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पसीने से बड़ा है उनका प्रबंध-तीन व्यंग्य कवितायें


प्रबंध का मतलब उनको केवल
इतना ही समझ में आता है।
परिश्रमी के शरीर से निकले
पसीने का अमृत बना दें
अपने मालिक के लिये
बदले में डालें उस पर विष भरी दृष्टि
और मुफ्त में उसके काम पर गरियायें
हालांकि अवसर आने पर
पसीने का उचित दाम का
नारा लगाना भी उनको खूब आता है।
……………………..
इस देश में कुशल प्रबंधक
उसे ही कहा जाता है
जो मालिक की नजर में चढ़ जाता है
दूसरे के पसीने से सींचे हुए फूलों को
जो न्यौछावर कर दे
अपने मालिक के लिये
वही तरक्की की राह पाता है।
पसीने की बूंदों को भले ही
अमृत कहते हों सभी लोग
पर कुशल प्रबंधक वही कहलाता
जो उसमें शोषण का विष मिलाता है।

…………………….
पसीने का मूल्य
पूरी तरह नहीं चुकाओ
तभी कुशल प्रबंधक कहलाओगे
कुचलोगे नहीं जब तक किसी निरीह को
तब तक वीर नहीं कहलाओगे।
जमाने का उसूल है
अच्छा है या बुरा
करता है जीतने वालों को सलाम
पद दिल भी कोई चीज है
अपने ईमान से भटके तो
जीत कर भी पछताओगे।
……………………….

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शराब पीकर पिटा तो हीरो हो जायेगा -व्यंग्य कविता


पड़ौसन ने कहा उस औरत से
‘तुम्हारा आदमी रात को रोज
शराब पीकर आता है
पर तुम कुछ नहीं कहती
वह आराम से सो जाता है
अरे, उससे कुछ कहा कर
ताकि चार लोग सुन सकें
तो वह सुधर जायेगा
इज्जत खराब होने के डर से
वह शराब पीना भूल जायेगा’

औरत से जवाब दिया
‘जानती हूं, तुम तमाशा देखना चाहती हो
इसलिये उकसाती हो
जब रात को वह पीकर आता है
तो मैं कुछ नहीं कहती
क्योंकि शराबी को अपने मान अपमान की
परवाह नहीं होती
पहले किराये के मकान में
रोज तमाशा होता था
सभी इसका समर्थन करते थे
जब यह मुझसे पिटकर रोता था
अपना इसलिये अब सुबह गुस्सा सुबह उठकर
इसकी पिटाई लगाती हूंं
दिन के उजाले में आवाज नहीं आती
इसलिये तुमको भी नहीं बताती
सुबह इसे अपने अपमान का
इसे कई बार भय सताता है
इसलिये कई बार बिना पिये घर आता है
अगर रात को मचाऊं कोहराम
जमाने भर में हीरो के रूप में हो जायेगा इसका नाम
पिटा हुआ शराबी भी क्यों न हो
जमाने भर को उस पर तरस आता है
क्यों करूं अपना खराब नाम
जमाना तो जज्बात की पतली धारा में ही बह जाता है

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फ्री में विलेन बनाया-हास्य कविता



उदास होकर फंदेबाज घर आया
और बोला
‘दीपक बापू, बहुत मुश्किल हो गयी है
तुम्हारे भतीजे ने मेरे भानजे को
दी गालियां और घूंसा जमाया
वह बिचारा तुम्हारी और मेरी दोस्ती का
लिहाज कर पिटकर घर आया
दुःखी था बहुत तब एक लड़की ने
उसे अपनी कार से बिठाकर अपने घर पहुंचाया
तुम अपने भतीजे को कभी समझा देना
आइंदा ऐसा नहीं करे
फिर मुझे यह न कहना कि
पहले कुछ न बताया’

सुनकर क्रोध में उठ खड़े हुए
और कंप्यूटर बंद कर
अपनी टोपी को पहनने के लिये लहराया
फिर बोले महाकवि दीपक बापू
‘कभी क्या अभी जाते हैं
अपने भाई के घर
सुनाते हैं भतीजे को दस बीस गालियां
भले ही लोग बजायें मुफ्त में तालियां
उसने बिना लिये दिये कैसे तुम्हारे भानजे को दी
गालियां और घूंसा बरसाया
बदल में उसने क्या पाया
वह तो रोज देखता है रीयल्टी शो
कैसे गालियां और घूंसे खाने और
लगाने के लिये लेते हैं रकम
पब्लिक की मिल जाती है गालियां और
घूसे खाने से सिम्पथी
इसलिये पिटने को तैयार होते हैं
छोटे पर्दे के कई महारथी
तुम्हारा भानजा भी भला क्या कम चालाक है
बरसों पढ़ाया है उसे
सीदा क्या वह खाक है
लड़की उसे अपनी कार में बैठाकर लाई
जरूर उसने सलीके से शुरू की होगी लड़ाई
सीदा तो मेरा भतीजा है
जो मुफ्त में लड़की की नजरों में
अपनी इमेज विलेन की बनाई
तुम्हारे भानजे के प्यार की राह
एकदम करीने से सजाई
उस आवारा का हिला तो लग गया
हमारे भतीजा तो अब शहर भर की
लड़कियों के लिये विलेन हो गया
दे रहे हो ताना जबकि
लानी थी साथ मिठाई
जमाना बदल गया है सारा
पीटने वाले की नहीं पिटने वाले पर मरता है
गालियां और घूंसा खाने के लिये आदमी
दोस्त को ही दुश्मन बनने के लिये राजी करता है
यह तो तुम्हारे खानदान ने
हमारे खानदान पर एक तरह से विजय पाई
हमारे भतीजे ने मुफ्त में स्वयं को खलनायक बनाया

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