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पतंजलि योग विज्ञान के साथ श्रीमद्भागवत् गीता का ज्ञान होने पर ही पूर्ण योगी बनना संभव-हिन्दी लेख (patanjali yoga vigyan aur shri madbhagwat gita ka gyan-hindi lekh)


        पतंजलि योग सूत्रों में अनेक प्रकार की ऐसी व्याख्यायें हैं जिनको समझने के लिये सहज भाव और सामान्य बुद्धि के साथ विवेक की आवश्यकता होती है। उन्होंने अपने योग को आठ अंगों में बांटा है-यम, नियम, आसन, प्राणयाम, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें आसन और प्राणायाम में मनुष्य को न केवल अपनी सक्रियता दिखती है बल्कि दूसरों को उसका दर्शक होता देखकर वह प्रसन्न भी होता है। दरअसल यह दो भाग मनुष्य की देह और मन को शुद्ध करते हैं और वह यह मान लेता है कि व न केवल स्वस्थ है बल्कि शक्तिशाली है। यह उसके अल्पज्ञान को दर्शाता है। यह प्रवृत्ति उसे अहंकार की तरफ ले जाती है और अंततः वह पतन की तरफ भी बढ़ सकता है।
       जिस तरह भक्तों के चार प्रकार होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी-उसी तरह योगी भी होते हैं। एक तो वह लोग हैं जो दैहिक आपत्ति आने पर योग साधना इस वजह से करते हैं कि उनकी बीमारियां वगैरह दूर हो जाये, तो दूसरे इस आशय से पहले ही अभ्यास करते हैं कि बीमारियां तथा मानसिक तनाव उनकी देह का वरण न करें। तीसरे वह जो इस उद्देश्य से करते हैं कि देखें इससे क्या लाभ होते हैं। सबसे बड़े ज्ञानी योगसाधक हैं जो इसे जीवन का वैसे ही आवश्यक अंग मानते हुए करते हैं जैसे भोजन, पानी तथा हवा को ग्रहण करना। इसका आशय सीधा यही है कि हम जहां योग साधकों का समूह देखते हैं वहां सभी को सात्विक नहीं मानना चाहिये। उनमे राजस और तामस प्रवृत्ति के लोग भी हो सकते हैं। ऐसे में कुछ लोगों के मन में यह बात आ सकती है कि आखिर पूर्ण योगी की पहचान कैसे करें? कुछ योग साधक यह भी विचार कर सकते हैं कि आखिर कैसे पूर्ण योग की स्थिति प्राप्त करें। वैसे पतंजलि योग विज्ञान का मार्ग अपनाने वाले स्वतः ही श्रीमद्भागवत गीता और कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन करते हैं। उनके अंदर स्वतः ही भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के अध्ययन की प्रेरणा जाग्रत होती है।
            योग साधना से जब देह में स्फूर्ति आती है तब मनुष्य के सामने कोई ऐसा काम करने की इच्छा बलवती होती है जो कि अनोखा हो। अब यहां अनोखा काम करने से आशय यही माना जा सकता है जिससे कि योग साधक की समाज में चर्चा हो। ऐसे में हमें श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना अत्यंत लाभदायक हो सकता है। बिना श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान को धारण किये बिना कोई पूर्ण योगी बन सकता है यह बात संभव नहीं लग सकती। अध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण गीता के सिद्धांत न केवल सांसरिक संघर्षों के जीतने का मार्ग बताते हैं बल्कि संकटों के निवारण तथा दूसरों के जाल में न फंसने की कला भी सिखाते हैं। एक बात निश्चित यह है कि पूर्ण योगी अपना मार्ग और लक्ष्य अपनी शक्ति और काल के अनुसार निर्धारित करते हैं। वह दूसरे के विषयों का अनुकरण न करते हुए अपने ही विषयों का चयन कर कार्य आरंभ करते हैं। जिन योगसाधकों को श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान नहीं है वह अपनी देह की स्फूर्ति के कारण कोई अनोखा काम ढूंढते है ऐसे में सांसरिक चालाकियों में सक्रिय लोग उनको अपने लिये उपयोग कर सकते हैं जो कि कालांतर में योगियों के लिये कष्ट का कारण बन सकता है।
          श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को संबोधित करते हुए कहा है कि
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        अशासत्रविहितं घोरं त्पयंन्ते ये तपो जनाः।
         दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।
        कर्शयन्तः शरीररथं भूतग्राममचेतसः।
        मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यसुरनिश्चयान्।।
    ‘‘जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप करते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त कामना, आसक्ति के साथ बल के अभिमान से भी युक्त है। जो शरीर में स्थित भूतसमुदाय के साथ ही अंतःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाला ही समझो।’
           वर्तमान युग में राजनीति, फिल्म, पत्रकारिता, टीवी, तथा कला के क्षेत्र में न केवल धन है बल्कि प्रतिष्ठा भी मिलती है। ऐसे में अनेक लोग उसमें सक्रिय होने के लिये मोहित हो रहे हैं। राजनीति शब्द तो स्पष्टतः राजस भाव से ओतप्रोत है और उसमें सात्विकता की आशा बहुत करनी चाहिए मगर कला, फिल्म, पत्रकारिता और टीवी में सक्रिय होना भी करीब करीब वैसा ही है। राजस भाव का मतलब केवल राजनीति ही नहीं वरन् जीवन में भी स्वार्थ भाव रखने से है। किसी भले काम को करने के बाद उसके फल में इच्छा रखना तथा अपने हाथ से किये गये दान के पुण्य मिलने की आशा करना मनुष्य मन के राजस्व भाव को ही दर्शाता है। तय बात है कि ऐसे भाव वाले लोग केवल अपने मतलब से ही दूसरों से संपर्क करते हैं। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान रखने वाले लोग जानते हैं कि सांसरिक कर्मों में फल मिलता है पर वह अनिश्चित भी होता है। इतना ही नहीं उनको मनुष्य की पहचान भी होती है पर वह किसी के सामने व्यक्त कर उसे दुःख नहीं देते और यथासंभव बिना किसी भेदभाव और स्वार्थ के दूसरे की सहायता के लिये तत्पर रहते हैं। ज्ञानी लोग किसी भी काम को करते समय उससे संबंधित शास्त्रों का अध्ययन अवश्यक करते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि बिना सोचे समझे कोई काम करना तामस बुद्धि का परिचायक है।
         योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता के साथ कौटिल्य अर्थशास्त्र का भी अध्ययन करना चाहिये। कौटिल्य का अर्थशास्त्र न केवल राजनीति बल्कि जीवन और संसार के कर्म करने के सिद्धांतों का प्रतिपादक है।
          कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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        दुरारोहं पदं राज्ञां सर्वलोकनमस्कृतम्।
        अल्पेनाप्यपचारेण ब्राह्मण्यमिव दुष्यति।
       ‘‘सब लोकों में नमस्कार करने योग्य राजपद पर आरूढ़ होना बड़ा कठिन काम है। थोड़े से ही दुष्कर्म से      ब्राह्मणत्व दुषित हो जाता है।
        आत्मानंच परांश्चैव ज्ञात्वा धीरः समुत्पतेत्।
       एतदेव हि विज्ञानं यदात्मपरवेदनम्।।
        ‘निर्मल बुद्धि से फल के निमित्त प्रयत्न करना चाहिए और यदि वह कुसमय भंग हो जाये तो उसमें देव ही कारण है।
          निष्फलं क्लेशबहुलं सन्वितगधफलमेव च।
        न कर्म कुर्यान्मतिमान्मह्यवैरानुबन्धि च।।
     ‘जो निष्फल, बहुत क्लेश संपन्न, संदिग्ध फल और विशेष वैर का अनुबंध हो बुद्धिमान को वह कर्म कभी नहीं करना चाहिए।
        उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदयायच्छते महान्।
       नचैर्नीचैस्तरां याति निपातभ्यशशकया।।
       ‘‘ऊंचे पद की इच्छा करता हुआ मनुष्य महान हो जाता है पर अपने महापद से गिरने के भय की आशंकासे नीचे आने लगता है। अंततः उसका पतन हो जाता है।
       प्रकृतिव्यसनं यस्मात्तत्प्रशाभ्य समुत्पतेत्।
       अनयापनयाश्चयांच जायते दैवतोऽपि वा।।
      ‘‘प्रकृति के व्यसन को शांत होने के बाद ही आक्रमण करें। प्रकृति की रुष्टता, अनीति, अनादर और दैव के कोप से होती है।’’
      एक बात सत्य है कि योगसाधक न उत्तेजित होते हैं न किसी की चाल में फंसते हैं। उनके अपने उद्देश्य और अभियान होते हैं। जिसमें वह प्राणप्रण से शामिल होकर भी कोई प्रचार नहीं करते। ढेर सारे लोगों की वाहवाही से वह प्रभावित होते हैं न आलोचना से विचलित होते हैं। इस पर अगर वह श्रीमद्भागवत गीता और कौटिल्य का अर्थशास्त्र का ज्ञान प्राप्त करें तो उनको सांसरिक कर्म की समझ आती है और वह अपने अभियान में दृढ़ होते हैं।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप” 
poet,writter and editor-Deepak “BharatDeep”
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मनुस्मृति-शांत बैठना भी एक तरह से आसन (shant rahna bhee ek tarha se asan-manu smruti in hindi)


यदावगच्छेदायत्वयामाधिक्यं ध्रृवमात्मनः।
तदा त्वेचाल्पिकां पीर्डा तदा सन्धि समाश्चयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
भविष्य में अच्छी संभावना हो तो वर्तमान में विरोधियों और शत्रुओं से भी संधि कर लेना चाहिए।


क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी मनुष्य के जीवन में दुःख, सुख, आशा और निराशा के दौर आते हैं। आवेश और आल्हाद के चरम भाव पर पहुंचने के बाद किसी भी मनुष्य का अपने पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है। भावावेश में आदमी कुछ नहीं सोच पाता। मनु महाराज के अनुसार मनुष्य को अपने विवेक पर सदैव नियंत्रण करना चाहिये। जब शक्ति क्षीण हो या अपने से कोई गलती हो जाये तब मन शांत होने लगता है और ऐसा करना श्रेयस्कर भी है। अनेक बार मित्रों से वाद विवाद हो जाने पर उनके गलत होने पर भी शांत बैठना एक तरह से आसन है। यह आसन विवेकपूर्ण मनुष्य स्वयं ही अपनाता है जबकि अज्ञानी आदमी मज़बूरीवश ऐसा करता है। जिनके पास ज्ञान है वह घटना से पहले ही अपने मन में शांति धारण करते हैं जिससे उनको सुख मिलता है जबकि अविवेकी मनुष्य बाध्यता वश ऐसा करते हुए दुःख पाते हैं।

जीवन में ऐसे अनेक तनावपूर्ण क्षण आते हैं जब आक्रामक होने का मन करता है पर उस समय अपनी स्थिति पर विचार करना  चाहिए। अगर ऐसा लगता है कि भविष्य में अच्छी आशा है तब बेहतर है कि शत्रु और विरोधी से संधि कर लें क्योंकि समय के साथ यहां सब बदलता है इसलिये अपने भाव में सकारात्मक भाव रखते स्थितियों में बदलाव की आशा रखना चाहिए।कहने का अभिप्राय यह है कि हमेशा ही शांत होकर अपना काम करना चाहिए।

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संत कबीरदास-संत लोग मान अपमान के भाव से परे होते हैं (sant kabir das-man aur apman se pare hote sant)


निर्बेरी निहकामता, स्वामी सेती नेह।
विषया सो न्यारा रहे, साधुन का मत येह।।
संत कबीरदास जी का कहना है कि किसी से विवाद न करे, बैर न पाले और किसी विषया या वस्तु में कामना न रखे वहर सच्चे संत हैं। संतों का विषयों से प्रेम नहीं होता बल्कि उनका सारा ध्यान तो परमात्मा की भक्ति पर ही केंद्रित होता है।
मान अपमान न चित्त धरै, औरन का सनमान।
जो कोई आशा करै, उपदेशै तेहि ज्ञान।।
संत कबीर दास का मानना है कि संत लोग मान और अपमान को अपने हृदय में स्थान नहीं देते। वह सभी को सम्मान देते हैं और कोई आशा लेकर आये तो उसका उचित मार्गदर्शन करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग सवाल पूछते हैं कि सही गुरु कैसे ढूंढा जाये? ज्ञान तो अनेक कथित संतों ने रट लिया है और वह उसका व्यवसायिक उपयोग अपने प्रवचनों में करते हैं। दक्षिणा लेकर अनेक शिष्य वह बनाते हैं। उनमें अनेक शिष्य बाद में अपने गुरु का व्यवहारिक सत्य देखकर निराश हो जाते हैं। अनेक लोग कथित पेशेवर संतों को देखकर यह भी कहते हैं कि‘ आजकल सच्चे गुरु मिलते कहां हैं? फिर हमें उनकी पहचान भी तो नहीं पता।’
संतों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह स्थिरप्रज्ञ होते हैं। उनका हृदय केवल भक्ति में लीन रहता है। सांसरिक विषयों में वह निर्लिप्त भाव से सक्रिय रहते हुए मान अपमान का विचार नहीं करते। वह अपशब्द बोलने वाले की बातों को अनसुना कर उनसे भी सद्व्यवहार करते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वह अपने निष्काम कम के बदले कोई दक्षिणा या उपहार स्वीकार नहीं करते। अतः ऐसे ही लोगों को गुरु मानकर चलना चाहिए।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
http://deepkraj.blogspot.com

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श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान और ज्योतिष ज्ञान-हिन्दी आलेख (shri madbhagvat geeta ka gyan aur jyotish-hidni article)


भारतीय ज्योतिष विज्ञान का विरोध किसलिये हो रहा है। चंद ज्योतिषी इस आड़ में यहां के लोगों को मूर्ख बना रहे हैं और हम यह जानते हैं। इसे बार बार दोहराने से क्या मतलब है? यहां के लोगों को बेवकूफ समझते हैं और अंग्रेजी शिक्षा पाने के बाद कुछ कथित विद्वान समझते हैं कि यह देश मूर्खों का है। कुछ लोग तो पाश्चात्य सभ्यता में ऐसे रम गये लगते हैं और उनको यह लगता है कि ‘हमारे अलावा यह सब मूर्ख बसते हैं।’
सूर्य ग्रहण या चंद्रग्रहण क्या आता है भारतीय टीवी चैनल चंद ज्योतिषियों को लेकर बैठ जाते हैं। फिर शुरु होती है बहस। ज्योतिष पर ही बहस हो तो ठीक, पर वहां तो श्रीगीता मद्भागवत का विषय भी छा जाता है। श्रीमद्भागवत गीता वास्तव में अद्भुत ग्रंथ है। आप रोज पढ़िये समझ में तब तक नहीं आयेगा जब तक भक्ति भाव के साथ ही ज्ञान प्राप्ति की प्यास मन में नहीं होगी। जब समझ में आयेगा तो फिर आप किसी से बहस नहीं करेंगे। कोई अन्य एक बार करेगा पर फिर दूसरी बार सोचेगा भी नहीं। अगर आप श्रीगीता से लेकर बोल रहे हैं और अगले को चुप नहीं करा पाये तो समझ लीजिये कि आपको अभी सिद्धि नहीं मिली। मगर यह ज्योतिषी अपने व्यवसायिक हितों के लिये अनावश्यक रूप से श्रीमद्भागवत गीता को बीच में लाते हैं।
दरअसल भारतीय अध्यात्म पर हमले करने के लिये विरोधी लोगों को केवल तोते से ज्योतिष बताकर पैसे एैंठने वाले ही दिखते हैं। उस दिन तो हद ही हो गयी। एक साथ दो चैनलों पर सूर्य ग्रहण के बाद बहस चल रही थी। एक दक्षिण का तर्कशास्त्री एक ही समय दो चैनलों पर दिखाई दे रहा था। नाम से गैर हिन्दू धर्म का प्रतीत होने वाला वह शख्स तर्कशास्त्री कैसे था यह तो नहीं मालुम-वह अपने को नास्तिक बता रहा था- पर वह एक जगह भविष्यवक्ता और दूसरी जगह तंत्र मंत्र वाले से जूझता दिखा-दोनों बहसें पहले से ही कैमरे में दर्ज की गयी थी।
भविष्यवक्ता से उस कथित तर्कशास्त्री बहस पहले सीधे हुई थी। उसमें उसने अपनी जन्मतिथि बताई तो भविष्यवक्ता ने उससे कहा कि ‘तुम्हारा घरेलू जीवन तनाव से भरा है।’
उसने इंकार किया और तब उसकी पत्नी से फोन पर पूछा गया तो वह भी ज्योतिषी की बात से असहमत हुई। बात आयी गयी खत्म होना चाहिये थी पर नहीं! अगले दिन फिर वह तर्कशास्त्री आया और आरोप लगाया कि ज्योतिषी उसकी जन्मतिथि पूछने के बाद फोन करने गया था, और वहीं से किसी से पूछकर भविष्य बताया। चैनल में काम करने वाली एक महिला तकनीशियन ने उसे बताया था कि ज्योतिषी का एक एस. एम. एस आया था। ज्योतिषी अब फोन पर बात करते हुए बता रहा था कि ‘उस समय तो मेरा फोन ही बंद था।’
चैनल की महिला तकनीशियन ने बताया कि यह संदेश बहस समाप्ति के बाद ही आया था। बहस का ओर छोर नहीं मिल रहा था।
यही तर्कशास्त्री उसी समय एक दूसरे चैनल पर एक तांत्रिक से उलझा हुआ था। तांत्रिक कह रहा था कि मैं तीन मिनट में तुम्हें बेहोश कर दूंगा। तांत्रिक को अवसर दिया गया पर वह ऐसा नहीं कर सका। इस दौरान वह संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण करता रहा। अब कौन कहे कि कहां ज्योतिष और कहां यह तंत्र मंत्र! मगर चूंकि भारतीय अध्यात्म को निशाना बनाना है तो ऐसे अनेक विषय मिल ही जाते हैं।
इस पूरी बहस में हमें हंसी आयी। ऐसा लगता है कि श्रीमद्भागवत गीता की तरह ज्योतिष भी एक ऐसा विषय है जो चाहे जितना पढ़ लो समझ में नहीं आ सकता जब तक अपने रक्त में समझदार तत्व प्रवाहित न हो रहे हों। इसी बहस में एक ज्योतिष पढ़ चुकी महिला कह रही थी कि मुझे ज्योतिष में विश्वास नहीं है। यहां तक कि मैं अपना भविष्यफल जानने की कोशिश नहीं करती।’
इसलिये हमें यह लगा कि ज्योतिष भी श्रीगीता की तरह सभी के समझ में न आने वाला विषय हो सकता है। आखिरी ज्योतिष पढ़ चुकी एक महिला कह रही है तो यही समझा जा सकता है।
बहरहाल हमें यह लगा कि इस आड़ के भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का मजाक उड़ाने का प्रयास हो रहा है। ज्योतिष विषय पर टीवी पर ही एक विद्वान द्वारा दी गयी जानकारी हमें अच्छी लगी। उसने बताया कि ज्योतिष के छह भाग हैं जिनमें एक ही भाग ऐसा है जिसमें समय समय पर पूछने पर भविष्य बताया जाता है। उन्होंने बताया कि गणितीय गणना भी ज्योतिष का भाग है जिसके आधार पर हमारे पुराने विद्वानों ने सूरज, चंद्रमा तथा अन्य ग्रहों का पता लगाया था।
वैसे पता नहीं कैसे लोग कहते हैं कि ग्रहों का असर नहीं होता? इस विषय पर हमारा आधुनिक तर्कशास्त्रियों से मतभेद है। सूर्य जब दक्षिणायन होता है तो ठंड पड़ती है। यह ठंड आदमी को शरीर को कंपकंपा देती है और यकीनन उसकी मनस्थिति बिगड़ती है। आधुनिक विज्ञानी एक तरफ कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग रहता है तब यह कैसे संभव है कि गर्मी फैला रहे सूर्य में जल रहा शरीर अपना ठंडा दिमाग रख सके। श्रीगीता के ‘गुण ही गुण बरतते हैं’ के सिद्धांत को हमने अपनी देह पर लागू होते देखा है। जब परेशान होते हैं तब सूर्य, चंद्रमा और आकाश की स्थिति को देखकर लगता है कि यह सभी ग्रहों का असर है। जब यह बदलेंगे तो हमारी मानसिकता भी बदलेगी। एक सम्मानित वैज्ञानिक भी वहां आये थे-यकीनन वह बहुत महान हैं पर उनको ग्रहण के अवसर पर ही लाया जाता है। हमने कभी किसी ग्रहण के अवसर पर एक कार्यक्रम में उनको कहते सुना था कि ‘हम यह तो पता नहीं लगा सके कि धरती से बाहर जीवन है कि नहीं, पर यह तय है कि जीवन के आधार वहां ऐसे ही होंगे।’
उन्होंने शायद यह भी कहा था कि जिस तरह धरती और सूर्य के बीच अन्य ग्रह हैं वह दूसरी सृष्टि में भी होंगेे तभी वहां जीवन होगा। तात्पर्य यह है कि कहीं जीवन होगा तो वहां ऐसी प्रथ्वी होगी जिसके पास अपना सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति, शुक्र, बुध, शनि, मंगल तथा अन्य ग्र्रह भी होंगे। हम इसे यह भी कह सकते हैं कि यह ग्रह सभी प्रकार के जीवन का आधार हैं तो फिर यह कैसे संभव है कि वह मनुष्य जीवन को प्रभावित न करें।
हमने अपने अनुभव से एक बात यह देखी है कि एक ही नाम के दो व्यक्ति में कई बार स्वभावगत, परिवार तथा वैचारिक स्तर पर समानता होती है। यह सही है कि सभी का जीवन स्तर समान नहीं होता पर उनकी आदतें और विचार एक ही तरह के दिखते हैं। संभव है कुछ ज्योतिषी इसका दुरुपयोग करते हों पर सभी को इसके लिये गलत नहीं ठहराया जा सकता।
दूसरी बात यह है कि ज्योतिष में ही हमारा खगोल शास्त्र भी जुड़ा हुआ है। हमारे यहां अनेक पंचांग छपते हैं जिनमें सूर्य और चंद्रग्रहण की तारीख और समय छपा होता है और जो पश्चिमी विज्ञान की भविष्यवाणी से मेल खाता है। भारत में अनेक लोगों को पता होता है कि अमुक तारीख को सूर्य या चंद्रग्रहण होगा। अखबार और टीवी में तो बहुत बाद में पढ़ते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय ज्योतिष एक विज्ञान है मगर इस विषय पर वही लोग बोल और लिख रहे हैं जिनको इसका ज्ञान नहीं है-इनमें वह लोग भी हैं जो पढ़े पर समझ नहीं पाये। वैसे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस तरह की बहसें प्रायोजित हैं ताकि भारतीय अध्यात्म को विस्मृत किया जा सके। एक तर्कशास्त्री की दो जगह उपस्थित यही प्रमाणित करती है।
आखिरी सलाह ज्योतिषियों को भी है कि हो सके तो वह श्रीमद्भागवत गीता से दूर ही रहें क्योंकि वह समझना भी हरेक के बूते का नहीं है। उसमें जो योग और ध्यान के अभ्यास का संदेश दिया गया है उसमें इतनी शक्ति है कि उससे न यहां आदमी इहलोक बल्कि परलोक भी सुधार लेता है। सूर्य इस देह को जला सकता है पर उस आत्मा को नहीं जो न जल सकती है न मर सकती है। किसी भी प्रकार के विज्ञान से परिपूर्ण होने की बात तो उसमें कही गयी है पर इसका मतलब यह नहीं है कि ज्योतिष विज्ञान में पारंगत होने का आशय श्रीगीता सिद्ध हो जाना है। वैसे ज्योतिषियों को यह पता होना चाहिये कि इस तरह अपने ज्ञान का प्रदर्शन अज्ञानियों के सामने प्रदर्शन तामसी प्रवृत्ति का परिचायक है और उनके सामने श्रीगीता का ज्ञान देने की मनाही तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी की है।

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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