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शब्दों की जादूगरी-हिन्दी साहित्य कविता


मु्फ्त की हवाओं से
जिंदगी की सांस चलती,
पानी से बुझती प्यास की आग
जब गले में जलती।
सूरज की धूप अपने स्पर्श से
देह को मलती।
कुदरत से जिंदगी के साथ मिले मुफ्त
तोहफों की इंसान कहां करता कदर,
ख्वाब करते हैं उसे दर-ब-दर,
रेत में ढूंढता है पत्थर की कोड़ियां,
भरता है उससे अपनी बोरियां,
आंखों से देखने को आतुर है सोना
नींद बेचकर खरीदता है बिछौना,
कागज के नोटों का बना लिया ढेर,
मन को समझाता है
पूजकर पत्थर के शेर,
लाचार क्या कर सकता है
इसके अलावा,
आजाद अक्ल मिली है
पर साथ मिला जरूरतों की
गुलामी का छलावा,
अपना सोचने में लगती है देर,
अक्लमंद भी सजाते हैं सामने
सपनों का अंधेर
भला कहां है आम इंसान की गलती।।

 वह हर रोज तारीखों पर लिखते हैं।

इसलिए कलेंडर में हमेशा झांकते दिखते  हैं।

बाजार के सौदागरों के लिए दलालों ने

अपने कारिंदों के सहारे

जमाने में किये हैं इतने हादसे कि

पेशेवर कलमकारों के शब्द

उन्हीं पर कहीं रोते तो कहीं हंसते मिलते हैं।

———-

हम हादसों की तारीखें भूल जाते हैं

पर शब्दों के सौदागर

हर तारीख को कब्र से ढूंढ कर लाते हैं।

भूल न जाये जमाना उनके साथ जमाना

शब्दों की जादूगरी और उनका नाम

इसलिये हर रोज की तारीख का

हादसा याद दिलाते हैं।

 


लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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आयु के अनुसार होता है मनोरंजन का स्वरूप-आलेख (age fector and entertainment-hindi article)


वह कौनसी संस्कृति और संस्कार है जिसके नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया है जिसे बचाने के लिये इतने सारे बुद्धिजीवी लगे हुए हैं। सविता भाभी नाम की वेबसाईट और सच का सामना नाम का एक धारावाहिक इतने खतरनाक नहीं हो सकते कि वह भारतीय संस्कृति को नष्ट कर दें। भारतीयों की ताकत उनका ध्यान है जो वह अध्यात्मिक ज्ञान से अर्जित करते हैं। भारत के प्राचीन ग्रंथों में कहीं इसकी चर्चा नहीं है कि जुआ, अश्लीलता या यौन विषयों पर प्रतिबंध लगाया जाये।
हमारे प्राचीन ग्रंथ आत्मनियंत्रण का संदेश देते हैं पर यह अपेक्षा नहीं करते कि राज्य इसके लिये कार्यवाही करे। इन्हीं ग्रंथों में योग साधन, प्राणायम, ध्यान और मंत्रों की विधियां बतायी गयी हैं जिनसे शरीर और मन पर नियंत्रण रखा जा सकता है। इस देश के अधिकतर लोग आत्मनिंयत्रण के द्वारा ही जीवन व्यतीत करते हैं और इसी कारण ही भारतीय समाज विश्व का सबसे योग्य समाज भी माना जाता है। तीन प्रकार की प्रवृत्तियों के लोग-सात्विक, राजस और तामस-इस धरती पर हमेशा रहेंगे यह बात बिल्कुल स्पष्ट है। आचार विचार, रहन सहन, और खान पान के आधार आदमी की प्रवृत्तियां निर्धारित करती हैं और वह इन्हीं से पहचाना भी जाता है।
आदमी के अपराधों से निपटने का काम राज्य का है और सामान्य आदमी को स्वयं पर ही नियंत्रण रखना चाहिये। दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है या कह रहा है इससे अधिक आदमी अगर स्वयं पर ध्यान दे तो अच्छा है-यह हमारे ग्रंथों का स्पष्ट मत है।

समाज को संभालने का काम गुरु करें यह भी स्पष्ट मत है। फिर फिल्मों, धारावाहिकों, किताबों और वेबसाईटों का प्रभाव हमेशा क्षणिक रहता है उनमें इतनी ताकत नहीं है कि वह पूरा समाज बिगाड़ सकें-कम से कम भारतीय समाज इतना कमजोर नहीं है। यह समाज जीवन के सत्य और रहस्यों को जानता है जो समय समय पर महापुरुष इसे बता गये हैं। इसके बावजूद इस समाज को कमजोर मानने वाले भ्रम में हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह भ्रम उस बौद्धिक समाज को है जो शरीरिक श्रम से परे है। शारीरिक से परे आदमी को भय, आशांकायें और संदेह हमेशा घेरे रहते हैं। यही चंद लोग ऐसी फिल्मों, वेबसाईटों,धारवाहिकों और साहित्य से चिपका रहता है जो आदमी के मन में पहले सुख और बाद में संताप पैदा करता है। जो श्रम करने वाले लोग हैं ऐसा वैसा सब देखकर भूल जाते हैं पर बुद्धिजीवियों के चिंतन की सुई वहीं अटकी रहती है-यह तय करने में कि समाज इससे बिगड़ेगा कि बनेगा!
खासतौर से जिनकी उम्र बढ़ी हो गयी है या फिर जिनको समाज सुधारने का ठेका मिल गया है वह ऐसे सभी स्तोत्रों पर पर प्रतिबंध की मांग करते हैं जिनसे युवा मन विचलित होने की आशंका रहती है।

यह समस्या तो पूरे समाज में है। हर बुढ़े को आजकल के युवा असंयमित दिखते हैं तो हर बुढ़िया को युवती अहंकारी नजर आती है। बुढ़ापे में आदमी का अहंकार अधिक बढ़ जाता है और वह पुजना चाहता है। हम बरसों से सुन रहे हैं कि ‘जमाना बिगड़ गया है।’ हम छोटे थे तो समझते थे कि ‘वास्तव में जमाना बिगड़ गया होगा। अब देखते हैं तो सोचते हैं कि जमाना ठीक कब था। कहते हैं कि घोर कलियुग है पर बताईये सतयुग कब था? रावण त्रेतायुग में हुआ और कंस द्वापर में हुआ। अगर वह युग ठीक था तो फिर उनमें ऐसे दुराचारी कहां से आ गये? कुछ लोग कहते हैं कि उस समय आम आदमी में धर्म की भावना अधिक थी। अब क्या कम है? आम आदमी तो आज भी भला है-उसकी चर्चा अधिक नहीं होती यह अलग बात है। फिर आजकल के प्रचार माध्यम सनसनी फैलाने के लिये खलपात्रों में ही अच्छाई ढूंढते नजर आते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बुढ़ापे में जमाना सभी को भ्रष्ट नजर आता है।
जहां तक यौन और अश्लील साहित्य का सवाल है तो वह चालीस सालों से हम बिकते देख रहे हैं। वह बिकता भी खूब था। अनेक लोग पढ़ते थे पर फिर भी चालीस सालों में ऐसा नहीं लगता कि उससे जमाना बिगड़ गया। उम्र के हिसाब से आदमी चलता है। अनेक युवाओं ने ऐसा साहित्य पढ़ा पर अब उनमें से कई ऐसे भी हैं जो मंदिरों में दर्शन करने के लिये जाते हैं। युवा मन हिलोंरे मारता है। वह ऐसा देखना चाहता है जो नया हो। उस समय हर कोई हर युवा अपने हमउम्र विपरीत लैंगिक संपर्क बढ़ाना चाहता है। युवावस्था में विवाह होने पर जीवन साथी के प्रति दैहिक आकर्षण चरम पर पहुंच जाता है। समय के साथ वह कम होता जाता है पर प्रेम यथावत रहता है क्योंकि मन में तब एक स्वाभाविक प्रेम की ग्रंथि है जो एक दूसरे को बांधे रहती है। यह व्यक्तिगत संपर्क कभी समाज के लिये देखने की चीज नहीं होता बल्कि सभी लोग अपनी बात ढंके रहते हैं पर दूसरे के घर में झांकने की उनके अंदर एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो हर मनुष्य मनोरंजन पैदा करती है।
आदमी में मन है तो उसे मनोरंजन की आवश्यकता होती है। मनोरंजन का स्वरूप आयु के अनुसार तय होता है। युवावस्था में यौन विषय नवीनतम और आकर्षक लगता है तो अधेड़ावस्था में दौलत और शौहरत का नशा चढ़ जाता है। बुढ़ापे में जब शरीर के अंग शिथिल होते हैं तब सम्मान पाने का लोभ आदमी में पैदा होता है। ऐसे में आदमी दूसरे की निंदा और आत्मप्रवंचना कर अपने आपको दिलासा देता है कि वह अपना सम्मान बढ़ा रहा है। ऐसे में युवाओं के मनोरंजन के साधन उनको भारी तकलीफ देते हैं भले ही अपनी युवावस्था में वह भी उनमें लिप्त रहे हों।

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कोई व्यक्ति या समूह किसी दूसरे को हानि नहीं पहुंचा रहा है तो उसे अपनी आयु के अनुसार मनोरंजन प्राप्त करने का अधिकार है। यह समाज की एक सहज प्रक्रिया होना चाहिये। युवाओं के मन को किस प्रकार का मनोरंजन चाहिये यह तय करने का अधिकार उनको है न कि अधेड़ और बूूढ़े इसका निर्धारण करें। यहां यह भी याद रखने लायक बात है कि बड़ी आयु के लोग ही छोटी आयु के लोगों में संस्कार भरने का प्रयास करते हैं। इसलिये गुरु भी कहलाते हैं। यह उनकी जिम्मेदारी है कि वह उनकी मन के पर्वत को मजबूत बनायें जिससे निकलने वाली मनोरंजन की नदी विषाक्त न हो भले ही वह यौन साहित्य वाले शहर से निकलती हो। इसकी बजाय उनको जबरन रोकने की चाहत एक मजाक ही है। सच तो यह है कि कभी कभी तो यह लगता है कि कुछ उत्पाद इसलिये ही लोकप्रिय हो जाते हैं कि उनका विरोध अधिक होता है। यह विरोध प्रायोजित लगता है। वेबसाईट पर प्रतिबंध और धारावाहिक के विरोध के बाद उनकी सार्वजनिक चर्चा अधिक होना इस बात का संदेह भी पैदा करती है। इस तरह के विरोध युवाओं की तरफ से नहीं होते जो इस बात का प्रमाण है कि वह उनके लिये मनोरंजन का साधन हैं पर वह इससे विचलित हो जायेंगे यह भी नहीं सोचना चाहिये। चलते रहना इस दुनियां का नियम है।
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अकेला अक्षर-हिंदी कविता (akshara,shabda & bhasha-hindi kavita)


कभी शब्द नहीं बनता
अकेला शब्द कभी भाषा नहीं बनता।
कई मिलकर बनाते हैं एक भाव समूह
जिससे उनका निज परिचय बनता।
एक का अस्तित्व कौन जानेगा
जब तक दूसरा नहीं दिखेगा
कहीं से पढ़कर ही कोई अपने हाथ से लिखेगा
भाषा में एक अकेला शब्द अहंकार भी है
जिसके भाव के इर्द गिर्द घूम रहा हर कोई
विनम्रता से परे सारी जनता।
अक्षर का अकेलापन
शब्द का बौनापन
बृहद भाषा समूह के बिना दर्दनाक होता है
जो जान लेता है
वही सच्चा लेखक बनता

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नजर और नजरिया-हिन्दी शायरी (nazar aur nazariya-hindi shayri)
अपनी पीर किसे दिखाऊं
हर शख्स आकंठ डूबा है
अपनी ही तकलीफों में
किसको अपना समंदर दिखाऊं।

लोगों के नजर और नजरिये में
इतना फर्क आ जाता है
जो सोचते और देखते है
अल्फाजों में बयां दूसरा ही बन जाता है
सुनते कुछ हैं
समझ में कुछ और ही आता है
पहले उनको अपना दर्द दिखाऊं
या इलाज करना सिखाऊं

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सविता भाभी पर प्रतिबन्ध -आलेख (hindi article ben on savita bhabhi)


सविता भाभी नाम की एक पौर्न साईट को बैन कर दिया गया है। बैन करने वालों का इसके पीछे क्या ध्येय है यह तो पता नहीं पर बैन के बाद इसे समाचार पत्र पत्रिकाओं में खूब स्थान मिला उससे तो लगता है कि इसके चाहने वालों की संख्या बढ़ेगी। पता नहीं इस पर बैन का क्या स्वरूप है पर कैसे यह संभव है कि बाहर लोग इससे भारत में न देख पायें।
यह साइट कैसे है यह तो पता नहीं पर अनुमान यह है कि यह किसी विदेशी साईट का देसी संस्करण होगी। गूगल, याहू, अमेजन और बिंग आदि सर्च इंजिनों तो सर्वव्यापी हैं और इन पर जाकर कोई भी इसे ढूंढ सकता है। यह अलग बात है कि इनके पास कोई ऐसा साफ्टवेयर हो जो भारतीय प्रयोक्ताओं को इससे रोक सके। तब भी सवाल यह है कि अगर विदेशों में अंग्रेजी में जो पोर्न वेबसाईटें हैं उनसे क्या भारतीय प्रयोक्ताओं को रोकना संभव होगा।
इस लेखक को तकनीकी जानकारी नहीं है इसलिये वह इस बात को नहीं समझ सकता है कि आखिर इस पर यह बैन किस तरह लगेगा?
लोगों को कैसे रहना है, क्या देखना है और क्या पहनना है जैसे सवालों पर एक अनवरत बहस चलती रहती है। कुछ बुद्धिजीवी और समाज के ठेकेदार उस हर चीज, किताब और विचार प्रतिबंध की मांग करते हैं जिससे लोगों की कथित रूप से भावनायें आहत होती हैं या उनके पथभ्रष्ट होने की संभावना दिखती है। अभी कुछ धर्माचार्य समलैंगिकता पर छूट का विरोध कर रहे हैं। कभी कभी तो लगा है इस देश में आवाज की आजादी का अर्थ धर्माचार्यों की सुनना रह गया है। इस किताब पर प्रतिबंध लगाओ, उस चीज पर हमारे धर्म का प्रतीक चिन्ह है इसलिये बाजार में बेचने से रोको।
हमारा धर्म, हमारे संस्कार और हमारी पहचान बचाने के लिये यह धर्माचार्य जिस तरह प्रयास करते हैं और जिस तरह उनको प्रचार माध्यम अपने समाचारों में स्थान देते हैं उससे तो लगता है कि धर्म और बाजार मिलकर इस देश की लोगों की मानसिक सोच को काबू में रखना चाहते है।

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में वह शक्ति है जो आदमी को स्वयं ही नियंत्रण में रखती है इसलिये जो भी व्यक्ति इसका थोड़ा भी ज्ञान रखता है वह ऐसे प्रयासों पर हंस ही सकता है। दरअसल धर्म, भाषा, जाति, और नस्ल के आधार पर बने समूहों को ठेकेदार केवल इसी आशंका में जीते हैं कि कहीं उनके समूह की संख्या कम न हो जाये इसलिये वह उसे बचाने के लिये ऐसे षडयंत्र रचाते हैं जिनको वह आंदोलन या योजना करार देते हैं। सच बात तो यह है कि अधिक संख्या में समूह होने का कोई मतलब नहीं है अगर उसमें सात्विकता और दृढ़ चरित्र का भाव न हो।
इस लेखक ने कभी ऐसी साईटें देखने का प्रयास नहीं किया पर इधर उधर देखकर यही लगता है कि लोगों की रुचि इंटरनेट पर भी इसी प्रकार के साहित्य में है। इंटरनेट पर ही नहीं बल्कि कहीं भी यौन साहित्य से मस्तिष्क और देह में विकास उत्पन्न होते हैं यह बात समझ लेना चाहिये। ऐसा साहित्य वैसे भी बाजार में उपलब्ध है और इंटरनेट पर एक वेबसाईट पर रोक से कुछ नहीं होगा। फिर दूसरी शुरु हो जायेगी। समाज के कथित शुभचिंतक फिर उस पर उधम मचायेंगे। इस तरह उनके प्रचार का भी काम चलता रहेगा। समस्या तो जस की तस ही रह जायेगी। इस तरह का प्रतिबंध दूसरे लोगों के लिये चेतावनी है और वह ऐसा नहीं करेंगे पर भारत के बाहर की अनेक वेबसाईटें इस तरह के काम में लगी हुई हैं उनको कैसे रोका जायेगा?
इसलिये प्रयास यह होना चाहिये कि समाज में चेतना लायी जाये पर ऐसा कोई प्रयास नहीं हो रहा है। इसके बनिस्बत केवल नारे और वाद सहारे वेबसाईटें रोकी जा रही है पर लोगों की रुचि सत्साहित्य की तरफ बढ़े इसके लिये कोई प्रयास नहीं हो रहा है।

कुतर्कों को तर्क से काटना चाहिये। एक दूसरी बात यह भी है कि जब आप कोई सार्वजनिक रूप से किसी व्यक्ति, किताब, दृश्य या किताब को बहुत अच्छा कहकर प्रस्तुत करते हैं तो उसके विरुद्ध तर्क सुनने की शक्ति भी आप में होना चाहिये। न कि उन पर की गयी प्रतिकूल टिप्पणियों से अपनी भावनायें आहत होने की बात की जानी चाहिये। इस मामले में राज्य का हस्तक्षेप होना ही नहीं चाहिये क्योंकि यह उसका काम नहीं है। अगर ऐसी टिप्पणियों पर उत्तेजित होकर कोई व्यक्ति या समूह हिंसा पर उतरता है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही होना चाहिये न कि प्रतिकूल टिप्पणी देने वाले को दंडित करना चाहिये। हमारा स्पष्ट मानना है कि या तो आप अपने धर्म, जाति, भाषा या नस्ल की प्रशंसा कर उसे सार्वजनिक मत बनाओ अगर बनाते हो तो यह किसी भी व्यक्ति का अधिकार है कि वह कोई भी तर्क देकर आपकी तारीफ की बखिया उधेड़ सकता है।
यह लेखक शायद ऐसी बातें नहीं कहता पर अंतर्जाल पर लिखते यह एक अनुभूति हुई है कि लोग पढ़ते और लिखते कम हैं पर ज्ञानी होने की चाहत उन्हें इस कदर अंधा बना देती है कि वह उन किताबों के लिखे वाक्यों की निंदा सुनकर उग्र हो जाते हैं। इस लेखक द्वारा लिखे गये अनेक अध्यात्म पाठों पर गाली गलौच करती हुई टिप्पणियां आती हैं पर उनमें तर्क कतई नहीं होता। हैरानी तो तब होती है कि विश्व की सबसे संपन्न भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा से जुड़े होने का दावा करने वाले लोग भी पौर्न साईटों, बिना विवाह साथ रहने तथा समलैंगिकता का विरोध करते हैं। बिना विवाह के ही लड़के लड़कियों के रहने में उनको धर्म का खतरा नजर आता है। यह सब बेकार का विरोध केवल अपनी दुकानें बचाने का अलावा कुछ नहीं है। ईमानदारी की बात तो यह है कि समाज में चेतना बाहर से नहीं आयेगी बल्कि उनके अंदर मन में पैदा करने लगेगी। कथित पथप्रदर्शक अपने भाषणों के बदल सुविधायें और धन लेते हैं पर जमीन पर उतर कर आदमी से व्यक्तिगत संपर्क उनका न के बराबर है।
कहने को तो कहते हैं कि आजकल की युवा पीढ़ी इनको महत्व नहीं देती पर वास्तविकता यह है कि लड़के लड़कियां विवाह करते ही इसी सामजिक दबाव के कारण हैं। कई लड़कियां धर्म बदल कर विपरीत संस्कार वाले लड़कों से विवाह कर बाद में पछताती हैं। कई लड़के और लड़कियां धर्म बदल कर विपरीत संस्कार वाले लड़कों से विवाह कर बाद में पछताते हैं। धर्म बदलकर विवाह करने पर उनको ससुराल पक्ष के संस्कार मानने ही पड़ते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि उन संस्कारों को उसकी ससुराल में ही बाकी लोग महत्व नहीं देते पर उसे मनवाकर अपनी धार्मिक विजय प्रचारित किया जाता है। विवाह एक संस्कार है इसे आखिर नई पीढ़ी तिलांजलि क्यों नहीं दे पाती? इसकी वजह यही है कि जाति, धर्म, भाषा और नस्ल के आधार पर बने समाज ठेकेदारों के चंगुल में इस कदर फंसे हैं कि उनसे निकलने का उनके पास कोई चारा ही नहीं है। आप अगर देखें। किस तरह लड़का प्यार करते हुए लड़की को उसके जन्म नाम को प्यार से पुकारता है और विवाह के लिये धर्म के साथ नाम बदलवाकर फिर उसी नाम से बुलाता है। इतना ही नहीं बाहर समाज में अपनी पहचान बचाने रखने के लिये लड़की भी अपना पुराना नाम ही लिखती है। समाज से इस प्रकार का समझौता एक तरह से कायरता है जिसे आज का युवा वर्ग अपना लेता है।

बात मुद्दे की यह है कि मनुष्य का मन उसे विचलित करता है तो नियंत्रित भी। उसे विचलित वही कर पाते हैं जो व्यापार करना चाहते हैं। फिर मनुष्य को एक मित्र चाहिये और वह ईश्वर में उसे ढूंढता है। अभी हाल ही में पश्चिम के वैज्ञानिकों ने बताया कि मनुष्य जब ईश्वर की आराधना करता है तो उसके दिमाग की वह नसें सक्रिय हो जाती हैं जो मित्र से बात करते हुए सक्रिय होती हैं। इसका मतलब साफ कि दिमाग की इन्हीं नसों पर व्यापारी कब्जा करते हैं। ईश्वर के मुख से प्रकट शब्द बताकर रची गयी किताबों को पवित्र प्रचारित किया जाता है। इसकी आड़ में कर्मकांड थोपते हुए धर्माचार्य अपने ही धर्म, जाति और समूहों की रक्षा का दिखावा करते हुए अपना काम चलाते हैं। मजे की बात है कि आधुनिक युग के समर्थक बाजार भी अब इनके आसरे चल रहा है। वजह यह है कि धर्म की आड़ में पैसे का लेनदेन बहुत पवित्र माना जाता है जो कि बाजार को चाहिये।
निष्कर्ष यह है कि कथित पवित्र पुस्तकों के यह कथित ज्ञानी पढ़ते लिखते कितना है यह पता नहीं पर उनकी व्याख्यायें लोगों को भटकाव की तरफ ले जाती हैं। आम व्यक्ति को समाज के रीति रिवाजों और कर्मकांडों का बंधक बनाये रखने का प्रयास होता रहा है और अगर कोई इनको नहीं मानता तो उसकी इसे आजादी होना चाहिये। यह आजादी कानून के साथ ही निष्पक्ष और स्वतंत्र बुद्धिजीवियों द्वारा भी प्रदान की जानी चाहिये।
किसी को बिना विवाह के साथ रहना है या समलैंगिक जीवन बिताना है या किसी को नग्न फिल्में देखना है यह उसका निजी विचार है। यह सब ठीक नहीं है और इसके नतीजे बाद में बुरे होते हैं पर इस पर कानून से अधिक समाज सेवी विचारक ही नियंत्रण कर सकते हैं। धर्म भी नितांत निजी विषय है। जन्म से लेकर मरण तक धर्म के नाम पर जिस तरह कर्मकांड थोपे जाते हैं अगर किसी को वह नापसंद है तो उसे विद्रोही मानकर दंडित नहीं करना चाहिये। कथित रूप से पवित्र पुस्तक की आलोचना करने वालों को अपने तर्कों से कोई धर्मगुरु समझा नहीं पाता तो वह राज्य की तरफ मूंह ताकता है और राज्य भी उसके द्वारा नियंत्रित समूह को अपनी हितैषी मानकर इन्हीं धर्माचार्यों को संरक्षण देता है और यही इस देश के मानसिक विकास में बाधक है।
इस लेखक का ढाई वर्ष से अधिक अंतर्जाल पर लिखते हुए हो गया है पर पाठक संख्या नगण्य है। देश में साढ़े सात करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ता है फिर भी इतनी संख्या देखकर शर्म आती है क्योंकि अधिकतर लोग इन्हीं पौर्नसाईटों पर अपना वक्त बिताते हैं पर फिर भी अफसोस जैसी बात नहीं है। एक लेखक के रूप में हम यह चाहते हैं कि लोग हमारा लिखा पढ़ें पर स्वतंत्रता और मौलिकता के पक्षधर होने के कारण यह भी चाहते हैं कि वह स्वप्रेरणा से पढ़ें न कि बाध्य होकर। अपने प्राचीन ऋषियों. मुनियों, महापुरुषों तथा संतों ने जिस अक्षुण्ण अध्यात्मिक ज्ञान का सृजन किया है वह मनुष्य मन के लिये सोने या हीरे की तरह है अगर उसे दिमाग में धारण किया जाये तो। अपनी बात कहते रहना है। आखिर आदमी अपने दैहिक सुख से ऊब जाता है और यही अध्यात्मिक ज्ञान उसका संरक्षक बनता है। हमने कई ऐसे प्रकरण देखे हैं कि आदमी बचपन से जिस संस्कार में पला बढ़ा और बड़े होकर जब भौतिक सुख की वजह से उसे भूल गया तब उसने जब मानसिक कष्ट ने घेरा तब वह हताश होकर अपने पीछे देखने लगता है। उसे पता ही नहीं चलता कि कहां से शुरु हुआ और कहां पहुंचा ऐसे में सब कुछ जानते हुए भी वह लौट नहीं पाता। जैसे कर्म होते हैं वैसे ही परिणाम! अगर देखा जाये तो समाज को डंडे के सहारे चलाने वाले कथित गुरु या धर्माचार्यों से बचने की अधिक जरूरत है क्योंकि वह तो अपने हितों के लिये समाज को भ्रमित करते हैं। मजे की बात यह है कि यह बाजार ही है जो कभी नैतिकता, धर्म और संस्कार की बात करता है और फिर लोगों के जज्बात भड़काने का काम भी करता है।
यह आश्चर्य की बात है कि इस देश के शिक्षित वर्ग का मनोरंजन से मन नहीं भरता। दिन भर टीवी पर अभिनेता और अभिनेत्रियों को देखकर वह बोर होता है तो कंप्यूटर पर आता है पर फिर वहां पर उन्हीं के नाम डालकर सच इंजिन में डालकर खोज करता है। यही हाल यौन साहित्य का है। टीवी और सीडी में चाहे वह कितनी बार देखता है पर कंप्यूटर में भी वही तलाशता है। ऐसे समाज से क्या अपेक्षा की जा सकती है। बाजार फिर उसका पैसा बटोरने के लिये कोई अन्य वेबसाईट शुरु कर देगा। इसलिये सच्चे समाज सेवी यह प्रयास प्रारंभ करें जिससे लोगों के मन में सात्विकता के भाव पुनः स्थापित किये जा सकें। शेष फिर कभी।
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कबीर के दोहे-अपने सुंदर और बड़े मकान पर अंहकार न करो


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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कबीर गर्व न कीजिए, ऊंचा देखि आवास
काल परौं भूईं लेटना, ऊपर जमसी घास

भावार्थ-अपना शानदार मकान और शानशौकत देख कर अपने मन में अभिमान मत पालो जब देह से आत्मा निकल जाती हैं तो देह जमीन पर रख दी जाती है और ऊपर से घास रख दी जाती है।
आज के संदर्भ में व्याख्या-यह कोई नैराश्यवादी विचार नहीं है बल्कि एक सत्य दर्शन है। चाहे अमीर हो या गरीब उसका अंत एक जैसा ही है। अगर इसे समझ लिया जाये तो कभी न तो दिखावटी खुशी होगी न मानसिक संताप। सबमें आत्मा का स्वरूप एक जैसा है पर जो लोग जीवन के सत्य को समझ लेते हैं वह सबके साथ समान व्यवहार करते हैं। हम जब किसी अमीर को देखते हैं तो उसको चमत्कृत दृष्टि से देखते हैं और कोई गरीब हमारे सामने होता है तो उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है। यह अज्ञान हमारे लिए कष्टकारक होता है। जब थोडा धन आता है तो मन में अंहकार आ जाता है और अगर नहीं होता तो निराशा में घिर जाते हैं और अपने अन्दर मौजूद आत्मा को नहीं जान पाते। यह आत्मा जब हमारी देह से निकल जाता है तो फिर कौन इस शरीर को पूछता है, यह अन्य लोगों की मृतक देह की स्थिति को देख सीख लेना चाहिये।
कई शानदार मकान बनते हैं पर समय के अनुसार सभी पुराने हो जाते हैं। कई महल ढह गये और कई राजा और जमींदार उसमें रहते हुए पुजे पर समय की धारा उनको बहा ले गयी। इनमें से कई का नाम लोग याद तक नहीं करते। हां, इतिहास उन लोगों को याद करता है जो समाज को कुछ दे जाते हैं। वैसे अपने इहकाल में भी किसी धनी को वही लोग सम्मान देते हैं जो उससे स्वार्थ की पूर्ति करते हैं पर जो ज्ञानी,प्रतिभाशाली और दयालु है समाज उसको वैसे ही सम्मान देता है यह जाने बगैर कि उसका घर कैसा है?
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

इन्सान जमीन पर कटते रहे-व्यंग्य कविता


लुटता रहा पूरा शहर
मगर लोग देखते रहे।
‘खराब ज़माना आ गया है’
एक दूसरे से बस यही कहते रहे।

‘बचाने के लिये जंग कर
जान गंवाने या
शरीर पर जख्म लेने से
अच्छा अमन है’
यही सोचकर आपस में हंसते रहे।

फिर भी
आसमान की तरफ देखकर
वहां से किसी फरिश्ते के जमीन पर आकर
खुद को बचाने की उम्मीद में
इंसान खामोशी से जमीन पर कटते रहे।।

…………………………….

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बहस की बजाय लोग लड़ना चाहते हैं -आलेख


बहस होना जरूरी है क्योंकि किसी भी सामाजिक,आर्थिक और धार्मिक विषय पर प्रस्तुत निष्कर्ष अंतिम नहीं होता। दूसरे निष्कर्ष की संभावना तभी बनती है जब उस पर कोई बहस हो। बस इसमें एक पैंच फंसता है कि आखिर यह बहस किन लोगों के बीच होना चाहिये और किनके साथ करना चाहिये। सच बात तो यह है कि बहस से बचना संकीर्ण मानसिकता का प्रमाण है। साामजिक, अर्थिक और धार्मिक समूहों के ठेकेदार बहसों से इसलिये बचना चाहते हैं क्योंकि इससे उनके वैचारिक ढांचे की पोल खुलने और उससे उनके अनुयायियों के छिटकने का भय व्याप्त हो जाता है तो अनुयायी इसलिये बिदकते हैं क्योंकि उनको अपने ठेकेदारों के बहस में परास्त होने से कमजोर पड़ने पर जो उनसे सुरक्षा मिलने का जो भाव बना हुआ है वह समाप्त होने की आशंका हो जाती है-जिसे ‘सामाजिक सुरक्षा’ भी कहा जा सकता है जिसके होने का भ्रम हर व्यक्ति में यह ठेकेदार बनाये रखते हैं।

इंटरनेट पर भटकते हुए ही कुछ ब्लाग के पाठों पर दृष्टि गयी। एक पर फिल्म को लेकर बहस थी तो दूसरे पर किसी धर्म विशेष पर चर्चा करते हुए टिप्पणियां भी बहुत लिखी हुई थी। फिल्म वाले विषय वाला ब्लाग हिंदी में था और धर्म वाला अंग्रेजी में। जिस तरह की बहस धर्म वाले विषय पर थी वैसी हिंदी में संभव नहीं है और जिस तरह की हिंदी वाले ब्लाग पर थी वैसी सतही बहस अंग्रेजी वाले नहीं करते। दरअसल भारतीय समाज में असहिष्णुता का जो भाव है उसे देखते हुए धार्मिक विषय पर बहस करना खतरनाक भी है और इसलिये लोग फिल्मों के काल्पनिक विषयों पर ही बहस करते हैं-अब वह स्लमडाग हो या गुलाल या कोई अन्य।

भारतीय समाज की असहिष्णुता की रक्षा के लिये आस्था और विचारों की रक्षा के लिये अनेक तरह के नियम बनाये गये हैं। किसी धर्म, जाति,भाषा या क्षेत्र के नाम वैचारिक आपत्तियां उठाना एक तरह से प्रतिबंधित है। आप यहां झूठी प्रशंसा करते जाईये तो समदर्शी भाव के लिये आपको भी प्रशंसा मिलती रहेगी। बहरहाल अंग्रेजी ब्लाग का विषय था कि ‘यूरोप को किस तरह किसी धर्म ने बचाया’। इस अंग्रेजी ब्लाग को एक हिंदी ब्लाग लेखक ने अपने पाठ में प्रस्तुत करते हुए यह मत व्यक्त किया कि किस तरह अंग्रेजी में जोरदार बहस होती है। उन्होंने इस तरह की बहस हिंदी ब्लाग जगत में न होने पर निराशा भी जताई। उनको टिप्पणीकारों ने भी जवाब दिया कि किस तरह हिंदी में पाठक और लेखक कम हैं और यह भी कि हिंदी के ब्लाग लेखक भी कम प्रतिभाशाली नहीं है आदि। मुद्दा हिंदी और अंग्रेजी ब्लाग की पाठक और लेखकों की संख्या नहीं है बल्कि एक इस आधुनिक समय में भी बहस से बचने की समाज प्रवृत्ति है जिस पर विचार किया जाना चाहिये। इसके चलते हमारे समाज के सहिष्णु होने का दावा खोखला लगता है।

एक तरफ हम कहते है कि हमारा समाज सहिष्णु हैं और वह बाहर से आये विचारों, परंपराओं और शिक्षा को अपने यहां समाहित कर लेता है। एक तरह से वह स्वतः प्रगतिशील है और उसे किसी प्रकार के सहारे की आवश्यकता नहीं है दूसरी ओर हम लोगों की आस्था और विश्वास पर बहस इसलिये नहीं होने देते कि इससे उनको मानने वालों की भावनायें आहत होंगी। अब सवाल यह है कि धर्म,जाति,भाषा और व्यक्तियों के नाम पर जो विचारधारायें हैं वह स्वतः ही भ्रामक अवधाराणाओं पर आधारित हों तो उस टीक टिप्पणी करें कौन? जो उनको मानने वाले समूह हैं उसके सदस्य तो कूंऐं की मैंढक की तरह उन्हीं विचारों के इर्द गिर्द घूमना चाहते हैं-यह उनकी खुशी कहें या समाज में बने रहने की मजबूरी यह अलग से चर्चा का विषय है। दूसरा कोई टिप्पणी करे तो उसके विरुद्ध समूहों के ठेकेदार आस्था और विश्वास को चोट पहुंचाने का आरोप लगाकर उसके पीछे पड़ जाते हैं। इसका आशय यह है कि उन समूहों में बदलाव लाना प्रतिबंधित है। इसलिये बहस नहीं हो पाती। उसे रोका जाता है। इसके बावजूद भारतीय विचारधारायें बहुत उदार रही हैं। उन पर बहस होती है पर उसमें भी बहुत भ्रम है। धर्म और अध्यात्म ज्ञान को मिलाने की वजह से यह कहना कठिन हो जाता है कि हम अपनी बात किसके समर्थन में रखें। देखा जाये तो इस विश्व में जितनी भी धार्मिक विचारधारायें उनमें चमत्कारेां की प्रधानता है और इसलिये लोग यकीन करते हैं। इन यकीन करने वालों में दो तरह के होते हैं। एक तो वह लोग होते हैं जिनकी सोच यह होती है कि ‘ऐसा हो सकता है कि वह चमत्कार हुआ हो‘। दूसरों की सोच यह होती है कि ‘अगर कहीं उन चमत्कारों पर कहीं शक जताया या प्रश्न उठाया तो हो सकता है कि समाज उनको नास्तिक समझ कर उसके प्रति आक्रामक रुख न अपना ले इसलिये हां जी हा ंजी कहना इसी गांव में रहना की नीति पर चलते रहो। यानि भय ही चमत्कारों से बनी इन धार्मिक विचाराधाराओं का संवाहक है और उनको मानने वाले अनुयायी भी उसी भय के सहारे उनको प्रवाहमान बनाये रखना चाहते हैं।

ऐसे में जो लोग धार्मिक विषयों पर बहस चाहते हैं उनको इस देश में ऐसी किसी बहस की आशा नहीं करना चाहिये-खासतौर पर तब जब बाजार के लिये वह लाभ देने का काम करती हैं। ऐसे में कुछ लेखक हैं जो व्यंजना विधा में लिखते हों या फिर बिना किसी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र का नाम लिये अपने विचार रखते हैं। हालांकि ऐसे में बहस किसी दिशा में जाती नहीं लगती पर विचारों की गति बनाये रखने के लिये ऐसा करना आवश्यक भी लगता है।

ऐसे में बहस करने वाले विशारद भी क्या करें? वह फिल्मों के विषयों पर ही बहस करने लगते हैं। भारत इतना बड़ा देश है पर उसमें किसी क्षेत्र विशेष पर बनी फिल्म को पूरे देश की कहानी मान लिया जाता है। इस देश में इतनी विविधता है कि हर पांच कोस पर भाषा बदलती है तो हर एक कोस पर पानी का स्वाद बदल जाता है इसलिये कोई जगह की कहानी दूसरी जगह का प्रतीक नहीं मानी जा सकी। मगर फिर भी लोग है कि बहस करते हैं। इसमें कोई दोष नहीं है क्योंकि बहस ही लोगों की जींवत और सहिष्णुता की भावना का प्रतीक होती है। अभी स्लम डाग पर एकदम निरर्थक बहस देखी गयी। एक बड़े शहर की किसी झुग्गी की काल्पनिक कहानी-जिसमें काल्पनिक करोड़पति दिखाया गया है-देश के किसी अन्य भाग का प्रतीक नहीं हो सकती। मगर इस पर बहस हुई। बाजार ने इसे खूब भुनाया। प्रचार माध्यमों ने अधिकतर समय और हिस्सा इस पर खर्च कर अपनी निरंतरता बनाये रखी। अब कोई गुलाल नाम की फिल्म है। कुछ लोग उस पर आपत्तियां जता रहे हें तो कुछ लोग उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। इन पंक्तियों ने तो यह दोनों ही फिल्में नहीं देखी और न देखने का इरादा ही है क्योंकि उनमें क्या है यह इधर उधर पढ़कर जान लिया।

कहने का तात्पर्य यह है कि जिन वास्तविक विषयों पर बहस होना चाहिये उन पर आस्था और विश्वास के नाम पर ताला लगा दिया गया है। बुद्धिजीवियों को एक तरह चेतावनी दी जाती है कि वह किसी की भावनाओं से खिलवाड़ न करें। मध्यम श्रेणी के व्यवसायों में लगे बुद्धिजीवी जिनके पास न तो समाज को सुधारने की ताकत है और न ही वह उनके साथ है ऐसे में फिल्मों के विषयों पर ही बहस करते हैं। बुद्धिजीवियों को अपने मानसिक विलास के लिये कोई विषय तो चाहिये जिस पर चर्चा कर वह अपने ज्ञान का परीक्षण कर सकें। इसलिये वह ऐसे विवादास्पद विषयों पर लिखने और बोलने से बचते हैं जिससे उनको विरोध का सामना करना पड़े। जाति,धर्म,भाषा और क्षेत्रों के नाम पर बने समूहों की ताकत बहुत अधिक इसलिये है क्योंकि उनको धनपतियों का पूरा समर्थन प्राप्त है। यह केवल भारत मेें नहीं बल्कि पूरे विश्व में है। अंग्रेजों की फूट डालों और राज करो की नीति अब पूरे विश्व के ताकतवर लोगों की नीति बन गयी है। फिर भारत तो संवेदनशील देश है। ऐसे में यहां के बुद्धिजीवियों को फूंक फूंककर कदम रखने पड़ते हैं। ऐसे में काल्पनिक विषयों पर खुली बहस की जा सकती है और वास्तविक विषयों पर बिना नाम लिये ही अपनी बात कहना सुविधाजनक लगता है हालांकि विषय के निष्कर्ष किसी दिशा में नहीं जाते पर अपना मन तो हल्का हो ही जाता है।
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पसीने से बड़ा है उनका प्रबंध-तीन व्यंग्य कवितायें


प्रबंध का मतलब उनको केवल
इतना ही समझ में आता है।
परिश्रमी के शरीर से निकले
पसीने का अमृत बना दें
अपने मालिक के लिये
बदले में डालें उस पर विष भरी दृष्टि
और मुफ्त में उसके काम पर गरियायें
हालांकि अवसर आने पर
पसीने का उचित दाम का
नारा लगाना भी उनको खूब आता है।
……………………..
इस देश में कुशल प्रबंधक
उसे ही कहा जाता है
जो मालिक की नजर में चढ़ जाता है
दूसरे के पसीने से सींचे हुए फूलों को
जो न्यौछावर कर दे
अपने मालिक के लिये
वही तरक्की की राह पाता है।
पसीने की बूंदों को भले ही
अमृत कहते हों सभी लोग
पर कुशल प्रबंधक वही कहलाता
जो उसमें शोषण का विष मिलाता है।

…………………….
पसीने का मूल्य
पूरी तरह नहीं चुकाओ
तभी कुशल प्रबंधक कहलाओगे
कुचलोगे नहीं जब तक किसी निरीह को
तब तक वीर नहीं कहलाओगे।
जमाने का उसूल है
अच्छा है या बुरा
करता है जीतने वालों को सलाम
पद दिल भी कोई चीज है
अपने ईमान से भटके तो
जीत कर भी पछताओगे।
……………………….

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दर्द और मदद की कोई जाति नहीं होती-लघु कहानी


वह हादसे में घायल होकर सड़क पर गिर पड़ा ह था। उसके चारों और लोग आकर खड़े हो गये। वह चिल्लाया-‘मेरी मदद करो। मुझे इलाज के लिये कहीं ले चलो।’
लोग उसकी आवाज सुन रहे थे पर बुतों की तरह खड़े थे। उनमें चार अक्लमंद भी थे। एक ने कहा-‘पहले तो तुम अपना नाम बताओ ताकि धर्म,जाति और भाषा से तुम्हारी पहचान हो जाये।

वह बोला-‘मुझे इस समय कुछ याद आ नहीं आ रहा है। मैं तो केवल एक घायल व्यक्ति हूं और अपने होश खोता जा रहा हूं। मुझे मदद की जरूरत है।
एक अक्लमंद बोला-‘नहीं! तुम्हारो साथ जो हादसा हुआ है वह केवल तुम्हारा मामला नहीं है। यह एक राष्ट्रीय मसला है और इस पर बहस तभी हो पायेगी जब तुम्हारी पहचान होगी। तुम्हारा संकट अकेले तुम्हारा नहीं बल्कि तुम्हारे धर्म, जाति और भाषा का संकट भी है और तुम्हें मदद का मतलब है कि तुम्हारे समाज की मदद करना। इसके लिये तुम्हारी पहचान होना जरूरी है।’

यह सुनते हुए उस घायल व्यक्ति की आंखें बंद हो गयीं। कुछ लोगों ने उसकी तरफ मदद के लिये हाथ बढ़ाने का प्रयास किया तो उनमें एक अक्लमंद ने कहा-‘नहीं, जब तक यह अपना नाम नहीं बताता तब तक इसकी मदद करो। हम मदद करें पर यह तो पता लगे कि किस धर्म,जाति और भाषा की मदद कर रहे हैं। ऐसी मदद से क्या फायदा जो किसी व्यक्ति की होती लगे पर उसके समाज की नहीं।

उसी भीड़ को चीरता हुए एक व्यक्ति आगे आया और उस घायल के पास गया और बोला-‘चलो घायल आदमी! मैं तुम्हें अपनी गाड़ी में बिठाकर अस्पताल लिये चलता हूं।’
उस घायल ने आंखें बंद किये हुए ही उस आदमी के कंधे पर हाथ रखा और उठ खड़ा हुआ। अक्लमंद ने कहा-‘तुम इस घायल की मदद क्यों कर रहे हो? तुम कौन हो? क्या इसे जानते हो?’

उस आदमी ने कहा-‘मैं हमदर्द हूं। कभी मैं भी इसी तरह घायल हुआ था तब सारे अक्लमंद मूंह फेर कर चले गये थे पर तब कोई हमदर्द आया था जो कहीं इसी तरह घायल हुआ था। घायल की भाषा पीड़ा है और जाति उसकी मजबूरी। उसका धर्म सिर्फ कराहना है। इसका इलाज कराना मुझ जैसे हमदर्द के लिये पूजा की तरह है। अब हम दोनों की पहचान मत पूछना। घायल और हमदर्द का समाज एक ही होता है। आज जो घायल है वह कभी किसी का हमदर्द बनेगा यह तय है क्योंकि जिसने पीड़ा भोगी है वही हमदर्द बनता है। भलाई और मदद की कोई जाति नहीं होती जब कोई करने लगे तो समझो वह सौदागर है।’
ऐसा कहकर उसको चला गया।
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मशहूर होने से शऊर नहीं आ जाता-हास्य व्यंग्य


मशहूर होने की ललक सबमें होती है और इसके लिये आदमी अपने स्वार्थ के काम भी इस तरह करते हैं कि जैसे वह परमार्थ का कर रहे हैं। और नहीं तो कई काम ऐसे जिन्होंने किए ही नहीं अपने नाम से बताकर आत्मप्रवंचना करते हैं। दूसरों का कम बिना किसी स्वार्थ के करना या अपनी जिंदगी में ही कुछ ऐसा करना जो दूसरे न करते हों यह कोई नहंी करता।  मतलब यह है कि मशहूर होने का आशय यह कतई नहीं है कि जीने का भी शऊर हो।

हमारी मुलाकात एक मशहूर आदमी से हुई दूसरे सज्जन के घर हुई थी। उस दिन वह सज्जन एक आम और खास आदमी के एक साथ मेजबान बने थे। हम बिना बुलाये गये थे और वह मशहूर आदमी विशेष आमंत्रित थे।

हम जब पहुंचे तो मेजबान ने हमें देखते ही मूंह बना लिया-‘‘यार, तुम्हें भी अभी आना था! कल आ जाते। खैर आ ही गये तो रुक जाओ, और मेरी मदद करना। आखिर इतना मशहूर आदमी हमारे घर आ रहा है।’’

हमने कहा-‘ठीक है। अब बताओं हम क्या करें?‘

वह बोले-‘‘आज ड्राइंग रूम में न बैठकर इधर बाहर कुर्सी पर बैठ जाओ।’

हम वहीं बैठ गये। वह मशहूर आदमी आया। पूरा घर उसके स्वागत के लिए बाहर उमड़ पड़ा। हम अपनी कुर्सी से उठकर वहीं डटे रहे। सम्मान के लिये आगे नहीं गये क्योंकि मेजबान ने हमसे ऐसा कोई आग्रह नहीं किया था। उन मशहूर आदमी को अंदर ले जाया गया। पूरे घर में हलचल मची थी। कोई शरबत बना रहा था तो कोई पानी ला रहा था। उन पर मनमोहक शब्द वर्षा हो रही थी।

हम दृष्टा बन कर डट गये। देखें आखिर क्या होता है? इतने में वह मेजबान सज्जन आये और बोले-‘‘आओ, जरा तुम बैठकर उनसे बात करो। मै थोड़ा अपने आपको  अकेला महसूस कर रहा हूं।’’

हम समझ गये कि वह भले ही स्वयं भी प्रसिद्ध है पर बोलने को शऊर उनमे भी  नहीं है। बहरहाल हम ड्राइंग रूम में जाकर उस मशहूर आदमी के सामने बैठ गये। वह मेजबान हमारा परिचय कराते हुए बोले-‘यह हमारे मित्र हैं। अच्छे लेखक हैं।’’

उन मशहूर सज्जन ने खीसें निपोरते हुए पूछा-‘क्या लिखते हो?’

हमने कहा-‘अधिक कुछ नहीं बस कभी कभार व्यंग्य लिखते है। अधिक मशहूर नहीं है।’

वह हंसकर बोले-‘चिंता मत करो। कभी हो जाओगे। हां, हम पर व्यंग्य लिखने का दुस्साहस नहीं करना।’

हमने हंसते हुए कहा-‘‘आप तो बहुत गंभीर आदमी हैं। चिंतक और विचारशील हैं। आप पर तो कभी अच्छा आलेख लिखना चाहिए पर हमें लिखना नहीं आता।’

वह एकदम गंभीर होकर बोले-‘वह भी आ जायेगा। कभी हमसे मिलना तो फिर तुम्हें मिलकर अपने बारे में बतायेंगे फिर हम पर लिखना।’’

हमने देखा कि  मेजबान उन मशहूर आदमी के स्वागत के लिए परिवार के महिलाएं और बच्चे इधर-उधर  भागमभाग कर रहे थे और हमें इसीलिये वहंा बिठा गये थे कि हम उनको बातचीत में व्यस्त रख सकें।

इतनी सी बात के बाद दोनों तरफ खामोशी छा गयी। हमने सोचा-‘कौन अपने को इनसे कोई जुगाड़ लगानी है जो अधिक चाटुकारिता करें।’

जब मेजबान अंदर आये तो खामोशी देखकर उनसे बोले-‘हां साहब, आप आये तो हमारा घर पवित्र हो गया।’

हमने देखा कि मशहूर आदमी का उस पर कोई प्रभाव नहंी हुआ वह बोले-‘सुनो यह अधिक तामझाम कर हमें बहलाओ नहीं। साफ-साफ बताओं हमारे पैसे कब लौटा रहे हो। यह तो तुमने हमें बुलाया पर हम तो खुद भी आते। आखिर पैसे का मामला है इसमें कोई समझौता नहीं हो सकता।’

मेजबान का मूंह उतर गया और बोले-‘‘अभी तो यह मकान बनाया है। मैने पहले ही बता दिया था कि कम से कम दो वर्ष लगेंगे। फिर उन लोगों ने जितना ब्याज बताया था उसक दूना ले रहे हैं। मेरी तो आपसे सीधे बातचीत हुई थी पर अब वह आपके लोग मुझे तंग कर रहे हैं।’’

मशहूर सज्जन रुखे स्वर में बोले-‘ तुम्हें पता है कि हम अपना काम स्वयं तो देखते नहीं। उन्हीं लोगों पर निर्भर है तो हम तो उनकी बात ही मानेंगे। हां यह मुझे अब ध्यान आया कि तुमने दो साल कहे थे। अभी कितना समय हुआ है?’

‘उसने कहा अभी तो 11 महीने हुए हैं।’’ मेजबान सज्जन ने कहा।

अब मशहूर आदमी ठंडे हुए और बोले-‘‘हो सकता है उन लोगों से कोई कागज पत्र पढ़ने में गलती हुई हो, पर तुमने छह महीने का ब्याज नहीं दिया है वह तो तय हुआ था कि हर महीने दोगे।’’

मेजबान सज्जन ने कहा-‘‘आपके लोग मान कहां रहे हैं। वह तो ब्याज अधिक लगा रहे हैं। जितना आपसे तय हुआ था उससे दूना लगा रहे हैं।’’

मशहूर आदमी ने कहा-‘‘ठीक है जितनी मेरे से बात हुई थी उतना दे दो फिर मैं उनको समझा दूंगा। नहीं तो वह फिर तुम पर गुस्सा कर बैठेंगे।’’

मेजबान अंदर गये और नोटों की गड्डी ले आये और उनको थमा दी। उसके बाद वह चले गये तो मेजबान ने चैन की सांस ली। फिर हमसे बोले-‘यार, अच्छा ही हुआ तुम थे। वरना जाने क्या-क्या सुनाता?’’

हमने कहा-‘पर यह मशहूर आदमी तो नैतिकता और परोपकार की बातें करता है। अगर मैं गलती पर नहीं हूं तो यह आदमी सूदखोरी का विरोध भी करता है।’’

मेजबान ने कहा-‘‘यार, जो जिस बात के लिये मशहूर हो समझो उस काम का   उसे शऊर भी हो यह जरूरी नहीं है।  इनका सच वही है जो तुमने देखा पर किसी से कहोगे भी तो कौन मानेगा?’’

हम भी उठकर चलने को हुए और कहा-‘‘अभी नहीं तो कभी इस पर लिखेंगे तो सही।’
उसने कहा-‘क्या लिखोगे?’

हमने कहा-‘‘मशहूर होने से शऊर नही आ जाता।’’


चाणक्य नीति:जहाँ सम्मान न हो वह स्थान त्याज्य


१.किसी भी व्यक्ति का जहाँ सम्मान न हो उसे त्याग देना चाहिए. क्योंकि बिना सम्मान के मनुष्य जीवन जीने का कोई अर्थ नहीं है.

२.किसी भी व्यक्ति को वह स्थान भी त्याग देना चाहिए जहाँ आजीविका न हो क्योंकि आजीविका रहित मनुष्य समाज में किसी सम्मान के योग्य नहीं रह जाता.

३.इसी प्रकार वह देश और क्षेत्र भी त्याज्य है जहाः अपने मित्र व संबंधी न रहते हों क्योंकि इनके अभाव में व्यक्ति कभी भी असहाय हो सकता है.

४.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वैद की निंदा करने वाले वेद की महानता कम नहीं कर सकते.शास्त्र निहित आचार-व्यवहार को व्यर्थ बताने वाले अल्प ज्ञानी उसकी विषय सामग्री की उपयोगिता को नष्ट नहीं कर सकते.

५.जिस स्थान पर धनि-व्यापारी, ग्यानी जन, शासन व्यवस्था में निपुण राजा, सिंचाई अथवा जल आपूर्ति की व्यवस्था न हो उस स्थान का भी त्याग कर देना चाहिऐ. क्योंकि धनि से श्री वृद्धि ज्ञानी से विविक, निपुण राजा से मनुष्य की सुरक्षा और जल से जीवन के रक्षा होती है.

कार और साईकिल की टक्कर-लघु कहानी laghu katha


वह साइकिल पर अपने एक तरफ गैस का छोटा सिलेंडर बाँध कर जा रहा था. उसके आगे भी हैंडल पर जो समान टंगा था उससे साफ लग रहा था की वह कोई गैस आदि को साफ करने और उनकी मरम्मत करने का काम करता होगा. एक जगह ट्रैफिक जाम था और संभाल कर चलते रहने के बाद भी उसके सिलेंडर का हिस्सा जाम में फंसी कार से टकरा गया. उसे पछतावा हुआ पर यह उसके चेहरे पर आयी शिकन से लग रहा था.

कार के अन्दर से चूड़ीदार पायजामा और सफ़ेद कुरता पहने एक आदमी निकला उसने अपनी कार देखी और उसपर लगे खरोंच के निशान दिखे तो उसे गुस्सा आगया. और उसने साइकिल वाले को पास बुलाया, उसके पास आते ही उसने उसकी गाल पर जोर से थप्पड़ जड़ दिया. उस गरीब की आंखों में पानी भर आया, और अपने गाल पर हाथ रखता हुआ वहाँ से चला गया.

एक सज्जन जो इस घटनाक्रम को देख रहे थे उस साइकिल वाले के पास गए और बोले-‘चलो, पुलिस में रिपोर्ट लिखाओ. उसको अदालत में घसीट कर दिखाएँगे कि किस तरह थप्पड़ मारा जाता है.’

उस साइकिल वाले ने लगभग रोते हुए कहा-.बाबूजी, जाने दीजिये. हम गरीबों की इज्जत क्या है? यह लोग तो ऐसे ही हैं. इन जैसे लोगों के बाप अंधे होकर अंधी कमाई कर रहे हैं और इनसे में गरीब कहाँ तक मुकाबला करूंगा?”

वह चला गया और वह सज्जन उसे जाते देखते रहे . एक दूसरा साइकिल वाला सज्जन भी उनके पास आया और बोला-‘वह सही कह रहा था. इनका कोई क्या कर सकता है.

उन सज्जन ने कहा-‘भाई, हकीकत तो यह है कि इस तरह तो गरीब का सड़क पर चलना मुशिकल हो जायेगा. अगर यह कार वाला मारकर उसे उडा जाता तो कुछ नहीं और उसकी साइकिल से थोडी खरोंच लग गई तो उसने उसे थप्पड़ मारा. इस तरह तो गरीब जब तक लड़ेगा नहीं तो जिंदा नही रह पाएगा.’

वह कार वाला दूर खडा था. दूसरा साइकिल वाला बोला-‘साहब वह गरीब आदमी कहाँ भटकता? आप मदद करते तो आपको भी परेशानी होती. हम तो गरीब लोग हैं, मैं साइकिल पर फल बेचता हूँ पर दिन भर अपमान को झेलता रहता हूँ. हम लोगों को आदत है, यह सब देखने की.’

उन सज्जन ने आसमान की तरफ देखा और गर्दन हिलाते हुए लंबी साँसे लेते हुए कहा -‘लोग समझते नहीं है को जो गरीब काम कर रहे हैं, वह अमीरों पर अहसान करते हैं क्योंकि वह कोई अपराध नहीं करते. शायद यही कारण है कि आजकल कोई छोटा काम करने की बजाय अपराध करना पसंद करते हैं. जो इस हालत में भी छोटा काम कर रहे हैं उन्हें तो सलाम करना चाहिऐ न कि इस तरह अपमानित करना चाहिए. जब तक अमीर लोग गरीब का सम्मान नहीं करेंगे तब तक इस देश में अपराध कम नहीं हो सकता.

वह सज्जन वहाँ से निराशा और हताशा में अपनी गर्दन हिलाते हुए चले गए, पीछे से दूसरा साइकिल वाला उनको जाते हुए पीछे से खडे होकर देखता रहा.

पावर कट तो पोस्ट कट


 भारत के बडे शहरों और विदेशों में रहने वाले हिन्दी ब्लोग लेखक और पाठक बहुत भाग्य्शाली हैं कि उनको पावर कट के बारे में तो सोचना भी नहीं है पर जो भारत में ही हैं उन्हें  तो इस समस्या से दो चार होना ही है-छोटे और मध्यम शहरों के ब्लोग लेखक और पाठक के लिये तो यह एक समस्या  बनी  रह्ती है।

      इधर हमें भी अब इस समस्या का सामना करना पड है  और हमारे लिये तो पहले तो पावर  कट का मतलब होता था ‘टीवी कट”  और अब साथ में  हो  गया है ‘ब्लोग पर पोस्ट कट’। जो बिजली के  जाने  का समय है वही मेरा ब्लोग पर आने का।  यह संकट अभी है। इसलिए अब तो पाठकों और मित्रों के साथ रिश्तों का निर्वाह तो किश्तों में ही हो पायेगा। कभी पोस्ट लिखते लाईट जायेगी तो कभी पढ़ने और   कमेन्ट लिखते समय। इधर अब इस बात की भी गारंटी नहीं रही कि इंटरनेट उस समय खुल पायेगा जब लाईट है। मतलब लिखेंगे कम मजा ज्यादा-क्योंकि जब लाईट जायेगी टू परेशान होंगे और आयेगी टू बहुत खुश होंगे. लाईट नहीं होती तो दूसरे काम ढूंढ  लेते हैं और उसमें मग्न होने के अलावा कोई चारा भी नहीं रहता  है। लाईट  जब आती है तो मन प्रसन्न हो जाता है उस पर अगर इंटरनेट  कभी  उसी क्षण भी काम करे तो और भी मजा आ जाता ।इस तरह जो मजे के लिये ब्लोग लिख रहे थे वह तो पहले ही ले चुके होते हैं तो लिखें क्या? सोचते हैं अब दूसरों के ब्लोग पढ़कर उस पर  कमेंट लिखकर काम चलायें तो उसमें  भी कई बार परेशानी झेलनी पडती है। पता लगा कि हमने पूरी तैयारी कर ली और लाईट गुल! जब लाईट  की समस्या नहीं थी तो खूब लिख कर मजे ले रहे थे  और अब वह सामने आ रही है तो उसके हल होने पर मजे लेते हैं। तकलीफ  ना हो तो आदमी बोर होता है और होती है तो  परेशान और उस्का निराकरण  हो जाये तो आनंद  भी आता है। और वह आनंद और कोई अन्य चीज की तरफ़ जाने नहीं देता।

                     इस देश में ब्लोग लेखन का सीधा संबंध पावर से है। और यह समस्या कोई एक प्रदेश या शहर की नहीं  है। मुश्किल यह है कि इस काम से कोई आय तो अभी है नहीं कि इसे जारी रखने के लिये अपना काम-धंधा छोड कर इस पर बैठ जाये।कोयी अपने कार्यालय से शाम को लौटता  है तो कोई काम धंधे से रात को। फ़िर अपने विश्राम के समय से निकालकर ब्लोग लिखते हैं, एसी स्थिति में देश के ब्लोग लेखक काफी  कड़े संघर्ष करते हुए चलते हैं। हमारा सुबह का कट तो तत्काल प्रभाव से  लागू हो गया है और ऐसा लगता है कि रात का भी कट करना पड़ेगा। पूरी तरह ब्लोग लाइन नहीं छोड सकते पर इसे अब पहले की तरह चलाना मुश्किल लगता है। ऐसा कब तक चलेगा हम नहीं जानते पर जब तक इस देश में पावर की समस्या है और जिन   ब्लोग लेखकों और पाठकों  के सामने यह जब आएगी तो उनको भी  ब्लोग पर पोस्ट कट की नीति पर चलना पडेगा। इस कारण अब पोस्ट में कटौती कर  उसे संक्षिप्त  करनी पडेगी। जैसे पहले देश के प्रेमी लोगों ने  आई लव यू की जगह इलु-इलु कर किया था। जहाँ  कविता लिखनी  हो वहां क्षणिका से काम चलाना पडेगा। और जहाँ आलेख का मन है वहाँ चार लाइन की  सूचना लिखने  जैसी नीति अपनानी पडेगी और पाठकों से कहना पडेगा कि थोडा  लिखा बहुत समझना और उन पाठकों को  भी यह करना पडेगा  जो स्वयं  इस  समस्या से दो चार हो रहे होंगे। अलबता छोटे और मध्यम शहर के शहरों के पाठक और ब्लोगर हमेशा ही  ऐसी समस्याओं से जूझते रहेंगे.

हास्य कविता -हिट- फ्लॉप के चक्कर में मत पडो


वह प्रतिदिन हिट होने के
नुस्खे सबको बताएं
और शब्दों के डाक्टर कहलाये
मरीज पढ़ते नुस्खा जब तक
डाक्टर साहब हिट की
सीढियाँ दनादन चढ़ जाएँ

यह कैसा खेल है
हिट और फ्लॉप का
जरा लोगों को समझाए
चार लाईन की रचना शिखर पर
परचम फहराये
कोई शीर्षक लेकर ही
चौपाल में छाये
शब्दों के भण्डार भरे हैं
जिनके निज-पत्रक संग्रहालय में
उनके तो ताले ही न खुल पायें

कहें दीपक बापू
मत पडो हिट और फ्लाप के
चक्कर में तुम
अपने शब्दों को यूँ लुटाये जाओ
जज्बातों से पैदा
दिल से लिखे
उम्मीदों से सजे शब्द
लोगों के सिर पर
फूल की तरह बरसाओ
आज का लिखा कल भी
पढा जाये
ऎसी रचना कर जाओ
एक दिन के लिए लिखा
दुसरे दिन नहीं पढा जायेगा
इसीलिये सदाबहार लिख जाओ
हिट जो होते हैं
वह फिक्र से घिरे रहते हैं
तुम फ्लाप होकर बेफिक्र हो
अपनी रचना करते जाओ
लोग तथाकथित हिट से
जब फुर्सत पाएं
तुम्हारा लिखा पढ़ते जाएँ

चाणक्य नीति:नीच और उच्च व्यक्ति की पहचान


  1. जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।

  2. समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।

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