Category Archives: hindi literature

अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने लीबिया पर तेल संपदा पर कब्जे के लिए किया हमला-हिन्दी लेख (libiya par tel sanpada par kabje ke liye-hindi lekh)


लीबिया पर कथित रूप से नाटो देशों के हमले होने का मतलब यह कतई नहीं लिया जाना चाहिए कि यह सब कोई वहां की जनता के हित के लिये किया गया है। लीबिया में जनअसंतोष न हो यह तो कोई भी निष्पक्ष विचारक स्वीकार नहीं कर सकता। दुनियां में कौनसा ऐसा देश है जहां अपने शिखर पुरुषों के प्रति निराशा नहीं है। जब आधुनिक लोकतंत्र वाले देशों में जनअसंतोष है तो एक तानाशाह के देश में खुशहाली होने का भ्रम वैसे भी नहंी पालना चाहिए। लोकतांत्रिक देशों में तो फिर भी आंदोलनों से वह असंतोष सामने आता है पर तानाशाही वाले देशों में तो उसे इस तरह कुचला जाता है कि भनक तक नहीं लगती। ऐसा चीन में दो बार हो चुका है।
लीबिया में एक जनआंदोलन चल रहा है। जिसके नेतृत्व का सही पता किसी को नहीं है। इस आंदोलन को कुचलने के लिये वहां के तानाशाह गद्दाफी ने कोई कसर नहीं उठा रखी है। गद्दाफी कोई भला आदमी नहीं है यह सभी को पता है पर एक बात याद रखनी होगी कि कम से कम उसके चलते लीबिया में एक राज्य व्यवस्था तो बनी हुई है जिसके ढहने पर लीबिया के लोगों की हालत अधिक बदतर हो सकती है। गद्दाफी का पतन हो जाये तो अच्छा पर लीबिया का पतन खतरनाक है। वहां की जनता ही नहीं वरन् पूरी दुनियां के लोगों को इसका दुष्परिणाम भोगना पड़ेगा क्योंकि वहां का तेल उत्पादन वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपना योगदान देता है।
गद्दाफी के विरुद्ध असंतोष कोई नई बात नहीं है। अब वहां आंदोलन चला तो यह पता नहीं लग सका कि वह बाहरी संगठित शक्तियों के कारण फलफूला या वाकई आम जनता अब अधिक कष्ट सहने को तैयार नहीं है इसलिये बाहर आई। अगर हम गद्दाफी के इतिहास को देखें तो पश्चिमी देशों का ऐजेंट ही रहा है। उसने खरबों रुपये की राशि अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस में जमा की होगी-यह इस आधार पर लिखा जा रहा है क्योंकि फ्रांस तथा अमेरिका ने उसकी भारी भरकम जब्त कर ली है-और अगर गद्दाफी मर गया तो इन देशों को ढेर सारा फायदा होगा। हमारे देश के जनवादी लेखक अमेरिका का विरोध करते हैं पर वह कभी विकासशील देशों की लूट का माल पश्चिमी देशों में किस तरह पहुंचता है इसका अन्वेषण नहीं करते। वह अमेरिकी साम्राज्यवाद का रोना रोते हैं पर उसका विस्तारित रूप आजतक नहीं समझ पाये। उनके पसंदीदा मुल्क चीन और रूस तक के देशों में अमेरिका को प्रसन्न करने वाले पिट्ठू बैठे हैं। इन देशों के शिखर पुरुषों के कहीं कहीं पारिवारिक और आर्थिक इन्हीं देशों में केंद्रित हैं। यही कारण है कि जब सुरक्षा परिषद में किसी देश के विरुद्ध प्रस्ताव आना होता है तो उसका पहले सार्वजनिक रूप से विरोध करते हैं पर जब विचार के लिये बैठक में प्रस्तुत होता है तो वीटो करना तो दूर वहां से भाग जाते है। लीबिया के मामले में यही हुआ। सुरक्षा परिषद में लीबिया के खिलाफ प्रस्ताव में दोनों देश नदारत रहे। यह दोनों गद्दाफी का खुलकर समर्थन करते रहे पर ऐन मौके पर मुंह फेरकर चल दिये।
एक आम व्यक्ति और लेखक के नाते हम लीबिया के आम आदमी की चिंता कर सकते हैं। भले ही नाटो देश वहां की जनता के भले के लिये लड़ने गये हैं पर सारी दुनियां जानती है कि युद्ध के बुरे नतीजे अंततः आम आदमी को ही भुगतने होते हैं। मरता भी वही, घायल भी वही होता है और भुखमरी और बेकारी उसे ही घेर लेती हैं। यह अलग बात है कि शिखर पुरुष जुबानी जमा खर्च करते हैं पर उससे कुछ होता नहीं है।
मान लीजिए गद्दाफी का पतन हो गया तो वहां शासन कौन करेगा? तय बात है कि इन पश्चिमी देशों का ही पिट्ठू होगा। वहां की तेल संपदा वह इन देशों के नाम कर देगा। वैसे गद्दाफी भी यही कर रहा था पर लगता है कि उसके खेल से अब यह नाटो देश ऊब गये हैं इसलिये कोई दूसरा वहां बिठना चाहते हैं। यह भी संभव है कि आंदोलनकारियों ने तेल उत्पादक शहरों पर कब्जा कर लिया तो यह देश डर गये कि अब गद्दाफी उनके काम का नहीं रहा। इसलिये लोकतंत्र पर उसको साफ कर वहां अपना आदमी बिठायें। गद्दाफी का पैसा तो वह ले ही चुके हैं पर डालर के अंडे देने वाली मुर्गियां यानि तेल क्षेत्र लेना भी उनके लिये जरूरी है। अपने आर्थिक हितों को लेकर यह देश कितने उतावले हैं कि बिना सूचना और समाचार के अपने हमले कर दिये। इस बात पर शायद कम ही प्रेक्षकों का ध्यान गया होगा कि लीबिया में गद्दाफी के तेल वाले क्षेत्रों पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया था। मतलब यह नाटो देशों के काम का नहीं रहा। फिर अब विद्रोहियों पर उनके हितैषी बनकर उन पर ही नियंत्रण के लिये गद्दाफी को मारने चल दिये। उनका मुख्य मकसर तेल संपदा की अपने लिये रक्षा करना है न कि लीबिया में लोकतंत्र लाना।
जहां तक इन देशों के लोकतंत्र के लिये काम करने का सवाल है तो सभी जानते हैं कि पूंजीवाद के हिमायती यह राष्ट्र पूंजीपतियों के इशारे पर चलते हैं। जरूरत पड़े तो अपराधियों को भी अपने यहां सरंक्षण देते हैं। दूसरे देशों में जनहित का दावा तो यह तब करें जब अपने यहां पूरी तरह कर लिया हो। लोकतंत्र के नाम पर पूंजीपतियों के बंधुआ बने यह राष्ट्र अपने हितों के लिये काम करते हैं और अगर यह लीबिया की जनता की हित का दावा कर रहे हैं तो उन पर कोई यकीन कर सकता है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
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भूख और गद्दारी-हिन्दी व्यंग्य चिंतन लेख (bhookh aur gaddari-hindi vyangya chittan lekh)


प्रगतिशील और जनवादी कवियों की सामाजिक तथा राजनीतिक कविताओं पर वाहवाही कितनी भी मिलती हो पर तार्किक रूप से उनका कोई आधार नहीं होता। खासतौर से जब वह भूख, गरीबी और लाचारी से त्रस्त लोगों से क्रांति की आशा करते हैं। इतिहास के उद्धरण देकर सोये समाज को जगाने के लिये मज़दूर और गरीब को नायक बनने के लिये प्रेरित करते हैं। संभव है कुछ लोग इस बात पर नाराज हो जायें पर हमारे देश के बुद्धिजीवियों, लेखकों और अंग्रेजी शिक्षा से पढ़े लोगों ने आधुनिक युग के कुछ महानायक गढ़ लिये हैं उनके रास्ते पर चलने का दावा करते हैं। उनकी कवितायें खोखली तो निबंध कबाड़ हैं। यह बात गुस्से या निराशा में लिखी गयी हैं पर इस भय से मुक्त होकर कि जब बेईमानी और भ्रष्टाचार इस तरह खुलेआम हो रहा है और यह बुद्धिजीवी अभी भी अपनी लकीर पीट रहे हैं तब हमारा क्या कर लेंगे? इतिहास खोद रहे हैं जबकि वह एक भूलभुलैया है। दरअसल यह बात लिखने से पहले कवि नीरज की काव्यात्मक पंक्तियां दिमाग में आयी थीं जिसे शैक्षणिक पाठ में एक निबंध में पढ़ा और जिसे परीक्षा में उत्तरपुस्तिका में भी लिखा था। जहां तक हमारी स्मरण शक्ति जाती है उस पंक्ति के बाद ही लिखने के लिये कलम उठाई थी। आज उस कविता का आधा हिस्सा झूठ लगता है और लिखने के लिये ऐसी उत्तेजना पैदा हो रही है कि लगता है कि हिन्दी का आधुनिक और उत्तर आधुनिक काल केवल भ्रमवश ही चलता रहा है। याद्दाश्त के आधार पंक्तियां यह हैं।
तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है,
बाग को उजाड़ बना देती है,
ओ भूखे को देशभक्ति का उपदेश देने वालों
भूख इंसान को गद्दार बना देती है।
कवि नीरज की यह कविता उस समय बहुत अच्छी लगी थी।
एक अन्य कविता की पंक्तियां है जो शायद रघुवीर सहाय या राजेन्द्र यादव की हो सकती है जिसने हम पर बहुत प्रभाव डाला था।
हमसे तो यह धूल ही अच्छी
जो कुचले जाने पर प्रतिरोध तो करती है।
यहां बात कवि नीरज जी काव्यात्मक पंक्तियों की करें। तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है। यह सच लगता है मगर भूख इंसान को गद्दार बना देती है, इन पर एतराज है।
हम पिछले कई दिनों से देश के साथ गद्दारी करने के आरोप में पकड़े गये लोगों की बात करते हैं। इनमें से कोई भूखा नहीं है। एक तो पाकिस्तान में ही विदेश सेवा में कार्यरत एक महिला पकड़ी गयी जो वहां के सैन्य अधिकारी से प्रेम की पीगें बढ़ा रही थी। संभव है तन की हवस ने गुनाहगार बनाया हो पर उसने भी वहां पैसा कमाया जो शायद उसका मुख्य उद्देश्य था। हालांकि अब भी यह कहना कठिन है कि तन की हवस ने ऐसा किया या पैसे की लालच ने। मगर वह रोटी की भूखी नहीं थी। कम से नीरज जी की यह पंक्तियां वहां ठीक नहीं बैठती। अभी एक भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी (आई. ए. एस.) भी एक अधिकारी पकड़ा गया। वह भी कौन? जिस पर देश की आंतरिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण दायित्व था। वह भी लड़कियों की मांग करता था। लगता है जैसे कि तन की हवस ने गुनाहगार बनाया मगर उसने पैसा भी कमाया और यही उसका ध्येय था। शारीरिक भूख से अधिक पैसे की लालच ने ही उसे देश की गद्दारी करने के लिये प्रेरित किया। पैसा हो तो शारीरिक हवस मिट ही जाती है इसलिये यह कहना बेकार है कि उन्होंने केवल यौन लाभ के लिये यह सब किया। इससे पहले भी एक अधिकारी पकड़ा गया जिस पर गोपनीय दस्तावेज लीक करने का आरोप लगा।
कोई बतायेगा कि किसी रोटी के भूखे ने देश से गद्दारी की हो। जरा, कोई बतायेगा कि किसी ने रोटी के लिये किसी का कत्ल किया हो! माओवाद के नाम पर चल रही हिंसा का समर्थन करने वाले वहां के क्षेत्रों की भूख और बेकारी की समस्याओं की बहुत आड़ लेते हैं। वह बताते हैं कि भूख की वजह से पूर्व में लोग हथियार उठा रहे हैं। जब उनसे कहा जाता है कि हथियार उठाने वाले तो भूखे नहीं है तो जवाब मिलता है कि वह भूखे नंगों को बचाने के लिये प्रेरित हुए हैं इसलिये हथियार उठाये हैं।
कौन बताये कि हमारे धर्मग्रंथों में एक सीता जी भी हुईं हैं जिन्होंने अपने पति भगवान श्रीराम को बताया था कि हथियार रखने से मन में हिंसा का भाव स्वतः आता है।
उन्होंने भगवान श्री राम को एक किस्सा सुनाया। एक तपस्वी की तपस्या से देवराज इंद्र विचलित हो गये तब उन्होंने उसके पास जाकर उससे कहा कि ‘मेरा यह खड्ग अपने पास धरोहर में रूप में रख लो कुछ दिन बाद ले जाऊंगा।’
तपस्वी ने रख लिया। चूंकि देवराज इंद्र बहुत प्रतिष्ठित थे इसलिये वह तपस्वी उस खड्ग की रक्षा मनोयोग से करने लगा। धीरे धीरे उसका मन तपस्या से अधिक उस खड्ग में लग गया और अंततः वह तपस्वी से हिंसक जीव बन गया। इससे तो यही आशय निकलता है कि जब हथियार रखने भर से ही तपस्वी का हृदय बदल गया तो जो यह आम माओवादी बंदूकें या बम होने पर देवता बने रह सकते हैं। तय बात है कि इससे वह वहीं अपने ही लोगों को आतंकित करते होंगे।
प्रगतिशील और जनवादियों ने भूख पर बहुत लिखा है। भूख में क्रांति की तलाश करते हुए इन लोगों पर अब तरस आने लगा है। उन पर ही नहीं अपने पर भी अब नाराजगी होने लगी है कि क्यों उनसे प्रभावित हुए। भूखा आदमी तो धीरे धीरे शारीरिक रूप से कमजोर हो जाता है और मानसिक रूप से उसकी स्थिति यह हो जाती है कि पत्थर भी उसको रोटी लगती है। इतना ही नहीं वह घास भी खाने लगता है। वह इतना अशक्त हो जाता है कि चोरी करना और कत्ल करने की सोचना भी उसके लिये मुश्किल हो जाता है। हालांकि हमारे बुजुर्ग कहते थे कि भूख आदमी शेर से भी लड़ जाता है पर अब उस पर यकीन नहीं होता।
देश में बरसों से भूख, गरीबी, बेरोजगारी और शोषण दूर करने का अभियान चल रहा है मगर उसका प्रभाव नहीं दिखता और अनेक बुद्धिजीवी इस पर रोते गाते हैं। यह अलग बात है कि इस पर इनाम के लिये वह राज्य और पूंजीपतियों से उनको सम्मान मिलता है-वह पूंजीपति जिन पर देश के गरीब रहने का आरोप लगाते हैं। ऐसे लोग केवल झूठ बेचते हैं। भूख से गद्दारी पैदा होने का भ्रम अब दिखने लगा है। जिनके पेट भरे हैं, जिनके पास सारे सुविधायें पहले से ही हैं। रोजगार की दृष्टि से ऐसे पद कि बेरोजगार ही नहीं बल्कि बारोजगारों के लिये भी एक क सपना हो। ऐसे में वह गद्दारी कर रहे हैं। तब कौन कहता है कि भूख इंसान को गद्दार बनाती है और कौन इसे मानेगा?
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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पतंजलि योग साहित्य-तप, स्वाध्याय तथा भक्ति हैं क्रियायोग (patanjali yoga sahitya-tap, swadhayay tathaa bhakti is kriya yog)


तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधान क्रियायोगः।।
हिन्दी में भावार्थ-
तप, स्वाध्याये तथा ईश्वर के प्रति प्राण केंद्रित करना तीनों ही क्रियायोग हैं।
समाधिभावनार्थः क्लेशतनुरणर्थश्च।।
हिन्दी में भावार्थ-
समाधि में प्राप्त सिद्धि से अज्ञान तथा अविद्या के कारण होने वाले क्लेशों का नाश होता है।
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशा।।
हिन्दी में भावार्थ-
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश यह पांचों क्लेश है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योग साधना के आठ भाग हैं जिसमें समाधि का अत्यंत महत्व है। समाधि ध्यान का वह चरम शिखर है जहां मनुष्य इस दैहिक संसार से प्रथक ईश्वरीय लोक में स्थित हो जाता है। उसका अपने अध्यात्म से इस तरह योग या जुड़ाव हो जाता है कि उसकी देह में स्थित इंद्रिया निष्क्रिय और शिथिल हो जाती हैं और जब योगी समाधि से वापस लौटता है तो उसके लिये पूरा संसार फिर नवीन हो जाता है क्योंकि वह मन के सारे विकारों से निवृत होता है।
योगासन तथा प्राणायाम के बाद परम पिता परमात्मा के प्रति ध्यान लगाना भी योग हैं और इनको क्रियायोग कहा जाता है। इसमे सिद्धि होने पर किसी विषय का अध्ययन न करने या उसमें जानकारी का अभाव होने पर भी उसको जाना जा सकता है। ऐसे में अविद्या और अज्ञान से उत्पन्न क्लेश नहीं रह जाता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि योग साधना की सीमा केवल योगासन और प्राणायाम तक ही केंद्रित नहीं है बल्कि ध्यान और समाधि भी उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा है। मनुष्य का अपना संकल्प भी इसमें महत्व रखता है।
सच तो यह है कि मनुष्य मन के इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक तो है सहज योग जिसमें मनुष्य स्वयं संचालित होता है। दूसरा है असहज योग जिसमें मनुष्य अज्ञान तथा अविद्या के कारण इधर उधर प्रसन्नता तलाश करते हुए केवल तनाव ही पाता है। पूर्ण रूप से योग साधना का ज्ञान प्राप्त करने वाले मनुष्य तत्व ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तब उनका प्रयोजन इस नश्वर संसार से अधिक नहीं रह जाता है। योगासन तथा प्राणायाम करने वाले कुछ लोग अपने आपको सिद्ध समझने लगते हैं और तब वह दूसरों को चमत्कार दिखाकर अपनी दुकानें जमाते हैं। दरअसल वह योग का पूर्ण रूप नहीं जानते। जिन लोगों को योग साधना का पूर्ण ज्ञान होता है वह समाधि के द्वारा सिद्ध तो प्राप्त करते हैं पर उसकी आड़ में कोई धंधा नहीं करते क्योंकि उनके लिये इस संसार में कोई भी कार्य चमत्कार नहीं रह जाता।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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संत कबीर दर्शन-सामूहिक भक्ति और भजन दिखावा है (samuhik bhakti ek dikhava-sant kabir darshan)


ऊजल पहिनै कापड़ा, पान सुपारी खाय।
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय।।
संत कबीर कहते हैं कि जो उजले कपड़े पहनने के साथ ही पान सुपारी खाकर दिखावा करते हैं और गुरु की भक्ति नहीं करते वह बहुत तकलीफ के साथ मुत्यु को प्राप्त होते हैं।
दुनियां सेती दोसती, होय भजन में भंग।
एका एकौ राम सों, कै साधुन के संग।।
संत कबीर कहते हैं कि दुनियां के लोगों के साथ मित्रता करने से भक्ति में बाधा आती है। एक अकेले ही भगवान राम की भक्ति तथा साधुओं की संगत करने पर ही मन को शांति मिलती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आधुनिक युग ने भारत में जीवन के मायने ही बदल दिये हैं। मित्रता के नाम पर अनेक लोग कुसंगत में फंसकर जीवन तबाह करते हैं तो अनेक लोग समूहों में मिलकर भगवान भजन का आयोजन कर अपने धार्मिक होने की दिखावा करते हैं। स्थिति यह है कि अनेक लोग अपने यहां शादी विवाह के अवसर पर परंपरागत गीत गायन के स्थान पर भजन जागरण करते हैं और इस अवसर पर शराब तंबाकू का खुलकर सेवन होता है। कई बार तो हंसी आती है कि भक्ति को लेकर लोग समझते क्या हैं? वह भगवान को भक्ति दिखा रहे हैं या लोगों को बता रहे हैं या अपने आपको ही स्वयं के भक्त होने का विश्वास दिला रहे हैं। अब तो हर मौके पर सामूहिक भजन कार्यक्रम करने की ऐसी परंपरा शुरु हो गयी है कि देखकर लगता है कि पूरा देश ही भक्तमय हो रहा है। उस हिसाब से देश में नैतिकता तथा आचरण के मानदंड बहुत ऊंचे दिखना चाहिये पर ऐसा है नहीं।
दरअसल देश में बढ़ते धन ने लोगों को बावला बना दिया है और धनी लोग अपनी छबि धार्मिक बनाये रखने के लिये ऐसे आयोजन करते हैं जिससे समाज में भले आदमी की छबि बने रहे। उसी तरह कुछ बाहुबली लोगों से पैसा वसूल कर भी अनेक प्रकार के सामूहिक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं कि लोग उनकी छबि को साफ सुथरा समझें। सच तो यह है कि धर्म साधना एकांत का विषय है और इसमें जो समूह बनाकर भजन करते हैं या कार्यक्रमों में शामिल होते हैं वह सिवाय पाखंड के कुछ नहीं करते। दूसरों को नहीं अपने आपको धोखा देते हैं।
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श्रीगुरुग्रंथ साहिब से-परमात्मा को कोई स्थापित नहीं कर सकता (shri gurugranth sahib-parmatma kee sthapna)


मनि साचा मुखि साचा सोइ।
अवर न पेखै ऐकस नि कोइ।
नानक इह लक्षण ब्रह्म गिआनी होइ।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस मनुष्य के मन और मुख का निवास होता है वह परमात्मा के अलावा कुछ नहीं देखता और किसी अन्य के सामने माथा नहीं टेकता।
थापिआ न जाइ कीता न होई, आपे आपि निरंजन सोइ।
हिन्दी में भावार्थ-
परमात्मा न तो कहीं स्थापित नहीं किया जा सकता है और बनाया जाता है। वह तो वह स्वयं ही निर्मित है।
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-श्री गुरुनानक जी ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता पर तो प्रहार किये ही साथ ही धर्म के लेकर लोगों के अंदर रहने वाले अहंकार भाव को भी रेखांकित किया है। सभी मनुष्य को अपना एक इष्ट होता है। हमारे देश में तो यह परंपरा भी रही है कि एक ही परिवार के सदस्यों का इष्ट अलग अलग होता है। हालांकि इसे लेकर अनेक लोग प्रतिकूल टीका टिप्पणियां करते हैं पर यह उनके अज्ञान का प्रमाण है। दरअसल पूरा देश ही निरंकार परमात्मा का उपासक रहा है पर सुविधा के लिये हर भक्त अपने लिये अपने मन के अनुसार किसी एक स्वरूप की पूजा करता है। जो ज्ञानी है वह तो निरंकार रूप का ही स्मरण करते हैं पर जो सामान्य मनुष्य है वह मूर्तियों के द्वारा उपासना कर अपना मन संतुष्ट करते हैं। इस पर विवाद नहीं होना चाहिऐ।
मुश्किल यह है कि हर कोई अपने स्वरूप को श्रेष्ठ बताकर दूसरे की मजाक उड़ाता है या आलोचना करता है। उससे भी ज्यादा बुरी बात यह है कि कुछ कथित ज्ञानी ऐसे भी हैं जो सभी स्वरूपों को एक बताकर अपने ही स्वरूप की पूजा दूसरे पर थोपते हैं यह कहते हुए कि हमारा धर्म तो एक ही है। कोई शिव का भक्त है तो कोई राम का या कृष्ण पर जब ऐसे भक्तों से माता या गणेश जी की मूर्तियों की झांकियों या कार्यक्रमों के नाम पर चंदा वसूलने का दबाव धार्मिक एकता के नाम पर बनाया जाता है तब कुछ लोगों का मन नाखुश हो जाता है। यही स्थिति उन लोगो की भी है जो निष्काम भाव से भगवान को भजते हैं और उन पर सकाम भक्ति-मंदिर या प्रवचनों में शामिल होना-करने के लिये दबाव बनाया जाता है।
कुछ लोगों के यह भ्रम है कि वह भगवान का नाम लेते हैं तो उनके दबदबे को सभी माने। धन, पद तथा बाहुबल के सहारे लोग भले ही दूसरों पर अपनी भक्ति का रौब जरूर गांठते हैं पर सच यही है कि परमात्मा की भक्ति किसी पर थोपी नहीं जा सकती। मुख्य बात यह है कि यह स्मरण स्वयं ही हृदय से करना चाहिये न कि दूसरे पर प्रभाव डालने के लिये।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-प्रभाव बढ़ने के साथ शत्रु भी बढ़ते हैं (kautilya ka arthshastra-prabhav aur shatru)


न जातु गच्छेद्धिश्वासे सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान।
अद्रोहसमयं कृत्यां वृत्रमिन्द्रः पुरात्त्वद्यीत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अगर किसी कारणवश किसी से संधि भी की जाये तो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ‘मैं वैर नहीं करूंगा’ यह कहकर भी इन्द्र ने वृत्रासुर को मार डाला था।
विकारं याति पुत्रो हि राज्यान्नीचः पिता तथा।
तल्लोकवृत्तांन्नृपतेरन्यद्वृत्नं प्रचक्षते।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस प्रकार के व्यवहार से पुत्र तथा पिता नीच हो जाता है राजा का ऐसा व्यवहार लोक व्यवहार से भिन्न है। 
ज्यायांसं सिंहः साहसं यथं मध्नाति दन्तिनः।
तस्मार्तिह इवोदग्रमात्मानं वीक्ष्ण सम्पतेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
शक्तिशाली सेना को साथ लिए शत्रु को युद्ध में मारने पर राजा का प्रभाव बढ़ता है। इसी प्रताप के कारण सभी जगह उसके दूसरे शत्रु भी पैदा होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जीवन अद्भुत है और रहस्यमय भी। मनुष्य को अन्य जीवों से अधिक बुद्धि वरदान में मिली है और वही उसकी सबसे शत्रु और मित्र भी है। जहां पशु पक्षी तथा अन्य जीव मनुष्य के एक बार मित्र हो जाते हैं तो फिर शत्रुता नहीं करते मगर स्वयं मनुष्य ही एक विश्वसनीय जीव नहीं है। वह परिस्थितियों के अनुसार अपनी वफादारी बदलता रहता है। अतः यह कहना कठिन है कि कोई मित्र अपने संकट निवारण या स्वार्थ सिद्धि का अवसर आने पर विश्वासघात नहीं करेगा। ऐसे में किसी शत्रु से संधि हो या मित्र से नियमित व्यवहार की पक्रिया उसमें कभी स्थाई विश्वास की अपेक्षा नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा एक बात यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे के प्रति कठोरता या हिंसा का व्यवहार न करें। अनेक बार मनुष्य अपने को प्रभावशाली सिद्ध करने के लिये अपने से हीन प्राणी पर अनाचार करता है या फिर हमला कर उसे मार डालता है। इससे अन्य मनुष्य डर अवश्य जाते हैं पर मन ही प्रभावशाली आदमी के प्रति शत्रुता का भाव भी पाल लेते हैं। समय आने पर प्रभावशाली आदमी जब संकट में फंसता है तो वह उनका मन प्रसन्न हो जाता है। इसलिये जहां तक हो सके क्रूर तथा हिंसक व्यवहार से बचना चाहिए।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
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भर्तृहरि नीति शतक-असिधारा व्रत का पालन करें (bhartrihari neeti shatak-asidhara vrat)


सन्तपन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषास्तान्प्रत्येष विशेष विक्रमरुची राहुर्न वैरायते।
द्वावेव प्रसते दिवाकर निशा प्रापोश्वरौ भास्करौ भ्रातः! पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषाकृतिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
आसमान में बृहस्पति समेत अनेक शक्तिशाली ग्रह हैं किन्तु पराक्रम में दिलचस्पी रखने वाला राहु उनसे कोई लड़ाई मोल नहीं लेता क्योंकि वह तो पूर्णिमा और अमावस्या के दिन अति देदीप्यमाान सूर्य तथा चंद्र को ही ग्रसित करता है।
असन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः प्रियान्यारूया वतिर्मलिनमसुभंगेऽप्यसुकरं।
विपद्युच्चैः स्थेयं पदमनुविधेयं च महतां सतां केनोद्दिष्टं विषमसिधाराव्रतमिदम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
सदाशयी मनुष्यों के लिये कठोर असिधारा व्रत का आदेश किसने दिया? जिसमें दुष्टों से किसी प्रकार की प्रार्थना नहीं की जाती। न ही मित्रों से धन की याचना की जाती है। न्यायिक आचरण का पालन किया जाता है। मौत सामने आने पर भी उच्च विचारों की रक्षा की जाती है और महान पुरुषों के आचरण की ही अनुसरण किया जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर मनुष्य को अपने पराक्रम में ही यकीन करना चाहिए न कि अपने लक्ष्यों को दूसरों के सहारे छोड़कर आलस्य बैठना चाहिए। इतना ही नहीं मित्रता या प्रतिस्पर्धा हमेशा अपने से ताकतवर लोगों की करना चाहिये न कि अपने से छोटे लोगों पर अन्याय कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए।
अनेक मनुष्य अपने आसपास के लोगों को देखकर अपने लिये तुच्छ लक्ष्य निर्धारित करते हैं। थोड़ा धन आ जाने पर अपने आपको धन्य समझते हुए उसका प्रदर्शन करते हैं। यह सब उनके अज्ञान का प्रमाण है। अगर स्थिति विपरीत हो जाये तो उनका आत्मविश्वास टूट जाता है और दूसरों के कहने पर अपना मार्ग छोड़ देते हैं। अनेक लोग तो कुमार्ग पर चलने लगते हैं। सच बात तो यह है कि हर मनुष्य को भगवान ने दो हाथ, दो पांव तथा दो आंखों के साथ विचारा करने के लिये बुद्धि भी दी है। अगर मनुष्य असिधारा व्रत का पालन करे-जिसमें दुष्टों ने प्रार्थना तथा मित्रों से धना की याचना न करने के साथ ही किसी भी स्थिति में अपने सिद्धांतों का पालन किया जाता है-तो समय आने पर अपने पराक्रम से वह सफलता प्राप्त करता है।

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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-आलस्य छोड़कर नियत समय पर काम प्रारंभ करना श्रेयस्कर


न कार्यकालं मतिमानतिक्रामेत्कदायन।
कथञ्चिदेव भवति कार्ये योगः सुदृर्ल्लभः।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि अपने कार्य को निश्चित समय पर पूरा करे और इसमें किसी प्रकार की कोताही न बरते। कारण यह कि किसी भी कार्य में मन लगाना दुर्लभ है। फिर जीवन में संयोग बार बार नहीं आते।
सतां मार्गेण मतिमान् काले कर्म्म समाचरेत्।
काले समाचरन्साधु रसवत्फल्मश्नुते।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को सत्य मार्ग पर स्थिर होकर समय आने अपना कार्य निश्चित रूप से आरंभ करना चाहिऐ। समय पर कार्य करने पर सारे फल प्रकट होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य स्वभाव में आलस्य का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है। संत कबीर दास जी ने कहा भी है कि ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय हो जायेगी बहुरि करेगा कब।’ हर मनुष्य सोचता है कि अपना काम तो वह कभी भी कर सकता है पर ऐसा सोचते हुए उसका समय निकलता जाता है। चतुर मनुष्य इस बात को जानते हैं इसलिये ही वह विकास के पथ पर चलते हैं। अक्सर लोग अपनी असफलता और निराशा को लेकर भाग्य को कोसते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि विकास का समय हर आदमी के पास आता है और जो अपने ज्ञान और विवेक से उसका लाभ उठाते हैं उनकी पीढ़ियों का भी भविष्य सुधर जाता है। संसार में सफल और प्रभावशाली व्यक्त्तिव का स्वामी, उद्योगपति, तथा प्रतिष्ठाप्राप्त लोगों की संख्या आम लोगों से कम होती है इसका कारण यह है कि सभी लोग समय का महत्व नहीं समझते और आलस्य के भाव से ग्रसित रहते हैं।
जीवन में निरंतर सक्रिय रहने से मनुष्य के चेहरे और मन में स्फूर्ति बनी रहती है और बड़ी आयु होने पर भी उसका अहसास नहीं होता। आलस्य मनुष्य का एक बड़ा शत्रु माना जाता है इसलिये उससे मुक्ति पाना ही श्रेयस्कर है। कोई काम सामने आने पर उसको तुरंत प्रारंभ कर देना चाहिये यही जीवन में सफलता का मूलमंत्र है। 

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मनुस्मृति-भोजन के लिये जाति या गौत्र के नाम का उपयोग उचित नहीं (bhojan prapt karne ke liye-manu smriti in hindi)


उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः।
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नांदिदायिजः।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार जो निर्बुद्धि मनुष्य अच्छे खाने की लालच में दूसरे स्थान पर जाकर आतिथ्य सत्कार पाने का प्रयास करता है वह अगले जन्म में अन्न खिलाने वाले मनुष्यों के घर में पशु का रूप धारण कर रहता है।
न भोजनार्थ स्वे विप्र कुलगोत्रे निवेदयेत्।
भोजनार्थ हि ते शंसन्न्वान्ताशीत्युच्यते बुधैः।।
हिन्दी में भावार्थ-
किसी भी ज्ञानी आदमी को कहीं से खाना प्राप्त करने के लिये अपने कुल या जाति की सहायता नहीं लेना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति वान्ताशी यानि उल्टी किए गऐ भोजन को खाने वाला माना जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की जीभ स्वाद के लालायित रहती है। जो ज्ञानी लोग भोजन को केवल पेट भरने के लिये मानते हैं वह तो हर प्रकार के भोजन में संतुष्ट हो जाते हैं पर पेट भरना ही जीवन मानते हैं वह अच्छे खाने के लिये इधर उधर मुंह मारते हैं। जीवन के लिये भोजन आवश्यक है पर कुछ लोग तो भोजन को ही जीवन मानकर उसके पीछे फिरते हैं। ऐसे लोग हमेशा भूखे रहते हैं और अपने घर के खाने को विष समझकर इधर उधर ताकते रहते हैं। एसे लोगों की बुद्धि अत्यंत निकृष्ट होती है।
भोजन हमें इस उद्देश्य से ग्रहण करना चाहिये कि उससे हमारे शरीर को नियमित ऊर्जा मिलती रहे। भोजन में ऐसे पदार्थ ग्रहण करना चाहिए जो भले ही स्वादिष्ट न हों पर सुपाच्य होना चाहिए। जीभ के स्वाद के चक्कर में अज्ञानी लोग ऐसे पदार्थ ग्रहण करते हैं जो पेट के लिए हानिकारक हैं। आजकल हम देख भी रहे है कि स्वादिष्ट पदार्थों के सेवन से बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है। इसलिये सुपाच्य पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कर ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।
उसी तरह भोजन प्राप्त करने के लिऐ कभी अपने कुल या गौत्र का नहीं लेकर सदाशयी गृहस्थ की सद्भावना पर ही निर्भर रहना चाहिए। जो लोग अपने भोजन के लिये कुल या जाति का आसरा लेते हैं वह ऐसे ही होते हैं जैसे कि उल्टी का भोजन करने वाले पशु होते हैं।
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विदुर नीति-मित्र का पहले से परिचित या संबंधी होना जरूरी नहीं (hindu dharma sandesh-religion of friendship)


सत्कृतताश्च श्रुतार्थाश्च मित्राणं न भविन्त ये।
तान् मुतानपि क्रव्यादाः कृतध्नान्नोपर्भुजते।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो अपने मित्र से सम्मान और सहायता पाने के बाद भी उनके नहीे होते ऐसे कृतघ्न मनुष्य के मरने पर उनका मांस तो मांस खाने वाले जंतु भी नहीं खाते।
न कश्चिदप्यसम्बद्धो मित्रभावेन वर्तते।
स एवं बन्धुस्तमित्रं सा गतिस्तत् परायणम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
पूर्व में कोई परिचय या संबंध न होने पर भी जो मित्रता का कर्तव्य निभाये वही बंधु और मित्र है। वही सहारा और आश्रय देने वाला है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्रता का धर्म सबसे बड़ा है और इसे निभाना इतना आसान नहंी है जितना समझा जाता है। हमारे साथ कार्य तथा व्यवसायिक स्थल पर अनेक लोग प्रतिदिन मिलते हैं पर वह मित्र की श्रेणी में नहंी आते। उसी तरह बंधु बांधव भी बहुत होते हैंे पर विपत्ति में सभी नहीं आते। ऐसा भी अवसर आता है कि विपत्ति के समक्ष होने पर कोई अपरिचित या पूर्व में किसी भी प्रकार का संबंध न रखने वाला व्यक्ति भी उससे मुक्ति दिलवाता है। इस तरह तो मित्र वही कहा जाता है। कहने का अभिप्राय यह है मित्रता का धर्म यही है कि विपत्ति या काम करने पर किसी की सहायता की जाये। प्रतिदिन मिलते जुलते रहना, व्यर्थ के विषयों पर वाद विवाद करना या साथ साथ काम करना मित्रता की श्रेणी में नहीं आता।
जब कोई व्यक्ति हमारे साथ मित्रता निभाता है तो फिर उसकी सहायता के लिये भी तत्पर रहना चाहिये। ऐसा न करने पर बहुत बड़ा अधर्म हो जाता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है-यह बात नहीं भूलना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि एक मनुष्य दूसरे की सहायता करे। इसे ही मित्रता निभाना कहा जाता है। मित्रता के लिये पूर्व परिचय या संबंध होना आवश्यक नहीं है।

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