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शहीदों की चिता पर मनाते दिखावे का शोक-हिन्दी व्यंग्य कविता (shahidon ki chita par dikhave ka shok-hindi vyangya kavita)


सुनते थे
शहीदों की चिता पर लगेंगे मेले,
नाचेंगे जहां आज़ादी के अलबेले,
मगर अब कहीं गैस एजेंसी तो
कहीं पेट्रोल पर उनके नाम पर बन जाते हैं,
कहीं ऊंची इमारतों में आवास भी तन जाते हैं।
उनकी विधवाओं और बच्चों को
मिलना हो बसेरा,
आम आदमी को भी हो जाता वहीं फेरा,
यह अलग बात है,
खास आदमी वहां भी हक
अपने नाम से मार जाते हैं,
शहीदों की चिता पर मनाते दिखावे का शोक,
मगर अपनी लालच पर नहीं रखते रोक,
बना देते उनका भूला हुआ आदर्श चरित्र
खुद ओढ़ लेते आम आदमी की चादर,
मुश्किल है समझना
आम आदमी फिर कौन कहलाये जाते हैं।
————

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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हिन्दी के अखबार-हिन्दी दिवस पर व्यंग्य कविता (hindi ke akhbar-hindi diwas par vyangya kavita)


अखबार आज का ही है
खबरें ऐसा लगता है पहले भी पढ़ी हैं
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

ट्रेक्टर की ट्रक से
या स्कूटर की बस से भिड़ंत
कुछ जिंदगियों का हुआ अंत
यह कल भी पढ़ा था
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

भाई ने भाई ने
पुत्र ने पिता को
जीजा ने साले को
कहीं मार दिया
ऐसी खबरें भी पिछले दिनों पढ़ चुके
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

कहीं सोना तो
कहीं रुपया
कहीं वाहन लुटा
लगता है पहले भी कहीं पढ़ा है
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

रंगे हाथ भ्रष्टाचार करते पकड़े गये
कुछ बाइज्जत बरी हो गये
कुछ की जांच जारी है
पहले भी ऐसी खबरें पढ़ी
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

अखबार रोज आता है
तारीख बदली है
पर तय खबरें रोज दिखती हैं
ऐसा लगता है पहले भी भी पढ़ी हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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कंप्यूटर पर लिखने का अपना तरीका-हिन्दी लेख (computer par hindi likhne ka apna tarika)


अंतर्जाल पर अगर लिखते रहें तो अच्छा है, पर पढ़ना एक कठिन काम है। दरअसल लिखते हुए दोनों हाथ चलते हैंे और आंखें बंद रहती हैं तब तो ठीक है क्योंकि तब सामने से आ रही किरणों से बचाव होने के साथ दोनों हाथों के रक्त प्रवाह का संतुलन बना रहता है।
लिखते हुए आंखें बंद करने की बात से हैरान होने की आवश्यकता नहीं है। अगर आपको टाईपराइटिंग का ज्ञान है और लिखते भी स्वतंत्र और मौलिक हैं तो फिर की बोर्ड पर उंगलियों और दिमाग का काम है आंखों से उसका कोई लेना देना नहीं है।
सच बात तो यह है कि कंप्यूटर पर काम करते हुए माउस थकाता है न कि की बोर्ड-अपने अनुभव से लेखक यही बात समझ सका है।
जब भी इस लेखक ने कंप्यूटर खोलकर सीधे लिखना प्ररंभ किया है तब लगता है कि आराम से लिखते जाओ। हिन्दी टाईप का पूरा ज्ञान है इसलिये उंगलियां अपने आप कीबोर्ड पर अक्षरों का चयन करती जाती हैं। एकाध अक्षर जब अल्ट से करके लेना हो तब जरूर कीबोर्ड की देखना पड़ता है वरना तो दो सो से तीन सौ अक्षर तो ं कब टंकित हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। हालत यह होती है कि सोचते हैं कि चार सौ शब्दों का कोई लेख लिखेंगे पर वह आठ सौ हजार तक तो पहुंच ही जाता है। यही वजह है कि अनेक बार कवितायें लिखकर काम चला लेते हैं कि कहीं गद्य लिखने बैठे तो फिर विषय पकड़ना कठिन हो जायेगा।
अगर कहीं माउस पकड़ कर अपने विभिन्न ब्लागों की पाठक संख्या देखने या अन्य ब्लाग पढ़ने का प्रयास किया तो दायां हाथ जल्दी थक जाता है। वैसे फायर फाक्स पर टेब से काम कर दोनों हाथ सक्रिय रखे जा सकते हैं पर तब भी आंखें तो खुली रखनी पड़ेंगी। फिर आदत न होने के कारण उसमें देर लगती है तब माउस से काम करने का लोभ संवरण नहीं हो पाता। वैसे एक कंप्यूटर विशारद कहते हैं कि अच्छे कंप्यूटर संकलक तथा संचालक कभी माउस का उपयेग नहंी करते। शायद वह इसलिये क्योंकि वह थकावट जल्दी अनुभव नहीं करते होंगे।
आंखें बंद कर टंकण करने का एक लाभ यह भी है कि आप सीधे अपने विचारों को तीव्रता से पकड़ सकते हैं जबकि आंखें खोलकर लिखने से एकाग्रता तो कम होती है साथ ही दूसरे विचार की प्रतीक्षा करनी पड़ती है और कभी कभी तो एक विचार निकल जाता है दूसरा दरवाजे पर खड़ा मिलता है। तब पहले को पकड़ने के चक्कर में दूसरा भी लड़खड़ा जाता है और वाक्य कुछ का कुछ बन जाता है। कंप्यूटर का सबसे अधिक असर आंखों पर पड़ता है पर एक हाथ माउस पकड़ना भी कम हानिकारक नहीं है। वैसे हमारे देश में लोग इस बात की परवाह कहां करते हैं। अधिकतर लोग पश्चिमी में अविष्कृत सुविधाजनक साधनों का उपयोग  तो करते हैं पर उससे जुड़ी सावधानियों को अनदेखा कर जाते हैं।
वैसे कंप्यूटर से ज्यादा हानिकारक तो हमें मोबाईल लगता है। उन लोगों की प्रशंसा करने का मन करता है तो उस पर इतने छोटे अक्षर देखकर टाईप करते हैं। उनकी स्वस्थ आंखें और हाथ देखकर मन प्रसन्न हो उठता है। उस एक मित्र ने हमसे कहा ‘यार, तुम्हारा मोबाईल बंद था, तब मैंने तुम्हें एसएमएस भेजा। तुमने कोई जवाब भी नहीं दिया।’
हमें आश्चर्य हुआ। उससे हमने कहा कि ‘मैं तो कभी मोबाईल पर मैसेज पढ़ता नहीं। तुमने अपने मैसेज में क्या भेजा था?’
‘तुम्हारे ब्लाग की तारीफ की थी। वहां कमेंट लिखने में शर्म आ रही थी क्योंकि वहां किसी ने कुछ लिखा नहीं था कि हम उसकी नकल कर कुछ लिख जाते। तुम्हारी पोस्ट एक नज़र देखी फिर उसे बंद कर दिया। तब ख्याल आया कि चलो तुम्हें एसएमएस कर देते हैं। किसी ब्लाग की एक लाख संख्या पार होने पर तुम्हारा पाठ था।’
हमने कहा‘अच्छा मजाक कर लेते हो!’
मित्र ने कहा‘ क्या बात करते हो। तुम्हारे साथ भला कभी मजाक किया है?’
हमने कहा-‘नहीं! मेरा आशय तो यह है कि तुमने अपने साथ मजाक किया। इतना बड़ा कंप्यूटर तुम्हारे पास था जिस पर बड़े अक्षरों वाला कीबोर्ड था पर तुमने उसे छोड़कर एक छोटे मोबाईल पर संदेश टाईप कर अपनी आंखों तथा हाथ को इतनी तकलीफ दी बिना यह जाने कि हम उस संदेश को पढ़ने का प्रयास करेंगे या नहीं।’

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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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व्यापार जज़्बातों का-हिन्दी शायरी


अपने जज़्बातों को दिल में रखो
बाहर निकले तो
तूफान आ जायेगा।
हर बाजार में बैठा हैं सौदागर
जो करता है व्यापार जज़्बातों का
वही तुम्हारी ख्वाहिशों से ही
तुमसे तुम्हारा सौदा कर जायेगा।
यहां हर कदम पर सोच का लुटेरा खड़ा है
देख कर ख्याल तुम्हारे
ख्वाब लूट जायेगा।
इनसे भी बच गये तो
नहीं बच पाओगे अपने से
जो सुनकर तुम्हारी बात
सभी के सामने असलियत गाकर
जमाने में मजाक बनायेगा।

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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नकली मुस्कराहट बेचने वाले-हिन्दी व्यंग्य कविता


हादसे हों या खुशी के मौके

बाजार के सौदागरों के हाथ

लड्डू ही आते हैं,

क्योंकि कफन हो या लिबास

वही से लोग लाते हैं।

चीजों के साथ जज़्बात भी

कहीं मोल मिलते हैं तो

कहीं किराये पर

इसलिये कृत्रिम मुस्कराहट बेचने वाले

आंसु भी बेचते नज़र आते हैं।
उन्होंने अपने अभिनय से

कर ली दुनियां अपनी मुट्ठी में

पर अपना ही सच भूल जाते हैं।

बोलते अपनी जुबां से, वह जो भी शब्द,

करता है उसे कोई दूसरा कलमबद्ध,

दूसरों के इशारे पर बढ़ाते कदम,

उनके चलने को होता बस, एक वहम,

पर्दे पर हों या पद पर

अपने ही अहसासों को भूल जाते हैं,

फुरसत में भी आजादी से  सांस लेना मुश्किल

बस, आह भरकर रह जाते हैं।

जमाना उनको बना रहा है अपना प्रिय

जो दिखावटी प्रेम का अभिनय किस जाते हैं।

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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धोती, टोपी और सम्मान-हिन्दी हास्य व्यंग्य (dhoti aur samman-hindi comic satire)


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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दीपक बापू जल्दी जल्दी सड़क पर जा रहे थे, सामने से थोड़ी दूरी पर स्कूटर पर सवार फंदेबाज आता दिखा। उनका दिल बैठ गया वह सोचने लगे कि ‘यह अब समय खराब करेगा। इससे बचने का उपाय भी तो नहीं है।’ फिर उन्होंने देखा कि वह तिराहे से गुजर रहे हैं और तत्काल अपने बायें तरफ मुड़कर दूसरे रास्ते पर चलें तो बच जायेंगे। उन्होंने यही किया पर स्कूटर पर सवार फंदेबाज उसी तिराहे से मुड़कर पीछे से आया और बोला-‘क्या बात है दीपक बापू! यह कैसे सोच लिया कि अपने इस आजीवन प्रशंसक से बचकर निकल जाओगे।’
दीपक बापू बोले-‘नहीं, यार, ऐसा नहीं है। दरअसल हमने अपने लिये एक टोपी खरीदी थी, वह उसी दुकान पर छोड़ आये। इधर कहीं शादी पर जाना है। इसलिये वही लेने जा रहे है। चलो, तुम मिल गये तो उस दुकान तक छोड़ दो।’
फंदेबाज ने ना में सिर हिलाते हुए कहा-‘अगर आपको अपनी टोपी बचानी है तो उसके लिये आपको स्वदेशी ढंग से ही प्रयास करना चाहिये। यह स्कूटर और पैट्रोल तो पाश्चात्य सभ्यता की देन है।’
दीपक बापू बोले-‘अच्छा, ठीक है! वैसे तुम्हें हमने अपने पीछे आने की दावत को नहीं दी थी। हम अपने मार्ग पर पैदल ही जा रहे थे।’
फंदेबाज ने कहा-‘हमने सोचा कोई दूसरी परेशानी है पर यह टोपी बचाने की समस्या ऐसी नहीं है कि हम आपके उसूलों के खिलाफ जाकर मदद करें। हां, आप चलते रहिये पीछे से हम स्कूटर पर धीरे धीरे आते रहेंगे। जब आप दूरे होंगे तो स्कूटर चलाते हुए आयेंगे। फिर रुक जायेंगे पर लौटते हुए जरूर वापस लायेंगे क्योंकि टोपी बचाने जैसा अहम विषय तब नहीं रहेगा।’
दीपक बापू फिर अपनी राह चले। रास्ते में ही उन्होंने देखा कि आलोचक महाराज एक पान की दुकान पर खड़े थे। वहां रास्ता बदलने की गुंजायश नहीं थी। तब उन्होंने दायें चलने की बजाय बायें किनारे से चलने का निर्णय लिया, मगर आलोचक महाराज की नज़र उन पर पड़ ही गयी। वह ऊं ऊं कर उनको बुलाते रहे पर दीपक बापू अनसुनी कर आगे बढ़ गये मगर पीछे से आ रहे फंदेबाज ने आगे स्कूटर खड़ा कर दिया और कहा-‘अरे, आलोचक महाराज आपको बुला रहे हैं। उनसे मिला करो, हो सकता है कि आपकी कुछ कवितायें अखबारों में छपवा दें। उनकी बहुत जान पहचान बहुत है। हो सकता है कभी कोई सम्मान वगैरह भी दिलवा दें।’
दीपक बापू ने आखें तरेरी-‘तुम्हें सब मालुम है फिर काहे आकर हमें उनसे मजाक में उलझा रहे हो।’
फंदेबाज ने भी उनकी बात को अनसुना कर दिया, बल्कि वह आलोचक महाराज की तरफ हाथ उठाकर इशारा कर बताने लगा कि उसने उनका संदेश उनके शिकार तक पहुंचा दिया है। दीपक बापू ने आलोचक महाराज को देखा और फिर पीछे लौटकर उनके पास गये और बड़े आदर से बोले-‘आलोचक महाराज नमस्कार! बड़े भाग्य जो आपके दर्शन हुए।’
आलोचक महाराज ने उंगली से रुकने का इशारा किया और थूकने के लिये थोड़ी दूर गये और फिर लौटे और बोले-‘मालुम है कि तुम हमारी कितनी इज्जत करते हो! हमारी पीठ पीछे तुम्हारी बयानीबाजी भी हम तक पहुंच जाती है। अगर हमारी इज्जत कर रहे होते तो तुम इस कदर फ्लाप नहीं हुए होते। इतने साल हो गये लिखते हुए पर इतनी अक्ल नहीं आयी कि जब तक हम जैसों की सेवा नहीं करोगे तब लेखन जगत में अपना नाम नहीं कमा सकते। घिसो अपनी उंगलियां, देखते हैं कब तक घिसते हो?’
दीपक बापू बोले-‘‘आपका कहना सही है पर अपनी रोटी की जुगाड़ के पास इतना समय भी बड़ा मुश्किल से मिल पाता है कि लिखें। अब या तो हम लिखें नहीं या फिर पुराने लिखे को लेकर इधर उधर डोलते फिरें कि ‘भईये, हमारा लिखा हुआ पढ़ो और छापो, नहीं पढ़ते तो हमसे सुनो’। आपकी सेवा का सुअवसर हमें कभी कभार ही मिल पाता है। अब आप ही बताईये कि क्या करें कि हमारा जीवन धन्य हो जाये!’
आलोचक महाराज बोले-‘अभी तो हमारी सेवा नहीं करनी पर एक सम्मेलन हो रहा है। तीन दिन तक चलेगा। अब तुम तो जानते हो कि आजकल धूल कितनी है। इसलिये हर दिन कुर्सियों की झाड़ पौंछ के लिये कपड़ा चाहिये। हमने सोचा तुम्हारे यहां पुरानी धोतियां होंगी। वह जरा भिजवा देना।’
इससे पहले दीपक बापू कुछ बोलते, बीच में फंदेबाज बोल पड़ा-‘महाराज, कुछ सम्मेलन की इज्जत का ख्याल भी करो। यह धोती पहनते हुए उसका कचूमर निकाल देते हैं। वह इतनी पुरानी है कि धूल के कण क्या हटेंगे, बल्कि उनकी मार से इनकी धोती के टुकड़े होकर गिरने लगेंगे।’
आलोचक महाराज ने फंदेबाज की तरफ गुस्से में देखा और कहा-‘देखो, हम तुम्हारे बारे में इतना ही जातने हैं कि तुम इसके ऐसे दोस्त हो जो अनेक बार इनकी टोपी उछालते हो जिससे व्यथित होकर यह हास्य कवितायें लिखते हैं। यह धोती खींचने वाला काम हमारे सामने मत करो। यह काम केवल हमारा है।’’
दीपक बापू बोले-‘महाराज, अब आप इसे छोड़े। मैं आपको एक नहंी पंद्रह धोतियां भिजवा दूंगा। कुछ पुरानी टोपियां भी रखी हैं। वह इस काम में लेना।’
आलोचक महाराज बोले-‘‘‘फिर तुमने हमारे साथ चालाकी की! धोती को देखकर कोई नहीं पूछेगा कि वह कहां से आयी? टोपी देख कर कोई भी सवाल कर सकता है तब तुम्हारा नाम पता चल जायेगा। इस तरह तुम अपना नाम कराना चाहते हो।’
दीपक बापू हंसकर बोले-‘क्या बात करते हैं महाराज! हमने कभी आपके साथ क्या किसी के साथ भी चालाकी की है? आपके पास प्रमाण हो तो बता दें। कब है सम्मेलन?’’
आलोचक महाराज बोले-तीन बाद है! पर तुम क्यों पूछ रहे हो? क्या वहां आकर लोगों कों बताओगे कि तुम्हारी पुरानी धोतियां झाड़ने पौंछने के लिये यहां लायी गयी हैं। ऐ भईये, तुम उधर झांकना भी मत, चाहे धोतियां दो या नहीं। भई, हमने तो यह सोचा कि चलो सम्मेलन वालों का भी काम हो जाये और तुम्हारे घर का सामान भी ठिकाने लग जाये। वैसे पुरानी धोतियों का होता भी क्या है? उन पर तो पुराने कपड़े लेने वाले कोई सामान भी नहीं देते। इस तरह तुम्हारे घर की भी सफाई हो जायेगी।’
फंदेबाज को अपना अपमान बहुत बुरा लगा था और बाद में दीपक बापू उसकी हंसी न उड़ायें इसलिये आलोचक महाराज से प्रशंसा पाने की गरज से बोला-’आप कहें तो वहां अपनी पुराने पैंट शर्ट भी भिजवा दूं।’
आलोचक महाराज ने कहा-‘तुमसे कहा था न कि चुप रहो! अरे, यह पैंट शर्ट सामा्रज्यवाद की पहचान है, जिसे अंग्रेज यहां छोड़ गये। हम तो कुर्ता पायजामा वाले ठेठ सभ्य भारतीय हैं। तुम मसखरी मत करो।’
इधर दीपक बापू ने उनसे कहा-‘मसखरी तो आप हमसे कर रहे है। हमने भला उस सम्मेलन में आने की बात कब कही? अरे ऐसे सम्मेलन थकेले, बुझेले, अकड़ेले और अठखेले लोगों के मिलन को ही कहा जाता हैं। हम इस श्रेणी में नहीं आते। लेखन हमारा व्यवसाय नहीं शौक है! आपको पुरानी धोतियां भिजवा देंगे। नमस्कार, अब चलता हूं।’
दीपक बापू चल पड़े तो पींछे से फंदेबाज भी आ गया और बोला-‘चलो, दीपक बापू। उन आलोचक महाराज ने आपको दुःखी किया इसलिये मेरा दायित्व बनता है कि आपको स्कूटर बिठाकर ले चलूं।’
दीपक बापू बोले-‘उन आलोचक महाराज ने हमारी टोपी बख्श दी, यही हमारे लिये बहुत है। अब तुम भी रास्ता नापो। अपनी टोपी हम खुद बचा लेंगे।’
फंदेबाज बोला-‘ठीक है, पर यह थकेले, बुझेले, अकड़ेले, और अठखेले लोगों से क्या आशय था?
‘नहीं मालुम!’यह कहते हुए दीपक बापू आगे बढ गये-‘अब यह कभी अगली किश्त में बतायेंगे जब तुम हमारी टोपी पर संकट पैदा करोंगे?’

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रौशनी की कीमत-छोटी हिंदी कहानी (value of light-hindi short story


बड़े शहर के विशाल मकान में रहने वाला वह शख्स एक दिन बरसात के दिनों मे गांव की ओर जाने वाली पगंडडी पर पानी मे अंधेरे में कांपते हुए कदम रखता हुआ आगे बढ़ रहा था। दरअसल शाम के समय वह बस मुख्य सड़क पर उतरा था उस समय बरसात धीरे शुरु हुई थी। उसे गांव जाना था जिसका रास्ता एक पगडंडी थी। बरसात के कारण वह वहीं खड़ी एक दुकान पर कुछ देर खड़ा हो गया। जब बरसात बंद हो गयी तो उसने वहां दुकानदार गांव का रास्ता पूछा तो पगडंडी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि‘यहां से एक मील दूर जाने पर वह गांव आ जायेगा।
वह गांव वहां से कम से कम चार किलोमीटर दूर था। इधर सूरज भी एकदम डूबने वाला था। वह जल्दी जल्दी चल पड़ा कुछ दूर जाने पर उसे कीचड़ दिखाई दी पर वह सूखी जमीन पर कदम रखता हुआ आगे बढ़ रहा था। इधर सूरज भी पूरी तरह से डूब गया। अंधेरे में उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। दूर दूर रौशनी भी नहीं दिख रही थी। चारों तरफ पेड़ और छोटे पहाड़ के पीछे छिपे उस गांव की तरफ जाते हुए उसका हृदय अब कांपने लगा था। अनेक जगह वह फिसला। अपने जूत भी उसे अपने हाथ में ले लिये ताकि फिसल न जाये। रास्ते में वह अनेक बार चिल्लाया-‘कोई है! कोई मेरी आवाज सुन रहा है।’
वह फिसलता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। एक समय तो उसे लगा कि उसका अब कहीं गिरकर अंत हो जायेगा
वह अब पीछे नहीं लौट सकता था क्योंकि मुख्य सड़क बहुत दूर थी और वह आशा कर रहा था कि बहुत जल्दी गांव आ जायेगा। अब तो उसे यह भी पता नहीं चला रहा था कि गांव होगा कहां? कोई कुछ बताने वाला नहीं था।
न दिशा का ज्ञान न रास्ते का। चलते चलते अचानक वह एक झौंपड़ी के निकट पहुंच गया। वहां एक मोमबती चल रही थी। उसे देखकर उस शख्स ने राहत अनुभव की। वहां खड़े एक आदमी से उसने उस गांव का रास्ता पूछा- उस आदमी ने इशारा करके बताया और उससे कहा-‘आपके चिल्लाने की आवाज तो आ रही थी पर मेरी समझ में नहीं आ रहा था। अब गांव अधिक दूर नहीं है। बरसात बंद हो गयी है। मैं मोमबती लेकर खड़ा हूं आप निकल जाईये थोड़ी देर में आपको वहां रौशनी दिखाई देगी। बिजली नहीं भी होगी तो भी लोगों की लालटेन या मोमबतियां जलती हुई दिखाई देंगी।’
वह मोमबती लेकर खड़ा। उसकी रौशनी में उसे पूरा मार्ग दिखाई दिया। कीचड़ थी पर वहां से निकलने के लिये कुछ सूखी जमीन भी दिखाई दी। वह धीरे धीरे चलकर गांव में अपने रिश्तेदार के यहां पहुंच गया।
रिश्तेदार ने कहा-‘हमें आपके घर से फोन आया था कि आप आ रहे हैं। इतनी देर न देखकर चिंता हो रही थी। आपने हमें इतला दी होती तो हम लेने मुख्य सड़क पर आ जाते। यह रास्ता खराब है। इतने अंधेरे में आप कैसे पहुंचे।’
उस शख्स ने आसमान में देखा और कहा-‘सच तो यह है कि इस अंधेरे से वास्ता नहीं पड़ता तो रौशनी का मतलब समझ में नहीं आता। शहर में हम इतनी रौशनी बरबाद करते हैं एक बूंद रौशनी की कीमत ऐसे अंधेरे में ही पता लगती है।’
वह रिश्तेदार उसकी तरफ देखने लगा। उसने लंबी सांस भरकर फिर कहा-‘एक मोमबती की बूंद भर रौशनी ने जो राहत दी उसे भूल नहीं सकता। जाओ, पानी ले आओ।’
वह रिश्तेदार उस शख्स का चेहरा गौर से देख रहा था जो आसमान में देखकर कुछ सोच रहा था।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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माँगा जो हिसाब-हास्य व्यंग और कविता (hisab-hindy hasya vyang aur kavia)


दीपक बापू अपने घर से बाहर निकले ही थे कि सेवक ‘सदाबहार’जी मिल गये। दीपक बापू ने प्रयास यह किया कि किसी तरह उनसे बचकर निकला जाये इसलिये इस मुद्रा में चलने लगे जैसे कि किसी हास्य कविता के विषय का चिंतन कर रहे हों जिसकी वजह से उनका ध्यान सड़क पर जा रहे किसी आदमी की तरफ नहीं है। मगर सदाबहार समाज सेवक जी हाथ में कागज पकड़े हुए थे और उनका काम ही यही था कि चलते चलते शिकार करना। वह कागज उनके रसीद कट्टे थे जिसे लोग पिंजरा भी कहते हैं।
‘‘ऐ, दीपक बापू! किधर चले, इतना बड़ी हमारी देह तुमको दिखाई नहंी दे रही। अरे, हमारा पेट देखकर तो तीन किलोमीटर से लोग हमको पहचान जाते हैं और एक तुम हो कि नमस्कार तक नहीं करते।’उन्होंने दीपक बापू को आवाज देकर रोका
उधर दीपक बापू ने सोचा कि’ आज पता नहीं कितने से जेब कटेगी?’
उन्होंने समाज सेवक जी से कहा-‘नमस्कार जी, आप तो जानते हो कि हम तो कवि हैं इसलिये जहां भी अवसर मिलता है कोई न कोई विषय सोचते हैं। इसलिये कई बार राह चलते हुए आदमी की तरफ ध्यान नहीं जाता। आप तो यह बतायें कि यह कार यात्रा छोड़कर कहां निकल पड़े?’
सेवक ‘सदाबहार’जी बोले-अरे, भई कार के बिना हम कहां छोड़ सकते हैं। इतना काम रहता है कि पैदल चलने का समय ही नहीं मिल पाता पर समाज सेवा के लिये तो कभी न कभी पैदल चलकर दिखाना ही पड़ता है। कार वहां एक शिष्य के घर के बाहर खड़ी की और फिर इधर जनसंपर्क के लिये निकल पड़े। निकालो पांच सौ रुपये। तुम जैसे दानदाता ही हमारा सहारा हो वरना कहां कर पाते यह समाज सेवा?’
दीपक बापू बोले-‘किसलिये? अभी पिछले ही महीने तो आपका वह शिष्य पचास रुपये ले गये था जिसके घर के बाहर आप कार छोड़कर आये हैं।’
सेवक ‘सदाबहार’-अरे, भई छोटे मोटे चंदे तो वही लेता है। बड़ा मामला है इसलिये हम ले रहे हैं। उसने तुमसे जो पचास रुपये लिये थे वह बाल मेले के लिये थे। यह तो हम बाल और वृद्ध आश्रम बनवा रहे हैं उसके लिये है। अभी तो यह पहली किश्त है, बाकी तो बाद में लेते रहेंगे।’
दीपक बापू ने कहा-‘पर जनाब! आपने सर्वशक्तिमान की दरबार बनाने के लिये भी पैसे लिये थे! उनका क्या हुआ?
सदाबहार जी बोले-‘अरे, भई वह तो मूर्ति को लेकर झगड़ा फंसा हुआ है। वह नहीं सुलट रहा। हम पत्थर देवता की मूर्ति लगवाना चाहते थे पर कुछ लोग पानी देवता की मूर्ति लगाने की मांग करने लगे। कुछ लोग हवा देवी की प्रतिमा लगवाने की जिद्द करने लगे।’
दीपक बापू बोले-‘‘तो आप सभी की छोटी छोटी प्रतिमायें लगवा देते।’
सदाबहार जी बोले-कैसी बात करते हो? सर्वशक्तिमान का दरबार कोई किराने की दुकान है जो सब चीजें सजा लो। अरे, भई हमने कहा कि हमने तो पत्थर देवता के नाम से चंदा लिया है पर लोग हैं कि अपनी बात पर अड़े हुए हैं। इसलिये दरबार का पूरा होना तो रहा। सोचा चलो कोई दूसरा काम कर लें।’
दीपक बापू बोले-पर सुना है कि उसके चंदे को लेकर बहुत सारी हेराफेरी हुई है। इसलिये जानबूझकर झगड़ा खड़ा किया गया है। हम तो आपको बहुत ईमानदार मानते हैं पर लोग पता नहीं आप पर भी इल्जाम लगा रहे हैं। हो सकता है कि आपके चेलों ने घोटाला किया हो?
सदाबहार जी एक दम फट पड़े-‘क्या बकवाद करते हो? लगता है कि तुम भी विरोधियों के बहकावे मंें आ गये हो। अगर तुम्हें चंदा न देना हो तो नहीं दो। इस संसार में समाज की सेवा के लिये दान करने वाले बहुत हैं। तुम अपना तो पेट भर लो तब तो दूसरे की सोचो। चलता हूं मैं!’
दीपक बापू बोले-हम आपकी ईमानदारी पर शक कर रहे हैं वह तो आपके चेले चपाटों को लेकर शक था!
सदाबहार जी बोले-ऐ कौड़ी के कवि महाराज! हमें मत चलाओ! हमारे चेले चपाटों में कोई भी ऐसा नहीं है। फिर हमारे विरोधी तो हम पर आरोप लगा रहे हैं और तुम चालाकी से हमारे चेलों पर उंगली उठाकर हमें ही घिस रहे हो! अरे, हमारे चेलों की इतनी हिम्मत नहीं है कि हमारे बिना काम कर जायें।’
दीपक बापू बोले-‘मगर मूर्ति विवाद भी तो उन लोगों ने उठाया है जो आपके चेले हैं। हमने उनकी बातें भी सुनी हैं। इसका मतलब यह है कि वह आपके इशारे पर ही यह विवाद उठा रहे हैं ताकि दरबार के चंदे के घोटाले पर पर्दा बना रहे।’
सर्वशक्तिमान बोले-‘वह तो कुछ नालायक लोग हैं जिनको हमने घोटाले का मौका नहीं दिया वही ऐसे विवाद खड़ा कर रहे हैं। हमसे पूछा चंदे के एक एक पैसे का हिसाब है हमारे पास!
दीपक बापू बोले-‘तो आप उसे सार्वजनिक कर दो। हमें दिखा दो। भई, हम तो चाहते हैंें कि आपकी छबि स्वच्छ रहे। हमें अच्छा नहीं लगता कि आप जो भी कार्यक्रम करते हैं उसमें आप पर घोटाले का आरोप लगता है।
सदाबहार जी उग्र होकर बोले-‘देखो, कवि महाराज! अब हम तो तुम से चंदा मांगकर कर पछताये। भविष्य में तो तुम अपनी शक्ल भी नहीं दिखाना। हम भी देख लेंगे तो मुंह फेर लेंगे। अब तुम निकल लो यहां से! कहां तुम्हारे से बात कर अपना मन खराब किया। वैसे यह बात तुम हमारे किसी चेले से नहीं कहना वरना वह कुछ भी कर सकता है।’
सदाबहार जी चले गये तो दीपक बापू ने अपनी काव्यात्मक पंक्तियां दोहराई।
हमारी कौड़ियों से ही उन्होंने
अपने घर सजाये
मांगा जो हिसाब तो
हमें कौड़ा का बता दिया।
खता बस इतनी थी हमारी कि
हमने सच का बयां किया।’
————
कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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सम्मान का भ्रम-हिन्दी हास्य व्यंग्य (samman ka bhram-hasya vyangya)


दीपक बापू तेजी से अपनी राह चले जा रहे थे कि पान की एक दुकान के पास खड़े आलोचक महाराज ने उनको आवाज देकर पुकारा-‘अरे, ओए फ्लाप कवि कहां जा रहे हो, कहीं सम्मान वम्मान का जुगाड़ करना है क्या?’
दीपक बापू चैंक गये। दायें मुड़कर देखा तो साक्षात आलोचक महाराज खड़े थे। दीपक बापू उनको देखकर उतावली के साथ बोले-‘आलोचक महाराज, आप अपनी घर से इतनी दूर यहां कैसे पधारे? हमारे लिये तो यही सम्मान है कि आपने हमें पुकारा। धन्य भाग हमारे जो इस इलाके की सीमा तक ही आपका पदार्पण तो हुआ। वरना आप जैसा साहित्यक महर्षि कहां इतनी दूर से यहां आयेगा? चलिये हुजूर हमारे घर को भी पवित्र कर दीजिये जो यहां से केवल तीन किलोमीटर दूर है।’
आलोचक महाराज ने पास ही नाली में पहले थूका फिर बोले-‘जब भी करना, घटिया बात ही करना! ऐसे भी साहित्यक महर्षि नहीं है कि तुम्हारे घर तक तीन किलोमीटर पैदल चलें। वैसे हमारी कार देखो उधर खड़ी है, पर अगर तुम्हें अपने घर लेकर चलना हो तो कोई अलग से इंतजाम करो।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज क्या करें, अपनी साइकिल तो घर पर ही छोड़े आये इसलिये यह संभव नहीं है कि कोई दूसरा इंतजार करें। हां, यह बताईये कि आप इधर कैसे आये, कोई सेवा हमारे लायक हो तो जरूर बतायें।’
आलोचक ने फिर दूसरी बार जाकर नाली में थूक और बोले-‘हमेशा लीचड़ बात ही करना! हम कार में बैठने वाले तुम्हारी साइकिल पर बैठकर क्या अपनी भद्द पिटवायेंगे। गनीमत समझो तुमसे बार कर रहे हैं। बहरहाल यह लो पर्चा! एक साहित्य पुस्तक केंद्र का उद्घाटन हैं। वहां जरूर आना। हमने तुम्हारी दो कवितायें एक गांव के अखबार में छपवा दी थी जिसमें अपनी समालोचना भी लिखी थी। लोगों ने हमारी समालोचना की प्रशंसा की। यह कार्यक्रम नये कवियों का परिचय कराने के लिये भी हो रहा है। तुम तो पुराने हो सोचा क्यों न उद्घाटन पर बुलाकर उनके समक्ष प्रस्तुत करें ताकि वह तुमसे कुछ सीखें।’

दीपक बापू शर्माते हुए बोले-‘क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं आप? हमारे अंदर ऐसी क्या येाग्यता है जो हम उस केंद्र का उद्घाटन करें? हम तो ठहरे एक अदना कवि! केवल कवितायें ही लिख पाते हैं। आप जैसे आलोचकों के सामने हमारी क्या बिसात? भले ही आप कहानी या कविता न लिखते हों पर साहित्य महर्षि का खिताब आपको ऐसे ही न मिला होगा। यह सम्मान कोई छोटी बात नहीं है।

अबकी बार आलोचक महाराज थूके बिना ही उनकी तरफ मुखातिब हुए और घूर घूर कर देखने लगे। अपना मुंह उनके मुंह के पास ले गये। फिर अपना हाथ उनके मस्तक पर रखा। दीपक बापू सिहर कर बोले-‘यह क्या आलोचक महाराज?’
आलोचक महाराज बोले-‘हम सोच रहे हैं कि कहीं तुम बुखार में तो घर से बाहर भाग कर नहीं आ गये। आजकल मौसम खराब है न! यह कैसी गलतफहमी पाल ली कि हम तुम्हारे इन नाकाम हाथों से किसी पुस्तक केंद्र का उद्घाटन करायेंगे। हमने तुम्हें उद्घाटन करने वाले मुख्य अतिथि के रूप में नहीं बल्कि वहां आकर कुछ किताबें खरीदो जिनको पढ़कर तुम्हें लिखने के लिये ढंगा आईडिया मिले, इसलिये बुलाया है। नये कवियों को तुम्हारा यह थोबड़ा दिखाकर बतायेंगे कि देखो इनको, ताउम्र कवितायें लिखने का प्रयास किया पर लिख नहीं सके। कभी कभी कामयाब आदमी की कामयाबी के साथ ही नाकाम आदमी की नाकामी से भी नये लोगों को सिखाने का एक अच्छा प्रयास होता है।’

दीपक बापू का चेहरा उतर गया वह बोले-‘ठीक है आलोचक महाराज, हमने कविता लिखने का प्रयास किया पर न लिख सके यह अलग बात है? मगर आपने तो कभी लिखी ही नहीं। बल्कि दूसरे लोगों की कविताओं का आलोचना करते हुए उनके कुछ हिस्सों को अपनी कविता बना डाला। हमारी कवितायें कहीं नहीं छपवायीं बल्कि हर बार टरका दिया। खैर, हमें बुरा नहीं लगा। अब चलता हूं।

आलोचक महाराज ने कहा-’नहीं! अभी रुको! मैंने अपना वक्त तुम्हें रोककर खराब नहीं किया। सुनो, यह कूपन लेकर उस दुकान पर आना। इसके लिये पांच सौ रुपया हमें दे दो। वहां इसके बदले तुम छह सौ रुपये की किताब खरीद सकते हो। वैसे मैं सोच रहा हूं कि तुम्हारी कवितायें अब शहर के अखबारों में भी छपवा दूं। तुमसे बहुत तपस्या करवा ली। लाओ, निकालो पांच सौ रुपये। वहां आकर साढ़ छह सौ रुपये किताबें खरीदना। तुम्हारे लिये पचास रुपये का फायदा करवा देंगें।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज, किताबों का तो मेरे घर पर ढेर लगा हुआ है। एक नयी अलमारी बनवा लूं तभी अब किताबें खरीद पाऊंगा। वैसे भी हम आपके पास अपनी एक किताब छपवाने के लिये पांडुलिपि लाये थे तब आपने इतनी अधिक सामग्री देखकर उसे पढ़ने से मना करते हुए कहा था कि ‘किताबों से पढ़ने योग्य पढ़ा जाये उससे अच्छा है कि उनमें लिखने योग्य कार्य किया जाये।’ आपकी बात चुभ गयी तभी से किताबें खरीदना बंद कर दिया। अब जब उनमें लिखने योग्य कर लेंगे तभी सोचेंगे।’
आलोचक महाराज ने कहा-’ठीक है! अब भूल जाना कि मैं तुम्हारी कविताओं पर आलोचना लिखकर उनको प्रकाशित करवाऊंगा।’
दीपक बापू वहां से जल्दी खिसक लिये यह सोचकर कि कहीं उनको पांच सौ रुपये की चपत न लग जाये। साथ ही उनको अपनी गलतफहमी पर भी हैरानी हो रही थी।
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हमदर्दी बेजान होकर जताते-हिंदी कविता (bezan hamdard-hindi poem


अक्सर सोचते हैं कि
कहीं कोई अपना मिल जाए
अपने से हमदर्दी दिखाए
मिलते भी हैं खूब लोग यहाँ
पर इंसान और शय में फर्क नहीं कर पाते.
हम अपने दर्द छिपाते
लोग उनको ही ढूंढ कर
ज़माने को दिखाने में जुट जाते
कोई व्यापार करता
कोई भीख की तरह दान में देता
दिल में नहीं होती पर
पर जुबान और आखों से दिखाते.
हमदर्दी होती एक जज़्बात
लोग बेजान होकर जताते.
दूसरे के जख्म देखकर मन ही मन मुस्कराते.
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नापसंद लेखक, पसंदीदा आशिक-हिन्दी हास्य कविता (rejected writer-hindi hasya kavita)


आशिक ने अपनी माशुका को
इंटरनेट पर अपने को हिट दिखाने के लिये लिए
अपने ब्लाग पर
पसंद नापसंद का स्तंभ
एक तरफ लगाया।
पहले खुद ही पसंद पर किल्क कर
पाठ को ऊपर चढ़ाता था
पर हर पाठक मूंह फेर जाता था
नापसंद के विकल्प को उसने लगाया।
अपने पाठों पर फिर तो
फिकरों की बरसात होती पाया
पसंद से कोई नहीं पूछता था
पहले जिन पाठों को
नापसंद ने उनको भी ऊंचा पहुंचाया।
उसने अपने ब्लाग का दर्शन
अपनी माशुका को भी कराया।
देखते ही वह बिफरी
और बोली
‘‘यह क्या बकवाद लिखते हो
कवि कम फूहड़ अधिक दिखते हो
शर्म आयेगी अगर अब
मैंने यह ब्लाग अपनी सहेलियों को दिखाया।
हटा दो यह सब
नहीं तो भूल जाना अपने इश्क को
दुबारा अगर इसे लगाया।’’

सुनकर आशिक बोला
‘‘अरे, अपने कीबोर्ड पर
घिसते घिसते जन्म गंवाया
पर कभी इतना हिट नहीं पाया।
खुद ही पसंद बटन पर
उंगली पीट पीट कर
अपने पाठ किसी तरह चमकाये
पर पाठक उसे देखने भी नहीं आये।
इस नपसंद ने बिना कुछ किये
इतने सारे पाठक जुटाये।
तुम इस जमाने को नहीं जानती
आज की जनता गुलाम है
खास लोगों के चेहरे देखने
और उनका लिखा पढ़ने के लिये
आम आदमी को वह कुछ नहीं मानती
आम कवि जब चमकता है
दूसरा उसे देखकर बहकता है
पसंद के नाम सभी मूंह फुलाते
कोई नापसंद हो उस पर मुस्कराते
पहरे में रहते बड़े बड़े लोग
इसलिये कोई कुछ नहीं कर पाता
अपने जैसा मिल जाये कोई कवि
उस अपनी कुंठा हर कोई उतार जाता
हिट देखकर सभी ने अनदेखा किया
नापसंद देखकर उनको भी मजा आया।
ज्यादा हिट मिलें इसलिये ही
यह नापसंद चिपकाया।
अरे, हमें क्या
इंटरनेट पर हिट मिलने चाहिये
नायक को मिलता है सब
पर खलनायक भी नहीं होता खाली
यह देखना चाहिये
मैं पसंद से जो ना पा सका
नापसंद से पाया।’’

इधर माशुका ने सोचा
‘मुझे क्या करना
आजकल तो करती हैं
लड़कियां बदमाशों से इश्क
मैंने नहीं लिया यह रिस्क
इसे नापसंद देखकर
दूसरी लड़कियां डोरे नहीं डालेंगी
क्या हुआ यह नापसंद लेखक
मेरा पसंदीदा आशिक है
इसमें कुछ बुरा भी समझ में नहीं आया।’
……………………………..

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हिंदी

शब्दों की जंग और बाजार-हिंदी व्यंग्य कविता (shabdon ke jang aur bazar-hindi vyangya kavita)


झगड़ा भी एक शय है जो
बड़ा पाव की तरह बाजार में बिकती।
अमन के आदी लोगों में चैन कहां
कहीं शोर देखने की चाहत उनमें दिखती।
इसलिये लिख वह चीज जो
बाजार में बड़े दाम पर बिकती।
अठखेलियां करती कवितायें
मन भाती कहानियां और
अमन के गीत लिखना है तो
अपने दिल के सुकूल के लिये लिख
शोर से दूर एक अजूबा दिख
दुनियां में उनके चाहने वाले
गुणीजनों की अधिक नहीं गिनती।
अमन का पैगाम लिखकर क्या करेगा
जब तक उसमें शोर नहीं भरेगा
सौदागरों ने रची है तयशुदा जंग
उस पर रख अपने ख्याल
जिससे बचे बवाल
सजा दिया है उन्होंने बाजार
वहां शब्दों की जंग महंगी बिकती।
सोचता है अपना
दूसरा ही है तेरा सपना
नहीं बहना विचारों की सतही धारा में
तो तू अपना ही लिख
गहरे में डूबकर नहीं ढूंढ सके मोती
वही नकली ख्याल बहा रहे हैं
सब तरफ बवाल मचा रहे हैं
अपनी सोच की गहराई में उतर जा
कभी न कभी तेरे नाम का भी बजेगा डंका
सच्चे मोती की माला
कोई यूं ही नहीं फिंकती।
………………………………

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इन्सान और सर्वशक्तिमान-हास्य व्यंग्य (bhagvan aur insan-hindi hasya vyangya


सर्वशक्तिमान ने एक नया इंसान तैयार किया और उसे धकियाने से पहले उसके सभी अंगों का एक औपचारिक परीक्षण किया। आवाज का परीक्षण करते समय वह इंसान बोल पड़ा-‘महाराज, नीचे सारे संसार का सारा ढर्रा बदल गया है और एक आप है कि पुराने तरीके से काम चला रहे हैं। अब आप इंसानों का भी पंख लगाना शुरु कर दीजिये ताकि कुछ गरीब लोग धनाभाव के कारण आकाश में उड़ सकें। अभी यह काम केवल पैसे वालों का ही रह गया।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘पंख दूंगा तो गरीब क्या अमीर भी उड़ने लगेंगे। बिचारे एयरलाईन वाले अपना धंधा कैसे करेंगे? फिर पंख देना है तो तुम्हें इंसान की बजाय कबूतर ही बना देता हूं। मेरे लिये कौनसा मुश्किल काम है?
वह इंसान बोला-‘नहीं! मैं इंसान अपने पुण्यों के कारण बना हूं इसलिये यह तो आपको अधिकार ही नहीं है। जहां तक पंख मिलने पर अमीरों के भी आसमान में उड़ने की बात है तो आपने सभी को चलने और दौड़ने के लिये पांव दिये हैं पर सभी नहीं चलते। नीचे जाकर आप देखें तो पायेंगे कि लोग अपने घर से दस मकान दूर पर स्थित दुकान से सामान खरीदने के लिये भी कार पर जाते हैं। ऐसे लोगों पर आपकी मेहरबानी बहुत है और पंख मिलने पर भी हवाई जहाज से आसमान में उड़ेंगे। मुद्दा तो हम गरीबों का है!’

सर्वशक्तिमान ने कहा-‘वैसे तुम ठीक कहते हो कि पांव देने पर भी इंसान अब उसका उपयोग कहां करता है पर फिर भी पंख देने से तुम पक्षियों का जीना हराम कर दोगे। अभी तो तुम उड़ते हुए पक्षी को ही गुलेल मारकर नीचे गिरा देते हो। फिर तो तुम चाहे जब आकाश में उड़ाकर पकड़ लोगे।’

उस इंसान ने कहा-‘ऐसा कर तो इंसान आप का ही काम हल्का करता है। वरना तो आपका यह प्रिय जीव इंसान हमेशा हीं संकट में रहेगा। इनकी संख्या इतनी बढ़ जायेगी कि इंसान भाग भाग कर आपके पास जल्दी आता रहेगा।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘अरे चुप! बड़ा आये मेरा काम हल्का करने वाले। वैसे ही तुम लोगों की वजह से हर एक दो सदी में अहिंसा का संदेश देने वाला कोई खास इंसान जमीन पर भेजना पड़ता है। वैसे तुम इंसानों ने वहां पर्यावरण इतना बिगाड़ दिया है कि नाम मात्र को पशु पक्षी भेजने पड़ते हैं। अधिक भेजे तो उनके लिये रहने की जगह नहीं बची है। सच तो यह है मुझे सभी प्रकार के जीव एक जैसे प्रिय हैं इसलिये सोचता हूं कि कुछ पशु पक्षी वहां मेरा दायित्व निभाते रहें। वह बिचारे भी मेरे नाम पर शहीद कर दिये जाते हैं इस कारण उनको अपने पास ही रखना पड़ता है। कभी सोचता हूं कि उनको दोबारा नीचे भेजूं पर फिर उन पर तरस आ जाता है। वैसे मैंने तुम इंसानों को इतनी अक्ल दी है कि बिना पंख आकाश में उड़ने के सामान बना सको।’
वह इंसान बोला-‘वह सामान तो बहुत है पर वहां पेट्रोल की वजह से एयर लाईनों में किराये बढ़े गये हैं और उसमें अमीर ही उड़ सकते हैं या आपके ढोंगी भक्त! गरीब आदमी का क्या?’

सर्वशक्तिमान ने कहा-‘गरीब आदमी जिंदा तो है न! अगर उसे पंख लगा दिये तो भी उड़ नहीं सकेगा। अभी गरीब आदमी को कहीं बैल की तरह हल में जोता जाता है और कहीं उसे घोड़े की जगह जोतकर रिक्शा खिंचवाया जाता है। अगर पंख दिये तो उसे अपने कंधे पर अमीर लोग ढोकर ले जाने पड़ेंगे। इंसान को इंसान पर अनाचार करने में मजा आता है और इस तरह तो गरीब पर अनाचार की कोई सीमा ही नहीं रहेगी। वैसे तुम क्यों फिक्र कर रहे हो।
वह इंसान बोला-‘महाराज, मैं तो बस जिंदगी भर आकाश में उड़ना चाहता हूं।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘अब तो बिल्कुल नहीं। तुम इंसानों को अक्ल का खजाना दिया है पर तुम उसका इस्तेमाल पांव से चलने पर भी नहीं कर पाते तो उड़ते हुए तो वैसे ही वह अक्ल कम हो जाती है। इतनी सारी दुर्घटनाओं के शिकार असमय ही यहां चले आते हैं और जब तक उनके दोबारा जन्म का समय न आये तब तक उनको भेजना कठिन है। उनसे पूरा पुराना अभिलेखागार भरा पड़ा है। अगर तुमको आकाश में उड़ने के लिये पंख दिये तो फिर ऐसे अनेक पुराने अभिलेखागार बनाने होंगे। अब तुम जाओ बाबा यहां से! कुछ देर बाद कहोगे कि सांप की तरह विष वाले दांत दे दो। अमीर तो अपनी रक्षा कर लेता है गरीब कैसे करेगा? जबकि उससे अधिक विष अंदर रहता ही है भले दांत नहीं दिये पर उसने तुम इंसान कहां चूकते हो।’
सर्वशक्तिमान ने उस जीव को नीचे ढकेल दिया।
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संगीत से सोच का अपहरण-आलेख(music in hindi film and tv)


किसी समय फिल्मों में पाश्र्व संगीत की सहायता से दृश्यों को भावपूर्ण बनाया जाता था। सामान्य स्थिति में दो व्यक्तियों के मध्य केवल संवाद होने पर तीसरा व्यक्ति उन पर सहजता से ध्यान देता है। अगर उनके वार्तालाप में कुछ बात अपने समझने लायक हो तो उस पर अपनी राय भी देता है। अगर वार्तालाप का विषय उसे प्रिय न हो तो वह अनसुना भी कर सकता है। चूंकि फिल्मों में दर्शक को बांधे रखना जरूरी है इसलिये उसमें संगीत इस तरह डाला जाता है कि बेकार का संवाद भी प्रभावपूर्ण हो जाता है क्योंकि जो भाव अभिनेत्री अभिनेत्री के शब्द और सुर नहीं उभार सकते वह काम संगीत कर देता है। निर्देशक इस संगीत को मसाले की तरह सजाता है ताकि दर्शक एक मिनट भी अपने दिमाग में जाकर विचार न करे।
अगर किसी संवाद में विरह रस इंगित करना है तो उसी तरह का संगीत जोड़ दिया जाता है जिससे दर्शक या श्रोता उसमें बह जाये। अगर कहीं वीभत्स रस भरना है तो उसी तरह का भयानक शोर वाला संगीत प्रस्तुत किया जाता है। कहीं करुणा का भाव है तो संगीत को इस तरह जोड़ा जाता है कि संवाद और पात्र के सुर प्रभावी न हों तो भी आदमी अपनी जज्बातों की धारा में बह जाये। जैसे जैसे मनोरंजन के साधनों का विस्तार हुआ तो रेडियो और टीवी चैनलों में भी इसका प्रयोग होने लगा है। एक तरह से पाश्र्व संगीत आम आदमी के निजी भावों का अपहरण करने वाला साधन बन गया है।
टीवी चैनलों में सामाजिक धारावाहिकों में वीभत्स सुर का खूब प्रयोग हो रहा है। कहीं सास, कहीं बहु तो कहीं ननद जब अपने मन में किसी षड्यंत्र का विचार करती दिखाई देती है तो उसके पाश्र्व में दनादन संगीत का शोर मचा रहता है जिसमें संवाद न भी सुनाई दे तो इतना तो लग जाता है कि वह कोई भला काम नहीं करने जा रही। करोड़पति बनाने वाला कार्यक्रम सभी को याद होगा। अगर उसमें संगीत के उतार चढ़ाव नहीं होता तो शायद इतने दर्शक उससे प्रभावित नहीं होते।
यह केवल टीवी चैनल ही उपयोग नहीं कर रहे बल्कि अनेक संत अपने प्रवचनों में भी अपनी बात के लिये इसका उपयोग कर रहे हैं। उस दिन एक संत देशभक्ति की बात करते हुए भावुक हो रहे थे। वह शहीदों की कुर्बानी को याद करते हुए आंखों में आंसु बहाते नजर आये। उस समय पाश्र्व में करुण रस से सराबोर संगीत बज रहा था। स्पष्टतः यह व्यवसायिकता का ही परिणाम था।
सच कहें तो यह पाश्र्व संगीत एक तरह से पैबंद की तरह हो गया है। धारावाहिकों और फिल्मों में अभिनेता अभिनेत्रियों के अभिनय से अधिक उनकी उससे अलग गतिविधियों की चर्चा अधिक होती है। हमारे अभिनेता और अभिनेत्रियां खूब कमा रहे हैं पर फिर भी उनको विदेशी कलाकारों से कमतर माना जाता है। सिफारिश के आधार पर ही लोग फिल्मों और धारावाहिकों में पहुंच रहे हैं। कहने को कलाकार हैं पर कला से उनका कम वास्ता कमाने से अधिक है। कुछेक को छोड़ दें तो अनेक हिंदी में काम करने वाले कलाकारों को तो हिंदी भी नहीं आती। अक्सर लोग यह सोचते हैं कि यह कलाकार अंग्रेजी में बोलकर हिंदी का अपमान करते हैं पर यह एक भ्रम लगता है क्योंकि उनकी पारिवारिक और शैक्षिक प्रष्ठभूमि इस बात को दर्शाती है कि उनको हिंदी का ज्ञान नहीं है। इतना ही नहीं अनेक गायक और गायिकायें ऐसे भी हैं जो केवल इसी पाश्र्व संगीत के कारण चमक जाते हैं।
देश में अनेक विवादास्पद धारावाहिकों को लेकर चर्चा होती है अगर आप गौर करें तो पायेंगे कि वह पाश्र्व संगीत के सहारे ही लोगों के जज्बातों को उभारते हैं। अगर उनमें संगीत न हो तो शायद आदमी इतना प्रभावित भी न हो और उनकी चर्चा भी न करे। यह तो गनीमत है कि समाचारों के साथ ऐसे ही किसी पाश्र्व संगीत की कोई प्रथा विदेश में नहीं है वरना हमारे समाचार चैनल उसका अनुकरण जरूर करते। अलबत्ता वह सनसनी खेज रिपोर्टों में वह इसका उपयोग खूब करते हैं तभी थोड़ी सनसनी फैलती नजर आती है। इसके अलावा वह ऐसे ही संगीतमय धारावाहिकों का प्रचार अपने कार्यक्रमों में कर संगीत की कमी को पूरा कर लेते हैं। सच कहा जाये तो पाशर्व संगीत आदमी की सोच को अपहरण करने वाला अस्त्र बन गया है।
……………………………….

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डरपोक और कमअक्ल -व्यंग्य कविता (akhri sach-hindi vyangya kavita)


डरपोक लोगों के समाज में
बहादुर बाहर से किराये पर लाये जाते हैं.
किसी गरीब को न देना पड़े मुआवजा
इसलिए किसी की कुर्बानी
कहाँ दी गयी
इससे न होता उनका वास्ता
उधार के शहीदों के गीत
चौराहे पर गाये जाते हैं.

कमअक्लों की महफ़िल में
बाहरी अक्लमंदों के
चर्चे सुनाये जाते हैं
किसी कमजोर की पीठ थपथपाने से
अपनी इज्जत छोटी न हो जाए
इसलिए उनको दिए इसके दाम
सभी के सामने सुनाये जाते हैं.
घर का ब्राह्मण बैल बराबर
ओन गाँव का सिद्ध
यूंही नहीं कहा जाता
दौलतमंदों और जागीरदारों की चौखट पर
हमेशा नाक रगड़ने वाले समाज की
आज़ादी एक धोखा लगती है
फिर भी उसके गीत गाये जाते हैं.
———————
उसने कहा ”मैं आजाद हूँ
खुद सोचता और बोलता हूँ.”
उसके पास पडा था किताबों का झुंड
हर सवाल पर
वह ढूंढता था उसमें ज़वाब
फिर सुनाते हुए यही कहता कि
‘वही आखिर सच है जो मैं कहता हूँ

————————

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