Category Archives: editorial

अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने लीबिया पर तेल संपदा पर कब्जे के लिए किया हमला-हिन्दी लेख (libiya par tel sanpada par kabje ke liye-hindi lekh)


लीबिया पर कथित रूप से नाटो देशों के हमले होने का मतलब यह कतई नहीं लिया जाना चाहिए कि यह सब कोई वहां की जनता के हित के लिये किया गया है। लीबिया में जनअसंतोष न हो यह तो कोई भी निष्पक्ष विचारक स्वीकार नहीं कर सकता। दुनियां में कौनसा ऐसा देश है जहां अपने शिखर पुरुषों के प्रति निराशा नहीं है। जब आधुनिक लोकतंत्र वाले देशों में जनअसंतोष है तो एक तानाशाह के देश में खुशहाली होने का भ्रम वैसे भी नहंी पालना चाहिए। लोकतांत्रिक देशों में तो फिर भी आंदोलनों से वह असंतोष सामने आता है पर तानाशाही वाले देशों में तो उसे इस तरह कुचला जाता है कि भनक तक नहीं लगती। ऐसा चीन में दो बार हो चुका है।
लीबिया में एक जनआंदोलन चल रहा है। जिसके नेतृत्व का सही पता किसी को नहीं है। इस आंदोलन को कुचलने के लिये वहां के तानाशाह गद्दाफी ने कोई कसर नहीं उठा रखी है। गद्दाफी कोई भला आदमी नहीं है यह सभी को पता है पर एक बात याद रखनी होगी कि कम से कम उसके चलते लीबिया में एक राज्य व्यवस्था तो बनी हुई है जिसके ढहने पर लीबिया के लोगों की हालत अधिक बदतर हो सकती है। गद्दाफी का पतन हो जाये तो अच्छा पर लीबिया का पतन खतरनाक है। वहां की जनता ही नहीं वरन् पूरी दुनियां के लोगों को इसका दुष्परिणाम भोगना पड़ेगा क्योंकि वहां का तेल उत्पादन वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपना योगदान देता है।
गद्दाफी के विरुद्ध असंतोष कोई नई बात नहीं है। अब वहां आंदोलन चला तो यह पता नहीं लग सका कि वह बाहरी संगठित शक्तियों के कारण फलफूला या वाकई आम जनता अब अधिक कष्ट सहने को तैयार नहीं है इसलिये बाहर आई। अगर हम गद्दाफी के इतिहास को देखें तो पश्चिमी देशों का ऐजेंट ही रहा है। उसने खरबों रुपये की राशि अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस में जमा की होगी-यह इस आधार पर लिखा जा रहा है क्योंकि फ्रांस तथा अमेरिका ने उसकी भारी भरकम जब्त कर ली है-और अगर गद्दाफी मर गया तो इन देशों को ढेर सारा फायदा होगा। हमारे देश के जनवादी लेखक अमेरिका का विरोध करते हैं पर वह कभी विकासशील देशों की लूट का माल पश्चिमी देशों में किस तरह पहुंचता है इसका अन्वेषण नहीं करते। वह अमेरिकी साम्राज्यवाद का रोना रोते हैं पर उसका विस्तारित रूप आजतक नहीं समझ पाये। उनके पसंदीदा मुल्क चीन और रूस तक के देशों में अमेरिका को प्रसन्न करने वाले पिट्ठू बैठे हैं। इन देशों के शिखर पुरुषों के कहीं कहीं पारिवारिक और आर्थिक इन्हीं देशों में केंद्रित हैं। यही कारण है कि जब सुरक्षा परिषद में किसी देश के विरुद्ध प्रस्ताव आना होता है तो उसका पहले सार्वजनिक रूप से विरोध करते हैं पर जब विचार के लिये बैठक में प्रस्तुत होता है तो वीटो करना तो दूर वहां से भाग जाते है। लीबिया के मामले में यही हुआ। सुरक्षा परिषद में लीबिया के खिलाफ प्रस्ताव में दोनों देश नदारत रहे। यह दोनों गद्दाफी का खुलकर समर्थन करते रहे पर ऐन मौके पर मुंह फेरकर चल दिये।
एक आम व्यक्ति और लेखक के नाते हम लीबिया के आम आदमी की चिंता कर सकते हैं। भले ही नाटो देश वहां की जनता के भले के लिये लड़ने गये हैं पर सारी दुनियां जानती है कि युद्ध के बुरे नतीजे अंततः आम आदमी को ही भुगतने होते हैं। मरता भी वही, घायल भी वही होता है और भुखमरी और बेकारी उसे ही घेर लेती हैं। यह अलग बात है कि शिखर पुरुष जुबानी जमा खर्च करते हैं पर उससे कुछ होता नहीं है।
मान लीजिए गद्दाफी का पतन हो गया तो वहां शासन कौन करेगा? तय बात है कि इन पश्चिमी देशों का ही पिट्ठू होगा। वहां की तेल संपदा वह इन देशों के नाम कर देगा। वैसे गद्दाफी भी यही कर रहा था पर लगता है कि उसके खेल से अब यह नाटो देश ऊब गये हैं इसलिये कोई दूसरा वहां बिठना चाहते हैं। यह भी संभव है कि आंदोलनकारियों ने तेल उत्पादक शहरों पर कब्जा कर लिया तो यह देश डर गये कि अब गद्दाफी उनके काम का नहीं रहा। इसलिये लोकतंत्र पर उसको साफ कर वहां अपना आदमी बिठायें। गद्दाफी का पैसा तो वह ले ही चुके हैं पर डालर के अंडे देने वाली मुर्गियां यानि तेल क्षेत्र लेना भी उनके लिये जरूरी है। अपने आर्थिक हितों को लेकर यह देश कितने उतावले हैं कि बिना सूचना और समाचार के अपने हमले कर दिये। इस बात पर शायद कम ही प्रेक्षकों का ध्यान गया होगा कि लीबिया में गद्दाफी के तेल वाले क्षेत्रों पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया था। मतलब यह नाटो देशों के काम का नहीं रहा। फिर अब विद्रोहियों पर उनके हितैषी बनकर उन पर ही नियंत्रण के लिये गद्दाफी को मारने चल दिये। उनका मुख्य मकसर तेल संपदा की अपने लिये रक्षा करना है न कि लीबिया में लोकतंत्र लाना।
जहां तक इन देशों के लोकतंत्र के लिये काम करने का सवाल है तो सभी जानते हैं कि पूंजीवाद के हिमायती यह राष्ट्र पूंजीपतियों के इशारे पर चलते हैं। जरूरत पड़े तो अपराधियों को भी अपने यहां सरंक्षण देते हैं। दूसरे देशों में जनहित का दावा तो यह तब करें जब अपने यहां पूरी तरह कर लिया हो। लोकतंत्र के नाम पर पूंजीपतियों के बंधुआ बने यह राष्ट्र अपने हितों के लिये काम करते हैं और अगर यह लीबिया की जनता की हित का दावा कर रहे हैं तो उन पर कोई यकीन कर सकता है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्दयोग

4.दीपकबापू   कहिन
५.ईपत्रिका 
६.शब्द पत्रिका 
७.जागरण पत्रिका 
८,हिन्दी सरिता पत्रिका 
९शब्द योग पत्रिका 
१०.राजलेख पत्रिका 

अपने सदगुरु स्वयं बने-विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष लेख (apne sadguru svyan bane-paryavaran par lekh)


पर्यावरण के लिये कार्य करने पर माननीय जग्गी सद्गुरु को सम्मानित किया जाना अच्छी बात है। जब कोई वास्तविक धर्मात्मा सम्मानित हो उस पर प्रसन्नता व्यक्त करना ही चाहिए वरना यही समझा जायेगा कि आप स्वार्थी हैं।
आज विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। दरअसल इस तरह के दिवस मनाना भारत में एक फैशन हो गया है जबकि सच यह है कि जिन खास विषयों के लिये पश्चिम को दिन चाहिये वह हमारी दिनचर्या का अटूट हिस्सा है मगर हमारी वर्तमान सभ्यता पश्चिम की राह पर चल पड़ी है तो इनमें से कई दिवस मनाये जाना ठीक भी लगता है।
पर्यावरण की बात करें तो भला किस देश में इतने बड़े पैमाने पर तुलसी के पौद्ये को प्रतिदिन पानी देने वाले होंगे जितना भारत में है। इसके अलावा भी हर दिन लोग धार्मिक भावनाओं की वजह से पेड़ों पौद्यों पर पानी डालते हैं और वह बड़ी संख्या में है। यह बात जरूर है कि प्राकृतिक संपदा की बहुलता ने इस देश के लोगों को बहुत समय तक उसके प्रति लापरवाह बना दिया था पर जब जंगल की कमियों की वजह से पूरे विश्व के साथ विश्व में गर्मी का प्रकोप बढ़ा तो विशेषज्ञों के सतत जागरुक प्रयासों ने लोगों में चेतना ला दी और अधिकतर नयी बनी कालोनी में अनेक लोग पेड़ पौद्ये लगाने का काम करने लगे हैं-यह अलग बात है कि इसके लिये वह सरकारी जमीन का ही अतिक्रमण करते हैं और नक्शे में अपने भूखंड में इसके लिये छोड़ी गयी जमीन पर अपना पक्का निर्माण करा लेते हैं। प्रकृति के साथ यह बेईमानी है पर इसके बावजूद अनेक जगह पेड़ पौद्यों का निवास बन रहा है।
एक बात सच है कि हमारे जीवन का आधार जल और वायु है और उनका संरक्षण करना हमारा सबसे बड़ा धर्म है। एक पेड़ दस वातानुकूलित यंत्रों के बराबर वायु विसर्जित करता है यही कारण है गर्मियों के समय गांवों में पेड़ों के नीचे लोगों का जमघट लगता है और रात में गर्मी की तपिश कम हो जाती है। इसके अलावा गर्मियों में शाम को उद्यानों में जाकर अपने शरीर को राहत भी दिलाई जा सकती है। कूलर और वाताकुलित यंत्र भले ही अच्छे लगते हैं पर प्राकृतिक हवा के बिना शरीर की गर्मी सहने की क्षमता नहीं बढ़ती है। उनकी ठंडी हवा से निकलने पर जब कहीं गर्मी से सामना हो जाये तो शरीर जलने लगता है।
इसलिये पेड़ पौद्यों का संरक्षण करना चाहिए। सच बात तो यह है कि पर्यावरण के लिये किसी सद्गुरु की प्रतीक्षा करने की बजाय स्वयं ही सद्गुरु बने। कोई भी महान धर्मात्मा सभी जगह पेड़ नहीं लगवा सकता पर उससे प्रेरणा लेना चाहिए और जहां हम पेड़ पौद्ये लगा सकते हैं या फिर जहां लगे हैं वहां उनका सरंक्ष कर सकते हैं तो करना चाहिए। दरअसल पेड़ पौद्यों को लगाना, उनमें खिलते हुए फूलों और लगते हुए फलों को देखने से मन में एक अजीब सी प्रसन्नता होती है और ऐसा मनोरंजन कहीं प्राप्त नहीं हो सकता। इसे एक ऐसा खेल समझें जिससे जीवन का दांव जीता जा सकता है।
प्रसंगवश एक बात कहना चाहिए कि पेड़ पौद्यों से उत्पन्न प्राणवायु का सेवन तो सभी करते हैं पर उनको धर्म के नाम स्त्रियां ही पानी देती हैं। अनेक महिलाऐं तुलसी के पौद्ये में पानी देते देखी जाती हैं। वैसे अनेक पुरुष भी यही करते हैं पर उनकी संख्या महिलाओं के अनुपात में कम देखी जाती है। इससे एक बात तो लगती है कि पेड़ पौद्यो तथा वन संरक्षण का काम हमारे लिये धर्म का हिस्सा है यह अलग बात है कि कितने लोग इसकी राह पर चल रहे हैं। आजकल उपभोक्तावादी युग में फिर भी कुछ सद्गुरु हैं जो यह धर्म निभा रहे हैं और जरूरत है उनके रास्ते पर चलकर स्वयं सद्गुरु बनने की, तभी इतने बड़े पैमाने पर हो रहे पर्यावरण प्रदूषण को रोका जा सकता है। 

——————-

संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
http://teradipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

सर्च इंजिनों में छायी रही रामनवमी-संपादकीय


रामनवमी के दिन सुबह अंतर्जाल पर दिलचस्प अनुभव हुआ। अपने आप में यह अनुभव बहुत सुखद था। सबसे पहला यह अनुभव तो यह था कि किसी दिन अगर कोई भारतीय पर्व है तो उस दिन उसके नाम से सर्च इंजिन पर खोज सुबह से ही प्रारंभ हो जाती है। ऐसे में अपने उससे संबंधित पुराने पाठ सामने ही कांउटर पर चमकने लगते हैं। रामनवमी के दिन भगवान श्री राम और रामनवमी के नाम से हिंदी और अंग्रेजी शब्दों के साथ सर्च इंजिनों पर खोज की गयी। ऐसे में इस लेखक के ब्लाग पर कम से कम पांच पाठ ऐसे थे जो पूरे दिन पाठकों के दृष्टिपथ में आये।

दो वर्ष पूर्व रामनवमी पर एक पाठ इस लेखक ने लिखा था जो कृतिदेव में होने के कारण पढ़ा नहीं जा सकता था और उसे पिछले साल यूनिकोड से परिवर्तित कर पुनः प्रकाशित किया। इसके अलावा पिछले ही वर्ष रामनवमी पर लिखा गया आलेख भी निरंतर इस वर्ष निरंतर पढ़ा जाता रहा। यह दोनों पाठ ब्लाग स्पाट के ब्लाग/पत्रिका अनंत शब्दयोग पर थे और कल इनकी वजह से जितने पाठकों ने पढ़ा उतने आम तौर से सामान्य दिनों में पाठक नहीं पढ़तें। इसके अलावा वर्डप्रेस के ब्लाग पर तो भी भगवान श्रीराम पर दिपावली और अन्य अवसरों पर लिखे गये आलेख चमकते दिख रहे थे। संत कबीरदास और रहीम के संदेशों में जहां भगवान श्रीराम के नाम का उल्लेख है उन पर भी कल पाठक अधिक थे।
इन पाठों पर सुबह ही इतने पाठक देखकर विचार आया कि नया लेख लिखने की बजाय इसे ही अपडेट किया जाये। ब्लाग स्पाट और वर्डप्रेस पर यह एक सुविधा है कि आप अपने पुराने पाठ नयी तारीख में अपडेट कर सकते हैं। तब लगा कि अनंत शब्दयोग के पाठ को अपडेट किया जा सकता है। इस सुविधा का लाभ उठाया जा सकता है ताकि पाठकों को यह न लगे कि वह कोई पुराना लेख पढ़ रहे है। दरअसल इससे कुछ अंतर नहीं पड़ता पर लोगों में अखबार और पत्र पत्रिकाओं ताजा पढ़ने की आदत पड़ गयी है कि वह यहां भी ताजा पढ़ना चाहते हैं। इसलिये अपडेट करते समय यह देख लिया कि उसमें कोई नयी बात जोड़ी जा सकती है तो जोड़ दें। बहरहाल उसे अपडेट किया। शाम को आकर देखा तो उस अकेले पाठ ने ही 58 पाठक जुटा लिये थे। अन्य पाठों को मिलाकर कुल 175 से अधिक पाठक भगवान श्रीराम पर लिखित पाठों पर आये। मजे की बात यह है कि हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों पर इस तरह के अपडेट नहीं पहुंचते और यही कारण है कि वहां से कोई पाठक नहीं आ सका। सारे पाठक सर्च इंजिनों से आये। इससे यह पता लगता है कि भगवान श्रीराम के प्रति हमारे देश के लोगों के कितने गहरी सीमा तक भक्ति का भाव है।
प्रसंगवश यह ब्लाग/पत्रिका कल ही दस हजार की संख्या आधिकारिक रूप से पार कर गया। वैसे यह ब्लाग दो वर्षों से सक्रिय है पर इस काउंटर पिछले साल ही लगाया गया। इसका सहधर्मी ब्लाग अंतर्जाल पत्रिका पहले ही दस हजार पार चुका है। इस ब्लाग पर संख्या प्रारंभ से ही अधिक रही है और वह निश्चित रूप से प्रदंह हजार से अधिक होगी पर प्रमाणिक रूप कल ही इसने यह संख्या पार की। यह पहला अध्यात्मिक ब्लाग बनाते समय ऐसा नहीं लगा था कि यह ब्लाग यात्रा इतनी दिलचस्प रहने वाली है। हां, इस ब्लाग/पत्रिका से यह अनुभूति इस लेखक को हुई अपने देश के लोग भले ही अन्य विषयों में लिप्त होते हैं पर जहां भी अध्यात्मिक विषय उनके सामने आता है वह अन्य विषय भूल जाते हैं।
सच बात तो यह है कि यह लेखक संपादक अपनी अध्यात्मिक रुचियों और टाईपिंग के ज्ञान का पूरा सुख उठाते हुए इस ब्लाग/पत्रिका पर अपने पाठ लिखता है। यह इंटरनेट की माया ही है कि अपने ही लिखे पाठ को लेखक भूलना भी चाहे तो भूल नहीं सकता क्योंकि पाठक ही उसे याद दिलाते हैं कि उसने क्या लिखा है? दो वर्ष पहले ही प्रारंभ में और फिर पिछले वर्ष ही भगवान श्रीराम पर लिखे गये आलेखों को लिखने का आनंद इस वर्ष अनुभव हुआ जब सुबह से पाठकों को सर्च इंजिन में उनको ढूंढते पाया। फिर अपडेट करने से वह पाठ नये भी लगने लगे साथ ही यह अनुभव हुआ कि लोगों के मन में अध्यात्मिकता के प्रति कितना गहरा लगाव है। इसलिये ही रामनवमी के दिन भगवान श्री राम और रामनवमी का नाम सर्चइंजिनों में उनका नाम छाया रहा।
बहरहाल इस अध्यात्मिक ब्लाग के दस हजार पाठक संख्या पार करने में इस लेखक का तो नहीं बल्कि भारतीय अध्यात्मिक के मनीषियों और उनके ज्ञान में रुचि रखने वाले श्रद्धालु लोगों का अधिक योगदान है। इस लेखक का तो बस इतना ही योगदान है कि वह लिखने का आनंद पहले ही उठा लेता है पढ़ने वालों के हिस्से में वह बाद में आता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की धारा अंतर्जाल पर बृहद रूप में बहती रहे ऐसी आशा हम सभी को करनी चाहिए।
…………………………………

%d bloggers like this: