Category Archives: sahitya

विदुर नीति-मित्र का पहले से परिचित या संबंधी होना जरूरी नहीं (hindu dharma sandesh-religion of friendship)


सत्कृतताश्च श्रुतार्थाश्च मित्राणं न भविन्त ये।
तान् मुतानपि क्रव्यादाः कृतध्नान्नोपर्भुजते।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो अपने मित्र से सम्मान और सहायता पाने के बाद भी उनके नहीे होते ऐसे कृतघ्न मनुष्य के मरने पर उनका मांस तो मांस खाने वाले जंतु भी नहीं खाते।
न कश्चिदप्यसम्बद्धो मित्रभावेन वर्तते।
स एवं बन्धुस्तमित्रं सा गतिस्तत् परायणम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
पूर्व में कोई परिचय या संबंध न होने पर भी जो मित्रता का कर्तव्य निभाये वही बंधु और मित्र है। वही सहारा और आश्रय देने वाला है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्रता का धर्म सबसे बड़ा है और इसे निभाना इतना आसान नहंी है जितना समझा जाता है। हमारे साथ कार्य तथा व्यवसायिक स्थल पर अनेक लोग प्रतिदिन मिलते हैं पर वह मित्र की श्रेणी में नहंी आते। उसी तरह बंधु बांधव भी बहुत होते हैंे पर विपत्ति में सभी नहीं आते। ऐसा भी अवसर आता है कि विपत्ति के समक्ष होने पर कोई अपरिचित या पूर्व में किसी भी प्रकार का संबंध न रखने वाला व्यक्ति भी उससे मुक्ति दिलवाता है। इस तरह तो मित्र वही कहा जाता है। कहने का अभिप्राय यह है मित्रता का धर्म यही है कि विपत्ति या काम करने पर किसी की सहायता की जाये। प्रतिदिन मिलते जुलते रहना, व्यर्थ के विषयों पर वाद विवाद करना या साथ साथ काम करना मित्रता की श्रेणी में नहीं आता।
जब कोई व्यक्ति हमारे साथ मित्रता निभाता है तो फिर उसकी सहायता के लिये भी तत्पर रहना चाहिये। ऐसा न करने पर बहुत बड़ा अधर्म हो जाता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है-यह बात नहीं भूलना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि एक मनुष्य दूसरे की सहायता करे। इसे ही मित्रता निभाना कहा जाता है। मित्रता के लिये पूर्व परिचय या संबंध होना आवश्यक नहीं है।

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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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रहीम के दोहे-ग़लत आदतों में आदमी अपनी संपत्ति गँवा देता है (rahim ke dohe-bhram aur galat adat)


संपति भरम गंवाइ के, हाथ रहत कछु नाहिं
ज्यों रहीम ससि रहत है, दिवस अकासहिं मांहि

कविवर रहीम कहते हैं कि भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है और उसमें अपनी संपत्ति का अपव्यय करता रहता है और एक दिन ऐसा आ जाता है जब उसके पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसके साथ ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है।
संतत संपति जानि कै, सबको सब कुछ देत
दीन बंधु बिन दीन की, कौ रहीम सुधि लेत

कविवर रहीम कहते हैं कि जिनके पास धन पर्याप्त मात्रा में लोग उनको सब कुछ देने को तैयार हो जाते हैं और जिसके पास कम है उसकी कोई सुधि नहीं लेता।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में माया का खेल विचित्र है। वह कभी स्थिर नहीं रहती। आजकल जितने धन के उद्भव के काले स्त्रोत बने हैं उतने उसके पराभव के मार्ग बने हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने अपने पद, प्रतिष्ठा और परिवार के नाम पर गलत तरीके से अथाह धनार्जन किया पर उनके घर के सदस्यों ने ही गलत मार्ग अपना कर जूए, शराब, सट्टे तथा अन्य व्यसनों में तबाह कर दिया। देखने के लिये अनेक भले लोग अपने धन का अहंकार दिखते हैं पन अपने बच्चों की आदतों से उनका मन हमेशा विचलित होता है। हालांकि कुछ लोग अनाप-शनाप पैसा कमा रहे हैं और अपने बच्चों के विरुद्ध शिकायत न तो सुनते हैं और न ही कोई उनके सामने करता है।

यह कारण है कि आजकल जो कथित बड़े लोग उनके अनेक घर के रहस्य जब सामने आते हैं तो लोग हैरान रह जाते हैं। उनका अपने परिवार पर बस नहीं हैं। कई लोग तो जिनका नाम था अब इसलिये गुमनाम हो गये क्योंकि उनका धन पूरी तरह गलत कामों की वजह से तबाह हो गया। उनकी चर्चा अब इसलिये नहीं होती क्योंकि जिनके पास धन नहीं है उनकी चर्चा भला कौन करता है? इसके बावजूद भी शिक्षित और कथित ज्ञानी लोग भी वैभवशाली लोगों का चाटुकारिता करते हैं और गरीब को अनदेखा करते हैं। अमीर के दौलत से कुद पाने के लिये ही वह लोग उनके इर्दगिर्द चक्कर लगाते है। गरीब को तो वह पांव की जुती समझते हैं। इसके बावजूद हमें समझदार होना चाहिए और सबके प्रति समान व्यवहार करना चाहिए। ऐसा भी होता है कि अमीर की चाटुकारिता करते रहो पर हाथ कुछ नहीं आता। कोई अमीर किसी की बिना कारण सहायता नहीं करता। यह हमें समझना चाहिए। अगर कोई हमारी सहायता करने आ रहा है तो समझ लो उसका कोई स्वार्थ है।
अतः अगर अपने पास अगर धन कम हो तो यह मान लेना चाहिए कि लोग आर्थिक सहयोग तैयार करने के लिये कम ही तैयार होंगे। साथ ही इस बात की चिंता नहीं करना चाहिए कि कोई सम्मान करेगा या नहीं। अगर धन अधिक हो तो दूसरों द्वारा सहयोग की पेशकश को अपने गुणों का प्रभाव न समझते हुए यह मान लेना चाहिए कि हमारे धन की वजह से दूसरे प्रभावित हैं।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जीवन में कभी आलस्य न करें (kautilya ka arthshastra)


भोक्तं पुरुषकारेण दृष्टसित्रयमिव वियम्।
व्यवसायं सदैवेच्छेन्न हि कलीववदाचरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्ट स्त्री के समान धन पाने की इच्छा यानि लक्ष्मी को पुरस्कार से भोगने के लिये सदा उद्योग करते रहें। कभी आलस्य न करें।
प्रयत्नप्रेर्यर्वमणेन महता चितहस्तिना।
रूढ़वैरिद्रु मोत्खतमकृत्देव कुतः सुखम्।।
हिंदी में भावार्थ-
चित्त रूपी हाथी को अपने नियंत्रण में करने के प्रयास के साथ ही वैर रूपी वृक्ष को उखाउ़ फैंके बिना भला सुख कहां प्राप्त हो सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह सच है कि जीवन में मानसिक शांति के लिये अध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है पर दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति और सांसरिक दायित्वों के निर्वहन के लिये धन की आवश्यकता होती है। इसकी प्राप्ति के लिये भी उद्योग करना चाहिये। कभी जीवन में आलस्य न करें। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में यही कहा है कि अपने सांसरिक कर्म करते हुए भक्ति करने के साथ ही ज्ञान प्राप्ति का प्रयास करें। निष्काम कर्म का श्रीगीता में आशय अक्सर गलत बताया जाता है। सच तो यह है उसमें धन की उपलिब्धयों को फल नहीं माना गया बल्कि उनसे तो सांसरिक कार्य का ही हिस्सा कहा जाता है। अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त होता है उससे हम दूसरे दायित्वों का निर्वहन करते हैं। वह अपने साथ नहीं ले जाते इसलिये उसे फल नहीं मानना चाहिये। सांसरिक कार्य के लिये धन जरूरी है और उसी से ही दान और यज्ञ भी किये जाते हैं।

इसके अलावा अपने मन में दूसरे की भौतिक उपलब्धियां देखकर निराशा या बैर नहीं पालना चाहिये। हमारे मानसिक दुःख का कारण यही है कि हम दूसरों के प्रति अनावश्यक रूप से द्वेष और बैर पाल लेते हैं। उनसे अगर विरक्त हो जायें तो आधा दुःख तो वैसे ही दूर हो जाये।
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भर्तृहरि शतकः दुर्जन को बताया रहस्य उजागर हो जाता है


जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तरं वस्तुशक्तितः।।
हिंदी में भावार्थ-
जल में मिलाया गया तेल, दुर्जन को बताया गया गुप्त रहस्य, सुपात्र को दिया गया धन का दान और बुद्धिमान को प्रदाय किया ज्ञान स्वतः वृद्धि को प्राप्त होते हैं।
धर्माऽऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्।
सा सर्वदैव तिष्ठेयेत् को न मुच्येत बंधानात्।।
हिंदी में भावार्थ-
किसी भी धर्म स्थान पर जब कोई व्यक्ति सत्संग का लाभ उठाता है, श्मशान में किसी के शव दाहसंस्कार होते देखता है या किसी रोगी को अपनी पीड़ा से छटपटाता हुआ देखता है तो इस भौतिक दुनियां को निरर्थक मानने लगता है परंतु जैसे ही वहां से हट जाता है वैसे ही उसकी बुद्धि फिर इसी संसार के भौतिक स्वरूप की तरफ आकर्षित होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने राज किसी अन्य से नहीं कहना चाहिये। अगर कोई व्यक्ति हमारे सामने अच्छा बर्ताव करता है पर अगर उसके मन में हमारे प्रति कपट,ईष्र्या या द्वेष का भाव है तो वह उसे जाकर सभी को बता देगा जिससे अधिक कष्ट प्राप्त होता है। उसी तरह अपने घन का दान किसी अगर अच्छे और गुणी को दिया जाये तो वह उसका सदुपयोग कर उसमें वृद्धि करेगा।
ऐसा अनेक बार जीवन में हमारे सामने अवसर आता है जब कहीं किसी सत्संग में जाते हैं या कहीं श्मशान में किसी प्रियजन और मित्र के दाह संस्कार को देखते हैं या कहीं कोई रोगी तड़तपा हुआ दिखता है तब हमें यह सारा संसार मिथ्या नजर आता है पर अगर उस स्थान से हटते हैं तो फिर सब भूल जाते है। दुनियां के इस भौतिक स्वरूप की महिमा कुछ ऐसी है कि जो इसे बाह्य आंखों से देखता है उसे प्रभावित करता है पर जो ज्ञानी हैं वह इसे जानते हैं और हमेशा ही सुख दुःख, प्रसन्नता शोक और लाभ हानि में समबुद्धिरूप से स्थित रहकर जीवन व्यतीत करते हैं।
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चाणक्य नीतिः नदी किनारे स्थित वृक्ष शीघ्र नष्ट हो जाते हैं (chankya niti)


नदी तीरे च ये वृक्षाः परगृहेषु कामिनी।
मन्त्रिहीनश्चय राजानः शीघ्रं नश्चाननसंशयम्

हिंदी में भावार्थ-नदी के किनारे वृक्ष, दूसरे के घर रहने वाली स्त्री, मंत्री के बिना राजा शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्।
खग चीतफल वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागता गृहम्।।

हिंदी में भावार्थ-निर्धन पुरुष को वैश्या, पराजित और शक्तिहीन राजा को प्रजा, फलहीन वृक्ष को पक्षी जिस तरह त्याग देते हैं उसी तरह भोजन करने के बाद अतिथि को गृहस्थ का त्याग कर देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन के लक्ष्य और कार्य पर स्वयं ही निर्भर रहना चाहिये। यह सही है कि अपने अनेक कार्यों के लिये दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है पर उस समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि अपनी निर्भरता किसी एक व्यक्ति की बजाय अनेक पर हो ताकि एक अगर सहायता न तो दूसरा कर दे। अपने कार्य तथा उद्देश्य की पूर्ति के सदैव स्वयं ही विचार करते हुए सक्रिय रहना चाहिये। दूसरों निर्भर रहने से जीवन में असफलता की आशंका बलवती होती है।

परिवार समाज और राष्ट्र के मुखिया को सदैव अपनी शक्ति और अर्थ का संचय करते रहना चाहिये। जहां उसकी शक्ति में शिथिलता आने के साथ ही धनाभाव घेर लेता है वहां उसके अंतर्गत सक्रिय अन्य लोग ही नहीं वरन् स्वजन ही उसका त्याग कर देते हैं। अपनी शक्ति और संपन्नता बनाये रखने के लिये अपने गुणों और दुर्गुणों पर निरंतर दृष्टिपात करते हुए आत्म मंथन करते हुए नये प्रयोग करते रहने से शक्ति अर्जित होती है और साथ में अपने प्रति लोगों में नवीनता का भाव बनाये रखा जा सकता है। वैसे आयु अनुसार शक्ति और समयानुसार धन का हृास होता है पर गुणवान और ज्ञानी लोग अपने अभ्यास से इसका आभास किसी को नहीं होने देते जिससे उनकी शक्ति यथावत रहती है।
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चाणक्य नीतिः ज्ञान मनुष्य का सेनापति होता है


हर्त ज्ञार्न क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नर।
हर्त निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष ह्यभर्तृकाः ।।

हिंदी में भावार्थ- जिस ज्ञान को आचरण में प्रयोग न किया जाये वह व्यर्थ है। अज्ञानी पुरुष हमेशा ही संकट में रहता हुआ ऐसे ही शीघ्र नष्ट हो जाता है जैसे सेनापति से रहित सेना युद्ध में स्वामीविहीन स्त्री जीवन में परास्त हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- मनुष्य का सेनापित उसका ज्ञान होता है। उसके बिना वह किसी का गुलाम बन जाता है या फिर पशुओं की तरह जीवन जीता है। ज्ञान वह होता है जो जीवन के आचरण में लाया जाये। खालीपीली ज्ञान होने का भी कोई लाभ नहीं है जब तक उसको प्रयोग में न लाया जाये। हमारे देश में ज्ञानोपदेश करने वाले ढेर सारे लोग है जो ‘दान, तत्वज्ञान, तपस्या, धर्म, अहिंसा, प्रेम, और भक्ति की महिमा’ का बखान करते हैं पर उनका जीवन उसके विपरीत विलासिता, धन संग्रह, और अपने बड़े होने के अभिमान में व्यतीत होता है। देखा जाये तो उनके लिये ज्ञान विक्रय और उनके अनुयायियों के लिये क्रय की वस्तु होती है। उसके आचरण से न तो गुरु का और न ही शिष्य का लेना देना होता है।

यही कारण है कि हमारा समाज जितना धार्मिक माना जाता है उतना ही व्यवसायिक भी। भारतीय प्राचीन ग्रथों का तत्वज्ञान का मूल सभी जानते हैं पर उसके भाव को कोई नहंीं जानता। अनेक गुरु ज्ञानोपदेश करते हुए बीच में ही यह बताने लगते हैं कि ‘धर्म के प्रचार के लिये धन की आवश्यकता है’। वह अपने भक्तों में दान और त्याग का भाव पैदा कर अपने लिये धन जुटाते है। भक्त भी अपने मन में स्थित दान भाव की शांति के लिये उनकी बातों में आकर अपनी जेब ढीली कर देते हैं। कथित गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान के पथ पर लाकर उनका भौतिक दोहन कर फिर उनको अज्ञान के पथ पर ढकेल देते हैं। यही कारण है कि अध्यात्मिक गुरु कहलाने वाला अपना देश भौतिकता के ऐसे जंजाल में फंस कर रह गया है जहां विकास केवला एक नारा है जिसकी अंतिम मंजिल विनाश है।
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संत कबीर वाणीः अपने विश्वास में बदलाव बनता है तनाव कारण


सौ वर्षहि भक्ति करि, एक दिन पूजै आन
सो अपराधी आत्मा, पैर चौरासी खान

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि सौ वर्ष तक अपने इष्ट या गुरु की भक्ति करने के बाद एक दिन किसी दूसरे देवी देवता की पूजा कर ली तो समझ लो कि पहले की भक्ति गड़ढे में गयी और अपनी आत्मा ही रंज होने लगती है।
कामी तिरै क्रोधी तिजै, लोभी की गति होय
सलिल भक्त संसार में, तरत न देखा कोय

कामी क्रोधी और लोभी व्यक्ति थोड़ी भक्ति करने के बाद भी इस भवसागर को तैर कर पार कर सकता है पर शराब का सेवन करने वालों की कोई गति नहीं हो सकती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक बार जिस इष्ट की आराधना करना प्रारंभ किया तो फिर उसमें परिवर्तन नहीं करना चाहिये। सभी जानते हैं कि परमात्मा का एक ही है पर इंसान उसे अलग अलग स्वरूपों में पूजता है। जिस स्वरूप की पूजा करें उसमें पूर्ण रूप से विश्वास करना चाहिये। जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते हैं पर दूसरों के कहने में आकर इष्ट का स्वरूप नहीं बदलना चाहिये। दरअसल विश्वास में बदलाव अपने अंदर मौजूद आत्मविश्वास का ही कमजोर करता है और हम अपने जीवन में आयी परेशानियों से लड़ने की क्षमता खो बैठते हैं।
अपने देश में जितना भक्तिभाव है उससे अधिक अधविश्वास है। किसी की कोई परेशानी हो तो दस लोग आते हैं कि अमुक जगह चलो वहां के पीर या बाबा तुम्हारी परेशानी दूर कर देंगे और परेशान आदमी उनके कहने पर चलने लगता है और अपने इष्ट से उसका विश्वास हटने लगता है। कालांतर में यही उसके लिये दुःखदायी होने लगता है। इस तरह अनेक प्रकार की सिद्धों की दुकानों बन गयी हैं जहां लोगों की भावनाओंं का दोहन जमकर दिया जाता है। सच बात तो यह है कि जीवन का पहिया घूमता है तो अनेक काम रुक जाते हैं और रुके हुए काम बन जाते हैं किसी सिद्ध के चक्कर लगाने से कोई काम नहीं बनता। इस तरह का भटकाव जीवन में तनाव का कारण बनता है। कोई एक काम बन गया तो दूसरे काम के लिये सिद्ध के पास भाग रहे हैं। इस तरह विश्वास में बदलाव हमारी संघर्ष की भावना का कमजोर करता है।

अपनी जिंदगी में हमेशा एक ही इष्ट पर यकीन करना चाहिये। यह मानकर चलें कि अगर कोई काम रुका है तो उनकी मर्जी से और जब समय आयेगा तो वह भी पूरा हो जायेगा। वैसे जीवन में प्रसन्न रहने का सबसे अच्छा उपाय तो निष्काम भक्ति ही है पर उसके लिये दृष्टा बनकर जीना पड़ता है। यह मानकर चलना पड़ता है कि इस तरह के उतार चढ़ाव जीवन का एक अभिन्न अंग है। साथ में निष्प्रयोजन दया भी करते रहना चाहिये यह सोचकर कि पता नहीं इस देह पर आये संकट के लिये कब कौन सहायता करने आ जाये।
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कबीर के दोहेःपहले आदमी को परखें फिर संपर्क बढ़ायें


संत कबीर कहते हैं कि
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कबीर देखी परखि ले, परखि के मुखा बुलाय
जैसी अन्तर होयगी, मुख निकलेगी आय
जब कोई मिले तो उसे पहले अच्छी प्रकार देख परख के पश्चात् ही उससे मुख मिलाओ। जैसी उसके मन में बात होगी वैसी कहीं न कहीं मुंह से निकल ही आयेगी।
पहिले शब्द पिछानिये, पीछे कीजै मोल
पारख परखै रतन को,शब्द का मोल न तोल

पहले किसी की बात सुनकर उसके शब्द पर विचार करें फिर अपने विवेक से निर्णय ले। हीरे का मोल तो होता है इसलिये उसके लिये मोलभाव किया जाता है पर सच्चे शब्दों का कोई मोल नहीं होता-यानि दूसरे के जो शब्द हैं उनमें अगर कमी दिखाई दे तो उस पर यकीन न करें और केवल अच्छी संभावना को मानकर संपर्क न बढ़ायें।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-प्रचार माध्यमों ने आदमी की मन बुद्धि पर अधिकार कर लिया है इसलिये लोगों की अपने विवेक से काम करने की शक्ति नष्ट हो गयी है। अभिनेता,कलाकार,लेखक और बुद्धिजीवियों को उनके सुंदर शब्दों पर ही योग्य मान लिया जाता है। फिल्मों में अभिनेता और अभिनेत्रियां दूसरे लेखकों द्वारा बोले गये शब्द बोलते हैं पर यह भ्रम हो जाता है कि जैसे वह स्वयं बोल रहे हैं। अनेक विज्ञापन आते हैं जिसमें सुंदर शब्दों के साथ प्रचार होता है और लोग मान लेते हैं। शब्दों के जाल मं किसी को भी फंसाना आसान हो गया है और जो एक बार किसी के जाल में फंस गया तो उसके हितैषी चाहें भी तो उसे नहीं निकाल सकते।

इस मायावी दुनियां में पहले भी कोई कम छल नहीं था पर अब तो खुलेआम होने लगा है। अनेक ऐसे लोग हैं जो बदनाम हैं पर वह पर्दे पर चमक रहे हैं क्योंकि वह बोलते बहुत सुंदर हैं। प्रचार माध्यमों में अपराधियों का महिमा मंडन हो रहा है और वह भी अपने को पवित्र बताते हैं। तब लगता है कि जब सभी लोग पवित्र हैं तब इस दुनियां में अपराध क्यों हो रहा है? यह सब समाज की विवेक शक्ति के पतन का परिचायक हैं क्योंकि हम दूसरें के शब्दों पर विचार नहीं करते जबकि होना यह चाहिये कि जब कोई दूसरा व्यक्ति बोल रहा है तो उसके शब्दों पर विचार करें। इतना ही नहीं जब तक किसी के शब्दों को परख न लें तब तक उस पर यकीन न करें। अपना किसी से संपर्क धीरज से बढ़ायें क्योंकि बातचीत में कहीं न कहीं आदमी में मूंह से सच निकल ही आता है।
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भर्तृशतकः विषय हमें छोड़े इससे पहले उनको छोड़ दो


अवश्यं यातारिश्चतरमुषित्वाऽपि विषया वियोगे को भेदस्त्यजति न जनो यत्स्वयममून्।
व्रजन्तः स्वातंत्र्यादतुलपरितापाय मनसः स्वयं त्यक्ता ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति।

हिन्दी में भावार्थ-अपने जीवन में हम कितना भी विषय को भोगें पर एक दिन वह छोड़ देते हैं। यह विचार करते हुए हम उनसे स्वयं ही अलग क्यों न हो जायें? मनुष्य जब विषयों को निरंतर भोगता है और जब उनके अलग होने पर बहुत मानसिक कष्ट झेलता है पर जब वह स्वयं त्याग करता है तो उससे सुख की अनुभुति होती है और उनके अलग होने की पीड़ा का उसे अनुभव नहीं होता।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस चराचर जगत में सभी वस्तुऐं और विषय नष्ट प्रायः हैं। कभी न कभी उनसे साथ छूटता है। यह जीवन धारा की तरह बहता जाता है और कहीं एक ठिकाना पकड़ कर बैठना संभव नहंी है पर इंसान अपने सुखों के पल को पकड़े रखना चाहता है और इसी प्रयास में वह विषयों के फेरे में पड़ा रहता है। इंसान के मन में सुख भोगने की इच्छा उसे अज्ञान क अंधेरे में डालती है और जिससे कई ऐसे विषयों, वस्तुओं और व्यक्तियों में मोह डाल लेता है जिनसे उसका बिछड़ना तय है। परिवार,मित्र,रिश्तेदार और व्यवसाय कभी न कभी साथ छोड़ते हैं और उस समय आदमी के मन में भारी संताप उत्पन्न होता है। यह जरूरी नहीं है कि जीवन के नष्ट होने पर ही उनसे बिछोह होता है बल्कि जीवन काल में भी ऐसा अवसर आ जाता है। बच्चों में आदमी का मोह होता है पर जब अपनी नौकरी और व्यापार के लिये मां बाप का साथ छोड़ जाते हैं। वह उच्च स्थान पर स्थापित होते है तो मां बाप समाज में अपना सम्मान समझते हैं पर जब कोई परेशानी का समय आता है तो उन्हीं बच्चो की पास में अनुपस्थिति उनको अखरती है।
यह मोह का परिणाम ही है। आदमी एक व्यवसाय या नौकरी में स्थायित्व ढूंढता है पर वह आजकल के समय में यह संभव नही है। कभी मंदी का दौर हो तो बड़े व्यवसाय डांवाडोल हो जाते हैं।

इनसे बचने का एक ही उपाय है कि मन में निष्काम और निर्लिप्तता का भाव रहे। जब हम कोई काम करें तो उससे अधिक आशा न करें या अवसर पड़े तो बदल दें। अगर जीवन में बहुत सारा धन कमा लिया है तो फिर व्यापार और नौकरी से स्वयं को प्ृथक कर लें क्योंकि उनसे कभी अलग होना है तो क्यों न स्वेच्छा से अलग हुआ जाये। ब्रच्चे अगर बाहर जातेे हैं तो समझ लेना चाहिये कि अब उनकी निकटता अधिक नहीं मिलगी और अपने जीवन में इस बदलाव के साथ जीना चाहिये।
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रहीम सन्देश: भ्रमवश संपत्ति गंवाने से हाथ में कुछ नहीं रहता


संपति भरम गंवाइ के, हाथ रहत कछु नाहिं
ज्यों रहीम ससि रहत है, दिवस अकासहिं मांहि

कविवर रहीम कहते हैं कि भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है और उसमें अपनी संपत्ति का अपव्यय करता रहता है और एक दिन ऐसा आ जाता है जब उसके पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसके साथ ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है।

संतत संपति जानि कै, सबको सब कुछ देत
दीन बंधु बिन दीन की, कौ रहीम सुधि लेत

कविवर रहीम कहते हैं कि जिनके पास धन पर्याप्त मात्रा में लोग उनको सब कुछ देने को तैयार हो जाते हैं और जिसके पास कम है उसकी कोई सुधि नहीं लेता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में माया का खेल विचित्र है। वह कभी स्थिर नहीं रहती। आजकल जितने धन के उद्भव के काले स्त्रोत बने हैं उतने उसके पराभव के मार्ग बने हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने अपने पद, प्रतिष्ठा और परिवार के नाम पर गलत तरीके से अथाह धनार्जन किया पर उनके घर के सदस्यों ने ही गलत मार्ग अपना कर जूए, शराब, सट्टे तथा अन्य व्यसनों में तबाह कर दिया। देखने के लिये अनेक भले लोग अपने धन का अहंकार दिखते हैं पन अपने बच्चों की आदतों से उनका मन हमेशा विचलित होता है। हालांकि कुछ लोग अनाप-शनाप पैसा कमा रहे हैं और अपने बच्चों के विरुद्ध शिकायत न तो सुनते हैं और न ही कोई उनके सामने करता है।

यह कारण है कि आजकल जो कथित बड़े लोग उनके अनेक घर के रहस्य जब सामने आते हैं तो लोग हैरान रह जाते हैं। उनका अपने परिवार पर बस नहीं हैं। कई लोग तो जिनका नाम था अब इसलिये गुमनाम हो गये क्योंकि उनका धन पूरी तरह गलत कामों की वजह से तबाह हो गया। उनकी चर्चा अब इसलिये नहीं होती क्योंकि जिनके पास धन नहीं है उनकी चर्चा भला कौन करता है? इसके बावजूद भी शिक्षित और कथित ज्ञानी लोग भी वैभवशाली लोगों का चाटुकारिता करते हैं और गरीब को अनदेखा करते हैं। अमीर के दौलत से कुद पाने के लिये ही वह लोग उनके इर्दगिर्द चक्कर लगाते है। गरीब को तो वह पांव की जुती समझते हैं। इसके बावजूद हमें समझदार होना चाहिए और सबके प्रति समान व्यवहार करना चाहिए। ऐसा भी होता है कि अमीर की चाटुकारिता करते रहो पर हाथ कुछ नहीं आता। कोई अमीर किसी की बिना कारण सहायता नहीं करता। यह हमें समझना चाहिए। अगर कोई हमारी सहायता करने आ रहा है तो समझ लो उसका कोई स्वार्थ है।
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विदुर नीतिः शोक से शरीर का नाश देखकर शत्रु प्रसन्न होते हैं


1.थोड़े धन वाले कुूल भी सदाचार से संपन्न है तो भी वे अच्छे कुलों में मान लिये जाते हैं और उनको यश प्राप्त होता है।
2.मन को प्रिय लगने वाली वस्तु शोक करने से प्राप्त नहीं होती। शोक से तो केवल शरीर का नाश होता है। इसे देखकर शत्रु प्रसन्न होते हैं।
3.जैसे हंस सूखे सरोवर के आसपास मंडराते रह जाते हैं और उसके अंदर प्रविष्ट नहीं होते। वैसे ही जिसके मन में चंचलता का भाव है वह अज्ञानी इंद्रियों के का गुलाम बन कर रह जाता है और उसे अर्थ की प्रािप्त नहीं हेाती।
4.विद्या,तप,संयम और त्याग के अलावा शांति का कोई उपाय नहीं है।
5.भले की बात कहीं जाये तो भी उन्हें अच्छी नहीं लगती। उनकी योग से भी सिद्धि नहीं हो पाती। भेदभाव करने वाले आदमी की विनाश के सिवा और कोई गति नहीं है।
6.जो भेदभाव करते हैं उनके लिये धर्म का आचरण करना संभव नहीं है। उनको न तो सुख मिलता है न ही गौरव। उनको शांति वार्तालाप करना नहीं सुहाता।
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संत कबीर संदेशः तंबाकू के सेवन से हृदय में मलिनता उत्पन्न होती है


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि
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हुक्का तो सोहै नहीं, हरिदासन के हाथ
कहैं कबीर हुक्का गहै, ताको छोड़ो साथ

इसका आशय यह है कि परमात्मा के सच्चे भक्तों के हाथ में हुक्का शोभा नहीं देता। जो व्यक्ति हुक्का पीते हैं उनका साथ ही छोड़ देना चाहिये।
भौंडी आवै बास मुख, हिरदा होय मलीन
कहैं कबीरा राम जन, मांगि चिलम नहिं लीन

आशय यह है कि जो चिलम आदि का सेवन करते हें उनके मूंह से गंदी बास आती है और उनका हृदय भी मलिन होता है। उनकी संगत न करना चाहिये और न उनसे ऐसी व्यसनों की सामग्री मांगना चाहिये।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-चाहे कितना भी कोई अपनी भक्ति का दिखावा करे पर अगर वह तंबाकू, सिगरेट और चिलम का सेवन करता है तो उसका विश्वास नहीं करना चाहिये। अब तो लोगों के लिये भक्ति भी एक तरह का फैशन हो गया है। कहीं भी किसी जगह धार्मिक मेले में जाईये वहां तंबाकू के पाउच बिकते मिल जायेंगे। वहां लोग खरीद कर उसका सेवन करते हैं। वह भले ही कहते हों कि वह तो भगवान के भक्त है पर अपने मन को खुश करने के लिये जब उनको तंबाकू वाले व्यसन जैसे सिगरेट या पाउच की जरूरत पड़ती है तो इसका आशय यह है केवल भक्ति से उनको राहत नहीं मिलती। यह उनकी मानसिक कमजोरी का परिचायक है। जो परमात्मा की सच्ची भक्ति करते हैं उनको ऐसी चीजों की आवश्यकता नहीं होती। वह तो भक्ति से ही अपने मन को सदैव प्रसन्न रखते हैं।

श्रीगीता में कहा गया है कि गुण ही गुणों को बरतते हैंं। जो लोग तंबाकू आदि का सेवन करते हैं तो उनके मूंह से बदबू आती है। इसका आशय यह है कि वह बदबू उनके शरीर में बैठी है और मन और मस्तिष्क को प्रभावित कर रही है। ऐसे में विचारों के केंद्र बिंदू मस्तिष्क में अच्छे विचार कैसे आ सकते हैं। क्या हम कहीं किसी गंदी गली से निकलते हैं तो हमारे मूंह में क्रोध या नाराजगी के भाव नहीं आते? फिर जो मस्तिष्क उस गंदी बदबू को झेल रहा है कैसे अच्छे विचार कर सकता है। इसलिये ऐसे लोगों के साथ भी नहीं रहना चहिये क्योंकि वह किसी तरह से सहायक नहीं होते।
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संत कबीर वाणीः जो सत्य हो उसी के अनुसार बोलें


शब्द कहै सो कीजिये, बहुतक गुरु लबार
अपने अपने लाभ को, ठौर ठौर बटपार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो शब्द सत्य के अनुसार है उसी का विचार कर कहो। अधिक बोलने वाले गुरु बहुत है जो अपने स्वार्थ के लिये दूसरों को बातें बनाकर ठगते हैं। ऐसे गुरुओं की बात पर विचार न कर अपने विवेक क अनुसार वचन बोलो।

शब्द पाय सुरति राखहि, सो पहुंचे दरबार
कहैं कबीर तहां देखिए, बैठा पुरुष हमार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो सत्य वचनों के ज्ञान को ग्रहण कर लेता है वह परमात्मा की भक्ति पा लेता है। उसे ऐसा लगता है कि वह भगवान की दरबार में ही बैठा है।
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