Tag Archives: ज्ञान

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-प्रभाव बढ़ने के साथ शत्रु भी बढ़ते हैं (kautilya ka arthshastra-prabhav aur shatru)


न जातु गच्छेद्धिश्वासे सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान।
अद्रोहसमयं कृत्यां वृत्रमिन्द्रः पुरात्त्वद्यीत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अगर किसी कारणवश किसी से संधि भी की जाये तो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ‘मैं वैर नहीं करूंगा’ यह कहकर भी इन्द्र ने वृत्रासुर को मार डाला था।
विकारं याति पुत्रो हि राज्यान्नीचः पिता तथा।
तल्लोकवृत्तांन्नृपतेरन्यद्वृत्नं प्रचक्षते।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस प्रकार के व्यवहार से पुत्र तथा पिता नीच हो जाता है राजा का ऐसा व्यवहार लोक व्यवहार से भिन्न है। 
ज्यायांसं सिंहः साहसं यथं मध्नाति दन्तिनः।
तस्मार्तिह इवोदग्रमात्मानं वीक्ष्ण सम्पतेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
शक्तिशाली सेना को साथ लिए शत्रु को युद्ध में मारने पर राजा का प्रभाव बढ़ता है। इसी प्रताप के कारण सभी जगह उसके दूसरे शत्रु भी पैदा होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जीवन अद्भुत है और रहस्यमय भी। मनुष्य को अन्य जीवों से अधिक बुद्धि वरदान में मिली है और वही उसकी सबसे शत्रु और मित्र भी है। जहां पशु पक्षी तथा अन्य जीव मनुष्य के एक बार मित्र हो जाते हैं तो फिर शत्रुता नहीं करते मगर स्वयं मनुष्य ही एक विश्वसनीय जीव नहीं है। वह परिस्थितियों के अनुसार अपनी वफादारी बदलता रहता है। अतः यह कहना कठिन है कि कोई मित्र अपने संकट निवारण या स्वार्थ सिद्धि का अवसर आने पर विश्वासघात नहीं करेगा। ऐसे में किसी शत्रु से संधि हो या मित्र से नियमित व्यवहार की पक्रिया उसमें कभी स्थाई विश्वास की अपेक्षा नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा एक बात यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे के प्रति कठोरता या हिंसा का व्यवहार न करें। अनेक बार मनुष्य अपने को प्रभावशाली सिद्ध करने के लिये अपने से हीन प्राणी पर अनाचार करता है या फिर हमला कर उसे मार डालता है। इससे अन्य मनुष्य डर अवश्य जाते हैं पर मन ही प्रभावशाली आदमी के प्रति शत्रुता का भाव भी पाल लेते हैं। समय आने पर प्रभावशाली आदमी जब संकट में फंसता है तो वह उनका मन प्रसन्न हो जाता है। इसलिये जहां तक हो सके क्रूर तथा हिंसक व्यवहार से बचना चाहिए।
————-

संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

मनुस्मृति-भोजन के लिये जाति या गौत्र के नाम का उपयोग उचित नहीं (bhojan prapt karne ke liye-manu smriti in hindi)


उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः।
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नांदिदायिजः।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार जो निर्बुद्धि मनुष्य अच्छे खाने की लालच में दूसरे स्थान पर जाकर आतिथ्य सत्कार पाने का प्रयास करता है वह अगले जन्म में अन्न खिलाने वाले मनुष्यों के घर में पशु का रूप धारण कर रहता है।
न भोजनार्थ स्वे विप्र कुलगोत्रे निवेदयेत्।
भोजनार्थ हि ते शंसन्न्वान्ताशीत्युच्यते बुधैः।।
हिन्दी में भावार्थ-
किसी भी ज्ञानी आदमी को कहीं से खाना प्राप्त करने के लिये अपने कुल या जाति की सहायता नहीं लेना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति वान्ताशी यानि उल्टी किए गऐ भोजन को खाने वाला माना जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की जीभ स्वाद के लालायित रहती है। जो ज्ञानी लोग भोजन को केवल पेट भरने के लिये मानते हैं वह तो हर प्रकार के भोजन में संतुष्ट हो जाते हैं पर पेट भरना ही जीवन मानते हैं वह अच्छे खाने के लिये इधर उधर मुंह मारते हैं। जीवन के लिये भोजन आवश्यक है पर कुछ लोग तो भोजन को ही जीवन मानकर उसके पीछे फिरते हैं। ऐसे लोग हमेशा भूखे रहते हैं और अपने घर के खाने को विष समझकर इधर उधर ताकते रहते हैं। एसे लोगों की बुद्धि अत्यंत निकृष्ट होती है।
भोजन हमें इस उद्देश्य से ग्रहण करना चाहिये कि उससे हमारे शरीर को नियमित ऊर्जा मिलती रहे। भोजन में ऐसे पदार्थ ग्रहण करना चाहिए जो भले ही स्वादिष्ट न हों पर सुपाच्य होना चाहिए। जीभ के स्वाद के चक्कर में अज्ञानी लोग ऐसे पदार्थ ग्रहण करते हैं जो पेट के लिए हानिकारक हैं। आजकल हम देख भी रहे है कि स्वादिष्ट पदार्थों के सेवन से बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है। इसलिये सुपाच्य पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कर ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।
उसी तरह भोजन प्राप्त करने के लिऐ कभी अपने कुल या गौत्र का नहीं लेकर सदाशयी गृहस्थ की सद्भावना पर ही निर्भर रहना चाहिए। जो लोग अपने भोजन के लिये कुल या जाति का आसरा लेते हैं वह ऐसे ही होते हैं जैसे कि उल्टी का भोजन करने वाले पशु होते हैं।
——————–

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

मनु स्मृति-गंदे स्थानों पर पैदा होने वाले पदार्थ खाने से बुद्धि भ्रष्ट होती है (bhojan aur buddhi-manu smriti)


लशुनं, गुंजनं चैव पलाण्डूंु कचकानि च।
अभ्याक्षाणि द्विजातीनामेध्यप्रवानि।
हिन्दी में भावार्थ-
लहसून, शलजम, प्याज, कुकरमुत्ता तथा अन्य ऐसे खाद्य पदार्थ जो गंदे स्थानों पर पैदा होते हैं, उनका सेवन करने से बुद्धि भृष्ट होती है। अतः इनके प्रयोग से बचना चाहिए।
लोहितान् वृक्षनिर्यासान् वश्चनप्रभवांस्तथा।
शेतुं गव्यं य पीयुषं प्रयत्नेन विवर्जयवेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
लाल रंग वाले पेड़ों का गोंद, वृक्षों में छिद्र करने से निकलने वाला द्रव्य तथा लेस वाले फल तथा हाल ही में बच्चे को जन्म देने वाली गाय के दूध का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे अकाल मृत्यु की संभावना रहती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम यह तो जानते हैं कि ‘स्वस्थ शरीर में ही प्रसन्न मन का निवास होता है’, तो हमें यह भी समझना चाहिए कि शीरर में मौजूद तत्व ही हमारी बुद्धि का संचालन करते हैं। हम पचने योग्य वस्तु का भक्षण करें यह बात स्वीकार्य है पर यह भी याद रखना चाहिये कि उनका बुद्धि पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी देखना चाहिए। अक्सर हम कहते हैं कि हमें यह पच जाता है या वह पच जाता है पर रक्त कणों में सम्मिलित उन खाद्य पदार्थों से आये जीवाणु किस मानसिकता के हैं यह भी देखना ठीक है।
देखा जाये तो मांस खाने से भी कोई मर नहीं जाता और लोग उसे पचा भी लेते हैं पर उससे आए विषाणु किस तरह मन को विकृत करते हैं यह उन लोगों की मानसिकता देखकर समझा जाता है जो इसका सेवन करते हैं। शराब तथा अन्य व्यसन करने वाले भी सभी कोई तत्काल नहीं मर जाते पर धीरे धीरे उनका दिमागी संतुलन बिगड़ने लगता है और उसका दुष्प्रभाव उनके जीवन में देखने को मिलता है।
प्याज और लहसुन को स्वास्थय के लिये अच्छा मानाा जाता है पर उनसे निर्मित होने वाली मानसिकता विकृत होती है शायद यही कारण है कि अनेक लोग इनके सेवन से बचते हैं। उसी तरह मांस खाना भी बहुत बुरा जाता है। वैसे मांस खाने वाले सभी उसे पचा लेते हैं पर प्रश्न यह है कि उसके साथ आये  विषैले विषाणु जो रक्त में घुलकर कलुषित मनुष्य की मानसिकता का निर्माण करते हैं उनका अध्ययन अभी तक नहीं किया गया है।
श्री मद्भागवत गीता में कहा गया है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते है।’ उसी तरह यह भी एक महावत है कि ‘जैसा खायें अन्न वैसा हो जाये मन’। अन्न खाने से आशय केवल उसके अच्छे या बुरे होने सा नहीं है बल्कि वह किस कमाई से खरीदा गया और कहां पैदा हो यह भी महत्वपूर्ण है। श्री मद भागवत गीता में भोजन के तीन प्रकार-सात्विक, राजसी तथा तामसी-बताये गये हैं। उनका अर्थ और भाव समझ कर खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

————
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

पतंजलि योग साहित्य-निर्विचार समाधि से बुद्धि ऋतंभरा होती (patanjali yoga sahitya-nirvichar samadhi)


पतंजलि योग सूत्र एक संपूर्ण विज्ञान है। जिसमें अनेक श्लोक हैं और उनका अर्थ बहुत छोटा लगता है पर उनका प्रभाव अत्यंत व्यापक है। सच तो यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान अत्यंत संक्षिप्त होता है पर अगर उनके बताये मार्ग पर चला जाये तो जीवन सहज हो जाता है।
निर्विचारवैशारद्योऽध्यात्मप्रसादः।।
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा।।
हिन्दी में भावार्थ-
निर्विचार समाधि अत्यंत निर्मल होने पर अध्यात्मप्रसाद प्राप्त होता है। उस समय बुद्धि ऋतंभरा अर्थात किसी वस्तु के सत्य स्वरूप को ग्रहण करने वाली होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जाग्रत हो या निद्रा में उसके अंदर विचारों का क्रम चलता रहता है। मस्तिष्क का एक भाग दिन में सक्रिय रहता है जो रात में सुप्तावस्था को प्राप्त होता है। मस्तिष्क के दूसरे भाग से मनुष्य दिन में काम नहीं लेता पर वह रात को स्वप्न देखता है। वैज्ञानिक तथ्य तो यह है कि मनुष्य अपने मस्तिष्क का केवल पांच प्रतिशत भाग ही उपयोग करता है भले ही उसकी सक्रियता अधिक दिखती है।
कहने का मतलब है कि मस्तिष्क कभी विराम नहीं करता। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अगर रात के स्वप्न अगर सुबह याद रहें तो इसका मतलब यह है कि आप ने पूरी तरह से निद्रा का सुख प्राप्त नहीं किया।
सच बात तो यह है कि अगर कोई रात को सपना आये तो सुबह उसे याद करने का प्रयास तक नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे मस्तिष्क में अनावश्यक तनाव होता है। इससे बचने का एक ही उपाय है कि समय मिलने पर ध्यान लगाया जाये जिसकी चरम परिणति निर्विचार समाधि के रूप में होती है। जिस तरह शरीर में भोजन आदि ग्रहण किये पदार्थ योगसन से पूरी तरह बाहर विसर्जित किये जाते हैं उसी तरह समाधि से मस्तिष्क में व्याप्त चिंताओं का निराकरण किया जा सकता है। पुताई के लिये जिस तरह सारे घर का सामान बाहर निकालना आवश्यक है उसी तरह मस्तिष्क से विचारों का कचड़ा निकालने के लिये ध्यान लगाना जरूरी है।
जब ध्यान लगाते हैं तब मस्तिष्क में विचारों का क्रम चलता है पर इसकी परवाह न करते हुए अपनी दृष्टि भृकुटि पर ही रखना चाहिए। धीरे धीरे स्वतः लगने लगेगा कि मस्तिष्क में विचारों का क्रम थमता जा रहा है। जब ध्यान में विचारशून्यता की स्थिति उत्पन्न हो तब समझना चाहिये कि मस्तिष्क से विकार निकाल लिये। कई लोगों को यह मजाक लगता हो पर जिन लोगों ने इसका अनुभव किया है वह इसे समझते हैं और ज्ञानी माने जाते हैं। दूसरी बात यह है कि मस्तिष्क में कर्मकांडों का बोझा लिये इंसान इतना अभ्यस्त हो जाता है कि वह उससे निवृत होने का सुख जानता ही नहीं है। मगर जो लोग ध्यान के निर्विचार समाधि से अध्यात्म प्रसाद प्राप्त कर लेते हैं वह जानते हैं कि सच्चा सुख क्या होता है।

————————–
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

मनुस्मृति-प्राणायाम करने से पाप तथा विकार नष्ट होते हैं (pranayam anivarya-hindu dharma sandesh)


प्राणायमाः ब्राहम्ण त्रयोऽपि विधिवत्कृताः।
व्याहृति प्रणवैर्युक्ताः विज्ञेयं परमं तपः।।
हिन्दी में भावार्थ-
किसी साधक द्वारा ओऽम तथा व्याहृति के साथ विधि के अनुसार किए गए तीन प्राणायामों को भी उसका तप ही मानना चाहिए।
दह्यान्ते ध्यायमानानां धालूनां हि यथा भलाः।
तथेन्द्रियाणां दह्यान्ते दोषाः प्राणस्य निग्राहत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अग्नि में सोना चादी, तथा अन्य धातुऐं डालने से जिस प्रकार उनकी अशुद्धता दूर होती है उसी प्राणायाम करने से इंद्रियों के सारे पाप तथा विकार नष्ट होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-विश्व में आर्थिक उदारीकरण तथा औद्योगिकीरण के कारण प्राकृतिक पर्यावरण बिगड़ने के कारण मनुष्य की मनस्थिति भी बिगड़ी है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में मनोरोगियों की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक है। कई लोगों को तो यह आभास ही नहीं है कि वह मनोरोगी है। हममें से भी अनेक लोगों को दूसरे के मनोरोगी होने का अहसास नहीं होता क्योंकि स्वयं हमें अपने बारे में ही इसका ज्ञान नहीं है। इसके अलावा कंप्यूटर, मोबाईल तथा पेट्रोल चालित वाहनों के उपयोग से हमारे शरीर के स्वास्थ्य पर जो बुरा असर पड़ने से दिमागी संतुलन बिगड़ता है यह तो सभी जानते हैं। इधर हम यह भी देख सकते हैं कि चिकित्सालयों में मरीजों की भीड़ लगी रहती है। कहने का अभिप्राय यह है कि आधुनिक साधनों की उपलब्धता ने रोग बढ़ाये हैं पर उसका इलाज हमारे पास नहीं है।
इधर हम यह भी देख सकते हैं कि विश्व में भारतीय योग साधना का प्रचार बढ़ रहा है। इसका कारण यह है कि योगासन तथा प्राणायाम से शरीर के विकार निकल जाते हैं। सच बात तो यह है कि प्राणायाम के मुकाबले इस धरती पर किसी भी रोग का कोई इलाज नहीं है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि प्राणायाम करने पर यह आभास हो जाता है कि इस धरती पर तो किसी रोग की कोई दवा ही नहीं है क्योंकि प्राणायाम करने से जो तन और मन में स्फूर्ति आती है उसका अभ्यास करने पर ही पता चलता है। अतः तीक्ष्ण बुद्धि तथा शारीरिक बल बनाये रखने के लिये प्राणायाम करना एक अनिवार्य आवश्यकता है। कम से कम आज विषैले वातावरण का सामना करने के लिये इससे बेहतर और कोई साधन नज़र नहीं आता।
————

संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
http://teradipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

भर्तृहरि शतक-अल्पज्ञानियों के स्वर्ग पाने की इच्छा


उन्मतत्तप्रेमसंरम्भादारभन्ते यदंगनाः।
तत्र प्रत्यूहमाधातुं ब्रह्मापि खलु कातरः।
हिन्दी में भावार्थ-
प्रेम में उन्मत होकर युवतियां अपने प्रियतम को पाने के लिये कुछ भी करने लगती हैं। उनके इस कार्य को रोकने का ब्रह्मा भी सामर्थ्य नहीं रखता।
स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीपण्डितो युवतीः।
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः।।
हिन्दी में भावार्थ-
शास्त्रों का अध्ययन करने वाले कुछ अल्पज्ञानी विद्वान व्यर्थ ही स्त्रियों की निंदा करते हुए लोगों को धोखा देते हैंे क्योंकि तपस्या तथा साधना के फलस्वरूप जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है उसमें भी तो अप्सराओं के साथ रमण करने का सुख मिलने की बात कही जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-विश्व के अनेक धर्मों की बड़ी बड़ी किताबें लिखी गयी हैं। उन सभी को पढ़ना कठिन है, पर कोई एक भी पढ़ी जाये तो उसमें तमाम तरह की विसंगतियां नज़र आती है। अधिकतर धार्मिक पुस्तकों के रचयिता पुरुष हैं इसलिये स्त्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये विशेष रूप से कुछ कुछ लिखा गया है। यह शोध का विषय है कि आखिर सारे धर्म ही स्त्रियों पर नियंत्रण की बात क्यों करते हैं पुरुष को तो एक देवता मानकर प्रस्तुत किया जाता है। सच बात तो यह है कि अगर पुरुष देवता नहंी है तो नारी भी कोई देवी नहीं है। हर मनुष्य परिस्थतियों, संस्कारों और व्यक्तिगत बाध्यताओं के चलते अपना सामाजिक व्यवहार करता है। अब यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे प्रेरणा कैसी मिलती है। अगर प्रेरणास्त्रोत बुरा है तो वह भी बुरा ही करेगा अगर अच्छा है तो वह अच्छे काम में लिप्त हो जायेगा।
दूसरी जो सबसे बड़ी अहम बात है वह यह कि हर पुरुष और स्त्री का व्यवहार तय करने में उसकी आयु का बहुत योगदान होता है। बाल्यकाल तो अल्लहड़पन में बीत जाता है। उसके बाद युवावस्था में स्त्री पुरुष दोनों का मन नयी दुनियां को देखने के लिये लालायित होता है। विपरीत लिंग का आकर्षण उनको जकड़ लेता है। ऐसे में उन पर जो नियंत्रण की बात करते हैं वह या तो बूढ़े हो चुके होते हैं या फिर जिनका जीवन असाध्य कष्टों के बीच गुजर रहा होता है। कभी कभी तो यह लगता है कि दुनियां के अनेक धर्म ग्रंथ बूढ़े लोगों द्वारा ही लिखे या लिखवाये गये हैं क्योंकि उसमें औरतों पर ही नियंत्रण की बात की जाती है पुरुष को तो स्वाभाविक रूप से आत्मनिंयत्रित माना जाता हैं स्त्रियों के लिये मुंह ढंकने, पिता या भाई के साथ ही घर के बाहर निकलने तथा ऊंची आवाज में न बोलने जैसी बातें कहीं जाती हैं। कभी कभी तो लगता है कि युवतियों की युवावस्था अनेक धर्म लेखकों और विद्वानों के बहुत बुरी लगती है। इसलिये अतार्किक और अव्यवाहारिक बातें लिखते हैं। स्त्री हो या पुरुष युवावस्था में स्वाभाविक रूप से हर जीव अनिंयत्रित होता है-मनुष्य ही नहीं पशु पक्षियों में भी काम वासना की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से देखी जाती है। इस पर युवा स्त्रियों पर नियंत्रण की बात तो व्यर्थ ही लगती है क्योंकि अपने प्रियतम को पाने के लिये जो वह करती हैं उसे रोकने का सामर्थ्य तो विधाता भी नहीं रखता। अलबत्ता सभ्य, कुलीन, शिक्षित तथा बुद्धिमान लड़कियां स्वयं पर नियंत्रण रखती हैं इसलिये ही समाज में अभी तक नैतिकता का आधार बना हुआ है। ऐसी लड़कियों को धार्मिक शिक्षक न भी समझायें तो भी वह मर्यादा में रहती हैं पर जो भटकने पर आमादा है उनको रोकना किसी के लिये संभव नहीं है। कम से कम भर्तृहरि महाराज की समझाइश के अनुसार तो स्त्रियों पर सामाजिक नियंत्रण की बात तो करना ही नहीं चाहिए।
——-

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जुआ या सट्टा घृणित कृत्य (gambling is bed work-hindi sandesh)


प्रच्छन्नं वा प्रकाशं वा तन्निषेवेत यो नरः।
तस्य दण्डविकल्पः स्वाद्येेष्ठं नृपतेस्तथा।।
हिन्दी में भावार्थ-
अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जुआ खेलने वाले लोगों को राज्य द्वारा दंड दिया जाना चाहिये।
द्युतमेतत्पुराकल्ये दुष्टं वैरकरं महत्।
तस्माद्द्यूतं न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान्।।
द्यूत वह घृणित कृत्य है जिसमें खेलने वालों के बीच आपस वैमनस्य पैदा होता है। अतः बुद्धिमान पुरुष को अपने मनोरंजन के लिए जुआ में भाग नहीं लेना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में अनेक ऐसे परिवार हैं जो जुआ या सट्टे के कारण बर्बाद हो गये हैं। अनेक ऐसे परिवार हैं जिनके पुरखे सात पीढ़ियों के लिये कमा गये पर उनकी दूसरी या तीसरी पीढ़ी ने पूरी कमाई सट्टे और जुआ में बर्बाद कर डाले हैं। जुआ जहां प्रत्यक्ष रूप से खेला जाता है वही सट्टा अप्रत्यक्ष रूप से जुआ का ही रूप है। आजकल तो हर बात पर सट्टा लगता है। चुनाव, क्रिकेट, फुटबाल, टेनिस तथा अन्य ऐसे क्षेत्र जहां अनिश्चताओं का खेल है वहां अब सट्टा खेला जाता है। नवधनाढ्य परिवारों के युवक युवतियां इसमें अपना धन बर्बाद करते हैं। जुआ या सट्टे का कृत्य इतना घृणित है कि समझदार लोग जुआ खेलने वालों पर कभी यकीन ही नहीं करते बल्कि उनसे घृण करते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि जुआ या सट्टा खेलने वालें मनोविकारों का शिकार हो जाते हैं। स्थिति यह हो जाती है कि उनकी जेबे खाली हो जाती हैं। कहंी से कुछ पैसा मिलता है तो जुआ और सट्टा खेलने वाले उसी में लगा जाते हैं। वह अपने आत्मीय जनों को भी ठगने लगते हैं।
जुआ और सट्टा खेलने वाले बाहरी रूप से भले ही सामाजिक संबंध निभाने वाले दिखते हों पर उनका अंतकरण केवल अपने व्यसन के प्रति ही आकर्षित रहता है। अपने ही परिजनों, मित्रों और परिचतों से वह धन ऐंठकर इसमें बर्बाद करते हैं। अतः बुद्धिमान लोगों को चाहिए कि वह कभी जुआ और सट्टा न खेलें। इतना ही नहीं उनके जो अपने लोग इस व्यसन में रत हैं उन पर कभी न यकीन करें न ही उनसे आत्मीय संबंध कायम करें।

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-कीर्तन से कुमति दूर होती है (kirtan-shri guru granth sahib)


‘उदम करहि अनेक हरि नाम न गवाही।
भरमहि जोनि असंख पर जन्महि आवही।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार कोई मनुष्य चाहे कितना भी उद्यम करे पर अगर परमात्मा के नाम का स्मरण नहीं करता तो उसे मुक्ति नहीं मिल सकती और वह भटकता रहता है।
‘जो जो कथै सुने हरि कीरतन ता की दुरमति नासु।
सगल मनोरथ पावै नानक पूरन हौवे आसु।।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्रीगुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जो मनुष्य कीर्तन गाते और सुनते हैं उनकी कुमति नष्ट होती है तथा सभी प्रकार की मनोकामनायें पूरी होती हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्री गुरुग्रंथ साहिब का हमारे देश में बहुत अध्यात्मिक महत्व है। यह किसी धर्म विशेष की पुस्तक नहीं है क्योंकि इसमें मनुष्य को सहजता सिखाने वाले संदेश मौजूद हैं और इसे पढ़कर सभी लोग सीख सकते हैं। आज के समय में अनेक बुद्धिमान लोगों को सत्संग और कीर्तन एक ढोंग लगते हैं तो कुछ लोग इनको मनोरंजन का साधन मानते है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि जब आज आधुनिक मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं तो फिर क्यों इस पुराने प्रकार के चक्कर में पड़ा जाये।
यह अज्ञान से उपजा भ्रम हैं। सत्संग और कीर्तन में शामिल होने का मतलब है कि कुछ देर अपने ध्यान को इस संसार से हटकार निष्काम प्रवृत्तियों की तरफ लगाना। जबकि आधुनिक मनोरंजन प्रसारणों में इसी संसार की वह बातें होती हैं जिनके साथ हम पूरा दिन जुड़े रहते हैं। मूर्ति पूजा की अनेक आलोचक भले ही खिल्ली उड़ाते हैं पर उनको इस बात का पता नहीं कि यह ध्यान को इस संसार से हटकार उसमें शुद्धता लाने का यह एक महत्वपूर्ण साधन है। जिस तरह कोई गाड़ी हम धुलवाने के लिये गैरेज भेजते हैं उसी तरह अपने मन और बुद्धि को कामनाओं से हटाकर पूजा, कीर्तन और सत्संग में शामिल होकर एक तरह से अपने मन और बुद्धि को निष्काम गैरेज में शुद्ध किया जाता है।
गुरुनानक जी ने इस देश में फैले अंधविश्वास को दूर करने का संदेश दिया था। अगर उनके बताये मार्ग पर चला जाये तो हमारा देश स्वर्ग बन सकता है। कामनाओं की पूर्ति के लिये हम सदैव लगे रहते हैं पर इससे केवल हमारे पास भौतिक वैभव की प्रचुरता हो सकती है पर मन को शांति नहीं मिल सकती। अतः यह जरूरी है कि ध्यान, योग तथा भक्ति कर अपने अंदर शुद्धता लायी जाये।

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

संत कबीर वाणी-परमात्मा के अलावा किसी दूसरे को स्वामी मानना कष्टप्रद


राम नाम जाना नहीं, जमा न अजपा जाप।
स्वामिपना माथे पड़ा, कोइ पुरबले पाप।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं परमात्मा के नाम महत्व और लाभ जाने बिना जपना और न जपना बराबर है। अपने अंदर अहंकार होने पर हर इंसान अनेक तरह के पाप कर बैठता है।
कबीर स्वामी कोय नहिं, स्वामी सिरजन हार।
स्वामी ह्ये करि बैठही, बहुत सहेगा मार।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी का कहना है कि इस संसार में कोई किसी का स्वामी नहीं है बल्कि सबका रचयिता और पालनहार परमात्मा ही सभी का स्वामी है। अगर यहां किसी को स्वामी माना तो सिवाय कष्ट और मार झेलने के कुछ नहीं मिलता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पाश्चात्य शैक्षणिक प्रणाली ने इस देश के लोगों की मानसिकता ही गुलाम बना दी दी है और यही कारण है कि चाटुकारों की एक बहुत बड़ी फौज दिखाई देती है जो शिखर पुरुषों की जीहुजूरी में अपना जीवन गुजार देती है। यहां आदमी परमात्मा की बजाय इन शिखर पुरुषों को स्वामी मानकर पूजने लगता है। संभव है कुछ चाटुकारों को कुछ उपलिब्धयां मिलती हों पर सभी के लिये ऐसा करना सौभाग्यपूर्ण नहीं होता।
धन, पद, और बाहुबल की वजह से जिन लोगों को स्वामित्व मिलता है वह किसी दूसरे को स्वामी योग्य बनने नहीं देते। उनकी चाहे कितनी भी चाटुकारिता करें वह अपने स्वार्थ की पूर्ति से कम ही दाम चुकाते हैं। कभी कभी तो बहुत निर्दयता से व्यवहार करने लगते हैं। ऐसे में अच्छा यही है कि बजाय यहां किसी को स्वामी मानन के उस परमात्मा को ही सर्वस्व माने जो सबके जीवन सृष्टा और कर्म का दृष्टा होने के कारण वास्तव में स्वामित्व धारण किये हुए है।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

वेदांत दर्शन-यज्ञादि में विविधता को विरोध न समझें (vedant darshan in hindi)


विरोधः कर्मणीति चैन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात्।।

हिन्दी में भावार्थ-यदि देवताओं की पूजा, यज्ञादि कर्म में विरोध आता है तो उसे ठीक नहीं मान लेना चाहिये क्योंकि उनके द्वारा एक ही समय में अनेक रूप धारण करना संभव है-ऐसा देखा गया है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-
हमारे देश में सांस्कृतिक, सांस्कारिक, तथा सामाजिक विविधता है और यही विश्व में हमारी पहचान भी है।  भगवत्स्वरूप को हर जगह विविध रूप में स्थापित किया जाता है और देवों की पूजा में भी भिन्नता दिखाई देती है।  उत्तर से दक्षिण तक विवाह आदि घरेलू कार्यों के अवसर पर यह विविधता दिखाई देती है।  इस विविधता को विरोध का प्रमाण नहीं समझना चाहिये।
इसके अलावा हमारे यहां, भगवान विष्णु, ब्रह्मा, तथा शिव को अपने अपने ढंग से अनेक भक्त अपना इष्ट मानते हैं।  भगवान विष्णु के तो 14 अवतार माने जाते हैं।  इन विविध रूपों के अनुसार भी अनेक क्षेत्रों में स्थापित प्रतिमाओं में भी विविधता देखी जाती है।  इसका अन्य धर्मावलंबी मजाक बनाते हैं पर यह उनके अज्ञान का प्रमाण है।  भारतीय अध्यत्मिक रहस्यों को समझे बिना भारत के ही अनेक लोग भी विपरीत टिप्पणियां करते हैं।  दरअसल मुख्य विषय भक्ति है और विभिन्न स्वरूपों की प्रतिमायें पूजने का आशय आकार से निरंकार की तरफ जाना होता है।  अगर हम देश की सीमाओं से उठकर देखें तो यहां से बाहर स्थापित स्वरूप भी इसी तरह विरोध भाव से परे हैं और यही कारण है कि भारतीय अध्यात्मिक पुरुषों ने कभी किसी दूसरे धर्म पर आक्षेप न कर उनको व्यापक दायरे में मान्यता दी। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी कभी किसी दूसरे के धर्म को निशाना नहीं बनाते।
मुख्य बात यह है कि अपने धर्म पर दृढ़ता से स्थित रहते हुए अपना कर्म करना चाहिये और जिस रूप में नारायण का मानते हैं उसका ही स्मरण करना चाहिये। चाहे कैसा भी समय हो उसके स्वरूप में बदलाव न करने में ही हितकर नहीं है-उल्टे अविश्वास, दबाव या लालच में आकर ऐसा करना भारी मानसिक कष्ट का कारण होता है।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

मनुस्मृति-दुस्साहसी की उपेक्षा करने वाले जल्दी नष्ट हो जाते हैं


साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः।
सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
यदि राज्य प्रमुख  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा या उसे अनदेखा करता है तो उसका अतिशीघ्र विनाश हो जाता है क्योंकि तब प्रजा में उसके विद्वेष की भावना पैदा होती है।
न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वाधनागमात्।
समुत्सुजोत्साहसिकान्सर्वभुतभयावहान्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह स्नेह या लालच मिलने पर भी प्रजा में भय उत्पन्न करने वाले अपराधियों को क्षमा न करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्षमा जीवन का मूलमंत्र है पर एक परिवार, समाज और राज्य के मुखिया को कहीं न कहीं अपने आश्रितों को बचाने के लिये दंड का उपयोग करना ही पड़ता है।  अगर वह इस दंड का उपयोग नहीं करेगा तो उसके आश्रित या प्रजाजन उसे कायर मानकर घृणा करने लगते हैं।  कहा जाता है कि योगियों को क्षमाक्षील होना चाहिये पर हमारी प्राचीन कथायें इस बात का प्रमाण हैं कि समय आने पर वही कोमल भाव वाले योगी अपने भक्तों और शिष्यों के लिये उग्र रूप धारण करते हुए अपराधियों को दंडित करते हैं। 

जिस परिवार, समाज या राज्य का मुखिया  अपराधियों और हिंसक तत्वों को क्षमा करता है या उनकी अनदेखी में भलाई समझता है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है। उसके समूह या राज्य के विरोधी उसके आश्रित या प्रजा को लक्ष्य नहीं करते बल्कि उनका लक्ष्य मुखिया ही होता है।  फिर उसके विरोधी आंतरिक विरोधियों को सबसे पहले मैदान में उतारते हैं इसलिये समझदार मुखिया को चाहिये कि वह अंतर्विरोधियों का समूल नाश करे।
ऐसे आंतरिक शत्रु जो प्रजा में भय करते हुए विचरते हैं उनकी अनदेखी करना खतरे से खाली नहीं है।  जिस परिवार, समाज, या राज्य का प्रमुख अपने आंतरिक खतरों की अनदेखी करता है वह कायर मान लिया जाता है और उसके आश्रित प्रजाजन ही उसका सम्मान नहीं करते। अहिंसा का सिद्धात केवल अपने निजी जीवन में लागू किया जा सकता है पर जहां सार्वजनिक विषय हो वहां दंड का उपयोग करना चाहिये अन्यथा परिवार, समाज तथा राज्य में असंतोष का परिणाम मुखिया को भोगना पड़ता है।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

विदुर नीति-शक्तिहीन होने पर क्रोध न करें (shakti aur krodh-hindi dharam sandesh)


द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।
गृहस्थश्चय निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर जी के अनुसार अकर्मयण्य गृहस्थ और तथा सांसरिक बातों में लगा भिक्षुक सन्यासी अपने लिये निश्चित कर्म के विपरीत आचरण करने के कारण शोभा नहीं पाते।
द्वाविमौ कपटीकौ तीक्ष्णी शरीरपरिशोषिणी।
पश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यत्यनीश्वरः।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जो गरीब होकर भी कीमती वस्तु की कामना करता है और शक्तिहीन होने पर भी क्रोध करता है वह अपने शरीर को सुखाने के लिये काम करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर आदमी को अपनी स्थिति के अनुसार ही कदम बढ़ाना ही चाहिये। इसके अलावा अपने नियत कर्म से पृथक होकर अन्य गतिविधि में बिना उद्देश्य ही सक्रिय न हों क्योंकि हर चीज हरेक को शोभा नहीं देती। केवल उन्हीं वस्तुओं के संग्रह की चिंता करना चाहिये जो कि अपने परिवार के लिये आवश्यक हों पर इस बात का ध्यान रखें कि उसके लिये हमारे उसकी प्राप्ति के लिये पास आय का पर्याप्त साधन भी होना चाहिये। आजकल लोग पैसा न होने पर कर्जा लेते हैं और फिर उसे न चुकाने पर चिंता करते हुए अपने शरीर को सुखा डालते हैं। जहां तक मन की बात है तो किसी भी नयी चीज को देखकर उसे पाने के लिये मचलता है तब अपनी बुद्धि इसके लिये काम नहीं करती कि उसकी पूर्ति कैसे होगी?
इसके अलावा कहीं भी किसी भी समय क्रोध करने से बचना चाहिये। खासतौर से वहां जहां अपने से अधिक पदारूढ़, धनवान तथा बाहुबली लोग हों। यह कायरता का नहीं बल्कि सतर्कता बरतने का लक्षण है। मूर्खों को ज्ञान देने, नवधनाढ्य को दान के लिये कहने, पदारूढ़ को विनम्रता के लिये समझाने और बाहुबली को दया के लिये प्रेरित करने के लिये प्रयास में अपना समय व्यर्थ ही करना है। कहीं आपने क्रोध किया तो बहुत जल्दी अपनी शक्तिहीनता का पता भी लग जायेगा। कहने का अभिप्राय यह है कि हमेशा सोच समझकर कदम आगे बढ़ाना चाहिये, ताकि बाद में उसके लिये पछताना न पड़े।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

मनु स्मृति-अपने हृदय को देवता समझें (dil hi bhagvan hai-hindu dharma sandesh)


द्यौर्भूमिरापो हृदयं चंद्रर्काग्नि यमानिलाः।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मख्च वृत्तजाः सर्वदेहिनाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार आकाश, पृथ्वी, पानी, हृदय, चंद्र, सूर्य, अग्नि, यम, वायु, रात संध्या और धर्म सभी प्राणियों के सत् असत् कर्मों को देखते हैं। इनको देवता ही समझना चाहिये।
साक्ष्येऽनृतं वदन्याशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम्।
विवशः शमाजातीस्तरस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
झूठी गवाही देने वाले मनुष्य, वरुण देवता के पाशों से बंधकर सैंकड़ों वर्षों तक जलोदर बीमारियों से ग्रसित जीवन गुजारता है। अतः हमेशा किसी के पक्ष में सच्ची गवाही ही देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्या हम सोचते हैं कि हम कोई भी काम कर रहे हैं तो दूसरा कोई उसे नहीं देख रहा? ऐसी गलती कभी न पालें। इस धरा पर ऐसे कई जीव विचरण कर रहे हैं जिनको हम नहीं देख पाते पर वह हमें देख रहे हैं। दूसरों की छोड़िये अपने अंदर के हृदय को ही कहां देख पाते हैं। यह हृदय भी देवता है पर उसे कहां समझ पाते हैं? वह लालायित रहता है धर्म और परोपकार का कार्य करने के लिये पर मनुष्य मन तो हमेशा अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर विचरण करता है। एक नहीं अनेक बार झूठ बोलते हैं। दूसरों की निंदा करने के लिये प्रवृत्त होने पर उसके लिये ऐसे किस्से गढ़ते हैं कि जो हम स्वयं जानते हैं कि वह सरासर झूठ है। मगर बोलते हैं यह मानते हुए कि कोई देख नहीं रहा है।

ऐसे भ्रम पालकर हम स्वयं को धोखा देते हैं। इस चंद्रमा, सूर्य नारायण, प्रथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के साथ हमारा हृदय देवता सब देख रहा है। समय आने पर यह देवता दंड भी देते हैं। अतः कोई भी अच्छा काम करते हुए इस बात की चिंता नहीं करना चाहिये कि कोई उसे देख नहीं रहा तो क्या सुफल मिलेगा तो बुरा कर्म करते हुए इस बात से लापरवाह भी न हों कि कौन देख रहा है जो सजा मिलेगी?
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

संत कबीर वाणी-परमात्मा के नाम के मतवालों में मद नहीं होता (bhakti aur ahankar-sant kabirdas ke dohe)


राता माता नाम का, मद का माता नांहि।
मद का माता जो फिरै, सौ मतवाला काहि।

संत कबीरदास का कहना है कि जो भक्त परमात्मा का नाम लेता है वह कभी मद में नहीं आता। वह तो भगवान की भक्ति में मतवाला रहकर हर चीज से अंजान हो जाता है। जो मद में चूर है वह भला कहां मतवाला हो सकता है।
राता माता नाम का पीया पे्रम अघाय।
मतवाला दीदार का, मांगे मुक्ति बलाय।।
संत कबीरदास जी का कहना है कि जो भक्त परमात्मा के नाम का अनुरागी है वह उसका रस पीकर तृप्त होता है। उसमें तो केवल भगवान के दर्शन का प्यास होती है, वह मोक्ष प्राप्त करने का विचार भी नहीं करता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कभी कभी तो यह लगता है कि कुछ लोग धर्म का ढोंग करते हैं। वह दूसरों पर प्रभाव जमाने के लिये भक्ति करते हैं। उनके जुबान पर भगवान का नाम आता है और वहीं से बाहर चला जाता है। उनके हृदय में तो केवल माया का वास होता है।
जिनमें भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा होती है वह चुपचाप घर में रहकर या मंदिर में जाकर उसका नाम लेते हुए पूजा या ध्यान करते हैं। अपने यहां हर शहर और मोहल्ले में मंदिर होते हैं जहां करोड़ों लोग चुपचाप जाकर अपनी श्रद्धा के अनुसार परमात्मा का नाम लेते हैं पर कुछ लोग ऐसे हैं जो दिन या वार के हिसाब से तमाम तरह के आयोजन कर यह दिखाते हैं कि वह भगवान के भक्त हैं। भगवान के नाम पर आयोजन करने के लिये वह चंदा लेते हैं। कहीं कहीं तो ऐसे लोग मंदिरों के निर्माण के लिये पैसा भी वसूल करते हैं। सरकारी जमीन पर कब्जा कर धार्मिक स्थान बनाने की परंपरा चल पड़ी है। इसमें सभी धर्मों के लोग शामिल हैं। ऐसे लोगों का भगवान की भक्ति का भाव नहीं होता बल्कि इस तरह वह नाम और धन का अपने लिये संग्रह करते हैं। जिनका भगवान के प्रति अगाध विश्वास है वह चुपचाप रहते हैं। किसी को दिखाने का न तो उनमें मोह होता है न ही विचार आता है। वह तो मतवाले होते हैं और जो दिखावे मेें यकीन करते हैं उनको मद आ जाता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

</strong

चाणक्य नीति-अपने मुख में कटु शब्दों की खेती न करें


यदीच्छसि वशीकर्तंु जगदेकेन कर्मणा।
परापवादसस्येभ्यो गां चरंन्तीं निवारथ।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि यदि कोई मनुष्य अपने किसी एक काम से ही सारी पृथ्वी पर अपना नाम करना चाहता है तो बस दूसरों की निंदा त्याग दे। अपने मूंह में किसी दूसरे के प्रतिकूल लगने वाले शब्दों की खेती करना बंद कर देना चाहिए।

स जीवति गुणा यस्य धर्मः स जीवति।
गुणधर्मविहीनस्य जीवतं निष्प्रयोजनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि वही मनुष्य जीवित माना जाता है जिसमें गुण हों और उसने जीवन में धर्म धारण कर लिया है। गुण और धर्म के बिना मनुष्य का जीवन जीना व्यर्थ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिस मनुष्य में दूसरों को प्रभावित करने वाला गुण नहीं है और न ही उसका अपने स्वार्थ के अलावा कोई धर्म है वह जीवित होेते हुए भी मृतक समान है। अपने और परिवार का पेट तो सभी पालते हैं पर जो परोपकार करे वही सच्चा मनुष्य है।
मनुष्य का सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह स्वयं कोई धर्म या परोपकार किये बिना ही अपने को ज्ञानी और परोपकारी प्रमाणित करना चाहता है। इसके लिये वह दूसरों की निंदा करता है। अक्सर वार्तालाप में अज्ञानी लोग अपने मुख से दूसरे के लिये निंदात्मक शब्द कहकर यह साबित करते हैं कि अमुक दुर्गुण हमारे अंदर नहीं है या दूसरे के मुकाबले हमारे अंदर यह गुण है। देखा जाये तो इस विश्व में अधिकतर झगड़े इसी बात को लेकर होते हैं कि सभी अपने को श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं पर उसके लिये वह कोई सात्विक काम नहीं करना चाहते। ज्ञानी आदमी को किसी की न तो निंदा करना चाहिए न ही किसी में दोष देखना चाहिए। हो रहा है उल्टा! लोग एक दूसरे को नीचा बताते हुए आक्रामक रूप से अपनी श्रेष्ठता साबित करना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि दूसरे के प्रति बुरा सोचना और बोलना अगर लोग कम कर दें तो पूरे विश्व में शांति स्वतः आ जाये।
…………………..

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप


gyan, hindi article, hindi sahitya,

%d bloggers like this: