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पहाड़ से टूटे पत्थर-हिन्दी व्यंग्य कविता


पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
———–
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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करते हास्य कविता की पैनी धार


फंदेबाज आया और बोला
‘दीपक बापू, तुम क्रिकेट जरूर देखा करो
अरे, तुम इस बात की चिंता क्यांे करते हो कि
कौन टीम जीत रही है और कौन हार
तुम तो देखो उसमे नृत्य और गाने जैसे चित्रहार
इसीलिये तो क्रिकेट और फिल्म को मिक्स किया है
खेल भी होगा और साथ में मनोरंजन का भी व्यापार
यह क्या रेडियो पर गाने सुनते हो
और ठोकते हो ब्लाग पर हास्य कविता
तुम्हारे पाठक तो उधर ही है
जहां है क्रिकेट की बहार’’

अपने चश्में और नाक के बीच से
आंखों से झांकते हुए उसे घूरा
और फिर कहैं दीपक बापू
‘तुमने क्रिकेट कितनी खेली होगी
जितनी हमने झेली होगी
अगर उसमें वक्त नहीं खराब लोग नहीं करवाते
तो हम आज प्रेमचंद जैसे कहलाते
बैट किसी के हाथ में खेलता कोई और है
बाल जिसके हाथ में होती
वह फैंकता नजर आता है
विकेट लेता  कोई और है
जब से सुना यह हमने
उतर गया क्रिकेट का नशा
अब तो हास्य कविता में मन है बसा
यह डांस देखने के लिये बहुत चैनल है
फिर क्रिकेट के साथ क्या देखना
दिखा रहे हैं जो लोग
उनका खेल से क्या वास्ता
उनका तो लोगों की जेब पर जोर है
अब नहीं उठा सकते क्रिकेट के मनोरंजन का बोझ
पाठक जब देख रहे हैं क्रिकेट
तो हम ठोक देंगे कोई कविता
मैच देखने के बाद सबकी हालत तो
वैसे ही हो जाती है
जैसे नाचने के बाद मैले पैर
देखकर रोता मोर है
फिर मन बहलाने के लिये हमारे पास तो
अपने पास शब्दों का है बहुत भंडार
लिख-लिखकर होती जा रही  अपनी
हास्य कविता की पैनी धार
……………………………….

कौन जीता कौन हारा-आलेख


हरभजन सिंह को मैच की पचास फीसदी कमीशन काटने के सजा देकर बरी कर दिया गया है और देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे कि कोई कारूँ का खजाना देश के हाथ लग गया है. उनको यह सजा अपशब्द कहने पर दी गयी है. जिस नस्लवाद के आरोप से उनको बरी किया गया है वह वैसे भी भारतीयों पर फिट नहीं बैठता क्योंकि यह गोरों का मुल्क नहीं है-बल्कि इसका पूरा विश्व ही उपहास की दृष्टि से देख रहा था.

अब सवाल यह है कि आस्ट्रेलिया के उस होग को क्यों माफ़ किया गया जिस पर भारतीय खिलाडियों ने गाली देने का आरोप लगाया था? उसे भारतीयों ने क्यों माफ़ किया? क्या उसे सजा दिलवाना जरूरी नहीं था? क्या यह सन्देश विश्व में नहीं गया कि गोरों को गाली देने का अधिकार है पर भारतीयों को नहीं?

बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता की बात और लोगों के गले उतर जाये पर अपने तो नहीं उतरी. कहीं ऐसा तो नहीं नस्लवाद के कथित आरोप को भयानक मानकर यह मान लिया गया कि इससे तो गाली की सजा ही हरभजन सिंह दिलवाकर बरी करवाया जाये. होग ने जो गलियाँ दी थी क्या वह इसलिए इतनी हल्की थी क्योंकि पश्चिम में वह नस्लवाद से कम मानी जातीं है. हरभजन सिंह ने बन्दर शब्द का प्रयोग किया था इसे पश्चिम में नस्लवाद माना जाता है भारत में नहीं. होग ने जो गालिया दीं होंगी उन्हें भारत में बहुत गंभीर माना जाता है. अगर यहाँ आप किसी के लिए बन्दर लिख दें तो वह हंसकर चुप हो जायेगा और कोई गाली दें तो पलटकर जवाव देगा. मतलब यह है कि इस मामले में तो हमें गोरे ही एक बार विजेता नजर आ रहे हैं.

अब इस देश का कुछ हाल ऐसा ही है कि आस्कर अवार्ड में भारत की फिल्म पीटकर आती है तो भी उसे हाथोहाथ उठा लिया जाता है. कुछ ऐसा ही ऐसा लग रहा है.

क्रिकेट और गंभीर अफरातफरी


आखिर वहाँ हुआ क्या होगा? लोग भूल गए पर उन्हें फिर याद दिलाया गया कि झगडे करने वाले खिलाडी ने माफ़ी मांग ली है। सवाल यह है की क्या वाकई झगडा हुआ होगा या फिर यह कोई नही परंपरा क्रिकेट में शुरू हुई है जैसे हिन्दी फिल्मों के हीरो हीरोइन अपनी फिल्म हिट करने के लिए ”अफैयर’ का प्रचार मीडिया में कराते हैं, और अब क्रिकेट के खिलाड़ी भी मैदान में कुछ ऐसी हरकतें करते हैं जो कि दर्शकों को नागवार गुजरें और अखबारों और टीवी पर सुर्खियाँ बने। जिस तरह फिल्म के रिलीज होने के कुछ समय बाद हीरो-हीरोइन अपने अफैयर का खंडन करते हैं या किसी दूसरे से अफैयर का प्रचार करते हैं, वैसे ही खिलाड़ी भी मैच या सीरिज ख़त्म होते ही सारी तोहमत मीडिया पर जड़ देते हैं। फर्क यह है कि फिल्मी कलाकारों के साथ किसी देश के जजबात जुडे नहीं होते इसलिए वह अपने आप को भलेमानस साबित करने के लिए माफ़ी-वाफी जैसे चक्कर में नहीं पड़ते जबकि खिलाडियों को अपने देश के मान-सम्मान के साथ अपने छबि और आई.सी.सी.आई के डंडे का भय भी होता है सो कभी सफाई कभी माफ़ी से काम चलाना होता है।

अपने कप्तान ने कहा-‘अगर ऐसा नहीं होता तो आप लोगों को मजा कैसे आता है। शांति से क्रिकेट हो तो भी मजा नहीं आता।’ अगर अपने देश का कप्तान ऐसा कहे तो कोई टेंशन नहीं होना चाहिए पर फिर उसने मागी क्यों मांगी? अब सवाल आता है कि आखिर उस दिन हुआ क्या जो कि टीवी और अखबारों में वह वाद-विवाद सुर्खियों में आ गया।
ज़रा दिमाग में जोर डाला। मैंने पहले अखबार में पढा था कि जब बिना आवाज वाली फिल्में बनतीं थीं तब कलाकार शुटिंग में वह डायलाग नहीं बोलते थे जो वास्तव में लिख कर फिल्म पर आते थे, बल्कि आपस में हँसी मजाक करते हुए शुटिंग करते थे क्योंकि दर्शकों के सामने तो वह आता तो था नहीं । यह रिवाज कुछ समय तक सवाक फिल्मों में भी चला क्योंकि आवाज की रिकार्डिंग बाद में होती थी। अब उस दिन क्या हुआ होगा, इस पर विचार करते हैं।

बल्लेबाज गेंद को पुश करने के बाद दूसरे सिरे पर जाना चाहता था गेंदबाज ने अपने कुहनी अडा दी। बल्लेबाज रुक गया और बोला होगा-”क्या कर रहे हो यार?”
गेंदबाज ने कहा होगा-”यार, तुम्हारे यहाँ के कुछ मीडिया वाले कह रहे हैं कि सब कुछ शांति से चल रहा है, कुछ गर्मी लाओ। अच्छा अब तुम अपने चेहरे पर गुस्से के भाव लाओ ताकि टीवी पर लोगों को लगे कि बहुत झगडा हो रहा है।”
बल्लेबाज बोला होगा-” तुम तो हो अफरातफरी वाले। सब चल जायेगा। मैं हूँ बहुत गंभीर। यार तुम क्यों मेरी इमेज खराब करना चाहते हो। तुम्हें कोई और नहीं मिला। अरे इस काम के लिए इतने सारे युवाओं का राजा हैं। धुनाई करने वाला हैं। इस रोल में वह दोनों फिट बैठते, कहाँ मुझे कामेडी रोल में घसीट रहे हो।”
गेंदबाज ने कहा होगा-”अरे सब तरह के रोल करना सीखो। तुम्हारे यहाँ लाफ्टर शो होते हैं और उसके लिए नये क्रिकेट खिलाड़ी की जरूरत पड़ेगी। तुम्हारे यहाँ एक सिद्ध बाबा टाईप क्रिकेटर हैं न!यही कर छाया हुआ है कि नहीं।”

तब तक अंपायर आया होगा-”तुम, लोग धन्धेबाजी की बात यहीं करोगे या खेलोगे भी। चलो तुम्हारा यह मिलन समारोह हो गया और टीवी पर सब आ गया, अब खेलो।”
उधर से गेंदबाज का कप्तान भी आया और उसने बोला होगा-”यह तुम लोगों ने क्या गंभीर अफरातफरी मचा रखी है। यार, पोल खुल जायेगी। चलो खेलो।”

उधर टीवी और अखबार वाले इस गंभीर अफरातफरी पर अपने समाचार दे रहे थे।लोग सोच रहे थे’ आखिर हुआ क्या’। तमाम तरह के चर्चे थे सब तरफ । बिचारे गभीर खिलाडी से ऐसी अफरातफरी। वह गेंदबाज है ही ऐसा। उधर गेंदबाज के साथी उससे लड़ रहे थे। तुमने गलत खिलाडी चुना इस रोल के लिए। इसलिए तुम्हारा अफरातफरी वाला शो फ्लॉप हो गया।

गेंदबाज सोच में पड़ गया होगा। शाम को पार्टी में मिले। बल्लेबाज से गेंदबाज ने कहा होगा-”यार, वैरी सोरी। मैं तुमसे माफ़ी मांगता हूँ।”
बल्लेबाज बोला होगा-”यार देखो यहाँ कोई शो मत करना।”
गेंदबाज ने कहा होगा-”नहीं, पहले तुम मुझे माफ़ करो।’
‘बल्लेबाज ने पीछा छुडाने की गरज से कहा होगा-”किया! किया!अब मैं चलूँ।”
शुक्रिया-”गेंदबाज खुश होकर जाने लगा होगा और फिर रुक गया होगा-‘पर यह बताओ, मैंने किया क्या था?”
बल्लेबाज ने कहा होगा-”पहले यह याद करो कि किसने करवाया था। यार, मेरा पीछा छोडो। मैं बहुत गंभीर आदमी हो तुम अफरातफरी करने वाले। मुझे तो याद नहीं आ रहा कि किस वजह से तुम्हें माफी दे रहा हूँ। पर तुम ही याद कर लो कि माफी क्यों मांग रहे हो।”

बल्लेबाज चला गया तो गेंदबाज भी सोच में पड़ गया कि आखिर ऐसी कौनसी गंभीर अफरातफरी हुई थी।

नोट-यह व्यंग्य काल्पनिक है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है और अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो यह संयोग होगा।

घर में टीवी पर है क्रिकेट देखने का मजा


हमारे बुजुर्ग कहते हैं कि जब तक जरूरी न हो जहाँ भीड़ हो मत जाओ, क्योंकि उसमें समय नष्ट होता है और अकारण शारीरिक परेशानी भी झेलनी पड़ती है। मगर आजकल लोग वहीं भागते हैं जहाँ भीड़ होती है। बात क्रिकेट की कर रहा हूँ। कहीं भी मैच होता है वहाँ भारी संख्या में लोग पहुँचते हैं। होता यह है कि कई लोगों को टिकिट होने के बावजूद अन्दर प्रवेश नहीं मिल पाता-और धक्के खाकर उनको घर लौटना पड़ता है।
मैंने जितनी क्रिकेट मैदान पर खेली है उससे अधिक रेडियो पर सुनी और टीवी पर देखी है। मैदान पर ऐसे मैच देखे हैं जो अंतर्राष्ट्रीय नहीं थे और अगर थे तो अनौपचारिक और जिनमें प्रवेश मुफ्त था। एक बार एक अंतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच मैदान पर देखने का भूत सवार हुआ और हमने अपने पैसे से टिकिट खरीदी और सुबह आठ बजे घर से मैदान की तरफ रवाना हुए। वहाँ देखा तो होश फाख्ता हो गए-सभी गेटों पर घुसने वालों की लाइन लगी हुई थी और चूंकि पैसे खर्च चुके इसलिए लाइन में लग गए। इतनी बड़ी लाइन हमने कभी राशन की दुकान पर भी नहीं देखी थी। बहरहाल मैच शुरू हो चुका था और भारत की बैटिंग पहले थी और भारतीय बल्लेबाजों द्वारा रन जुटाने पर स्टेडियम के अन्दर मौजूद दर्शकों की हो-हो की आवाज हमारे कानों में गूंग रही थी और हमें पहली बार लगा कि हम पूरा मैच देखने से चूक रहे हैं। घर पर टीवी पर मैच पहली गेंद से ही देखते थे और कहाँ यह पता ही नहीं लग रहा था कि क्या स्कोर चल रहा है।
जब हम किसी तरह अन्दर पहुचे तो बीस ओवर का मैच निकल चुका था। हमने अपने लिए बड़ी मुश्किल से बैठने की जगह ढूंढी। मैच देखना शुरू किया तब लगा ही नहीं कि मैच देख रहे हैं। बल्लेबाज आउट हुआ तो यह पता ही नहीं लगता कि सही आउट हुआ या गलत-क्योंकि वहाँ रिप्ले देखने की वहाँ कोई व्यवस्था नहीं थी। भारत की इनिंग ख़त्म हुई तो हम बाहर गए। पानी के लगी टंकियों पर भारी भीड़ थी। चाय के ठेलों पर जो चाय मिल रही थी वह दूने दाम पर और बेकार- यह पहले पी चुके लोगों ने बताया। उस समय पानी के पाउच का सिस्टम शुरू नहीं हुआ था। अब तो हमारी हालत बिगडी। एक बार ख्याल लाया कि घर वापस लौट जाएं पर फिर पैसे खर्च कर घर जाकर देखना गवारा नहीं हुआ।
स्टेडियम में वापस लौटे। फिर मैच शुरू हुआ तो अपनी तकलीफे मन से गायब हो गईं-पर मैच समाप्त होते-होते वह फिर परेशान करने लगीं। भारत वह मैच हारा तो हम भी अपने को हारा अनुभव करने लगे। पैसे खरीद कर देखा गया वह हमारा पहला और आखिरी मैच रहा। इसके कम से कम पांच वर्ष और बाद और छः वर्ष पहले फ्री में वहाँ कुछ मैच देखने गए। एक बार दक्षिण अफ्रीका और भारत के युवाओं का मैच देखने गए। दूधिया रोशनी में खेले गए मैच में बड़ा आनंद आया। लोग भी परिवार समेत ऐसे आ-जा रहे थे जैसे कि पार्क में आ रहे हों। पुलिस किसी को आने-जाने से नहीं रोक रही थी। परिवार सहित उस मैच का कुछ देर आनंद लेकर हम घर लौट आये। ऐसी तसल्ली से मैच देखना अब कहीं संभव नहीं है। अब लोग जिस तरह इन मैचों को देखने के लिए टूट रहे हैं उससे तो लगता ही नहीं है कि देश में कोई गंभीर समस्या है। टीवी पर उनके साक्षात्कारों में उनकी तकलीफ देखकर कोई सहानुभूति भी नहीं होती। जिस मैच को घर पर आसानी से और रिप्ले के साथ देखा जा सकता है उसके लिए धक्के खाने जाने वालों के साथ कैसी सहानुभूति? समाचार देने वाले इसे संवेदनशील बनाने की करते हैं पर मुझे नहीं लगता कि उसकी कोई लोगों पर प्रतिक्रिया होती है। क्योंकि कई जगह ऐसा हो चुका है और लोग देखते हुए भी अगर इसका अनुमान नहीं कर चलते तो क्या कहा जाये?
सच तो यह है की जितना मजा घर पर मैच देखने में आता है हमें मैदान पर कभी नहीं आया। फिर आजकल तो वातावरण में गर्मी भी अधिक है और मैदान में अपना पसीना बहाने से कोई फायदा नजर नहीं आता।

गुरु-चेला और क्रिकेट


गुरु चेले जंगल से निकल कर शहर के मुख्य बाजार में आये, तो देखा सब जगह लोग मूर्तियों की तरह खडे थे. बाजार में सब दुकानों के बाहर लोग खडे थे और टीवी की तरफ घूर कर देख रहे थे.

गुरु ने चेले से पूछा-”यह क्या बात है लोग क्या कर रहे हैं.”
चेले ने कहा-”गुरु जी, सब क्रिकेट मैच देख रहे हैं.
गुरु जी ने कहा-”पिछली बार आये तो यह बीमारी कम थी, क्या फिर यह वाइरस फ़ैल गया. जाओ पता करो. देखते हैं कि कुछ इसका इलाज हो सकता है. मैं तब तक यहाँ पेड़ के नीचे बैठकर आराम करता हूँ.
‘कौनसा पेड़ गुरूजी-‘चेले ने पूछा
गुरूजी ने इधर-उधर देखा-‘यहाँ एक पेड़ था न! मैं उसके नीचे आकर बैठता था. लगता है काट दिया. चलो वह दुकान बंद है वहीं बैठकर आराम करता हूँ तब तक तुम पीछे वाली लाइन से जल्दी चाय ले आओ.’

चेला चला गया और गुरूजी वहीं विराजमान हो गए. थोडी देर बार चेला लौट आया और बोला-”गुरूजी चाय वाला बोला इस समय मैच चल रहा है और अपने बल्लेबाज धुआंधार खेल रहे हैं, थोडी देर बाद आना.”

गुरूजी-”पिछली बार तो कह रहा था की क्रिकेट मैच नहीं देखूंगा. फिर उसने देखना शुरू कर दिया.”

चेला-”गुरूजी!ट्वंटी-ट्वंटी विश्व कप में टीम जीतकर आ गयी है इसलिए उसने दोबारा देखना शुरू कर दिया है.”
गुरूजी-”ठीक है! थोडी देर बाद चले जाना. वह चाय अच्छी बनता है इसलिए उसके नखरे झेल लेते हैं.
थोडी देर बाद चेला लौट आया और बोला-”चाय वाले का मूड खराब हो गया. अपने खिलाडी की सेंचुरी नहीं हो पायी. कहा रहा है की मूड खराब हो गया घर जा रहा हूँ.”
गुरूजी बोले-”ठीक है. अब फिर यह वाइरस फ़ैल गया और मुझे पहले ही लग रहा था कि यह बीमारी फिर फैलेगी. फिफ्टी-फिफ्टी गयी तो ट्वंटी-ट्वंटी फ़ैली और साथ में फिफ्टी-फिफ्टी भी लाई. चलो कहीं और चलते हैं.”

क्रिकेट में संयत व्यवहार रखना आवश्यक


भारत और आस्ट्रेलिया की बीच हाल ही में संपन्न श्रंखला में आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी साइमंड पर भारतीय दर्शकों द्वारा नस्लभेदी टिप्पणियों और श्रीसंत के व्यवहार की बहुत चर्चा रही है. वैसे देखा जाये तो इन दोनों मामलों में कोई दम नहीं है क्योंकि इस मामले में आस्ट्रेलिया के खिलाडी अधिक बदनाम रहे हैं. मैदान के बाहर भले ही वह अन्य देशों के खिलाडियों से मित्रवत व्यवहार करते हैं पर मैदान पर उनके बुर व्यवहार की सभी देशों के खिलाड़ी करते हैं और कई बार उन्हें सचिन, सौरभ और द्रविड़ जैसे खिलाडियों के साथ बदतमीजी करते देखा गया है. उनके क्षेत्र रक्षकों द्वारा बल्लेबाजों का ध्यान भंग किया जाता ताकि वह अपनी एकाग्रता खो बैठे और उसमें वह सफल भी रहते हैं.

अब पोंटिंग अगर भारतीय खिलाडियों के व्यवहार से क्षुब्ध होकर यह कह रहे हैं कि मैच रेफरी या आई सी सी आई ऐसे मामलों का नोटिस क्यों नहीं ले रही तो उन्हें यह बताना जरूरी है कि ऐसे मामलों में इन सबकी दया दृष्टि उनके देश पर ही रही है. अगर कुछ नये भारतीय खिलाड़ी उनके साथ ऐसे व्यवहार कर रहे हैं तो इसके लिए वह और उनकी टीम ही जिम्मेदार है जो कई सालों से विश्व विजेता है और उनसे नये खिलाडी प्रेरणा लेते हैं. मतलब ऐसे मामलों में वह उनके गुरु हैं और यह उनके चेले गुरु दक्षिणा में वही व्यवहार लौटा रहे हैं. प्रतिपक्षी बल्लेबाज पर फबती कसने के मामले में ऐसा कोई देश नही है जिसके खिलाड़ी अनौपचारिक रूप से आस्ट्रेलिया की शिकायत न करते हों . पोंटिंग ने भी अभी अखबार वालों के सामने ही कहा है पर उसकी शिकायत नहीं की है. पाकिस्तानी और श्रीलंकाई खिलाडियों से तो उनके झगडे तक नौबत आ जाती हैपर पुराने भारतीय खिलाड़ी उन्हें झेलते रहे पर नये भारतीय खिलाड़ी उन्हें अब पलट कर जवाब देने लगे हैं तो बुरा लग रहा है.

वैसे भारतीय खिलाडियों को अपना व्यवहार सौम्य रखना चाहिए क्योंकि इस तरह बुरा व्यवहार करने से उन पर भी तनाव आयेगा और उनके खेल पर ही बुरा असर पडेगा. अगर आस्ट्रेलिया के खिलाडी को टिप्पणी करते हैं तो उसकी लिखित शिकायत करें पर स्वयं कोई ऐसा व्यवहार न करें जिससे उनका और देश का नाम खराब हो. आस्ट्रेलिया वाले इतने सालों से यही कर रहे हैं भारत के महान खिलाडियों ने उनको अपने खेल से ही जवाब दिया है. यह क्रिकेट खेल है इसमें हार जीत तो चलती रहेगी पर व्यवहार से अगर छबि एक बार खराब होती है तो फिर नहीं बनती और भारतीय खिलाडियों की छबि व्यवहार के मामले में उज्जवल है. जहाँ तक सायमंड्स पर दर्शकों द्वारा नस्लभेदी टिप्पणियों का सवाल है तो इतने सारे दर्शकों में कुछ शरारती तत्व हो सकते हैं जो देश का नाम बदनाम करना चाहते है पर अधिकतर दर्शक तो ऐसा करने की सोच भी नही सकते. वैसे भी क्रिकेट को भद्रजनों का खेल कहा जाता है और मैदान पर खिलाडियों और दर्शकों के संयत व्यहार करना चाहिए

हास्य कविता-बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा


बीस के शेर
पचास में ढ़ेर
जीतते हैं तो फुलाते सीना
हारें तो कहें’समय का फेर’
समझाया था क्यों करते हो
पचास का आयोजन
जब है बीस का भोजन
क्रिकेट कोई दाल होता तो
पानी मिलाकर चला लेते
कुछ खा लेते तो
बाकी भूखे रह जाते माला फेर
बीस ओवर के खेल पर
बहुत खुश हुए थे कि
दुनिया में जीते अपने शेर
पचास ओवर के खेल में
कंगारुओं की फुर्ती से हुए ढ़ेर

कहैं दीपक बापू
लोग पूछ रहें हैं
‘वह मधुर सपना था या
खडा है सामने यह कटु सत्य’
दिन भर पूछने लगे हैं फिर स्कोर
चर्चा करते हैं क्रिकेट की
सांझ हो या भोर
चौबीस साल पुरानी कहानी
फिर सामने आ रही है
जब विश्व विजेता हुए थे
इसी तरह ढ़ेर
अब इस कहानी पर
अगले चौबीस महीने तक भी
नहीं चलेगा खेल
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती
छोटी जीत पर बड़ी हर नहीं फबती
बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा
कितना भी नया हो बीस का ही रहेगा
पोल खुल जायेगी देर-सबेर

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