Category Archives: friends

अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने लीबिया पर तेल संपदा पर कब्जे के लिए किया हमला-हिन्दी लेख (libiya par tel sanpada par kabje ke liye-hindi lekh)


लीबिया पर कथित रूप से नाटो देशों के हमले होने का मतलब यह कतई नहीं लिया जाना चाहिए कि यह सब कोई वहां की जनता के हित के लिये किया गया है। लीबिया में जनअसंतोष न हो यह तो कोई भी निष्पक्ष विचारक स्वीकार नहीं कर सकता। दुनियां में कौनसा ऐसा देश है जहां अपने शिखर पुरुषों के प्रति निराशा नहीं है। जब आधुनिक लोकतंत्र वाले देशों में जनअसंतोष है तो एक तानाशाह के देश में खुशहाली होने का भ्रम वैसे भी नहंी पालना चाहिए। लोकतांत्रिक देशों में तो फिर भी आंदोलनों से वह असंतोष सामने आता है पर तानाशाही वाले देशों में तो उसे इस तरह कुचला जाता है कि भनक तक नहीं लगती। ऐसा चीन में दो बार हो चुका है।
लीबिया में एक जनआंदोलन चल रहा है। जिसके नेतृत्व का सही पता किसी को नहीं है। इस आंदोलन को कुचलने के लिये वहां के तानाशाह गद्दाफी ने कोई कसर नहीं उठा रखी है। गद्दाफी कोई भला आदमी नहीं है यह सभी को पता है पर एक बात याद रखनी होगी कि कम से कम उसके चलते लीबिया में एक राज्य व्यवस्था तो बनी हुई है जिसके ढहने पर लीबिया के लोगों की हालत अधिक बदतर हो सकती है। गद्दाफी का पतन हो जाये तो अच्छा पर लीबिया का पतन खतरनाक है। वहां की जनता ही नहीं वरन् पूरी दुनियां के लोगों को इसका दुष्परिणाम भोगना पड़ेगा क्योंकि वहां का तेल उत्पादन वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपना योगदान देता है।
गद्दाफी के विरुद्ध असंतोष कोई नई बात नहीं है। अब वहां आंदोलन चला तो यह पता नहीं लग सका कि वह बाहरी संगठित शक्तियों के कारण फलफूला या वाकई आम जनता अब अधिक कष्ट सहने को तैयार नहीं है इसलिये बाहर आई। अगर हम गद्दाफी के इतिहास को देखें तो पश्चिमी देशों का ऐजेंट ही रहा है। उसने खरबों रुपये की राशि अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस में जमा की होगी-यह इस आधार पर लिखा जा रहा है क्योंकि फ्रांस तथा अमेरिका ने उसकी भारी भरकम जब्त कर ली है-और अगर गद्दाफी मर गया तो इन देशों को ढेर सारा फायदा होगा। हमारे देश के जनवादी लेखक अमेरिका का विरोध करते हैं पर वह कभी विकासशील देशों की लूट का माल पश्चिमी देशों में किस तरह पहुंचता है इसका अन्वेषण नहीं करते। वह अमेरिकी साम्राज्यवाद का रोना रोते हैं पर उसका विस्तारित रूप आजतक नहीं समझ पाये। उनके पसंदीदा मुल्क चीन और रूस तक के देशों में अमेरिका को प्रसन्न करने वाले पिट्ठू बैठे हैं। इन देशों के शिखर पुरुषों के कहीं कहीं पारिवारिक और आर्थिक इन्हीं देशों में केंद्रित हैं। यही कारण है कि जब सुरक्षा परिषद में किसी देश के विरुद्ध प्रस्ताव आना होता है तो उसका पहले सार्वजनिक रूप से विरोध करते हैं पर जब विचार के लिये बैठक में प्रस्तुत होता है तो वीटो करना तो दूर वहां से भाग जाते है। लीबिया के मामले में यही हुआ। सुरक्षा परिषद में लीबिया के खिलाफ प्रस्ताव में दोनों देश नदारत रहे। यह दोनों गद्दाफी का खुलकर समर्थन करते रहे पर ऐन मौके पर मुंह फेरकर चल दिये।
एक आम व्यक्ति और लेखक के नाते हम लीबिया के आम आदमी की चिंता कर सकते हैं। भले ही नाटो देश वहां की जनता के भले के लिये लड़ने गये हैं पर सारी दुनियां जानती है कि युद्ध के बुरे नतीजे अंततः आम आदमी को ही भुगतने होते हैं। मरता भी वही, घायल भी वही होता है और भुखमरी और बेकारी उसे ही घेर लेती हैं। यह अलग बात है कि शिखर पुरुष जुबानी जमा खर्च करते हैं पर उससे कुछ होता नहीं है।
मान लीजिए गद्दाफी का पतन हो गया तो वहां शासन कौन करेगा? तय बात है कि इन पश्चिमी देशों का ही पिट्ठू होगा। वहां की तेल संपदा वह इन देशों के नाम कर देगा। वैसे गद्दाफी भी यही कर रहा था पर लगता है कि उसके खेल से अब यह नाटो देश ऊब गये हैं इसलिये कोई दूसरा वहां बिठना चाहते हैं। यह भी संभव है कि आंदोलनकारियों ने तेल उत्पादक शहरों पर कब्जा कर लिया तो यह देश डर गये कि अब गद्दाफी उनके काम का नहीं रहा। इसलिये लोकतंत्र पर उसको साफ कर वहां अपना आदमी बिठायें। गद्दाफी का पैसा तो वह ले ही चुके हैं पर डालर के अंडे देने वाली मुर्गियां यानि तेल क्षेत्र लेना भी उनके लिये जरूरी है। अपने आर्थिक हितों को लेकर यह देश कितने उतावले हैं कि बिना सूचना और समाचार के अपने हमले कर दिये। इस बात पर शायद कम ही प्रेक्षकों का ध्यान गया होगा कि लीबिया में गद्दाफी के तेल वाले क्षेत्रों पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया था। मतलब यह नाटो देशों के काम का नहीं रहा। फिर अब विद्रोहियों पर उनके हितैषी बनकर उन पर ही नियंत्रण के लिये गद्दाफी को मारने चल दिये। उनका मुख्य मकसर तेल संपदा की अपने लिये रक्षा करना है न कि लीबिया में लोकतंत्र लाना।
जहां तक इन देशों के लोकतंत्र के लिये काम करने का सवाल है तो सभी जानते हैं कि पूंजीवाद के हिमायती यह राष्ट्र पूंजीपतियों के इशारे पर चलते हैं। जरूरत पड़े तो अपराधियों को भी अपने यहां सरंक्षण देते हैं। दूसरे देशों में जनहित का दावा तो यह तब करें जब अपने यहां पूरी तरह कर लिया हो। लोकतंत्र के नाम पर पूंजीपतियों के बंधुआ बने यह राष्ट्र अपने हितों के लिये काम करते हैं और अगर यह लीबिया की जनता की हित का दावा कर रहे हैं तो उन पर कोई यकीन कर सकता है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्दयोग

4.दीपकबापू   कहिन
५.ईपत्रिका 
६.शब्द पत्रिका 
७.जागरण पत्रिका 
८,हिन्दी सरिता पत्रिका 
९शब्द योग पत्रिका 
१०.राजलेख पत्रिका 

Advertisements

तबादला-हिन्दी हास्य कविता (tabadla-hindi shaya kavita


अपने तबादले से वह खुश नहीं थे,
क्योंकि नयी जगह पर
ऊपरी कमाई के अवसर कुछ नहीं थे,
इसलिये अपने बॉस के जाकर बोले,
‘‘मैंने तो आपकी आज्ञा का पालन
हमेशा वफादार की तरह किया,
मेरी टेबल पर जो भी तोहफा आया
बाद में डाला अपनी जेब में
आपका हिस्सा पहले आपके हवाले किया,
यह आप मेरे पेट पर क्यों मार रहे लात,
जो तबादले की कर दी घात।’’

बॉस ने रुंआसे होकर कहा
‘‘शायद तुम्हें पता नहीं
तुम्हारी वज़ह से मेरे ऊपर भी
संभावित जांच की तलवार लटकी है,
प्रचार वालों की नज़र अब तुम पर भी अटकी है,
जब आता है अपने पर संकट
तब शिकार के रूप में पेश
अपना वफ़ादार ही किया जाता है,
दाना दुश्मन से निपटते हैं बाद में
पहले नांदा दोस्त मिटाया जाता है,
तुम्हारे सभी जगह चर्चे हैं,
कि जितनी आमदनी है
उससे कई गुना घर के खर्चे हैं,
भला कौन बॉस सहन कर सकता है
अपने मातहत से अपनी तुलना,
बता रहे हैं लोग तुमको मेरे बराबर अमीर
तुम भी अब जाकर सुनना,
अधिकारी के अगाड़ी तुम चल रहे थे,
जैसे हम तुम्हारे हिस्से पर ही पल रहे थे,
एक तो छोटे के पिछाड़ी चलना मुझे मंजूर न था,
फिर तुम्हारी वज़ह से
हमारी मुसीबत का दिन भी दूर न था,
इसलिये तुम्हारा तबादला कर दिया,
अपने वफादार भी हम नहीं कृपालु
यह साबित कर
बदनामी से बचने के लिये रफादफा मामला कर दिया,
तुम्हारी वफदारी का यह है इनाम,
बर्खास्तगी का नहीं किया काम,
तबादले पर ही खत्म कर दी बात।
———

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
————————

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

अंग्रेजी की सनसनी हिन्दी में-व्यंग्य कवितायें


हिन्दी में सनसनी खेज खबर भी
अंग्रेजी अखबार से ही क्यों आती है,
जो हिन्दी में हो
वह सनसनी क्यों नहीं बन पाती है।
डरे हुए हैं बंधुआ कलम मजदूर
उनकी कमजोरी
शायद परायी भाषा में छिप जाती है।
———
मखमली विकास तक ही
उनकी नज़र जाती है,
जहां पैबंद लगे हैं अभावों के
वहां पर आंखें बंद हो जाती हैं।
देसी गुलामों का नजरिया
विदेशी शहंशाहों को यहां गिरवी हैं,
जहां दलाली मिलती है
वहां जुबान दहाड़ती है
नहीं तो तालू से चिपक जाती है।
———

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

————————-
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

इसका नाम ही क्रिकेट है-हिन्दी व्यंग्य लेख


उफ! यह क्रिकेट है! इस समय क्रिकेट खेल को देखकर जो विवाद चल रहा है उसे देखते हुए दिल में बस यही बात आती है कि ‘उफ! यह क्रिकेट है!
इस खेल को देखते हुए अपनी जिंदगी के 25 साल बर्बाद कर दिये-शायद कुछ कम होंगे क्योंकि इसमें फिक्सिंग के आरोप समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपने के बाद मन खट्टा हो गया था पर फिर भी कभी कभार देखते थे। इधर जब चार वर्ष पूर्व इंटरनेट का कनेक्शन लगाया तो फिर इससे छूटकारा पा लिया।
2006 के प्रारंभ में जब बीसीसीआई की टीम-तब तक हम इसे भारत की राष्ट्रीय टीम जैसा दर्जा देते हुए राष्ट्रप्रेम े जज्बे के साथ जुड़े रहते थे-विश्व कप खेलने जा रही थी तो सबसे पहला व्यंग्य इसी पर देव फोंट में लिखकर ब्लाग पर प्रकाशित किया था अलबता यूनिकोड में होने के कारण लोग उसे नहीं पढ़ नहीं पाये। शीर्षक उसका था ‘क्रिकेट में सब कुछ चलता है यार!’
टीम की हालत देखकर नहंी लग रहा था कि वह जीत पायेगी पर वह तो बंग्लादेश से भी हारकर लीग मैच से ही बाहर आ गयी। भारत के प्रचार माध्यम पूरी प्रतियोगिता में कमाने की तैयारी कर चुके थे पर उन पर पानी फिर गया। हालत यह हो गयी कि उसकी टीम के खिलाड़ियों द्वारा अभिनीत विज्ञापन दिखना ही बंद हो गये। जिन तीन खिलाड़ियों को महान माना जाता था वह खलनायक बन गये। उसी साल बीस ओवरीय विश्व कप में भारतीय टीम को नंबर एक बनवाया गया-अब जो हालत दिखते हैं उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है क्योंकि क्रिकेट के सबसे अधिक ग्राहक (प्रेमी कहना मजाक लगता है) भारत में ही हैं और यहां बाजार बचाने के लिये यही किया गया होगा। उस टीम में तीनों कथित महान खिलाड़ी नहीं थे पर वह बाजार के विज्ञापनों के नायक तो वही थे। एक बड़ी जीत मिल गयी आम लोग भूल गये। कहा जाता है कि आम लोगों की याद्दाश्त कम होती है और क्रिकेट कंपनी के प्रबंधकों ने इसका लाभ उठाया और अपने तीन कथित नायकों को वापसी दिलवाई। इनमें दो तो सन्यास ले गये पर वह अब उस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में खेलते हैं। अब पता चला है कि यह प्रतियोगिता तो ‘समाज सेवा’ के लिये आयोजित की जाती है। शुद्ध रूप से मनोरंजन कर पैसा बटोरने के धंधा और समाज सेवा वह भी क्रिकेट खेल में! हैरानी होती है यह सब देखकर!
आज इस बात का पछतावा होता है कि जितना समय क्रिकेट खेलने में बिताया उससे तो अच्छा था कि लिखने पढ़ने में लगाते। अब तो हालत यह है कि कोई भी क्रिकेट मैच नहीं देखते। इस विषय पर देशप्रेम जैसी हमारे मन में भी नहीं आती। हम मूर्खों की तरह क्रिकेट देखकर देशप्रेम जोड़े रहे और आज क्रिकेट की संस्थायें हमें समझा रही हैं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। यह अलग बात है कि टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाओं जब भारत का किसी दूसरे देश से मैच होता है तो इस बात का प्रयास करते हैं कि लोगों के अंदर देशप्रेम जागे पर सच यह है कि पुराने क्रिकेट प्रेमी अब इससे दूर हो चुके हैं। क्रिकेट कंपनियों की इसकी परवाह नहीं है वह अब क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की आड़ में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव के दर्शक ढूंढ रहे हैं। इसलिये अनेक जगह मुफ्त टिकटें तथा अन्य इनाम देने के नाम कुछ छिटपुट प्रतियोगितायें होने की बातें भी सामने आ रही है। बहुत कम लोग इस बात को समझ पायेंगे कि इसमें जितनी बड़ी राशि का खेल है वह कई अन्य खेलों का जन्म दाता है जिसमें राष्टप्रेम की जगह राष्ट्रनिरपेक्ष भाव उत्पन्न करना भी शामिल है।
कभी कभी हंसी आती है यह देखकर कि जिस क्रिकेट को खेल की तरह देखा वह खेलेत्तर गतिविधियों की वजह से सामने आ रहा है। यह क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में ऊपर क्या चल रहा है यह तो सभी देख रहे हैं पर जिस तरह आज के युवा राष्ट्रनिरपेक्ष भाव से इसे देख रहे हैं वह चिंता की बात है। दूसरी बात जो सबसे बड़ी परेशान करने वाली है वह यह कि इन मैचों पर सट्टे लगने के समाचार भी आते हैं और इस खेल में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव पैदा करने वाले प्रचार माध्यम यही बताने से भी नहीं चूकते कि इसमें फिक्सिंग की संभावना है। सब होता रहे पर दाव लगाने वाले युवकों को बर्बाद होने से बचना चाहिेए। इसे मनोंरजन की तरह देखें पर दाव कतई न लगायें। राष्ट्रप्र्रेम न दिखायें तो राष्ट्रनिरपेक्ष भी न रहे। हम तो अब भी यही दोहराते हैं कि ‘क्रिकेट में सब चलता है यार।’

————————-
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
—————————
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

अंग्रेज किताबें छोड़ गए-हिन्दी व्यंग्य


इस संसार का कोई भी व्यक्ति चाहे शिक्षित, अशिक्षित, ज्ञानी, अज्ञानी और पूंजीवादी या साम्यवादी हो, वह भले ही अंग्रेजों की प्रशंसा करे या निंदा पर एक बात तय है कि आधुनिक सभ्यता के तौर तरीके उनके ही अपनाता है। कुछ लोगों ने अरबी छोड़कर अंग्रेजी लिखना पढ़ना शुरु किया तो कुछ ने धोती छोड़कर पेंट शर्ट को अपनाया और इसका पूरा श्रेय अंग्रेजों को जाता है। मुश्किल यह है कि अंग्रेजों ने सारी दुनियां को सभ्य बनाने से पहले गुलाम बनाया। गुलामी एक मानसिक स्थिति है और अंग्रेजों से एक बार शासित होने वाला हर समाज आजाद भले ही हो गया हो पर उनसे आधुनिक सभ्यता सीखने के कारण आज भी उनका कृतज्ञ गुलाम है।
अंग्रेजों ने सभी जगह लिखित कानून बनाये पर मजे की बात यह है कि उनके यहां शासन अलिखित कानून चलता है। इसका आशय यह है कि उनको अपने न्यायाधीशों के विवेक पर भरोसा है इसलिये उनको आजादी देते हैं पर उनके द्वारा शासित देशों को यह भरोसा नहीं है कि उनके यहां न्यायाधीश आजादी से सोच सकते हैं या फिर वह नहीं चाहते कि उनके देश में कोई आजादी से सोचे इसलिये लिखित कानून बना कर रखें हैं। कानून भी इतने कि किसी भी देश का बड़ा से बड़ा कानून विद उनको याद नहीं रख सकता पर संविधान में यह प्रावधान किया गया है कि हर नागरिक हर कानून को याद रखे।
अधिकतर देशों के आधुनिक संविधान हैं पर कुछ देश ऐसे हैं जो कथित रूप से अपनी धाार्मिक किताबों का कानून चलाते हैं। कहते हैं कि यह कानून सर्वशक्तिमान ने बनाया है। कहने को यह देश दावा तो आधुनिक होने का करते हैं पर उनके शिखर पुरुष अंग्रेजों के अप्रत्यक्ष रूप से आज भी गुलाम है। कुछ ऐसे भी देश हैं जहां आधुनिक संविधान है पर वहां कुछ समाज अपने कानून चलाते हैं-अपने यहां अनेक पंचायतें इस मामले में बदनाम हो चुकी हैं। संस्कृति, संस्कार और धर्म के नाम पर कानून बनाये मनुष्य ने हैं पर यह दावा कर कि उसे सर्वशक्तिमान  ने बनाया है दुनियां के एक बड़े वर्ग को धर्मभीरु बनाकर बांधा जाता है।
पुरानी किताबों के कानून अब इस संसार में काम नहीं कर सकते। भारतीय धर्म ग्रंथों की बात करें तो उसमें सामाजिक नियम होने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान भी उनमें हैं, इसलिये उनका एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी प्रासंगिक है। वैसे भारतीय समाज अप्रासांगिक हो चुके कानूनों को छोड़ चुका है पर विरोधी लोग उनको आज भी याद करते हैं। खासतौर से गैर भारतीय धर्म को विद्वान उनके उदाहरण देते हैं। दरअसल गैर भारतीय धर्मो की पुस्तकों में अध्यात्मिक ज्ञान का अभाव है। वह केवल सांसरिक व्यवहार में सुधार की बात करती हैं। उनके नियम इसलिये भी अप्रासंगिक हैं क्योंकि यह संसार परिवर्तनशील है इसलिये नियम भी बदलेंगे पर अध्यात्म कभी नहीं बदलता क्योंकि जीवन के मूल नियम नहीं बदलते।
अंग्रेजों ने अपने गुलामों की ऐसी शिक्षा दी कि वह कभी उनसे मुक्त नहीं हो सकते। दूसरी बात यह भी है कि अंग्रेज आजकल खुद भी अपने आपको जड़ महसूस करने लगे हैं क्योंकि उन्होंने अपनी शिक्षा पद्धति भी नहीं बदली। उन्होंनें भारत के धन को लूटा पर यहां का अध्यात्मिक ज्ञान नहीं लूट पाये। हालत यह है कि उनके गुलाम रह चुके लोग भी अपने अध्यात्मिक ज्ञान को याद नहीं रख पाये। अलबत्ता अपने किताबों के नियमों को कानून मानते हैं। किसी भी प्रवृत्ति का दुष्कर्म रोकना हो उसके लिये कानून बनाते हैं। किसी भी व्यक्ति की हत्या फंासी देने योग्य अपराध है पर उसमें भी दहेज हत्या, सांप्रदायिक हिंसा में हत्या या आतंक में हत्या का कानून अलग अलग बना लिया गया है। अंग्रेज छोड़ गये पर अपनी वह किताबें छोड़ गये जिन पर खुद हीं नहीं चलते।
यह तो अपने देश की बात है। जिन लोगों ने अपने धर्म ग्रंथों के आधार पर कानून बना रखे हैं उनका तो कहना ही क्या? सवाल यह है कि किताबों में कानून है पर वह स्वयं सजा नहीं दे सकती। अब सवाल यह है कि सर्वशक्तिमान की इन किताबों के कानून का लागू करने का हक राज्य को है पर वह भी कोई साकार सत्ता नहीं है बल्कि इंसानी मुखौटे ही उसे चलाते हैं और तब यह भी गुंजायश बनती है कि उसका दुरुपयोग हो। किसी भी अपराध में परिस्थितियां भी देखी जाती हैं। आत्म रक्षा के लिये की गयी हत्या अपराध नहीं होती पर सर्वशक्तिमान के निकट होने का दावा करने वाला इसे अनदेखा कर सकता है। फिर सर्वशक्तिमान के मुख जब अपने मुख से किताब प्रकट कर सकता है तो वह कानून स्वयं भी लागू कर सकता है तब किसी मनुष्य को उस पर चलने का हक देना गलत ही माना जाना चाहिये। इसलिये आधुनिक संविधान बनाकर ही सभी को काम करना चाहिए।
किताबी कीड़ों का कहना ही क्या? हमारी किताब में यह लिखा है, हमारी में वह लिखा है। ऐसे लोगों से यह कौन कहे कि ‘महाराज आप अपनी व्याख्या भी बताईये।’
कहते हैं कि दुनियां के सारे पंथ या धर्म प्रेम और शांति से रहना सिखाते हैं। हम इसे ही आपत्तिजनक मानते हैं। जनाब, आप शांति से रहना चाहते हैं तो दूसरे को भी रहने दें। प्रेम आप स्वयं करें दूसरे से बदले में कोई अपेक्षा न करें तो ही सुखी रह सकते हैं। फिर दूसरी बात यह कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। मतलब यह कि आप में अगर प्रेम का गुण नहीं है तो वह मिल नहंी सकता। बबूल का पेड़ बोकर आम नहीं मिल सकता। पुरानी किताबें अनपढ़ों और अनगढ़ों के लिये लिखी गयी थी जबकि आज विश्व समाज में सभ्य लोगों का बाहुल्य है। इसलिये किताबी कीड़े मत बनो। किताबों में क्या लिखा है, यह मत बताओ बल्कि तुम्हारी सोच क्या है यह बताओ। जहां तक दुनियां के धर्मो और पंथों का सवाल है तो वह बनाये ही बहस और विवाद करने के लिये हैं इसलिये उनके विद्वान अपने आपको श्रेष्ठ बताने के लिये मंच सजाते हैं। जहां तक मनुष्य की प्रसन्नता का सवाल है तो उसके लिये भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के अलावा कोई रास्ता नहीं है। दूसरी बात यह कि उनकी किताबें इसलिये पढ़ना जरूरी है कि सांसरिक ज्ञान तो आदमी को स्वाभाविक रूप से मिल जाता है और फिर दुनियां भर के धर्मग्रंथ इससे भरे पड़े हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान बिना गुरु या अध्यात्मिक किताबों के नहीं मिल सकता। जय श्रीराम!

————————
कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
————————

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

धर्म का बाज़ार सजाने की कोशिश-हिन्दी आलेख (dharma ka bazar-hindi lekh)


धार्मिक सत्संगों का आयोजन कोई सरल और सस्ता काम नहीं है। प्रबंधन एक कला है और जिस आदमी को कोई आर्थिक व्यवसाय करना हो तो केवल उसे संबंधित क्षेत्र की जानकारी के साथ प्रबंध का ज्ञान होना चाहिए तो वह अच्छा काम कर लेता है पर अगर प्रबंध क्षमता का सत्संग में प्रयोग करना हो तो उसके लिये कुछ अध्यात्मिक ज्ञान के साथ धार्मिक दिखना भी जरूरी है। अपने यहां सत्संग भी एक व्यवसाय है और धर्म प्रेमी धनिकों में मौजूद देवत्व की आराधना कर उसने धन प्राप्त करना कोई इतना सरल काम नहीं होता जितना अन्य व्यवसायों में लगता है। अन्य व्यवसायों में प्रबंधक स्वयं भी पूंजी लगा सकता है पर सत्संग के आयोजन में कोई ऐसा जोखिम नहीं उठाता क्योंकि उसमें केवल किताबें या मूर्तियां ही नहीं बेचना होता बल्कि एक अदद संत भी रखना पड़ता है।
विदेश में कहीं किसी धार्मिक कार्यक्रम का टीवी पर सीधा प्रसारण हो रहा था। आमतौर से धार्मिक विषयों पर व्यंग्य नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसा कर आप अपनी कुंठाओं का परिचय देते भी लग सकते हैं, पर ऐसे कार्यक्रमों में कुछ ऐसी गतिविधियां भी होती हैं जो वहां मौजूद लोगों को भी हंसाती हैं भले ही वह उस समय कहते न हों। उस धार्मिक कार्यक्रम में कुछ बुद्धिजीवियों के भाषण हुए तो संतों ने भी प्रवचन दिये। उच्च वर्ग के धार्मिक लोगों के माध्यम से सी.डी. आदि का विमोचन करवाकर उनकी भी धार्मिक भावनाओं को तृप्त किया गया-अपने देश में खास भक्त कहलाने पर बड़े लोगों को शायद एक अजीब अनुभूति होती है।
भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के प्रयास के रूप में हो रहे उसे कार्यक्रम को टीवी पर देखकर अनेक ऐसी बातें मन में आयीं जो सब की सब यहां लिखना कठिन है। कार्यक्रम का अधिकतर भाग किसी माननीय संत की प्रशंसा में गुजरा। वहां दो संतों की मूर्तियां भी रखी गयी थीं जिन पर बड़े लोग मंच पर आकर प्रणाम करते और फिर अपना व्याख्यान देते।
इन मूर्तियों को देखकर लगता था कि वह संत ही केवल भारतीय अध्यात्म के आधार हैं। हां, वह पर सर्वशक्तिमान के भारतीय स्वरूपों में प्रचलित नामों का उल्लेख हुआ पर उनकी मूर्तियां वहां न देखकर एक खालीपन लगा। एक बात यहां बता दें कि भगवान श्रीराम, कृष्ण या शिव जी की मूर्तियां जरूर हम लोग देखते हैं पर वह हमारे अंदर निरंकार के रूप में स्वाभाविक रूप से विराजमान रहते हैं। दूसरी बात यह है कि यह मूर्तियां पत्थर, धातु या लकड़ी की बनती हैं पर उनके अस्तित्व का आभास ही हमें शक्ति देता है। संतों की मूर्तियां रखना गलत नहीं है पर ऐसी जगह पर सर्वशक्तिमान की मूर्ति न होना इस बात का प्रमाण है कि वह सत्संग अधूरा है। दूसरी बात यह है कि देहधारी संत चाहे कितने भी माननीय हों पर उनकी मूर्तियों में कहीं न कहीं उनकी मृत्यु की अनुभूति है इसलिये उनसे आम भारतीय अधिक लगाव हृदय में धारण नहीं कर पाता। भारतीय अध्यात्म का आधार यही है कि आत्मा कभी नहीं मरता और देह नश्वर है। इसलिये जिसमें देह का आभास है वह मूर्तियां भारतीय भक्त को नागवार लगती हैं। भगवान श्री राम, श्रीकृष्ण और श्री शिवजी के साथ अन्य देवताओं की मूर्तियों में ऐसा आभास नहीं होता। दरअसल यह प्रतिमायें पूजना इसलिये भी गलत है कि हम दूसरी विचारधाराओं के ऐसे ही कदम की आलोचना करते हैं। इधर यह भी देखने में आ रहा है कि हमारे पूज्यनीय संतों की समाधियां पूजी जा रही हैं। यह परब्रह्म से परे रखने का प्रयास भर है ताकि लोग मायावी दुनियां में ही घूमते रहें। ऐसे कथित ज्ञान लोग नाम तो सर्वशक्तिमान के रूपों का लेते हैं पर सामने अपना चेहरा लगा लेते हैं-यह धार्मिक भावनाओं का एक तरह से दोहन है।
संत कबीर एक महान संत कवि हुए हैं मगर उनकी मूर्ति रखकर पूजा करने का आशय यही है कि आप उनको समझे ही नहीं। जो गुरु तत्व ज्ञान देगा और उसका शिष्य ब्रह्म तत्व को समझ जायेगा तो स्वयं ही गुरु का मानेगा। यह बात श्रीमद्भागवत गीता भी कहती है और संत कबीर उसकी पुष्टि भी करते हैं। गुरु का दायित्व है कि वह शिष्य को गोविंद दिखाये-इससे यूं भी कह सकते हैं कि सत्गुरु से मिलाये। मगर आजकल के नये गुरु गोविंद के नाम पर अपना चेहरा लगा लेते हैं और स्वयं को ही सत्गुरु की तरह स्थापित करने का उनका प्रयास रहता है।
हम यहां उन माननीय गुरुओं की आलोचना नहीं कर रहे जिनकी तस्वीरें वहां रखी थीं। यकीनन उन लोगों ने श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान ग्रहण कर इतने सारे लोगों का सुनाया होगा। अब उनके बाद के शिष्यगण उनकी मूर्तियां लगाकर अपना सत्संग व्यवसाय चला रहे होंगे। केवल यही प्रसंग नहीं है बल्कि कई ऐसे अन्य उदाहरण भी है जिसमें तत्व ज्ञान का उपदेश करने वाले संत इस संसार से दैहिक रूप से क्या विदा होते हैं उनके चेहरे पत्थरों में सजाकर उनकी पूजा की जाती है। उनकी कर्मस्थली में जहां कभी सर्वशक्तिमान की मूर्तियां की आराधना करते हैं उनके जाते ही उनका महत्व कम प्रचारित होता है और संतों को सत्गुरु की जगह दी जाती है। कुछ लोगों ने संत शिरोमणि कबीरदास जी की मूर्तियां भी बनवाई हैं जबकि भारतीय अध्यात्मिक का वह एक ऐसा प्रकाशमान पुंज थे जो अपन रचनाओें से हमेशा ही भारतीय जनमानस में रहेंगे। उनकी मूर्तियां बनवाना ही उनके पथ से अलग हटना है। ऐसा अनेक संतों के शिष्य कर रहे हैं।
आखिरी मजेदार बात यह रही कि उसी कार्यक्रम में घोषणा की जा रही थी कि कार्यक्रम की कैसिटें और सर्वशक्तिमान की मूर्तियां आज ही यहां दरों में बीस प्रतिशत कटौती पर मिलेंगी। कैसिटें आज कम हैं इसलिये आज आर्डर दें तो कम दर पर भेजी जायेंगी।
यह बात हंसी पैदा करने वाली थी साथ ही यह संदेश भेजने वाली थी कि इसमें कोई व्यवसाय है। यह धर्म के नाम पर लगी सेल अचंभित करने वाली थी। अब इससे एक ही बात लगती है कि संतों के वर्तमान उतराधिकारी और प्रबंधक शिष्य आम आदमी के बारे में यह धारणा रखते हैं कि वह भक्त होने के कारण वह इसे बुरा नहीं समझते या फिर ऐसी अपेक्षा करते हैं कि पुराने मनीषियों की बात मानते हुए भक्तों को अपने गुरुओं को में दोष नहीं देखना चाहिये और हम तो गुरु हैं चाहे जो करें।’
हम भी गुरुओं की आलोचना के खिलाफ हैं पर भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में यह वर्णित है कि पहले सत्य को समझो और देखभाल के गुरु बनाओ। दूसरों में दोष मत देखो पर दुर्जन का साथ भी न करो। सीधा आशय यही है कि कहीं न कहीं अपनी अक्ल का इस्तेमाल करो-यही भारतीय अध्यात्मिक संदेशों का आधार है। बहरहाल धर्म के नाम यह यह सेल लगाना ठीक नहीं है पर लगती भी है तो चिंतित होने वाली बात नहीं है। अपना तो एक ही काम है कि जहां भी समय मिले अच्छी बात सुनो उसक मंथन करो। जो अच्छा लगे उसे ग्रहण करो और जो बुरा, उसे भुला दो।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्दयोग

नाम के मालिक-व्यंग्य हिंदी शायरी


सुंदरता अब सड़क पर नहीं

बस पर्दे पर दिखती है

जुबां की ताकत अब खून में नहीं

केवल जर्दे में दिखती है।

सौंदर्य प्रसाधन पर पड़ती

जैसे ही पसीने की बूंद

सुंदरता बह जाती,

तंबाकू का तेज घटते ही

जुबां खामोश रह जाती,

झूम रहा है वहम के नशे में सारा जहां

औरत की आंखें देखती

दौलत का तमाशा

तो आदमी की नजर बस

कृत्रिम खूबसूरती पर टिकती है।

 

—————-
हांड़मांस के बुत हैं

इंसान भी कहलाते हैं,

चेहरे तो उनके अपने ही है

पर दूसरे का मुखौटा बनकर

सामने आते हैं।

आजादी के नाम पर

उनके हाथ पांव में जंजीर नहीं है

पर अक्ल पर

दूसरे के इशारों के बंधन

दिखाई दे जाते हैं।

नाम के मालिक हैं वह गुलाम

गुलामों पर ही राज चलाये जाते हैं।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
—————————
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

सभी के चरित्र को कमजोर न समझें-हिन्दी लेख (charitya aur samaj-hindi lekh


वैश्यावृत्ति और जुआ खेलना ऐसी सामाजिक समस्यायें हैं और इनसे कभी भी मुक्ति नहीं पायी जा सकती। वैश्यावृत्ति पर कानून से नियंत्रण पाना चाहिए या नहीं इस पर अक्सर बहस चलती है। कुछ लोगों को मानना है कि वैश्यावृत्ति को कानून से छूट मिलना चाहिए तो कुछ लोगों को लगता है कि इस पर रोक बनी रहे। वैश्यावृत्ति पर कानूनी रोक का समर्थन करने वालों ने जो तर्क दिये जाते हैं वह हास्याप्रद हैं। कुछ लोग तो यहां तक कह जाते हैं कि तब तो भ्रष्टाचार, शराब तथा अन्य अपराधों को भी कानून से छूट मिलना चाहिए। अभी हाल ही में सुनने में आया कि किन्ही न्यायालय द्वारा भी इसकी वकालत की गयी है कि वैश्यावृत्ति को कानूनी शिकंजे से मुक्त किया जाना चाहिए। इसके पहले भी अनेक सामाजिक विशेषज्ञ इस बात की वकालत करते रहे हैं कि देश की सामाजिक परिस्थतियों में ऐसी रोक ठीक नहीं है।
दरअसल अंग्रेजों के समय ही वैचारिक और सामाजिक कायरता के बीज जो भारत में बो दिये गये वह अब फल और फूल की जगह सभी जगह प्रकट हो रहे हैं। याद रखने की बात यह है कि वैश्यावृत्ति कानून अंग्रजों के समय में ही बनाया गया है। इसका मतलब यह है कि इससे पहले ऐसा कानून यहां प्रचलित नहीं था।
इतना ही नहीं शराब, वैश्यावृत्ति तथा जुआ पर रोक लगाने के किसी भी पुराने कानून की चर्चा हमारे इतिहास में नहीं मिलती। इसका आशय यह है कि समाज को नियंत्रित करने की यह राजकीय प्रवृत्ति अंग्रेजों की देन है जो स्वयं ही इस तरह का कोई कानून नहीं बनाते बल्कि आजादी के नाम पर यहां अनेक अपराध भी मुक्त हैं जिनमें सट्टा भी शामिल हैं। कुछ कानूनी विशेषज्ञ तो यह बताते हैं कि अभी भी इस देश में 95 प्रतिशत कानून उन अंग्रेजों के बनाये हैं जिनके यहां कोई लिखित कानून हैं। मतलब यह है कि वह एक शब्द समूह यहां अपने गुलामों को थमा गये जिससे पढ़कर हम अभी भी चल रहे हैं।
इस मामले में हम एक सती प्रथा पर रोक के कानून का उल्लेख करना चाहेंगे जिसकी वजह से राजा राममोहन राय को भारत का एक बहुत बड़ा समाज सुधारक माना जाता है। उन्होंने ऐसा कानून बनाने के लिये आंदोलन चलाया था पर इतिहास में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता कि उस समय देश में सत्ती प्रथा किस हद तक मौजूद थी। अगर उनके आंदोलन की गति को देखें तो लगता है कि उस समय देश में ऐसी बहुत सी घटनायें रोज घटती होंगी पर इसको कोई प्रमाणित नहीं करता। उस समय देश में आजादी के लिये भी आंदोलन चल रहा था। ऐसे में लगता है कि भारत की सती प्रथा के लेकर अंग्रेज कहीं दुष्प्रचार करते होंगे या फिर ऐसी कृत्रिम घटनाओं का समाचार बनता होगा जिससे लगता हो कि यह देश तो भोंदू समाज है। यह कानून बनने से कोई सत्ती प्रथा कम हुई इसका भी प्रमाण नहीं मिलता। संभव है कुछ संपत्ति की लालच में औरतों को जलाकर उसके सत्ती होने का प्रचार करते हों पर ऐसी घटनायें तो देश में इस कानून के बाद भी हुईं। फिर मान लीजिये यह कानून नहीं बनता तो भी इस देश में आत्म हत्या और हत्या दोनों के लिये कानून है तब उसे सत्ती होने वाले मामलों पर लागू किया जा सकता था।
एक बार एक लेखक ने अपने लेख में लिखा था कि वैश्यावृत्ति, जुआ और शराब के कानून तो अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को ऐसे मामलों में फंसाकर उन्हें बदनाम करने के उद्देश्य से बनाये थे। सच हम नहीं जानते पर इतना जरूर है कि सामाजिक संकटों को राज्य से नियंत्रित करने का प्रयास ठीक नहीं है। समाज को स्वयं ही नियंत्रित होने दीजिये। आखिर इस देश के समाजों के ठेकेदार क्या केवल उनकी भावनाओं का दोहन करने लिये ही बैठे हैं क्या?
वैश्यावृत्ति, जुआ और शराब सामाजिक समस्यायें हैं और इन पर नियंत्रण करने के दुष्परिणाम यह हुए हैं कि जिसके पास धन, बल, और बड़ा पद है पर अपनी शक्ति कानून को तोड़कर दिखाता है। आप भ्रष्टाचार या सार्वजनिक रूप से धुम्रपान करने जैसे अपराधों से इसकी तुलना नहीं कर सकते।
वैश्यावृत्ति कोई अच्छी बात नहीं है। एक समय था जो महिला या पुरुष इसमें संलिप्त होते उनको समाज हेय दृष्टि से देखता था। अनेक बड़े शहरों में वैश्याओं के बाजार हुआ थे जहां से भला आदमी निकलते हुए अपनी आंख बंद कर लेता था। धीरे धीरे वैश्यायें लुप्त हो गयीं पर आजकल कालगर्ल उनकी जगह ले जगह चुकी हैं। पहले जहां अनपढ़ और निम्न परिवारों की लड़कियां जबरन या अपनी इच्छा से इस व्यवसाय में आती थीं पर आजकल पढ़लिखी लड़कियां स्वेच्छा से इस काम में लिप्त होने की बातें समाचारों में में आती है। उसकी वजह कुछ भी हो सकती हैं-घर का खर्चा चलना या अय्याशी करना।
सवाल यह है कि इसका हल समाज को ढूंढना चाहिये या नहीं। इस देश के उच्च वर्ग ने तो अपने बच्चों की शादी को प्रदर्शन करने का एक बहाना बना लिया है। मध्यम वर्ग के परिवार उन जैसे दिखने के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार है। नतीजा यह है कि बड़ी उम्र तक बच्चों के विवाह नहीं हो रहे। इसके अलावा बच्चों के साथ ही उनके अभिभावकों द्वारा उनके जीवन साथी के लिये अत्यंत खूबसूरत काल्पनिक पात्र सृजित कर रिश्ता तलाशा जाता है। लड़की सुंदर हो, काम काज में दक्ष हो, कंप्यूटर जानती हो और कमाना जानती हो-जैसे जुमले तो सुनने में मिलते ही हैं। उस पर दहेज की रकम की समस्या। समाज का यह अंतद्वंद्व सभी जानते हैं पर जिसका समय निकला जाता है वह उसे भुला देता है। जिन्होंने बीस वर्ष की उम्र में शादी कर ली वह अपने पुत्र या पुत्री को तीस वर्ष तक विवाह योग्य नहीं पाते-उनके बारे में क्या कहा जाये? क्या मनुष्य की दैहिक आवश्यकताओं को खुलकर कहने की आवश्यकता है? इंद्रियों को निंयत्रित करना चाहिये पर उनका दमन करना भी संभव नहीं है-क्या यह सच नहीं है।
ऐसा नहीं है कि इस सभी के बावजूद पूरा समाज इसी राह पर चल रहा है। अगर कोई वैश्यावृत्ति में संलिप्त नहीं है तो वह कानून के डर की वजह से नहीं बल्कि पुराने चले आ रहे संस्कारों ने सभी को इसकी प्रेरणा दे रखी है। हमारे संत महापुरुषों ने हमेशा ही व्यसनों से बचने का संदेश दिया है। उसके दुष्परिणाम बताये गए हैं। देश में आज भी नैतिकता को संबल मिला हुआ है क्योंकि वह संस्कारों के सहारे टिकी है। यह भरोसा वह हर विद्वान करता है जो इसे जानता है।
ऐसे में वैचारिक कायरों का वह समूह- जो चाहता है कि रात को टीवी पर खबरें देखते हुए ‘अपने देश की चारित्रिक रक्षा के दृश्य देखकर खुश हों‘-ऐसी बातें कह रहा है जिसको न तो समाज पर विश्वास है न ही अपने पर। पढ़ी लिखी लड़कियां ऐसे मामलों में पकड़े जाने मुंह ढंके दिखती हैं, तब सवाल यह उठता है कि आखिर उनका अपराध क्या है? वह किसको हानि पहुंचा रही थीं? याद रहे अपराध का मुख्य आधार यही है कि कोई व्यक्ति दूसरे को हानि पहुंचाये। अनेक बार अखबार में जुआ खेलते हुए पकड़े जाने वाले समाचार आते हैं। सवाल यह है यह भी शराब जैसे व्यसन है और जिस पर कोई रोक नहीं है।
दरअसल ऐसे कानूनों ने पुरुष समाज को गैर जिम्मेदार बना दिया है। अपने घर की औरतों की देखभाल करने के साथ ही उनपर नज़र रखना अभी तक पुरुषों का ही जिम्मा है। इस कानून ने उनको आश्वस्त कर दिया है कि औरतें डर के बारे में इस राह पर नहीं जायेंगी। समाज के ठेकेदार भी नैतिकता को निजी विषय मानने लगे हैं। इसके अलावा विवाह योग्य पुत्र के माता पिता-पुत्री के भी वही होते हैं उसका रिश्ता तय करते समय भूल जाते हैं-इस विश्वास में अधिक दहेज की मांग करते हैं कि कि कोई न कोई लड़की का बाप मजबूर होकर उनकी शर्ते मानेगा।
इसके अलावा समाज के ठेकेदार उसके नाम पर कार्यक्रम करने के लिये चंदा मांगने और चुनाव के समय उनको अपने हिसाब से मतदान का आव्हान करने के अलावा अन्य कुछ नहीं करते क्योंकि उनको लगता है कि बाकी सुधार के लिये तो राज्य ही जिम्मेदार है। समाज को अंधविश्वासों, रूढ़ियों तथा अनुचित कर्मकांडों से बचने का संदेश इनमें कोई नहीं देता। यही हालत आजकल के व्यवसायिक संतों की है।
एक बात यह भी लगती है कि अंग्रेजों ने इतने सारे कानून शायद इसलिये बनाये ताकि विश्व का बता सकें कि देखिये हम एक पशु सभ्यता को मानवीय बना रहे हैं और आज भी वह इसका दावा करते हैं। इधर अपने देश के वैचारिक कायर चिंतक उन्हीं कानूनों को ढोने की वकालत करते हैं क्योंकि अपने समाज पर विश्वास न रखने की नीति उन्हें अंगे्रजी शिक्षा पद्धति से ही मिलती है। अपने पूरा समाज को कच्ची बुद्धि का समझने की उनकी आदतें बदलने वाली नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि अपराध वह है जिससे दूसरे को हानि पहुंचे। वैश्यावृत्ति, जुआ या सट्टा ऐसे अपराध हैं जिसमें आदमी अपने धन और इज्जत तो गंवाता ही है अपना स्वास्थ्य भी खोता है। किसी स्त्री से जबरन वैश्यावृत्ति कराना अपराध है और इस पर सख्त कार्यवाही होना चाहिये। यही कारण है कि एक विद्वान से यह भी सलाह दी है कि वैश्यावृत्ति में पकड़े गये अपराधियों में इस बात की पहचान करने का प्रावधान हो कि कोई जबरन तो इस कार्य में नहीं लगा हो।
हमारे देश का सामाजिक ढांचा मजबूत है और पूरा विश्व इसे मानता है। हर आदमी घर परिवार से जुड़ा है। अधिकतर पुरुष अपने घरेलू समस्याओं को हल करने के लिये संघर्ष करते हैं। संभव है कुछ घरों में पुरुष सदस्य की बीमारी या आर्थिक परेशानी होने पर कुछ लड़कियां और महिलाऐं इस काम में लगती हों पर सभी एसा नहीं करती बल्कि अधिकतर नौकरी आदि कर अपना काम चलाती है। ऐसे में पूरे समाज को भ्रष्ट होने की आशंका करना बेमानी है। खासतौर से इस देश में जहां रोजगार और संपत्ति मौलिक अधिकार न बना हो। फिर जब समलैंगिकता जैसे मूर्खतापूर्ण कृत्य को छूट मिल रही है तब वैश्यावृत्ति जैसे कानून को बनाये रखने का औचित्य तो बताना ही पड़ेगा न! बुरे काम का बुरा नतीजा सभी जानते हैं और यही कारण है कि मनुष्य की आदतों को नियंत्रित करने का काम उसे ही करने देना चाहिये। आखिर मनुष्य एक समझदार प्राणी है।
कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
————————

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

शब्दों की जादूगरी-हिन्दी साहित्य कविता


मु्फ्त की हवाओं से
जिंदगी की सांस चलती,
पानी से बुझती प्यास की आग
जब गले में जलती।
सूरज की धूप अपने स्पर्श से
देह को मलती।
कुदरत से जिंदगी के साथ मिले मुफ्त
तोहफों की इंसान कहां करता कदर,
ख्वाब करते हैं उसे दर-ब-दर,
रेत में ढूंढता है पत्थर की कोड़ियां,
भरता है उससे अपनी बोरियां,
आंखों से देखने को आतुर है सोना
नींद बेचकर खरीदता है बिछौना,
कागज के नोटों का बना लिया ढेर,
मन को समझाता है
पूजकर पत्थर के शेर,
लाचार क्या कर सकता है
इसके अलावा,
आजाद अक्ल मिली है
पर साथ मिला जरूरतों की
गुलामी का छलावा,
अपना सोचने में लगती है देर,
अक्लमंद भी सजाते हैं सामने
सपनों का अंधेर
भला कहां है आम इंसान की गलती।।

 वह हर रोज तारीखों पर लिखते हैं।

इसलिए कलेंडर में हमेशा झांकते दिखते  हैं।

बाजार के सौदागरों के लिए दलालों ने

अपने कारिंदों के सहारे

जमाने में किये हैं इतने हादसे कि

पेशेवर कलमकारों के शब्द

उन्हीं पर कहीं रोते तो कहीं हंसते मिलते हैं।

———-

हम हादसों की तारीखें भूल जाते हैं

पर शब्दों के सौदागर

हर तारीख को कब्र से ढूंढ कर लाते हैं।

भूल न जाये जमाना उनके साथ जमाना

शब्दों की जादूगरी और उनका नाम

इसलिये हर रोज की तारीख का

हादसा याद दिलाते हैं।

 


लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
————————————-

यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

लोग अपने से बात करते हुए पाठ अंतर्जाल पर पढ़ना चाहते हैं-संपादकीय


आज यह ब्लाग/पत्रिका की पाठ पठन/पाठक संख्या एक लाख को पार कर गयी। इस ब्लाग/पत्रिका के साथ इसके लेखक संपादक के दिलचस्प संस्मरण जुड़े हुए हैं। यह ब्लाग जब बनाया तब लेखक का छठा ब्लाग था। उस समय दूसरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर यूनिकोड में न रखकर सामान्य देव फोंट में रचनाएं लिख रहा था। वह किसी के समझ में नहीं आते थे। ब्लाग स्पाट के हिंदी ब्लाग से केवल शीर्षक ले रहा था। इससे हिन्दी ब्लाग लेखक उसे सर्च इंजिन में पकड़ रहे थे पर बाकी पाठ उनकी समझ में नहीं आ रहा था। यूनिकोड में रोमन लिपि में लिखना इस लेखक के लिये कठिन था। एक ब्लाग लेखिका ने पूछा कि ‘आप कौनसी भाषा में लिख रहे हैं, पढ़ने में नहीं आ रहा।’ उस समय इस ब्लाग पर छोटी क्षणिकायें रोमन लिपि से यूनिकोड में हिन्दी में लिखा इस पर प्रकाशित की गयीं। कुछ ही मिनटों में किसी अन्य ब्लाग लेखिका ने इस पर अपनी टिप्पणी भी रखी। इसके बावजूद यह लेखक रोमन लिपि में यूनिकोड हिंदी लिखने को तैयार नहीं था। बहरहाल लेखिका को इस ब्लाग का पता दिया गया और उसने बताया कि इसमें लिखा समझ में आ रहा है। उसके बाद वह लेखिका फिर नहीं दिखी पर लेखक ने तब यूनिकोड हिन्दी में लिखना प्रारंभ किया तब धीरे धीरे बड़े पाठ भी लिखे।

उसके बाद तो बहुत अनुभव हुए। यह ब्लाग प्रारंभ से ही पाठकों को प्रिय रहा है। यह ब्लाग तब भी अधिक पाठक जुटा रहा था जब इसे एक जगह हिन्दी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों का समर्थन नहीं मिलता था। आज भी यहां पाठक सर्वाधिक हैं और एक लाख की संख्या इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी अपनी गति से अंतर्जाल पर बढ़ रही है। मुख्य बात है विषय सामग्री की। इस ब्लाग पर अध्यात्मिक रचनाओं के साथ व्यंग, कहानी, कवितायें भी हैं। हास्य कवितायें अधिक लोकप्रिय हैं पर अध्यात्मिक रचनाओं की तुलना किसी भी अन्य विधा से नहीं की जा सकती। लोगों की अध्यात्मिक चिंतन की प्यास इतनी है कि उसकी भरपाई कोई एक लेखक नहीं कर सकता। इसके बाद आता है हास्य कविताओं का। यकीनन उनका भाव आदमी को हंसने को मजबूर करता है। हंसी से आदमी का खून बढ़ता है। दरअसल एक खास बात नज़र आती है वह यह कि यहां लोग समाचार पत्र, पत्रिकाओं तथा किताबों जैसी रचनाओं को अधिक पसंद नहीं करते। इसके अलावा क्रिकेट, फिल्म, राजनीति तथा साहित्य के विषय में परंपरागत विषय सामग्री, शैली तथा विधाओं से उन पर प्रभाव नहीं पड़ता। वह अपने से बात करती हुऐ पाठ पढ़ना चाहते हैं। अंतर्जाल पर लिखने वालों को यह बात ध्यान रखना चाहिये कि उनको अपनी रचना प्रक्रिया की नयी शैली और विधायें ढूंढनी होंगी। अगर लोगों को राजनीति, क्रिकेट, फिल्म, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विषयों पर परंपरागत ढंग से पढ़ना हो तो उनके लिये अखबार क्या कम है? अखबारों जैसा ही यहां लिखने पर उनकी रुचि कम हो जाती है। हां, यह जरूर है कि अखबार फिर यहां से सामग्री उठाकर छाप देते हैं। कहीं नाम आता है कहीं नहीं। इस लेखक के गांधीजी तथा ओबामा पर लिखे गये दो पाठों का जिस तरह उपयेाग एक समाचार पत्र के स्तंभकार ने किया वह अप्रसन्न करने वाला था। एक बात तय रही कि उस स्तंभकार के पास अपना चिंतन कतई नहीं था। उसने इस लेखक के तीन पाठों से अनेक पैरा लेकर छाप दिये। नाम से परहेज! उससे यह लिखते हुए शर्म आ रही थी कि ‘अमुक ब्लाग लेखक ने यह लिखा है’। सच तो यह है कि इस लेखक ने अनेक समसामयिक घटनाओं पर चिंतन और आलेख लिखे पर उनमें किसी का नाम नहीं दिया। उनको संदर्भ रहित लिखा गया इसलिये कोई समाचार पत्र उनका उपयोग नहीं कर सकता क्योंकि समसामयिक विषयों पर हमारे प्रचार माध्यमों को अपने तयशुदा नायक और खलनायकों पर लिखी सामग्री चाहिये। इसके विपरीत यह लेखक मानता है कि प्रकृत्तियां वही रहती हैं जबकि घटना के नायक और खलनायक बदल जाते हैं। फिर समसामयिक मुद्दों पर क्या लिखना? बीस साल तक उनको बने रहना है इसलिये ऐसे लिखो कि बीस साल बाद भी ताजा लगें-ऐसे में किसी का नाम देकर उसे बदनाम या प्रसिद्ध करने
से अच्छा है कि अपना नाम ही करते रहो।
मुख्य बात यह है कि लोग अपने से बात करते हुऐ पाठ चाहते हैं। उनको फिल्म, राजनीति, क्रिकेट तथा अन्य चमकदार क्षेत्रों के प्रचार माध्यमों द्वारा निर्धारित पात्रों पर लिख कर अंतर्जाल पर प्रभावित नहीं किया जा सकता। अपनी रचनाओं की भाव भंगिमा ऐसी रखना चाहिये जैसी कि वह पाठक से बात कर रही हों। यह जरूरी नहीं है कि पाठक टिप्पणी रखे और रखे तो लेखक उसका उत्तर दे। पाठक को लगना चाहिये कि जैसे कि वह अपने मन बात उस पाठ में पढ़ रहा है या वह पाठ पढ़े तो वह उसके मन में चला जाये। अगर वह परंपरागत लेखन का पाठक होता तो फिर इस अंतर्जाल पर आता ही क्यों? अपने मन की बात ऐसे रखना अच्छा है जैसे कि सभी को वह अपनी लगे।
इस अवसर पर बस इतना ही। हां, जिन पाठकों को इस लेखक के समस्त ब्लाग/पत्रिकाओं का संकलन देखना हो वह हिन्द केसरी पत्रिका को अपने यहां सुरक्षित कर लें। इस पत्रिका के पाठकों के लिये अब इस पर यह प्रयास भी किया जायेगा कि ऐसे पाठ लिखे जायें जो उनसे बात करते हुए लगें।

लेखक संपादक दीपक भारतदीप,ग्वालियर 

शब्द महर्षि और क्रिकेट मैच-हिन्दी आलेख (shabda maharshi aur cricket match-hindi lekh)


उन महान शब्द ऋषि की मृत्यु की खबर ने स्तब्ध कर दिया। यह लेखक घर से बाहर अपने काम पर जाने की तैयारी कर रहा था। उसी समय टीवी पर यह खबर दिखाई दी। खबर यह थी कि‘अपने प्रिय खिलाड़ी के आउट होने के बाद भारतीय टीम की हार का सदमा उनसे सहन नहीं हुआ।’
मन ही मन यह शब्द फूट पड़े‘हे शब्द ऋषि! आप तो सत्य के अन्वेषण करने वाले तपस्वी थे फिर कहां इस मिथ्या खेल में मन फंसाये बैठे थे।’
एक तरफ उनके निधन का दुःख और दूसरा क्रिकेट के प्रति उनके लगाव पर आश्चर्य एक साथ हो रहा था। ऐसे में अधिक शब्द नहीं सूझ पाये।
इस हिंदी भाषा में अनेक पत्रकार आये और गये पर जिसने आजादी के बाद एक हिंदी पत्रकार के रूप में अकेले ख्याति अर्जित की तो उसमें वही एक व्यक्ति थे। कहने को तो अनेक प्रकाशक ही अपना नाम संपादक के रूप में लिखते हैं। इसके अलावा अधिकतर समाचार पत्र अंग्रेजी के लेखकों के अनुवाद कर उनको हिंदी में प्रतिष्ठित करते हैं इसलिये हिंदी में एक प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक पत्रकार बनना हरेक के बूते नहीं होता। केवल हिंदी के दम पर महान पत्रकार का दर्जा केवल उन्हीं महर्षि को ही दिया जा सकता है क्योंकि उनका लिखा अनुवाद के माध्यम से नहीं पढ़ा गया।
एक गैरपूंजीपति पत्रकार हमेशा अपना जीवन एक सामान्य आदमी की तरह व्यतीत करता है और उन्होंने भी यही किया। लिखने में जब विशिष्टता प्राप्त होती है तब आदमी अत्यंत सहज हो जाता है। उसे अपनी विशिष्टता का अहंकार नहीं आता क्योंकि उसे एक के बाद दूसरी रचना करनी होती है।
वह शब्द ऋषि एक आदमी की तरह जिया। इस लेखक से कभी उनकी मुलाकात नहीं हुई पर उनके अनेक लेख पढ़े। क्या गजब की लेखनी थी? हर पंक्ति में अपना अर्थ था। उनकी भाषा शैली की नकल अनेक पत्रकार करने का प्रयास करते हैं। लंबें चैड़े वाक्यों में हिंदी के आकर्षक शब्दों का प्रयोग करने की शैली को कोई दूसरा छू नहीं पाया पर कुछ लोग कोशिश करते हैं पर जो पढ़ने वाले जानते हैं उनका स्तर कितना ऊंचा था।
फिर क्रिकेट जैसे खेल में उनका मन कैसे फंसा। वह खेल प्रेमी थे। अपने ही अखबारों में क्रिकेट के संबंध में समय समय पर जो प्रतिकूल छपता है क्या वह पढ़ते नहीं थे? हमने तो उनका अखबार पढ़ते ही पढ़ते क्रिकेट देखा और फिर देखना कम कर दिया। किसी पर यकीन नहीं है। किसी क्रिकेट खिलाड़ी में लगाव नहीं है। हार जीत के समाचार जबरन सामने आते हैं तो देख लेते हैं। जिस मैच को देखने के बाद उनके दिल ने साथ छोड़ा उसकी खबर हमने उनके परमधाम गमन के साथ ही सुनी।
संभव है कि जान बूझकर इसका प्रचार किया गया हो कि देखो कैसे इस देश में जुनून की तरह माना जाता है-हालांकि मैच के समय जिस तरह पहले सड़कों पर इसकी चर्चा देखते थे अब नहीं दिखती । एक तरह से संदेश होता है कि अगर आप क्रिकेट नहीं देखते तो इसका मतलब है कि आप युवा नहीं है-जैसे कि क्रिकेट कोई सैक्सी खेल हो।
बहरहाल उन शब्द ऋषि के देहावसान की खबर ने दुःख तो दिया पर सच बात तो यह है कि एक दिन यह सभी के साथ होना है। फिर हम कहें कि क्रिकेट की वजह से यह हुआ-गलत होगा। सत्य के अन्वेषक एक ऋषि का दिल एक मैच से टूट जाये यह संभव नहीं है। मृत्यु के लिये कोई न कोई बहाना तो बनता ही है।
इतने सारे मैच भारत हारा। सच तो यह है कि अनेक लोग तो पक गये हैं कि जीतने पर ही यकीन नहीं करते। जिसने मैच न देखा हो उसे कसम खाकर बताना पड़ता है कि भारत मैच जीत गया। उनका जो प्रिय खिलाड़ी है तो उसका कहना ही क्या? ढेर सारे रिकार्डों से लोग खुश जरूर होते हैं पर टीम कभी विश्व नहीं जीत सकी। केवल एक मैच की वजह से उनका दिल टूटेगा यह संभव नहीं हो सकता। जो आदमी जितनी सांसे लिखवाकर लाया है उतनी ही ले पायेगा।
अलबत्ता क्रिकेट वह शौकीन जो बड़ी उम्र के हैं उनको अब इसे देखना बंद करना चाहिये। कुछ लोग इसे देखते हुए ही वृद्ध हो गये हैं पर फिर भी उनका दिल मानता नहीं है। जिन लोगों ने यकीन कम होने के कारण क्रिकेट देखना बंद कर दिया है वह बहुत आराम अनुभव करते हैं। वरना पहले जब भारत हारता था तो अनेक लोगों का सदमे से सारा शरीर सुन्न हो जाता था। सारा दिन मैच आंखें लगाकर देखा और जब भारत हार गया तो बाहर जाने पर ऐसा लगता था कि नरक से बाहर आये हैं। सुबह मैच हो तो रात को नींद नहीं आती थी। वह तो भला उस भारतीय खिलाड़ी का जिसने पाकिस्तानी खिलाड़ी द्वारा इसके काले पक्ष को उजागर करने के बाद उसका समर्थन किया जिससे अनेक क्रिकेट प्रेमियों की आंखें खुल गयीं। इधर हम यह भी देखते हैं कि भारत पाकिस्तान के बीच अन्य विषयों पर भले ही दुश्मनी हो पर क्रिकेट के विषय पर एका दिखता है। इससे हमें क्या? लब्बोलुआब यह कि क्रिकेट एक पैसे का खेल है जिसमें आगे पैसा, पीछे पैसा, नीचे पैसा, ऊपर पैसा, दायें पैसा, बायें पैसा यानि हर बात में पैसा है।
उन शब्द ऋषि जैसा हम तो नहीं लिख सकते पर उन जैसे हमारे गुरु भी थे। उनके परमधाम गमन के समय हमें अपने गुरुजी की भी याद आयी। वही हमसे कहते कि क्रिकेट गुलामों का खेल है। सच तो यह है कि हमारा मन भर आया था। लोग रोये भी होंगे पर सोच रहे थे कि ‘क्या यह सच नहीं है कि आजादी के बाद वही ऐसे एकमात्र शख्स रहे हैं जिन्होंने पत्रकार के रूप में बिना धन लगाये केवल शब्दों के सहारे ख्याति अर्जित की। उनको नमन करने का मन करता है क्योंकि वह भी हमारे लेखन के प्रेरक रहे थे।
—————–
कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
————————

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।

अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

नया सामान भी कबाड़ हो जाता है-हिंदी व्यंग्य कविता (naya saman aur kabad-hindi vyangya kavita)


सुनने और पढने वाला
जाल में फंस जाए
विज्ञापन ऐसे ही सजाये जाते हैं.
अगर उनमें सच होता तो
नहीं भर जाते घर उस कबाड़ के सामान से
जिनको खरीदा था कभी चाव से
बड़े महंगे भाव से
आये थे जो सामान नए बनकर ठेले से
वही कभी कबाड़ बनकर फिर उसमें लद जाते हैं.
———————
बाज़ार अब नगद ही नहीं
उधार पर भी चलते हैं.
चुकाते हुए रोते रहो
नहीं चुकाने पर
चीख पुकार भी मचती है
कभी उधार वाले
पहलवान बनकर गर्दन भी पकड़ते हैं.

—————————-
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
—————————

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

नापसंद लेखक, पसंदीदा आशिक-हिन्दी हास्य कविता (rejected writer-hindi hasya kavita)


आशिक ने अपनी माशुका को
इंटरनेट पर अपने को हिट दिखाने के लिये लिए
अपने ब्लाग पर
पसंद नापसंद का स्तंभ
एक तरफ लगाया।
पहले खुद ही पसंद पर किल्क कर
पाठ को ऊपर चढ़ाता था
पर हर पाठक मूंह फेर जाता था
नापसंद के विकल्प को उसने लगाया।
अपने पाठों पर फिर तो
फिकरों की बरसात होती पाया
पसंद से कोई नहीं पूछता था
पहले जिन पाठों को
नापसंद ने उनको भी ऊंचा पहुंचाया।
उसने अपने ब्लाग का दर्शन
अपनी माशुका को भी कराया।
देखते ही वह बिफरी
और बोली
‘‘यह क्या बकवाद लिखते हो
कवि कम फूहड़ अधिक दिखते हो
शर्म आयेगी अगर अब
मैंने यह ब्लाग अपनी सहेलियों को दिखाया।
हटा दो यह सब
नहीं तो भूल जाना अपने इश्क को
दुबारा अगर इसे लगाया।’’

सुनकर आशिक बोला
‘‘अरे, अपने कीबोर्ड पर
घिसते घिसते जन्म गंवाया
पर कभी इतना हिट नहीं पाया।
खुद ही पसंद बटन पर
उंगली पीट पीट कर
अपने पाठ किसी तरह चमकाये
पर पाठक उसे देखने भी नहीं आये।
इस नपसंद ने बिना कुछ किये
इतने सारे पाठक जुटाये।
तुम इस जमाने को नहीं जानती
आज की जनता गुलाम है
खास लोगों के चेहरे देखने
और उनका लिखा पढ़ने के लिये
आम आदमी को वह कुछ नहीं मानती
आम कवि जब चमकता है
दूसरा उसे देखकर बहकता है
पसंद के नाम सभी मूंह फुलाते
कोई नापसंद हो उस पर मुस्कराते
पहरे में रहते बड़े बड़े लोग
इसलिये कोई कुछ नहीं कर पाता
अपने जैसा मिल जाये कोई कवि
उस अपनी कुंठा हर कोई उतार जाता
हिट देखकर सभी ने अनदेखा किया
नापसंद देखकर उनको भी मजा आया।
ज्यादा हिट मिलें इसलिये ही
यह नापसंद चिपकाया।
अरे, हमें क्या
इंटरनेट पर हिट मिलने चाहिये
नायक को मिलता है सब
पर खलनायक भी नहीं होता खाली
यह देखना चाहिये
मैं पसंद से जो ना पा सका
नापसंद से पाया।’’

इधर माशुका ने सोचा
‘मुझे क्या करना
आजकल तो करती हैं
लड़कियां बदमाशों से इश्क
मैंने नहीं लिया यह रिस्क
इसे नापसंद देखकर
दूसरी लड़कियां डोरे नहीं डालेंगी
क्या हुआ यह नापसंद लेखक
मेरा पसंदीदा आशिक है
इसमें कुछ बुरा भी समझ में नहीं आया।’
……………………………..

यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

हिंदी

अमृत तो पी गए फ़रिश्ते-व्यंग्य कविताएँ (amrut aur zahar-vyangya kavitaean)


फरिश्तों ने छोड़ दिया दौलत का घर
मासूम इंसानों के लिए.
पर शैतानों ने कर लिया उस पर कब्जा,
दिखाया इंसानियत का जज्बा,
करोडों से भर रहे हैं अपने घर
पाई से जला रहे चिराग जमाने के लिए.
वह भी रखे अपने घर की देहरी पर
अपनी मालिकी जताने के लिए.
————————
जितनी चमक है उनकी शयों में
जहर उससे ज्यादा भरा है.
अमृत तो पी गए फ़रिश्ते किसी तरह बचाकर
छोड़ दिया अपने हाल पर दुनिया को
उसे पचाकर,
शैतानों ने हर शय को सजाकर,
रख दिया बाज़ार में,
कहते भले हों अमृत उसमें भरा है.
पर वह अब इस दुनिया में कहाँ धरा है.
———————–

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

क्रिकेट मैच और हिंदी ब्लाग का आपसी रिश्ता-हास्य व्यंग्य (cricket match and hindi blog-hindi hasya vyangya)


अंतर्जाल पर लिखने के अलग ही अनुभव है। इनमें से कुछ अनुभव ऐसे हैं जो समाज की गतिविधियों से इस तरह परिचय कराते हैं जिसका संबंध ब्लाग लिखने से सीधे न होते हुए भी लगता है। खासतौर से जब हिंदी में लिख रहे हैं तब कुछ अच्छी और बुरी घटनायें ऐसी होती हैं जिनको दर्ज करना जरूरी लगता है-ऐसे में क्रिकेट से संबंध हो तो हम उससे बच नहीं सकते।
वजह इसकी यह है कि कवितायें, कहानियां और व्यंग्य तो लिखना बहुत पहले ही शुरु किया था पर अखबारों में एक लेखक के रूप में छपने का श्रेय हमें 1983 में भारत के विश्व कप जीतने पर लिखे विषय के कारण ही मिला था। उसके बाद जो दौर चला वह एक अलग बात है पर अंतर्जाल पर भी हमने सबसे पहले अपना एक व्यंग्य क्रिकेट में सब चलता है यार शीर्षक से लिखा। उसमें 2007 में होने वाले संभावित विश्व क्रिकेट प्रतियोगिता में भारतीय टीम के चयन पर व्यंग्य कसा गया था। सामान्य हिन्दी फोंट में होने के कारण वह कोई पढ़ नहीं पाया पर उस समय रोमन लिपि में हिन्दी लिखना आसान नहीं था इसलिये 200ल में विश्व कप में भारतीय टीम की हार पर लिखे गये छोटे पाठ पर हमें पहली प्रतिक्रिया मिली थी। दरअसल वह पाठ एक पुराने खिलाड़ी के बयान पर था जिनकी हाल ही में मृत्यु गयी और टिप्पणी में उनके प्रति गुस्से का भाव था सो टिप्पणी उड़ाने के लिये पूरा पाठ ही उड़ाना पड़ा-उस समय तकनीकी जानकारी इतनी नहीं थी।
क्रिकेट में फिक्सिंग जैसी कथित घटनाओं ने हमें क्रिकेट से विरक्त कर दिया था और हम मन लगाने के लिये ही अंतर्जाल पर लिखने आये। उन्हीं दिनों विश्व कप भी चल रहा था और इधर ब्लाग बनने के दौर भी-कोई तकनीकी जानकारी देने वाला नहीं था वरना आज तो हम पांच मिनट में ब्लाग बनाकर कविता ठेल सकते हैं। कोई अनुभव नहीं था और क्रिकेट पर लिखने का हमारा कोई इरादा नहीं था। जब भी क्रिकेट पर लिखा तो व्यंग्य या हास्य कविता ही लिखी। एक बार जरूर बहक गये जब पिछले वर्ष बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता में भारत जीता तो उस पर एक पाठ लिखा मगर वह बिना टिप्पणी के रहा तो हैरानी हुई तब हमने पता लगाया कि वह तो फोरमों पर पहुंचा ही नहीं। वजह हमने फीड बर्नर का कोड इस तरह लगााया कि वह ब्लाग हमारे यहां ही दिख सकता था। दो दिन बाद हमने उसको हटाया तो देखा कि वह फोरमों पर दिख रहा था।
इसी के चलते गुस्सा आया तो फिर एक हास्य कविता लिख डाली ‘बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा’। कुछ लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमें ही बेकार लगने वाली वह कविता सबसे अधिक टिप्पणियां प्राप्त कर चुकी है। अलबत्ता कुछ हिंदी ज्ञाता उस तमाम तरह की नाराजगी भी जता चुके हैं। उसका कविता में हमारा आशय यही था कि कुछ पुराने खिलाड़ी े केवल इसलिये पचास ओवर वाली टीम में बने हुए हैं क्योंकि उनके पास विज्ञापन मिलते हैं। ऐसे तीन खिलाड़ी बीस ओवरीय प्रतियोगिता में नहीं गये थे और अब उस विश्व कप की आड़ में उनको जीवनदान इसलिये मिलने वाला था क्योंकि विरक्त हो रहा भारतीय समुदाय फिर क्रिकेट की तरफ आकर्षित होने वाला था। पचास ओवरीय विश्व कप के बाद भारतीय बाजार प्रबंधकों को मूंह सूख गया था जिसे बीस ओवर से अमृत मिलने वाला था। हुआ भी यही। अब देखिए फिर क्रिकेट की तरफ लोगों का आकर्षण पहले जैसा ही हो गया जैसे 1983 के बाद बना था। वही हीरो अभी भी चल रहे हैं जिन्होंने कभी एक भी विश्व कप नहीं जितवाया। इस देश की हालत यही है कि जहां देखते हैं कि आकर्षण हैं वहीं अपना लोग मन लगा देते हैं।

हमें इस पर भी कोई आपत्ति नहीं है। हम कोई यह थोड़े ही कहते हैं कि हमारे ब्लाग पढ़ो जिसमें हम अनेक बार बेकार सी कवितायें और व्यंग्य ठूंस देते हैं।
दरअसल बात यह है कि क्रिकेट मैच वाले दिनों में हमारे ब्लाग सुपर फ्लाप हो जाते हैं। वैसे भी कोई हम हिट ब्लाग लेखक नहीं माने जाते पर जिस दिन क्रिकेट मैच हो उस दिन स्वयं को यह समझाते हुए भी डर लगता है कि हम हिंदी में ब्लाग लिख रहे हैं। अगर कोई क्रिकेट प्रेमी मित्र मिल जाये तो उससे इस विषय पर बात ही नहीं करते कि ब्लाग पर आज किस विषय पर लिखेंगे। शेष दिनों में ऐसे मित्रों से हमारी अपने ब्लाग के विषयों पर चर्चा होती है।
ब्लाग पर पाठ पठन/पाठक संख्या बताने वाले अनेक कांउटर लगाये जाते हैं। हमने भी दूसरों की देखादेखी अनेक प्रकार के काउंटर लगा चुके हैं-यह अलग बात है कि एक ‘गुड कांउटर’ की वजह से हमारे दो ब्लाग जब्त भी हो चुके हैं क्योंकि वह कांउटर किसी जुआ वगैरह से संबंधित था। कहें तो घुड़दौड़ की फिक्सिंग से भी हो सकता है। पूरी तरह हम भी उसके बारे में समझ नहीं पाये। हालांकि हमें लगता था कि पाठ पठन/पाठक संख्या बताने वाली उस वेबसाईट में कुछ गड़बड़ है पर फिर सोचते थे कि क्रिकेट जैसी ही होगी। वहां सब चल रहा है तो यहां चलने में क्या है?
उसका अफसोस भी नहीं है। मगर आज कुछ अधिक अफसोस वाला दिन था तो सोचा कि क्यों न अपने सारे गम एक ही दिन याद कर लिये जायें। रोज रोज का क्लेश हम नहीं पाल सकते। जब हम यह पाठ लिख रहे हैं तब कहीं भारत पाकिस्तान का क्रिकेट मैच चल रहा है। उससे हमारा लेना देना बस इतना ही है कि हमारे ब्लाग पचास फीसदी पिट रहे हैं। जो पचास फीसदी बचे हैं वह इसलिये क्योंकि वह मैच दिन में नहीं था-यानि अब सौ फीसदी पिट रहे हैं। ऐसा पहले भी हुआ है पर भारत पाकिस्तान का मैच बहुत दिन बाद हो रहा है इसलिये अधिक लोग देख रहे हैं। फिर इधर भाई लोगों ने जनता को बीसीसीआई की क्रिकेट टीम ‘विश्व में नंबर वन’होने’ की नशीली गोली पिला दी है। बस! सारी पब्लिक उधर!
हम इससे भी परेशान नहीं है। अरे, आज ब्लाग पिट रहे हैं कल फिर अपनी जगह पर आ जायेंगे। समस्या यह है कि हम इसमें कुछ ज्यादा ही सोच रहे हैं पर चिंतन नहीं लिख पा रहे। इस पर फिर कभी लिखेंगे। अलबत्ता हम यह सोच रहे हैं कि क्या क्रिकेट ने भारत की युवा पीढ़ी को दिमागी रूप से पंगु तो नहीं बना दिया। हमने पूरी युवावस्था क्रिकेट के खेल होने के भ्रम में गुजारी और अपनी नयी पीढ़ी को इसमें जाता देख रहे हैं। यकीनन हमने अगर अपना समय क्रिकेट पर बरबाद नहीं किया होता तो इस समय तीस से चालीस उपन्यास, सौ पचास कहानी संगह, एक हजार कविता संग्रह और पचास कभी चिंतन संग्रह छपवा चुके होते-यह अलग बात है कि पढ़ने वाले भी हम ही होते पर कम से कम अपना समय तो नष्ट करने का गम तो नहीं होता।
कहते हैं कि इस देश में हिंदी के अच्छे लेखक नहीं मिलते। मिलेंगे कहां से? हर नयी पीढ़ी को क्रिकेट खाये जा रहा है। न हिंदी के लेखक मिलते हैं न पाठक! यह ज्ञान हमें आज नहीं प्राप्त हुआ बल्कि पिछले तीन वर्ष से इस तरह अपने ब्लाग का उतार चढ़ाव देखकर सोचते थे।
आज हुआ यह कि हम पास के शहर में एक मंदिर में गये थे। लौटते हुए रास्ते में हमारा एक मित्र मिल गया और बोला-‘आज मेरे घर में लाईट नहीं है इसलिये दूसरे मित्र के घर मैच देखने जा रहा हूं। तुमने तो मना ही कर दिया कि मंदिर जाऊंगा।’
हमने कहा-‘पर तुमने बताया नहीं था कि मैच देखना है। अब चलो।’
वह बोला-‘अब क्या? मैंने उसे फोन कर दिया है। फिर मैच तो अब निकल ही रहा है।’
वह चला गया पर वहां हमें अपने ब्लाग याद आये-ऐसा बहुत कम होता है कि हम घर के बाहर कभी ब्लाग वगैरह याद करते हों । मित्रों के साथ किसी विषय पर होते समय यह जरूर कहते हैं कि इस पर लिखेंगे। हमने उसी मित्र को यह बताया था कि क्रिकेट मैच वाले दिन ब्लाग पिट जाता है। यही कारण है कि जब बातचीत के बाद वह जा रहा था तब उसने कहा‘हां, पर आज पाकिस्तान के साथ मैच है तुम्हारे ब्लाग तो पिट जायेंगे।’
इस बात ने हमारी चिंतन क्षमता जगा दी और घर आकर ब्लागों की पाठ पठन/पाठक संख्या देखी तो उसने इसकी पुष्टि की। मैच अधिक आकर्षक है तो हिंदी ब्लाग उतनी ही बुरी तरह से पिट रहा है। हो सकता है कि यह हमारे साथ ही होता हो और जो अच्छे लिखने वाले हों उनकी संख्या इतनी अधिक होती होगी कि उनको इसमें कमी का पता अधिक नहीं चले। हमें जरूर इसका आभास होता है तब सोचते हैं कि ‘क्या क्रिकेट मैचों की हिंदी से भला कोई ऐसी अदृश्य प्रतिस्पर्धा है जो इस तरह हो रहा है। वैसे संभवत कुछ अनुभवी लोग इस बात से सहमत हो सकते हैं कि क्रिकेट ने हमारी रुचियों को अप्राकृतिक और कृत्रिम आकर्षण का गुलाम बना दिया है और जिसकी वजह से हिंदी का रचनाकर्म भी प्रभावित होता है क्योंकि उसको समाज से अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिलता। अपनी अपनी सोच है। हमने क्रिकेट मेें समय गंवाया है उसकी भरपाई करने के लिये अपनी बात लिखने बाज नहीं आते। लोग भी भला अपनी आदत से कहां बाज आते हैं और कहां क्रिकेट की हार पर विलाप करते हुए उसे भूल रहे थे फिर उसे याद करने लगे हैं।
…………………………..

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

%d bloggers like this: