Tag Archives: आस्था

मनुस्मृति-भोजन के बाद गीत-संगीत सुनकर ही शयन करें (dinner and music-hindi adhyamik sandesh)


तत्र भुक्तपर पुनः किंचित्तूर्यघोषैः प्रहर्षितः।
संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्च गतक्लमः।
हिन्दी में भावार्थ-
भोजन करने के बाद गीत संगीत का आनंद उठाना चाहिये। उसके बाद ही शयन के लिये प्रस्थान करना उचित है।
एतद् विधानमातिष्ठेदरोगः पृथिवीपतिः।
अस्वस्थः सर्वमेत्त्ु भृत्येषु विनियोजयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
स्वस्थ होने पर अपने सारे काम स्वयं ही करना चाहिये। अगर शरीर में व्याधि हो तो फिर अपना काम विश्वस्त सेवकों को सौंपकर विश्राम भी किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक तरफ मनुस्मृति में प्रमाद से बचने का सुझाव आता है तो दूसरी जगह भोजन के बाद गीत संगीत सुनने की राय मिलती है। इसमें कहीं विरोधाभास नहीं समझा जा सकता। दरअसल मनुष्य की दिनचर्या को चार भागों में बांटा गया है। प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सायं काम या मनोरंजन तथा रात्रि मोक्ष या निद्रा के लिये। जिस तरह आजकल चारों पहर मनोरंजन की प्रवृत्ति का निर्माण हो गया है उसे देखते हुए मनृस्मृति के संदेशों का महत्व अब समझ में आने लगा है।
आजकल रेडियो, टीवी तथा अन्य मनोंरजन के साधनों पर चौबीस घंटे का सुख उपलब्ध है। लोग पूरा दिन मनोरंजन करते हैं पर फिर भी मन नहीं भरता। इसका कारण यह है कि मनोंरजन से मन को लाभ मिले कैसे जब उसे कोई विश्राम ही नहीं मिलता। जब कोई मनुष्य प्रातः धर्म का निर्वहन तथा दोपहर अर्थ का अर्जन ( यहां आशय अपने रोजगार से संबंधित कार्य संपन्न करने से हैं) करता है वही सायं भोजन और मनोरंजन का पूर्ण लाभ उठा पाता है। उसे ही रात्रि को नींद अच्छी आती है और वह मोक्ष प्राप्त करता है।
शाम को भोजन करने के बाद गीत संगीत सुनना चाहिये। अलबत्ता टीवी देखने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि उसमें आंखें ही थकती हैं और दिमाग को कोई राहत नहीं मिलती। इसलिये टेप रिकार्ड या रेडियो पर गाने सुनने का अलग मजा है। वैसे भी देखा जाये तो आजकल अधिकर टीवी चैनल फिल्मों पर गीत संगीत बजाकर ही गाने प्रस्तुत किये जाते हैं-चाहे उनके हास्य शो हों या कथित वास्तविक संगीत प्रतियोगितायें फिल्मी धुनों से सराबोर होती हैं। देश के व्यवसायिक मनोरंजनक प्रबंधक जानते हैं कि गीत संगीत मनुष्य के लिये मनोरंजन का एक बहुत बड़ा स्त्रोत हैं इसलिये वह उसकी आड़ में अपने पंसदीदा व्यक्तित्वों को थोपते हैं। प्रसंगवश अभी क्रिकेट में भी चौका या छक्का लगने पर नृत्यांगना के नृत्य संगीत के साथ प्रस्तुत किये जाते हैं। स्पष्टतः यह मानव मन की कमजोरी का लाभ उठाने का प्रयास है।
टीवी पर इस तरह के कार्यक्रम देखने से अच्छा है सीधे ही गाने सुने जायें। अलबत्ता यह भोजन करने के बाद कुछ देर तक ठीक रहता है। अर्थशास्त्र के उपयोगिता के नियम के अनुसार हर वस्तु की प्रथम इकाई से जो लाभ होता है वह दूसरी से नहीं होता। एक समय ऐसा आता है कि लाभ की मात्रा शून्य हो जाती है। अतः जबरदस्ती बहुत समय तक मनोरंजन करने का कोई लाभ नहीं है। सीमित मात्रा में गीत संगीत सुनना कोई बुरी बात नहीं है-मनोरंजन को विलासिता न बनने दें।
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संत कबीर वाणी-मन की दुविधा दूर करो (man ki duvidha door karo-hindi adhyamik gyan sandesh)


‘कबीर’दुविधा दूरि करि, एक अंग है लागि।
यहु सीतल बहु तपति है, दोऊ कहिये आगि।।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि मन की दुविधा को दूर करो। एक परमात्मा का ही स्मरण करो। वही शीतलता भी प्रदान करता है तो आग जैसा तपाता भी है। अगर सांसरिक मोह और भगवान भक्ति में बीच में फंसे रहोगे तो दोनों तरफ आग अनुभव होगी।
भूखा भूखा क्या करैं, कहा सुनावै लोग।
भंडा घड़ि जिनि मुख यिका, सोई पूरण जोग।।
संत कबीरदास जी का कहना है कि अपनी भूख को लेकर परेशान क्यों होते हो? सभी के सामने अपने संकट का बयान करने से कोई लाभ नहीं है। जिसने मुख दिया है उसने पेट भरने के योग का निर्माण भी कर दिया है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब मनुष्य के मन में कर्तापन का बोध बढ़ने लगता है तो उसें अहंकार का भाव पैदा होता है और जिसकी वजह से उसे अनेक बार भारी निराशा मिलती है। मनुष्य सोचता है कि वह अपना काम स्वयं कर रहा है। उसके मन में अपने कर्म फल को पाने की तीव्र इच्छा पैदा हो जाती है और जब वह पूर्ण न हो तब वह निराशा हो जाता है। अनेक लोग इस संशय में पड़े रहते हैं कि हम अपने कर्म के फल का प्रदाता भगवान को माने या स्वयं ही उसे प्राप्त करने के लिये अधिक प्रयास करें। वह भगवान की भक्ति तो करते हैं पर अपने जीवन को दृष्टा की तरह न देखते हुए अपने कर्म फल के लिये स्वयं अपनी प्रशंसा स्वयं करते हैं। यह कर्तापन का अहंकार उन्हें सच्ची ईश्वर भक्ति से परे रखता है।
ईश्वर भक्ति के लिये विश्वास होना चाहिये। अपने सारे कर्म परमात्मा को समर्पित करते हुए जीवन साक्षी भाव से बिताने पर मन में अपार शांति मिलती है। किसी कार्य में परिणाम न मिलने या विलंब से मिलने की दशा में तो निराशा होती है या उतावली से हानि की आशंका रहती है। अतः अपने नियमित कर्म करते हुए परमात्मा की भक्ति करने के साथ ही उसे कर्म प्रेरक और परिणाम देने वाला मानते हुए विश्वास करना चाहिये।
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पतंजलि योग दर्शन-एक संस्कार से दूसरे का भी बोध होता है (patanjali yog darshan in hindi)


श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्।।
तज्जः संस्कारऽप्रतिबन्धी।।
हिन्दी में भावार्थ-
सुनने अथवा अनुमान से होने बुद्धि की अपेक्षा उस बुद्धि का विषय भिन्न है क्योंकि वह विशेष अर्थ वाली है। उससे उत्पन्न होने वाला संस्कार अन्य संस्कार का बोध कराने वाला होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य का बौद्धिक विकास उसके सांसरिक अनुभवों के साथ बढ़ता जाता है। बुद्धि अनेक रूपों में काम करती है या कहें कि उसके अनेक रूप हैं। मनुष्य किसी की बात सुनकर या अपने अनुमान से किसी विषय पर विचार कर निष्कर्ष पर पहुंचता है। उसी तरह उसके व्यवहार से दूसरा भी उसके व्यक्तित्व पर अपनी राय कायम करता है। इनसे अलग एक तरीका यह भी है कि जब मनुष्य अपने संस्कार का प्रदर्शन करता है तो उससे अन्य संस्कारों का भी बोध होता है। कोई मनुष्य शराब या जुआखाने में जाता है तो उसके विषय में अन्य लोग यह राय कायम करते हैं कि वह ठीक आदमी नहीं है और उसका जीवन तामसी कर्म से भरा हुआ होगा। उसके परिवार के लोग ही उससे प्रसन्न नहीं होंगे। वह सम्मान का पात्र नहीं है।
उसी तरह कोई मनुष्य मंदिर जाता है या कहीं एकांत में साधना करता है तो उसके बारे में यह राय कायम होती है कि वह भला आदमी है और अपने से संबद्ध लोग उसका सम्मान करते होंगे। उसके पास ज्ञान अवश्य होगा। कहने का अभिप्राय यह है कि अगर समाज में अपनी छबि बनानी है तो उसके लिये मनुष्य को अपने कर्म भी सात्विक रखना चाहिये। व्यसनों में लिप्त रहते हुए उसे यह आशा नहीं करना चाहिये कि लोग उसका हृदय से सम्मान करेंगे। उसी तरह किसी दूसरे मनुष्य पर अपनी राय कायम करते हुए उसकी दिनचर्या में प्रकट होने वाले संस्कारों का अध्ययन करना चाहिये। पतंजलि योग दर्शन मे इस तरह का संदेश इस बात का प्रमाण भी है कि योग केवल योगासन या प्राणायम ही नहीं है बल्कि जीवन को संपूर्णता से जीने का एक तरीका है।

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विदुर नीति-अपने से प्रेम करने वालों को छोड़ना मूर्खता


अकामान् कामयति यः कामयानान् परित्यजेत्।
बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मुढचेतसम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो अपने से प्रेम करने वाले को त्याग देता है और न प्रेम करने वालों से संपर्क जोड़ता है तथा जो बलवान् के साथ बैर बांधता है उसे मूर्ख कहा जाता है।
अनाहूतः प्रविशति अपुष्टो वहु भाषते।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः।।
हिन्दी में भावार्थ-
मूढ़बुद्धि वाला मनुष्य बिन बुलाये ही कहीं भी चला जाता है और बिना पूछे ही बोलता है तथा अविश्वसनीय व्यक्ति पर विश्वास करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-अपने साथ जुड़े व्यक्तियों के बारे में एकांत मिलने पर विचार अवश्य करना चाहिए अन्यथा हम अनजाने में ही मूढ़ता की स्थिति को प्राप्त हो जाते हैं। इस आत्ममंथन से ही यह स्पष्ट होता है कि कौन हमें वाकई चाहता है और कौन नहीं। अगर हम ऐसा नहीं करते तो अपने से प्रेम करने वालों को अनजाने में त्याग देते हैं और जिनका मन कलूषित है और केवल हमसे दिखावे का प्रेम करते हैं उनकी चिकनी चुपड़ी बातें सुनकर उनसे ही चिपके रहते हैं।
महात्मा विदुर की तरह नीति विशारद चाणक्य भी कहते हैं कि एकांत में बैठकर अपने मित्रों, परिवार के सदस्यों और सहयोगियों के बारे में विचार अवश्य करना चाहिये।
अनेक लोग ऐसे होते हैं जो चिकनी चुपड़ी बातें नहीं करते पर उनका प्रेम निच्छल होता है। हितैषी होने के कारण वह समय पर कटु बात भी कह देते हैं पर उसका बुरा नहीं मानना चाहिये। ऐसे लोगों से अधिक खतरनाक वह हैं जो सामने प्रशंसा करते हुए ऐसे मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करते हैं जिसका परिणाम दुःखद होता है या वह किसी दुष्परिणाम देने वाला काम करते देख अपने मित्र को उससे रोकते नहीं है। आजकल तो चाटुकारिता का जमाना है और ऐसे में अपने हितैषियों को अपने साथ रखना जरूरी है पर इसके लिये यह जरूरी है कि हम अपने पास रहने वाले लोगों का विश्लेषण करते रहें।

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संत कबीर वाणी-तंत्र मंत्र से बुद्धि भ्रष्ट होती है (sant kabir vani-tantra aur mantra)


सार शब्द निज जानि के, जिन कीन्ही परतीति।
काग कुमत तजि हंर ह्नै, चले सु भौजल जीति।।
संत कबीरदास के मतानुसार शब्द का ज्ञान होने पर जिसने अपना व्यवहार निष्कपट बनाने के साथ जीवन में परमात्मा के प्रति श्रद्धा और विश्वास भाव हृदय में धारण कर लिया वह वैसे ही कुमति को त्याग देता है जैसे कि हंस ने प्राप्त की और उसका उद्धार हो गया।
जंत्र मंत्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय।
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी का कहना है कि इस ंसंसार में जंत्र मंत्र सब झूठ है और इनसे बुद्धि भ्रमित हो जाती है। जब तक शब्द का ज्ञान न हो तब तक कोई मनुष्य वैसे ही ज्ञानी नहीं बन सकता जैसे कि कौआ कभी हंस नहीं बन सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में तंत्र मंत्र को लेकर अनेक लोग भ्रमित होते हैं। अनेक लोग तो पशु बलि देकर अपना काम सिद्ध करना चाहते हैं। बहुत बड़ी संख्या में कथित श्रद्धालु सांसरिक कामों की सिद्धि के लिये तांत्रिकों और कथित सिद्धों के दरवाजे पर हाजिरी देते हैं। यही कारण है कि अनेक ढोंगी लोगों ने तंत्र मंत्र को अपना व्यवसाय बना लिया है। अनेक लोग तो ऐसे हैं जो गढ़े खजाने की खोज का काम भी करते हैं। जितना हमारे देश का अध्यात्मिक ज्ञान समृद्ध है उतना ही तंत्र मंत्र के वहमों का अंधेरा भी यहीं दिखाई देता है।
दरअसल सृष्टि का नियम है कुछ काम तो समय आने पर स्वयमेव सिद्ध होते हैं पर उनके पूर्ण होने की तीव्रतर इच्छा अनेक लोगों को इन तंत्र मंत्रों के चक्कर में डाल देती है। यह तंत्र मंत्र उस अध्यात्मिक ज्ञान का भाग नहंी है जो जीवन का मार्ग प्रशस्त करने के लिये ऐसी बुद्धि प्रदान करता है जिससे मनुष्य अपना काम सिद्ध करने में स्वयं ही सक्षम हो जाता है। ऐसे तांत्रिक या कथित सिद्ध भले ही अपने आपको धार्मिक व्यक्ति बताते हों पर यह कृत्य धर्म का हिस्सा नहीं है। यह विचार करते हुए उनसे दूर ही रहना अच्छा है। इससे अच्छा तो यह है कि भगवान का नाम स्मरण करते रहें जिससे मन में शांति और धीरज बना रहता है और जीवन संसार के काम तो समय आपने पर ही स्वयं ही सिद्ध होते हैं।

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संत कबीर वाणी-शीतल गंगा जल पर्वत को फोड़ देता है (sant kabir vani-Ganga jal ki shitlata)


कुटिल बचन नहिं बोलिये, शीतल बैन ले चीन्हि
गंगा जल शीतल भया, परबत फोड़ा तीन्हि।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कुटिल वचन न बोलते हुए मधुर शब्दों का चयन करना चाहिये। जिस तरह गंगा जल शीतल होकर पहाड़ भेद देता है वैसे ही शीतल वचन मनुष्य की शक्ति होते हैं जो उसे सफल बनाते हैं।
बोलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि।
कहैं कबीर ता दास को, कबहुं न आवै हारि।
संत कबीरदास जी का कहना है कि हमेशा विचार कर अपनी बात रखना चाहिये। जो विनम्रता पूर्वक बोलता है वह कभी पराजित नहीं होता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपनी शक्ति और प्रभाव दिखाने के लिये कड़े शब्द बोलने से कोई लाभ नहीं होता। संभव है कि कटु वचन सुनने पर कोई व्यक्ति तत्काल उसका उत्तर न दे पर वह बोलने वाले के प्रति मन में वह विद्वेष तो पाल लेता है। दूसरी बात यह भी है कि हमेशा सोच विचार कर कहीं अपनी बात रखना ही अच्छा है क्योंकि बिना विचारे कही गयी बात का दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है।
मन हमेशा स्वच्छ रखकर दूसरों से व्यवहार करने से ही सारे काम सिद्ध होते हैं। अगर किसी व्यक्ति से काम निकालना है और उसके साथ हम चालाकी करते हैं तो वह समझ जाता है। कुटिल लोग अपने आपको कितना भी चालाक समझें पर उनकी पोल छिपी नहीं रहती। एक बात ध्यान रखें जब आपके मन में किसी के प्रति कुटिलता का भाव आता है तो दूसरा भी उससे बच नहीं सकता। ऐसे में व्यवहार कलुषित हो जाता है। अपने मन में इसलिये स्वच्छता और निर्मलता का भाव रखते हुए अपने मुंह से निकलने वाली को कोमल बनाना चाहिये।

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श्रीगुरुग्रंथ साहिब-अपने हृदय में पवित्र संकल्प धारण करें (shri guru granth sahib-paivitra sankalp dharan karen)


‘राम नाम करता सभ जग फिरै, राम न पाया जाए
गुर के शब्दि भेदिआ, इन बिध वसिआ मन आए।।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्रीगुरुग्रंथ साहिब की पवित्र वाणी के अनुसार राम का नाम तो सारा संसार जपता है पर फिर भी किसी को राम नहीं मिलता। गुरु से शब्द ग्रहण कर अगर राम की भक्ति हृदय से की जाये तभी लाभ हो सकता है।
‘साई वस्तु परापति होई, जिसु सिउ लाइआ हेतु।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब की पवित्र वाणी के अनुसार किसी भी मनुष्य की उपलब्धि उसके अच्छे और बुरे संकल्प के अनुसार ही होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह संसार तो जीव के संकल्प के अनुसार ही उसे दिखाई देता है। श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि यह संसार परमात्मा के संकल्प के आधार पर ही स्थित है। उसी तरह जीव जैसा संकल्प करता है वैसा ही यह संसार उसके लिये हो जाता है। हम चाहे जिस व्यवसाय या नौकरी में हों अपने संकल्प की शुद्धता पर ही ध्यान देना चाहिए। अगर हम अपने अच्छे कर्म के भी बुरे परिणाम पर विचार करेंगे तो वही सामने आयेगा-उसी तरह बुरा कर्म करेंगे तो चाहे अच्छा सोचें तब भी बुरा परिणाम आयेगा। इसलिये अपने मन में अच्छे कर्म करने के साथ ही उसके अच्छे परिणाम का संकल्प ही धारण करना चाहिये।
अपना संकल्प परमात्मा भक्ति में दृढ़ रूप से स्थित रखने का प्रयास करना चाहिए। केवल मुंह से माला जपते हुए मुख से राम का नाम जपने से तब तक कोई लाभ नहीं हो सकता जब तक उसे हृदय में धारण न करें। दिखावे के लिये नाम जपना या दान करना एक तरह एक ऐसा ढोंग है जिसे सभी पहचान लेते हैं यह अलग बात है कि सामने कोई कहता नहीं है। दूसरा कहे या न कहे पर हम अपने मन में स्वयं जानते हैं कि स्वयं ढोंग कर रहे हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि सांसरिक कर्म हो या भक्ति उनको करते समय अपने संकल्प और विचारों की शुद्धता पर ध्यान अवश्य देना चाहिये।

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मनुस्मृति-धर्म के विषय पर झूठ बोलना अनुचित


एकोऽहमस्मीत्यात्मानं यत्तवं कल्याण मन्यसे।
नित्यं स्थितस्ते हृद्येष पुण्यपापेक्षिता मुनिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
यदि कोई मनुष्य यह सोचकर झूठा साक्ष्य दे रहा है कि वह अकेला है और उसे कोई नहीं देख रहा तो वह गलती पर है क्योंकि पाप और पुण्य को देखने वाला परमात्मा सभी के हृदय में रहता है।
अवाविशरास्समस्यन्धे कित्वषी नरकं व्रजेत्।
च प्रश्नवितर्थ ब्रूयात्पृष्ठः सनधर्मनिश्चये।।
हिन्दी में भावार्थ-
धर्म के विषय पर पूछे जाने पर उसका उत्तर झूठा देने वाला भयानक अंधेरे से भरे नरक में गिरता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ लोगों की आदत होती है कि वह धर्म के नाम पवित्र ग्रंथों में लिखी गयी सामग्री की झूठी मूठी व्याख्या कर लोगों को बहकाते हैं। अनेक लोग इसका आर्थिक लाभ उठाते हैं तो अनेक सामजिक रूप से सम्मानीय बनने के लिये धर्मग्रंथों के संदेशों को तोड़ मरोड़कर लोगों भ्रमित करते हैं। सच बात तो यह है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में अनेक बातें व्यंजना विद्या में लिखी गयी है और उसके लिये भाषा, व्याकरण और साहित्य की समझ होना जरूरी है केवल शाब्दिक अर्थ से ही उनकी व्याख्यान करना अल्पज्ञान का प्रमाण देना ही है। इसके अलावा इन प्राचीन ग्रंथों में अनेक बार उसमें कही गयी बातों में विरोधाभास भी लगता है क्योंकि धार्मिक पुस्तकों में अलग अलग प्रसंगों में विद्वानों ने समय के अनुसार अपने विचार व्यक्त किये हैं। इसका लाभ कुछ अल्पज्ञानी अपने आपको ज्ञानवान प्रमाणिक करने के लिये उनकी गलत व्याख्या कर उठाते हैं। ऐसे लोग बहुत बड़े अपराध के भागी बनते हैं क्योंकि उनका यह दुष्कृत्य झूठी गवाही देने के समान है।
अनेक बार विवादों में लोग झूठे गवाह बन जाते हैं। तब वह सोचते हैं कि कोई उनको देख नहीं रहा पर यह उनका भ्रम है। हमारी देह में रहने वाला आत्मा तो परमात्मा का ही अंश है जो सब देखता है और कहीं न कहीं अपने अपराध के लिये धिक्कारता है यह अलग बात है कि कुछ लोग उसे समझ पाते हैं कुछ नहीं।

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श्रीगुरुग्रंथ साहिब-कीर्तन से कुमति दूर होती है (kirtan-shri guru granth sahib)


‘उदम करहि अनेक हरि नाम न गवाही।
भरमहि जोनि असंख पर जन्महि आवही।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार कोई मनुष्य चाहे कितना भी उद्यम करे पर अगर परमात्मा के नाम का स्मरण नहीं करता तो उसे मुक्ति नहीं मिल सकती और वह भटकता रहता है।
‘जो जो कथै सुने हरि कीरतन ता की दुरमति नासु।
सगल मनोरथ पावै नानक पूरन हौवे आसु।।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्रीगुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जो मनुष्य कीर्तन गाते और सुनते हैं उनकी कुमति नष्ट होती है तथा सभी प्रकार की मनोकामनायें पूरी होती हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्री गुरुग्रंथ साहिब का हमारे देश में बहुत अध्यात्मिक महत्व है। यह किसी धर्म विशेष की पुस्तक नहीं है क्योंकि इसमें मनुष्य को सहजता सिखाने वाले संदेश मौजूद हैं और इसे पढ़कर सभी लोग सीख सकते हैं। आज के समय में अनेक बुद्धिमान लोगों को सत्संग और कीर्तन एक ढोंग लगते हैं तो कुछ लोग इनको मनोरंजन का साधन मानते है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि जब आज आधुनिक मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं तो फिर क्यों इस पुराने प्रकार के चक्कर में पड़ा जाये।
यह अज्ञान से उपजा भ्रम हैं। सत्संग और कीर्तन में शामिल होने का मतलब है कि कुछ देर अपने ध्यान को इस संसार से हटकार निष्काम प्रवृत्तियों की तरफ लगाना। जबकि आधुनिक मनोरंजन प्रसारणों में इसी संसार की वह बातें होती हैं जिनके साथ हम पूरा दिन जुड़े रहते हैं। मूर्ति पूजा की अनेक आलोचक भले ही खिल्ली उड़ाते हैं पर उनको इस बात का पता नहीं कि यह ध्यान को इस संसार से हटकार उसमें शुद्धता लाने का यह एक महत्वपूर्ण साधन है। जिस तरह कोई गाड़ी हम धुलवाने के लिये गैरेज भेजते हैं उसी तरह अपने मन और बुद्धि को कामनाओं से हटाकर पूजा, कीर्तन और सत्संग में शामिल होकर एक तरह से अपने मन और बुद्धि को निष्काम गैरेज में शुद्ध किया जाता है।
गुरुनानक जी ने इस देश में फैले अंधविश्वास को दूर करने का संदेश दिया था। अगर उनके बताये मार्ग पर चला जाये तो हमारा देश स्वर्ग बन सकता है। कामनाओं की पूर्ति के लिये हम सदैव लगे रहते हैं पर इससे केवल हमारे पास भौतिक वैभव की प्रचुरता हो सकती है पर मन को शांति नहीं मिल सकती। अतः यह जरूरी है कि ध्यान, योग तथा भक्ति कर अपने अंदर शुद्धता लायी जाये।

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भर्तृहरि शतक-सदाचार आभूषणों का भी आभूषण (sadachar hai abhushan-bhartrihari shataka)


ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता शौर्यस्य वाक्संयमो ज्ञानस्योपशमः श्रुतस्य वित्तस्य पात्रे व्ययः।
अक्रोधस्तपसः क्षमा प्रभवितुर्धर्मस् निव्र्याजता सर्वेषमपि सर्वकारणमिद्र शीलं परं भूषणम्
हिन्दी में भावार्थ-
सज्जनता ऐश्वर्य का, संयम शौर्य का, ज्ञान शांति का, शास्त्र का विनय भाव आभूषण है। उसी धन का सदुपयोग करने से है। तपस्या का महत्व अक्रोध से तो प्रभुत्व की शोभा क्षमादान से है। धर्म की शोभा निष्कपटता से प्रदर्शित होती है। इनमें भी सदाचार सभी आभूषणो का आभूषण है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहते हैं कि धन गया तो समझ लो कुछ नहीं गया। अगर स्वास्थ्य गया तो समझो कि बहुत कुछ चला गया। अगर चरित्र गया तो समझ लो सभी कुछ चला गया। जीवन में अध्यात्मिक संदेशों को धारण करने से अपनी विचार शक्ति दृढ़ होती है। जरा जरा सी बात पर उत्तेजित होना या हमेशा ही अपनी प्रशंसा करना या किसी के मुख से सुनने के लिये व्यर्थ के उपाय कर आदमी अपने ही अज्ञान का परिचय देता है।
जिस व्यक्ति में शक्ति होती है उसमें संयम भी होता है। जब आदमी जरा जरा बात पर क्रोध करता है तो समझिये कि उसमें शक्ति का अभाव है। उसी तरह जिसमें ज्ञान है वह उसे बघारता नहीं है। कहा जाता है ‘विद्या ददाति विनयम्’। इसके विपरीत हम देख रहे हैं कि आजकल शिक्षित व्यक्ति अधिक अहंकार का शिकार है बनिस्बत अशिक्षित के। यकीनन यह हमारी शिक्षा पद्धति के निरर्थक होने का प्रमाण है।
इससे ज्यादा बुरी बात यह है कि लोग दादा, गुंडों और मवालियों से मित्रता करने में गौरव अनुभव करते हैं। धनी, पदारूढ़ तथा बाहूबलियों को सम्मान देकर समाज अपने लिये ही संकट के बीज बोता है। हालत यह है कि सज्जन व्यक्ति को सीधासाधा या मूर्ख समझा जाता है। मगर यह सोच कृत्रिम है। सज्जन व्यक्ति ही सबसे अधिक सुरक्षित होता है और कालांतर में उसे औपचारिक रूप से कोई उपाधि भले ही न मिले पर वह सम्मानित होता है। धन के पीछे सभी इसलिये भाग रहे हैं क्योंकि लोग अपने को उससे प्रतिष्ठा पाने का एक सहज तरीका मानते हैं पर धन की भूख भला कभी मिट सकती है? धन तो आती जाती चीज है पर चरित्र पर एक बार दाग लगा तो फिर आदमी की छबि हमेशा के लिये खराब हो जाती है।

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चाणक्य नीति- अभ्यास से ही ज्ञान का घड़ा भर जाता है


जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वसे घटः।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च।।
हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह पानी की एक एक बूंद से पानी का घड़ा भर जाता है वैसे ही विभिन्न विद्याओं के थोड़े अभ्यास से ही मनुष्य के अंदर धार्मिक प्रवृत्ति का विकास होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी व्यक्ति को जीवन में पूर्णता प्राप्त के लिये उसमें आध्यात्मिक ज्ञान का होना जरूरी है। हमारे देश में अब शैक्षणिक संस्थानों में अध्यात्मिक शिक्षा नहीं देकर केवल रोजगार योग्य बनाया ही जाता है। एक तरह से छात्र को रोटी कमाने लायक यह सोचकर बनाया जाता है कि मनुष्य के लिये यही एक मुश्किल काम है। जबकि सच तो यह है कि जिस परमात्मा ने पेट दिया है उसने अन्न के दानों पर भी खाने वाले का नाम लिख दिया है। फिर इस संसार में क्या मनुष्य ही ऐसा है जो रोटी कमा रहा है और बाकी जीव भूखे मर रहे हैं? सर्वशक्तिमान परमात्मा ने तो इस संसार में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के जीवों का भोजन का निर्माण भी कर दिया है।
ऐसे में अगर कोई मनुष्य अपने पराक्रम से भौतिक उपलब्धियां प्राप्त करता है तो उसमें प्रशंसा जैसी कोई बात नहीं हैं।  मनुष्य तो वही है जो अपनी बुद्धि से ऐसे काम करे जो अन्य जीव न कर सकते हों और यही उसकी पहचान है।  वह स्वतंत्र रूप से विचरण करे ताकि  मनुष्य यौनि की श्रेष्ठता प्रमाणित हो और इसके लिये अध्यात्मिक ज्ञान का होना जरूरी है।  जबकि स्थिति यह है कि चंद बुद्धिमान ही पूरे समाज पर राज्य कर रहे हैं।  यह कोई अनिवार्य शर्त नहीं है कि हर दिन किसी धार्मिक ग्रंथ का पूरा पाठ ही पढ़ा जाये बल्कि उसका एक अंश पढ़कर उस पर चिंतन भी किया जा सकता है।  जिस तरह एक बूंद से बूंद से घड़ा भरता है वैसे ही एक दो श्लोक या दोहा पढ़ने से भी ज्ञान में श्रीवृद्धि प्राप्त की जा सकती है।


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विदुर नीति-जिस लाभ से बाद में हानि हो, वह सुखद नहीं (labh aur hani-vidur niti)


न स क्षयो महाराज यः क्षयो बुद्धिमावहेत्।
क्षय सत्विह मन्तव्यो यं लब्धवा बहु नाशयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-वास्तव में जो हानि या क्षय भविष्य में वृद्धि का कारण बने उसे लाभ ही समझना चाहिये।  जिस लाभ से भविष्य में अनेक हानियां हों उसे तो हानि ही समझना चाहिये।
समृद्धा गुणतः केचिद् भविन्त धनतोऽपरे।
धनवृद्धान गुणंहीनान् धृतराष्ट्र विसर्जन।।
हिन्दी में भावार्थ-कुछ मनुष्य धनाभाव में जीते हुए भी गुणवान होते हैं और कुछ धन होते हुए भी गुण की दृष्टि से विपन्न होते हैं। इसलिय गुणहीन व्यक्ति का त्याग कर देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक ऐसे लाभ हैं जो बाद में हानि का कारण बनते हैं। जैसे शराब, सिगरेट तथा अन्य मादक पदार्थ सेवन के समय अच्छे लगते हैं पर बाद में उससे जो शारीरिक और मानसिक हानि होती है उसका आंकलन कोई नहीं करता। उसी तरह जुआ, लाटरी  या सट्टा में जब किसी को प्रारंभ में ही लाभ होता है तो समझ लो वह गया काम से! उसके बाद जो तबाही का दौर शुरु होता है तो उसमें व्यसनी लोगों के परिवार तक बर्बाद हो जाते है।  अनेक बार गलत ढंग से धन आने पर लोग खुश होते हैं कि ‘चलो आया तो सही’, पर जब उसके कारण ही फंसते हैं तो फिर वहां से निकलना कठिन हो जाता है।  यही कारण है कि अपने पास आने वाले धन और समय समय पर होने वाले लाभों पर भी विचार करना चाहिये कि वह कहीं अनुचित मार्ग के अनुसरण से तो नहीं प्राप्त हुए।
दूसरी तरफ अपने साथ संपर्क रखने वाले लोगों पर भी दृष्टि रखना चाहिये।  धनी लोगों में अहंकार अधिक होता है और गुण कम और साथ ही उनमें संघर्ष क्षमता का भी अभाव होता  इसलिये संकट पड़ने पर वह मैदान छोड़कर भागते हैं यह कहते हुए कि ‘हमारे पास समय नहीं है’ और ‘हमें बहुत सारे दूसरे भी काम है’।  अतः हमेशा निर्धन और गुणवान लोगों को अपने साथ रखना चाहिये। समय आने पर वह उपयोगी सिद्ध होते हैं इसलिये उनकी आवश्यकताओं का भी ध्यान रखते हुए यथासंभव उनकी पूर्ति करना चाहिये।  गरीब नमक का कर्ज चुकाता है जबकि अमीर तो अधिकार की तरह खाकर भूल जाता है। कुछ अमीरों को तो यह लगता है कि हमारे पास पैसा है इसलिये लोग चमचागिरी कर खिला रहे हैं तो कुछ इसे चालाकी समझते हैं और समय आने पर कहते भी हैं कि ‘हमें पता था कि तुम हमारी मदद कुछ पाने की चाहत में कर रहे थे, पर हम भी चालाक हैं इसलिये नहीं करते तुम्हारा काम!’ इसलिये प्रयास यही करें कि किसी की दौलत, शौहरत या बाहुबल देखकर उसे मित्र न बनायें बल्कि यह देखें कि समय पड़ने पर वह काम आयेगा कि नहीं।



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संत कबीर वाणी-चंद्रमा और सूर्य की स्थापना का मुहूर्त किसने निकाला होगा (chandrama,suraj aur muhurt-kabir ke dohe)


धरती अम्बर न हता, को पंडित था पास।

कौन मुहूरत थापिया, चांद सूरज आकाश।।

संत कबीरदास जी कहते हैं कि जब यह धरती और आकाश नहीं था तब यहां कोई पंडित नहीं था। बताओ इनको स्थापित करने का मुहूर्त किसने निकाला होगा?

ब्राह्ण गुरु है जगत का, संतन के गुरु नाहिं

अरुझि परुझि के मरि गये, चारौ बेदों मांहिं।।

ब्राह्म्ण जगत का गुरु हो सकता है पर किसी संत का नहीं।  ज्ञानी ब्राह्म्ण लोग वेदों पर वाद विवाद करते हुए आपस में उलझ कर बिना भक्ति किये ही संसार से विदा हो गय
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य को शायद इसलिये भी स्वर्णकाल कहा जाता है क्योंकि इसमें अध्यात्मिक ज्ञान तथा हार्दिक भक्ति का महत्व बताते हुए कर्मकांडो से दूर रहने की बात कही गयी।  कबीर, रहीम, मीरा, सूर तथा तुलसीदास जैसे महापुरुषों ने भक्ति भाव को प्रधानता दी पर अंधविश्वासों के नाम पर अपनाये कर्मकांडों का समर्थन कभी नहीं किया-संत कबीर तथा कविवर रहीम ने तो इसका जमकर विरोध किया और मखौल तक उड़ाया।  

आश्चर्य इस बात है कि हमारा समाज के सामान्य लोग अध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति तथा हृदय से भक्ति करने को महत्व कम देते हुए कर्मकांडों को ही धर्म समझते हैं।  अनेक लोग अपने पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक तथा मानसिक संकटों के निवारण के लिये तांत्रिकों की मदद लेते हैं जो कि उनमें अज्ञान तथा आत्मविश्वास के अभाव का प्रमाण होता है।
सच बात तो यह है कि वैदिक मंत्रों का प्रभाव तो होता है पर उसे लिये यह जरूरी है कि मनुष्य स्वयं निर्मल भाव से स्वयं उनका जाप करे।  वह भी न करे तो हृदय में केवल भगवान के नाम का स्मरण करे तो भी संकट दूर हो जाते हैं।  शादी तथा दुकान मकान के मुहूर्त के लिये पंडितों के पास जाकर तारीख निकाली जाती है पर क्या कभी किसी ने सोचा है कि जब यह प्रथ्वी, चंद्रमा या सूरज स्थापित हुआ होगा तक किसने मुहूर्त निकाला होगा।
कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तथा भक्ति भाव ही हमारे जीवन की नैया पार लगा सकता है। इस देह के जन्म या मृत्यु को लेकर नाटकबाजी करना बेकार है।  कोई आदमी पैदा होता है तो लोग जश्न मनाते हैं और मरता है तो रोते हैं।  मरने के बाद भी देह का यशोगान करना हमारी परंपरा नहीं है-यानि जन्म तिथि और पुण्यतिथि मनाना भी देहाभिमान का प्रमाण है।  अनेक महापुरुषों ने तेरहवीं और श्राद्धों का भी विरोध किया है।  श्रीमद्भागवत गीता के पहले अध्याय को विषाद योग कहा जाता है जिसमें वीर अर्जुन अपनी चिंताओं से श्रीकृष्ण जी को अवगत कराते हैं-उसमें पितरों के श्राद्ध पर संकट की बात भी कहते हैं।  सीधी बात यह है कि मृत्यु पर शोक करना या तेरहवीं और श्राद्ध करना विषाद को ही जन्म देता है।  अनेक लोग केवल इसलिये ही शोक, श्राद्ध तथा तेरहवीं करते हैं कि न करने पर समाज क्या कहेगा? वह यह सब करते हुए तनाव भी अनुभव करते हैं पर कह नहीं पाते। भगवान श्रीकृष्ण ने बाद के पंद्रह अध्यायों में इसी प्रकार की सकाम भक्ति को अनावश्यक बताया है।  इस तरह के कर्मकांड न केवल धन बल्कि समय भी नष्ट करते हैं और अंततः निजी तनाव का कारण भी इन्हीं से उत्पन्न होता है।

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विदुर नीति-कोमल व्यवहार तीर्थ करने समान (komal vyavhar aur teerth-hindi sandesh)


सर्वतोर्थेषु वा स्नानं स्र्वभूतेषु चार्जवम्।
उभे त्वेते समेस्यातामार्जवं वा विशिष्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
अनेक जगह तीर्थों पर स्नान करना तथा प्राणियों के साथ कोमलता का व्यवहार करना एक समान है। कोमलता के व्यवहार का तीर्थों से अधिक महत्व है।
यावत् कीर्तिर्ममनुष्य पुण्या लोके प्रगीयते।
तावत् स पुरुषव्याघ्र स्वर्गलोके महीयते।।
हिन्दी में भावार्थ-
इस धरती पर किसी भी मनुष्य की जब तक पवित्र प्रतिष्ठा या कीर्ति रहती है तभी तक वह स्वर्ग में निवास करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे धर्म में तीर्थों का विशेष महत्व है। पर्यटन, अध्यात्मिक तथा वैचारिक शुद्धता के लिये तीर्थों पर जाना अच्छी बात है। इतना अवश्य ध्यान रखें कि सामान्य स्थिति में अपने आसपास रहने वाले लोगों के साथ कोमलता का व्यवहार करें जो कि तीर्थों की तरह फल देने वाला होता है। साथ ही यह भी प्रयास करें कि अपने हृदय में हमेशा दूसरों के लिये कोमल भाव रहे। हर व्यक्ति के लिये मंगल कामना करें न कि दिखावे के लिये कोमलता दिखायें। यह ढोंग होगा और इससे न तो दूसरे के हृदय को शांति नहीं मिलेगी और न ही अपना भला होगा। बाहरी कोमलता अंदर की कटुता को खत्म नहीं करती और कहीं न कहीं वह चेहरे पर प्रकट हो जाती है। कोमल व्यवहार से अभिप्राय यही है कि वह हृदय से उत्पन्न होना चाहिए।
अक्सर हमारे देश में स्वर्ग पाने और दिलाने की आड़ में धार्मिक खेल चलता है। इसके लिये लोग धन खर्च करते हैं और ढोंगी उनसे अपना आर्थिक सम्राज्य स्थापित करते हैं। अनेक लोग तो यह धन दूसरों से ठगकर या शोषण कर एकत्रित करते हैं और उनकी अपकीर्ति चारों तरफ फैल रही होती है। सच बात तो यह है कि जिसकी कीर्ति इस संसार में नहीं है उसे स्वर्ग कभी नहीं मिल सकता और जिसने अपने व्यवहार से यहां कीर्ति प्राप्त की तो उसका हृदय वैसे ही शुद्ध हो जाता है और वह यहां तो धरती पर ही स्वर्ग प्राप्त करता ही है आकाश में उसके लिये तब तक जगह बनी रहती है जब तक उसकी कीर्ति इस धरती पर बनी रहती है। अतः जहां तक हो सके हृदय में कोमलता का भाव धारण कर सभी से मधुर व्यवहार करें।

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मनु स्मृति-अपने हृदय को देवता समझें (dil hi bhagvan hai-hindu dharma sandesh)


द्यौर्भूमिरापो हृदयं चंद्रर्काग्नि यमानिलाः।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मख्च वृत्तजाः सर्वदेहिनाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार आकाश, पृथ्वी, पानी, हृदय, चंद्र, सूर्य, अग्नि, यम, वायु, रात संध्या और धर्म सभी प्राणियों के सत् असत् कर्मों को देखते हैं। इनको देवता ही समझना चाहिये।
साक्ष्येऽनृतं वदन्याशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम्।
विवशः शमाजातीस्तरस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
झूठी गवाही देने वाले मनुष्य, वरुण देवता के पाशों से बंधकर सैंकड़ों वर्षों तक जलोदर बीमारियों से ग्रसित जीवन गुजारता है। अतः हमेशा किसी के पक्ष में सच्ची गवाही ही देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्या हम सोचते हैं कि हम कोई भी काम कर रहे हैं तो दूसरा कोई उसे नहीं देख रहा? ऐसी गलती कभी न पालें। इस धरा पर ऐसे कई जीव विचरण कर रहे हैं जिनको हम नहीं देख पाते पर वह हमें देख रहे हैं। दूसरों की छोड़िये अपने अंदर के हृदय को ही कहां देख पाते हैं। यह हृदय भी देवता है पर उसे कहां समझ पाते हैं? वह लालायित रहता है धर्म और परोपकार का कार्य करने के लिये पर मनुष्य मन तो हमेशा अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर विचरण करता है। एक नहीं अनेक बार झूठ बोलते हैं। दूसरों की निंदा करने के लिये प्रवृत्त होने पर उसके लिये ऐसे किस्से गढ़ते हैं कि जो हम स्वयं जानते हैं कि वह सरासर झूठ है। मगर बोलते हैं यह मानते हुए कि कोई देख नहीं रहा है।

ऐसे भ्रम पालकर हम स्वयं को धोखा देते हैं। इस चंद्रमा, सूर्य नारायण, प्रथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के साथ हमारा हृदय देवता सब देख रहा है। समय आने पर यह देवता दंड भी देते हैं। अतः कोई भी अच्छा काम करते हुए इस बात की चिंता नहीं करना चाहिये कि कोई उसे देख नहीं रहा तो क्या सुफल मिलेगा तो बुरा कर्म करते हुए इस बात से लापरवाह भी न हों कि कौन देख रहा है जो सजा मिलेगी?
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