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श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान और ज्योतिष ज्ञान-हिन्दी आलेख (shri madbhagvat geeta ka gyan aur jyotish-hidni article)


भारतीय ज्योतिष विज्ञान का विरोध किसलिये हो रहा है। चंद ज्योतिषी इस आड़ में यहां के लोगों को मूर्ख बना रहे हैं और हम यह जानते हैं। इसे बार बार दोहराने से क्या मतलब है? यहां के लोगों को बेवकूफ समझते हैं और अंग्रेजी शिक्षा पाने के बाद कुछ कथित विद्वान समझते हैं कि यह देश मूर्खों का है। कुछ लोग तो पाश्चात्य सभ्यता में ऐसे रम गये लगते हैं और उनको यह लगता है कि ‘हमारे अलावा यह सब मूर्ख बसते हैं।’
सूर्य ग्रहण या चंद्रग्रहण क्या आता है भारतीय टीवी चैनल चंद ज्योतिषियों को लेकर बैठ जाते हैं। फिर शुरु होती है बहस। ज्योतिष पर ही बहस हो तो ठीक, पर वहां तो श्रीगीता मद्भागवत का विषय भी छा जाता है। श्रीमद्भागवत गीता वास्तव में अद्भुत ग्रंथ है। आप रोज पढ़िये समझ में तब तक नहीं आयेगा जब तक भक्ति भाव के साथ ही ज्ञान प्राप्ति की प्यास मन में नहीं होगी। जब समझ में आयेगा तो फिर आप किसी से बहस नहीं करेंगे। कोई अन्य एक बार करेगा पर फिर दूसरी बार सोचेगा भी नहीं। अगर आप श्रीगीता से लेकर बोल रहे हैं और अगले को चुप नहीं करा पाये तो समझ लीजिये कि आपको अभी सिद्धि नहीं मिली। मगर यह ज्योतिषी अपने व्यवसायिक हितों के लिये अनावश्यक रूप से श्रीमद्भागवत गीता को बीच में लाते हैं।
दरअसल भारतीय अध्यात्म पर हमले करने के लिये विरोधी लोगों को केवल तोते से ज्योतिष बताकर पैसे एैंठने वाले ही दिखते हैं। उस दिन तो हद ही हो गयी। एक साथ दो चैनलों पर सूर्य ग्रहण के बाद बहस चल रही थी। एक दक्षिण का तर्कशास्त्री एक ही समय दो चैनलों पर दिखाई दे रहा था। नाम से गैर हिन्दू धर्म का प्रतीत होने वाला वह शख्स तर्कशास्त्री कैसे था यह तो नहीं मालुम-वह अपने को नास्तिक बता रहा था- पर वह एक जगह भविष्यवक्ता और दूसरी जगह तंत्र मंत्र वाले से जूझता दिखा-दोनों बहसें पहले से ही कैमरे में दर्ज की गयी थी।
भविष्यवक्ता से उस कथित तर्कशास्त्री बहस पहले सीधे हुई थी। उसमें उसने अपनी जन्मतिथि बताई तो भविष्यवक्ता ने उससे कहा कि ‘तुम्हारा घरेलू जीवन तनाव से भरा है।’
उसने इंकार किया और तब उसकी पत्नी से फोन पर पूछा गया तो वह भी ज्योतिषी की बात से असहमत हुई। बात आयी गयी खत्म होना चाहिये थी पर नहीं! अगले दिन फिर वह तर्कशास्त्री आया और आरोप लगाया कि ज्योतिषी उसकी जन्मतिथि पूछने के बाद फोन करने गया था, और वहीं से किसी से पूछकर भविष्य बताया। चैनल में काम करने वाली एक महिला तकनीशियन ने उसे बताया था कि ज्योतिषी का एक एस. एम. एस आया था। ज्योतिषी अब फोन पर बात करते हुए बता रहा था कि ‘उस समय तो मेरा फोन ही बंद था।’
चैनल की महिला तकनीशियन ने बताया कि यह संदेश बहस समाप्ति के बाद ही आया था। बहस का ओर छोर नहीं मिल रहा था।
यही तर्कशास्त्री उसी समय एक दूसरे चैनल पर एक तांत्रिक से उलझा हुआ था। तांत्रिक कह रहा था कि मैं तीन मिनट में तुम्हें बेहोश कर दूंगा। तांत्रिक को अवसर दिया गया पर वह ऐसा नहीं कर सका। इस दौरान वह संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण करता रहा। अब कौन कहे कि कहां ज्योतिष और कहां यह तंत्र मंत्र! मगर चूंकि भारतीय अध्यात्म को निशाना बनाना है तो ऐसे अनेक विषय मिल ही जाते हैं।
इस पूरी बहस में हमें हंसी आयी। ऐसा लगता है कि श्रीमद्भागवत गीता की तरह ज्योतिष भी एक ऐसा विषय है जो चाहे जितना पढ़ लो समझ में नहीं आ सकता जब तक अपने रक्त में समझदार तत्व प्रवाहित न हो रहे हों। इसी बहस में एक ज्योतिष पढ़ चुकी महिला कह रही थी कि मुझे ज्योतिष में विश्वास नहीं है। यहां तक कि मैं अपना भविष्यफल जानने की कोशिश नहीं करती।’
इसलिये हमें यह लगा कि ज्योतिष भी श्रीगीता की तरह सभी के समझ में न आने वाला विषय हो सकता है। आखिरी ज्योतिष पढ़ चुकी एक महिला कह रही है तो यही समझा जा सकता है।
बहरहाल हमें यह लगा कि इस आड़ के भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का मजाक उड़ाने का प्रयास हो रहा है। ज्योतिष विषय पर टीवी पर ही एक विद्वान द्वारा दी गयी जानकारी हमें अच्छी लगी। उसने बताया कि ज्योतिष के छह भाग हैं जिनमें एक ही भाग ऐसा है जिसमें समय समय पर पूछने पर भविष्य बताया जाता है। उन्होंने बताया कि गणितीय गणना भी ज्योतिष का भाग है जिसके आधार पर हमारे पुराने विद्वानों ने सूरज, चंद्रमा तथा अन्य ग्रहों का पता लगाया था।
वैसे पता नहीं कैसे लोग कहते हैं कि ग्रहों का असर नहीं होता? इस विषय पर हमारा आधुनिक तर्कशास्त्रियों से मतभेद है। सूर्य जब दक्षिणायन होता है तो ठंड पड़ती है। यह ठंड आदमी को शरीर को कंपकंपा देती है और यकीनन उसकी मनस्थिति बिगड़ती है। आधुनिक विज्ञानी एक तरफ कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग रहता है तब यह कैसे संभव है कि गर्मी फैला रहे सूर्य में जल रहा शरीर अपना ठंडा दिमाग रख सके। श्रीगीता के ‘गुण ही गुण बरतते हैं’ के सिद्धांत को हमने अपनी देह पर लागू होते देखा है। जब परेशान होते हैं तब सूर्य, चंद्रमा और आकाश की स्थिति को देखकर लगता है कि यह सभी ग्रहों का असर है। जब यह बदलेंगे तो हमारी मानसिकता भी बदलेगी। एक सम्मानित वैज्ञानिक भी वहां आये थे-यकीनन वह बहुत महान हैं पर उनको ग्रहण के अवसर पर ही लाया जाता है। हमने कभी किसी ग्रहण के अवसर पर एक कार्यक्रम में उनको कहते सुना था कि ‘हम यह तो पता नहीं लगा सके कि धरती से बाहर जीवन है कि नहीं, पर यह तय है कि जीवन के आधार वहां ऐसे ही होंगे।’
उन्होंने शायद यह भी कहा था कि जिस तरह धरती और सूर्य के बीच अन्य ग्रह हैं वह दूसरी सृष्टि में भी होंगेे तभी वहां जीवन होगा। तात्पर्य यह है कि कहीं जीवन होगा तो वहां ऐसी प्रथ्वी होगी जिसके पास अपना सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति, शुक्र, बुध, शनि, मंगल तथा अन्य ग्र्रह भी होंगे। हम इसे यह भी कह सकते हैं कि यह ग्रह सभी प्रकार के जीवन का आधार हैं तो फिर यह कैसे संभव है कि वह मनुष्य जीवन को प्रभावित न करें।
हमने अपने अनुभव से एक बात यह देखी है कि एक ही नाम के दो व्यक्ति में कई बार स्वभावगत, परिवार तथा वैचारिक स्तर पर समानता होती है। यह सही है कि सभी का जीवन स्तर समान नहीं होता पर उनकी आदतें और विचार एक ही तरह के दिखते हैं। संभव है कुछ ज्योतिषी इसका दुरुपयोग करते हों पर सभी को इसके लिये गलत नहीं ठहराया जा सकता।
दूसरी बात यह है कि ज्योतिष में ही हमारा खगोल शास्त्र भी जुड़ा हुआ है। हमारे यहां अनेक पंचांग छपते हैं जिनमें सूर्य और चंद्रग्रहण की तारीख और समय छपा होता है और जो पश्चिमी विज्ञान की भविष्यवाणी से मेल खाता है। भारत में अनेक लोगों को पता होता है कि अमुक तारीख को सूर्य या चंद्रग्रहण होगा। अखबार और टीवी में तो बहुत बाद में पढ़ते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय ज्योतिष एक विज्ञान है मगर इस विषय पर वही लोग बोल और लिख रहे हैं जिनको इसका ज्ञान नहीं है-इनमें वह लोग भी हैं जो पढ़े पर समझ नहीं पाये। वैसे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस तरह की बहसें प्रायोजित हैं ताकि भारतीय अध्यात्म को विस्मृत किया जा सके। एक तर्कशास्त्री की दो जगह उपस्थित यही प्रमाणित करती है।
आखिरी सलाह ज्योतिषियों को भी है कि हो सके तो वह श्रीमद्भागवत गीता से दूर ही रहें क्योंकि वह समझना भी हरेक के बूते का नहीं है। उसमें जो योग और ध्यान के अभ्यास का संदेश दिया गया है उसमें इतनी शक्ति है कि उससे न यहां आदमी इहलोक बल्कि परलोक भी सुधार लेता है। सूर्य इस देह को जला सकता है पर उस आत्मा को नहीं जो न जल सकती है न मर सकती है। किसी भी प्रकार के विज्ञान से परिपूर्ण होने की बात तो उसमें कही गयी है पर इसका मतलब यह नहीं है कि ज्योतिष विज्ञान में पारंगत होने का आशय श्रीगीता सिद्ध हो जाना है। वैसे ज्योतिषियों को यह पता होना चाहिये कि इस तरह अपने ज्ञान का प्रदर्शन अज्ञानियों के सामने प्रदर्शन तामसी प्रवृत्ति का परिचायक है और उनके सामने श्रीगीता का ज्ञान देने की मनाही तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी की है।

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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हिन्दू धर्म संदेश-अन्य लोगों के काम करने पर मिलती है इज्जत


स्वारथ सूका लाकड़ा, छांह बिहना सूल।
पीपल परमारथ भजो, सुख सागर को मूल।।
संत कबीरदास जी का कहना है कि स्वार्थ तो सूखी लकड़ी के समान हैं जिसमें न तो छाया मिलती है और न ही सुख। एक तरह से वह कांटे की तरह है। इसके विपरीत परमार्थ पीपल के पेड़ के समान हैं जो सुख प्रदान करता है।
धन रहै न जोबन रहे, रहै न गांव न ठांव।
कबीर जग में जस रहे, करिदे किसी का काम।
संत कबीर दास जी कहते हैं कि एक दिन यह न धन रहेगा न यह यौवन ही साथ होगा। गांव और घर भी छूट जायेगा पर रहेगा तो अपना यश, यह तभी संभव है कि हमने किसी का काम किया हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह लोगों की गलतफहमी है कि वह भौतिक उपलब्धियों के कारण सम्मान पा रहे हैं। लोग अपनी आर्थिक उपलब्धियों, परिवार की प्रतिष्ठा और अपने कर्म का बखान स्वयं करते हैं। मजा तो तब है जब दूसरे आपकी प्रशंसा करेें और यह तभी संभव है कि आप अपने काम से दूसरे की निस्वार्थ भाव से सहायता कर उसको प्रसन्न करें।
आप कहीं किसी धार्मिक स्थान, उद्यान या अन्य सार्वजनिक स्थान पर जाकर बैठ जायें। वहां आपसे मिलने वाले लोग केवल आत्मप्रवंचना में लगे मिलेंगे। हमने यह किया, वह किया, हमने यह पाया और हमने यह दिया जैसे जुमले आप किसी के भी श्रीमुख से नहीं सुन पायेंगे।
दरअसल बात यह है कि सामान्य मनुष्य पूरा जीवन अपने और परिवार के लिये धन का संचय कर यह सोचता है कि वह सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित कर रहा है और परमार्थ करना उसके लिये एक फालतू विषय है। जब उससे धन और यौवन विदा होता है तब वह खाली बैठे केवल अपने पिछले जीवन को गाता है पर सुनता कौन है? सभी तो इसमें ही लगे हैं। इसलिये अगर ऐसा यश पाना है जिससे जीवन में भी सम्मान मिले और मरने पर भी लोग याद करें तो दूसरों के हित के लिये काम करें। जब समय निकल जायेगा तब पछताने से कोई लाभ नहीं होगा।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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धर्म का बाज़ार सजाने की कोशिश-हिन्दी आलेख (dharma ka bazar-hindi lekh)


धार्मिक सत्संगों का आयोजन कोई सरल और सस्ता काम नहीं है। प्रबंधन एक कला है और जिस आदमी को कोई आर्थिक व्यवसाय करना हो तो केवल उसे संबंधित क्षेत्र की जानकारी के साथ प्रबंध का ज्ञान होना चाहिए तो वह अच्छा काम कर लेता है पर अगर प्रबंध क्षमता का सत्संग में प्रयोग करना हो तो उसके लिये कुछ अध्यात्मिक ज्ञान के साथ धार्मिक दिखना भी जरूरी है। अपने यहां सत्संग भी एक व्यवसाय है और धर्म प्रेमी धनिकों में मौजूद देवत्व की आराधना कर उसने धन प्राप्त करना कोई इतना सरल काम नहीं होता जितना अन्य व्यवसायों में लगता है। अन्य व्यवसायों में प्रबंधक स्वयं भी पूंजी लगा सकता है पर सत्संग के आयोजन में कोई ऐसा जोखिम नहीं उठाता क्योंकि उसमें केवल किताबें या मूर्तियां ही नहीं बेचना होता बल्कि एक अदद संत भी रखना पड़ता है।
विदेश में कहीं किसी धार्मिक कार्यक्रम का टीवी पर सीधा प्रसारण हो रहा था। आमतौर से धार्मिक विषयों पर व्यंग्य नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसा कर आप अपनी कुंठाओं का परिचय देते भी लग सकते हैं, पर ऐसे कार्यक्रमों में कुछ ऐसी गतिविधियां भी होती हैं जो वहां मौजूद लोगों को भी हंसाती हैं भले ही वह उस समय कहते न हों। उस धार्मिक कार्यक्रम में कुछ बुद्धिजीवियों के भाषण हुए तो संतों ने भी प्रवचन दिये। उच्च वर्ग के धार्मिक लोगों के माध्यम से सी.डी. आदि का विमोचन करवाकर उनकी भी धार्मिक भावनाओं को तृप्त किया गया-अपने देश में खास भक्त कहलाने पर बड़े लोगों को शायद एक अजीब अनुभूति होती है।
भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के प्रयास के रूप में हो रहे उसे कार्यक्रम को टीवी पर देखकर अनेक ऐसी बातें मन में आयीं जो सब की सब यहां लिखना कठिन है। कार्यक्रम का अधिकतर भाग किसी माननीय संत की प्रशंसा में गुजरा। वहां दो संतों की मूर्तियां भी रखी गयी थीं जिन पर बड़े लोग मंच पर आकर प्रणाम करते और फिर अपना व्याख्यान देते।
इन मूर्तियों को देखकर लगता था कि वह संत ही केवल भारतीय अध्यात्म के आधार हैं। हां, वह पर सर्वशक्तिमान के भारतीय स्वरूपों में प्रचलित नामों का उल्लेख हुआ पर उनकी मूर्तियां वहां न देखकर एक खालीपन लगा। एक बात यहां बता दें कि भगवान श्रीराम, कृष्ण या शिव जी की मूर्तियां जरूर हम लोग देखते हैं पर वह हमारे अंदर निरंकार के रूप में स्वाभाविक रूप से विराजमान रहते हैं। दूसरी बात यह है कि यह मूर्तियां पत्थर, धातु या लकड़ी की बनती हैं पर उनके अस्तित्व का आभास ही हमें शक्ति देता है। संतों की मूर्तियां रखना गलत नहीं है पर ऐसी जगह पर सर्वशक्तिमान की मूर्ति न होना इस बात का प्रमाण है कि वह सत्संग अधूरा है। दूसरी बात यह है कि देहधारी संत चाहे कितने भी माननीय हों पर उनकी मूर्तियों में कहीं न कहीं उनकी मृत्यु की अनुभूति है इसलिये उनसे आम भारतीय अधिक लगाव हृदय में धारण नहीं कर पाता। भारतीय अध्यात्म का आधार यही है कि आत्मा कभी नहीं मरता और देह नश्वर है। इसलिये जिसमें देह का आभास है वह मूर्तियां भारतीय भक्त को नागवार लगती हैं। भगवान श्री राम, श्रीकृष्ण और श्री शिवजी के साथ अन्य देवताओं की मूर्तियों में ऐसा आभास नहीं होता। दरअसल यह प्रतिमायें पूजना इसलिये भी गलत है कि हम दूसरी विचारधाराओं के ऐसे ही कदम की आलोचना करते हैं। इधर यह भी देखने में आ रहा है कि हमारे पूज्यनीय संतों की समाधियां पूजी जा रही हैं। यह परब्रह्म से परे रखने का प्रयास भर है ताकि लोग मायावी दुनियां में ही घूमते रहें। ऐसे कथित ज्ञान लोग नाम तो सर्वशक्तिमान के रूपों का लेते हैं पर सामने अपना चेहरा लगा लेते हैं-यह धार्मिक भावनाओं का एक तरह से दोहन है।
संत कबीर एक महान संत कवि हुए हैं मगर उनकी मूर्ति रखकर पूजा करने का आशय यही है कि आप उनको समझे ही नहीं। जो गुरु तत्व ज्ञान देगा और उसका शिष्य ब्रह्म तत्व को समझ जायेगा तो स्वयं ही गुरु का मानेगा। यह बात श्रीमद्भागवत गीता भी कहती है और संत कबीर उसकी पुष्टि भी करते हैं। गुरु का दायित्व है कि वह शिष्य को गोविंद दिखाये-इससे यूं भी कह सकते हैं कि सत्गुरु से मिलाये। मगर आजकल के नये गुरु गोविंद के नाम पर अपना चेहरा लगा लेते हैं और स्वयं को ही सत्गुरु की तरह स्थापित करने का उनका प्रयास रहता है।
हम यहां उन माननीय गुरुओं की आलोचना नहीं कर रहे जिनकी तस्वीरें वहां रखी थीं। यकीनन उन लोगों ने श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान ग्रहण कर इतने सारे लोगों का सुनाया होगा। अब उनके बाद के शिष्यगण उनकी मूर्तियां लगाकर अपना सत्संग व्यवसाय चला रहे होंगे। केवल यही प्रसंग नहीं है बल्कि कई ऐसे अन्य उदाहरण भी है जिसमें तत्व ज्ञान का उपदेश करने वाले संत इस संसार से दैहिक रूप से क्या विदा होते हैं उनके चेहरे पत्थरों में सजाकर उनकी पूजा की जाती है। उनकी कर्मस्थली में जहां कभी सर्वशक्तिमान की मूर्तियां की आराधना करते हैं उनके जाते ही उनका महत्व कम प्रचारित होता है और संतों को सत्गुरु की जगह दी जाती है। कुछ लोगों ने संत शिरोमणि कबीरदास जी की मूर्तियां भी बनवाई हैं जबकि भारतीय अध्यात्मिक का वह एक ऐसा प्रकाशमान पुंज थे जो अपन रचनाओें से हमेशा ही भारतीय जनमानस में रहेंगे। उनकी मूर्तियां बनवाना ही उनके पथ से अलग हटना है। ऐसा अनेक संतों के शिष्य कर रहे हैं।
आखिरी मजेदार बात यह रही कि उसी कार्यक्रम में घोषणा की जा रही थी कि कार्यक्रम की कैसिटें और सर्वशक्तिमान की मूर्तियां आज ही यहां दरों में बीस प्रतिशत कटौती पर मिलेंगी। कैसिटें आज कम हैं इसलिये आज आर्डर दें तो कम दर पर भेजी जायेंगी।
यह बात हंसी पैदा करने वाली थी साथ ही यह संदेश भेजने वाली थी कि इसमें कोई व्यवसाय है। यह धर्म के नाम पर लगी सेल अचंभित करने वाली थी। अब इससे एक ही बात लगती है कि संतों के वर्तमान उतराधिकारी और प्रबंधक शिष्य आम आदमी के बारे में यह धारणा रखते हैं कि वह भक्त होने के कारण वह इसे बुरा नहीं समझते या फिर ऐसी अपेक्षा करते हैं कि पुराने मनीषियों की बात मानते हुए भक्तों को अपने गुरुओं को में दोष नहीं देखना चाहिये और हम तो गुरु हैं चाहे जो करें।’
हम भी गुरुओं की आलोचना के खिलाफ हैं पर भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में यह वर्णित है कि पहले सत्य को समझो और देखभाल के गुरु बनाओ। दूसरों में दोष मत देखो पर दुर्जन का साथ भी न करो। सीधा आशय यही है कि कहीं न कहीं अपनी अक्ल का इस्तेमाल करो-यही भारतीय अध्यात्मिक संदेशों का आधार है। बहरहाल धर्म के नाम यह यह सेल लगाना ठीक नहीं है पर लगती भी है तो चिंतित होने वाली बात नहीं है। अपना तो एक ही काम है कि जहां भी समय मिले अच्छी बात सुनो उसक मंथन करो। जो अच्छा लगे उसे ग्रहण करो और जो बुरा, उसे भुला दो।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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चाणक्य नीति-अपने मुख में कटु शब्दों की खेती न करें


यदीच्छसि वशीकर्तंु जगदेकेन कर्मणा।
परापवादसस्येभ्यो गां चरंन्तीं निवारथ।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि यदि कोई मनुष्य अपने किसी एक काम से ही सारी पृथ्वी पर अपना नाम करना चाहता है तो बस दूसरों की निंदा त्याग दे। अपने मूंह में किसी दूसरे के प्रतिकूल लगने वाले शब्दों की खेती करना बंद कर देना चाहिए।

स जीवति गुणा यस्य धर्मः स जीवति।
गुणधर्मविहीनस्य जीवतं निष्प्रयोजनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि वही मनुष्य जीवित माना जाता है जिसमें गुण हों और उसने जीवन में धर्म धारण कर लिया है। गुण और धर्म के बिना मनुष्य का जीवन जीना व्यर्थ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिस मनुष्य में दूसरों को प्रभावित करने वाला गुण नहीं है और न ही उसका अपने स्वार्थ के अलावा कोई धर्म है वह जीवित होेते हुए भी मृतक समान है। अपने और परिवार का पेट तो सभी पालते हैं पर जो परोपकार करे वही सच्चा मनुष्य है।
मनुष्य का सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह स्वयं कोई धर्म या परोपकार किये बिना ही अपने को ज्ञानी और परोपकारी प्रमाणित करना चाहता है। इसके लिये वह दूसरों की निंदा करता है। अक्सर वार्तालाप में अज्ञानी लोग अपने मुख से दूसरे के लिये निंदात्मक शब्द कहकर यह साबित करते हैं कि अमुक दुर्गुण हमारे अंदर नहीं है या दूसरे के मुकाबले हमारे अंदर यह गुण है। देखा जाये तो इस विश्व में अधिकतर झगड़े इसी बात को लेकर होते हैं कि सभी अपने को श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं पर उसके लिये वह कोई सात्विक काम नहीं करना चाहते। ज्ञानी आदमी को किसी की न तो निंदा करना चाहिए न ही किसी में दोष देखना चाहिए। हो रहा है उल्टा! लोग एक दूसरे को नीचा बताते हुए आक्रामक रूप से अपनी श्रेष्ठता साबित करना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि दूसरे के प्रति बुरा सोचना और बोलना अगर लोग कम कर दें तो पूरे विश्व में शांति स्वतः आ जाये।
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बहादुर बनना है तो फिल्में न देखें-हिन्दी हास्य व्यंग्य (hindi film aur bahaduri-hasya vyangya


पिछले दो तीन दिनों से टीवी पर बच्चों की बहादुरी के किस्से आ रहे हैं। एक लड़की अपहर्ताओं को चकमा देकर भाग निकली। चलती ट्रेन में डकैती करने वालों को बच्चों ने भागने के लिये बाध्य किया। कुछ और भी घटनायें सामने आ रही हैं। आगे भी ऐसी ही घटनायें आयेंगी और आप देखना वह समय आने वाला है जब भ्रष्टाचारी और अनाचारी लोगों को हमारी कौम के युवा ही सबक सिखायेंगे बस जरूरत इस बात की है कि उनको नैतिक समर्थन मिलना चाहिये।

यह सोचकर लोग सोच रहे होंगे कि आखिर इस निराशाजनक वातावरण के बीच यह आशा की किरण कौन निरर्थक जगा रहा है? सोचने का अपना तरीका होता है पर कोई बात है जो मन में होती है पर हम उसे स्वयं नहीं देख पाते। दरअसल आज की नयी पीढ़ी मनोरंजन के लिये हिंदी फिल्मों पर निर्भर नहीं है। आजकल के सभी बच्चे-जो कभी युवा तो होंगे-हिंदी फिल्में नहीं देखते और यकीनन जो नहीं देखेंगे वह बहादुर बनेंगे, यह हमारा दावा है। अगर आज की सक्रिय पीढ़ी को देखें तो वह कायरों जैसी लगती है और इसका कारण है फिल्में। इसने उस दौर की फिल्में देखी हैं जब मनोंरजन का वह इकलौता साधन था और जो कायरता का बीच बो रही थीं। सामने कोई भी हो पर इनके पीछे के प्रायोजक सही नीयत के लोग नहीं थे और उनका हित समाज को कायर बनाने में था। यहां तक कि कलात्मक फिल्मों के नाम पर ऐसी कायरता समाज में बोई गयी।
एक फिल्म में नायिका को निर्वस्त्र किया गया और बाकी लोग हतप्रभ होकर देख रहे थे। दृश्य मुंबई के किसी मोहल्ले का था। कहने को निर्देशक कह रहे थे कि हम तो वही दिखा रहे हैं जो समाज में होता है पर यह सरासर झूठ था। उस समय तक यह संभव नहीं था कि किसी छोटे शहर में कोई शोहदा ऐसी हरकत करे और सभी लोग उसे नकारा होकर देखें।
अनेक फिल्मों में ईमानदारी पुलिस इंस्पेक्टर का पूरा का पूरा परिवार का सफाया होते दिखाया गया। आज आप जिस शोले, दीवार और जंजीर फिल्मो की बात सोचें तो वह मनोरंजन से अधिक समाज को कायर बनाने के लिये बनायी गयीं। संदेश यह दिया गया कि अगर आप एक आम आदमी हो तो चुपचाप सभी झेलते जाओ। नायक बनना है तो फिर परिवार के सफाये के लिये मन बनाओ।
सच बात तो यह है कि सभी पुलिस वाले भी ऐसे नहीं थे जैसे इन फिल्मों में दिखाये गये। पुलिस हो या प्रशासन आदमी तो आदमी होता है जब समाज के अन्य लोगों पर बुरा प्रभाव पड़े तो वह इससे बच जाये यह संभव नहीं है। इसलिये उस समय जो बच्चे थे वह जब सक्रिय जीवन में आये तो कायरता उनके साथी थी।

इस संबंध में पिछले साल की टीवी पर ही दिखायी गयी एक घटना याद आ रही है जब बिहार में एक स्त्री को निर्वस्त्र किया जा रहा था तब लोग नकारा होकर देख रहे थे। तब लगने लगा कि समाज पर हिंदी फिल्मों ने अपना रंग दिखा दिया है। इधर हमारे टीवी चैनल वाले भी इन फिल्मों के रंग में रंगे हैं और वह ऐसे अवसरों पर ‘हमारा क्या काम’ कर अपने फोटो खींचते रहते हैं।
आजकल की सक्रिय पीढ़ी बहुत डरपोक है। फिल्म के एक हादसे से ही उस पर इतना प्रभाव पड़ता रहा है कि हजारों लोग भय के साये में जीते हैं कहीं किसी खलनायक से लड़ने का विचार भी उनके मन में नहीं आता।
सच बात तो यह है कि इन फिल्मों का हमारे लोगों के दिमाग पर बहुत प्रभाव पड़ता रहा है और आज की पीढ़ी के सक्रिय विद्वान अगर यह नहीं मानते तो इसका मतलब यह है कि वह समाज का विश्लेषण नहीं करते। फिल्मों के इसी व्यापाक प्रभाव का उनसे जुड़े लोगों ने अध्ययन किया इसलिये वह इसके माध्यम से अपने ऐजंेडे प्रस्तुत करते रहे हैं। अगर आप थोड़ा बहुत अर्थशास्त्र जानते हैं और किसी व्यवसाय में रहे हों तो इस बात को समझ लीजिये कि इसका प्रायोजक फिल्मों से पैसा कमाने के साथ ही अपने ऐजेंडे इस तरह प्रस्तुत करता है कि समाज पर उसका प्रभाव उसके अनुकूल हो। आपको याद होगा जब देश आजाद हुआ तो देशभक्ति के वही गाने लोकप्रिय हुए जो फिल्मों में थे। फिर तो यह आलम हो गया कि हर फिल्में एक गाना देशभक्ति का होने लगा था। फिर होली, दिवाली तथा राखी के गाने भी इसमें शामिल हुए और उसका प्रभाव पड़ा।
अगर आप कोई फिल्म में देखें तो उसका विषय देखकर ही आप समझ जायेंगे कि उसके पीछे कौनसा आर्थिक तत्व है। हमने तो यही आंकलन किया है कि जहां से पैसा आ रहा है उसकी हर कोई बजा रहा है। आजकल के संचार माध्यमों में तमाम तरह के प्रसारण देखकर इस बात को समझ लेते हैं कि उनके आर्थिक स्त्रोत कहां हैं। यह जरूरी नहीं है कि किसी को प्रत्यक्ष सहायता दी जाये बल्कि इसका एक तरीका है ‘विज्ञापन’। इधर आप देखें तो अनेक धनपतियों -जिनको हम आज के महानायक भी कहते सकते हैं-के अनेक व्यवसाय हैं। वह क्रिकेट और फिल्मों से जुड़े हैं तो उनको इस बात की आवश्यकता नहीं कि आत्मप्रचार के लिये सीधे पैसा दें बल्कि उनसे अप्रत्यक्ष रूप से विज्ञापन पाने वाले उनका प्रचार स्वतः करेंगे। उनका जन्म दिन और मंदिर में जाने के दृश्य और समाचार स्वतः ही प्रस्तुत संचार माध्यमों में चमकने लगते हैं। फिर उनके किसी एक व्यवसाय के विज्ञापन से मिलने वाली राशि बहुत अच्छी हो तो उनके दूसरे व्यवसाय का भी प्रचार हो जायेगा।
हमने तो आत्मंथन किया है और अपने मित्रों से भी कई बार इस बात पर चर्चा की और सभी इस बात पर सहमत थे कि इन फिल्मों के माध्यम से समाज को कायर, लालची और अहंकारी बनाया गया है। वह इस बात को भी मानते हैं कि हो सकता है कि यह ऐजेंडा समाज को अपने चंगुल में रखने के प्रयास के उद्देश्य से ही हुआ हो। बहरहाल बच्चों की बहादुरी देखकर यह मन में आया कि यकीनन अब फिल्मों का इतना प्रभाव नहीं है और यकीनन उन बच्चों में हिंदी फिल्मों द्वारा पैदा किया जाने वाला कायरता का भाव उनमें नहीं जम पाया है। यह भाव इस तरह पैदा होता है कि एक चाकू पकड़े बदमाश भी इतना खतरनाक ढंग से पेशा आता है कि बाकी सभी लोग सांस थामें उसे देखते हैं तब तक, जब तक कोइ नायक नहीं आ जाता। इन फिल्मों पर यह आरोप इसलिये भी लगता है कि क्योंकि अधिकतर फिल्मों में खलनायक को लोगों का गोलियों से सीना छलनी करते दिखाने के बाद जब नायक से उसकी मुठभेड़ होती है तो वह लात घूंसों में दिखती है-कभी ऐसा नहीं दिखाया गया कि नायक पिस्तौल लेकर पहुंचा हो और पीछे से खलनायक को मारा हो। अपराधी खतरनाक, चालाक और अजेय होते हैं पर उतने नही जितने फिल्मों में दिखाया गया। ऐसे बहादुर बच्चों को सलाम। आजकल के बच्चों को तो बस हमारी यही शिक्षा है कि सब देखो। श्लील हो या अश्लीन वेबसाईट या फिल्म! सब चलेगा! मगर यह हिन्दी फिल्में मत देखना वरना कायरों की तरह जियोगे। जिन माता पिता को अपने बच्चे बहादुर बनाने हैं वह फिल्मों से अपने बच्चों को बचायें चाहे वह अंग्रेजी की हों-आखिर हिंदी फिल्में भी उनकी नकल होती हैं।
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कबीर के दोहे-अपने सुंदर और बड़े मकान पर अंहकार न करो


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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कबीर गर्व न कीजिए, ऊंचा देखि आवास
काल परौं भूईं लेटना, ऊपर जमसी घास

भावार्थ-अपना शानदार मकान और शानशौकत देख कर अपने मन में अभिमान मत पालो जब देह से आत्मा निकल जाती हैं तो देह जमीन पर रख दी जाती है और ऊपर से घास रख दी जाती है।
आज के संदर्भ में व्याख्या-यह कोई नैराश्यवादी विचार नहीं है बल्कि एक सत्य दर्शन है। चाहे अमीर हो या गरीब उसका अंत एक जैसा ही है। अगर इसे समझ लिया जाये तो कभी न तो दिखावटी खुशी होगी न मानसिक संताप। सबमें आत्मा का स्वरूप एक जैसा है पर जो लोग जीवन के सत्य को समझ लेते हैं वह सबके साथ समान व्यवहार करते हैं। हम जब किसी अमीर को देखते हैं तो उसको चमत्कृत दृष्टि से देखते हैं और कोई गरीब हमारे सामने होता है तो उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है। यह अज्ञान हमारे लिए कष्टकारक होता है। जब थोडा धन आता है तो मन में अंहकार आ जाता है और अगर नहीं होता तो निराशा में घिर जाते हैं और अपने अन्दर मौजूद आत्मा को नहीं जान पाते। यह आत्मा जब हमारी देह से निकल जाता है तो फिर कौन इस शरीर को पूछता है, यह अन्य लोगों की मृतक देह की स्थिति को देख सीख लेना चाहिये।
कई शानदार मकान बनते हैं पर समय के अनुसार सभी पुराने हो जाते हैं। कई महल ढह गये और कई राजा और जमींदार उसमें रहते हुए पुजे पर समय की धारा उनको बहा ले गयी। इनमें से कई का नाम लोग याद तक नहीं करते। हां, इतिहास उन लोगों को याद करता है जो समाज को कुछ दे जाते हैं। वैसे अपने इहकाल में भी किसी धनी को वही लोग सम्मान देते हैं जो उससे स्वार्थ की पूर्ति करते हैं पर जो ज्ञानी,प्रतिभाशाली और दयालु है समाज उसको वैसे ही सम्मान देता है यह जाने बगैर कि उसका घर कैसा है?
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संत कबीर वाणी-आदमी का दोस्त और दुश्मन उसके अन्दर ही बैठा है


शीतल शब्द उचारिये, अहं आनिये नाहिं।
तेरा प्रीतम तुझहि में, दुसमन भी तुझ माहिं

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से हमेशा ही ऐसे शब्दों का उच्चारण करो जो दूसरे को श्ीतलता प्रदान करें। अपने अहंकार में भरकर किसी से कठोर वचन मत कहो। सच बात तो यह है कि अपना दुश्मन या प्रेमी अपने अंदर ही है।
हरिजन सोई जानिए, जिव्हा कहैं न मार।
आठ पहर चितवन रहै, गुरु का ज्ञान विचार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान का सच्चा भक्त वही है जो अपनी जीभ से कभी यह नहीं कहता कि ‘इसे या उसे मार’। वह आठों पहर अपने गुरु के ज्ञान का विचार करते हुए अहिंसा भाव से रहता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में सारा खेल हमार इंद्रियों का है। इनमें भी सबसे अधिक हमारी जीभ का है। यही जीभ हमें तपती धूप में खड़ा कर सकती है और यही किसी छत के नीचे छाया दिला सकती है। ऐसी अनेक धटनायें होती हैं जिसमें बात बेबात मूंहवाद होने पर कत्लेआम हो जाता है। कहते हैं कि ‘न सूत न कपास, जुलाहों में लट्टम लट्ठा’। इसका संबंध केवल बुनकरों से नहीं है बल्कि यह पूरे समाज पर लागू होता है। लोग अपने अहंकार की तुष्टि के लिये अपनी वाणी का दुरुपयोग करते हैं और फिर होता है झगड़ा। अगर आप आये दिन होने वाले झगड़ों का विश्लेषण करें तो पता लगेगा कि बात तो कोई खास है नहीं है बल्कि झगड़ा करने वाले लोग अपने अहंकार की तुष्टि करने के लिये वाणी की आजादी का दुरुपयोग करना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि उनकी कटु बातों का कोई प्रतिकार न करे। वह अपशब्द बोलें तो लोग सहें।
सच बात तो यह है कि जो भक्ति और ज्ञानार्जन में लीन होते हैं वह इस तरह का व्यवाहर नहीं करते। उनकी वाणी हमेशा सार्थक वचनों का प्रवाह करती है। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या अब बहुत कम है।
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संत कबीर के दोहे:त्रिगुणी मायावृक्ष के नीचे सब ले रहे साँस


संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि
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तीन गुनन की बादरी, ज्यों तरुवर की छाहिं
बाहर रहे सौ ऊबरे, भींजैं मंदिर माहिं

तीन गुणों वाली माया के नीचे ही सभी प्राणी सांस ले रहे हैं। यह एक तरह का वृक्ष है जो इसकी छांव से बाहर रहेगा वही भक्ति की वर्षा का आनंद उठा पायेगा।

जिहि सर घड़ा न डूबता, मैंगल मलि मलि न्हाय
देवल बूड़ा कलस सौं, पंछि पियासा जाय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जहां कभी सर और घड़ा नहीं डूबता वहां वहां मस्त हाथी नहाकर चला जाता है। जहां कलसी डूब जाती है वहां से पंछी प्यासा चला गया।

संपादकीय व्याख्या-यहां भक्ति और ज्ञान के बारे में कबीरदास जी ने व्यंजना विद्या में अपनी बात रखी है। वह कहते हैं कि प्रारंभ में आदमी का मन भगवान की भक्ति में इतनी आसानी से नहीं लगता। उसे अपने अंदर दृढ़ संकल्प धारण करना पड़ता है। ज्ञान और भक्ति की बात सुनते ही आदमी अपना मूंह फेर लेता है क्योंकि उसका मन तोत्रिगुणी माया में व्याप्त होता है। यह विषयासक्ति उसे भक्ति और ज्ञान से दूर रहने को विवश करती है ऐसे वह भगवान का नाम सुनते ही कान भी बंद कर लेता है। जब उसका मन भक्ति और ज्ञान में रमता है तब वही आदमी संपूर्ण रूप से उसके आंनद में लिप्त हो जाता है-अर्थात जहां सिर रूपी घड़ा नहीं डूबता था ज्ञान प्राप्त होने पर वहां लंबा-चौड़ा हाथी नहाकर चला जाता है। जिसे ज्ञान नहीं है वह हमेशा ही प्यासा रहता है। माया के फेरे में ही अपना जीवन गुजार देता है। इस त्रिगुणी माया की छांव में जो व्यक्ति बैठा रहेगा वह भक्ति कभी नहीं प्राप्त कर सकता है।
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भर्तृहरि नीति शतक:दिल अगर न मिलें तो निकट व्यक्ति से भी दूरी अनुभव होती है


विरहेऽपि संगमः खलु परस्परं संगतं मनो येषाम्
हृदयमपि विघट्ठितं चित्संगी विरहं विशेषयति

हिंदी में भावार्थ-जिनके हृदय आपस में मिले हों वह विरह होने पर साथ रहने की अनुभूति करते हैं और जिनके मन न मिलते हों वह साथ भी रहें तो ऐसा लगता है कि बहुत दूर हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सारी दुनियां में प्रेम का संदेश फैलाया जाता है पर सच यह है कि प्रेम वह भाव है जो स्वाभाविक रूप से होता है। प्रेम में अगर कोई दैहिक,आर्थिक या सामाजिक स्वार्थ हो तो वह प्रेम नहीं रहता। ऐसे स्वार्थ के संबंध आदमी एक दूसरे से निभाते हैं पर उनमें आपस में हार्दिक प्रेम हो यह समझना गलत है। हमारा अध्यात्म दर्शन स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रेम दो अक्षरों का सीमित अर्थ वाला शब्द नहीं है बल्कि उसका आधार व्यापक है। जो व्यक्ति एक दूसरे के प्रति निस्वार्थ भाव रखते हैं वही प्रेम करते हैं।
वैसे आजकल प्रेम का शब्द चाहे जहां सुनाई देता है पर उसका भाव कोई जानता हो यह नहीं लगता। आजकल तो प्रेम स्त्री पुरुष के दैहिक संबंधों तक ही सीमित माना जाता है। कभी प्रेम दिवस तो कभी मित्र दिवस के नाम पर युवक युवतियों की दैहिक भावनाओं को भड़काने के लिये तमाम तरह के प्रयास उनको बाजार के उत्पादों के प्रयोक्ता बनाने के लिये किये जाते हैं पर यह क्षणिक आकर्षण कभी प्रेम नहीं होता। अनेक ऐसे प्रसंग भी सामने आते हैं जब कथित प्रेम के आकर्षण में फंसकर युवक युवती विवाह कर लेते हैं पर बाद में घर गृहस्थी के बोझ तले दोनों एक दूसरे के लिये अपरिचित होते जाते हैं। जहां हृदय के प्रेम की बात होती थी वहां जब अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिये संघर्ष की बात आती है तो सब कुछ हवा हो जाता है। ऐसे तनाव होता है कि एक छत के नीचे रहने वाले पति पत्नी एक दूसरे के लिये दूर हो जाते हैं।
नौकरी और व्यापार में अनेक लोगों से संपर्क प्रतिदिन बनता है पर सभी मित्र या प्रेमी नहीं बन जाते। कई बार तो ऐसा होता है कि अपने परिवार के सदस्यों से अधिक अपने निकट सहकर्मियों या निकटस्थ लोगों के साथ समय व्यतीत होता है पर फिर भी वह अपने नहीं बन पाते। उनसे मानसिक दूरी बनी रहती है। इसके विपरीत परिवार के सदस्य दूर हों तो भी हृदय के निकट होते हैं।
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कबीर के दोहे: शब्द हमेशा ही इस अन्तरिक्ष में विचरण करता है


कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार।
साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कटु वचन बहुत बुरे होते हैं और उनकी वजह से पूरा बदन जलने लगता है। जबकि मधुर वचन शीतल जल की तरह हैं और जब बोले जाते हैं तो ऐसा लगता है कि अमृत बरस रहा है।

शब्द न करैं मुलाहिजा, शब्द फिरै चहुं धार।
आपा पर जब चींहिया, तब गुरु सिष व्यवहार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शब्द किसी का मूंह नहीं ताकता। वह तो चारों ओर निर्विघ्न विचरण करता है। जब शब्द ज्ञान से अपने पराये का ज्ञान होता है तब गुरु शिष्य का संबंध स्वतः स्थापित हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- पिछले दिनों समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ कि अब लोगों में अपशब्द बोलना एक तरह से फैशन बनता जा रहा है। लोग अंतर्जाल पर गाली गलौच लिखना एक फैशन बना रहे हैं। यह वर्तमान विश्व समुदाय में अज्ञान और अहंकार की बढ़ती प्रवृत्ति का परिचायक है। पहले तो यह विचार करना जरूरी है कि हमारे शब्दों का प्रभाव किसी न किसी रूप में होता ही है। एक बात यह भी है कि हम जो शब्द बोलते हैं वह समाप्त नहीं हो जाता बल्कि हवा में तैरता रहता है। फिर समय पढ़ने पर वह उसी मुख की तरफ भी आता है जहां से बोला गया था। ऐसे में अगर हम अपने मुख से अपशब्द प्रवाहित करेंगे तो वह लौटकर कभी न कभी हमारे पास ही आने हैं। आज हम किसी से अपशब्द अपने मुख से बोलेंगे कल वही शब्द किसी अन्य द्वारा हमारे लिये बोलने पर लौट आयेगा। इस तरह तो अपशब्द बोलने और सुनने का क्रम कभी नहीं थमेगा।

इसलिये अच्छा यही है कि अपने मुख मधुर और दूसरे को प्रसन्न करने वाले शब्द बोलें जाये। लिखने का सौभाग्य मिले तो पाठक का हृदय प्रफुल्लित हो उठे ऐसें शब्द लिखें। पूरे विश्व समुदाय में गाली गलौच का प्रचलन कोई अच्छी बात नहीं है। ब्रिटेन हो या भारत या अमेरिका इस तरह की प्रवृत्ति ही विश्व में तनाव पैदा कर रही है। हम आज आतंकवाद और मादक द्रव्यों से विश्व समुदाय को बचाने का प्रयास कर रहे हैं पर इसके के लिये यह जरूरी है कि अपने शब्द ज्ञान का अहिंसक उपयोग करें तभी अन्य को समझा सकते हैं।
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भर्तृहरि शतकः बेइज्जत होने पर भी भूख कहाँ मिटती है


राजा भर्तृहरि कहते हैं कि
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भ्रान्तं देशमनेकदुर्गविषमं प्राप्तं न किंचित्फलं त्यकत्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला।
भुक्तं मानिववर्जितं परगुहेध्वाशंक्या काकवततृष्णे दुर्गतिपापकर्मनिरते नाद्यापि संतुष्यसि ।।

हिंदी में भावार्थ- राजा भर्तृहरि कहते हैं कि अनेक दुर्गम और कठिन देशों में गया पर वहां कुछ भी न मिला। अपनी जाति और कुल का अभिमान त्याग कर दूसरों की सेवा की पर वह निष्फल गयी। आखिर में कौवे की भांति भयभीत और अपमानित होकर दूसरों के घरों में आश्रय ढूंढता रहा। अपने मन की तृष्णा यह सब झेलने पर भी शांत नहीं हुई।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- मन की तृष्णा आदमी को हर तरह का अपमान और दुर्गति झेलने को विवश करती है। कहते हैं कि जिसने पेट दिया है वह उसके लिये भोजन भी देगा पर आदमी को इस पर विश्वास नहीं है। इसके अलावा वह केवल दैहिक आवश्यकताओं से संतुष्ट नहीं होता। उसके मन में तो भोग विलास और प्रदर्शन के लिये धन पाने की ऐसी तृष्णा भरी रहती है जो उसे अपने से कम ज्ञानी और निम्न कोटि के लोगों की सेवा करने को विवश कर देती है जिनके पास धन है। वह उनकी सेवा में प्राणप्रण से इस आशा जुट जाता है कि वह धनी आदमी उस पर प्रसन्न होकर धन की बरसात कर देगा।
आदमी अपने से भी अल्प ज्ञानी बाहुबली और पदारूढ़ व्यक्ति के इर्दगिर्द घूमने लगता है कि वह उसका प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचा देगा। किसी भी आदमी की ऐसी तृष्णा शांत नहीं होती। इस दुनियां में हर बड़ा आदमी अपने से छोटे लोगों की सेवा तो लेता है पर अपने जैसा किसी को नहीं बनाता। छोटा आदमी धन और मान सम्मान पाने की इसी तृष्णा की वजह से इधर उधर भटकता है पर कभी उसके हाथ कुछ नहीं आता। मगर फिर भी वह चलता जाता है। उसकी तृष्ण उसे इस अंतहीन सिलसिले से परे तब तक नहीं हटने देती जब तक वह देह धारण किये रहता है।
जीवन के मूल तत्व को जानने वाले ज्ञानी इससे परे होकर विचार करते हैं और इसलिये जो मिल गया उससे संतुष्ट होकर भगवान की भक्ति में लीन हो जाते हैं। वह अपने तृष्णाओं के वशीभूत होकर इधर उधर नहीं भटकते जो कभी शांत ही नहीं होती।
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‘विषाद’ का प्रतिकार ‘सहजता’ से ही संभव -आलेख


वह एक ब्लाग पर टिप्पणी थी। उसमें कोई ऐसी बात नहीं कही गयी जिस पर बावेला मचायें। टिप्पणीकार की नीयत पर भी कोई संदेह नहीं था। वह भारतीय समाज में एकता के लिये प्रतिबद्ध दिख रहा था इसमें संदेह नहीं है। कभी कभी लगता है कि यह वही ब्लाग लेखक हो सकता है जिसके पाठ से प्रभावित होकर इस लेखक ने लिखना प्रारंभ किया था। अपने ही धर्म के प्रवर्तक के एक अंग्रेजी कार्टून के विरोध में कुछ लोगों ने प्रदर्शन किया था और उसने उसी पर ही ईमानदारी से एक बढ़िया व्यंग्य लिखा था। उसने अपने धर्म के ठेकेदारों पर कटाक्षा किया था। शायद वही ऐसा ब्लागर हो सकता है। दावे से यह कहना कठिन है कि यह वही ब्लाग लेखक है पर उसकी नेकनीयती पर संदेह करना अपने आपको धोखा देना है। उसने एक ब्लाग पर टिप्पणी की थी।
उसकी टिप्पणियों के बाकी अंशों से कोई मतलब नहीं है पर उसके श्रीगीता के प्रति किये गये उद्गार से इस लेखक को असहमति-याद रखें कि विरोध नहीं- थी। उसने दूसरे ब्लाग लेखक के पाठ पर टिप्पणी की थी। उस पाठ में एक धार्मिक पुस्तक को लेकर चर्चा थी। उस पाठ मेंे कुछ कतिपय लोगों द्वारा एक धार्मिक पुस्तक की व्याख्या अपने स्वार्थ से करने की आलोचना थी और उस ब्लाग लेखक ने उसी पर अपनी सदाशयता से टिप्पणी की थी।
उसने अपनी टिप्पणी में दो अन्य धर्मों की पुस्तकों के साथ श्रीगीता का भी उल्लेख करते हुए लिखा था कि यह सभी धार्मिक पुस्तकों इसलिये लिखी गयी क्योंकि उस समय लोगों के पास समय था। इन पुस्तकों का अधिक महत्व नहीं है।
उसकी इस टिप्पणी से लेखक के अधरों पर बरबस ही मुस्कान आ गयी। उस भावुक ब्लागर ने भले ही सदायशता से टिप्पणी की पर कहीं न कहीं उसका अज्ञान श्रीगीता के प्रति साफ दिख रहा था। अगर वह श्रीगीता के अलावा किसी अन्य धर्म ग्रंथ की बात करता तो शायद उसे समझा जा सकता था।
हम यहां धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र की विचारधाराओं से हटकर विचार करें तो लगेगा कि इस देश में लोगों की आदत हो गयी है कि केवल नारों के आधार पर ही बहस और टिप्पणियां करते हैं। वह टिप्पणीकार भी उस बुद्धिजीवी समाज से है जो केवल चर्चा करने के लिये चर्चा करता है। यहां हमें किसी बुद्धिजीवी का समाज देखकर उस पर टिप्पणी नहीं करना क्योंकि श्रीगीता को मानने वाला इंसान अगर समदर्शी नहीं हुआ तो उसका ज्ञान व्यर्थ होगा। हां, श्रीगीता के प्रति उसका जो भाव है वह देश के बुद्धिजीवी समाज का ही प्रतीक है और इस बात को कोई मतलब नहीं है कि उनमें कौन श्रीगीता का मानता है और कौन नहीं।
बाकी धर्मों की पुस्तकों पर यह लेखक टिप्पणी नहीं करता क्योंकि उनको इसने पढ़ा नहीं है पर श्रीगीता के बारे में यह कहना पड़ता है कि लाख सिर पटक लो। पढ़ो या नहीं। पढ़ो तो समझो, नहीं समझो तो अपनी मर्जी के मालिक हो। इस दुनियां में झगड़े चलते रहे हैं और चलते रहेंगे। मगर श्रीगीता में जीवन और सृष्टि के संबंध में जो ज्ञान और विज्ञान का रहस्य उद्घाटित किया गया है वह कभी बदल नहीं सकता। सच बात तो यह है कि श्रीगीता को मानने का दावा करने वाले ही उसके बारे में उतना ही जानते हैं जिससे दूसरे को बता कर अपने ज्ञानी होने का प्रभाव जमा सकें। श्रीगीता की पुस्तक और उसके संदेश आश्रमों के दरवाजे या दीवारों पर प्रकाशित करने से अगर उसके स्वामियों को आ जाता तो वह उनको बनाते ही नहीं। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता के ज्ञान का केवल अपने भक्तों में प्रचार करने की आज्ञा दी है मगर उसे सरेराह सुनाकर कथित धर्म के ठेकेदार इसी बात का प्रमाण देते हैं कि उनके पास केवल संदेश नारों के रूप में है धारण किये हुए ज्ञान की तरह नहीं।
एक मजे की बात दूसरी भी है। अगर अन्य धर्मग्रंथों के साथ श्रीगीता का नाम लेकर हल्की प्रतिकूल बात कहने को लोग यह मान लेते हैं कि चलो उसने हमारी श्रीगीता की अकेले आलोचना नहीं की। ऐसे में दो बातें प्रमाणित होती हैं-
1. लोग श्रीगीता के समर्थक हैं पर उसके ज्ञान से अनजान है इसलिये चुनौती नहीं दे पाते।
2. दूसरा यह कि पूरा समूह ही ऐसा हो गया है कि ‘चलो हमारे थप्पड़ मारा तो क्या हुआ पड़ौसी को भी तो मारा’।
दूसरा कारण पूरे समाज को इंगित कर दिया गया है वरना उस टिप्पणीकर्ता ब्लाग लेखक का ऐसा कोई उद्देश्य नहीं था-यह उसकी सदाशयता को देखकर कही जा सकती है।
विश्व भर में तनाव बढ़ता जा रहा है। विभिन्न धर्मों के नाम पर लिखी गयी बृहद पुस्तकों को पढ़ना सामान्य आदमी के लिये कठिन है इसलिये वह उनके पढ़ने वाले कथित ज्ञानियों के दरवाजे पर हाजिरी लगाता है और वह उसे सर्वशक्तिमान की पहचान और स्वर्ग का पता देने के बहाने अपने हित दो तरह से साधते हैं।
1.अपने लिये दान दक्षिणा जुटाते हैं
2.अपनी छबि सिद्ध की बनाकर लोगों के अपना नाम करना चाहते हैं।
हमारे देश में तो इतनी धार्मिक पुस्तकें हैं कि कोई भी अच्छा खासा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि उसने सब कुछ पढ़ लिया। अब आप कहेंगे कि तब क्या किया जाये?
सारी धार्मिक पुस्तकों का सार श्रीगीता में है। उसे एक बार पढ़ लें तो फिर अन्य ज्ञान की पुस्तकें पढ़ने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। हां, मनोरंजन की पुस्तकें पढ़ सकते हैं, कार्यक्रम देख सकते हैं पर उनमें लिप्त नहीं होना-यही संदेश श्रीगीता से निकलता है।
आखिर बात यह है कि आजकल जब बीमार आदमी डाक्टर के पास जाता है तो वह कहता है कि ‘तुम्हारी बीमारी की जड़ तनाव है!’
बीमार उसके हाथ से लिखा पर्चा हाथ में लेता है तो डाक्टर कहता है कि‘यह दवायें समयानुसार लेना। हा, पर ठीक तब ही हो पाओगे जब तनाव मुक्त रहोगे। ‘टैंशन मत पालो। हमेशा रिलैक्स रहो तभी इजीनैस फील कर पाओगे।’
श्रीगीता का पहला अध्याय ही ‘विषाद योग’ है और फिर सहज योग की स्थापना करते हुए अन्य अध्याय हैं। ‘विषाद’ का प्रतिकार ‘सहजता’ से करने के लिये कोई अन्य धर्मपुस्तक है क्या? अगर है तो क्या वह इतनी छोटी और संक्षिप्त संदेशों से सुसज्जित है जिसे आम आदमी पढ़ सके क्योंकि आजकल लोगों के फुरसत ही कहां है? दूसरी बात यह कि श्रीगीता फुरसत में नहीं लिखी गयी। उसके संदेश इसलिये भी संक्षिप्त हैं क्योंकि उसके कुछ ही देर बाद महाभारत का युद्ध शुरु होने वाला था और भगवान श्रीकृष्ण में ही इतना सामथर््य था जो संक्षिप्त ढंग से प्रभावी बात कह सकें। कोई बात विस्तार से कहकर उसे उलझाने का न तो उनका इरादा हो सकता था न वक्त ही था।
बात से बात निकलती है। उस टिप्पणीकर्ता ब्लाग लेखक की सदाशयता के प्रति कोई संदेह नहीं होते हुए भी इस लेखक द्वारा ऐसा लिखना इसलिये जरूरी लगा क्योंकि आमतौर से ऐसी बातें होती हैं तब लोगों को समझाना ही पड़ता है कि ‘श्रीगीता’ में सारे संसार के सत्य का उद्घाटित करने वाला ज्ञान और विज्ञान है। हो सकता है कि अन्य धर्म ग्रंथों में भी हो पर श्रीगीता में उनका सार भी है। यह आलेख अपनी बात दूसरे पर लादने के लिये नहीं लिखा गया बल्कि अपनी कहने के लिये लिखा गया है और ऐसी हल्की टिप्पणियोें या अन्य प्रतिकूल वक्तव्यों से कभी विचलित होकर उग्र नहीं होना चाहिये श्रीगीता यही संदेश देती है।
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पहचान किसे चाहिये और क्यों? (चिंतन)


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भीड़ में पहचान बनाने की कोशिश! बिल्कुल निरर्थक है। हम सोचते हैं कि कोई हमें देख रहा है। हम यह सोचकर बोलते हैं कि कोई हमें सुन रहा है। यह एक भ्रम हैं। भ्रमों के झुंड में हम फंसे हैं। बंदरों की तरह गुलाटी मारकर लोगों का अपनी तरफ घ्यान खीचंने की कोशिश करते हैं। अपनी बात कहने के लिये चिल्लाते हैं कि शायद कोई उसे सुन रहा है। इसके विपरीत स्थिति भी होती है। हम कुछ नहीं करते क्योंकि कोई देख रहा है क्या कहेगा? कुछ नहीं बोलते! कोई सुन लेगा तो? अपनी अर्कमण्यता और खामोशी से भीड़ से अलग दिखने की कोशिश!

पहचान किसे चाहिये और क्यों? पता नहीं! जब आदमी स्वयं से साक्षात्कार नहीं करता तो अपने को ही नहीं पहचान पाता और उम्मीद यह करता है कि दूसरे उसे पहचाने। आत्ममंथन और चिंतन की प्रक्रिया से दूर होकर भौतिक साधनों की उपलब्धियों के पीछे दौड़ रहा है आदमी। वह मिल जायेंगी तो लोग हमें देखेंगे-हमारी पहचान बनेगी। कुछ इसके विपरीत अपनी गरीबी, लाचारी और बीमारी का प्रचार करते हैं कि लोग हम पर तरस खायें। उद्देश्य यही है कि लोग हमें पहचाने।

कुछ लोग इससे भी आगे। वह दूसरों की पहचान बनाने में जुटे हैं। हाय…वह गरीब है…….हाय…..वह बेबस है………….हाय……………..वह बीमार है। सारी दुनियां को स्वर्ग जैसा बनाने का नारा लगाते हुए भीड़ में अपनी पहचान बनाने की कोशश! आत्मसाक्षात्कार करने से घबड़ाते लोग। अपनी देह में सांसों को चला रहे उस आत्मा को देखने से बिदक जाते हैं। उसका न कोई रंग है न रूप है। न वह बोलता है न वह सुनता है। न वह खुश होता है न दुःखी होता है। अपनी आंखों से रंग देखने के आदी, बोलने के लिये बिना चयन के शब्द बाहर प्रस्तुत करने के लिये उतावले और केवल अपने मतलब की सुनने के लिये उत्सुक लोग अपने उस रूप को नहीं देखना चाहते क्योंकि वहां है एक महाशून्य। उसकी तरफ देखते हुए उनका मन घबड़ाता है।
वह महाशून्य जो शक्ति का पुंज है उससे साक्षात्कार करने के बाद जो ऊर्जा आंख, वाणी, कान और पूरी देह को मिलती है उसे वही अनुभव कर सकता है जो उस महाशून्य की शक्ति का ज्ञान रखता है।

ऐसा ज्ञानी अनर्गल प्रलाप नहीं करता। ऐसे सुर जो कान को बाद में नष्ट कर दें उनसे परहेज करता है। ऐसे दृश्य जो आंखों के सामाने आते ही मस्तिष्क का कष्ट देते हैं उनको देखता नहीं है। ऐसा आनंद जो बाद में संताप दे उससे वह दूर रहता है।
जिनको ज्ञान नहीं है। वह क्या करते हैं।
एक ने कहा-‘मेरे सिर में दर्द है’।
दूसरे ने कहा-‘यार, कल मेरे सिर में भी दर्द था।’
किसने कहा और किसने सुना। कोई नहीं जानता। एक ने कहा, दूसरे ने कहा पर सुना किसने?
पहले ने दूसरे से कहा-‘मंदिर चलकर ध्यान करें तो कैसा रहेगा?
दूसरे ने कहा-‘उंह! मजा नहीं आयेगा।
पहले ने कहा-‘अरे, चलो उधर झगड़ा हो रहा है। देखें! शायद मजा आये।
दूसरा एकदम खड़ा हो गया और बोला-हां, चलो देखते हैं। झगड़ा हो रहा है तो जरूर मजा आयेगा।’
दूसरे के द्वंद्व देखने में लोग आनंद उठाते हैं। अपने मन के अंतद्वंद्व दूसरे से छिपाने के लिये यह एक सरल उपाय लगता है।
आत्मसाक्षात्कार के बिना भटकता आदमी आनंदशून्य हो जाता है परिणामतः वह दूसरे को दुःख देकर अपने लिये आनंद जुटाना चाहता है। मगर कितनी देर? थोड़ी देर बाद उसका दुःख दुगना हो जाता है। मन में एक तो पहले से ही मौजूद खालीपन तकलीफ देता है फिर जिससे दुःख देकर स्वयं प्रसन्न हुऐ थे वह आदमी बदला लेने के लिये प्रतिकार स्वरूप दुःख देता है। दुःख का यह अनवरत चक्र इंसान के जीवन का अटूट हिस्सा बना जाता है। इससे बचने का एक ही उपाय है आत्मसाक्षात्कार यानि अपने अंदर स्थित आत्मा को पहचाने। वही हमारी पहचान है। दूसरी जगह दूसरे से दूसरी पहचान ढूंढना जीवन व्यर्थ करना है।
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1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

देश के सभी भाषियों में प्रिय है अध्यात्मिक विषय


हिंदी भाषा के कई मशहूर लेखक हुए हैं पर इस भाषा का क्षेत्र बहुत व्यापक है इसलिये कई लेखक कहीं प्रसिद्ध हैं तो अन्य कहीं। हिंदी के शुरूआती दौर में उत्तर प्रदेश और बिहार से कई लेखक प्रसिद्ध हुए पर बाद में अन्य प्रदेशों के भी हिंदी लेखक हुए जिन्होंने अपने परचम फहराया। ऐसे में किसी प्रदेश विशेष के किसी प्रसिद्ध लेखक के कोई विचार हिंदी के पूरे इलाक पर लागू हो जरूरी नहीं है।

आज अंतर्जाल पर एक लेखक का नाम लेकर समस्त हिंदी भाषियों के लिये निंदापरक शब्द लिखे देखकर सोच में पड़ गया। वह लेखक मेरे प्रदेश के नहीं थे इसलिये मुझे पर उन शब्दों का प्रभाव नहीं पड़ा। उन लेखक का हाल ही में देहावसान हुआ और उनके बारे में मुझे पूरी जानकारी अंतर्जाल पर ही उपलब्ध हुई। अनेक अंतर्जाल पत्र-पत्रिकाओं ने उनके बारे में मैनें भी पढ़ा। मगर हमारे प्रदेश के लोगों में उनका नाम चर्चित नहीं था और मुझे उनके बारे में ज्ञान न होने का कोई अफसोस भी नहीं है। हिंदी एक व्यापक आधार वाली भाषा है और यह जरूरी नहीं है कि हर लेखक का मुझे भान हो। पिछले पैंतीस साल से लिखते हुए मैने भी बहुत लिखा पर मशहूर नहीं हुआ। कहने को कोई भी कह सकता है कि तुम्हारा स्तर क्या है? ठीक है पर जिन लोगों ने मुझे पढ़ा है वह इसकी सराहना करते है।

अब बात करें हिंदी भाषियों के प्रति निंदापरक शब्दों की। कई लेखक अपने लिखे से इस समाज में परिवर्तन होते देखना चाहते है वह न होता देखकर उनका हताशा होती है। दूसरी बड़ी समस्या है कि हिंदी में संस्कृत से अनुवाद कर जो धार्मिक और साहित्य संबंधी सामग्री प्रकाशित की गयी है उसका आधार व्यापक और अक्षुण्ण है। आज भी जब लोग उनका पढ़ते है तो उसमें नवीनता लगती है। भक्ति काल को हिंदी भाषा का स्वर्ण काल कहा जाता है पर उसकी कोई भी रचना तब तक अनेक लोग समझ नहीं सकते जब तक कोई समझाने वाला न हो। तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, रहीम तथा अन्य अनेक महान विभूतियां ऐसी रचनाऐ इस समाज को सौंप गयीं कि उनको विस्मृत करना कठिन है। जीवन के अद्भुत सत्यों और ज्ञान के भरे इस खजाने का खत्म होना कठिन है और इसलिये उनके बाद के लेखकों को वह सम्मान नहीं मिल पाता जो वह चाहते हैं। ऐसे में एक प्रश्न और भी होता है कि बाद के लेखकों ने आखिरी किस तरह की रचनाएं कीं और उनका उद्दंश्य क्या था। हम हिंदी के जिस स्वर्णकाल की बात करते है वह सभी भक्ति के सराबोर थे और इसलिए उन्होने जीवन के मूल तत्व और ज्ञान से परिपूर्ण रचनाएं दी। उनसे पहले महर्षि बाल्मीकि और वेदव्यास भी संस्कृत में अपने पवित्र ग्रंथ इस देश को सौप गये। देखा जाये तो इन महर्षियों की रचनाएं सदाबहार है पर भी जहां तक सम्मान की बात है तो स्वर्णकाल के लेखकों कबीर, मीरा, तुलसी, सूरदास और रहीम ने भी कोई कम सम्मान नहीं पाया और वह इसलिये क्योंकि इनका जीवन और रचनाएं सत्य के निकट थी।
अब बाद के लेखकों को संक्षिप्त विश्लेषण करें। इनमें से कई लोगों ने अपनी रचनाओं से हिंदी की विकास यात्रा का आगे बढ़ाया। उनकी रचनाओं में वर्तमान संदर्भों में अच्छी प्रस्तुति होने के बावजूद उसमें अध्यात्मिक पुट नहीं है जो हिंदी भाषियों का सबसे प्रिय विषय रहा है। अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष बालक-बूढ़ा और युवा सभी के अंदर अध्यात्म को लेकर एक जिज्ञासा रहती है और जो उनकी इन्हीं भावनाओं को छूता है वही सम्मान पाता है। कुछ लेखक जिन गरीबों की गरीबी को लेकर कहानियां और कविताएं लिखकर समाज से वाह-वाही चाहते है वह भी अपने अध्यात्म के प्रति सद्भावना रखते है। उनके मुद्दे उठाने वाले कतिपय लेखक इस बात से चिढ़ जाते हैं कि जिन गरीबों के लिये लिखते हैं वह भी उनको पूछा नहीं करते तब उनके लिये निंदापरक शब्द कह देते है। हालांकि लेखक हमेशा सदाशयी होते है और अपनी निंदापरक बात कहकर भूल जाते है पर कुछ लोग उनके इन्हीं शब्दों को प्रकाशित कर यह साबित करना चाहते हैं कि देखो हम उस लेखक के प्रशंसक है। मुझे इस पर आपत्ति नहीं पर मैं यह जरूर कहना चाहता हूं कि हिंदी का क्षेत्र बहुत व्यापक है और इस तरह कुछ लोग जरूर उनकी प्रशंसा कर जायें पर कुछ लोग उस लेखक के प्रति भी कुछ का कुछ सोच सकते हैं और यह मृतकात्मा के प्रति कोई अच्छी बात नहीं है।

फिर आज एक और भी सवाल उठ सकता है कि उन लेखक के जीवित रहते ही उनकी रचनाएं और अन्य विचार क्यों नहीं अंतर्जाल पर रखे ताकि उस पर विचार किया जा सके। आखिर मशहूर कवि के जीते जी उनकी रचनाएं रखकर भी उनका सम्मान किया जा सकता था। अब उनके देहावसान पर लोगों की जिन सात्विक भावनाओं को वह छूना चाहते है उनको जीते जी क्यों नहीं उनकी तरफ मोड़ नहीं सकते थे।

हमारे देश के लोग बहुत भावुक हैं और कुछ लोग उनको नहीं समझ पाते तो यह उनका दोष है। हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषियों में अभी तक अपने देश का अध्यात्म ज्ञान बसा हुआ है इसलिए वह केवल उन्हीं रचनाओं और रचनाकारों को अपने हृदय में स्थान देते है जो जीवन के मूल तत्व के निकट होता है। ऐसे में भी उन लेखकों को अपने जीते जी प्रशंसा नहीं मिल पाती ।

मनुस्मृति:राज्य सभी धर्मों के पालन कराने वाला मध्यस्थ


१.देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त अपराधियों की शक्ति को देखते हुए राज्य को उन्हें उचित दण्ड देना चाहिए। सच तो यह है कि राज्य का दण्ड ही राष्ट्र में अनुशासन बनाए रखने में सहायक तथा सभी वर्गों के धर्म-पालन की व्यवस्था करने वाला मध्यस्थ होता है।
२.सारी प्रजा के रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है। भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा प्रसन्न होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।
३.यदि अपराधियों को सजा देने में राज्य सदैव सावधानी से काम नहीं लेता, तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोंगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बड़ी मछ्ली छोटी मछ्ली को खा जाती है।
४.संसार के सभी स्थावर-जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य का पालने करते और अपने-अपने भोग को भोगने में समर्थ होते हैं ।

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