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पतंजलि योग विज्ञान-संतोष ही जीवन का सबसे बड़ा धन (patanjali yoga vigyan-santosh jivan ka dhan)


शौचात्स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः।।
हिन्दी में भावार्थ-
शौच करने से अपने अंगों में वैराग्य तथा दूसरों से संपर्क न रखने की इच्छा पैदा होती है।
सत्त्वशुद्धिसौमनरस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च।।
हिन्दी में भावार्थ-
इसके सिवा अंतकरण की शुद्धि, मन में प्रसन्नता, चित की एकाग्रता, इंद्रियों का वश में होना और आत्मसाक्षात्कार की योग्यता की अनुभूति भी होती है।
संतोषादनुत्तसुखलाभः।।
हिन्दी में भावार्थ-
संतोष से उत्तम दूसरा कोई सुख या लाभ नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम जब योग साधना करते हैं तब अपनी देह के समस्त अंगों की क्रियाओं को देख सकते हैं। हम अपनी खाने पीने तथा शौच की क्रियाओं को सामान्य बात समझ कर टालते हैं जबकि जीवन के आनंद का उनसे घनिष्ठ सम्बंध है। इसका अनुभव तभी किया जा सकता है जब हम योगासन, प्राणायाम, ध्यान तथा मंत्र जाप करें। हम जब शौच करते हैं तब अपनी देह से गंदगी निकलने के साथ ही अपने अंदर सुख का अनुभव करें। अगर ऐसा न हो तो समझ लेना चाहिए कि अभी हमारी देह में अनेक प्रकार के विकार रह गये हैं। जब हम शौच के समय अपने अंदर से विकार निकलने की अनुभूति होती है तब मन में एक तरह से वैराग्य भाव आता है और साथ ही मन में यह भी भाव आता है कि जितना हो सके अपने खान पान में सात्विक भाव का पालन किया जाये। ऐसी वस्तुऐं ग्रहण की जायें जो सुपाच्य तथा देह के लिये कम तकलीफदेह हों। इतना ही नहंी कम से कम भोजन किया जाये ताकि देह और मन में विकार न रहें यह अनुभूति भी होती है। कहने का अभिप्राय यह है कि शौच से निवृत होने पर देह के स्वस्थ होने की अनुभूति होना चाहिए। इसके विपरीत अगर शरीर में थकावट या कमजोरी के साथ मानसिक तनाव का अनुभव तो समझ लेना चाहिए कि हमारी देह बिना योगसाधना के विकार नहीं निकाल सकती।
इतना ही नहीं अपनी देह की हर शारीरिक क्रिया के साथ हमें अपने अंदर संतोष का अनुभव हो तभी यह मानना चाहिए कि हम स्वस्थ हैं। इस संसार में संतोष ही सुख का रूप है। अपने मन में असंतोष से अपना ही खून जलाकर कोई सुखी नहीं रह सकता।

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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
http://deepkraj.blogspot.com

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पतंजलि योग साहित्य-तप, स्वाध्याय तथा भक्ति हैं क्रियायोग (patanjali yoga sahitya-tap, swadhayay tathaa bhakti is kriya yog)


तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधान क्रियायोगः।।
हिन्दी में भावार्थ-
तप, स्वाध्याये तथा ईश्वर के प्रति प्राण केंद्रित करना तीनों ही क्रियायोग हैं।
समाधिभावनार्थः क्लेशतनुरणर्थश्च।।
हिन्दी में भावार्थ-
समाधि में प्राप्त सिद्धि से अज्ञान तथा अविद्या के कारण होने वाले क्लेशों का नाश होता है।
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशा।।
हिन्दी में भावार्थ-
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश यह पांचों क्लेश है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योग साधना के आठ भाग हैं जिसमें समाधि का अत्यंत महत्व है। समाधि ध्यान का वह चरम शिखर है जहां मनुष्य इस दैहिक संसार से प्रथक ईश्वरीय लोक में स्थित हो जाता है। उसका अपने अध्यात्म से इस तरह योग या जुड़ाव हो जाता है कि उसकी देह में स्थित इंद्रिया निष्क्रिय और शिथिल हो जाती हैं और जब योगी समाधि से वापस लौटता है तो उसके लिये पूरा संसार फिर नवीन हो जाता है क्योंकि वह मन के सारे विकारों से निवृत होता है।
योगासन तथा प्राणायाम के बाद परम पिता परमात्मा के प्रति ध्यान लगाना भी योग हैं और इनको क्रियायोग कहा जाता है। इसमे सिद्धि होने पर किसी विषय का अध्ययन न करने या उसमें जानकारी का अभाव होने पर भी उसको जाना जा सकता है। ऐसे में अविद्या और अज्ञान से उत्पन्न क्लेश नहीं रह जाता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि योग साधना की सीमा केवल योगासन और प्राणायाम तक ही केंद्रित नहीं है बल्कि ध्यान और समाधि भी उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा है। मनुष्य का अपना संकल्प भी इसमें महत्व रखता है।
सच तो यह है कि मनुष्य मन के इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक तो है सहज योग जिसमें मनुष्य स्वयं संचालित होता है। दूसरा है असहज योग जिसमें मनुष्य अज्ञान तथा अविद्या के कारण इधर उधर प्रसन्नता तलाश करते हुए केवल तनाव ही पाता है। पूर्ण रूप से योग साधना का ज्ञान प्राप्त करने वाले मनुष्य तत्व ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तब उनका प्रयोजन इस नश्वर संसार से अधिक नहीं रह जाता है। योगासन तथा प्राणायाम करने वाले कुछ लोग अपने आपको सिद्ध समझने लगते हैं और तब वह दूसरों को चमत्कार दिखाकर अपनी दुकानें जमाते हैं। दरअसल वह योग का पूर्ण रूप नहीं जानते। जिन लोगों को योग साधना का पूर्ण ज्ञान होता है वह समाधि के द्वारा सिद्ध तो प्राप्त करते हैं पर उसकी आड़ में कोई धंधा नहीं करते क्योंकि उनके लिये इस संसार में कोई भी कार्य चमत्कार नहीं रह जाता।
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पतंजलि योग दर्शन-जातीय सीमाओं से मुक्त होने पर मनुष्य बन जाता है महावत (patanjali yog darshan-manushya aur jatipati)


जातिदेशकालसमयानमच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्।
हिन्दी में भावार्थ
-जाति, देश, काल तथा व्यक्तिगत सीमा से रहित होकर सावैभौमिक विचार का हो जाने पर मनुष्य एक महावत की तरह हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-महर्षि पतंजलि यहां पर मनुष्य को संकीर्ण विचाराधाराओं से बाहर आने का संदेश दे रहे हैं। योगासन और प्राणायाम के बाद मनुष्य की देह तथा मन में स्फूर्ति आती है तब उसके हृदय में कुछ नया कर गुजरने की चाहत पैदा होती है। ऐसे में वह अपने लक्ष्य निर्धारित करता है। उस समय उसे अपने मस्तिष्क की सारी खिड़कियां खुली रखना चाहिए।
हमारे देश में जाति, भाषा, वर्ण तथा क्षेत्र को लेकर संकीर्णता का भाव लोगों में बहुत देखा जाता है। सभी लोग अपने समाज की श्रेष्ठता का बखान करते हुए नहीं थकते। हमारे देश में समाज का विभाजन कर कल्याण की योजनायें बनायी जाती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से काम करने में जातीय, भाषाई, तथा क्षेत्रीय भावनाओं की प्रधानता देखती है जाती है। इस संकीर्ण सोच ने हमारे देश के लोगों को कायर और अक्षम बना दिया है। भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है क्योंकि हर आदमी अपने व्यक्तिगत दायरों में होकर सोचता है और उसे समाज से कोई सरोकार नहीं  है।
जिन लोगों को कुशल महावत की तरह अपने जिंदगी रूपी हाथी पर नियंत्रण करना है उनको अपने अंदर किसी प्रकार की संकीर्ण सोच को स्थान नहीं देना चाहिये। जब आदमी जातीय, भाषाई, वर्णिक तथा क्षेत्रीय सीमाओं के सोचता है तो उसकी चिंता अपने समाज पर ही क्रेद्रित होकर रह जाती है। तब उसे लगता है कि वह कोई ऐसा काम न करे करे जिससे उसका समाज नाराज न हो जाये। यहां तक कि इस डर से वह दूसरे समाज के लिये हित का न तो सोचता है न करता है कि वह उसके समाज का विरोधी है। इससे उसके अंदर असहजता का भाव उत्पन्न होता है। जब आदमी उन्मुक्त होकर जीवन में में विचरण करता है तब वह विभिन्न जातीय, भाषाई, तथा क्षेत्रीय समूहों में भी उसको प्रेम मिलता है जिससे उसका आनंद बढ़ जाता है।

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कंप्यूटर चलायें तो ध्यान जरूर करें-आलेख (computer and dhyan-hindi lekh)


कई बार ऐसा पढ़ने को मिलता है कि कंप्यूटर पर काम करने वालों बीस मिनट से अधिक काम लगातार नहीं करना चाहिये। इस अवधि के बाद अगर काम करना हो तो वहीं दो मिनट आंखें बंद कर बैठें और फिर काम करें। यह सुझाव उन पश्चिमी विशेषज्ञों का ही है जहां कंप्यूटर का अविष्कार हुआ।
हम भारतीय उपभोग की प्रवृत्ति में इतना लिप्त हो जाते हैं कि पश्चिम द्वारा अविष्कृत वस्तुओं का उपभोग तो करते हैं पर सावधानियां नहीं बरतते बल्कि वही वस्तुऐं हमारा साध्य हो जाती हैं न कि साधन। आप सुनकर चैंकेंगे पश्चिमी चिकित्सक रंगीन टीवी देखने को एक खतरनाक वस्तु मानते हैं जिस पर हमारे देश का हर आदमी आंखें गड़ाकर तमाम तरह के दृश्य देखता ही रहता है। यही हाल अंग्रेजी शराब का है। अंग्रेज और अमेरिककन शराब घूंट घूंट कर पीते हैं जबकि हमारे देश के लोग तो इस पर ऐसे टूटते हैं जैसे कि पेट इसी से भरना हो। इसके अलावा पीने से अधिक तो इसकी चर्चा करते हैं। इसके अलावा खान पान के जो पश्चिमी तरीके हमने अपनाये हैं वह भी स्वास्थ्य के लिये अनुकूल नहीं है पर यहां हम केवल कंप्यूटर से होने वाली हानि पर ही विचार करेंगे।
दरअसल आंखें बंद करने से हमारे दिमाग की अनेक नसें शिथिल होती हैं जिससे आराम मिलता है। कंप्यूटर पर बीस मिनट काम करने के बाद आंखें करने का सुझाव बहुत अच्छा है पर इसके साथ अगर ध्यान की बात जोड़ी दी जाये तो सोने में सुहागा।
ध्यान से आशय यह है कि हम अपना ध्यान भृकुटि के मध्य नाक के ऊपर रखें। अगर अभ्यास हो जाये तो यह बहुत सरल है नहीं तो बहुत कठिन लगता है। आंखें बंद कर बस अपना ध्यान वहीं रख दीजिये। उस समय विचार आयेंगे आने दीजिये क्योंकि यह हमारे मानसिक विकार है जो वहंा भस्म होने वहां आते हैं। आप तो यही अनुभव करिये कि आंखें बंद करने से आपके पूरी शरीर को राहत मिल रही है यही अनुभूति भी एक तरह से ध्यान है। थोड़ी देर में आपको ऐसा लगेगा कि आपके अंदर नई ऊर्जा का संचय हो रहा है।
अगर आप प्रातः भी प्राणायम-टीवी पर सिखाने वाले बहुत लोग हैं जिनको देखकर सीख लीजिये-करने के बाद ध्यान अवश्य लगायें क्योंकि यह एक तरह से योग साधना और ध्यान की अभ्यास क्रिया का फिनिशिंग पौइंट (पूर्ण शुद्धता की अनुभूति का समय) होता है।
श्रीगीता में ध्यान की परम महत्ता है। ध्यान आत्म साक्षात्कार करने की एक ऐसी विधि है जिससे अगर संकल्प के साथ करें तो बहुत सहज लगती है और अगर टालने वाली बात है तो यह संभव नहीं है। आप जब ध्यान लगायेंगे तो तनाव में ऐसी कमी अनुभव होगी जिसे तभी समझ पायेंगे जब इसे करेंगे।
योगासन, प्राणायम तथा ध्यान करने का लाभ तभी हो सकता है जब हम उनको अनुभव करने के लिये अपने अंदर संकल्प धारण करें। एक बात याद रखिये यह कोई सिद्ध होने की विधि नहीं है। जहां आपने अंदर सिद्ध होने का भ्रम पाला वहां सब बेकार हो जायेगा। मुख्य बात हमें अपने अंदर सुख की अनुभूति करने से है कि दूसरे को यह दिखाने की हम उससे बड़े हैं।
आप एक बार कंप्यूटर पर हर बीस मिनट बाद जैसे ही आंखों बंद कर दो मिनट का ध्यान लगायेंगे और तब हो सुखानुभूति होगी तो यह एक आदत सी बन जायेगी। कुछ ऐसे पाठों पर अनेक पाठक लिखते हैं कि आप विधियां लिखिये। दरअसल ध्यान की विधि तो बस यही है कि भृकुटि पर अपना ध्यान रखें। इससे अधिक तो अनावश्यक प्रवचन करना होगा। योगासनों के लिये अनेक साधन हैं जहां से सीखें। हमारे पाठों का उद्देश्य तो केवल अपने मित्रों, पाठकों और साथियों में संकल्प पैदा करना होता है। याद रखिये संकल्प से सारी विधियां
फलीभूत होती है वरना तो अभ्यास करते रहिये उससे सीमित लाभ होगा चाहे वह ध्यान ही क्यों न हो? मुख्य बात यह है कि हम मन में ही यह विचार करें कि ‘मैं योगासन, प्राणायम, ध्यान और मंत्रोच्चार से अपने मन, विचार और बुद्धि को स्वच्छ रखते हुए इस संसार में विचरण करूंगा।’

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लड़ाई बढ़ाने का फायदा-हास्य व्यंग्य


वह कुटिल साधु अपने लिये स्थाई ठिकाना ढूंढने निकला था पर उसे कुछ समझ में नहीं आया कि कहां रुकें? वह चाहता था कि वह ऐसी जगह रुके जहां चारों तरफ पेड़ पौद्ये हों? जहां के निवासी मेहनती और धनी हों। पास में कोई नदी बहती हो। वह एक अपराधी था और राज्य के दबाव के चलते वह अपने धंधे छोड़कर दूसरा धंधा करना चाहता था। इसलिये उसने साधु का वेश बना लिया। वह चलता थक गया पर चलता जा रहा। आखिर वह थक कर एक पेड़ के नीच आंखें बंद कर बैठ गया। कुछ देर बार उसने आंखे खोली तो देखा सामने चार लोग जमीन पर बैठकर उसे देख रहे हैं। फिर उसने अपने चारों तरफ देखा तो दंग रह गया। वैसी ही जगह वहां थी जैसी वह चाहता था। उसने चारों तरफ देखा। पक्के मकान ही दिखाई दिये। खेतों में फसल लहरा रही थी तो पेड़ के झुंड उनके किनारे खडे थे दूर बहती नहर भी उसने देखी।
फिर उसने उन चारों लोगों की तरफ देखा और कहा-‘बच्चों तुम कौन हो? और यहां कैसे आये हो?’
उनमें एक न कहा-‘हम चारों आसपास के चार गावों के हैं। यहां दोपहर में गपशप करने के लिये मिलते हैं। आज आप यहां विराजे हैं। आपको ध्यान में देखकर हम चुपचाप बैठ गये कि आप ध्यान से निवृत हों तो कुछ आपसे ज्ञान की बात सुनें ताकि हमारे मन का संताप दूर हो जाये।’
साधु ने पूछा-‘तुम्हारे अंदर कैसा मानसिक संताप है?’
दूसरे ने कहा-‘बाबा, हमारे गांवों में आपसी दुश्मनी है। लोग हमारी मित्रता को देखकर ताने कसते हैं। कहते हैं कि तुम अपने गांव के वफादार नहीं हो और दुश्मन गांव वाले से दोस्ती करते हो। आप बताओ यहां एकता कैसे करवायें?
साधु ने कहा-‘उनमें लड़ाई बढ़ाकर फायदा उठाओ। एकता से तुम्हें क्या मिलने वाला है?’
चारों एक दूसरे का मूंह देखने लगे। तीसरा बोला-‘बाबा, दरअसल हम यही तो सोचते हैं कि एकता से हमें फायदा होगा कोई व्यापार करेंगे तो चारों गावों के ग्राहक मिलेंगे। अभी तो यह हाल है कि बीच में कोई दुकान खोलो तो दुश्मन गांव का आदमी रात को जलाकर भाग जाता है। हमारे गांव का आदमी इसलिये सामान नहीं खरीदता कि हमारी दुश्मन गांव वाले से दोस्ती है दूसरे गांव वाले द्वारा खरीदने का सवाल ही नहीं है। इसलिये बेकार घूम रहे हैं। वैसे अगर उनकी दुश्मनी से फायदा उठाने की कोई योजना हो तो हम उसी भी चलने को तैयार हैं एकता की बात भी तो हम अपने फायदे के लिये सोच रहे हैं।’
उस कुटिल साधु ने कहा-‘ठीक है! तुम अपने गांवों में जाओ और इस बात का हमारे बारे में प्रचार करो कि खूब चढ़ावा हमारे पास आ रहा है। इस पेड़ के नीचे आज ही हम एक कच्ची कुटिया बना लेते हैं। तुम जाकर दुश्मन गावों के लोगों द्वारा हम पर अधिक चढ़ावे की बात करो। उनमें होड़ लग जायेगी। अपने गांव की इज्जत दाव पर लगने के भय से लोग खूब चढ़ावा लायेंगे। गांव में जाकर बाहर के गांव के मुकाबले और गांव में जाति, भाषा और धर्म के मुकाबले इज्जत की बात करना। बस देखो! कैसे काम बनता है। इसमें तुम्हारा कमीशन भी बन जायेगा। हम यहां एक मूर्ति लगा लेते हैं तुम यहां पर उस प्रसाद तथा दूसरा सामान चढ़ाने का सामान बेचने का काम शुरू कर देना। बस! फिर देखो धन दौलत तुम्हारे कदम चूमने लगेगी।’
चैथे ने कहा-‘पर हम वहां जाकर यह झूठ कैसे बोलें कि आपके पास चढ़ावा बहुत आ रहा हैं अभी तो आपकी कुटिया भी नहीं बनी और बनेगी तो उसमें दिखाने के लिये भारी चढ़ावा कैसे आयेगा?’
साधु ने कहा-‘हम जनता को कुटिया के बाहर दर्शन देंगे। हमारी कुटिया में प्रवेश किसी का हाल फिलहाल तो नहीं होगा। जब हम अंदर हों तो तुम यहां पहरा देना और कहना कि ‘साधु महाराज अभी अंदर साधना और ध्यान कर रहे है। जैसे हम अभी बैठे बैठे नींद ले रहे थे और तुमको लगा कि हम ध्यान लगा रहे हैं। वैसे ही भक्तों को भी यही वहम बना रहेगा कि अंदर कुटिया में भारी चढ़ावा होगा। वैसे इस बहाने अनजाने में सही तुम्हारा दुश्मन गावों में एकता लाने का सपना भी पूरा कर लोगे, पर हां एकता की बात करना पर चारों गांवों एकता होने बिल्कुल नहीं देना। एकता उतनी होने देना तुम्हारे धंधे के लिये खतरा न हो और इज्जत की लड़ाई को कभी बंद नहीं होने देना।’

वह चारों चले गये। अगले दिन सुबह चारों गावों से भीड़ उस कुटिल साधु के पास तमाम तरह का सामान लिये चली आ रही थी और वह मंद मंद मुस्करा रहा था।
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प्रचार की मूर्ति-हास्य व्यंग्य कवितायेँ
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ओ आम इंसान!
तू क्यों
ख़ास कहलाने के लिए मरा जाता है.
खास इंसानों की जिन्दगी का सच
जाने बिना
क्यों बड़ी होने की दौड़ में भगा जाता है.
तू बोलता है
सुनकर उसे तोलता है
किसी का दर्द देखकर
तेरा खून खोलता है
तेरे अन्दर हैं जज्बात
जिनपर चल रहा है दुनिया का व्यापार
इसलिए तू ठगा जाता है.
खास इंसान के लिए बुत जैसा होना चाहिए
बोलने के लिए जिसे इशारा चाहिए
सुनता लगे पर बहरा होना चाहिए
सौदागरों के ठिकानों पर सज सकें
प्रचार की मूर्ति की तरह
वही ख़ास इन्सान कहलाता है.
————————
प्रचार की चाहत में उन्होंने
कुछ मिनटों तक चली बैठक को
कई घंटे तक चली बताया.
फिर समाचार अख़बार में छपवाया.
खाली प्लेटें और पानी की बोतलें सजी थीं
सामने पड़ी टेबल पर
कुर्सी पर बैठे आपस में बतियाते हुए
उन्होंने फोटो खिंचवाया
भोजन था भी कि नहीं
किसी के समझ में नहीं आया.
भला कौन खाने की सोचता
जब सामने प्रचार से ख़ास आदमी
बनने का अवसर आया.

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भृतहरि संदेशः दुष्ट को ज्ञान अहंकारी बना देता है


ज्ञानं सतां मानमदादिननाशं केषांचिदेतन्मदमानकारणम्
स्थानं विविक्त्तं यमिनां विमुक्त्तये कामातुराणामपिकामकारणम्

हिंदी में भावार्थ-संत और सज्जन पुरुषों जब ज्ञान को धारण करते हैं तो उनके मन में सम्मान का मोह और मद नष्ट हो जाता है पर वही ज्ञान दुष्टों को अहंकारी बना देता है। जिस प्रकार एकांत स्थान योगियों को साधना के लिये प्रेरित करता है वैसे कामी पुरुषों की काम भावना को बढ़ा देता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय अध्यात्म ज्ञान की यही खूबी है कि वह ज्ञानी आदमी को महाज्ञानी बना देता है पर अगर दुष्ट हो तो वह उसे अहंकारी बना देता है। शायद यही कारण है कि श्रीगीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अपना ज्ञान केवल भक्तों में प्रचारित करने के लिये कहा है। ‘यह जीवन नश्वर है’-यह भाव जब सज्जन में आता है तब वह यही प्रयास करता है कि वह उसका सदुपयोग करते हुए उसे परोपकार,ज्ञानार्जन और दान करते बिताये पर यही ज्ञान जब किसी दुष्ट को प्राप्त हो जाये तो वह हिंसा,लूट और भोग विलास में लगा देता है यह सोचकर कि यह जीवन तो कभी न कभी नष्ट हो जायेगा।
कथित साधु संत भारतीय धर्म ग्रंथों से ज्ञान रटकर देश विदेश में घूमते हैं अपने लिये धनार्जन करते हुए वह इस बात का ध्यान नहीं करते कि इस तरह सार्वजनिक रूप से ज्ञान चर्चा नहीं की जाती। अनेक योग शिक्षक भी भारत की इस विद्या का प्रचार उन लोगों में कर रहे हैं जो भारतीय अध्यात्म ज्ञान को समझते नहीं है। सच बात तो यह है कि योगासन करने से देह में एक स्फूर्ति आती है पर अगर ज्ञान नहीं है तो कोई भी भटक सकता है। देह के साथ मन की शुद्धि के लिये मंत्रादि जपना चाहिये और विचारों की शुद्धता के लिये ध्यान करना अनिवार्य है। योग शिक्षक इसका महत्व नहीं समझते बस! शरीर को स्वस्थ रखने के लिये योगासन का प्रचार करते हैं जबकि इसके लिये यह अनिवार्य है कि साधक भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परिचित हो। जो भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परिचित नहीं है तो वह योगासन से अच्छा स्वास्थ प्राप्त कर भी कोई भला काम करे यह संभव नहीं है पर कोई बुरा काम तो कर ही सकता है। इसलिये भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा उन्हें ही दिया जाना चाहिये जो सज्जन हो। दुष्ट लोगों को देने से कोई लाभ नहीं क्योंकि या तो वह उसका मजाक बनाते हैं या दुरुपयोग करने के लिये तैयार हो जाते हैं।
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मोबाइल और ध्यान-हास्य कविता


फंदेबाज ने राह चलते हुए
रोक लिया और लगा गुस्सा होने
‘दीपक बापू यह क्या बात हुई
हम जब भी तुम्हारा मोबाइल खटखटाते
उसका स्विच आफॅ पाते
स्कूटर की डिग्गी में भला
कहीं ऐसे मोबाइल बंदकर क्यों ले जाते
हम तुम्हारे दोस्त हैं
तुम्हारे फ्लाप ब्लाग अगर हिट हो जायें तो
इसकी खबर पहले सुनने के लिये ही
रोज तुम्हारे मोबाइल की घंटी बजाते
तुम सुबह अपने ब्लाग की दशा
देखकर ही जरूर घर से बाहर जाते
मालुम है मिलते तो वह तुम्हें
हमेशा फ्लाप ही हैं पर
तुम फिर भी कहां बाज आते
तुम्हारी चिंता कम हुई हो
यह जानने के लिये ही
हम तुमसे करते हैं सुबह संपर्क
पर तुम्हार रवैया देख कर खफा हो जाते’

सुनकर बोले महाकवि दीपक बापू
‘हमारे फ्लाप होने की चिंता बहुत हैं तुमको
इसलिये सुबह से शाम तक
मिस काल ही लगाते
कभी काम पड़ता है तभी
करते हो मोबाइल पर बात
पर कभी ब्लाग के बारे में पूछते हो
याद हमें नहीं आता
तुम्हें हमारे मोबाइल बंद होने से अधिक
फिक्र इस बात की है कि
हम क्यों नहीं अपने साथ
राह पर यह संकट भी ले जाते
जिससे चाहकर भी तुम निजात नहीं पाते
पर तुमसे नहीं सीखना मोबाइल का उपयोग
दिमाग में नहीं भरना रोग
याद रखना
सारी दुनिया मानती है कि
भारतीयों की ताकत उनका ध्यान है
मोबाइल वालों को कहां इसका ज्ञान है
राह पर वाहन चलाते हुए
कितने मोबाइल वाले दूसरे की गाडि़यों में
घुस कर दम तोड़ गये
खबरों के लिये सनसनी छोड़ गये
हमें मोबाइल पर पद्मश्री मिलने की
खबर मिलने की संभावना हो तब भी
रास्ते में उसे बंद ही रखेंगे
कहीं तुम्हारे मिस काल पर आया ध्यान
स्कूटर कहां घुस जाये इसका नहीं रहेगा भान
जिंदा रहते तो नहीं फैला सके लिखकर सनसनी
न मिला सम्मान
घुस गये किसी गाड़ी में
तो बन जायेगी एक खबर हमारे नाम की
फैलायेंगे खबरची तमाम सनसनी
इसलिये मोबाइल को खोलकर साथ नहीं ले जाते

…………………………..

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