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आय और आयु का सवाल, मचता ही है बवाल-व्यंग्य


उस 21 साल की अभिनेत्री ने एक 24 साल की अभिनेत्री के लिये कह दिया कि ‘वह मेरे जैसी कम उम्र की अभिनेत्रियों के लिये प्रेरणास्त्रोत हैै।’
भला इसमें बवाल मचने जैसे क्या बात है? मगर मचा क्योंकि एक स्+त्री दूसरे के मुकाबले अपने को कम उम्र का बताकर उसके दिल पर घाव दे रही है जो प्रेरणास्त्रोत बताने से भर नहीं जाता। टीवी चैनल वालों ने 24 साल की उस अभिनेत्री को बूढ़ी कहकर प्रचारित करना शुरू किया और फिर उससे प्रतिक्रिया लेने पहुंच गये। कई बार उस अभिनेत्री के लिये बूढ़ी बूढ़ी शब्द सुनकर हमें हैरानी हुई। वजह! इस समय उस बड़ी अभिनेत्री को भारत की सैक्सी अभिनेत्री कहा जाता है-इसका अर्थ हमें स्वयं भी नहीं मालुम- और नयी आयी छोटी अभिनेत्री भी कम प्रसिद्ध नहीं है। पहले दो क्रिकेट सितारों-इस खेल के लिये खिलाड़ी शब्द अब हल्का लगता है-और एक फिल्मी सितारे से उसके रोमांस के चर्चे बहुत हुए हैं। सवाल यह है कि 24 साल और 21 साल की युवती के बीच इस तरह का वार्तालाप वाकई तनाव का कारण हो हो सकता है?
जवाब है हां! कहते है कि आदमी की आय और औरत की आयु पर कभी उससे सवाल नही करना चाहिये। समझदार कहते हैं कि इशारों में एसी बात नहीं करना चाहिये। उससे उनमें गुस्सा उत्पन्न होता है। खैर, उस दिन दो लड़कों के बीच संवाद इस तरह जो दिलचस्प तो था ही साथ ही यह भी जाहिर करता है कि मनुष्य की मानसिकता कुछ ऐसी ही है कि वह कभी कभी किसी दूसरे के बारे में कोई फैसला उसके साथी की उम्र देखकर भी कर लेता है। भले ही वह दूसरा आदमी उमर का छोटा पर जब वह अपने से बड़ी आयु की संगत करता है तो पहला आदमी चाहे तो भी वह अपने मानसिक दृष्टिकोण को बदल नहीं सकता।
पहला लड़का-‘अरे, तेरी मनपसंद हीरोइन की फिल्म आयी है। चलेगा देखने?
दूसरा बोला-‘अरे, यार वह तो अब बूढ़ी लगने लगी है।’
पहला-‘क्या बेवकूफी की बात करता है वह तेरे से केवल पांच साल ही तो बड़ी है। आजकल यह सब चलता है।’
दूसरा बोला-‘नहीं यार, जब तक वह जवान हीरो के साथ उसका अफेयर था तब तब मुझे वह अच्छी लगती थी आजकल वह मेरे पिताजी के बराबर अभिनेता के बराबर से उसके अफेयर की चर्चा है इसलिये मेरा दिमाग बदल गया है।’
पहले वाले को जैसे ज्ञान प्राप्त हो गया और वह बोला-‘यार, बात तो सही कहते हो। मेरे दिमाग में ऐसी ही बात चल रही थी कि आखिर इतनी बड़ी उम्र का हीरो है और वह हीरोइन उसके साथ रोमांस कर रही है।’
कहीं से एक तीसरा लड़का भी आ गया था और बोला-‘उस हीरो को तो अधिक सिगरेट पीने के कारण दिल दौरा भी पड़ चुका है। एक बार मैंने टीवी पर सुना था।’
स्वाभाविक है यह 21 वर्ष की उस हीरोईन के दिमाग के भी बात स्वाभाविक रूप से आती हो क्योंकि 24 वर्ष की बड़ी हीरोईन का जिस हीरो के साथ कथित रूप से रोमांस है वह भी 43 से ऊपर का हो चुका है। ऐसे में उसकी गलती स्वाभाविक लगती है। कई बार टीवी पर होने वाले साक्षात्कारों में उस हीरो चेहरे पर झुर्रियां दिखाई भी दे जाती हैं। वैसे यह प्यार और शादी निजी विषय हैं और इन पर चर्चा करना ठीक नहीं है पर जब आप सार्वजनिक जीवन में और वह भी अपनी देह के सहारे अभिनेता और अभिनेत्रियों हों तो -फिल्मों से कला का कोई लेना देना लगता भी नहीं है-फिर उम्र और चेहरे की चर्चा के साथ दैहिक रिश्तों पर भी आम लोग दृष्टि डालते ही हैं। हीरोइने युवा लोगों के जज्बातों के कारण ही अपना स्थान बनाये हुये हैं पर उनके रोमांस की खबरों जब अधिक आयु वाले हीरो के साथ आती हैं तो लड़कों में भी उनके प्रति आकर्षण कम हो सकता है। वैसे दो तीन लड़कों की बात पर निष्कर्ष निकालना गलत भी लग सकता है।

मर्दों की आय का भी कुछ ऐसा ही मामला है। एक आदमी सरकारी नौकरी में था। उसकी नौकरी में उपरी आय का कोई चक्कर नहीं था। उसके माता पिता ने उसकी शादी होते ही अपना बड़ा मकान बेचकर छोटा मकान इस इरादे लिया कि छोटे बेटे को भी व्यापार करा देंगे। वैसे उसके पिताजी को यह भ्रम था कि बड़ी बहु कहीं मकान पर कब्जा कर हमें बाहर न निकाल दें। बड़े बेटे ने समझाया कि नौकरी कुछ पुरानी होने दो ताकि वेतन बढ़े तो वह भाई के लिये कुछ इंतजाम कर देगा पर वह नहीं माने। बहरहाल नौकरी वाला बेटा किराये के मकान में चला गया। उसकी पत्नी ने उसे ताना भी दिया कि‘देखो तुम्हारे माता पिता ने मेरे माता पिता के साथ धोखा किया।’

बहरहाल माता पिता का छोटा बेटा अपने व्यापार में घाटा उठाता गया तो उन्होंने वह मकान भी बेच दिया और किराये के मकान में आ गये। अब उनके रिश्तेदारी उनसे सवाल करने लगे कि यह क्या हुआ? बड़ा बेटा सामथर््यानुसार उनकी सहायता करता पर छोटे बेटे की नाकामी छिपाने के लिये आपने हाल के लिये वह बड़े बेटे और बहु को जिम्मेदारी बताते। बहु का हाल यह था कि वह अपने सास ससुर के साथ मुश्किल से दो महीने रही होगी पर अब हुआ यह कि वह अपने रिश्तेदारों के पास जाकर बड़े बेटे और बहु का रोना रोते रहते। रिश्तेदार बड़े बेटे को कहते। उसके रिश्तेदार यह समझते थे कि जब वह सरकारी नौकरी मेें है तो उपरी आय भी अच्छी होगी जबकि वह सूखी तनख्वाह में अपना घर चलाता था। रिश्तेदार व्यापारी धनी थे तो उसे कहते कि‘भई तेरी तन्ख्वाह कितनी है। उपरी कमाई तो होगी। अपने मां बाप की मदद किया कर बिचारे परेशान रहते हैं!’

बड़े बेटे को यह अपमानजनक लगता पर वह कर भी क्या सकता था? इधर पिता का देहावसान हुआ। फिर उसने किसी तरह अपने छोटे भाई की शादी भी करवाई पर अपने व्यसनों की वजह से उसकी नयी नवेली पत्नी भी उसको छोड़ गयी। इधर रिश्तेदारों के सवाल जवाब से वह चिढ़ता भी था। आखिर उसने एक दिन आकर एक बुजुर्ग रिश्तेदार को एक पारिवारिक कार्यक्रम में सभी के सामने कह दिया‘ चाचा जी आप में इतनी अक्ल नहीं है कि औरत की आयु और मर्द की आय नहीं पूछना चाहिये। अच्छा बताईये चाचा जी आपकी कुल आय कितनी है और चाची की उमर भी बताईये।’
चाचा के पैरों तले जमीन खिसक गयी। बहुत पैसे वाले थे पर अपनी आय इस तरह सार्वजनिक रूप से बताने का मतलब था कि जमाने भर के लोगों में एक आंकड़ा देना जो चर्चा का विषय बन जाये यानि चारों और डकैतों के यहां अपने घर पर आक्रमण करने का निमंत्रण देना। बड़े बेटे की यह बात सभी ने सुनी तो उसके बाद फिर रिश्तेदारों ने उससे यह सवाल करना बंद कर दिया।

इस तरह विवादों से बचने का सबसे बढि़या उपाय यही है कि किसी मर्द से उसकी आय और औरत से उसकी आयु न तो सीधे पूछना चाहिये न इशारा करना चाहिये। दूसरी बात अपने आप भी सतर्क रहें। कहीं अपनी आर्थिक तंगी और पत्नी की बीमारी की चर्चा न करें वरना इस तरह के सवाल कोई भी पूछ सकता है।
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‘भ्रष्टाचार’ किसी कहानी का मुख्य विषय क्यों नहीं होता -आलेख


स्वतंत्रता के बाद देश का बौद्धिक वर्ग दो भागों में बंट गया हैं। एक तो वह जो प्रगतिशील है दूसरा वह जो नहीं प्रगतिशील नहीं है। कुछ लोग सांस्कृतिक और धर्मवादियों को भी गैर प्रगतिशील कहते हैं। दोनों प्रकार के लेखक और बुद्धिजीवी आपस में अनेक विषयों पर वाद विवाद करते हैं और देश की हर समस्या पर उनका नजरिया अपनी विचारधारा के अनुसार तय होता है। देश में बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकटों पर पर ढेर सारी कहानियां लिखी जाती हैं पर उनके पैदा करने वाले कारणों पर कोई नहीं लिखता। अर्थशास्त्र के अंतर्गत भारत की मुख्य समस्याओं में ‘धन का असमान वितरण’ और कुप्रबंध भी पढ़ाया जाता है। बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकट कोई समस्या नहीं बल्कि इन दोनों समस्याओं से उपजी बिमारियां हैं। जिसे हम भ्रष्टाचार कहते हैं वह कुप्रबंध का ही पर्यायवाची शब्द है। मगर भ्रष्टाचार पर समाचार होते हैं उन पर कोई कहानी लिखी नहीं जाती। भ्रष्टाचारी को नाटकों और पर्दे पर दिखाया जाता है पर सतही तौर पर।

अनेक बार व्यक्तियों के आचरण और कृतित्व पर दोनों प्रकार के बुद्धिजीवी आपस में बहस करते है। अपनी विचारधाराओं के अनुसार वह समय समय गरीबों और निराश्रितों के मसीहाओं को निर्माण करते हैं। एक मसीहा का निर्माण करता है दूसरा उसके दोष गिनाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सतही बहसें होती हैं पर देश की समस्याओं के मूल में कोई झांककर नहीं देखता। फिल्म,पत्रकारिता,नाटक और समाजसेवा में सक्र्रिय बुद्धिजीवियों तंग दायरों में लिखने और बोलने के आदी हो चुके हैं। लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिसमें स्वयं की चिंतन क्षमता तो किसी मेें विकसित हो ही नहीं सकती और उसमें शिक्षित बुद्धिजीवी अपने कल्पित मसीहाओं की राह पर चलते हुए नारे लगाते और ‘वाद’गढ़ते जाते हैं।

साहित्य,नाटक और फिल्मों की पटकथाओं में भुखमरी और बेरोजगारी का चित्रण कर अनेक लोग सम्मानित हो चुके हैं। विदेशों में भी कई लोग पुरस्कार और सम्मान पाया है। भुखमरी, बेरोजगारी,और गरीबी के विरुद्ध एक अघोषित आंदोलन प्रचार माध्यमों में चलता तो दिखता है पर देश के भ्रष्टाचार पर कहीं कोई सामूहिक प्रहार होता हो यह नजर नहंी आता। आखिर इसका कारण क्या है? किसी कहानी का मुख्य पात्र भ्रष्टाचारी क्यों नहीं हेाता? क्या इसलिये कि लोगों की उससे सहानुभूति नहीं मिलती? भूखे,गरीब और बेरोजगार से नायक बन जाने की कथा लोगों को बहुत अच्छी लगती है मगर सब कुछ होते हुए भी लालच लोभ के कारण अतिरिक्त आय की चाहत में आदमी किस तरह भ्रष्ट हो जाता है इस पर लिखी गयी कहानी या फिल्म से शायद ही कोई प्रभावित हो।
भ्रष्टाचार या कुप्रबंध इस देश को खोखला किये दे रहा है। इस बारे में ढेर सारे समाचार आते हैं पर कोई पात्र इस पर नहीं गढ़ा गया जो प्रसिद्ध हो सके। भ्रष्टाचार पर साहित्य,नाटक या फिल्म में कहानी लिखने का अर्थ है कि थोड़ा अधिक गंभीरता से सोचना और लोग इससे बचना चाहते हैं। सुखांत कहानियों के आदी हो चुके लेखक डरते हैं कोई ऐसी दुखांत कहानी लिखने से जिसमें कोई आदमी सच्चाई से भ्रष्टाचार की तरफ जाता है। फिर भ्रष्टाचार पर कहानियां लिखते हुए कुछ ऐसी सच्चाईयां भी लिखनी पड़ेंगी जिससे उनकी विचारधारा आहत होगी। अभी कुछ दिन पहले एक समाचार में मुंबई की एक ऐसी औरत का जिक्र आया था जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती थी। जब भ्र्रष्टाचार पर लिखेंगे तो ऐसी कई कहानियां आयेंगी जिससे महिलाओं के खल पात्रों का सृजन भी करना पड़ेगा। दोनों विचारधाराओं के लेखक तो महिलाओं के कल्याण का नारा लगाते हैं फिर भला वह ऐसी किसी महिला पात्र पर कहानी कहां से लिखेंगे जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती हो।
फिल्म बनाने वाले भी भला ऐसी कहानियां क्यों विदेश में दिखायेंगे जिसमें देश की बदनामी होती हो। सच है गरीब,भुखमरी और गरीबी दिखाकर तो कर्ज और सम्मान दोनों ही मिल जाते हैं और भ्रष्टाचार को केंदीय पात्र बनाया तो भला कौन सम्मान देगा।
देश में विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने समाज को टुकड़ों में बांटकर देखने का जो क्रम चलाया है वह अभी भी जारी है। देश की अनेक व्यवस्थायें पश्चिम के विचारों पर आधारित हैं और अंग्रेज लेखक जार्ज बर्नाड शा ने कहा था कि ‘दो नंबर का काम किये बिना कोई अमीर नहीं बन सकता।’ ऐसे में अनेक लेखक एक नंबर से लोगों के अमीर होने की कहानियां बनाते हैं और वह सफल हो जाते हैं तब उनके साहित्य की सच्चाई पर प्रश्न तो उठते ही हैं और यह भी लगता है कि लोगा ख्वाबों में जी रहे। अपने आसपास के कटु सत्यों को वह उस समय भुला देते हैं जब वह कहानियां पढ़ते और फिल्म देखते हैं। भ्रष्टाचार कोई सरकारी नहीं बल्कि गैरसरकारी क्षेत्र में भी कम नहीं है-हाल ही में एक कंपनी द्वारा किये घोटाले से यह जाहिर भी हो गया है।

आखिर आदमी क्या स्वेच्छा से ही भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित होता है? सब जानते हैं कि इसके लिये कई कारण हैं। घर में पैसा आ जाये तो कोई नहीं पूछता कि कहां से आया? घर के मुखिया पर हमेशा दबाव डाला जाता है कि वह कहीं से पैसा लाये? ऐसे में सरकारी हो या गैरसरकारी क्षेत्र लोगों के मन में हमेशा अपनी तय आय से अधिक पैसे का लोभ बना रहता है और जहां उसे अवसर मिला वह अपना हाथ बढ़ा देता है। अगर वह कोई चोरी किया गया धन भी घर लाये तो शायद ही कोई सदस्य उसे उसके लिये उलाहना दे। शादी विवाहों के अवसर पर अनेक लोग जिस तरह खर्चा करते हैं उसे देखा जाये तो पता लग जाता है कि किस तरह उनके पास अनाप शनाप पैसा है।
कहने का तात्पर्य है कि हर आदमी पर धनार्जन करने का दबाव है और वह उसे गलत मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। जैसे जैसे निजी क्षेत्र का विस्तार हो रहा है उसमें भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। नकली दूध और घी बनाना भला क्या भ्रष्टाचार नहीं है। अनेक प्रकार का मिलावटी और नकली सामान बाजार में बिकता है और वह भी सामाजिक भ्रष्टाचार का ही एक हिस्सा है। ऐसे में भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर उस पर कितना लिखा जाता है यह भी देखने की बात है? यह देखकर निराशा होती है कि विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने ऐसा कोई मत नहीं बनाया जिसमें भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर लिखा जाये और यही कारण है कि समाज में उसके विरुद्ध कोई वातावरण नहीं बन पाया। इन विचाराधाराओं और समूहों से अलग होकर लिखने वालों का अस्तित्व कोई विस्तार रूप नहीं लेता इसलिये उनके लिखे का प्रभाव भी अधिक नहीं होता। यही कारण है कि भ्रष्टाचार अमरत्व प्राप्त करता दिख रहा है और उससे होने वाली बीमारियों गरीबी,बेरोजगारी और भुखमरी पर कहानियां भी लोकप्रिय हो रही हैं। शेष फिर कभी
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महादानव क्या ब्रह्माण्ड का रहस्य जानेगा-व्यंग्य आलेख


महामशीन का महाप्रयोग हो गया। कुछ समय तक उसे महादानव कहकर भी प्रचारित कर प्रचार माध्यमों ने आम लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। संभवतः लोगों का ध्यान नहीं जा रहा था इसलिये उसका नकारात्मक प्रचार कर पश्चिम के वैज्ञानिकों ने उस महामशीन का नाम प्रतिष्ठित किया। आजकल यह भी एक तरीका हो गया है कि नाम करने के लिये बदनाम होने को भी कुछ लोग तैयार हो जाते हैं। कहते हैं कि ‘बदनाम हुए तो क्या नाम तो है‘। शायद इसी तर्ज पर तमाम तरह की बातें की गयीं।

भारतीय संचार माध्यमों को भी अपने लिये चार दिन तक खूब सक्रियता दिखाकर अपने ग्राहकों को संतुष्ट करने का सुंदर अवसर मिला। विज्ञान की फतह-हां, यही शब्द प्रयोग किया है प्रचार माध्यमों ने उस सफल प्रयोग के लिये। पहले महादानव अब महादूत बन गया लगता है। आजकल यह भी एक तरीका हो गया है कि पहले किसी को दानव बनाओ फिर देवदूत। इससे किसी विषय को लंबा खींचने का अवसर तो मिलता ही है उससे वह व्यक्ति भी संतुष्ट हो जाता है जिससे बदनाम किया गया पर ऐक बेजान मशीन को जिस तरह प्रचारित किया गया उसे प्रचार के बाजार में सक्रिय लोगों की तारीफ करने का मन करता है।

अब बात करें उस महादानव या महामशीन की जिसे आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी गयी है। वह ब्रह्माण्ड की उत्पति के रहस्य को जानना चाहते हैं। आश्चर्य है कि जो विषय विज्ञान की परिधि से कोसों दूर है वह उस पर काम कर रहे हैं। दुनियां की कोई शय उस रहस्य को नहीं देख सकती। जीवन से पहले और मृत्यु के बाद के रहस्य विज्ञान की शक्ति से बाहर हैं। उन्हें वही ज्ञानी जान सकता है जिसने अपनी इस देह से तपस्या की हो। यह काम हमारे ऋषि और मुनि कर चुके हैं। उन्होंेने इस ब्रह्माण्ड की उत्पति का रहस्य पहले ही बता दिया है।

उसकी संक्षिप्त कहानी इस तरह है कि सत्य बरसों तक ऐसे ही पड़ा हुआ था। उसे इतना समय व्यतीत हो गया कि वह स्वयं को असत्य समझने लगा तब वह प्रयोग करने निकला। पांच तत्व (प्रथ्वी,आकाश.जल.आकाश.और वायु) कणों के रूप में-जिन्हें आधुनिक भाषा में अणु भी कह सकते हैं-उसके समक्ष पड़े हुए थे। वह उनमें दाखिल हो गया तो उस देखने, सुनने सूंघने, और स्पर्श करने का अवसर मिला। वह इन तत्वों से निकल आया पर उसके अंश इसमें छूट गये और वह पांचों तत्व बृहद रूप लेते गये। उनके आपसी संपर्क से ब्रहमाण्ड का सृजन हुआ। यह कथा व्यापक है और इस पर चर्चा आगे भी की जा सकती है।

हमारे देश के ज्ञानी महापुरुषों ने पहले ही इसे जान लिया है। अब विज्ञान की बात करे लें। विज्ञान केवल भौतिक पदार्थों तक ही कार्य कर सकता है। उन्होंने इस महाप्रयोग में जिन भी चीजों का उपयोग किया वह कहीं न कहीं इसी धरती पर मौजूद हैं। यानि पांच तत्वों में एक तत्व। फिर जल, वायु और अग्नि का भी उन्होंने उपयोग किया होगा। चलो यह भी मान लिया। उन्होंनें आकाशीय तत्व के रूप में गैसों का भी प्रयोग किया होगा। हां, इसके बिना सब संभव नहीं है। मगर वह सत्य का तत्व जो निर्गुण, निराकार, और अदृश्य है उसका उपयोग वह नहीं कर सकते थे। उसे कोई छू नहीं सकता, उसे कोई देख नहीं सकता और जिसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है उस सत्य तत्व का प्रयोग केवल कोई तपस्वी ही कर सकता है। उस सत्य तत्व की केवल अनुभूति की जा सकती है और उसके लिये ध्यान और योग की प्रक्रिया है। जो इन प्रक्रियाओं से गुजरते हैं वही उसकी अनुभूति कर पाते हैं।

भारतीय अध्यात्म का ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति इस सत्य का जानता है फिर यह कौनसे ब्रह्माण्ड का रहस्य जानने का प्रयास कर रहे है। यह अलग बात है कि अंग्रेजी की शिक्षा पद्धति ने लोगों को अपना अध्यात्मक भुला दिया है पर फिर भी कुछ लोग हैं जो इस सत्य का धारण किये रहते हैं। आधुनिक विज्ञान मंगल और बृहस्पति तक पहुंच गया है। हो सकता है वह सूर्य तक भी पहुंच जाये। वह ब्रह्माण्ड के अंतिम सिरे तक पहुंच जाये पर वह सत्य उसे नहीं दिखाई देगा। भारतीय अध्यात्म ज्ञान के साथ ही विज्ञान का भी पोषक है। श्रीमद्भागवत गीता में विज्ञान का महत्व प्रतिपादित किया गया है। क्योंकि धर्म की रक्षा के लिये अस्त्रों और शस्त्रों का प्रयोग अवश्यंभावी होता है इसलिये विज्ञान का विरोध करना तो मूर्खता है पर उसकी सीमाऐं हैं यह सत्य भी स्वीकार करना चाहिए।
हमारे देश ने एक समय योग साधना और ध्यान को नकार दिया था। पश्चिम से आयातित इलाज को ही प्राथमिकता दी जाने लगी। अब यह रहस्य तो सभी जगह उजागर है कि आधुनिक चिकित्सा के पास रोग को रोकने की क्षमता है पर मिटाने की नहीं। इसलिये अब डाक्टर ही अपने मरीजों को योगसाधना करने का मशविरा देते हैं। यानि भारतीय ज्ञान की अपनी महिमा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। पश्चिम विज्ञान ने आत्मा का वजन 21 ग्राम बताया है जबकि उसका तो कोई वजन है ही नहीं। आदमी मर जाता है तो उसका इतना वजन इसलिये कम हो जाता है क्योंकि कुछ हवा पानी म्ृत्यु के समय निकल जाता है। भारतीय और पश्चिम के विज्ञान बारंबार कहते हैं कि उनको ं ब्रह्माण्ड का रहस्य जानना है मगर पांच तत्वों के मेल से बने इस ब्रह्माण्ड को जानने के लिये क्या वैज्ञानिकों से किसी छठे तत्व को भी अपने प्रयोग को शामिल किया था। अरे, भई वह छठा तत्व किसी की पकड़ में नहीं आ सकता।

दुनियां का सबसे बड़ा प्रयोग-यही नाम उसे दे रहे हैं। लगता है कि वैज्ञानिकों के पास कोई काम नहीं बचा है। हमारे हिसाब से वैज्ञानिकों के पास एक काम है जिस पर वह नाकाम हो रहे हैं। वह यह कि बिना तेल के कार,स्कूटर,वायुयान और घर की बिजली जल सके इस पर उनको काम करना चाहिये। परमाणु ऊर्जा के उपयोग से जो पर्यावरण प्रदूषण होता है उसकी तरफ अनेक वैज्ञानिक इशारा करते हैं। अगर वैज्ञानिको को करना ही है तो ऐसे यंत्र बनाये जो कि सूर्य से इस धरती पर आने वाली ऊर्जा का संयच तीव्र गति से कर सकें और बिना तेल और लकड़ी के लोगों का खाना बन सके। अभी तक तो धरती पर मौजूद तेल,गैस और अन्य रसायनों के भंडारों से ही सारा संसार चल रहा है। मतलब यह कि अभी धरती पर ही विजय नहीं पायी और आकाश में ब्रह्माण्ड का रहस्य जानने चले हैं। अनेक लोग बिचारे रोज अखबार और टीवी इसलिये ही खोलकर देखते हैं कि कहीं कोई ऐसी चीज बनी गयी क्या जिससे बिना तेल और बिजली के उनका काम चल सके। स्कूटर चलाने के लिये अभी भी पैट्रोल पंप पर जाना पड़ता है और गैस के लिये फोन करना पड़ता हैं। कंप्यूटर चलाने के लिये लाईट खोलना पड़ती है। यह सब सौर ऊर्जा से हो जाये तो फिर माने कि विश्व के वैज्ञानिकों ने तरक्की की है।

जहां तक इन पश्चिमी वैज्ञानिकों की बात है वह अनेक तरह के अविष्कारों से नये नये साधन बना चुके हैं पर ऊर्जा के मामले में फैल हैं। परमाणु ऊर्जा का नाम बहुत है पर उसे केवल बम की वजह से जाना जाता है जो अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासकी पर गिराये थे। अगर उससे कुछ बिजली बनी भी है तो वह कोई समस्या का हल नहीं हैं। बात तो तब मानी जाये जैसे स्कूटर हर कोई आदमी चला लेता है वैसे ही उसके पास ऐसे साधन भी हों कि वह घर बैठे ही सूर्या से ऊर्जा एकत्रित कर उसे चला सके। कहीं ऐसा तो नहीं पश्चिम के वैज्ञानिक केवल उसी स्तर तक काम करते हों जहां तक आम आदमी सुविधाओं का दास बने और स्वतंत्र रूप से विचरण न कर सकें। इस महाप्रयोग का प्रचार कितना भी हो पर वह छठा तत्व-जिसे वैज्ञानिक जानने का प्रयास ही नहीं कर रहे-विज्ञान के कार्य करने की परिधि से बाहर है, यह बात तय है।
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25 हजार पाठकों की संख्या पार कर चुका यह ब्लाग-संपादकीय


आज मेरा यह ब्लाग/पत्रिका पच्चीस हजार की पाठक संख्या पार कर गया। यह दूसरा ब्लाग/पत्रिका है जो इस संख्या के पार पहुंचा है। शायद कुछ लोगों को यह अजीब लगता होगा कि मैं अपने किसी पाठ की पाठक संख्या एक हजार पार होने पर लिखता हूं तो कभी किसी ब्लाग के दस हजार पार होने की बात कर समय नष्ट करता हूं। यह लोगों को शायद आत्मप्रवंचना
भी लग सकती है, पर चाणक्य का कथन है कि कभी कभी अपने गुणों को प्रकट करने का उद्यम भी करना चाहिए।

वैसे मेरे शायद बीस ब्लाग/पत्रिकाएं होंगी पर मैं 12 उन ब्लाग को ही आधिकारिक मानता हूं जिनके पंजीकरण के लिये मैंने हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने के लिये फोरमों को स्वयंं ईमेल किये। मेरे अन्य ब्लाग/पत्रिकाओं को भी कुछ फोरम अपने यहां दिखा रहे हैं पर मैं उन पर कभी नयी पोस्ट नहीं रखता। यह अलग बात है कि शीर्षक बदलकर रखे गये पाठों पर वहां भी पाठक आते है।

इस ब्लाग के पच्चीस हजार पाठक संख्या पार करने पर मुझे प्रसन्नता हुई है-यह मेरे एक अति सामान्य लेखक होने का प्रमाण है। तकनीकी रूप से मुझे ब्लाग का कोई ज्ञान नहीं था। जब यह ब्लाग बनाये तब पता भी नहीं था कि इसे ब्लाग कहते हैं। मैंने तो इसे अपनी पत्रिका की तरह उपयोग करने का विचार किया। कुल मिलाकर आज के स्वरूप की कल्पना तक मैंने नहीं की। जो सीखा यहीं अपने ब्लाग लेखक मित्रों से ही सीखा। तकनीकी रूप से ब्लाग लेखकों की बातें कभी समझ में नहीं आयी पर सीखने में हुई गलतियों से ही मैं सीखा। इसका एक उदाहरण हाल ही का है। श्री अनुनाद सिंह ने कृतिदेव को यूनिकोड में बदलने वाला टूल अपने ब्लाग पर दिखाया। मैं उसे हड़बड़ी में 28 मार्च को उठाकर लाया और जब वह सफल रहा तो एक पोस्ट लिख डाली। वहां यूनिकोड से कृतिदेव को बदलने वाले टूल पर दृष्टि ही नहीं गयी। कुछ दिन से पत्र पत्रिकाओं से आग्रह आते हैं कि आप कुछ लिखकर कर दो। मैं सोचता था कि यूनिकोड में पड़ी रचनाओं में बहुत सारा फेरबदल कर ही पत्र-पत्रिकाओं में इनका प्रकाशन सही हो पायेगा, पर करना आता नहीं था क्योंकि अगर मैं उनको अपने विंडो पर लाता तो वहां शब्द कूड़ा दिखाई देते थे। संयोगवश एक मित्र को काम करने के लिये उसके कंप्यूटर पर कृतिदेव से यूनिकोड में बदलने वाला टूल स्थापित करना चाहता था पर जब मैं उसे लोड करता तो यूनिकोड से कृतिदेव में बदलने वाले टूल को लोड करता। वह तो वैसे काम नहीं कर सकता था। वहां से निराश घर आकर भी वही गलती करता रहा था। मैने श्री अनुनाद सिंह को ईमेल किया। फिर दोबारा उनके ब्लाग में गया और ध्यान से देखा तो पाया कि यह तो वह यूनिकोड से कृतिदेव में बदलने वाला टूल है जिसकी मुझे बहुत जरूरत है। तब मैंने अपने यहां उसको स्थापित कर ब्लाग से एक पाठ उठाकर वहां आजमाया। वहां से अपने विंडो पर जाकर पेस्ट किया तो पता लगा कि पूरी सामग्री कृतिदेव में आ गयी थी और मैं उसमें अब संशोधन कर सकता था। यह अभी तीन दिल पहले की बात है। अपनी मूर्खता पर मैं हंस भी नहीं सकता था। मैंने तत्काल श्री अनुनाद सिंह को इसकी जानकारी दी ताकि वह परेशान न हों।

इधर लोग शिकायत कर रहे हैं कि बहुत लंबी पोस्ट लिख रहे हो, पर इसमें मैं कुछ नहींं कर सकता क्योंकि अपनी पूरी बात कहे बिना मुझे अपना आलेख समाप्त करना ठीक नहीं लगता। फिर मैं तो अपने शीर्षक में ही लिख देता हूं कि वह आलेख है या कविता। आलेख का मतलब मेरे लिये होंगे कम से कम 1200 शब्द! मैंने सवा साल तक अपने मौलिक स्वरूप के विपरीत लिखा पर अब सहज भाव से लिखता हूं। इसलिये बाद में भी उसमें जोड़ता हूं जबकि पहले रोमन लिपि में यूनिकोड में हिंदी टाईप में ऐसा करने की सोचता भी नहीं थां
इसी ब्लाग के संबंध में एक और रोचक बात है। हुआ यूं कि एक ब्लाग ने एक वेबसाइट का उल्लेख अपने पाठ में किया जिसमें सभी ब्लाग के रेट का आंकलन किया जा सकता है-वहां ऐसा कोई साफ्टवेयर था। मैंने उसमें अपने सभी ब्लाग का मूल्य आंका। यह मेरा सबसे महंगा ब्लाग था हालांकि अन्य ब्लाग लेखको के ब्लाग के मुकाबले इसकी कीमत कम थी। इस पर एक पाठ लिखते हुए मैंने अपने सभी ब्लाग की कीमत उल्लेख की जो कुल योग में उस समय अनेक महंगे ब्लाग से अधिक थी। मेरे एक मित्र ने अपनी टिप्पणी में मुझसे कहा कि यह एक साफ्टवेयर है जिसका कोई अधिक महत्व नहीं है क्योंकि श्रेष्ठता के पैमाने तो और भी बहुत हैं। फिर यह साफ्टवेयर किस प्रकार तैयार किया गया है यह भी पता नहीं है पर हां, इससे हम यह तो देख सकते हैं कि हमारे ब्लाग की स्थिति क्या है?’
अपने मित्र की आखिरी पंक्तियां मुझे बहुत ज्ञानवद्र्धक लगी। तब मैंने सोचा कि यह अगर मेरा महंगा ब्लाग है तो क्यों न इसी पर अधिक काम किया जाये। इसके बाद शब्द पत्रिका का नंबर आता था तब मैंने इन दोनों ब्लाग पर अधिक लिखने का विचार किया। यही कारण है कि यह दोनो ब्लाग पिछले चार महीने में मेरे मुख्य ब्लाग दीपक बापू कहिन से आगे निकल गये हैं। दीपक बापू कहिन भी अभी इस दौड़ मैं है पर अभी उसे पच्चीस हजार का आंकड़ा पार करने में शायद बीस से पच्चीस दिन और लग सकते हैं। अन्य ब्लाग बनाये थे उन पर शुरू में मैंने कृतिदेव में ही अपनी रचनायें रखीं थी पर यह पहला ब्लाग था जिस पर मैंने रोमन लिपि में अंग्रेजी में यूनिकोड मेंं कवितायें प्रकाशित की थी-वह भी ब्लागस्पाट के ब्लाग पर टूल पर टाईप करने के बाद कापी कर यहां रखी थी। इसी कारण पहली प्रोत्साहित करने वाली सकारात्मक टिप्पणी भी इस पर आयी थी। उससे पहले आने वाली अन्य ब्लाग पर आई टिप्पणियों में मेरा ब्लाग पढ़ने में न आने की शिकायत लिये हुए थीं। यह संयोग ही है कि कृतिदेव से यूनिकोड में परिवर्तित करने वाले टूल से लिखा पहला पाठ भी यहीं आया।

हाथी को गुड़ का पहाड़ भी मिल जाये तो उसे परवाह नहीं होती पर चूहे को हल्दी की गांठ मिल जाये तो वह कहता है कि ‘मैं भी पंसारी, मैं भी पंसारी’-ऐसा व्यंग्य करने वाले कह सकते हैं पर जैसा मेरे मन में आता है वैसा ही लिखता हूं। मैं कभी आत्ममुग्ध नहीं होता इसलिये आत्मप्रचार का दुर्गुण भी मुझमें नहीं है। जो कहता हूं कर दिखाता हूं, जो नहीं कर सकता उसे स्वीकार कर लेता हूं। मैं कभी बड़ा ब्लाग लेखक या हिंदी भाषा का लेखक नहीं बन सकता यह मैंने प्रारंभ से ही स्वीकार किया है पर मेरी मौलिक रचनाओं का कथ्य चर्चा में रहेगा क्योंकि वह मेरे पसीने से सिंचित वृक्ष की तरह हैं। सत्य से परे मन के विचरण को मैं जिस तरह दृष्टा की तरह देखता हूं सरस्वती की कृपा के बिना वह संभव नहीं है शायद यही कारण है कि मेरे मित्र अधिक हैं। यही मित्र मुझे अपने प्यार और स्नेह भरे शब्दों से और शक्तिशाली बना देते हैं। उनका सद्भाव मेरे लिये ऐसा पुरस्कार होता है जिसमें उत्तरोत्तर वृद्धि होती है।
पच्चीस हजार की संख्या पार करने पर यह पाठ इसलिये लिख रहा हूं क्योंकि मुझे लग रहा है कि कुछ लोग विश्लेषणों में दिलचस्पी लेते हैं। शायद इसमें उनके लिये कुछ हो। वह मुझे महत्वहीन कहकर नकार सकते हैं, वह मेरे लिखे में दस मीन मेख निकाल सकते हैं पर मेरे पसीने से निकला सत्य के निकट लिखे गये पाठों की अनदेखी नहीं कर सकते । पच्चीस हजार का आंकड़ा पार करता हुआ यह ब्लाग मुझे एक ही संदेश देता है कि तुम तो बेपरवाह होकर लिखो और बाकी फैसले का काम अपने ब्लाग लेखक मित्रों और आम पाठकों के लिये छोड़ दो-जिन दिनों ब्लाग बनाने के लिये जूझ रहा था तब एक पत्रिका में एक लेख पर नजर पड़ी थी। उसमें भी यही संदेश था। अगर ब्लाग बना लिया है तो उस पर नियमित लिखो। इसलिये इन दोनों ब्लाग-शब्द पत्रिका और हिंदी पत्रिका-पर कभी कुछ ऐसा हल्का पाठ आ जाये तो उसे अनदेखा कर दें-मैं देर से सीखता और समझता हूं पर एक बार कोई बात दिमाग में घुस जाये तो फिर उस मार्ग से हटता भी नहीं हूं। अपनी कमियां मुझे साफ दिखाईं देतीं है पर उनसे मैं कुंठित हुए बिना अपने परिश्रम के सहारे अपने मार्ग पर बढ़ता हूं।
……………………………………………….
दीपक भारतदीप

मरी संवेदना का व्यापार जारी है


संवेदना मर गयी है
फिर भी उसका व्यापार
अब भी जारी है
फर्क बस यही आ गया कि
पहले जिन्दों की गरीबी
हटाने की कसम खाकर
होते थे बाजार में सौदे
अब उजाड़कर लोगों के घरोंदे
छोड़ देते मरने के लिए
फिर उनके ग़मों को बेचते हैं
संवेदना से शून्य समाज
बिना आँख खोले
अपने कानों को बंद कर
दिमागी कसरत से बचते लोग
झुंड में चले जा रहे हैं
अपने को बेचने के लिए
भ्रम यह पाले कि हम
कुछ खरीदने जा रहे हैं
इस तरह जीवंत नहीं
मरी हुई संवेदना का व्यापार जारी है

संत कबीर वाणी: पराई स्त्री से प्रेम करना लहसुन खाने के समान


पर नारी का राचना, ज्यूं लहसुन की खान
कोने बैठे खाईये, परगट होय निदान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पराई स्त्री के साथ प्रेम करना, जैसे लहसुन का खाना है. चाहे उसे किसी स्थान में बैठकर खाईये, अंत में वह प्रकट होकर ही रहेगा अर्थात गंध के कारण वह छिपाए नहीं छिपेगा.

पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचे कोय
कबहूँ छेडि न देखिये, हसी हंसी खावे रोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पर नारी पैनी छुरी के समान है, इससे कोई विरला ही बच पाता है, और कभी भी उससे छेड़-छाड़ मत करो, वह हंस-हंस कर या रोकर दोनों प्रकार से खाती है.

निज स्वारथ के कारनै, सेव करे संसार
बिन स्वारथ भक्ति करे, सो भावै करतार

कबीरदास जी कहते है की इस संसार में जो भी सेवा होती है वह बिना कारण नहीं होती, उसके पीछे अपनी कुछ भलाई भी छिपी होती है, परन्तु बिना स्वारथ और निष्काम से जो भक्ति और सेवा होती परमात्मा को वही पसंद है.
नोट-रहीम, चाणक्य, कबीर और कौटिल्य की त्वरित पोस्टें नारद और ब्लोगवाणी पर अभी उपलब्ध हैं, अत: वहाँ देखने का प्रयास करें.

जिंदगी के सौदागर


चंद किताबें पढ़कर वह
दुनियाँ को मुट्ठी में करना चाहते हैं
उसमें लिखीं चार लाईनों पर
पूरे जमाने को चलाना चाहते हैं
किसी के दर्द से उनका कोई नही वास्ता
अपने घर से चौराहे तक ही है उनका रास्ता
बनते हैं सबके हमदर्द
अपने खौफ के साए में
प्यार और अमन के लिए
लोगों को नफरत की आग में जलाना चाहते हैं

कितनी भी किताब मशहूर क्यों न हो
उसकी इबारत दुनियाँ का आखरी सत्य नहीं होतीं
पल-पल बदलती इस दुनियाँ में
ढह जाती हैं बड़ी-बड़ी इमारतें
घूमता हुआ धरती का चक्र
उखाड़ देता है सबसे ताकतवर रियासतें
किसी की कोई जीत तभी मशहूर हो पाती है
जब उसकी हारों पर धुल डाल दी जाती है
पर कुछ लोग हैं जो
दूसरों पर उसका इतिहास लादना चाहते हैं

दूसरे से अक्ल उधार लेकर
चलना अपने इंसान होने का
मखौल उडाना ही है
कोई नहीं बांटता मुफ्त में
तकदीर किसी को
भरोसा करो अपनी तब्दीर पर
जिन्दगी के सौदागर तुम्हें
अपनी रोजी-रोटी बनाना चाहते हैं

ब्लोग लेखक और लेखक ब्लोगर (२)


जब मैं अपने सभी ब्लोग पर पाठकों की संख्या देखता हूँ तो चक्कर में पड़ जाता हूँ, क्योंकि अधिकतर ब्लॉगों पर संख्या १०० से ऊपर निकल जाती है, चाहे मैं पोस्ट करूं या नहीं. पिछले कई दिनों से इस बढ़ती संख्या की वजह से उन पर यह सोचकर लिखता हूँ कि नियमित से अगर वह पढ़ रहें है तो आखिर मुझे क्यों न लिखना चाहिए. स्वभाव से मैं जिज्ञासु और कुछ कर गुजरने की इच्छा वाला व्यक्ति हूँ. इसलिए यह देखता रहता हूँ कि किस किस्म की रचनाएं उनके द्वारा देखी जा रहीं है और वह किस तरह मेरे ब्लोग पर आते हैं. मेरे ब्लोग कितनी वेब साइटों पर लिंकित हैं और कैसे पढे जा रहे हैं इसे मैं निरंतर देखता हूँ. खासतौर से वर्डप्रेस के ब्लोग इस मामले में मुझे बहुत सारी जानकारी देते हैं क्योंकि उसमें मैंने केटेगरी और टेग अधिक रखे हुए हैं.

मुझे यह पता नहीं कि ब्लाग पर लिखने वालों के क्या अनुभव हैं पर एक बात मेरी समझ में आ गयी है कि यह भी एक वेब साईट की तरह हैं. मैंने जो अंग्रेजी में इन पर केटेगरी या टेग अपनी पोस्ट दिए हैं वह जब सर्च पा डालता हूँ तो उस विषय बनी वेब साईट के बाद मेरे ब्लोग वहाँ दिखाई देते हैं, और हिन्दी में देवनागरी में डालने पर तो विकिपीडिया के बाद मेरे ब्लोग आ जाते हैं. उदाहरण के लिए अगर मैं चाणक्य, कबीर या रहीम लिखता हूँ तो विकिपीडिया के बाद मेरे ब्लोग आ जाते हैं. वैसे यह हमें मालूम है कि यह वेब साईट नहीं है पर जो पढ़ने वाले हैं उनके लिए यह एक वेब साईट की तरह हैं. जब लोग हिन्दी टूल से अपने शब्द इन सर्च इंजिनों में डालेंगे तो जो हमने टेग या केटेगरी अपनी पोस्ट में लगाते हैं वह उनके सामने ब्लोग ला खडा कर देंगे.

इसलिए जो लेखक अपनी रचनाओं के लिए इन ब्लोग का इस्तेमाल करेंगे उनको आगे बहुत पढ़ने वाले मिलेंगे.
जब मैं सर्च पर जाकर हिन्दी और अंग्रेजी में शब्द रखता हूँ और मेरे ब्लोग मेरे सामने आ जाते हैं तो मुझे खुद पर यकीन नहीं होता कि मेरा लिखा अंतर्जाल पर इस तरह फ़ैल चुका है. इसलिए लिखते समय मेरे दिमाग में यही विचार रहता है कि ऐसा लिखा जाये जो बहुत समय तक नवीनता का बोध लिए हो. बस बात वहीं आकर अटकती हैं कि लोगों को हिन्दी टूल के बारे में बताया जाये ताकि अपने सर्च में टूल से हिन्दी देवनागरी के शब्द पोस्ट करें.
ऐसा नहीं है कि लोग कर नहीं रहे पर उनकी संख्या कम है. मैंने अपने दो मित्रों को हिन्दी टूल बताया और जब इसका उपयोग किया तो उनका मत था कि अभी इंटरनेट पर काम करने वाले लोगों को इस बारे में अधिक पता नहीं है. उन्होने कुछ जगह अपने दिवाली की बधाई हिन्दी भाषा में भेजी तो उनसे पूछा गया कि आप ऐसे हिन्दी कैसे लिखते हैं जो हमारी पढ़ने में आती है. इसलिए मेरा मानना है कि अंतरजाल पर जो हिन्दी लिख रहे हैं वह अपने लोगों को ब्लोग बनाने के साथ हिन्दी दूल के इस्तेमाल के लिए प्रेरित करें.

इधर मैंने कुछ ब्लोग देखें हैं जिनमें कई युवा लेखक इसका उपयोग अपनी साहित्यक रचनाओं के लिए करना चाहते हैं और उनकी रचनाओं में जो पुट है उसको देखते हुए मुझे लगता है कि वह लोग इस विधा को बहुत आगे तक ले जाने वाले हैं. उससे भी अधिक जिसकी कल्पना इसके आविष्कार करने वालों ने भी नहीं की होगी. वैसे भी मैं आशावादी हूँ और निराशावादिता का मेरा जीवन मैं कोई स्थान नहीं है.इसलिए जो इस पर लिख रहे हैं उन्हें निराश नहीं होना चाहिऐ

अपनी पहचान ढूंढता आदमी


अलग खडा नहीं रह सकता
इसलिये भीड़ में शामिल
हो जाता है आदमी
फिर वहीं तलाशता है
अपनी पहचान आदमी
भीड़ में सवाल-दर सवाल
सोचता मन में
भीड़ में शामिल पर अलग सोचता आदमी

भीड़ में शामिल लोगों में
अपने धर्म के रंग
अपनी जाति का संग
अपनी भाषा का अंग
देखना चाहता आदमी
अपनी टोपी जैसी सब पहने
और उसके देवता को सब माने
उसके सच को ही सर्वश्रेष्ठ जाने
अपनी शर्तें भीड़ पर थोपता आदमी
भीड़ में किसी की पहचान नहीं होती
यह जानकर उसे कोसता आदमी

अपने अन्दर होते विचारों में छेद
भीड़ में देखता सबके भेद
अपनी सोच पर कभी नहीं होता खेद
सबको अलग बताकर एकता की कोशिश
दूसरे की नस्ल पर उंगुली उठाकर
अपने को श्रेष्ठ साबित कराने का इरादा
असफल होने पर सबको समान
बताने का दावा
आदमी देता है भीड़ को धोखा
पर भीड़ का कोई रंग नहीं होता
कोई देवता उसकी पहचान नहीं बनता
कोई उसकी भाषा नहीं होती
कहा-सुना सब बेकार
तब हताश हो जाता है आदमी
भीड़ में शामिल होना चाहता है
अपनी शर्तें भूलना नहीं चाहता आदमी
अपने अंतर्द्वंदों से मुक्त नहीं हो पाता आदमी
—————————

hasya kavita-दिल और दोस्ती


हमें पूछा था अपने दिल को
बहलाने के लिए किसी जगह का पता
उन्होने बाजार का रास्ता बता दिया
जहां बिकती है दिल की खुशी
दौलत के सिक्कों से
जहाँ पहुंचे तो सौदगरों ने
मोलभाव में उलझा दिया
अगर बाजार में मिलती दिल की खुशी
और दिमाग का चैन
तो इस दुनिया में रहता
हर आदमी क्यों इतना बैचैन
हम घर पहुंचे और सांस ली
आँखें बंद की और सिर तकिये पर रखा
जिस चैन को ढूंढते थक गए थे
आखिर उसने ही उसका पता दिया
——————-
दोस्ती निभाने के वादे
किये नही जाते
निभाए जाते हैं।
जुबान से कहने के
मौक़े आते हैं हर दिन
निभाने के कभी कभी आते हैं।
देखा रोज यह कहने वालों की
भीड़ लगी रहती है कि कोइ
मुसीबत में हमें याद कर लेना
घिरता हूँ जब चारों और से
वही दोस्त सबसे पहले छोड़ जाते हैं
जो हर पल निभाने की कसमें
सबसे ज्यादा खाते हैंदोस्ती निभाने के वा दे
किये नही जाते
निभाए जाते हैं।
जुबान से कहने के
मौक़े आते हैं हर दिन
निभाने के कभी कभी आते हैं।
देखा रोज यह कहने वालों की
भीड़ लगी रहती है कि कोइ
मुसीबत में हमें याद कर लेना
घिरता हूँ जब चारों और से
वही दोस्त सबसे पहले छोड़ जाते हैं
जो हर पल निभाने की कसमें
सबसे ज्यादा खाते हैं
——————
कोई भी जब मेरे पास
वादों का पुलिंदा लेकर आता है
मैं समझ जाता हूँ
आज मी लुटने का दिन है
पहले सलाम करते हैं
फिर पूछते हैं हालचाल
फिर याद दिलाते हैं
पुरानी दोस्ती का इतिहास
मैं इन्तजार करता हूँ
उनकी फरमाइश सुनने का
वह सुनाते हैं शब्द चुन चुन कर
दावा यह कि केवल तुम अपने हो
इसीलिये कह रहा हूँ
मैं समझ जाता हूँ
आज एक दोस्त अपने से
सबंध ख़त्म होने का दिन है
________________

कार और साईकिल की टक्कर-लघु कहानी laghu katha


वह साइकिल पर अपने एक तरफ गैस का छोटा सिलेंडर बाँध कर जा रहा था. उसके आगे भी हैंडल पर जो समान टंगा था उससे साफ लग रहा था की वह कोई गैस आदि को साफ करने और उनकी मरम्मत करने का काम करता होगा. एक जगह ट्रैफिक जाम था और संभाल कर चलते रहने के बाद भी उसके सिलेंडर का हिस्सा जाम में फंसी कार से टकरा गया. उसे पछतावा हुआ पर यह उसके चेहरे पर आयी शिकन से लग रहा था.

कार के अन्दर से चूड़ीदार पायजामा और सफ़ेद कुरता पहने एक आदमी निकला उसने अपनी कार देखी और उसपर लगे खरोंच के निशान दिखे तो उसे गुस्सा आगया. और उसने साइकिल वाले को पास बुलाया, उसके पास आते ही उसने उसकी गाल पर जोर से थप्पड़ जड़ दिया. उस गरीब की आंखों में पानी भर आया, और अपने गाल पर हाथ रखता हुआ वहाँ से चला गया.

एक सज्जन जो इस घटनाक्रम को देख रहे थे उस साइकिल वाले के पास गए और बोले-‘चलो, पुलिस में रिपोर्ट लिखाओ. उसको अदालत में घसीट कर दिखाएँगे कि किस तरह थप्पड़ मारा जाता है.’

उस साइकिल वाले ने लगभग रोते हुए कहा-.बाबूजी, जाने दीजिये. हम गरीबों की इज्जत क्या है? यह लोग तो ऐसे ही हैं. इन जैसे लोगों के बाप अंधे होकर अंधी कमाई कर रहे हैं और इनसे में गरीब कहाँ तक मुकाबला करूंगा?”

वह चला गया और वह सज्जन उसे जाते देखते रहे . एक दूसरा साइकिल वाला सज्जन भी उनके पास आया और बोला-‘वह सही कह रहा था. इनका कोई क्या कर सकता है.

उन सज्जन ने कहा-‘भाई, हकीकत तो यह है कि इस तरह तो गरीब का सड़क पर चलना मुशिकल हो जायेगा. अगर यह कार वाला मारकर उसे उडा जाता तो कुछ नहीं और उसकी साइकिल से थोडी खरोंच लग गई तो उसने उसे थप्पड़ मारा. इस तरह तो गरीब जब तक लड़ेगा नहीं तो जिंदा नही रह पाएगा.’

वह कार वाला दूर खडा था. दूसरा साइकिल वाला बोला-‘साहब वह गरीब आदमी कहाँ भटकता? आप मदद करते तो आपको भी परेशानी होती. हम तो गरीब लोग हैं, मैं साइकिल पर फल बेचता हूँ पर दिन भर अपमान को झेलता रहता हूँ. हम लोगों को आदत है, यह सब देखने की.’

उन सज्जन ने आसमान की तरफ देखा और गर्दन हिलाते हुए लंबी साँसे लेते हुए कहा -‘लोग समझते नहीं है को जो गरीब काम कर रहे हैं, वह अमीरों पर अहसान करते हैं क्योंकि वह कोई अपराध नहीं करते. शायद यही कारण है कि आजकल कोई छोटा काम करने की बजाय अपराध करना पसंद करते हैं. जो इस हालत में भी छोटा काम कर रहे हैं उन्हें तो सलाम करना चाहिऐ न कि इस तरह अपमानित करना चाहिए. जब तक अमीर लोग गरीब का सम्मान नहीं करेंगे तब तक इस देश में अपराध कम नहीं हो सकता.

वह सज्जन वहाँ से निराशा और हताशा में अपनी गर्दन हिलाते हुए चले गए, पीछे से दूसरा साइकिल वाला उनको जाते हुए पीछे से खडे होकर देखता रहा.

क्रिकेट में संयत व्यवहार रखना आवश्यक


भारत और आस्ट्रेलिया की बीच हाल ही में संपन्न श्रंखला में आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी साइमंड पर भारतीय दर्शकों द्वारा नस्लभेदी टिप्पणियों और श्रीसंत के व्यवहार की बहुत चर्चा रही है. वैसे देखा जाये तो इन दोनों मामलों में कोई दम नहीं है क्योंकि इस मामले में आस्ट्रेलिया के खिलाडी अधिक बदनाम रहे हैं. मैदान के बाहर भले ही वह अन्य देशों के खिलाडियों से मित्रवत व्यवहार करते हैं पर मैदान पर उनके बुर व्यवहार की सभी देशों के खिलाड़ी करते हैं और कई बार उन्हें सचिन, सौरभ और द्रविड़ जैसे खिलाडियों के साथ बदतमीजी करते देखा गया है. उनके क्षेत्र रक्षकों द्वारा बल्लेबाजों का ध्यान भंग किया जाता ताकि वह अपनी एकाग्रता खो बैठे और उसमें वह सफल भी रहते हैं.

अब पोंटिंग अगर भारतीय खिलाडियों के व्यवहार से क्षुब्ध होकर यह कह रहे हैं कि मैच रेफरी या आई सी सी आई ऐसे मामलों का नोटिस क्यों नहीं ले रही तो उन्हें यह बताना जरूरी है कि ऐसे मामलों में इन सबकी दया दृष्टि उनके देश पर ही रही है. अगर कुछ नये भारतीय खिलाड़ी उनके साथ ऐसे व्यवहार कर रहे हैं तो इसके लिए वह और उनकी टीम ही जिम्मेदार है जो कई सालों से विश्व विजेता है और उनसे नये खिलाडी प्रेरणा लेते हैं. मतलब ऐसे मामलों में वह उनके गुरु हैं और यह उनके चेले गुरु दक्षिणा में वही व्यवहार लौटा रहे हैं. प्रतिपक्षी बल्लेबाज पर फबती कसने के मामले में ऐसा कोई देश नही है जिसके खिलाड़ी अनौपचारिक रूप से आस्ट्रेलिया की शिकायत न करते हों . पोंटिंग ने भी अभी अखबार वालों के सामने ही कहा है पर उसकी शिकायत नहीं की है. पाकिस्तानी और श्रीलंकाई खिलाडियों से तो उनके झगडे तक नौबत आ जाती हैपर पुराने भारतीय खिलाड़ी उन्हें झेलते रहे पर नये भारतीय खिलाड़ी उन्हें अब पलट कर जवाब देने लगे हैं तो बुरा लग रहा है.

वैसे भारतीय खिलाडियों को अपना व्यवहार सौम्य रखना चाहिए क्योंकि इस तरह बुरा व्यवहार करने से उन पर भी तनाव आयेगा और उनके खेल पर ही बुरा असर पडेगा. अगर आस्ट्रेलिया के खिलाडी को टिप्पणी करते हैं तो उसकी लिखित शिकायत करें पर स्वयं कोई ऐसा व्यवहार न करें जिससे उनका और देश का नाम खराब हो. आस्ट्रेलिया वाले इतने सालों से यही कर रहे हैं भारत के महान खिलाडियों ने उनको अपने खेल से ही जवाब दिया है. यह क्रिकेट खेल है इसमें हार जीत तो चलती रहेगी पर व्यवहार से अगर छबि एक बार खराब होती है तो फिर नहीं बनती और भारतीय खिलाडियों की छबि व्यवहार के मामले में उज्जवल है. जहाँ तक सायमंड्स पर दर्शकों द्वारा नस्लभेदी टिप्पणियों का सवाल है तो इतने सारे दर्शकों में कुछ शरारती तत्व हो सकते हैं जो देश का नाम बदनाम करना चाहते है पर अधिकतर दर्शक तो ऐसा करने की सोच भी नही सकते. वैसे भी क्रिकेट को भद्रजनों का खेल कहा जाता है और मैदान पर खिलाडियों और दर्शकों के संयत व्यहार करना चाहिए

चाणक्य नीति:विवशता में करते हैं भक्ति का नाटक


    1.भंवर जब तक कमल दल के बीच रहता है तो उसके फूल का मजा लेता है पर अगर उसे वहां से दूर तौरिया का फूल भी उसे बहुत आनन्द देता. इसी कारण मनुष्य को भूखे रहने की बजाय कुछ खा लेना चाहिए. अगर अपनी मनपसंद का भोजन नहीं मिले तो जो मिले उसे खा लेना चाहिए-भूखा रहना ठीक नहीं है.

    2. जब कोई शक्तिहीन साधू, धनहीन ब्रह्मचारी और रोगी किसी देवता का भक्त बनता है तो उसे ढोंगी कहा जा सकता है. वास्तविकता यह है कि बलवान कभी साधू, धनवान कभी ब्रह्मचारी नहीं बनता. सब लोग विवशता के कारण नाटक करते हैं और कुछ नहीं.

    3. अगर आदमी का स्वयं का मन ठीक है तो उसे भक्ति का पाखंड करने की जरूरत नहीं पड़ती! लोभी को दूसरे के दोषों से क्या? चुगली और परनिन्दा करने वाले को दूसरे के पापों से सत्यवादी को तपस्या से हृदय की स्वच्छता वाले को तीर्थ यात्रा से, सज्जन को दूसरे के गुणों से क्या वास्ता? अगर अपना प्रभाव है तो भूषन से, विधा है तो धन से और अगर अपयश है तो मृत्यु से क्या लाभ?

    4.मनुष्य की चार चीजों की भूख कभी नहीं बुझती. धन, जीवन स्त्री और भोजन. इसके लिए वह हमेशा लालायित रहता है.

विवाद से बचने के लिए व्यंजना विधा में लिखें


हिंदी भाषा में लिखने की तीय विधाएं हैं-शाब्दिक, लाक्षणिक और्र्र व्यंजना. इसमें सबसे बेहतर विधा व्यंजना मानी जाती है और पंचतंत्र की कहानिया इसका सबसे बड़ा अच्छा उदाहरण है. जो लोग व्यंजना विधा के ज्ञाता नहीं है तो यही कहेंगे कि उसमें तो मनुष्यों की कहानिया न होकर पशुओं की हैं. उन्हें पहली बट तो यह समझना चाहिए कि पशु कहानिया नहीं पढते दूसरे कि हमारे दर्शन के अनुसार समस्त जीवों में मूल गुण और स्वभाव एक ही जैसे होते हैं. काम,क्रोध, भोजन ग्रहण, निद्रा और बिमारी आदि सभी में होती है, पर मनुष्य में बुद्धि के साथ और विवेक भी होता है. आदमी जिस तरह प्रसन्न और अप्रसन्न होता है वैसे ही पशु भी होते हैं. पंचतंत्र की कहानिया मनुष्यों को जीवन का स्वरूप समझाने के लिक्ये ही लिखीं गईँ है.

शाब्दिक विधा में हम जिस व्यक्ति के बारे में लिख रहे हैं उसके बारे में सीधा लिख देते हैं. लाक्षणिक में हम उस व्यक्ति के लक्षणों को इंगित करने वाला पात्र गढ़ लेते हैं, और व्यंजना में हम उसके लिए कोई प्रतीक गढ़ते हैं. जैसे कोई पशु, खंबा, ट्यूब लाईट या कोई वाहन आदि. और उस पर लिखते ऐसे है कि पढने वाले को लगे कि किस तरफ इशारा किया जा रहा है. अक्सर लोग व्यंजना में लिखे गए विषयों को समझ नहीं पाते और जो समझते हैं वह ख़ूब मजा लेते हैं. हिंदी में भाषा में उसी लेखक को श्रेष्ठ मना जाता है जो व्यंजना में लिखते हैं. जो इस विधा में लिखते हैं वह निश्चिंत होकर लिखते हैं क्योंकि उन्हें संबंधित व्यक्ति जानते हुए भी कुछ नहीं कह सकता.

मैं व्यंग्य लिखता हूँ तब इसी विधा में लिखने का प्रयास करता हूँ-क्योंकि यह विधा उसकी मूल प्रकृति है. मैं अपनी सफलता और असफलता पर विचार का बोझ अब नहीं उठाता पर मुझे पढने वाले कुछ लोग हैं जो इशारा समझ जाते हैं. कुछ हास्य कवितायेँ जो वाकई काल्पनिक होती हैं और मैं उन पर कोई प्रमाण पत्र नहीं लगाता तो उस पर मेरे एक मित्र मजाक में लिख जाते हैं कि इस पर आपने डिसक्लैमर भी नहीं लगाया और हमारा सीधे नाम भी नहीं लिखा, इसे हम क्या समझें. कुछ में इशारा होता लगता है तो मैं प्रमाणपत्र लगा ही देता हूँ पर पढने वालों की तेज नजरें उसे पढ़ ही लेतीं हैं और वह कह भी जाते हैं कि इस पर क्या जरूरत थी जो डिसक्लैमर लगाया. जब कभी किसी पूरे समूह पर लिख रहे हैं तो यह विधा बहुत काम देती है और व्यंग्य का मतलब भी यही है कि वह व्यंजना विधा में होना चाहिए- नहीं तो उसे हास्य कहा जाता है.

जो लोग डरते हैं या वाद-विवाद से दूर रहना चाहिते हैं उनके लिए यह विधा ब्रह्मास्त्र का काम करती है. मैं इस विधा में लिखने को हमेशा लालायित रहता हूँ क्योंकि इससे आप अपनी बात कह भी जाते हैं और किसी विवाद भी नहीं होता. इसलिये जो लोग डरते हैं या विवाद से बचना चाहते हैं उन्हें इस व्यंजना विधा में काम करना चाहिए. एसा नहीं है कि लोगों को इसकी समझ नहीं है, यह अलग बात है कि अप लिखते किस तरह हैं और आपका प्रभाव कैसा है. मान लीजिये के मैं आज कंगारुओं और शेर के बीच मैच पर लिख दूं तो लोग हाल समझ जायेंगे कि यह भारत और आस्ट्रेलिया के बीच मैच के बारे में लिखा गया है पर उस पर लिखने से कोई प्रभाव नहें छोडेगा क्योंकि उसमें लेखक के लिए विवाद का कोई खतरा नहीं है इसलिये पाठक स्वीकार नहीं करेगा पर जहाँ किसी बड़ी ताक़त पर लिख रहे हैं और प्रतीक का इस्तेमाल करे तो पाठक उसे स्वीकार कर लेगा बशर्ते कि उसकी भाषा और प्रस्तुति प्रभावपूर्ण हो. वैसे आप व्यंजना विधा में लिखे या नहीं पर इस की जानकारी रखना चाहिए तो कई बेहतर सामग्री पढने को मिल जाती हैं जो लिखने का अच्छा अवसर प्रदान करती हैं. मेरा मानना है कि आप तब तक अच्छा नहीं लिख सकते जब तक आप पढेंगे नहीं.

चाणक्य नीति:मन की अग्नि अधिक कष्टकारी


1.ऐसा व्यक्ति अविश्वसनीय होता है जो क्रुद्ध होने पर सारे भेद देता है। ऐसा व्यक्ति कदापि मित्रता के योग्य नहीं होता है। ऐसा व्यक्ति निकृष्ट श्रेणी का होता है और जो भी ऐसे व्यक्ति को मित्र बनाता है वह सदैव धोखा ही खाता है।
2.पार्थिव अग्नि की ज्वाला से भी अधिक दग्ध करने वाली मन की अग्नि होती है, और वह मन और शरीर दोनों को भस्म कर देती है।
पत्नी के वियोग का अग्नि मनुष्य को जलाने वाली होती है, विशेषकर वृद्धावस्था में मिलने वाला यह दर्द अधिक कष्टकारी होता है।

3.अपमान की अग्नि मनुष्य को दग्ध कर देती है। विशेषकर बंधु-बांधवों द्वारा किया गया अपमान तो दिल को जलाकर ही रख देता है। इसी प्रकार कर्जा न अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है। इसी प्रकार कर्जा अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है।

4.दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रों और मूर्खों की सभा से भी जो अपमान होता है वह शरीर को जलाता है।

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