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आधुनिक लोकतंत्र के सिद्ध-हिन्दी व्यंग्य (adhunik loktantra ke siddh-hindi vyangya


फिलीपीन के राजधानी मनीला में एक बस अपहरण कांड में सात यात्री मारे गये और दुनियां भर के प्रचार माध्यम इस बात से संतुष्ट रहे कि बाकी को बचा लिया गया। इस बस का अपहरण एक निलंबित पुलिस अधिकारी ने किया था जो बाद में मारा गया। पूरा दृश्य देखकर ऐसा लगा कि जैसे तय कर लिया गया था कि दुनियां भर के प्रचार माध्यमों को सनसनी परोसनी है भले ही अंदर बैठे सभी यात्रियों की जान चली जाये जो एक निलंबित पुलिस अधिकारी के हाथ में रखी एक 47 के भय के नीचे सांस ले रहे थे। एक आसान से काम को मुश्किल बनाकर जिस तरह संकट से निपटा गया वह कई तरह के सवाल खड़े करता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ ने कहा था कि ‘लोकतंत्र में क्लर्क राज्य करते हैं।’ यह बात उस समय समझ में नहीं आती जब शैक्षणिक काल में पढ़ाई जाती है। बाद में भी तभी समझ में आती है जब थोड़ा बहुत चिंतन करने की क्षमता हो। वरना तो क्लर्क से आशय केवल फाईलें तैयार करने वाला एक लेखकर्मी ही होता है। उन फाईलों पर हस्ताक्षर करने वाले को अधिकारी कहा जाता है जबकि होता तो वह भी क्लर्क ही है। अगर एडमस्मिथ की बात का रहस्य समझें तो उसका आशय फाईलों से जुड़े हर शख्स से था जो सोचता ही गुलामों की तरह है पर करता राज्य है।
अपहर्ता निलंबित पुलिस अधिकारी ने अपनी नौकरी बहाल करने की मांग की थी। बस में पच्चीस यात्री थे। उसमें से उसने कुछ को उसने रिहा किया तो ड्राइवर उससे आंख बचाकर भाग निकला। उससे दस घंटे तक बातचीत होती रही। नतीजा सिफर रहा और फिर फिर सुरक्षा बलों ने कार्यवाही की। बस मुक्त हुई तो लोगों ने वहां जश्न मनाया। एक लोहे लंगर का ढांचा मुक्त हो गया उस पर जश्न! जो मरे उन पर शोक कौन मनाता है? उनके अपने ही न!
संभव है पुलिस अधिकारी की नाराजगी को देखते हुए कुछ बुद्धिजीवी उसका समर्थन भी करें पर सवाल यहां इससे निपटने का है।
अपहर्ता ने बस पकड़ी तो उससे निपटने का दायित्व पुलिस का था मगर उसकी मांगें मानने का अधिकार तो नागरिक अधिकारियों यानि उच्च क्लर्कों के पास ही था। आखिर उस अपहर्ता से दस घंटे क्या बातचीत होती रही होगी? इस बात को कौन समझ रहा होगा कि एक पूर्व पुलिस अधिकारी के नाते उसमें कितनी हिंसक प्रवृत्तियां होंगी। चालाकी और धोखे से उसका परास्त किया जा सकता था मगर पुलिस के लिये यह संभव नहीं था और जो नागरिक अधिकारी यह कर सकते थे वह झूठा और धोखा देने वाला काम करने से घबड़ाते होंगे।
अगर नागरिक अधिकारी या क्लर्क पहले ही घंटे में उससे एक झूठ मूठ का आदेश पकड़ा देते जिसमें लिखा होता कि ‘तुम्हारी नौकरी बहाल, तुम्हें तो पदोन्नति दी जायेगी। हमने पाया है कि तुम्हें झूठा फंसाया गया है और ऐसा करने वालों को हमने निलंबित कर दिया है। यह लो उनके भी आदेश की प्रति! तुम्हें तो फिलीपीन का सर्वोच्च सम्मान भी दिया जायेगा।’
उसके निंलबन आदेश लिखित में थे इसलिये उसे लिखा हुआ कागज देकर ही भरमाया जा सकता था। जब वह बस छोड़ देता तब अपनी बात से पलटा जा सकता था। यह किसने कहा है कि अपनी प्रजा की रक्षा के लिये राज्य प्रमुख या उसके द्वारा नियुक्त क्लर्क-अजी, पद का नाम कुछ भी हो, सभी जगह हैं तो इसी तरह के लोग-झूठ नहीं बोल सकते। कोई भी अदालत इस तरह का झूठ बोलने पर राज्य को दंडित नहीं  कर सकती। पकड़े गये अपराधी को उल्टे सजा देगी वह अलग विषय है।
हम यह दावा नहीं करते कि अपराधी लिखित में मिलने पर मान जाता पर क्या ऐसा प्रयास किया गया? कम से कम यह बात तो अभी तक जानकारी में नहीं आयी।
किसी भी राज्य प्रमुख और उसके क्लर्क को साम, दाम, दण्ड और भेद नीति से काम करने का प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है। अपनी प्रजा के लिये छल कपट करना तो राष्ट्रभक्ति की श्रेणी में आता है। मगर यह बात समझी नहीं गयी या कुछ होता दिखे इस प्रवृत्ति के तहत दस घंटे तक मामला खींचा गया कहना कठिन है।
बात केवल फिलीपीन की नहीं  पूरी दुनियां की है। सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की है। नीतिगत निर्णय क्लर्क-जिनको हस्ताक्षर करने का अधिकार है उन क्लर्कों को अधिकारी कह कर बुलाया जाता है-लेते हैं। सजायें अदालतें सुनाती हैं। ऐसे में आपात स्थिति में संकट के सीधे सामने खड़ा पुलिस कर्मी दो तरह के संकट में होता है। एक तो यह कि उसके पास सजा देने का हक नहीं है। गलत तरह का लिखित आश्वासन देकर अपराधी को वह फंसा नहीं सकता क्योंकि वह उस पर यकीन नहीं करेगा यह जानते हुए कि कानून में उसके पास कोई अधिकारी नहीं है और बिना मुकदमे के दंड देने पर पुलिस कर्मचारी खुद ही फंस सकता हैै।
ऐसे में आधुनिक लोकतंत्र में क्लर्कों का जलजला है। संकट सामने हैं पर उससे निपटने का उनका सीधा जिम्मा नहीं है। मरेगा तो पुलिस कर्मचारी या अपराधी! इसलिये वह अपनी कुर्सी पर बैठा दर्शक की तरह कुश्ती देख रहा होता है। बात करने वाले क्लर्क भी अपने अधिकार को झूठमूठ भी नहीं छोड़ सकते। वह कानून का हवाला देते हैं ‘हम ऐसा नहीं कर सकते।’
जहां माल मिले वहां कहते हैं कि ‘हम ही सब कर सकते हैं’
पूरी दुनियां में अमेरिका और ब्रिटेन की नकल का लोकतंत्र है। वहां राज्य करने वाले की सीधी कोई जिम्मेदारी नहीं है। यही हाल अर्थव्यवस्था का है। कंपनी नाम का एक दैत्य सभी जगह बन गया है जिसका कोई रंग रूप नहीं है। जो लोग उन्हें चला रहे हैं उन पर कोई प्रत्यक्ष आर्थिक दायित्व नहीं है। यही कारण है कि अनेक जगह कंपनियों के चेयरमेन ही अपनी कंपनी को डुबोकर अपना घर भरते हैं। दुनियां भर के क्लर्क उनसे जेबे भरते हैं पर उनका नाम भी कोई नहीं ले सकता।
ऐसे में आतंकवाद एक व्यापार बन गया है। उससे लड़ने की सीधी जिम्मेदारी लेने वाले विभाग केवल अपराधियों को पकड़ने तक ही अपना काम सीमित रखते हैं। कहीं अपहरण या आतंक की घटना सामने आये तो उन्हें अपने ऊपर बैठे क्लर्कों की तरफ देखना पड़ता है जो केवल कानून की किताब देखते हैं। उससे अलग हटकर वह कोई कागज़ झूठमूठ भी तैयार नहीं कर सकते क्योंकि कौन उन पर सीधे जिम्मेदारी आनी है। जब घटना दुर्घटना में बदल जाये तो फिर डाल देते हैं सुरक्षा बलों पर जिम्मेदारी। जिनको रणनीति बनानी है वह केवल सख्ती से निपटने का दंभ भरते हैं। ऐसे में इन घटनाओं में अपनी नन्हीं सी जान लेकर फंसा आम इंसान भगवान भरोसे होता है।
मनीला की उस अपहृत बस में जब सुरक्षा बल कांच तोड़ रहे थे तब देखने वालों को अंदर बैठे हांगकांग के उन पर्यटकों को लेकर चिंता लगी होगी जो भयाक्रांत थे। ऐसे में सात यात्री मारे गये तो यह शर्मनाक बात थी। सब भी मारे जाते तो भी शायद लोग जश्न मनाते क्योंकि एक अपहृता मरना ही उनके लिए खुशी की बात थी। फिर अंदर बैठे यात्री किसे दिख रहे थे। जो बचे वह चले गये और जो नहीं बचे उनको भी ले जाया गया। आज़ाद बस तो दिख रही है।
अब संभव है क्लर्क लोग उस एतिहासिक बस को कहीं रखकर वहां उसका पर्यटन स्थल बना दें। आजकल जिस तरह संकीर्ण मानसिकता के लोग हैं तुच्छ चीजों में मनोरंजन पाते हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि यकीनन उस स्थल पर भारी भीड़ लगेगी। हर साल वहां मरे यात्रियों की याद में चिराग भी जल सकते हैं। उस स्थल पर नियंत्रण के लिये अलग से क्लर्कों की नियुक्ति भी हो सकती है। कहीं  उस स्थल पर कभी हमला हुआ तो फिर पुलिस आयेगी और कोई एतिहासिक घटना हुई तो उसी स्थान पर एक ही साल में दो दो बरसियां मनेंगी।
आखिरी बात यह कि अर्थशास्त्री एडस्मिथ अमेरिका या ब्रिटेन का यह तो पता नहीं पर इन दोनों  में से किसी एक का जरूर रहा था और उसने इन दोनों की स्थिति देखकर ही ऐसा कहा होगा। अब जब पूरे विश्व में यही व्यवस्था तो कहना ही पड़ता है कि गलत नहीं कहा होगा। आधुनिक लोकतंत्र में क्लर्क ही सिद्ध होते हैं।

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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महंगाई का अर्थशास्त्र-हिन्दी व्यंग्य (black economics-hindi satire article)


किसी भी देश की मुद्रा पर अर्थशास्त्र में अनेक बातें पढ़ने को मिलती हैं पर उसके संख्यांक पर कहीं अधिक पढ़ने को नहीं मिलता अर्थात मुद्रा एक से लेकर एक हजार तक के अंक में छापी जाये या नहीं इस पर अधिक चर्चा नहीं मिलती। हम सीधी बात कहें तो डालर या सौ रुपये से ऊपर हो या नहीं इस पर अर्थशास्त्री अधिक विस्तार से विचार नहीं रखते। वजह शायद यह है कि आधुनिक अर्थशास्त्र की संरचना भी पुरानी है और तब शायद यह मुद्दा अधिक विचार योग्य नहीं था। इसलिये नये संदर्भ ंअब अर्थशास्त्र में जोड़ा जाना आवश्यक लगता है। हम बात कर रहे हैं भारत के सौ रुपये के ऊपर से नोटों की जिनका प्रचलन ऐसी समस्यायें पैदा कर रहा है जिनकी जानकारी शायद अर्थ नियंत्रण कर्ताओं को नहीं है। कभी कभी तो लगता है कि काली अर्थव्यवस्था के स्वामी अपने काला अर्थशास्त्र भी यहां चलाते हैं।
कुछ समय पूर्व योग शिक्षक स्वामी रामदेव ने बड़े अंक वाली मुद्रा छापने का मसला उठाया था पर उसे भारतीय प्रचार माध्यमों ने आगे नहीं बढ़ाया। एक दौ टीवी चैनल ने इस पर चर्चा की तो अकेले बाबा रामदेव के मुकाबले अनेक वक्ता थे जो भारत में पांच सौ और हजार के नोटों के पक्षधर दिखाई दिये क्योंकि वह सभी बड़े शहरों के प्रतिबद्ध तथा पेशेवर विद्वान थे जो संभवत प्रचार माध्यमों द्वारा इसी अवसर के लिये तैयार रखे जाते हैं कि कब कोई बहस हो और उनसे मनमाफिक बात कहलवाई जाये। यही हुआ भी! एक ऐसे ही विद्वान ने कहा कि ‘बड़े अंक की मुद्रा से उसे ढोने में सुविधा होती है और महंगाई बढ़ने के कारण रुपये की कीमत गिर गयी है इसलिये हजार और पांच सौ के नोट छापने जरूरी है।’
हैरानी होती है यह देखकर कि एक बहुत ही महत्व के मुद्दे पर कथित बुद्धिजीवी खामोश हैं-शायद कारों में घूमने, ऐसी में बैठने वाले तथा होटलों में खाना खाने वाले यह लोग नहीं जानते कि छोटे शहरों और गांवों के लिये आज भी हजार और पांच सौ का नोट अप्रासंगिक है। अनेक वस्तुऐं महंगी हुईं है पर कई वस्तुऐं ऐसी हैं जो अभी भी इतनी सस्ती हैं कि पांच सौ और हजार के नोट उससे बहुत बड़े हैं। टीवी, फ्रिज, कार, कंप्यूटर खरीदने में पांच सौ का नोट सुविधाजनक है पर सब्जियां तथा किराने का सामान सीमित मात्रा में खरीदने पर यह नोट बड़ा लगता है। दूसरा यह भी कि जिस अनुपात में आधुनिक सामानों के साथ उपभोक्ता वस्तुओं में मूल्य वृद्धि हुई है उतनी सेवा मूल्यों में नहीं हुई। मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि बहुंत कम होती है तथा लघू तथा ग्रामीण व्यवसायों में भी कोई बजट इतना बड़ा नहीं होता। वहां अभी भी सौ रुपये तक का नोट भी अपनी ताकत से काम चला रहा है तब पांच सौ तथा हजार के नोट छापना एक तरह से अर्थशास्त्र को चुनौती देता लगता है।
साइकिल के दोनों पहियों में हवा आज भी एक रुपये में भरी जाती है तो दुपहिया वाहनों के लिए दो रुपये लगते हैं। बढ़ती महंगाई देखकर यह विचार मन में आता है कि कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को हजार और पांच सौ नोटों के प्रचलन योग्य बनाने का प्रयास तो नहीं हो रहा है। कभी कभी तो लगता है कि जिन लोगों के पास पांच सौ या हजार के नोट बहुत बड़ी मात्रा मैं है वह उसे खपाना चाहते हैं इसलिये बढ़ती महंगाई देखकर खुश हो रहै हैं क्योंकि उसकी जावक के साथ आवक भी उनके यहां बढ़ेगी। दूसरी बात यह भी लगती है कि शायद पांच सौ और हजार नोटों की वजह से पांच तथा दस रुपये के सिक्के और नोट कम बन रहे हैं। इससे आम अर्थव्यवस्था में जीने वाले आदमी के लिये परेशानी हो रही है। आम व्यवस्था इसलिये कहा क्योंकि हजार और पांच सौ नोट उसके समानातंर एक खास अर्थव्यवस्था का प्रतीक हैं इसलिये ही अधिक रकम ढोने के लिये जो तर्क दिया जा रहा है जो केवल अमीरों के लिये ही सुविधाजनक है।
अनेक जगह कटे फटे पुराने नोटों की वजह से विवाद हो जाता है। अनेक बार ऐसे खराब छोटे नोट लोगों के पास आते हैं कि उनका चलना दूभर लगता है। उस दिन एक दुकानदार ने इस लेखक के सामने एक ग्राहक को पांच का पुराना नोट दिया। ग्राहक ने उसे वापस करते हुए कहा कि ‘कोई अच्छा नोट दो।’
दुकानदार ने उसके सामने अपनी दराज से पांच के सारे नोट रख दिये और
कहा कि ‘आप चाहें इनमें से कोई भी चुन लो। मैंने ग्राहकों को देने के लिये सौ नोट कमीशन देकर लिये हैं।’
वह सारे नोट खराब थै। पता नहीं दुकानदार सच कहा रहा था या झूठ पर पांच के वह सभी नोट बाज़ार में प्रचलन योग्य नहीं लगते थे। पुरानी मुद्रा नहीं मुद्रा को प्रचलन से बाहर कर देती है-यह अर्थशास्त्र का नियम है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि नयी मुद्रा पुरानी मुद्रा को प्रचलन में ला देती है पर इसके पीछे तार्किक आधार होना चाहिए। ऐसे पुराने और फटे नोट बाज़ार में प्रचलन में रहना हमारी बैकिंग व्यवस्था के लिये बहुत बड़ी चुनौती है।
हम यहां बड़ी मुद्रा के प्रचलन का विरोध नहीं कर रहे पर अर्थनियंत्रणकर्ताओं को छोटे और बडे नोटों की संरचना के समय अर्थव्यवस्था में गरीब, अमीर और मध्यम वर्ग के अनुपात को देखना चाहिए। वैसे यहां इस बात उल्लेख करना जरूरी है कि जितने भी विकसित और शक्तिशाली राष्ट्र हैं उनकी मुद्रा का अंतिम संख्यांक सौ से अधिक नहीं है। इसलिये जो देश को शक्तिशाली और विकसित बनाना चाहते हैं वह यह भी देखें कि कहंी यह बड़ी मुद्रा असंतुलन पैदा कर कहीं राष्ट्र को कमजोर तो नहीं कर देगी। कहीं हम आधुनिक अर्थशास्त्र को पढ़कर कहीं काला अर्थशास्त्र तो नहीं रचने जा रहे यह देखना देश के बुद्धिमान लोगों का दायित्व है।
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हिंसक तत्वों को हथियार कहां से मिलते हैं-हिन्दी लेख


दंतेवाड़ा छत्तीसगढ़ में सुरक्षा कर्मियों की हत्या परे भारत के लोगों को जितना क्षोभ हुआ है उसका अंदाजा देश के बुद्धिजीवी और संगठित प्रचार माध्यम नहीं लगा पा रहे। कभी कभी तो इस लेखक को लगता है कि अपना दिमाग ही चल गया है या फिर देश के कथित बुद्धिजीवियों और संगठित प्रचार माध्यमों में सक्रिय प्रसिद्ध विशेषज्ञों के पास अक्ल नाम की चीज नहीं है। यह सच है कि समाचार और उनके विश्लेषणों पर विचार करते हुए निष्पक्षता होना चाहिये पर समाज से अपनी प्रतिबद्धताओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। व्यवस्था से असंतोष हो सकता है पर उसके लिये देश पर आए संकट पर निरपेक्ष होकर बैठा नहीं जा सकता-खासतौर से जब आप स्वयं दुनियां का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करते हैं जिसमें किसी भी प्रकार के व्यवस्था के निर्माण या उसकी पुर्नसंरचना में आपकी भूमिका हर हाल में होती है।
हमारे देश के कथित बुद्धिजीवी हमेशा ही बीबीसी और सीएनएन जैसे प्रचार संगठनों की निष्पक्षता का बयान करते हुए नहंी अघाते पर क्या कभी उनको अपने राष्ट्र की प्रतिबद्धताओं से मुंह मोड़ते देखा गया है। जब भी अमेरिका या ब्रिटेन पर कोई आतंकवादी हमला होता है तब यह दोनों चैनल और उनके रेडियो कथित निष्पक्षता छोड़कर अपने देश का मनोबल बनाने में लग जाते हैं।
दंतेवाड़ा में अस्सी से अधिक सुरक्षाकर्मियों की हत्या के मामले पर देश के बुद्धिजीवियों और प्रचार माध्यमों का रवैया चौंकाने वाला है। इतनी बड़ी संख्या में तो चीन, पाकिस्तान और अमेरिका जैसे राष्ट्र मिलकर भारत से लड़ें तो भी मैदानी लड़ाई में इतने सैनिक नहीं मार सकते। जिन्हें भ्रष्टाचार या सामाजिक वैमनस्य के कारण भारत के कमजोर होने का शक है उन्हें यह भी समझ लेना चाहिये कि आज कोई भी देश इन समस्याओं से न मुक्त न होने के कारण इतना सक्षम नहीं है कि भारत को हरा सके इसलिये चूहों की तरह यहां कुतरने के लिये वह अपने गुर्गे भेजते हैं । देशों की सामरिक क्षमता की बड़ी बड़ी बातें करने से यहां कोई लाभ नहीं है। ऐसे में नक्सलीवादियों ने यह कारनामा किया तो उसे सिवाय छद्म युद्ध के अलावा दूसरा क्या माना जा सकता है? इतने सारे सुरक्षा कर्मी मरे वह इस देश के ही थे और उनके परिवारों का क्या होगा? इस पर बताने की आवश्यकता नहीं है।
भारत की एक कथित सामाजिक कार्यकर्ता तथा एक विदेशह पुरस्कार विजेता महिला लेखिका आए दिन इन नक्सलियों के समर्थन में बोलती रहती हैं। इसमें एक कथित सामाजिक कार्यकर्ता का बयान तो बेहद चिढ़ाने वाला था। अब यह लगने लगा है कि भारत के बाहर पुरस्कार प्राप्त करने वाले कलाकार, चित्रकार, लेखक तथा सामाजिक कार्यकर्ता पुरस्कृत इसलिये ही किये जाते हैं ताकि वहां रहकर भारत विरोधी बयान देते रहे हैं। इस पर तुर्रा यह कि यह पुरस्कार विजेता भी यहां अपने आपको विदेशी समझते हुए ऐसा बयान देते हैं जैसे कि उनके लिये यहां विदेश हैं। उस कथित सामाजिक कार्यकर्ता/नेत्री का बयान यह आया कि वह इस नक्सली हमले की वह निंदा करती हैं पर इसके लिये सरकार ग्रीन हंट अभियान जिम्मेदार है।’
इससे ज्यादा क्या शर्मनाक बात हो सकती है कि अपने ही देश के सुरक्षाकर्मियों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने को आप वर्जित बताने लगते हैं। एक दूसरी मुश्किल यह है कि भारत के पं्रसिद्ध प्रचार माध्यम-टीवी, समाचार पत्र पत्रिकाऐं तथा रेडियो-वाले देश के मध्य केंद्र में बैठकर काम करते हैं वह उन क्षेत्रों में नहीं जाते जहां नक्सलवाद फैला है इसलिये उस क्षेत्र में काम करने वाले यह कथित कार्यकर्ता बयान देते हैं उसे ही छाप देते हैं। इन्हीं अखबार वालों पर यकीन करें तो देश के चालीस फीसदी इलाकों में नक्सलवाद का दबदबा है पर संगठित प्रचार माध्यमों को तो बाकी साठ प्रतिशत सुरक्षित इलाके में ही इतनी कमाई हो जाती है कि वह उस जगह जाकर सत्य का उद्घाटन नहीं करते-कभी कभी करते भी हैं तो नक्सलवादियों सूरमाओं को प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में विदेशी पुरस्कार विजेता कथित लेखक, चित्रकार, कलाकार तथा सामाजिक कार्यकर्ता वहां के दौरे कर जो भी कहें वही समाचार पत्रों और टीवी चैनलों की सुर्खियां बन जाता है।
समस्या यह है कि नक्सलवाद के विरोधी भी तो कोई सवाल ढंग का नहीं उठाते। रामायण, में शंबुक वध, सीता की अग्नि परीक्षा, तुलसीदास का एक दोहा तथा वेदों के दो चार श्लोकों में भारतीय संस्कृति में खोट देखने वालों को समर्थक बस सफाई देते रह जाते हैं। नक्सलप्रभावित क्षेत्रों की जातिगत स्थिति का वैसा हाल नहीं हो सकता जैसे कि माओवादियों के समर्थक करते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि वहां भुखमरी, बेरोजगारी और बेबसी का बयान तो सभी नक्सल समर्थक करते हैं पर विरोधी कभी यह नहीं पूछ पाते कि उनके उद्धारकर्ता योद्धाओं के पास लड़ाई का इतना महंगा सामान वहां आता कैसे है? एकदम ढाई सौ सुरक्षाकर्मियों पर हमला करने में जो हथियार इस्तेमाल हुए होंगे वह कोई जंगल में नहीं उगे होंगे। भुखमरी, बेरोजगारी और बेबसी से परेशान लोगों को रोटी नसीब नहीं पर वह हथियार उगा लेते हैं। चलिये वह नहीं करते पर उनके समर्थक कथित वीर भी इतना सारा महंगा असला लाकर गोलियां चलाते हैं पर उनके लिये रोटी का इंतजाम नहंी कर सकते।
संगठित प्रचार माध्यमों में छोटी छोटी खबरों पर यकीन करें तो यह नक्सली हफ्ता वसूली, अपहरण, लूटपाट तथा तस्करी जैसे अपराधों से पैसा बनाते हैं और अपना कार्यक्रम जारी रखने के लिये इस तरह की हिंसा करते हैं। ग्रीन हंट अभियान में सुरक्षा कर्मियां के आने से उनका धंधा बंद हो जायेगाा। इस संबंध में जो निर्दोष आदिवासियों के मरने की बात करते हैं वह सिवाय बकवास के कुछ अन्य नहीं करते हैं। नक्सलियों का ही नहीं पूरे विश्व में आतंकवाद एक व्यापार है भले ही उसके साथ कोई वाद जुड़ा हो। यह वाद जोड़ा इसलिये जाता है कि बुद्धिमान लोगों को बहस में लगाकर मनोरंजन पैदा किया जाये ताकि अपराधियों के कुकर्मों पर किसी की नज़र न जाये।
ऐसे में जो नक्सलवादियों की समस्याओं और अपने कथित समाज को बचाने का समर्थन कर रहे हैं उनकी बकवास पर अधिक समय देना अपनी ऊर्जा बेकार नष्ट करना है। जो राष्ट्रवाद चिंतक, निष्पक्ष प्रेक्षक तथा हम जैसे लेखक विचारधाराओं के आधार पर अगर उनका जवाब देंगे तो उसका कोई लाभ नहीं है। उनसे तो बस यही सवाल करना चाहिये कि ‘यह खतरनाक हथियार, महंगी गाड़ियां और अन्य महंगा सामान उनके कथित योद्धाओं के पास से आया कैसे।
दूसरी बात यह है कि देश के संगठित प्रचार माध्यम यह विचार कर लें कि इस समय ऐसे कथित लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के यह किन्तु परंतु वाले बयान न छापें। हमसे न तो अपने अग्रज बीबीसी और सीएनएन से सीखें जो बिना किसी लाग लपेटे के अपने देश के प्रति समर्पित हो जाते हैं। याद रखें कि वह स्वयं इस देश में रहते हैं और उनकी पीढ़ियां भी यहां रहेंगी। सभी को अमेरिका, ब्रिटेन या कनाडा में रहने के लिये जगह नहीं मिलेगी। अब वह समय आ गया है जब नक्सलसमर्थकों की इन संगठित प्रचार माध्यमों को उपेक्षा शुरु कर देना चाहिये। अगर वह ऐसा नहंीं करते तो उनकी नीयत पर संदेह बढ़ता जायेगा। अपने काम के प्रति ऐसी निष्पक्षता दिखाने से कोई लाभ नहीं है जिसमें देशभक्ति के प्रति निरपेक्षता का भाव झलकता हो।
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‘विषाद’ का प्रतिकार ‘सहजता’ से ही संभव -आलेख


वह एक ब्लाग पर टिप्पणी थी। उसमें कोई ऐसी बात नहीं कही गयी जिस पर बावेला मचायें। टिप्पणीकार की नीयत पर भी कोई संदेह नहीं था। वह भारतीय समाज में एकता के लिये प्रतिबद्ध दिख रहा था इसमें संदेह नहीं है। कभी कभी लगता है कि यह वही ब्लाग लेखक हो सकता है जिसके पाठ से प्रभावित होकर इस लेखक ने लिखना प्रारंभ किया था। अपने ही धर्म के प्रवर्तक के एक अंग्रेजी कार्टून के विरोध में कुछ लोगों ने प्रदर्शन किया था और उसने उसी पर ही ईमानदारी से एक बढ़िया व्यंग्य लिखा था। उसने अपने धर्म के ठेकेदारों पर कटाक्षा किया था। शायद वही ऐसा ब्लागर हो सकता है। दावे से यह कहना कठिन है कि यह वही ब्लाग लेखक है पर उसकी नेकनीयती पर संदेह करना अपने आपको धोखा देना है। उसने एक ब्लाग पर टिप्पणी की थी।
उसकी टिप्पणियों के बाकी अंशों से कोई मतलब नहीं है पर उसके श्रीगीता के प्रति किये गये उद्गार से इस लेखक को असहमति-याद रखें कि विरोध नहीं- थी। उसने दूसरे ब्लाग लेखक के पाठ पर टिप्पणी की थी। उस पाठ में एक धार्मिक पुस्तक को लेकर चर्चा थी। उस पाठ मेंे कुछ कतिपय लोगों द्वारा एक धार्मिक पुस्तक की व्याख्या अपने स्वार्थ से करने की आलोचना थी और उस ब्लाग लेखक ने उसी पर अपनी सदाशयता से टिप्पणी की थी।
उसने अपनी टिप्पणी में दो अन्य धर्मों की पुस्तकों के साथ श्रीगीता का भी उल्लेख करते हुए लिखा था कि यह सभी धार्मिक पुस्तकों इसलिये लिखी गयी क्योंकि उस समय लोगों के पास समय था। इन पुस्तकों का अधिक महत्व नहीं है।
उसकी इस टिप्पणी से लेखक के अधरों पर बरबस ही मुस्कान आ गयी। उस भावुक ब्लागर ने भले ही सदायशता से टिप्पणी की पर कहीं न कहीं उसका अज्ञान श्रीगीता के प्रति साफ दिख रहा था। अगर वह श्रीगीता के अलावा किसी अन्य धर्म ग्रंथ की बात करता तो शायद उसे समझा जा सकता था।
हम यहां धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र की विचारधाराओं से हटकर विचार करें तो लगेगा कि इस देश में लोगों की आदत हो गयी है कि केवल नारों के आधार पर ही बहस और टिप्पणियां करते हैं। वह टिप्पणीकार भी उस बुद्धिजीवी समाज से है जो केवल चर्चा करने के लिये चर्चा करता है। यहां हमें किसी बुद्धिजीवी का समाज देखकर उस पर टिप्पणी नहीं करना क्योंकि श्रीगीता को मानने वाला इंसान अगर समदर्शी नहीं हुआ तो उसका ज्ञान व्यर्थ होगा। हां, श्रीगीता के प्रति उसका जो भाव है वह देश के बुद्धिजीवी समाज का ही प्रतीक है और इस बात को कोई मतलब नहीं है कि उनमें कौन श्रीगीता का मानता है और कौन नहीं।
बाकी धर्मों की पुस्तकों पर यह लेखक टिप्पणी नहीं करता क्योंकि उनको इसने पढ़ा नहीं है पर श्रीगीता के बारे में यह कहना पड़ता है कि लाख सिर पटक लो। पढ़ो या नहीं। पढ़ो तो समझो, नहीं समझो तो अपनी मर्जी के मालिक हो। इस दुनियां में झगड़े चलते रहे हैं और चलते रहेंगे। मगर श्रीगीता में जीवन और सृष्टि के संबंध में जो ज्ञान और विज्ञान का रहस्य उद्घाटित किया गया है वह कभी बदल नहीं सकता। सच बात तो यह है कि श्रीगीता को मानने का दावा करने वाले ही उसके बारे में उतना ही जानते हैं जिससे दूसरे को बता कर अपने ज्ञानी होने का प्रभाव जमा सकें। श्रीगीता की पुस्तक और उसके संदेश आश्रमों के दरवाजे या दीवारों पर प्रकाशित करने से अगर उसके स्वामियों को आ जाता तो वह उनको बनाते ही नहीं। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता के ज्ञान का केवल अपने भक्तों में प्रचार करने की आज्ञा दी है मगर उसे सरेराह सुनाकर कथित धर्म के ठेकेदार इसी बात का प्रमाण देते हैं कि उनके पास केवल संदेश नारों के रूप में है धारण किये हुए ज्ञान की तरह नहीं।
एक मजे की बात दूसरी भी है। अगर अन्य धर्मग्रंथों के साथ श्रीगीता का नाम लेकर हल्की प्रतिकूल बात कहने को लोग यह मान लेते हैं कि चलो उसने हमारी श्रीगीता की अकेले आलोचना नहीं की। ऐसे में दो बातें प्रमाणित होती हैं-
1. लोग श्रीगीता के समर्थक हैं पर उसके ज्ञान से अनजान है इसलिये चुनौती नहीं दे पाते।
2. दूसरा यह कि पूरा समूह ही ऐसा हो गया है कि ‘चलो हमारे थप्पड़ मारा तो क्या हुआ पड़ौसी को भी तो मारा’।
दूसरा कारण पूरे समाज को इंगित कर दिया गया है वरना उस टिप्पणीकर्ता ब्लाग लेखक का ऐसा कोई उद्देश्य नहीं था-यह उसकी सदाशयता को देखकर कही जा सकती है।
विश्व भर में तनाव बढ़ता जा रहा है। विभिन्न धर्मों के नाम पर लिखी गयी बृहद पुस्तकों को पढ़ना सामान्य आदमी के लिये कठिन है इसलिये वह उनके पढ़ने वाले कथित ज्ञानियों के दरवाजे पर हाजिरी लगाता है और वह उसे सर्वशक्तिमान की पहचान और स्वर्ग का पता देने के बहाने अपने हित दो तरह से साधते हैं।
1.अपने लिये दान दक्षिणा जुटाते हैं
2.अपनी छबि सिद्ध की बनाकर लोगों के अपना नाम करना चाहते हैं।
हमारे देश में तो इतनी धार्मिक पुस्तकें हैं कि कोई भी अच्छा खासा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि उसने सब कुछ पढ़ लिया। अब आप कहेंगे कि तब क्या किया जाये?
सारी धार्मिक पुस्तकों का सार श्रीगीता में है। उसे एक बार पढ़ लें तो फिर अन्य ज्ञान की पुस्तकें पढ़ने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। हां, मनोरंजन की पुस्तकें पढ़ सकते हैं, कार्यक्रम देख सकते हैं पर उनमें लिप्त नहीं होना-यही संदेश श्रीगीता से निकलता है।
आखिर बात यह है कि आजकल जब बीमार आदमी डाक्टर के पास जाता है तो वह कहता है कि ‘तुम्हारी बीमारी की जड़ तनाव है!’
बीमार उसके हाथ से लिखा पर्चा हाथ में लेता है तो डाक्टर कहता है कि‘यह दवायें समयानुसार लेना। हा, पर ठीक तब ही हो पाओगे जब तनाव मुक्त रहोगे। ‘टैंशन मत पालो। हमेशा रिलैक्स रहो तभी इजीनैस फील कर पाओगे।’
श्रीगीता का पहला अध्याय ही ‘विषाद योग’ है और फिर सहज योग की स्थापना करते हुए अन्य अध्याय हैं। ‘विषाद’ का प्रतिकार ‘सहजता’ से करने के लिये कोई अन्य धर्मपुस्तक है क्या? अगर है तो क्या वह इतनी छोटी और संक्षिप्त संदेशों से सुसज्जित है जिसे आम आदमी पढ़ सके क्योंकि आजकल लोगों के फुरसत ही कहां है? दूसरी बात यह कि श्रीगीता फुरसत में नहीं लिखी गयी। उसके संदेश इसलिये भी संक्षिप्त हैं क्योंकि उसके कुछ ही देर बाद महाभारत का युद्ध शुरु होने वाला था और भगवान श्रीकृष्ण में ही इतना सामथर््य था जो संक्षिप्त ढंग से प्रभावी बात कह सकें। कोई बात विस्तार से कहकर उसे उलझाने का न तो उनका इरादा हो सकता था न वक्त ही था।
बात से बात निकलती है। उस टिप्पणीकर्ता ब्लाग लेखक की सदाशयता के प्रति कोई संदेह नहीं होते हुए भी इस लेखक द्वारा ऐसा लिखना इसलिये जरूरी लगा क्योंकि आमतौर से ऐसी बातें होती हैं तब लोगों को समझाना ही पड़ता है कि ‘श्रीगीता’ में सारे संसार के सत्य का उद्घाटित करने वाला ज्ञान और विज्ञान है। हो सकता है कि अन्य धर्म ग्रंथों में भी हो पर श्रीगीता में उनका सार भी है। यह आलेख अपनी बात दूसरे पर लादने के लिये नहीं लिखा गया बल्कि अपनी कहने के लिये लिखा गया है और ऐसी हल्की टिप्पणियोें या अन्य प्रतिकूल वक्तव्यों से कभी विचलित होकर उग्र नहीं होना चाहिये श्रीगीता यही संदेश देती है।
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उम्मीद और कगार-व्यंग्य आलेख


‘एक समय भारत और पाकिस्तान कश्मीर समस्या हल करने के कगार पर पहुंच गये- यह वाक्य जब अपने ईमेल पर तरकश की तरह लगे समाचारों में पढ़ें तो यह अपने आपको यह समझाना कठिन हो जाता है कि ब्लाग पढ़ रहे हैं या टीवी देख रहे हैं।

अक्सर टीवी पर सुनते हैं कि भारी तूफान में फंसी नौका के डूबने की उम्मीद है या इस मंदी में औद्योगिक वस्तुओं में मूल्य के साथ ही किस्म में भी गिरावट की उम्मीद है। सच बात तो यह है कि टीवी वाले आशंका और भय शब्द का उपयोग वहां नहीं करते जहां जरूरी है। संभव है उनके लिये भय और आशंका वाले विषय चूंकि सनसनी फैलाने वाले होते हैं और उससे ही उनको प्रतिष्ठा
मिलने की संभावना बलवती होती है इसलिये ही उनको उम्मीद शब्द के उपयोग करने की सूझती है। जब वह आशंका और भय की जगह उम्मीद शब्द का उपयोग करते हैं तो हमारा दिल बैठ जाता है पर इसकी परवाह किसे है।

अगर कोई तूफान में डूबेगी तो ही खबर बनेगी और तभी तो उसका बताने का कोई मतलब होगा।
यही हाल कगार का भी है। कई बार द्वार की जगह वह कगार शब्द का उपयोग करते हैं। हां दरवाजा या द्वार चूंकि हल्के भाव वाले इसलिये शायद वह कगार -जो कि डराने वाले होता है-उसका उपयोग करते हैं। कगार शब्द का उपयोग ऐसे होना चाहिये जहां विषय या वाक्य का आशय पतनोन्मुख होता है। जैसै मुंबई धमाकों के बाद भारत और पाकिस्तान युद्ध के कगार पर पहुंच गये थे। जहां समझौते वाली बात हो वहां ‘निकट’, दरवाजे या द्वारा शब्द ही लगता है। अगर भारत और पाकिस्तान कभी कश्मीर पर समझौते के द्वार-वैसे यह खबर पुरानी है पर अब ईमेल दी गयी है-तक पहुंंचे तो इसमें आश्चर्य नहीं हैं। दोनों कई बार आपसी समझौतों के निकट पहुंचते हैं पर युद्ध के कगार पर लौट आते हैं।

इस आलेख का उद्देश्य किसी की मजाक उड़ाना नहींं है क्योंकि यह लेखक हिंदी का सिद्ध होने का दावा नहीं करता। एक पाठक के में सहजता से पढ़ने में अड़चन आती है तो पूछना और बताना तो पड़ता ही है। हिंदी ब्लाग जगत में अनेक उत्साही लोग हैं और उनकी हिंदी पर संदेह करना स्वयं को धोखा देना होगा पर यह भी सच है कि इस टीवी ने हमारी भाषा को भ्रमित कर दिया है। अगर बचपन से हिंदी न पढ़ी होती तो शायद इसे पचा जाते। अब सोचा कि लोगों का ध्यान इस तरफ आकर्षित करें। अंतर्जाल पर लिखने वाले हिंदी लेखकों का लिखा बहुत लंबे समय तक पढ़ा जाने वाला है। अंतर्जाल पर सक्रिय लोगों को देखें तो बहुत कम ऐसे हैं मिलते हैं जो हमारी तरह सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं और शायद अति उत्साह में उनको इस बात का ध्यान नहीं रहता कि कगार और निकट में अंतर होता है। फिर टीवी पर अक्सर कगार उम्मीद, आशा और आशंका का उपयोग करते हुए उसके भाव का ध्यान नहीं रख पाते। कगार या आशंका हमेशा निराशा का द्योतक होते हैं और उससे हिंदी का श्रोता उसी रूप में लेता है। यह अलग बात है कि पाठकों और श्रोताओं में भी कुछ लोग शायद इस बात को नहीं समझते होंगे। हां, जो हिंदी में बचपन से रचे बसे हैं वह यह देखकर असहज होते हैं और बहुत देर बात उनको समझ में आता है कि लिखने या बोलने वाले का आशय पतनोन्मुख नहीं बल्कि उत्थानोन्मुक था।

हिंदी ब्लाग जगत में कुछ लोग उसके उत्थान के लिये बहुत अच्छे प्रयास कर रहे हैं उनकी प्रशंसा करना चाहिये और हमारी उनको शुभकामनायें है कि वह मातृभाषा को शिखर पर ले जायें पर उसके लिये उनको आशा आशंका और उम्मीद और कगार के भाव को हृदंयगम करना होगा। हालांकि अनेक लोग मात्रा और वाक्यों के निर्माण में भारी त्रुटियां करते हैं पर इस आलेख का आशय उन पर टिप्पणियां करना नहीं है बल्कि शब्दों के भावों के अनुसार उनका उपयोग हो यही संदेश देना है। हालांकि हम इस गलती पर वहां टिप्पणी कर ध्यान दिला सकते थे पर ब्लाग जगत में कोई सिखाने वाली बात कहते हुए यह पता नहीं लगता कि ब्लाग लेखक किस प्रवृति का है दूसरा यह कि ब्लाग पर इस तरह की गलती पहले भी एक दो जगह देखने को मिली है। इसलिये सोचा कि चलो अपने पाठको और मित्रों को सचेत कर दें।
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पसीने से बड़ा है उनका प्रबंध-तीन व्यंग्य कवितायें


प्रबंध का मतलब उनको केवल
इतना ही समझ में आता है।
परिश्रमी के शरीर से निकले
पसीने का अमृत बना दें
अपने मालिक के लिये
बदले में डालें उस पर विष भरी दृष्टि
और मुफ्त में उसके काम पर गरियायें
हालांकि अवसर आने पर
पसीने का उचित दाम का
नारा लगाना भी उनको खूब आता है।
……………………..
इस देश में कुशल प्रबंधक
उसे ही कहा जाता है
जो मालिक की नजर में चढ़ जाता है
दूसरे के पसीने से सींचे हुए फूलों को
जो न्यौछावर कर दे
अपने मालिक के लिये
वही तरक्की की राह पाता है।
पसीने की बूंदों को भले ही
अमृत कहते हों सभी लोग
पर कुशल प्रबंधक वही कहलाता
जो उसमें शोषण का विष मिलाता है।

…………………….
पसीने का मूल्य
पूरी तरह नहीं चुकाओ
तभी कुशल प्रबंधक कहलाओगे
कुचलोगे नहीं जब तक किसी निरीह को
तब तक वीर नहीं कहलाओगे।
जमाने का उसूल है
अच्छा है या बुरा
करता है जीतने वालों को सलाम
पद दिल भी कोई चीज है
अपने ईमान से भटके तो
जीत कर भी पछताओगे।
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‘भ्रष्टाचार’ किसी कहानी का मुख्य विषय क्यों नहीं होता -आलेख


स्वतंत्रता के बाद देश का बौद्धिक वर्ग दो भागों में बंट गया हैं। एक तो वह जो प्रगतिशील है दूसरा वह जो नहीं प्रगतिशील नहीं है। कुछ लोग सांस्कृतिक और धर्मवादियों को भी गैर प्रगतिशील कहते हैं। दोनों प्रकार के लेखक और बुद्धिजीवी आपस में अनेक विषयों पर वाद विवाद करते हैं और देश की हर समस्या पर उनका नजरिया अपनी विचारधारा के अनुसार तय होता है। देश में बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकटों पर पर ढेर सारी कहानियां लिखी जाती हैं पर उनके पैदा करने वाले कारणों पर कोई नहीं लिखता। अर्थशास्त्र के अंतर्गत भारत की मुख्य समस्याओं में ‘धन का असमान वितरण’ और कुप्रबंध भी पढ़ाया जाता है। बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकट कोई समस्या नहीं बल्कि इन दोनों समस्याओं से उपजी बिमारियां हैं। जिसे हम भ्रष्टाचार कहते हैं वह कुप्रबंध का ही पर्यायवाची शब्द है। मगर भ्रष्टाचार पर समाचार होते हैं उन पर कोई कहानी लिखी नहीं जाती। भ्रष्टाचारी को नाटकों और पर्दे पर दिखाया जाता है पर सतही तौर पर।

अनेक बार व्यक्तियों के आचरण और कृतित्व पर दोनों प्रकार के बुद्धिजीवी आपस में बहस करते है। अपनी विचारधाराओं के अनुसार वह समय समय गरीबों और निराश्रितों के मसीहाओं को निर्माण करते हैं। एक मसीहा का निर्माण करता है दूसरा उसके दोष गिनाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सतही बहसें होती हैं पर देश की समस्याओं के मूल में कोई झांककर नहीं देखता। फिल्म,पत्रकारिता,नाटक और समाजसेवा में सक्र्रिय बुद्धिजीवियों तंग दायरों में लिखने और बोलने के आदी हो चुके हैं। लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिसमें स्वयं की चिंतन क्षमता तो किसी मेें विकसित हो ही नहीं सकती और उसमें शिक्षित बुद्धिजीवी अपने कल्पित मसीहाओं की राह पर चलते हुए नारे लगाते और ‘वाद’गढ़ते जाते हैं।

साहित्य,नाटक और फिल्मों की पटकथाओं में भुखमरी और बेरोजगारी का चित्रण कर अनेक लोग सम्मानित हो चुके हैं। विदेशों में भी कई लोग पुरस्कार और सम्मान पाया है। भुखमरी, बेरोजगारी,और गरीबी के विरुद्ध एक अघोषित आंदोलन प्रचार माध्यमों में चलता तो दिखता है पर देश के भ्रष्टाचार पर कहीं कोई सामूहिक प्रहार होता हो यह नजर नहंी आता। आखिर इसका कारण क्या है? किसी कहानी का मुख्य पात्र भ्रष्टाचारी क्यों नहीं हेाता? क्या इसलिये कि लोगों की उससे सहानुभूति नहीं मिलती? भूखे,गरीब और बेरोजगार से नायक बन जाने की कथा लोगों को बहुत अच्छी लगती है मगर सब कुछ होते हुए भी लालच लोभ के कारण अतिरिक्त आय की चाहत में आदमी किस तरह भ्रष्ट हो जाता है इस पर लिखी गयी कहानी या फिल्म से शायद ही कोई प्रभावित हो।
भ्रष्टाचार या कुप्रबंध इस देश को खोखला किये दे रहा है। इस बारे में ढेर सारे समाचार आते हैं पर कोई पात्र इस पर नहीं गढ़ा गया जो प्रसिद्ध हो सके। भ्रष्टाचार पर साहित्य,नाटक या फिल्म में कहानी लिखने का अर्थ है कि थोड़ा अधिक गंभीरता से सोचना और लोग इससे बचना चाहते हैं। सुखांत कहानियों के आदी हो चुके लेखक डरते हैं कोई ऐसी दुखांत कहानी लिखने से जिसमें कोई आदमी सच्चाई से भ्रष्टाचार की तरफ जाता है। फिर भ्रष्टाचार पर कहानियां लिखते हुए कुछ ऐसी सच्चाईयां भी लिखनी पड़ेंगी जिससे उनकी विचारधारा आहत होगी। अभी कुछ दिन पहले एक समाचार में मुंबई की एक ऐसी औरत का जिक्र आया था जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती थी। जब भ्र्रष्टाचार पर लिखेंगे तो ऐसी कई कहानियां आयेंगी जिससे महिलाओं के खल पात्रों का सृजन भी करना पड़ेगा। दोनों विचारधाराओं के लेखक तो महिलाओं के कल्याण का नारा लगाते हैं फिर भला वह ऐसी किसी महिला पात्र पर कहानी कहां से लिखेंगे जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती हो।
फिल्म बनाने वाले भी भला ऐसी कहानियां क्यों विदेश में दिखायेंगे जिसमें देश की बदनामी होती हो। सच है गरीब,भुखमरी और गरीबी दिखाकर तो कर्ज और सम्मान दोनों ही मिल जाते हैं और भ्रष्टाचार को केंदीय पात्र बनाया तो भला कौन सम्मान देगा।
देश में विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने समाज को टुकड़ों में बांटकर देखने का जो क्रम चलाया है वह अभी भी जारी है। देश की अनेक व्यवस्थायें पश्चिम के विचारों पर आधारित हैं और अंग्रेज लेखक जार्ज बर्नाड शा ने कहा था कि ‘दो नंबर का काम किये बिना कोई अमीर नहीं बन सकता।’ ऐसे में अनेक लेखक एक नंबर से लोगों के अमीर होने की कहानियां बनाते हैं और वह सफल हो जाते हैं तब उनके साहित्य की सच्चाई पर प्रश्न तो उठते ही हैं और यह भी लगता है कि लोगा ख्वाबों में जी रहे। अपने आसपास के कटु सत्यों को वह उस समय भुला देते हैं जब वह कहानियां पढ़ते और फिल्म देखते हैं। भ्रष्टाचार कोई सरकारी नहीं बल्कि गैरसरकारी क्षेत्र में भी कम नहीं है-हाल ही में एक कंपनी द्वारा किये घोटाले से यह जाहिर भी हो गया है।

आखिर आदमी क्या स्वेच्छा से ही भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित होता है? सब जानते हैं कि इसके लिये कई कारण हैं। घर में पैसा आ जाये तो कोई नहीं पूछता कि कहां से आया? घर के मुखिया पर हमेशा दबाव डाला जाता है कि वह कहीं से पैसा लाये? ऐसे में सरकारी हो या गैरसरकारी क्षेत्र लोगों के मन में हमेशा अपनी तय आय से अधिक पैसे का लोभ बना रहता है और जहां उसे अवसर मिला वह अपना हाथ बढ़ा देता है। अगर वह कोई चोरी किया गया धन भी घर लाये तो शायद ही कोई सदस्य उसे उसके लिये उलाहना दे। शादी विवाहों के अवसर पर अनेक लोग जिस तरह खर्चा करते हैं उसे देखा जाये तो पता लग जाता है कि किस तरह उनके पास अनाप शनाप पैसा है।
कहने का तात्पर्य है कि हर आदमी पर धनार्जन करने का दबाव है और वह उसे गलत मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। जैसे जैसे निजी क्षेत्र का विस्तार हो रहा है उसमें भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। नकली दूध और घी बनाना भला क्या भ्रष्टाचार नहीं है। अनेक प्रकार का मिलावटी और नकली सामान बाजार में बिकता है और वह भी सामाजिक भ्रष्टाचार का ही एक हिस्सा है। ऐसे में भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर उस पर कितना लिखा जाता है यह भी देखने की बात है? यह देखकर निराशा होती है कि विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने ऐसा कोई मत नहीं बनाया जिसमें भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर लिखा जाये और यही कारण है कि समाज में उसके विरुद्ध कोई वातावरण नहीं बन पाया। इन विचाराधाराओं और समूहों से अलग होकर लिखने वालों का अस्तित्व कोई विस्तार रूप नहीं लेता इसलिये उनके लिखे का प्रभाव भी अधिक नहीं होता। यही कारण है कि भ्रष्टाचार अमरत्व प्राप्त करता दिख रहा है और उससे होने वाली बीमारियों गरीबी,बेरोजगारी और भुखमरी पर कहानियां भी लोकप्रिय हो रही हैं। शेष फिर कभी
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‘एक स्कूटर ब्लागर के ऊपर’-हास्य व्यंग्य


ब्लागर सड़क पर अपने स्कूटर से जा रहा था। सड़क ऊबड़ खाबड़ थी और ब्लागर और स्कूटर दोनों ही हांफते हुए बढ़ रहे थे कि अचानक एक गड्ढा आया और स्कूटर ने झटका खाया और अब वह आधा जमीन पर आधा अपने सवार ब्लागर के ऊपर था।

वह सड़क मुख्य सड़क से दूर थी इसलिये वहां अधिक भीड़ भाड़ नहीं थी। जमीन पर गिरे ब्लागर ने अपने ऊपर से स्कूटर उठाने का प्रयास करने से पहले अपने अंगों का अध्ययन किया तो पाया कि कहीं कोई चोट नहीं थी। अब वह जल्दी जल्दी अपने ऊपर से स्कूटर उठाने का प्रयास करने लगा कि कहीं कोई आदमी उसे गिरा हुआ देख न ले। अपने गिरने के दर्द से अधिक आदमी को इस बात की चिंता सताती है कि कोई उसे संकट में पड़ा देखकर हंसे नहीं।

ब्लागर ने अपने ऊपर से स्कूटर का कुछ भाग हटाया ही था कि उसके कानों में आवाज गूजी-‘क्या यहां रास्तें बैठकर स्कूटर पर कोई कविता या चिंतन लिख रहे हो?’
ब्लागर ने पलटकर देखा तो उसके होश हवास उड़ गये। एक तरह से उसके लिये यह दूसरी दुर्घटना थी। दूसरा ब्लागर खड़ा था। गिरे हुए पहले ब्लागर ने कहा-‘यार, यह गड्ढा सामने आ गया था तो मेरे स्कूटर का संतुलन बिगड़ गया।

दूसरे ब्लागर ने हाथ नचाते हुए कहा-‘स्कूटर का संतुलन बिगड़ा कि तुम्हारा? स्कूटर के पास दिमाग नहीं होता जो उसका संतुलन बिगड़े। तुम्हारे दिमाग का संतुलन बिगड़ा तो ही तुम यहां गिरे। अपना दोष स्कूटर पर मत डालो

पहले ब्लागर ने कहा-‘यार, तुम्हें शर्म नहीं आती। इस हालत में स्कूटर मेरे ऊपर से हटाने की बजाय अपनी कमेंट लगाये जा रहे हो।’

दूसरे ब्लागर ने कहा-‘वैसे तो मेरा काम कमेंट लगाना है तुम्हारे ऊपर से स्कूटर हटाने का नहीं। अब हटा ही देता हूं पर इस बारे में तुम अपने ब्लाग पर लिखना जरूर कि मैंने तुम्हारी मदद की! हां पर कमेंट का आग्रह नहीं करना।’
इस बात पर पहले ब्लागर को गुस्सा आ गया और उसने उसकी सहायता के बिना ही स्कूटर अपने ऊपर से हटा लिया और खड़ा हो गया और बोला-‘तुम्हें तो मजाक ही सूझता है।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘देखो मुझे कभी मजाक करना तो आता ही नहीं वरना मैं तुम्हारी तरह फूहड़ हास्य कवितायें लिखता। बहुत गंभीरता से कह रहा हूं कि तुम स्कूटर चलाना पहले सीख लो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम मुझे स्कूटर सीखने के लिये कह रहे हो। दस वर्ष से यह स्कूटर चला रहा हूं। यह गड्ढा ऐसी जगह हो गया है कि इससे दूर निकलना कठिन था। इसलिये गिर गया, समझे।
दूसरा ब्लागर ने कहा-‘पर यह गड़ढा तो कई दिनों से है और तुम और हम कितनी बार यहां से निकल जाते हैं। वैसे तुम्हारा स्कूटर पुराना है इसलिये गिर गया उसे भी सड़क पर चलते हुए शर्म आती होगी। इतनी नयी और प्यारी गाडि़यां सड़क पर चलती हैं तो इस बूढ़े स्कूटर को शर्म आती ही होगी। कोई नया स्कूटर खरीद लो! क्यों पैसे की बचत कर अपने को कष्ट पहुंचा रहे हो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नया स्कूटर क्या गड्ढे में नहीं गिरेग?’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘तो कोई कार खरीद लो। अरे ,भई अपने आपको दुर्घटना से बचाओ। कहीं अधिक चोट लग गयी तो परेशान हो जाओगे। अच्छा अब मैं चलता हूं। ध्यान से जाना आगे और भी गड्ढे हैं। अभी तो तुम्हारी किस्मत अच्छी थी जो मैं आ गया। और हां इस दुर्घटना पर अगर लिखो तो यह जरूर लिखना कि मैंने आकर तुम्हें बचाया।’
पहले ब्लागर ने गुस्से में पूछा-‘तुमने आकर मुझे बचाया। क्या बकवाद करते हो?’
दूसरे ब्लागर ने कहा-’अगर मैं आकर तुम्हें गुस्सा नहीं दिलवाता तो शायद तुम पूरी ताकत से स्कूटर को नहीं हटा पाते।‘
दूसरा ब्लागर चला गया। पहले ब्लागर ने स्कूटर पर किक लगायी पर वह शुरू नहीं हुआ। तब वह उसे घसीटता हुआ मरम्मत की दुकान तक लाया। वहां उसका परिचित एक डाक्टर भी अपनी मोटर साइकिल की मरम्मत करवा रहा था। ब्लागर को देखते हुए बोला-‘क्या बात है? ऐसे स्कूटर खींचे चले आ रहे हो?’
ब्लागर ने कहा-‘खराब हो गया है।’
डाक्टर ने कहा-’स्कूटर पुराना हो गया। कोई नया खरीद लो।’
ब्लागर ने कहा-‘नया स्कूटर क्या खराब नहीं होगा? तुम्हारी यह दो साल पुरानी मोटर साइकिल भी तो आज खराब हुई। वैसे मैं इसे तुम्हें दूसरी या तीसरी बार बनवाते हुए देख रहा हूं।’
डाक्टर से बातचीत हो ही रही थी कि दूसरा ब्लागर किसी दूसरे के साथ उसके स्कूटर पर बैठ कर वहां से निकल रहा था। उसने जब पहले ब्लागर को वहां देखा तो उसने अपने साथी को वही रुकने के लिये कहा और उसे दूर खड़ाकर वहां आया जहां डाक्टर और पहला ब्लागर खड़े थे। डाक्टर भी उसे जानता था। उसने डाक्टर को देखकर कहा-’सर, आप अपनी गाड़ी बनवा रहे हैं उसमें समय लगेगा। यह मेरा मित्र है स्कूटर समेत एक गड्ढे में गिर गया था। यह घसीटता हुआ स्कूटर यहां तक लाया है। आप जरा इसके अंगों का निरीक्षण करें और देखें कि कहीं कोई गंभीर चोट तो नहीं आयी। यह सड़क पर गिरा हुआ था। स्कूटर इसके ऊपर था। मैंने उसे हटाया और फिर इसे उठाया। वहां से चला गया पर मेरा मन नहीं माना। अपने इस पड़ौसी से अनुरोध कर उसे स्कूटर पर ले आया कि देखूं कहीं कोई बड़ी अंदरूनी चोट तो नहीं है। आप थोड़ा इस दुकान के अंदर जाकर देख लेंे तो मुझे तसल्ली हो जाये।’
डाक्टर हंस पड़ा और बोला-‘तुम अपनी हरकत से बाज नहीं आओगे। यह तुम्हारा नहीं मेरा भी दोस्त है। यहां तुम इसका हालचाल पूछने नहीं आये बल्कि मुझे बताने आये हो कि यह कहीं गिर गये हो। अब तुम जाओ। तुम्हें अब इसकी दुर्घटना की बात हजम हो जायेगी। मुझे पता है कि तुम्हारा हाजमा बहुत खराब है जब तक कोई आंखों देखी घटना या दुर्घटना पांच दस लोग को बताते नहीं हो तब तक पेट में दर्द होता है।’

इतने में दूसरे ब्लागर का स्कूटर वाला साथी वहां आया और उससे बोला-‘भाई साहब, जल्दी चलो। बातें तो होती रहेंगी। मुझे अस्पताल अपनी मां के पास नाश्ता जल्दी लेकर पहुंचारा है। अगर मेरी मां को देखने चलना है तो जल्दी चलो। नहीं तो पीछे से आते रहना।’

दूसरे ब्लागर ने कहा-‘चलो चलते हैं।’फिर वह पहले ब्लागर को दूर लेजाकर बोला-‘डाक्टर साहब को दिखा देना कि कहीं अंदरूनी चोट तो नहीं है। हां, इस घटना पर रिपोर्ट जरूर लिखना ‘एक स्कूटर ब्लागर के ऊपर’।
वह चला गया तो ब्लागर अपने स्कूटर के पास लौटा तो डाक्टर ने उससे पूछा-‘यह तुम्हारा दोस्त कब से बन गया? मैं तो तुम्हें बचपन से जानता हूं इससे कैसे परिचय हुआ?’
ब्लागर ने कहा-‘बस ऐसे ही। मुझे भी याद नहीं कब इससे मुलाकात हुई। आप तो जानते हैं कि मैं एक लेखक हूं लोगों से मिलना होता है। सभी के साथ मिलने का सिलसिला चलता है। यह याद कहां रहता है कि किससे कब मुलाकात हुई?‘
डाक्टर ने कहां-‘ यह तुम्हें जाते जाते क्या कहा रहा था? एक स्कूटर! किसके ऊपर कह रहा था? यह मैं सुन नहीं पाया!’
इसी बीच में मैकनिक ने आकर डाक्टर से कहा-’लीजिये साहब, आपकी मोटर साइकिल बन गयी।’
पहले ब्लागर से विदा ले डाक्टर चला गया। दूसरे मैकनिक ने स्कूटर भी बना दिया था। पहले मैकनिक ने ब्लागर से पूछा‘-स्कूटर किसके ऊपर था? डाक्टर साहब क्या पूछ रहे थे? वह आपके दूसरे साथी क्या कह गये थे?’
ब्लागर आसमान में देखते धीरे धीरे बुदबुदाया-‘एक स्कूटर, ब्लागर के ऊपर!
मैकनिक ने कहा-‘यह ब्लागर कौन?’
पहले ब्लागर ने कहा-‘जो ब्लाग पर लिखता है?’
मैकनिक ने पूछा-‘यह ब्लाग क्या होता है?’
पहले ब्लागर ने कंधा उचकाते हुए कहा-‘मुझे नहीं मालुम?’
इधर दूसरा मैकनिक स्कूटर बनाकर पहले ब्लागर के पास लाया और पहले मैकनिक से बोला-‘तुम्हें नहीं मालुम ब्लाग क्या होता है? अरे, बड़े बड़े हीरो ब्लाग लिख रहे हैं। तू मुझसे कहता है न कि अखबार क्यों पढ़ता है? मैंने अखबार में पढ़ा है अरे, अखबार पढ़ने से नालेज मिलता है। देख तुझे और साहब दोनों का पता नहीं कि ब्लाग क्या होता है? वह जो डाक्टर साहब के पास जो दूसरे सज्जन आये थे और साहब की चैकिंग करने को कह रहे थे वह भी बहुत बड़े ब्लागर हैं। कितनी बार कहता हूं कि तुम भी अखबार पढ़ा करो।’

पहले ब्लागर ने मैकनिक को पैसे दिये और स्कूटर शुरू किया तो पहने मैकनिक ने पूछा-‘यह स्कूटर क्या उन सज्जन के ऊपर था।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नहींं।
वह वहां से चला गया तो पहले मैकनिक ने दूसरे से पूछा-‘अगर यह दूसरे सज्जन ब्लागर थे और स्कूटर उनके ऊपर नहीं था तो फिर यह स्कूटर किसके ऊपर था? घसीटते हुए तो यह सज्जन ले लाये थे तो वह ब्लागर कौन था।’
दूसरे मैकनिक-‘इसका ब्लाग से क्या संबंध?’
दूसरे ने अपना सिर पकड़ लिया और कहा-‘चलो यार, अब अपना काम करें।
………………………….

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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साहब बनने निकलते गुलाम बन जाते-व्यंग्य कविता


साहब जैसी जिंदगी जीने का
सपना लिये निकलते हैं सब
किताबें-दर-किताबें पढ़ते जाते
अपना पसीना बहाते हुए
कागजों के ढेर के ढेर रंगते जाते
फिर नौकरी पाने की कतार में
बड़ी उम्मीद के साथ खडे हो जाते
पता ही नहीं चलता गुलाम बन जाते कब
…………………………………………………

साहब क्या जाने गुलाम का दर्द
उनको मालुम रहते अपने हक
याद नहीं रहते फर्ज
उनका किया सब जायज
क्योंकि एक ढूंढो हजार लोग
गुलामी के लिये मिल जातें
साहब बनने की दौड़ में
भला कितने दौड़ पाते
साहब तो टपकते हैं आकाश से
क्या जानेंगे धरती के गुलामों का दर्द
…………………………..

यह कविता/आलेख ‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टोपी के व्यापार का शुभारंभ-हास्य व्यंग्य


दीपक बापू बाहर जाने के लिये बाहर निकल रहे थे तो बा (गृहस्वामिनी) ने कहा-‘अभी बिजली नहीं आयी है इसलिये सर्वशक्तिमान के दरबार में दर्शन करने जा रहे हो नहीं तो अभी तक कंप्यूटर पर अपनी आखें झौंक रहे थे।’
दीपक बापू ने कहा-‘कैसी बात करती हो। लाईट चली गयी तो चली गयी। मैं तो पहले ही कंप्यूटर को पर्दा गिराने (शट डाउन) का संदेश भेज चुका था। अपने नियम का मैं पक्का हूं। सर्वशक्तिमान की कृपा है कि मैं ब्लाग लिख पा रहे हूं।
बा ने कहा-‘फंदेबाज बताता रहता है कि तुम्हारे हिट होने के लिये वह कई जगह मन्नतें मांगता है। तुम्हारे फ्लाप शो से वह भी दुःखी रहता है।
दीपक बापू ने कहा-‘तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गयी। न वह पढ़ने में न लिखने में। आ जाता है फालतू की बातें करने। हमने कभी अपने फ्लाप रहने की परवाह नहीं की जो वह करता है। जिनके दोस्त ऐसे ही हों वह भला हिट ब्लागर बन भी कैसे सकता है।’

इतने में फंदेबाज ने दरवाजे पर दस्तक दी। दीपक बापू ने कहा-‘और लो नाम शैतान का। अच्छा खासा सर्वतशक्तिमान के दरबार में जा रहा था और यह आ गया मेरा समय खराब करने। साथ में किसी को लाया भी है।’
फंदेबाज उस आदमी को लेकर अंदर आया और बोला-‘दीपक बापू कहीं जा रहे थे क्या? लगता है घर में लाईट नहीं हैं वरना तुम इस तरह जाते नहीं।’
दीपक बापू ने कहा-‘ अब तुम कोई फालतू बात तो करना नहीं क्योंकि हमारे पास समय कम ही है। बताओ कैसे आये? आज हमारा हास्य कविता लिखने का कोई विचार नहीं है।’
फंदेबाज अपने साथ लाये आदमी की तरफ हाथ उठाते हुए बोला-‘ यह मेरा दोस्त टोपीबाज है। इसने कई धंधे किये पर हिट नहीं हो सका। आपको तो परवाह नहीं है कि हिट हैं कि फ्लाप पर हर आदमी फ्लाप होने का दर्द नहीं झेल सकता। इसे किसी तोते वाले ज्योतिषी ने बताया है कि टोपी के धंधे में इसे सफलता मिलेगी। इसलिये इसने झगड़ेबाज की जगह अपना नाम टोपीबाज कर लिया। यह धंधे के हिसाब से अपना नाम बदलता रहता है। यह बिचारा इतने धंधे कर चुका है कि अपना असली नाम तक भूल गया है। अब आप इसके धंधे का शुभारंभ करो। तोते वाले ज्योतिषी ने इसे बताया था कि किसी फ्लाप लेखक से ही उसका शुभारंभ करवाना। लोग उससे सहानुभूति रखते हैं इसलिये तुम्हें लाभ होगा।’

दीपक बापू ने उस टोपीबाज की तरफ दृष्टिपात किया और फिर अपनी टोपी पर दोनों हाथ लगाकर उसे घुमाया और हंसते हुए बोले-‘चलो! यह नेक काम तो हम कर ही देते हैं। वहां से कोई चार छहः टोपी खरीदनी है। इसकी दुकान से पहली टोपी हम खरीद लेंगे। वह भी नगद। वैसे तो हमने पिछली बार छहः टोपी बाजार से उधार खरीदी थी पर वह चुकायी नहीं। जब उस बाजार से निकलते हैं तो उस दुकान वाले रास्ते नहीं निकलते। कहीं उस दुकान वाले की नजर न पड़ जाये। अगर तुम्हारी दुकान वहीं है तो भैया हम फिर हम नहीं चलेंगे क्योंकि उस दुकानदार को देने के लिये हमारे पास पैसा नहीं है। वैसे सर्वशक्तिमान ने चाहा तो इसके यहां से टोपी खरीदी कहीं फलदायी हो गयी तो शायद कोई एकाध ब्लाग हिट हो जाये।
फंदेबाज बोला-‘अरे, तुम समझे नहीं। यह किसी टोपी बेचने की दुकान नहीं खोल रहा बल्कि यह तो ‘इसकी टोपी उसके सिर’ वाली लाईन में जा रहा है। हां, शुभारंभ आपसे करना चाहता है। आप इसे सौ रुपये दीजिये आपको अंतर्जाल का हिट लेखक बना देगा। इसके लिये वह घर पर बैठ कर अंग्रेजी का मंत्र जपेगा अब उसमें इसकी ऊर्जा तो खत्म होगी तो उसके लिये तो कुछ पैसा तो चाहिये न!
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, ऐसे व्यापार करने से तो न करना अच्छा। यह तो धोखा है, हम तो कभी हिट लेखक नहीं बन सकते। कहीं ठगीबाजी में यह पकड़ लिया गया तो हम भी धर जिये जायेंगे कि इसके धंधे का शुभारंभ हमने किया था।
फंदेबाज ने कहा-‘तुम्हें गलतफहमी हो गयी है कि इसे सौ रुपये देकर हिट लेखक बन जाओगे और यह कोई अंग्रेजी का मंत्र वंत्र नहीं जपने वाला। सौ रुपये नहीं यह तो करोड़ों के वारे न्यारे करने वाला है। यह तो आपसे शुरूआत है। इसलिये टोकन में सौ रुपये मांग रहा हूं। ऐसे धंधे में कोई पकड़ा गया है आजतक। मंत्र का जाप तो यह करेगा। कुछ के काम बनेंेगे कुछ के नहीं। जिनके बनेंगे वह इसका गुण गायेंगे और जिनके नहीं बनेंगे वह कौन शिकायत लेकर जायेंगे?’
दीपक बापू ने कहा-‘क्या तुमने हमें बेवकूफ समझ रखा है। ठगी के धंधे का शुभारंभ भी हम करें क्योंकि एक फ्लाप लेखक हैं।’
फंदेबाज ने कहा-‘तुम भी चिंता मत करो। कई जगह तुम्हारे हिट होने के लिये मन्नतें मांगी हैं। जब हिट हो जाओगे तो तुमसे किसी और बड़े धंधे का शुभारंभ करायेंगे।’
दीपक बापू ने आखें तरेर कर पूछा-‘तो क्या लूटपाट के किसी धंधे का शुभारंभ करवायेगा।’
बा ने बीच में दखल दिया और बोली-‘अब दे भी दो इस बिचारे को सौ रुपये। हो सकता है इसका ध्ंाधा चल निकले। कम से कम फंदेबाज की दोस्ती का तो ख्याल करो। हो सकता है अंग्रेजी के मंत्रजाप करने से आप कंप्यूटर पर लिखते हुए हिट हो जाओ।’
दीपक बापू ने सौ का नोट टोपीबाज की तरफ बढ़ा दिया तो वह हाथ जोड़ते हुए बोला-‘आपके लिये तो मैं सचमुच में अंग्रेजी में मंत्र का जाप करूंगा। आप देखना अब कैसे उसकी टोपी उसके सिर और इसकी टोपी उसके सिर पहनाने का काम शुरू करता हूं। घर घर जाकर अपने लिये ग्राहक तलाश करूंगा। कहीं न कहीं कोई समस्या तो होती है। सभी की समस्या सुनकर उनके लिये अंग्रेजी का मंत्र जपने का आश्वासन दूंगा जो अच्छी रकम देंगे उनके लिये वह जपूंगा और जो कम देंगे उनका फुरसत मे ही काम करूंगा।’
बा ने कहा-‘महाराज, आप हमारे इनके लिये तो आप जरूर अंग्रेजी का मंत्र जाप कर लेना। अगर हिट हो गये तो फिर आपकी और भी सेवा कर देंगे। आपका नाम अपने ब्लाग पर भी चापेंगे (छापेंगे)
अपना काम निकलते ही फंदेबाज बोला-‘अच्छा दीपक बापू चलता हूं। आज कोई हास्य कविता का मसाला मिला नहीं। यह दुःखी जीव मिल गया। अपने धंधे के लिये किसी फ्लाप लेखक की तलाश में था। यह पुराना मित्र है मैंने सोचा तुमसे मिलकर इसका काम करा दूं।’
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, इतने करोड़ो के बजट वाला काम शुरू किया है और दो लड्डे भी नहीं ले आये।’
फंदेबाज ने झुककर बापू के मूंह के पास अपना मूंह ले जाकर कहा-‘यह धंधा किस तरह है यह बताया था न! इसमेें लड्डू खाये जाते हैं खिलाये नहीं जाते।’
वह दोनो चले गये तो बा ने दोनों हाथ उठाकर ऊपर की तरफ हाथ जोड़कर कहा-‘चलो इस दान ही समझ लो। हो सकता है उसके अंग्रेजी का मंत्र से हम पर कृपा हो जाये।’
दीपक बापू ने कहा-‘यह दान नहीं है क्योंकि यह सुपात्र को नहीं दिया गया। दूसरा कृपा तो सर्वशक्तिमान ही करते हैं और उन्होंने कभी कमी नहीं की। हम तो उनकी कृपा से ब्लाग लिख रहे हैं उसी से हीं संतुष्ट हैं। फ्लाप और हिट तो एक दृष्टिकोण है। कौन किसको किस दृष्टि से देखता है पता नहीं। फिर अंतर्जाल पर तो जिसका आभास भी नहीं हो सकता उसके लिये क्या किसी से याचना की जाये।’
बा ने पूछा-‘पर यह मंत्र जाप की बात कर रहा था। फिर धंधे की बात कर रहा था समझ में नहीं आया।’
दीपक बापू ने कहा-‘इसलिये तो मैंने उसे सौ रुपये दे दिये कि वह तुम्हारी समझ में आने से पहले निकल ले। क्योंकि अगर तुम्हारे समझ में आ जाता तो तुम देने नहीं देती और बिना लिये वह जाता नहीं। समझ में आने पर तुम फंदेबाज से लड़ बैठतीं और वह पैसा लेकर भी वह अपना अपमान नहीं भूलता। फिर वह आना बंद कर देता तो यह कभी कभार हास्य कविताओं का मसाला दे जाता है उससे भी हाथ धो बैठते। यह तो सौ रुपये का मैंने दंड भुगता है।’
इतने में लाइट आ गयी और बा ने कहा-‘लो आ गयी बिजली! अब बैठ जाओ। फंदेबाज ने कोई मसाला दिया हो तो लिख डालो हास्य कविता।’
दीपक बापू ने कहा-‘अब तो जा रहे सर्वशक्तिमान के दरबार में। आज वह कोई मसाला नहीं दे गया बल्कि हमारी हास्य कविता बना गया जिसे दस को सुनायेगा। अभी तक हमने उसकी टोपी उड़ायी है आज वह उड़ायेगा।
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हिंदी में उर्दू शब्दों के उपयोग पर सावधानी जरूरी-आलेख


हिंदी भाषा में उर्दू के शब्दों का प्रयोग इतना आम है कि लोग हिंदी व उर्दू के शब्दों के अंतर का ध्यान नहीं रखते और एक अपनी बात में दोनों के शब्द इस्तेमाल करते हैं। कमोबेश यही हाल हिंदी के अनेक लेखकों और कवियों का है-जिनमें मैं स्वयं भी शामिल हूं।
जैसे मैं यह कहता हूं कि‘कोई काम शुरू किये बिना उसके परिणाम पर विचार नहीं किया जा सकता है। पहले कोई कार्य प्रारंभ किया तो जाये उससे पहले क्या सोचना।’
अब इनमें उर्दू भी है और हिंदी भी। इसे हम बोली कहते हैं और इसका धड़ल्ले से उपयोग होता है। मेरी शिक्षा हिंदी में हुई है और इसी दौरान संस्कृत भी पढ़ा हूं। इसलिये हिंदी का कोई भी शब्द पढ़ने में कठिनाई नहीं होती पर जब लिखना प्रारंभ किया तो इस बात का ध्यान नहीं रखा कि शब्दों का चयन पूर्णतः हिंदी से किया जाये। इसलिये बोलचाल की भाषा ही लिखने की भाषा बनती गयी। बाद में कभी कभार मैंने इस बात का प्रयास किया कि अधिकतम हिंदी शब्दों का उपयोग किया जाये तो अनुभव हुआ कि उससे मेरा कथ्य प्रभावित होता है। हां, तमाम तरह के विवादों को पढ़कर अक्सर यह सोचता था कि मैं तो कभी ऐसा लिख ही नहीं पाऊंगा।
मेरी जीवन की शुरूआत 2 एक पत्रकार के रूप में ही हुई थी और मैंने एक दिन अपना एक छोटा लेख लिखा और अपने गुरू जी-जो पत्रकार थे और बाद में मैं उनको अपने जीवन का गुरू भी मानने लगा-को दिखाया तो उन्होंने उसे छपने के लिये फोटो कंपोजिंग में ले जाने को कहा। उस समय मैं अपने लेख टाईप भी स्वयं ही करता था। वहां उनसे कनिष्ठ पत्रकार ने मुझे वह लेख दिखाने को कहा। मैंने उसे दिखाया तो उसने मेरे कई शब्दों पर लाल स्याही फेर दी और कहा-‘तुम अपने लेखों में उर्दू शब्दो को शामिल करते हो पर तुम्हें उनके बारे में पता नहीं लिखा कैसे जाता है। कई शब्दों में नुक्ता (नीचे बिंदी) लगती है पर तुमने नहीं लगायी।’

मैं चुपचाप खड़ा रहा क्योंकि उस समय मुझे इतनी समझ भी नहीं थी कि किसी बात का प्रतिवाद कर सकूं-उन लोगों के सामने तो एक तरह से बच्चा ही था। मेरे गुरूजी ने मुझे बुलाया और वह कागज लेकर उसकी लाल स्याही पर अपनी नीली स्याही फेर दी और कहा-‘जाओ, तुम अपना टाईप करो।’
वह महाशय उर्दू पढ़े हुए थे इसलिये उनको उसकी अच्छी जानकारी थी वह उनसे बोले-‘बाबूजी, यह शब्द गलत है।’
हमारे गूरूजी ने कहा-’वह शब्द तो लिख कर बताओ।’
उन्होंने पास ही पड़े कागज पर सभी शब्द लिख कर दिखाये तो हमारे गुरूजी ने कहा-‘इसे तुम अपनी लिपि में लिखो। यह तो देवनागरी में लिखा है।’
उसने कहा-‘तो क्या हुआ।’
हमारे गुरूजी ने कहा-‘यह नुक्ता फारसी में लगता है, पर कई शब्द ऐसे हैं जो हिंदी भाषा में प्रयोग में लाये जाते है उनको इस तरह लिखना ही पड़ेगा। वह बोलचाल में हैं न कि हिंदी साहित्य में इसको पढ़ाया गया है। पर अब लिखे जा रहे हैं तो किसी को रोकने का मतलब है कि उसे स्वाभाविक रूप से लिखने से रोकना।’
उन दोनों में इस विषय पर बहस चलती रही और मैं अंदर जाकर अपना लेखक टाईप करने लगा। उर्दू को अदब की भाषा कहा जाता है और उसमें कई शब्दों में नुक्ता लगता है यह मुझे पता है पर वह शब्द मुझे आसानी से याद नहीं रहते। मुझे याद आ रहा है कि किसी ने मुझसे कहा था कि उर्दू भाषा में जिन शब्दों का वजन अधिक होता है उनमें ही यह नुक्ता लगता है। शायद उसने जज्बात या जजबात, गजब और अजब जैसे शब्द बताये थे। मेरे मन में तब से उर्दू शब्दों को लेकर संशय बना रहता है कि कोई टोक न दे। इसके बावजूद उर्दू के अनेक शब्द उपयोग करने के मामले में चूकता नहीं हूं। अलफाज और लफ्ज जैसे शब्द उपयोग करता हूं पर पता नहीं उनमें नुक्ता कहां आता है।
कई बार दूसरे लोगों से भी मेरी उर्दू भाषा के शब्दों के उपयोग पर बहस हो जाती है। कई लोग ऐसे शब्दों का उपयोग करते हैं जो मुझे लगता है कि वह उर्दू के नहीं हो सकते। जैसे एक ने लफ्ज की लब्ज शब्द उपयोग किया। मुझे लगा कि वह गलत है, पर एक ने कहा वह सही है। कुल मिलाकर उर्दू की हालत भी हिंदी जैसी है। फिर भी हिंदी के किसी शब्द के उपयोग पर संशय होने पर किसी अपने साथी से पूछ सकता हूं पर उर्दू में यह संशय दूर करने के लिये कोई नहीं मिलता। इसके बावजूद हिंदी में कई विद्वानों के आलेख पढ़कर उसमें प्रयोग किये गये कठिन उर्दू शब्दों को ध्यान से पढ़कर अपने मस्तिष्क में रख लेता हूं ताकि अगर कभी उसका उपयोग करूं तो वह गलत न हो। इस कारण उर्दू के अनेक शब्दों का ज्ञान हो गया है। इसलिये आजकल अनेक लोग जिस तरह उर्दू शब्दों का उपयोग कर रहे हैं वह मेरी समझ से परे हैं।
अनेक ब्लाग लेखक अपनी कविताओं और गजलों में उर्दू शब्दों के उपयोग में बिल्कुल सतर्कता नहीं दिखा रहे। मैं जजबात ऐसे लिखता था पर आजकल जज्बात ऐसे लिखता हूं। कई लोगों का ऐसा उपयोग देखा तो लगा शायद यही सही हो। यानि संशय से पूरी तरह मैं भी उबर नहीं पाया। इसके बावजूद मुझे लगता है कि उर्दू के सही शब्द उपयोग करना किसी को नहीं आता। ऐसे में अक्सर सोचता हूं कि जितना हो सके उर्दू शब्द के उपयोग से बचा जाये अच्छा रहेगा।
अनेक ब्लाग लेखक इसे कट्टरतावादी रवैया मान सकते हैं पर मेरा मंतव्य है कि आम पाठक की दृष्टि से ही हमें लिखना चाहिए। मैं जब लिखता हूं तो स्वाभाविक रूप से लिखता हूं और कोई कम अप्रचलित उर्दू शब्द अगर मेरे दिमाग में आता है तो उसे पहले तो लिख लेता हूं पर बाद में संपादन के समय उससे संतुष्ट न होने पर हटा देता हूं यानि अपने अंदर के विचार प्रवाह को अपने मस्तिष्क में अवरुद्ध नहीं होने देता। यह एक निश्चित बात है कि भाषा और बोलियां स्वाभाविक रूप से अपने स्थान बनाती और त्यागती हैं। चंद लेखकों के लिखे से उनका कोई प्रभाव नहीं होता पर ब्लाग लेखकों में कुछ लोग भाषा की शक्ति का समझे बिना अपनी तरफ से अन्य भाषाओं के शब्दों के प्रयोग पर जिस तरह जोर दे रहे है जैसे वह भाषा के लिये कोई बहुत अधिक काम करने जा रहे हैं। उनके इस उद्देश्य में सफलता संदिग्ध हो जाती है।
मेरे से जिस उर्दू के जानकार ने अपने शब्द लेख से हटाने के लिये कहा था वह कहीं उर्दू अखबार से जुड़े थे। उन्होंने बाद में कहा था कि‘तुम अगर कोई हिंदी में गजल लिखोगे तो उसका तर्जूमा मैं उर्दू में छाप सकता हूं पर अगर तुमने उसमें उर्दू शब्द का गलत उपयोग किया होगा तो यह संभव नहीं है। वैसे तुमने ठीकठाक ही इस्तेमाल किया लोग तो इससे भी बुरा करते हैं। लोग अनावश्यक रूप से उर्दू शब्दों का उपयोग कर अपने आपको बहुत ऊंचा समझते हैं पर वह नहीं जानते कि उनकी हंसी उड़ायी जाती है।’
मैंने ब्लाग पर कई बार ऐसे कठिन उर्दू शब्दों का उपयोग देखा है जिनके बारे में मेरा विश्वास है कि वह गलत हैं। ऐसे में वहां कोई टिप्पणी भी नहीं कर सकता। एक तो मैं स्वयं ही अपने अंदर विश्वास नहीं स्थापित करता दूसरा यह कि कोई भी कह सकता है कि यही इस्तेमाल होता है आप गलत हैं।
एक बात तय है कि अगर हम अपनी भाषा संबंधी त्रुटियों पर ध्यान नहीं देंगे तो आगे आने वाली चुनौतियों का सामना नहीं कर पायेंगे। सामने कोई नहीं कहे पर पीठ पीछे कोई भी कह सकता है कि ‘वह तो बचकाना लिखता है’। यह टिप्पणी आपके प्रभावी कथ्य को भी कमतर बना सकती है। ऐसे में हिंदी भाषा में उर्दू शब्दों का उपयोग स्वयं संतुष्ट होने पर ही करें। लिखते समय लिख जायें पर संपादन के समय उस विचार करें। यह साफ कर दूं कि मैं अपने पाठों में उर्दू शब्दों के प्रयोग से रोक नहीं रहा बल्कि उनके गलत लिखने पर ही अपनी बात रख रहा हूं। हालांकि मैं स्वयं भी उर्दू शब्दों का उपयोग करता हूं और उससे मुझे कोई परहेज नहीं है।

पहले आतंकवाद आया कि पर्यावरण प्रदूषण


पहले इस नई दुनिया में पर्यावरण प्रदूषण फैलना शुरू हुआ या आतंकवाद? यह प्रश्न ऐसा ही है कि पहले मुर्गी हुई कि अंडा। कुछ लोगों को शायद यह हास्यास्पद लगेगा पर जो थोडा भी गहराई से चिंतन करेंगे तो यह बात आसानी से समझी जा सकती हैं कि जैसा हम अन्न-जल ग्रहण करते हैं वैसे ही हमारा शरीर होता है और जैसी आबोहवा में रहते हैं वैसी हमारी मानसिक हालत होती है। जब हम किसी ऐसी सड़क से गुजरते हैं जहाँ भारी गंदगी है तो हम नाक पर रुमाल रख लेते हैं और किसी पार्क में होते हैं तो मन में खुशी होती है।

इंडोनेशिया के बाली द्वीप में पर्यावरण में मौसमी बदलाव को लेकर अधिवेशन हो रहा है। इसमें एक रिपोर्ट का जिक्र है जिस्म्के अनुसार धरती के वायुमंडल में कार्बन आक्साइड का स्तर पिछले साढे छः लाख साल के स्तर से कहीं ज्यादा बढ़ चुका है। हम रिपोर्ट पर अधिक विश्लेषण करने की बजाय इस बात पर दृष्टिपात करें कि क्या हम अपने आसपास वायुप्रदूषण से पीड़ित नहीं है? इस मामले में अधिकतर लोग अपने कष्टों का वर्णन करते हुए नहीं थकेंगे। कारखानों द्वारा छोडी जा रही गैसों और पेट्रोल से चालित वाहन जो प्रदूषण फैला रहे हैं वह पहले से कहीं अधिक है और प्रदूषण निरन्तर बढ़ता जा रहा है। सांस की बीमारी से लोगों के ग्रसित लोगों कि संख्या बढ़ती जा रही है। बढ़ी आयु की बीमारियाँ छोटे बच्चों को लग रहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि लोग के मन में मानसिक संताप बढ़ता जा रहा है जिससे जिन बिमारियों को रोगरोग जैसे -मधुमेह, हृदयाघात आदि- कहा जाता था वह अब सामान्य आदमी को भी होने लगी हैं।

जब हम बीमारियों के नाम लेते हैं तो वह बीमारियों का परिणाम हैं न कि समस्या। हवा में कार्बनडाई आक्साइड की मात्रा बढ़ते रहने का अर्थ है कि जब लोग नाक से विष ग्रहण कर रहे हैं-तब वह अपने कर्म, वचन और विचार से समाज में कोई अमृत नहीं बरसायेंगे। श्रीगीता में कहा गया है कि ‘गुण ही गुण को बरतते हैं’-और इस आधार पर हम देखें तो जब लोगों के मन में बुरी वायु जा रही हैं तो वह मन को बुरा बनाएगी और फिर आदमी नकारात्मक रास्ते पर चलेगा। यहाँ मैं बता दूं कि पर्यावरण के प्रदूषित होने का कोई आजकल का मामला नहीं है और बरसों से इस पर बहुत सारे सम्मेलन हो चुके हैं। मैं कई वर्षों से आतंकवाद और पर्यावरण प्रदूषण की खबरें पढता आ रहा हूँ और मुझे याद नहीं आ रहा कि किसी खबर पहले पढी होगी। जब मैं लोगों मैं बढ़ते मानसिक संताप और उनसे पैदा होने वाले रोगों को देखता हूँ तो सोचता हूँ क्या आतंकवादी भी कहीं ऐसे मानसिक रोगों से ग्रसित तो नहीं होते? और क्या विकसित देशों द्वारा परमाणु विस्फोटों तथा उनके अन्य उपक्रमों द्वारा नहीं फैलाया जा रहा है।

मेरा तो सिर्फ मानना है कि आदमी का संचालन उसका मन करता है और उसको वायु तत्व प्रभावित करता है और आतंकवाद की तरह पर्यावरण प्रदूषण भी कम खतरनाक नहीं है शायद कुछ अधिक ही होगा। आतंकवादी तो कहीं भी विस्फोट कर एक समय में अभी तक कुछ हजार लोगों को ही मार पाए है-वह भी दिनों के अंतराल के बाद, पर सांस की बीमारी से रोज कितने लोग मरते हैं या मर-मर कर जीते हैं उसका आंकडा कहीं अधिक है। फिर हम देख रहे हैं कि उसमें कई युवकों को उनमें व्याप्त निराशा और हताशा का लाभ उठाकर उन्हें आतंकवादी बना देते हैं। यह सही है विश्व में बेरोजगारी की वजह से भी ऐसा होता है पर हमने देखा होगा कि यह समस्या भी कोई कम पुरानी नहीं है फिर अचानक ऐसा क्यों हो रहा है। मैं कोई विशेषज्ञ नहीं हूँ पर इतना सब जानते हैं कि हवाओं का असर होता है और उसीके अनुसार आदमी का मन होता है वरना कोई गर्मी के मौसम का उल्लेख करते हुए ठंडी हवा चलते रहने की बात अपने गीत में नहीं करता। वास्तविकता यह है कि इस दुनिया में जितना खतरा आतंकवाद है उतना ही या कहा जाये उससे अधिक पर्यावरण प्रदूषण का है और इससे लडे बिना हम इस दुनिया में शांति नहीं ला सकते (पर्यावरण के प्रदूषण फैलने के वास्तविक कारणों पर कल या अगले अंक में इसी ब्लोग पर)।

जिंदगी के सौदागर


चंद किताबें पढ़कर वह
दुनियाँ को मुट्ठी में करना चाहते हैं
उसमें लिखीं चार लाईनों पर
पूरे जमाने को चलाना चाहते हैं
किसी के दर्द से उनका कोई नही वास्ता
अपने घर से चौराहे तक ही है उनका रास्ता
बनते हैं सबके हमदर्द
अपने खौफ के साए में
प्यार और अमन के लिए
लोगों को नफरत की आग में जलाना चाहते हैं

कितनी भी किताब मशहूर क्यों न हो
उसकी इबारत दुनियाँ का आखरी सत्य नहीं होतीं
पल-पल बदलती इस दुनियाँ में
ढह जाती हैं बड़ी-बड़ी इमारतें
घूमता हुआ धरती का चक्र
उखाड़ देता है सबसे ताकतवर रियासतें
किसी की कोई जीत तभी मशहूर हो पाती है
जब उसकी हारों पर धुल डाल दी जाती है
पर कुछ लोग हैं जो
दूसरों पर उसका इतिहास लादना चाहते हैं

दूसरे से अक्ल उधार लेकर
चलना अपने इंसान होने का
मखौल उडाना ही है
कोई नहीं बांटता मुफ्त में
तकदीर किसी को
भरोसा करो अपनी तब्दीर पर
जिन्दगी के सौदागर तुम्हें
अपनी रोजी-रोटी बनाना चाहते हैं

चाणक्य नीति:बेमौसम राग अलापना हास्यास्पद


1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।

2.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं।
3.मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।जब तक बारिश नहीं आती कोयल नहीं गाती, वह समयानुकूल स्वर निकालती है।

4.पशु-पक्षी समय के अनुसार अपने क्रियाएँ करते हैं और जो मनुष्य समय का ध्यान नहीं रखते वह पसु-पक्षियों से भी गए गुजरे हैं।
5.उसी कवि की शोभा और उपयोगिता होती है जो समयानुकूल होता है। बेमौसम राग अलापना जग हँसाई कराना है।

चाणक्य नीति:अल्पज्ञानी को समझाना कठिन


१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।

२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।

४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंक उस किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता। *लेखक का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।

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