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ब्लागर सरकार पर एसा वैसा मत लिख देना-हास्य व्यंग्य


सर्दी की सुबह चाय पीने के बाद ब्लागर कोहरे में घर से बाहर निकला। उसका शरीर ठंड से कांप रहा था पर चाय पीने से जो पेट मं गैस बनती है उससे निपटने का ब्लागर के पास यही एक नुस्खा था कि वह बाहर टहल आये। वह थोड़ा दूर चला होगा तो उसे कालोनी के नोटिस बोर्ड पर एक पर्चा चिपका दिखाई दिया। वह उसे देखकर कर अनेदखा कर निकल जाता पर उसे लगा कि कहीं ब्लागर शब्द लिखा हुआ है। वह सोच में पड़ गया कि यह आखों का वहम होगा। भला यहां कौन जानता है ब्लागर के बारे में। फिर वह रुककर उस पर्चे के पास गया और उसे पढ़ने लगा। उस पर लिखा था कि

‘आज ब्लागर सरकार की दरबार पर विशेष कार्यक्रम होगा। सभी इंटरनेट धार्मिक बंधुओं से निवेदन है कि वहां पहुंचकर लाभ उठावें । इस अवसर पर ब्लागर सरकार की विशेष आरती होगी उसके बाद समस्त धार्मिक बंधुओं को ज्योतिष,विज्ञान,तकनीकी तथा वैवाहिक ब्लाग तथा वेबसाईटों की जानकारी दी जायेगी। ब्लागर सरकार की पूजा से अनेक लोगों ने इंटरनेट पर हिट पाये हैं और उनके प्रवचन भी इस अवसर पर आयोजित किये जायेंगे। स्थान-नीली छतरी, दो पुलों के बीच, घाटी के बगल में। निवेदक ब्लागर स्वामी।

ब्लागर का माथा ठनका। वह भागा हुआ घर लौटा। गृहस्वामिनी ने कहा-‘क्या बात है इतनी जल्दी लौट आये। क्या सर्दी सहन नहीं हुई। मैंने पहले ही कहा था कि बाहर मत जाओ।’
ब्लागर ने कहा-‘यह बात नहीं हैं। मैं साइकिल पर जा रहा हूं थोड़ा दूर जाना होगा। वह जो दूसरा ब्लागर है न! उसने शायद कोई ब्लागर सरकार का दरबार के नाम से कुछ बनाया है। इतने दिन से आया नहीं हैं। मैं समझ गया था कि वह कुछ न कुछ करता होगा।
गृहस्वामिनी ने कहा-‘वह क्यों ब्लागर सरकार का दरबार बनायेगा। उसके सामने तो वैसे ही सर्वशक्तिमान का पुराना बना बनाया दरबार है जहां उसकी महफिल जमती है।’
ब्लागर ने कहा-‘पर ठिकाना वही है। जरूर वह कुछ गड़बड़ कर रहा है। मैं जाता हूं। यह दरबार उसी का होना चाहिये। उसने कोई नया बखेड़ा खड़ा किया होगा। वह बहुत दिनों से उस दरबार में भक्तों के जमावड़े और चढ़ावा बढ़ाने की योजनायें बन रहा है।
गृहस्वामिनी ने कहा-‘तो फिर स्कूटर ले जाओ।’
ब्लागर अपने पुराने स्कूटर की तरफ झपटा तो गृहस्वामिनी ने कहा-‘अब इस पुराने स्कूटर को मत ले जाओ। नया स्कूटर ले जाओ। वैसे ही वहां भीड़ होगी और वह मजाक बनायेगा। उसके नये दरबार में अपनी भद्द मत पिटवाओ।
ब्लागर ने अपना नया स्कूटर लिया। रास्ते में उसका कालोनी का एक मित्र टिप्पणी स्वामी मिल गया। उसे जब ब्लागर ने अपनी बात बताई तो वह भी उसके साथ हो लिया। स्कूटर पर बैठते हुए वह बोला-‘वैसे तो वह तुम और वह दोनों फालतू हो पर क्योंकि स्कूटर तुम्हारा है और पेट्रोल भी तो साथ चलता हूं। मेरा घूमना फ्री में हो जायेगा इसलिये साथ चल रहा हूं।’
दोनों स्कूटर पर सवाल होकर साढ़े तीन मिनट में-टिप्पणी स्वामी की वहां पहुंचते ही दी गयी टिप्पणी के अनुसार-वहां पहुंच गये। ब्लागर का संदेह ठीक था। दूसरे ब्लागर ने अपने सामने बने पुराने दरबार पर पहले ही कब्जा कर रखा था और उसके आंगन में खाली पड़ी जमीन पर बना दिया था ‘ब्लागर सरकार का दरबार’।
ब्लागर अपना स्कूटर सीधे अंदर ले गया। वहां एक आदमी तौलिया पहने दांतुन कर रहा था। उसने सिर से ठोढ़ी तक टोपा तथा शरीर पर भारीभरकम पुराना स्वेटर पहनकर रखा था। मूंह में दातुन रखे ही उसने ब्लागर की तरफ उंगली उठाकर कहा-‘उधर रखो। इधर स्कूटर कहां रख रहे हो। यह ब्लागर सरकार का दरबार है।’
ब्लागर उसे घूर कर देख रहा था। टिप्पणी स्वामी ने उससे कहा-‘अरे, भाई यह ब्लागर सरकार का दरबार है और हमारे यह मित्र ब्लागर हैं। इस दरबार का जो स्वामी है वह इनका खास मित्र है। जाओ उसे बुलाओ। ब्लागरों का स्कूटर भी खास होता है।’

जानता हूं। जानता हूं। इसका नया स्कूटर तो क्या पुरानी साइकिल भी खास होती है।’ यह कहकर वह आदमी कुल्ला करने गया। इधर पहले ब्लागर ने टिप्पणी स्वामी से कहा-‘अरे, तुमने पहचाना नहीं यही है वह ब्लागर स्वामी। अब लौटते ही शाब्दिक आक्रमण करेगा।’
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘अरे, यार मैंने उसे एक बार ही देखा है। तुम तो अक्सर उससे मिलते हो।’

उधर से दूसरा ब्लागर लौटा और पहले ब्लागर से बोला-‘यह कौन कबूतर पकड़ लाये? जो मुझे बता रहा है कि तुम्हारा स्कूटर खास है?
पहले ब्लागर ने कहा-‘यह टिप्पणी स्वामी है। कभी कभार टिप्पणी देता है। हालांकि जबसे इसके मकान की उपरी मंजिल बनना शुरू हुई तब से इसकी पत्नी इसे इंटरनेट पर काम नहीं करने देती इसलिये वह भी अब बंद है। बहरहाल यह ब्लागर सरकार के दरबार का क्या चक्कर है।’

दूसरे ब्लागर ने कहा-‘चक्कर क्या है? अधार्मिक कहीं के। तुम अपनी टांग क्यों फंसाने आ गये? तुम तो अध्यात्मिक ज्ञान और धर्म को अलग अलग मानते हो न! क्या जानो धर्म के बारे में। चक्कर नहीं है। यह मेरीे श्रद्धा और आस्था है। उस दिन रात को सपने में ब्लागर सरकार के दर्शन हुए और उन्होंने बताया कि उनकी स्थापना करूं! आजकल इंटरनेट के समय लोग सर्वशक्तिमान के सभी नाम और स्वरूपों को पुराना समझते हैं इसलिये उन्होंने मुझे इस नये स्वरूप की स्थापना का संदेश दिया। वैसे तुम यहां निकल लो क्योंकि तुम अपने ब्लाग पर मूर्तिपूजा के विरुद्ध लिखते रहते हो जबकि चाहे जिस दरबार में मूंह उठाये पहुंच जाते हो। हमारा चरित्र तुम्हारी तरह दोहरा नहीं है।’
टिप्पणी स्वामी ने पहले ब्लागर से कहा-‘यार, यह तो तुम्हें काटने दौड़ रहा है। इसे मालुम नहीं कि तुम अध्यात्म के विषय पर लिखते हो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘कोई बात नहीं। इस बिचारे का दोष नहीं है। बहुत व्यस्त आदमी है इसलिये इसे पढ़ने का अवसर नहीं मिलता।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-वैसे तुम पढ़ने लायक लिखते क्या हो जिसे मैं पढ़ूं। वैसे इस नये स्कूटर का मुहूर्त करने यहां आये हो क्या? यह केवल खाली हाथ मुझे दिखाकर क्या दिखाना चाहते होे। वैसे मैंने तुम्हें उस दिन नये स्कूटर पर देख लिया था। अब बताओ यहां किसलिये आये हो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम्हारे इस दरबार का पर्चा अपनी कालोनी में पढ़ा। मुझे लगा कि यह तुम्हारा कोई नया स्वांग है जिसे देखने चला आया।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘हां, तुमसे यही उम्मीद थी। तुम मेरी धार्मिक भावनाओं को आहत कर रहे हो। वैसे तुम चाहे कितना भी लिखो जब तक ब्लाग स्वामी की कृपा नहीं होगी तब तक तुम हिट नहीं हो सकते।’
पहला ब्लागर-‘ठीक है पहले तुम्हारे ब्लागर सरकार की मूर्ति अंदर चलकर देख लें।’
दूसरा ब्लागर बोला-नहीं। तुम जैसे नास्तिकों का अंदर प्रवेश वर्जित है।’
टिप्पणीकार बोला-‘मैं तो अस्तिक हूं। अंदर जाकर देख सकता हूं न!
दूसरा ब्लागर बोला-‘नहीं! तुम इसके साथी हो। नास्तिक का साथी भी नास्तिक ही होता है मेरे सामने तुम्हारा यह पाखंड नहीं चल सकता।’
पहला ब्लागर बोला-‘ठीक है। अंदर क्या जाना? यहीं से पूरी तस्वीर दिख रही है। यह पत्थर की है न!
दूसरा ब्लागर-‘नहीं प्लास्टिक की है। आर्डर देकर बनवाई है।
पहला ब्लागर बोला-‘यार, फिर तुम मुझसे नाराज क्यों होते हो? मैंने तो कभी प्लास्टिक की मूर्तियों की पूजा करने से तो रोका नहीं है। वैसे यह डिजाइन तो ठीक है।’
दूसरा ब्लागर-‘‘हां, डिजाइन पर अधिक पैसा खर्च हुआ है जो भक्तों के चंदे से मिले हैं। जैसे सपने में डिजाईन जैसी देखी थी वैसी ही बनवाई है।’
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘यह डिजाईन तो शायद मैंने किसी पत्रिका में देखा था। फिर पैसे किस पर खर्च हुए। लगता है किसी ने ठग लिया।’
दूसरा ब्लागर-टिप्पणी स्वामी! तुम अपनी बेतुकी टिप्पणियां करने बाज आओ। कहीं ब्लागर सरकार नाराज हो गये तो तुम्हारा इस दोस्त को एकाध टिप्पणी मिलती है उससे भी तरस जायेगा। मकान बनने के बाद भी तुम्हारी पत्नी तुम्हें इंटरनेट पर काम करने नहंी देगी।
दोनों मूर्तियां देखने लगे। कंप्युटर के उपर रखे कीबोर्ड पर अपने दोनों हाथों की उंगलियां रख ेएक चूहा बैठा मुस्कराने की मुस्कराने की मुद्रा में था। कंप्यूटर से जुड़ी हर सामग्री को वहां दिखाया गया था। कंप्यूटर की स्क्रीन पर लिखा था ब्लागर सरकार।

टिप्पणीकार ने धीरे से कहा-‘यह चूहा और कीबोर्ड कंप्यूटर के ऊपर क्यों रखा हुआ है।’
दूसरा ब्लागर चीखा-‘चूहा! अरे, यही तो हैं ब्लागर स्वामी! तुम कुछ तो सोचकर बोला करो। अपने इस दोस्त के चक्कर में तुम भी वैसी ही बेहूदा टिप्पणियां कर रहे हो जैसे यह पाठ लिखता है।’
पहला ब्लागर अभी प्लास्टिक की मूर्ति को घूर रहा था। फिर बोला-‘मैंने अपनी कालोनी में एक पहचान वाले के यहां ऐसी ही मूर्ति देखी थी। वह बता रहे थे कि उन्होंने यह कबाडी को बेची थी।’
दूसरा ब्लागर’-‘तुम क्या कहना चाहते हो कि मैंने यह कबाड़ी से खरीदी थी। अब तुम जाओ। यार, तुम मेरा समय खोटी कर रहे हो। अब यहां भक्तों के आने का समय हो गया है। यहां पर मैंने लोगों को ज्योतिष,चैट,विवाह तथा नौकरी में मदद देने के लिये असली कंप्यूटर लगा रखे हैं। वह भक्त आते होंगे।
पहले ब्लागर ने देखा कि टीन शेड से बने केबिन थे जहां कंप्यूटर रखे दिख रहे थे। दूसरा ब्लागर बोला-‘जैसे जैसे भक्तों के कमेंट आते जायेंगे वैसे वैसे दरबार का विकास होता जायेगा।’
ब्लागर और टिप्पणी स्वामी ने आश्चर्य से पूछा-‘कमेंट!
दूसरा ब्लागर बोला-‘कमेंट यानि चढ़ावा। अरे, इतने दिन से ब्लागिंग कर रहे हो तुम्हें मालुम नहीं कि कमेंट भी चढ़ावे की तरह होता है और प्रसाद भी! वैसे तुम क्या समझोगे? तुम्हारे पाठ पढ़ता कौन है? जो कमेंट लगायेगा।’
दूसरा ब्लागर मूर्ति तक गया और वहां से लड्ड्ओं की थाली ले आया। उस एक लड्ड् के दो भाग किये। एक भाग अपने मूंह में रख गया। फिर दूसरे भाग के दो भाग कर उसका एक भाग अपने मूंह में रख लिया और बाकी के दो भागों में एक पहले ब्लागर को दूसरा टिप्पणी स्वामी को देते हुए बोला-तुम दोनों तो हो नास्तिक। फिर भी यह थोड़ा थोड़ा प्रसाद खा लो। कल हमारे यहां एक लड़के को इंटरनेट पर चैट करते समय अपनी गर्लफ्रैंड का पहला ईमेल मिला तो उसने मन्नत पूरी होने पर यह लड्डूओं की कमेेंट चढ़ा गया।’
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘इसकी क्या जरूरत थी। हम तो ब्लागर सरकार के दर्शन कर वैसे ही बहुत खुश हो गये।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘चुपचाप खालो टिप्पणी स्वामी! वरना इससे भी जाओगे।
फिर उसने दूसरे ब्लागर से पूछा-‘वह तुम्हारा विशेष कार्यक्रम कब है?’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘परसों हो गया। क्या तुमने उस पर्चे में तारीख नहीं पढ़ी थी।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘यार, जोश में होश नहीं रहा। अच्छा हम दोनों चलते हैं।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘बहुत मेहरबानी! अब मैं ब्लाग सरकार की विशेष आरती करूंगा। ब्लाग सरकार की मेहरबानी हो तो अच्छा अच्छे कमेंट आयेंगे तो तुम दोनों की शक्लें देखने से जो बुरा टोटका हो गया उसको मिटाने के लिये यह जरूरी है। और हां! ब्लागर सरकार पर कुछ एैसा-वैसा मत लिख देना।’

पहला ब्लागर और टिप्पणी स्वामी स्कूटर से वापस लौटने लगे। टिप्पणी स्वामी ने पहले ब्लागर से पूछा-‘तुम इस पर कुछ लिखोगे।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, हास्य व्यंग्य!
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘पर उसने मना किया था न! कहा था कि ब्लागर सरकार पर कुछ एैसा-वैसा मत लिख देना।’
पहले ब्लागर ने स्कूटर रोक दिया और बोला-‘यार, उसने हास्य व्यंग्य लिखने से मना तो नहीं किया था! चलो लौटकर फिर भी पूछ लेते हैं।’
टिप्पणीकार हैरान होकर उसकी तरफ देखने लगा। फिर पहले ब्लागर ने कहा-‘अगली बार पूछ लूंगा।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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संत कबीर वाणी:सत्य शब्द की खोज करे वह संत धन्य



खोजी हुआ शब्द का, धन्य संत जन सोय
कहैं कबीर गहि शब्द को, कबहु न जाय बिगोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि वह सत्य धन्य है जो सत्य के शब्दों की खोज करता है। जो सत्य के शब्द के ज्ञान को धारण करता है वह गलती नहीं करता और उसका कभी पतन नहीं होता।

सोई शब्द जिन सार है, जो गुरू दिया बताय
बलिहार वा गुरुन की, सीष बियोग न जाय

वह शब्द ज्ञान सत्य है जो हमें अपनु गुरूओं से मिलता है। उस गुरू के सर्वस्व अर्पण कर दो जिससे शब्द ज्ञान मिला है और उससे कभी दूर न जाओ

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल ढोंगी गुरूओं की बाढ़ इस देश में आयी है। कभी कभी तो लगता है कि अध्यात्मिक ज्ञान को रटने वाले पर स्वयं उसे धारण करने से वंचित लोग गुरू बनते जा रहे हैं। सकाम भक्ति का प्रचार इस समय जोरों पर है। सकाम भक्ति से तब तक ही मन में शांति रहती है जब तक हम उसे करते हैं और अधिकतर गुरू इसी प्रकार की भक्ति को प्रोत्साहन देते हैं ताकि जब तक भक्त या शिष्य जब तक उनके पास रहें उसमें मग्न रहें और फिर सांसरिक दुनियां में लौटकर दुःख भोगते हुए उनको याद करें। निष्काम भक्ति तो सदैव ह्ृदय में बनी रहती हैं और करने के बाद भी हमारा मन प्रफुल्लित रहता है। निष्काम भक्ति का आशय ईश्वर का ध्यान करते हुए निरंकार के रूप में उसे देखना। इससे हमारे मन, बुद्धि और विचारों का जो चक्र है वह घूमता रहता है और उससे उसमें शुद्धता आती है।

रहीम के दोहे:यह जीवन फिर नहीं मिलता


रीति प्रीति सबसों भली, बैर न हित मित गोत
रहिमन याही जनम की, बहुरि न संगति होत

कविवर रहीम कहते है कि इस जीवन में सबसे प्रेम से पेश आओ। न किसी से बैर करो न अपने मित्र और गौत्र से हित की चाह करो। यह मनुष्य जीवन फिर मिलेगा कि नहीं कहना कठिन है।

वर्तमान संदर्भ मे व्याख्या-आप देखेंगे कई ऐसे पेशेवर प्रवचनकर्ता हैं जो लोगों को सकाम भक्ति की तरह प्रेरित कर दावा करते हैं कि अगले जन्म में भी मनुष्य योनि प्राप्त होगी। यह उनका ढोंग है। सच तो यह है कि यह जीवन अनंत रहस्यों से भरा पड़ा है और इसका पूरा ज्ञान किसी को नहींं। अगला जन्म होता है भी कि नहीं या अगली योनि में कौन क्या बनता है इसका आभास किसी को नहीं हो सकता चाहे कोई कितना बड़ा तत्वज्ञानी होने का दावा क्यों न करे। जो तत्वज्ञानी है वह जीवन जीने के बेहतर तरीके तो बताते हैं पर उसके बाद का अनुमान तो वह भी नहीं कर पाये। इसलिये बेहतर यही है कि हमें अपने जीवन में सबसे प्रेम का बर्ताव करना चाहिए और इस स्वार्थ से भरे संसार में अपने मित्रों और रिश्तेदारों से कोई आशा न कर निष्काम भाव से अपना कर्म करना चाहिए। हम अगर दूसरे को सुख देते हैं तो हमें सुख मिलेगा, और अगर दूसरे को दुख देंगे तो हमें चैन से रहने की आशा भी नहीं करना चाहिए। अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए अपने दैनिक कार्यों के साथ भगवान की भक्ति भी करना चाहिए। इसके साथ ही जो अगले जन्म में मनुष्य योनि दिलाने का दावा करते हैं ऐसे कथित लोगों की बातों को अनदेखा कर देना चाहिए।

रहीम के दोहे:पराए देश में कमाना, आत्मसम्मान गंवाना


भला भयो घर से छुट्यो, हंस्यो सीस परिखेत
काके काके नवत हम, अपन पेट के हेत

कविवर रहीम कहते हैं कि घर से छूटकर दूसरी जगह पर कमाना बहुत अच्छा लगता है पर इसके लिये वहां पर दूसरों के आगे सिर नवाना पड़ता है और हमारे ऊपर बैठा सबका रक्षक परमात्मा हंसता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अनेक लोग धन कमाने के लिये अपने गांव और प्रदेश से बाहर जाकर अपनी प्रतिभा से अच्छी आय भी अच्छी अर्जित करते हैं पर उनको कई कारणवश दूसरों के सामने झुकना पड़ता है तब उनकी आत्मा को भारी कष्ट होता है। हमारे देश से कई लोग विदेशों में जाकर बसे हैं इसमें कुछ देश ऐसे है जिनके राज्य धार्मिक आधार पर चलते हैं और वहां दूसरे धर्म के लोगों के लिये किसी भी प्रकार की आराधना करने की अनुमति नहीं है। ऐसे देशों के रहने वाले भारतीयों को उस देश की आराधना के वक्त अपने काम बंद रखने पड़ते हैं। इसके अलावा चूंकि उन देशों के पुराने धार्मिक कानून चलते हैं अतः उन्हें सतर्क रहना पड़ता है कि कहीं से उनके धर्म पर कोई ऐसी टिप्पणी न हो जाये जिसका परिणाम उन्हें भोगना पड़े।

हमारे देश के विद्वान मनीषी उदार रहे हैं और यह हम समझते हैं कि सभी जगह ऐसा है तो यह भ्रम है। धार्मिक राष्ट्रों में तो विद्वान लोग ही हिंसक कानूनों को लागू करने में सहायता करते हैं और इतना ही नहीं वह अपने यहां किसी अन्य धर्म के पालन की अनुमति देने के भी विरुद्ध हैं। हां, वह दूसरे स्थानों से दूसरे धर्म के लोगों के आने के खिलाफ नहीं हैं क्योंकि वह तो उनकी प्रतिभा का लाभ उठाकर अपने देश के हित साध रहे हैं। भारत में बेरोजगारी अधिक है इसलिये अनेक लोग ऐसे राष्ट्रों में जाते हैं और खूब कमाते हैं पर अपने इष्ट का स्मरण न कर जो पीड़ा झेलते हैं वह उसे कह भी नहीं पाते। कुछ लोगों ने अपनी बातें घुमाफिराकर लिखीं पर स्पष्ट किसी ने नहीं लिखा और न वह मांग कर पाते हैं कि वह भी उन देशों की सेवा करते हैं और उनको अपने धर्म पालन की अनुमति दी जाये। ऐसे कई देशों में भारतीयों के मानसिक तनाव की चर्चा तो आती है पर उस पर कोई रोशनी नहीं डालता कि वह किस कारण से है?

उनके मानसिक तनाव का कारण भी यही है कि हमारे देश का आदमी अपने इष्टों की प्रतिमाओं के आगे शीश नवाकर अपने मन का बोझ हल्का करता है और वहां इसकी अनुमति न होने से उनकी आत्मा त्रस्त होती है। उनको ऐसे कानून मानने पड़ते हैं जो उनके अनुकूल नही है। ऐसे में रहीम को दोहे में उन लोगों के की मानसिक पीड़ा की अभिव्यक्ति प्रकट होती है वह विचारणीय है।

रहीम के दोहे:जहाँ शील और सदाचार न हो वह स्थान त्याग दें


रहिमन रहिबो वा भलो जो लौं सील समूच
सील ढील जब देखिए, तुरत कीजिए कूच

कविवर रहीम कहते हैं कि वही रहना ठीम है जहां लोगों में शील और सदाचार का भाव है। जहां इसमें कमी दिखाई दे वहां से हट जाना चाहिए।

रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागे बार
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार

कविवर रहीम कहते हैं कि अधर्म से प्राप्त धन को नष्ट हाने में समय नहीं लगता। होली के अवसर पर लोग चोरी की लकड़ी लाते हैं पर उसको जलकर रख होने में क्षण भी नहीं लगता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-वैसे तो देखा जाय बुरे लोग तो रहीम जी के समय में ही रहे हैं इसलिये तो उन्होंने ऐसी बातें कहीं हैं जो आज भी प्रासंगिक लगतीं हैं। एक बात जरूर है कि उस समय आवागमन के साधन इतना तीव्र नहीं थे इसलिये आदमी अधिकतर अपने सीमित क्षेत्र में ही जीवन व्यतीत करता था। वर्तमान में कई कारणों से अपने मूल स्थान से दूर जाना पड़ता है और ऐसे में भले और बुरे दोनों प्रकार के लोगों का कार्यक्षेत्र भी विस्तृत हुआ है अतः दुष्ट लोग अपराध कर अपने क्षेत्र आसानी से बदलने लगते हैं ताकि दूसरी जगह उनकी पहचान न हो पाये। कई जगह तो उनकी बहुतायत हो जाती है और उससे लगता है कि इस दुनियां में भलाई और सदाचार नाम की कोई चीज नहीं है। यह हमारा एक भ्रम है। अगर इस दुनिया से बुराई को लोप नहंी हुआ है तो भलाई का भी नहीं हुआ है। हम अगर ऐसी जगह पहुंच जाते हैं जहां दुष्ट और निंदक प्रवृत्ति के लोगों का जमघट है तो हमें वहां से निकल जाना चाहिए। अगर वहां रहेंगे तो हमारे विचारों में दुष्टता का भाव और अधर्म से पैसा कमाने की प्रवृत्ति उत्पन्न होगी। अधर्म को धन वैसे भी अधिक देर नहीं ठहर जाता और कभी कभी तो वह अपने स्वामी को भी नष्ट कर देता है। अतः कुविचारों की बहुतायत वाले स्थान को त्यागने के साथ अधर्म से धन प्राप्त करने को मोह त्याग देना चाहिए।

रहीम के दोहे:अपनी पीडा दूसरों को सुनाकर उपहास का पत्र बने


रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय

कविवर रहीम कहते है अपने मन के दुःख दर्द किसी से मत करो। लोग उसे सुनकर उपहास करेंगे। कोई भी उसे बांटने वाला नहीं मिलेगा।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में दुख दर्द तो सभी को होता है पर जो उसे दूसरों को सुनाकर उसे हल्का करने का प्रयास करते हैं उन्हें समाज में उपहास का पात्र बनना पड़ता है। अब तो वैसे भी लोगों की पीड़ाएं इतनी हो गयीं हैं कि कोई किसी की पीड़ा क्या सुनेगा? सब अपनी कह रहे हैं पर कोई किसी की सुनता नहीं है। अमीर हो या गरीब सब अपने तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में बस सबके पास हंसने का बस एक ही रास्ता है वह यह कि दूसरा अपनी पीड़ा कहे तो दिल को संतोष हो कि कोई अन्य व्यक्ति भी दुखी है। उसकी पीड़ा का मजाक उड़ाओ ‘‘देख हम भी झेल रहे हैं पर भला किसी से कह रहे हैं‘।

कई चालाक लोग अपने दुख को कहते नहीं है पर अपनी पीड़ा को हल्का करने के लिये दूसरों की पीड़ा को सबके सामने सुनाकर उसे निशाना बनाते हैं। ऐसे लोगों को अपनी थोड़ी पीड़ा बताना भी मूर्खता है। वह सार्वजनिक रूप से उसकी चर्चा कर उपहास बनाते है। ऐसे में अपना दर्द कम होने की बजाय बढ़ और जाता है। अपने दुःख दर्द जब हमें खुद ही झेलने हैं तब दूसरों को वह बताकर क्या मिलने वाला है? जब हमारे दर्द को कोई इलाज करने वाला नहीं है उसकी दवा हमें ढूंढनी है तो फिर क्योंकर उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाएं। उसका हल हो न हो पर लोग पूछते फिरेंगे-‘‘क्या हुआ उसका?’’

हम अपनी उस पीड़ा को भूल गये हों पर लोग उसे याद कर बढ़ा देते हैं। ऐसे में कुछ अन्य विषय पर सोच रहे हों तो उससे ध्यान हटकर अपनी उसी समस्या की तरफ चला जाता है। बेहतर है अपने दर्द अपने मन में रखें।

रहीम के दोहे:किसी के कहने से बडे लोग छोटे नहीं हो जाते


जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाहिं
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं

कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े लोगों को कोई छोटा कहता है तो वह छोटे नहीं हो जाते। भगवान श्री कृष्ण जिन्होंने गिरधर पर्वत उठाया उनको कुछ लोग मुरलीधर भी कहते हैं पर इससे उनकी मर्यादा कम नहीं हो जाती।

जो मरजाद चली सदा, सोई तो ठहराय
जो जल उमगै पारतें, कहे रहीम बहि जाय

कविवर रहीम कहते हैं कि जो सदा से मर्यादा चली आती है, वही स्थिर रहती है। जो पानी नदी के तट को पार करके जाता है वह बेकार हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कई लोगों को तब बहुत पीड़ा होती है जब कोई उनको छोटा या महत्वहीन बताता है। सच बात तो यह है कि आजकल हर कोई एक-दूसरे को छोटा बताकर अपना महत्व साबित करना चाहता है। ऐसे में कोई व्यक्ति अगर हमको छोटा कहता है या आलोचना करता है तो उसे सहज भाव से ग्रहण करना चाहिए। अपने मन में यह सोचना चाहिए कि जो हम और हमारा कार्य है वह अपने आप हमारा महत्व साबित कर देगा। भौतिक साधनों की उपलब्धता आदमी को बड़ा नही बनाती और उनका अभाव छोटा नहीं बनाती। आजकल के युग में जिसके पास भौतिक साधनों का भंडार है लोग उसे बड़ा कहते है और जिसके पास नहीं है उसे छोटा कहते है। जबकि वास्तविकता यह है कि जो अपने चरित्र में दृढ़ रहते हुए मर्यादित जीवन व्यतीत करता है वही व्यक्ति बड़ा है। इसलिये अगर हम इस कसौटी पर अपने को खरा अनुभव करते हैं तो फिर लोगों की आलोचना को अनसुना कर देना चाहिए।

संत कबीर वाणी:कलि का स्वामी लोभिया


कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि भरी खटाइ
राज-दुबारा यौं फिरै, ज्यूँ हरिहाई गाइ

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कलियुग के स्वामी बडे लोभी हो गए हैं और उनमें विकार आ गया है, जैसे पीपल के बल्टोई में खटाई रख देने से आता है। राज द्वारों पर ये लोग मान-सम्मान पाने के लिए घुमते हैं रहते हैं, जैसे खेतों मैं बिगडैल गायें घुस आती हैं।

स्वामी हवा सीतका, पिलाकर पचास
राम-नाम काठे रह्मा, करै सिपां की आँस

कविवर कबीरदास जी कहते हैं कि स्वामी आज-कल मुफ्त में, या पैसे के पचास मिल जाते हैं, मतलब यह कि सिद्धिया और चमत्कार दिखाने वाले स्वामी और बाबा बहुत है। राम नाम को तो रख देते हैं किनारे और शिष्यों से लाभ की आशा करते हैं।

आज नवमी-भक्तों के रक्षक हैं भगवान् श्रीराम


आज पूरे देश में दुर्गा नवमी मनाई जा रही है और कल दशहरा है.. राम केवल भारत के ही नही वरन विश्व के हृदय नायक हैं. भगवान् श्रीराम के चरित्र पर अनेक संतो और विद्वानों ने अपने ढंग से विचार प्रस्तुत किये हैं और उनका अध्ययन, श्रवन और मनन हृदय को सुख प्रदान करता है.

भगवान् श्री राम के चरित्र का जो मुख्य तत्व वाल्मीकि कृत रामायण के अध्ययन से मेरे समक्ष उभरता है वह यह कि उन्होने किसी विशेष प्रकार की पूजा पद्धति की स्थापना का प्रयास न कर केवल यही सन्देश दिया है कि किसी को भी दूसरे के कार्य में दखल नहीं देना चाहिए. उनका धर्म स्थापना का उद्देश्य किसी प्रकार की पूजा पद्धति की स्थापना तक सीमित नहीं बल्कि इस पूरे विश्व में शांति और जन कल्याण का था. यह सही है कि उनका पूरा जीवन उन्हीं राक्षसों से संघर्ष करते हुए बीता जो यज्ञ-हवन और तपस्या में विघ्न डालने और ऋषि-मुनियों और तपस्वियों को मार डालने का अभियान चलाये हुए थे. भगवान् श्री राम जी का संघर्ष तो उनसे सीता के विवाह से पूर्व ही शुरू हो गया था जब विश्वामित्रजी के यज्ञ की रक्षा करने पहुंचे थे. अगर सीता का हरण नहीं भी हुआ होता तो रावण के साथ श्रीराम जी का कभी न कभी युद्ध होता- यह अलग बात है कि ऐसा दुष्कृत्य कर रावण ने अपने पूरे कुनबे को नष्ट करवा डाला.

जैसे जैसे श्रीरामजी अपनी शक्ति संचय करते जा रहे थे वैसे ही उनका संघर्ष राक्षसों के राजा रावण से तय होता जा रहा था. रावण स्वयं भी नास्तिक नहीं था बल्कि शिव उसके आराध्य देव थे. उसने खुद भी बड़ी भारी तपस्या की और वरदान पाया. इसी वरदान से उसे अहंकार हो गया और यज्ञ-हवन और तपस्या जैसे कार्य उसे असहनीय हो गए और उसने अपने अधीनस्थों को ऐसे स्थानों पर व्यवधान डालने के आदेश दिए जहाँ यह सब होते थे. इस कारण जहाँ भी यज्ञ-हवन की अग्नि का धुआं उठता या कहीं भगवत नाम का उच्चारण होता राक्षस उसमें विघ्न डालने पहुंच जाते और उसे बंद करवा देते और न करने पर हत्याएं तक कर देते थे. इसके बावजूद कुछ ऐसे ऋषियों- और मुनियों के आश्रमों से वह लोग दूर ही रहते थे जो न केवल अपनी तपस्या से अलौकिक शक्तियाँ अर्जित कर चुके थे बल्कि अपने आश्रमों में( जिन्हें आज के समय में हम उनकी प्रयोगशालाएं भी कह सकते हैं) दिव्यास्त्रों का निर्माण भी कर चुके थे. रावण उन पर आक्रमण नहीं कर सकता था और अपनी मर्यादाओं से बंधे ऋषि-मुनि उसे घर जाकर न तो शाप दे सकते थे और न दिव्यास्त्रों के साथ हमला कर सकते थे. उन्हें प्रतीक्षा थी किसी धनुर्धर की और श्री राम जी उस समय अपनी कीर्ति एक धनुर्धर के साथ धर्म रक्षक के रूप में अर्जित कर चुके थे. वह इन दिव्य आश्रमों पर गए और ऋषियों और मुनियों ने उन्हें अपने यह दिव्यास्त्र प्रदान किये. इस तरह इस लोक में ही एक मनुष्य की तरह शक्ति संचय कर यह सन्देश भी दिया कि एक सामान्य मनुष्य धर्म के रास्ते पर चले तो उसे भी ऐसी शक्ति इसी लोक में मिल सकती है.

रावण उनकी बढ़ती शक्ति से भयाक्रांत था और वह उन पर हमला कर अपने इलाके में आमंत्रित कर उनसे युद्ध चाहता था और सीता हरण के पीछे यही उसका उद्देश्य था. उसको यह अनुमान नहीं था कि राम अपने साथ चतुरंगिणी सेना और वह भी सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जाम्बवान और नल-नील जैसे योद्धाओं से भरी उसके यहाँ ले आयेंगे. रावण ने सीता को अशोक वाटिका में रखने के उनकी निगरानी और देखभाल के लिए महिलाओं को लगाया यह इस बात का प्रमाण था कि राजा के रूप में भी वह अपने कर्तव्य जानता था. उसने कभी उनको हाथ लगाने का प्रयास नहीं किया-इसके पीछे कारण उसे मिला वह शाप भी था जिसमे किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध हाथ लगाने पर उसके सिर के टुकड़े होने की बात कही गयी थी और उसने यह बात स्वयं ही लोगों को बताई थी ताकि उसे कोई उकसाये नहीं. उसका एकमात्र उद्देश्य श्री राम और श्री लक्ष्मण को युद्ध में मार डालना था जो स्वयं भी उसे मारने के लिए तैयार हो रहे थे.

श्री राम जी ने स्वयं भी यज्ञ-हवन किये पर इसके लिए किसी को प्रेरित नहीं कर रहे थे. राक्षसों को परास्त किया तो केवल इसलिए कि वह दूसरों की भक्ति में बाधा डाल रहे थे न कि इसलिए कि वह स्वयं यज्ञ-हवन नहीं करते. कोई किसी की भक्ति में खलल न डाले यही उनका उद्देश्य था. हमारे राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जी न जो सर्व धर्म समभाव का जो सन्देश दिया है वह अपने हृदय नायक भगवान श्री राम के इसी चरित्र से प्रभावित होकर दिया है. वैसे यज्ञ-हवन कोई मूर्ति पूजा का प्रतीक नहीं है और कई वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह सिद्ध हो चुका है कि आदमी के मस्तिष्क पर इनका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इनमें उच्चारित मंत्रों से मानसिक शुद्धि होती है. श्री राम जी ने अगर ऐसे सत्कार्यों की रक्षा का अभियान चलाया तो केवल इसीलिए कि इस विश्व में शांति और कल्याण के भाव की धारा सतत बहती रहे. भगवान् श्री राम के चरित्र की महिमा अनंत है और मैं आगे भी इसी तरह की चर्चा में करता रहूँगा-क्योंकि मुझे इसमें बहुत आनंद आता है.

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