहर जीवन है कि नहीं, पर यह तय है कि जीवन के आधार वहां ऐसे ही होंगे।’
उन्होंने शायद यह भी कहा था कि जिस तरह धरती और सूर्य के बीच अन्य ग्रह हैं वह दूसरी सृष्टि में भी होंगेे तभी वहां जीवन होगा। तात्पर्य यह है कि कहीं जीवन होगा तो वहां ऐसी प्रथ्वी होगी जिसके पास अपना सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति, शुक्र, बुध, शनि, मंगल तथा अन्य ग्र्रह भी होंगे। हम इसे यह भी कह सकते हैं कि यह ग्रह सभी प्रकार के जीवन का आधार हैं तो फिर यह कैसे संभव है कि वह मनुष्य जीवन को प्रभावित न करें।
हमने अपने अनुभव से एक बात यह देखी है कि एक ही नाम के दो व्यक्ति में कई बार स्वभावगत, परिवार तथा वैचारिक स्तर पर समानता होती है। यह सही है कि सभी का जीवन स्तर समान नहीं होता पर उनकी आदतें और विचार एक ही तरह के दिखते हैं। संभव है कुछ ज्योतिषी इसका दुरुपयोग करते हों पर सभी को इसके लिये गलत नहीं ठहराया जा सकता।
दूसरी बात यह है कि ज्योतिष में ही हमारा खगोल शास्त्र भी जुड़ा हुआ है। हमारे यहां अनेक पंचांग छपते हैं जिनमें सूर्य और चंद्रग्रहण की तारीख और समय छपा होता है और जो पश्चिमी विज्ञान की भविष्यवाणी से मेल खाता है। भारत में अनेक लोगों को पता होता है कि अमुक तारीख को सूर्य या चंद्रग्रहण होगा। अखबार और टीवी में तो बहुत बाद में पढ़ते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय ज्योतिष एक विज्ञान है मगर इस विषय पर वही लोग बोल और लिख रहे हैं जिनको इसका ज्ञान नहीं है-इनमें वह लोग भी हैं जो पढ़े पर समझ नहीं पाये। वैसे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस तरह की बहसें प्रायोजित हैं ताकि भारतीय अध्यात्म को विस्मृत किया जा सके। एक तर्कशास्त्री की दो जगह उपस्थित यही प्रमाणित करती है।
आखिरी सलाह ज्योतिषियों को भी है कि हो सके तो वह श्रीमद्भागवत गीता से दूर ही रहें क्योंकि वह समझना भी हरेक के बूते का नहीं है। उसमें जो योग और ध्यान के अभ्यास का संदेश दिया गया है उसमें इतनी शक्ति है कि उससे न यहां आदमी इहलोक बल्कि परलोक भी सुधार लेता है। सूर्य इस देह को जला सकता है पर उस आत्मा को नहीं जो न जल सकती है न मर सकती है। किसी भी प्रकार के विज्ञान से परिपूर्ण होने की बात तो उसमें कही गयी है पर इसका मतलब यह नहीं है कि ज्योतिष विज्ञान में पारंगत होने का आशय श्रीगीता सिद्ध हो जाना है। वैसे ज्योतिषियों को यह पता होना चाहिये कि इस तरह अपने ज्ञान का प्रदर्शन अज्ञानियों के सामने प्रदर्शन तामसी प्रवृत्ति का परिचायक है और उनके सामने श्रीगीता का ज्ञान देने की मनाही तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी की है।

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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हिन्दू धर्म संदेश-अन्य लोगों के काम करने पर मिलती है इज्जत


स्वारथ सूका लाकड़ा, छांह बिहना सूल।
पीपल परमारथ भजो, सुख सागर को मूल।।
संत कबीरदास जी का कहना है कि स्वार्थ तो सूखी लकड़ी के समान हैं जिसमें न तो छाया मिलती है और न ही सुख। एक तरह से वह कांटे की तरह है। इसके विपरीत परमार्थ पीपल के पेड़ के समान हैं जो सुख प्रदान करता है।
धन रहै न जोबन रहे, रहै न गांव न ठांव।
कबीर जग में जस रहे, करिदे किसी का काम।
संत कबीर दास जी कहते हैं कि एक दिन यह न धन रहेगा न यह यौवन ही साथ होगा। गांव और घर भी छूट जायेगा पर रहेगा तो अपना यश, यह तभी संभव है कि हमने किसी का काम किया हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह लोगों की गलतफहमी है कि वह भौतिक उपलब्धियों के कारण सम्मान पा रहे हैं। लोग अपनी आर्थिक उपलब्धियों, परिवार की प्रतिष्ठा और अपने कर्म का बखान स्वयं करते हैं। मजा तो तब है जब दूसरे आपकी प्रशंसा करेें और यह तभी संभव है कि आप अपने काम से दूसरे की निस्वार्थ भाव से सहायता कर उसको प्रसन्न करें।
आप कहीं किसी धार्मिक स्थान, उद्यान या अन्य सार्वजनिक स्थान पर जाकर बैठ जायें। वहां आपसे मिलने वाले लोग केवल आत्मप्रवंचना में लगे मिलेंगे। हमने यह किया, वह किया, हमने यह पाया और हमने यह दिया जैसे जुमले आप किसी के भी श्रीमुख से नहीं सुन पायेंगे।
दरअसल बात यह है कि सामान्य मनुष्य पूरा जीवन अपने और परिवार के लिये धन का संचय कर यह सोचता है कि वह सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित कर रहा है और परमार्थ करना उसके लिये एक फालतू विषय है। जब उससे धन और यौवन विदा होता है तब वह खाली बैठे केवल अपने पिछले जीवन को गाता है पर सुनता कौन है? सभी तो इसमें ही लगे हैं। इसलिये अगर ऐसा यश पाना है जिससे जीवन में भी सम्मान मिले और मरने पर भी लोग याद करें तो दूसरों के हित के लिये काम करें। जब समय निकल जायेगा तब पछताने से कोई लाभ नहीं होगा।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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गर्भ में कन्या की हत्या सामाजिक कुरीतियों का परिणाम-हिन्दी लेख


देश में पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की कम होती संख्या चिंता का विषय है। यह चिंता होना भी चाहिये क्योंकि जब हम मानव समाज की बात करते हैं तो वह दोनों पर समान रूप से आधारित है। रिश्तों के नाम कुछ भी हों मगर स्त्री और पुरुष के बीच सामजंस्य के चलते ही परिवार चलता है और उसी से देश को आधार मिलता है। इस समय स्त्रियों की कमी का कारण ‘कन्या भ्रुण हत्या’ को माना जा रहा है जिसमें उसके जनक माता, पिता, दादा, दादी, नाना और नानी की सहमति शामिल होती है। यह संभव नहीं है कि कन्या भ्रुण हत्या में किसी नारी की सहमति न शामिल हो। संभव है कि नारीवादी कुछ लेखक इस पर आपत्ति करें पर यह सच नहीं बदल सकता क्योंकि हम अपने समाज की कुरीतियों, अंधविश्वासों और पाखंडों को अनदेखा नहीं कर सकते जिसमें स्त्री और पुरुष समान रूप से शामिल होते दिखते हैं।
अनेक समाज सेवकों, संतों तथा बुद्धिजीवी निंरतर कन्या भ्रुण हत्या के विरुद्ध अभियान छेड़े हुए हैं-उनकी गतिविधियों की प्रशंसा करना चाहिये।
मगर हमें यह बात भी देखना चाहिये कि ‘कन्या भ्रुण हत्या’ कोई समस्या नहीं बल्कि समाज में व्याप्त दहेज प्रथा तथा अन्य प्रकार की सामाजिक सोच का परिणाम है। ‘कन्या भ्रुण हत्या’ रोको जैसे नारे लगाने से यह काम रुकने वाला नहीं है भले ही कितनी ही राष्ट्रभक्ति या भगवान भक्ति की कसमें खिलाते रहें।
अनेक धार्मिक संत अपने प्रवचनों में भी यही मुद्दा उठा रहे हैं। अक्सर वह लोग कहते हैं कि ‘हमारे यहां नारी को देवी की तरह माना जाता है’।
सवाल यह है कि वह किसे संबोधित कर रहे हैं-क्या उनमें नारियां नहीं हैं जो कहीं न कहीं इसके लिये किसी न किसी रिश्ते के रूप में शामिल होती हैं।
दहेज प्रथा पर बहुत लिखा गया है। उस पर लिखकर कर विषय के अन्य पक्ष को अनदेखा करना व्यर्थ होगा। मुख्य बात है सोच की।
हममें से अनेक लोग पढ़ लिखकर सभ्य समाज का हिस्सा बन गये हैं पर नारी के बारे में पुरातन सोच नहीं बदल पाये। लड़की के पिता और लड़के के पिता में हम स्वयं भी फर्क करते दिखते हैं पर तब हमें इस बात का अनुमान नहीं होता कि अंततः यह भाव एक ऐसी मानसिकता का निर्माण करता है जो ‘कन्या भ्रुण हत्या’ के लिये जिम्मेदार बनती है। शादी के समय लड़की वालों को तो बस किसी भी तरह बारातियों को झेलना है और लड़के वालों को तो केवल अपनी ताकत दिखाना है। अनेक बार ऐसी दोहरी भूमिकायें हममें से अनेक लोग निभाते रहे हैं। तब हम यंत्रवत चलते रहते हैं कि यह तो पंरपरा है और इसे निभाना है। शादी के समय जीजाजी का जूता साली चुराती है और उसे पैसे लेने हैं पर इससे पहले उसका पिता जो खर्च कर चुका होता है उसे कौन देखता है। साली द्वारा जुता चुराने की रस्म बहुत अच्छी लगती है पर उससे पहले हुई रस्में निभाते हुए दुल्हन का बाप कितना परेशान होता है यह देखने वाली बात है।
हमारे यहां अनेक प्रकार के समाज हैं। कमोबेश हर समाज में नारी की स्थिति एक जैसी है। उस पर उसका पिता होना मतलब अपना सिर कहीं झुकाना ही है। अनेक लोग कहते भी हैं कि ‘लड़की के बाप को सिर तो झुकाना ही पड़ता है।’
कुछ समाजों ने तो अब शराब खोरी और मांसाहार परोसने जैसे काम विवाहों के अवसर सार्वजनिक कर दिये हैं जो कभी हमारी परंपरा का हिस्सा नहीं रहे। वहां हमने पाश्चात्य सभ्यता का मान्यता दी पर जहां लड़की की बात आती है वहां हमें हमारा धर्म, संस्कार और संस्कृति याद आती है और उसका ढिंढोरा पीटने से बाज नहीं आते।
कहने का अभिप्राय यह है कि ‘कन्या भ्रुण हत्या’ का नारा लगाना है तो नारा लगाईये पर देश के लोगों को प्रेरित करिये कि
1. शादी समारोह अत्यंत सादगी से कम लोगों की उपस्थिति में करें। भले ही बाद में स्वागत कार्यक्रम स्वयं लड़के वाले करें।
2. दहेज को धर्म विरोधी घोषित करें। याद हमारे यहां दहेज का उल्लेख केवल भगवान श्रीराम के विवाह समारोह में दिया गया था पर उस समय की हालत कुछ दूसरे थे। समय के साथ चलना ही हमारे अध्यात्मिक दर्शन का मुख्य संदेश हैं।
3. लोगों को यह समझायें कि अपने बच्चों का उपयेाग अस्त्र शस्त्र की तरह न करें जिससे चलाकर अपनी वीरता का परिचय दिया जाता है।
4. अनेक रस्मों को रोकने की सलाह दें।
याद रखिये यही हमारा समाज हैं। अगर आज किसी को तीन लड़कियां हों तो उसे सभी लोग वैसे ही बिचारा कहते हैं। ऐसा बिचारा कौन बनना चाहेगा? जब तक हम अपने समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, शादी में अनाप शनाप खर्च तथा सोच को नहीं बदलेंगे तब तक कन्या भ्रुण हत्या रोकना संभव नहीं है। दरअसल इसके लिये न केवल राजनीतिक तथा कानूनी प्रयास जरूरी हैं बल्कि धार्मिक संतों के साथ सामाजिक संगठनों को भी कार्यरत होना चाहिये। सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह है कि जब लड़कियों की संख्या इतनी कम हो रही है तब भी लड़के वालों के दहेज बाजार में भाव क्यों नहीं गिर रहे? लाखों रुपये का दहेज, गाड़ी तथा अन्य सामान निरंतर दहेज में दिया जा रहा है। इतना ही नहीं लड़कियों के सामाजिक सम्मान में भी कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही है। इन सभी बातों का विश्लेषण किये बिना ‘कन्या भ्रुण हत्या’ रोकने के लिये प्रारंभ वैचारिक अभियान सफल हो पायेगा इसमें संदेह है।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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नाम के मालिक-व्यंग्य हिंदी शायरी


सुंदरता अब सड़क पर नहीं

बस पर्दे पर दिखती है

जुबां की ताकत अब खून में नहीं

केवल जर्दे में दिखती है।

सौंदर्य प्रसाधन पर पड़ती

जैसे ही पसीने की बूंद

सुंदरता बह जाती,

तंबाकू का तेज घटते ही

जुबां खामोश रह जाती,

झूम रहा है वहम के नशे में सारा जहां

औरत की आंखें देखती

दौलत का तमाशा

तो आदमी की नजर बस

कृत्रिम खूबसूरती पर टिकती है।

 

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हांड़मांस के बुत हैं

इंसान भी कहलाते हैं,

चेहरे तो उनके अपने ही है

पर दूसरे का मुखौटा बनकर

सामने आते हैं।

आजादी के नाम पर

उनके हाथ पांव में जंजीर नहीं है

पर अक्ल पर

दूसरे के इशारों के बंधन

दिखाई दे जाते हैं।

नाम के मालिक हैं वह गुलाम

गुलामों पर ही राज चलाये जाते हैं।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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नश्वर का शोक-हिन्दी हास्य व्यंग्य (nashvar ka dukh-hindi hasya vyangya)


आप कितने भी ज्ञानी ध्यानी क्यों न हों, एक समय ऐसा आता है जब आपको कहना भी पड़ता है कि ‘भगवान ही जानता है’। जब किसी विषय पर तर्क रखना आपकी शक्ति से बाहर हो जाये या आपको लगे कि तर्क देना ही बेकार है तब यह कहकर ही जान छुड़ाना पड़ती है कि ‘भगवान ही जानता है।’
अब कल कुछ लोगों ने छ दिसंबर पर काला दिवस मनाया। दरअसल यह किसी शहर में कोई विवादित ढांचा गिरने की याद में था। अब यह ढांचा कितना पुराना था और सर्वशक्तिमान के दरबार के रूप में इसका नाम क्या था, ऐसे प्रश्न विवादों में फंसे है और उनका निष्कर्ष निकालना हमारे बूते का नहीं है।
दरअसल इस तरह के सामूहिक विवाद खड़े इसलिये किये जाते हैं जिससे समाज के बुद्धिमान लोगों को उन पर बहस कर व्यस्त रखा जा सकें। इससे बाजार समाज में चल रही हेराफेरी पर उनका ध्यान न जाये। कभी कभी तो लगता है कि इस पूरे विश्व में धरती पर कोई एक ऐसा समूह है जो बाजार का अनेक तरह से प्रबंध करता है जिसमें लोगों को दिमागी रूप से व्यस्त रखने के लिये हादसे और समागम दोनों ही कराता है। इतना ही नहीं वह बहसें चलाने के लिये बकायदा प्रचार माध्यमों में भी अपने लोग सक्रिय रखता है। जब वह ढांचा गिरा था तब प्रकाशन से जुड़े प्रचार माध्यमों का बोलाबाला था और दृष्यव्य और श्रवण माध्यमों की उपस्थिति नगण्य थी । अब तो टीवी चैनल और एफ. एम. रेडियो भी जबरदस्त रूप से सक्रिय है। उनमें इस तरह की बहसे चल रही थीं जैसे कि कोई बड़ी घटना हुई हो।
अब तो पांच दिसंबर को ही यह अनुमान लग जाता है कि कल किसको सुनेंगे और देखेंगे। अखबारों में क्या पढ़ने को मिलेगा। उंगलियों पर गिनने लायक कुछ विद्वान हैं जो इस अवसर नये मेकअप के साथ दिखते हैं। विवादित ढांचा गिराने की घटना इस तरह 17 वर्ष तक प्रचारित हो सकती है यह अपने आप में आश्चर्य की बात है। बाजार और प्रचार का रिश्ता सभी जानते हैं इसलिये यह कहना कठिन है कि ऐसे प्रचार का कोई आर्थिक लाभ न हो। उत्पादकों को अपनी चीजें बेचने के लिये विज्ञापन देने हैं। केवल विज्ञापन के नाम पर न तो कोई अखबार छप सकता है और न ही टीवी चैनल चल सकता है सो कोई कार्यक्रम होना चाहये। वह भी सनसनीखेज और जज़्बातों से भरा हुआ। इसके लिये विषय चाहिये। इसलिये कोई अज्ञात समूह शायद ऐसे विषयों की रचना करने के लिये सक्रिय रहता होगा कि बाजार और प्रचार दोनों का काम चले।
बहरहाल काला दिवस अधिक शोर के साथ मना। कुछ लोगों ने इसे शौर्य दिवस के रूप में भी मनाया पर उनकी संख्या अधिक नहीं थी। वैसे भी शौर्य दिवस मनाने जैसा कुछ भी नहीं है क्योंकि वह तो किसी नवीन निर्माण या उपलब्धि पर मनता है और ऐसा कुछ नहीं हुआ। अलबत्ता काला दिवस वालों का स्यापा बहुत देखने लायक था। हम इसका सामाजिक पक्ष देखें तो जिन समूहों को इस विवाद में घसीटा जाता है उनके सामान्य सदस्यों को अपनी दाल रोटी और शादी विवाह की फिक्र से ही फुरसत नहीं है पर वह अंततः एक उपभोक्ता है और उसका मनोरंजन कर उसका ध्यान भटकाना जरूरी है इसलिये बकायदा इस पर बहसें हुईं।
राजनीतिक लोगों ने क्या किया यह अलग विषय है पर समाचार पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनलों पर हिन्दी के लेखकों और चिंतकों को इस अवसर पर सुनकर हैरानी होती है। खासतौर से उन लेखको और चिंतकों की बातें सुनकर दिमाग में अनेक प्रश्न खड़े होते हैं जो साम्प्रदायिक एकता की बात करते हैं। उनकी बात पर गुस्सा कम हंसी आती है और अगर आप थोड़ा भी अध्यात्मिक ज्ञान रखते हैं तो केवल हंसिये। गुस्सा कर अपना खूना जलाना ठीक नहीं है।
वैसे ऐसे विकासवादी लेखक और चिंतक भारतीय अध्यात्मिक की एक छोटी पर संपूर्ण ज्ञान से युक्त ‘श्रीमद्भागवत गीता’ पढ़ें तो शायद स्यापा कभी न करें। कहने को तो भारतीय अध्यात्मिक ग्रथों से नारियों को दोयम दर्जे के बताने तथा जातिवाद से संबंधित सूत्र उठाकर यह बताते हैं कि भारतीय धर्म ही साम्प्रदायिक और नारी विरोधी है। जब भी अवसर मिलता है वह भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान पर वह उंगली उठाते है। हम उनसे यह आग्रह नहीं कर रहे कि वह ऐसा न करें क्योंकि फिर हम कहां से उनकी बातों का जवाब देते हुए अपनी बात कह पायेंगे। अलबत्ता उन्हें यह बताना चाहते हैं कि वह कभी कभी आत्ममंथन भी कर लिया करें।
पहली बात तो यह कि यह जन्मतिथि तथा पुण्यतिथि उसी पश्चिम की देन है जिसका वह विरोध करते हैं। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि न आत्मा पैदा होता न मरता है। यहां तक कि कुछ धार्मिक विद्वान तो श्राद्ध तक की परंपरा का भी विरोध करते हैं। अतः भारतीय अध्यात्मिक को प्राचीन मानकर अवहेलना तो की ही नहीं जा सकती। फिर यह विकासवादी तो हर प्रकार की रूढ़िवादिता का विरोध करते हैं कभी पुण्यतिथि तो कभी काला दिवस क्यों मनाते हैं?

सांप्रदायिक एकता लाने का तो उनका ढोंग तो उनके बयानों से ही सामने आ जाता है। उस विवादित ढांचे को दो संप्रदाय अपनी अपनी भाषा में सर्वशक्तिमान के दरबार के रूप में अलग अलग नाम से जानते हैं पर विकासवादियों ने उसका नाम क्या रखा? तय बात है कि भारतीय अध्यात्म से जुड़ा नाम तो वह रख ही नहीं सकते थे क्योंकि उसके विरोध का ही तो उनका रास्ता है। अपने आपको निष्पक्ष कहने वाले लोग एक तरफ साफ झुके हुए हैं और इसको लेकर उनका तर्क भी हास्यप्रद है कि वह अल्प संख्या वाले लोगों का पक्ष ले रहे है क्योंकि बहुसंख्या वालों ने आक्रामक कार्य किया है। एक मजे की बात यह है कि अधिकतर ऐसा करने वाले बहुसंख्यक वर्ग के ही हैं।
इस संसार में जितने भी धर्म हैं उनके लोग किसी की मौत का गम कुछ दिन ही मनाते हैं। जितने भी धर्मो के आचार्य हैं वह मौत के कार्यक्रमों का विस्तार करने के पक्षधर नहीं होते। कोई एक मर जाता है तो उसका शोक एक ही जगह मनाया जाता है भले ही उसके सगे कितने भी हों। आप कभी यह नहीं सुनेंगे कि किसी की उठावनी या तेरहवीं अलग अलग जगह पर रखी जाती हो। कम से कम इतना तो तय है कि सभी धर्मों के आम लोग इतने तो समझदार हैं कि मौत का विस्तार नहीं करते। मगर उनको संचालित करने वाले यह लेखक और चिंतक देश और शहरों में हुए हादसों का विस्तार कर अपने अज्ञान का ही परिचय ही देते हैं। । इससे यह साफ लगता है कि उनका उद्देश्य केवल आत्मप्रचार होता है।
आखिरी बात ऐसे ही बुद्धिजीवियों के लिये जो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से दूर होकर लिखने में शान समझते हैं। उनको यह जानकर कष्ट होगा कि श्रीगीता में अदृश्य परमात्मा और आत्मा को ही अमर बताया गया है पर शेष सभी भौतिक वस्तुऐं नष्ट होती हैं। उनके लिये शोक कैसा? यह प्रथ्वी भी कभी नष्ट होगी तो सूर्य भी नहीं बचेगा। आज जहां रेगिस्तान था वहां कभी हरियाली थी और जहां आज जल है वहां कभी पत्थर था। यह ताजमहल, कुतुबमीनार, लालाकिला और इंडिया गेट सदियों तक बने रहेंगे पर हमेशा नहीं। यह प्रथवी करोड़ों साल से जीवन जी रही है और कोई नहीं जानता कि कितने कुतुबमीनार और ताज महल बने और बिखर गये। अरे, तुमने मोहनजो दड़ो का नाम सुना है कि नहीं। पता नहीं कितनी सभ्यतायें समय लील गया और आगे भी यही करेगा। अरे लोग तो नश्वर देह का इतना शोक रहीं करते आप लोग तो पत्थर के ढांचे का शोक ढो रहे हो। यह धरती करोड़ों साल से जीवन की सांसें ले रही है और पता नहीं सर्वशक्तिमान के नाम पर पता नहीं कितने दरबादर बने और ढह गये पर उसका नाम कभी नहीं टूटा। बाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि भगवान श्रीरामचंद्र जी के पहले भी अनेक राम हुए और आगे भी होंगे। मतलब यह कि राम का नाम तो आदमी के हृदय में हमेशा से था और रहेगा। उनके समकालीनों में परशुराम का नाम भी राम था पर फरसे के उपयोग के कारण उनको परशुराम कहा गया। भारत का आध्यात्मिक ज्ञान किसी की धरोहर नहीं है। लोग उसकी समय समय पर अपने ढंग से व्याख्या करते हैं। जो ठीक है समाज उनको आत्मसात कर लेता है। यही कारण है कि शोक के कुछ समय बाद आदमी अपने काम पर लग जाता है। यह हर साल काला दिवस या बरसी मनाना आम आदमी को भी सहज नहीं ल्रगता। मुश्किल यह है कि उसकी अभिव्यक्ति को शब्दों का रूप देने के लिये कोई बुद्धिजीवी नहीं मिलता। जहां तक सहजयोगियों का प्रश्न है उनके लिये तो यह व्यंग्य का ही विषय होता है क्योंकि जब चिंतन अधिक गंभीर हो जाये तो दिमाग के लिये ऐसा होना स्वाभाविक ही है
सबसे बड़ी खुशी तो अपने देश के आम लोगों को देखकर होती है जो अब इस तरह के प्रचार पर अधिक ध्यान नहीं देते भले ही टीवी चैनल, अखबार और रेडियो कितना भी इस पर बहस कर लें। यह सभी समझ गये हैं कि देश, समाज, तथा अन्य ऐसे मुद्दों से उनका ध्यान हटाया जा रहा है जिनका हल करना किसी के बूते का नहीं है। यही कारण है कि लोग इससे परे होकर आपस में सौहार्द बनाये रखते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि इसी में ही उनका हित है। वैसे तो यह कथित बुद्धिजीवी जिन अशिक्षितों पर तरस खाते हैं वह इनसे अधिक समझदार है जो देह को नश्वर जानकर उस पर कुछ दिन शोक मनाकर चुप हो जाते हैं। ऐसे में उनसे यही कहना पड़ता है कि ‘भई, नश्वर निर्जीव वस्तु के लिये इतना शोक क्यों? वह भी 17 साल तक!
हां, चाहें तो कुछ लोग उनकी हमदर्दी जताने की अक्षुण्ण क्षमता की प्रशंसा भी कर सकते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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शब्दों की जादूगरी-हिन्दी साहित्य कविता


मु्फ्त की हवाओं से
जिंदगी की सांस चलती,
पानी से बुझती प्यास की आग
जब गले में जलती।
सूरज की धूप अपने स्पर्श से
देह को मलती।
कुदरत से जिंदगी के साथ मिले मुफ्त
तोहफों की इंसान कहां करता कदर,
ख्वाब करते हैं उसे दर-ब-दर,
रेत में ढूंढता है पत्थर की कोड़ियां,
भरता है उससे अपनी बोरियां,
आंखों से देखने को आतुर है सोना
नींद बेचकर खरीदता है बिछौना,
कागज के नोटों का बना लिया ढेर,
मन को समझाता है
पूजकर पत्थर के शेर,
लाचार क्या कर सकता है
इसके अलावा,
आजाद अक्ल मिली है
पर साथ मिला जरूरतों की
गुलामी का छलावा,
अपना सोचने में लगती है देर,
अक्लमंद भी सजाते हैं सामने
सपनों का अंधेर
भला कहां है आम इंसान की गलती।।

 वह हर रोज तारीखों पर लिखते हैं।

इसलिए कलेंडर में हमेशा झांकते दिखते  हैं।

बाजार के सौदागरों के लिए दलालों ने

अपने कारिंदों के सहारे

जमाने में किये हैं इतने हादसे कि

पेशेवर कलमकारों के शब्द

उन्हीं पर कहीं रोते तो कहीं हंसते मिलते हैं।

———-

हम हादसों की तारीखें भूल जाते हैं

पर शब्दों के सौदागर

हर तारीख को कब्र से ढूंढ कर लाते हैं।

भूल न जाये जमाना उनके साथ जमाना

शब्दों की जादूगरी और उनका नाम

इसलिये हर रोज की तारीख का

हादसा याद दिलाते हैं।

 


लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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माँगा जो हिसाब-हास्य व्यंग और कविता (hisab-hindy hasya vyang aur kavia)


दीपक बापू अपने घर से बाहर निकले ही थे कि सेवक ‘सदाबहार’जी मिल गये। दीपक बापू ने प्रयास यह किया कि किसी तरह उनसे बचकर निकला जाये इसलिये इस मुद्रा में चलने लगे जैसे कि किसी हास्य कविता के विषय का चिंतन कर रहे हों जिसकी वजह से उनका ध्यान सड़क पर जा रहे किसी आदमी की तरफ नहीं है। मगर सदाबहार समाज सेवक जी हाथ में कागज पकड़े हुए थे और उनका काम ही यही था कि चलते चलते शिकार करना। वह कागज उनके रसीद कट्टे थे जिसे लोग पिंजरा भी कहते हैं।
‘‘ऐ, दीपक बापू! किधर चले, इतना बड़ी हमारी देह तुमको दिखाई नहंी दे रही। अरे, हमारा पेट देखकर तो तीन किलोमीटर से लोग हमको पहचान जाते हैं और एक तुम हो कि नमस्कार तक नहीं करते।’उन्होंने दीपक बापू को आवाज देकर रोका
उधर दीपक बापू ने सोचा कि’ आज पता नहीं कितने से जेब कटेगी?’
उन्होंने समाज सेवक जी से कहा-‘नमस्कार जी, आप तो जानते हो कि हम तो कवि हैं इसलिये जहां भी अवसर मिलता है कोई न कोई विषय सोचते हैं। इसलिये कई बार राह चलते हुए आदमी की तरफ ध्यान नहीं जाता। आप तो यह बतायें कि यह कार यात्रा छोड़कर कहां निकल पड़े?’
सेवक ‘सदाबहार’जी बोले-अरे, भई कार के बिना हम कहां छोड़ सकते हैं। इतना काम रहता है कि पैदल चलने का समय ही नहीं मिल पाता पर समाज सेवा के लिये तो कभी न कभी पैदल चलकर दिखाना ही पड़ता है। कार वहां एक शिष्य के घर के बाहर खड़ी की और फिर इधर जनसंपर्क के लिये निकल पड़े। निकालो पांच सौ रुपये। तुम जैसे दानदाता ही हमारा सहारा हो वरना कहां कर पाते यह समाज सेवा?’
दीपक बापू बोले-‘किसलिये? अभी पिछले ही महीने तो आपका वह शिष्य पचास रुपये ले गये था जिसके घर के बाहर आप कार छोड़कर आये हैं।’
सेवक ‘सदाबहार’-अरे, भई छोटे मोटे चंदे तो वही लेता है। बड़ा मामला है इसलिये हम ले रहे हैं। उसने तुमसे जो पचास रुपये लिये थे वह बाल मेले के लिये थे। यह तो हम बाल और वृद्ध आश्रम बनवा रहे हैं उसके लिये है। अभी तो यह पहली किश्त है, बाकी तो बाद में लेते रहेंगे।’
दीपक बापू ने कहा-‘पर जनाब! आपने सर्वशक्तिमान की दरबार बनाने के लिये भी पैसे लिये थे! उनका क्या हुआ?
सदाबहार जी बोले-‘अरे, भई वह तो मूर्ति को लेकर झगड़ा फंसा हुआ है। वह नहीं सुलट रहा। हम पत्थर देवता की मूर्ति लगवाना चाहते थे पर कुछ लोग पानी देवता की मूर्ति लगाने की मांग करने लगे। कुछ लोग हवा देवी की प्रतिमा लगवाने की जिद्द करने लगे।’
दीपक बापू बोले-‘‘तो आप सभी की छोटी छोटी प्रतिमायें लगवा देते।’
सदाबहार जी बोले-कैसी बात करते हो? सर्वशक्तिमान का दरबार कोई किराने की दुकान है जो सब चीजें सजा लो। अरे, भई हमने कहा कि हमने तो पत्थर देवता के नाम से चंदा लिया है पर लोग हैं कि अपनी बात पर अड़े हुए हैं। इसलिये दरबार का पूरा होना तो रहा। सोचा चलो कोई दूसरा काम कर लें।’
दीपक बापू बोले-पर सुना है कि उसके चंदे को लेकर बहुत सारी हेराफेरी हुई है। इसलिये जानबूझकर झगड़ा खड़ा किया गया है। हम तो आपको बहुत ईमानदार मानते हैं पर लोग पता नहीं आप पर भी इल्जाम लगा रहे हैं। हो सकता है कि आपके चेलों ने घोटाला किया हो?
सदाबहार जी एक दम फट पड़े-‘क्या बकवाद करते हो? लगता है कि तुम भी विरोधियों के बहकावे मंें आ गये हो। अगर तुम्हें चंदा न देना हो तो नहीं दो। इस संसार में समाज की सेवा के लिये दान करने वाले बहुत हैं। तुम अपना तो पेट भर लो तब तो दूसरे की सोचो। चलता हूं मैं!’
दीपक बापू बोले-हम आपकी ईमानदारी पर शक कर रहे हैं वह तो आपके चेले चपाटों को लेकर शक था!
सदाबहार जी बोले-ऐ कौड़ी के कवि महाराज! हमें मत चलाओ! हमारे चेले चपाटों में कोई भी ऐसा नहीं है। फिर हमारे विरोधी तो हम पर आरोप लगा रहे हैं और तुम चालाकी से हमारे चेलों पर उंगली उठाकर हमें ही घिस रहे हो! अरे, हमारे चेलों की इतनी हिम्मत नहीं है कि हमारे बिना काम कर जायें।’
दीपक बापू बोले-‘मगर मूर्ति विवाद भी तो उन लोगों ने उठाया है जो आपके चेले हैं। हमने उनकी बातें भी सुनी हैं। इसका मतलब यह है कि वह आपके इशारे पर ही यह विवाद उठा रहे हैं ताकि दरबार के चंदे के घोटाले पर पर्दा बना रहे।’
सर्वशक्तिमान बोले-‘वह तो कुछ नालायक लोग हैं जिनको हमने घोटाले का मौका नहीं दिया वही ऐसे विवाद खड़ा कर रहे हैं। हमसे पूछा चंदे के एक एक पैसे का हिसाब है हमारे पास!
दीपक बापू बोले-‘तो आप उसे सार्वजनिक कर दो। हमें दिखा दो। भई, हम तो चाहते हैंें कि आपकी छबि स्वच्छ रहे। हमें अच्छा नहीं लगता कि आप जो भी कार्यक्रम करते हैं उसमें आप पर घोटाले का आरोप लगता है।
सदाबहार जी उग्र होकर बोले-‘देखो, कवि महाराज! अब हम तो तुम से चंदा मांगकर कर पछताये। भविष्य में तो तुम अपनी शक्ल भी नहीं दिखाना। हम भी देख लेंगे तो मुंह फेर लेंगे। अब तुम निकल लो यहां से! कहां तुम्हारे से बात कर अपना मन खराब किया। वैसे यह बात तुम हमारे किसी चेले से नहीं कहना वरना वह कुछ भी कर सकता है।’
सदाबहार जी चले गये तो दीपक बापू ने अपनी काव्यात्मक पंक्तियां दोहराई।
हमारी कौड़ियों से ही उन्होंने
अपने घर सजाये
मांगा जो हिसाब तो
हमें कौड़ा का बता दिया।
खता बस इतनी थी हमारी कि
हमने सच का बयां किया।’
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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सम्मान का भ्रम-हिन्दी हास्य व्यंग्य (samman ka bhram-hasya vyangya)


दीपक बापू तेजी से अपनी राह चले जा रहे थे कि पान की एक दुकान के पास खड़े आलोचक महाराज ने उनको आवाज देकर पुकारा-‘अरे, ओए फ्लाप कवि कहां जा रहे हो, कहीं सम्मान वम्मान का जुगाड़ करना है क्या?’
दीपक बापू चैंक गये। दायें मुड़कर देखा तो साक्षात आलोचक महाराज खड़े थे। दीपक बापू उनको देखकर उतावली के साथ बोले-‘आलोचक महाराज, आप अपनी घर से इतनी दूर यहां कैसे पधारे? हमारे लिये तो यही सम्मान है कि आपने हमें पुकारा। धन्य भाग हमारे जो इस इलाके की सीमा तक ही आपका पदार्पण तो हुआ। वरना आप जैसा साहित्यक महर्षि कहां इतनी दूर से यहां आयेगा? चलिये हुजूर हमारे घर को भी पवित्र कर दीजिये जो यहां से केवल तीन किलोमीटर दूर है।’
आलोचक महाराज ने पास ही नाली में पहले थूका फिर बोले-‘जब भी करना, घटिया बात ही करना! ऐसे भी साहित्यक महर्षि नहीं है कि तुम्हारे घर तक तीन किलोमीटर पैदल चलें। वैसे हमारी कार देखो उधर खड़ी है, पर अगर तुम्हें अपने घर लेकर चलना हो तो कोई अलग से इंतजाम करो।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज क्या करें, अपनी साइकिल तो घर पर ही छोड़े आये इसलिये यह संभव नहीं है कि कोई दूसरा इंतजार करें। हां, यह बताईये कि आप इधर कैसे आये, कोई सेवा हमारे लायक हो तो जरूर बतायें।’
आलोचक ने फिर दूसरी बार जाकर नाली में थूक और बोले-‘हमेशा लीचड़ बात ही करना! हम कार में बैठने वाले तुम्हारी साइकिल पर बैठकर क्या अपनी भद्द पिटवायेंगे। गनीमत समझो तुमसे बार कर रहे हैं। बहरहाल यह लो पर्चा! एक साहित्य पुस्तक केंद्र का उद्घाटन हैं। वहां जरूर आना। हमने तुम्हारी दो कवितायें एक गांव के अखबार में छपवा दी थी जिसमें अपनी समालोचना भी लिखी थी। लोगों ने हमारी समालोचना की प्रशंसा की। यह कार्यक्रम नये कवियों का परिचय कराने के लिये भी हो रहा है। तुम तो पुराने हो सोचा क्यों न उद्घाटन पर बुलाकर उनके समक्ष प्रस्तुत करें ताकि वह तुमसे कुछ सीखें।’

दीपक बापू शर्माते हुए बोले-‘क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं आप? हमारे अंदर ऐसी क्या येाग्यता है जो हम उस केंद्र का उद्घाटन करें? हम तो ठहरे एक अदना कवि! केवल कवितायें ही लिख पाते हैं। आप जैसे आलोचकों के सामने हमारी क्या बिसात? भले ही आप कहानी या कविता न लिखते हों पर साहित्य महर्षि का खिताब आपको ऐसे ही न मिला होगा। यह सम्मान कोई छोटी बात नहीं है।

अबकी बार आलोचक महाराज थूके बिना ही उनकी तरफ मुखातिब हुए और घूर घूर कर देखने लगे। अपना मुंह उनके मुंह के पास ले गये। फिर अपना हाथ उनके मस्तक पर रखा। दीपक बापू सिहर कर बोले-‘यह क्या आलोचक महाराज?’
आलोचक महाराज बोले-‘हम सोच रहे हैं कि कहीं तुम बुखार में तो घर से बाहर भाग कर नहीं आ गये। आजकल मौसम खराब है न! यह कैसी गलतफहमी पाल ली कि हम तुम्हारे इन नाकाम हाथों से किसी पुस्तक केंद्र का उद्घाटन करायेंगे। हमने तुम्हें उद्घाटन करने वाले मुख्य अतिथि के रूप में नहीं बल्कि वहां आकर कुछ किताबें खरीदो जिनको पढ़कर तुम्हें लिखने के लिये ढंगा आईडिया मिले, इसलिये बुलाया है। नये कवियों को तुम्हारा यह थोबड़ा दिखाकर बतायेंगे कि देखो इनको, ताउम्र कवितायें लिखने का प्रयास किया पर लिख नहीं सके। कभी कभी कामयाब आदमी की कामयाबी के साथ ही नाकाम आदमी की नाकामी से भी नये लोगों को सिखाने का एक अच्छा प्रयास होता है।’

दीपक बापू का चेहरा उतर गया वह बोले-‘ठीक है आलोचक महाराज, हमने कविता लिखने का प्रयास किया पर न लिख सके यह अलग बात है? मगर आपने तो कभी लिखी ही नहीं। बल्कि दूसरे लोगों की कविताओं का आलोचना करते हुए उनके कुछ हिस्सों को अपनी कविता बना डाला। हमारी कवितायें कहीं नहीं छपवायीं बल्कि हर बार टरका दिया। खैर, हमें बुरा नहीं लगा। अब चलता हूं।

आलोचक महाराज ने कहा-’नहीं! अभी रुको! मैंने अपना वक्त तुम्हें रोककर खराब नहीं किया। सुनो, यह कूपन लेकर उस दुकान पर आना। इसके लिये पांच सौ रुपया हमें दे दो। वहां इसके बदले तुम छह सौ रुपये की किताब खरीद सकते हो। वैसे मैं सोच रहा हूं कि तुम्हारी कवितायें अब शहर के अखबारों में भी छपवा दूं। तुमसे बहुत तपस्या करवा ली। लाओ, निकालो पांच सौ रुपये। वहां आकर साढ़ छह सौ रुपये किताबें खरीदना। तुम्हारे लिये पचास रुपये का फायदा करवा देंगें।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज, किताबों का तो मेरे घर पर ढेर लगा हुआ है। एक नयी अलमारी बनवा लूं तभी अब किताबें खरीद पाऊंगा। वैसे भी हम आपके पास अपनी एक किताब छपवाने के लिये पांडुलिपि लाये थे तब आपने इतनी अधिक सामग्री देखकर उसे पढ़ने से मना करते हुए कहा था कि ‘किताबों से पढ़ने योग्य पढ़ा जाये उससे अच्छा है कि उनमें लिखने योग्य कार्य किया जाये।’ आपकी बात चुभ गयी तभी से किताबें खरीदना बंद कर दिया। अब जब उनमें लिखने योग्य कर लेंगे तभी सोचेंगे।’
आलोचक महाराज ने कहा-’ठीक है! अब भूल जाना कि मैं तुम्हारी कविताओं पर आलोचना लिखकर उनको प्रकाशित करवाऊंगा।’
दीपक बापू वहां से जल्दी खिसक लिये यह सोचकर कि कहीं उनको पांच सौ रुपये की चपत न लग जाये। साथ ही उनको अपनी गलतफहमी पर भी हैरानी हो रही थी।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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अय्याशी की चीजों पर वह फ़िदा हो जाते-हिंदी व्यंग्य कविताएँ (khamosh duniya-hindi kavita


निरापद रहने की कोशिश
निष्क्रिय बना देती है
बाहर जलती आग पर
दिल को ठंडा रखने की सोच
घर को राख बना देती है.
खामोशी से जीती जा सकती हैं दुनिया
पर जीतती है वही बांह
जो जंग में हथियार लेती है.
———————-
जिन के पेट भरे हैं
उनके घर भी बहुत बड़े हैं
अय्याशी की चीजों पर वह फ़िदा हो जाते.
भूख का मतलब वह क्या समझें
रोटी को जो पेट तरसे
उनकी निहारती आँखों को अमीर नहीं पढ़ते
बगावत के इन्तजार में उनके पल भी गुजर जाते.
मौके पर टूटे लोग ही
अपने हाथों से जलाकर चिंगारी
अपनी आग को इतिहास की धारा से बुझाते.
ऐ, दौलतमंदों तुम यह क्यों नहीं समझ पाते.

————————————-
बाहर जलती रौशनी देखकर भी
कब तक खुश रहा जा सकता है
अंदर का अंधेरा कभी न कभी
बाहर आकर दर्द देता
खुशियों का बोझ भी कब तक सहा जा सकता है
………………………………
अपनी आवाज बुलंद होने का गुमान
कुछ इस तरह है उनको कि
कहीं मशहूर हम भी न हो जायें
वह अपने लबों सें नाम लेते भी डरते हैं।
हम भी कहां चाहते हैं
रौशनी करने की कीमत
क्योंकि ठहरे वह चिराग जो
अपने तले अंधेरा रखते हैं।


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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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