Category Archives: हिन्दू धार्मिक विचार

योग शक्ति और माया की आसक्ति के बीच स्वामी रामदेव-हिन्दी लेख (yog shakti, maya ki asakti aur swami ramdev-hindi lekh)


योग साधकों को यह समझाना व्यर्थ है कि उनको क्या करना चाहिए और क्या नहीं! अगर कोई योग शिक्षक अपने शिष्य को योग के आठों अंगों की पूर्ण शिक्षा प्रदान करे तो फिर इस बात की आवश्यकता नहीं रह जाती कि उसे वह संसार में परिवार या समाज के संभालने के तरीके भी बताये। व्यापार और राजनीति के सिद्धांत समझाये। इसका कारण यह है कि योग साधना से आदमी की समस्त इंद्रियां बाहर और अंदर तीक्ष्णता से सक्रिय रहती है। उसके चिंतन  की धार इतनी तीक्ष्ण हो जाती है कि वह सामने दृश्य देखकर अपने मस्तिष्क उसकी अगली कड़ी का अनुमान तो कर ही लेता है भूतकाल भी समझ लेता है। उसे अपनी देह, मन और बुद्धि को कुछ करने का निर्देश देने की आवयकता भी नहीं  पड़ती क्योंकि योग साधक की सभी क्रिया शक्तियां स्वाभाविक रूप से सक्रिय हो जाती हैं। अपनी धारणा शक्ति से योगसाधक अपने सामने हर गतिविधि के पीछे छिपी शक्तियों को देख लेता है-या अनुमान कर लेता है। वह वैचारिक योग की ऐसी प्रक्रिया से गुजरता है जहां उसे अपने मस्तिष्क को अधिक कष्ट देना नहंी पड़ता। हालांकि इस प्रकार के गुण पाने के लिये यह जरूरी है कि योगसाधक पतंजलि योग दर्शन तथा तथा श्रीमद्भागवत्गीता का अध्ययन करे। ऐसे में आज विश्व के सबसे प्रसिद्ध शिक्षक बाबा रामदेव का जनजागरण अभियान बहुत दिलचस्पी और चर्चा का विषय बन गया है।
एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि योग शिक्षक स्वामी रामदेव अपने कार्यक्रमों में योग से इतर विषयों पर क्यों बोलते हैं? कभी राष्ट्रवाद तो कभी धार्मिक तथा सामाजिक गतिविधियों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्हें क्या इस बात का आभास होता है कि वह किसे और क्यों समझा रहे हैं? अगर स्वामी रामदेव इसे सामान्य ढंग से अपने जन जागरण का हिस्सा समझते हुए करते हैं तो कोई बात नहीं पर अगर वह अगर उनको लगता हैं कि उनके कथनों का प्रभाव हो रहा है तो गलती कर रहे हैं। पहली बात तो यह कि अगर वह उन लोगों को समझाते हैं जो योग साधना में नियमित रूप से संलग्न नहीं हैं तो शायद जरूर इस बात को न माने पर सच यह है कि ऐसे लोग इस कान से बात सुनते हैं और दूसरे कान से निकाल देते हैं। अगर लोग ऐसे ही समझने वाले होते तो आज शायद आज के संत लोग कबीर और तुलसी के दोहे पढ़ाकर उनको ज्ञान नहीं देते। मतलब योग साधना न करने वालों को अपना प्रवचन दिया कि नहीं, सब  बराबर है पर अगर योग साधक है तो उसे कुछ बताने या समझाने की आवश्यकता ही नहीं है वह सारी बातें स्वतः ही समझन की सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
हमारे देश में हर युग मे संत रहे हैं और आज भी हैं पर आमजन में कोई चेतना नहीं है। लोग अपने सांसरिक कामों में ही लिप्त रहते हुए सुख की कामना करते हैं। उनको अपने घर में कल्पित स्वर्ग के वह सुख चाहिये जिनकी कल्पना कुछ ग्रंथों में बताई गयी है। ज्ञान को वह केवल सन्यासियों की संपत्ति मानते हैं। एक अरब के इस देश को प्रचार माध्यमों के दम पर व्यापार, उद्योग राजनीति तथा फिल्म में रूढ़ता का दौर इसलिये चल रहा है क्योंकि चंद परिवार अपने ही समाज को मूढ़ समझते हैं। उनको कोई चुनौती नहंी दे सकता। हर स्तर पर वंशवाद फैला हुआ है। समाज का निचला तबका स्वयं को असहाय अनुभव करता है। स्पष्टतः इस चेतना विहीन समाज में योग साधना ही जान फूंक सकती है और बाबा रामदेव को अगर समर्पित बुद्धिजीवियों का सतत समर्थन मिल रहा है तो केवल इसलिये कि वह इस बात को समझते हैं कि लगभग बिखर रही सामाजिक परंपराओं को बचाने या नवीन समाज बनाने की जिम्मेदारी उन्होंने ली है शायद उससे कोई विकास का दीपक प्रज्जवलित हो उठे।
अपने को देश में मिल रहे समर्थन ने स्वामी रामदेव को प्रोत्साहित किया है जिससे उनके तेवर आक्रामक हो गये हैं। इसका प्रभाव भी हो रहा है क्योंकि प्रचार माध्यमों में उनके कथन सर्वत्र चर्चित हो रहे हैं, पर उनके भविष्य में प्रभावों का अभी अनुमान करना ठीक नहीं है क्योंकि समाज में चेतना विहीन लोगों से कोई आशा नहीं की जा सकती है और योग साधना से जिनकी इंद्रियों में चेतना है उनको तो कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है। सीधी बात कहें तो बाबा रामदेव के समर्थकों की प्रचारात्मक भूख इससे शांत होती है और हमें इस पर कुछ प्रतिकूल टिप्पणियां कर उनके अभियान पर प्रश्न चिन्ह खड़ा नहीं करना।
स्वामी रामदेव को राष्ट्रवादी अभियान में सबसे बड़ी समस्या यह आने वाली है कि उनके संगठन के प्रचारात्मक मोर्चे के अकेले ही सिपाही हैं और ऐसे अभियानों के लिय कम से कम आठ से दस उनको अपने जैसे लोग चाहिये। इतना ही नहीं अभी उनको यह भी प्रमाणित करना है कि वह योग साधना की शिक्षा से लेकर राष्ट्रवादी अभियान में उन शक्तियों से परे रहे हैं जो बाज़ार और प्रचार के दम पर समाज पर नियंत्रण किये हुए हैं। यह शक्तियां धर्म, राजनीति, समाज सेवा, कला, साहित्य और मनोरंजन के क्षेत्र में अपने मुखौटे रखकर आम लोगों की भीड़ पर शासन करती है। स्वामी रामदेव एक तरफ कहते हैं कि उनके पास एक भी रुपया नहीं है, पतंजलि योग पीठ की संपत्ति तो उनके द्वारा स्थापित ट्रस्ट की है’, तो दूसरी तरफ अपने ऊपर हो रहे शाब्दिक प्रहारों के लिये खुद ही सामने आकर कहते हैं कि ‘हमारे ट्रस्ट के आर्थिक कामकाज में पूरी तरह ईमानदारी बरती जाती है।’
ऐसे में कुछ सवाल स्वामी रामदेव से भी पूछे जा सकते हैं कि‘जब आपके पास रुपया नहीं है और ट्रस्ट काम देख रहा है तो आप उसकी ईमानदारी का दावा कैसे कर सकते हैं, खासतौर से जब उसमें दूसरे लोग भी सक्रिय हैं। आप तो घूमते रहते हैं तब आपको क्या पता कि ट्रस्ट के अन्य कामकाजी लोग क्या करते हैं? फिर वही लोग सामने आकर इन शब्दिक हमलों का सामना क्यों नहीं करते?’
योग शिक्षा से अलग स्वामी रामदेव की अन्य गतिविधियों मे अनेक पैंच हैं। क्या बाबा रामदेव के पीछे जो संगठन या व्यक्तियों का कोई ऐसा समूह है जो उनकी छवि या लोकप्रियता का लाभ निरंतर उठाकर अपना काम साध रहा है। 12 सौ करोड़ की संपत्ति होने की बात तो स्वयं स्वामी रामदेव ने स्वयं स्वीकारी है। इतनी संपत्ति को संभालने वालों में सभी माया से बचे रहने वाले पुतले हैं यह सहजता से स्वीकार करना कठिन है। किसी भी संगठन में पैसा देखकर कोई बेईमान न हो यह मान लेना कठिन लगता है। अगर बाबा रामदेव के संगठन में सभी योग साधना में निपुण हैं तो वह उनके अलावा अन्य कोई शब्दिक आक्रमण के बचाव में क्यों नहीं आता। हर बार अपने सर्वोच्च शिखर पुरुष को आगे क्यों करते हैं?
आखिरी बात यह कि हमारा मानना है कि बाबा रामदेव को अपनी शक्ति योग साधना की शिक्षा के साथ ही राष्ट्र जागरण के अभियान में लगाना चाहिए। वह चाहें तो समसामयिक विषयों पर भी बोलें, पर अपनी शक्ति अपने ऊपर लगने वाले आरोपों के खंडन में न लगायें। उनके स्थापित ट्रस्ट के पास 12 सौ करोड़ क्या 12 लाख करोड़ की संपत्ति भी हो तो हम उसमें छेद देखने का प्रयास नहंी करेंगे कि वह तो किसी एक व्यक्ति या उनके समूह की भी हो सकती है। चूंकि स्वामी रामदेव उसकी अपने होने से इंकार करते है तो फिर उनके भक्तों के लिये वह विवाद का विषय नहीं रह जाता। इस देश में इतने सारे लोगों के पास इतनी संपत्ति है पर आम लोग उनमें कितनी दिलचस्पी लेते हैं? यह काम राज्य का है और बाबा रामदेव के अनुसार उनके स्थापित ट्रस्ट की पूरी जानकारी संबंधित विभागां को है। अगर वह अपने ट्रस्ट की आर्थिक सफाई देते रहेंगे तो यकीनन अपने अभियान से भटक जायेंगे। एक बात याद रखनी चाहिये कि इस संसार में जो बना है नष्ट होगा। पतंजलि ट्रस्ट हो या उसकी संपत्ति भी एक न एक दिन प्रकृति के नियम का शिकार होगी पर बाबा रामदेव की पहचान भारत की प्राचीन विधा योग को चर्चित बनाने तथा जन जागरण की वजह से हमेशा रहेगी। आदमी के साथ संपत्ति नहीं जाती बल्कि उसका कर्म जाता हैं। ऐसे में इतने बड़े योगी को भौतिकता को लेकर विवाद में फंसना थोड़ा अचंभित करता है। एक आम लेखक और योग साधक होने के नाते हम देश की खुशहाली की कामना करते हैं और बाबा रामदेव इसके लिये प्रयासरत हैं तो उस पर हमारी दृष्टि जाती है तब कुछ न कुछ विचार आता ही है। खासतौर से तब जब हमने छह वर्ष पूर्व जब रामदेव को योग शिक्षा के लिये एक अवतरित होते देखा था तब यह आशा नहीं थी कि वह इतना सफर तय करेंगे। उन जैसे योगी पर माया भी अपना रंग जमायेगी। माया संतों की दासी होती है पर लगता है कि स्वामी रामदेव अब इसी दासी को अपने यहां जगह देने के लिये भी अपनी सफाई आलोचकों को देते हुए साथ में जनजागरण का अभियान भी जारी रखेंगे। अलबत्ता उन पर योगमाता की कृपा है और देखना यह है कि वह किस तरह यह दोनों काम एक साथ कर पायेंगे
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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भूख और गद्दारी-हिन्दी व्यंग्य चिंतन लेख (bhookh aur gaddari-hindi vyangya chittan lekh)


प्रगतिशील और जनवादी कवियों की सामाजिक तथा राजनीतिक कविताओं पर वाहवाही कितनी भी मिलती हो पर तार्किक रूप से उनका कोई आधार नहीं होता। खासतौर से जब वह भूख, गरीबी और लाचारी से त्रस्त लोगों से क्रांति की आशा करते हैं। इतिहास के उद्धरण देकर सोये समाज को जगाने के लिये मज़दूर और गरीब को नायक बनने के लिये प्रेरित करते हैं। संभव है कुछ लोग इस बात पर नाराज हो जायें पर हमारे देश के बुद्धिजीवियों, लेखकों और अंग्रेजी शिक्षा से पढ़े लोगों ने आधुनिक युग के कुछ महानायक गढ़ लिये हैं उनके रास्ते पर चलने का दावा करते हैं। उनकी कवितायें खोखली तो निबंध कबाड़ हैं। यह बात गुस्से या निराशा में लिखी गयी हैं पर इस भय से मुक्त होकर कि जब बेईमानी और भ्रष्टाचार इस तरह खुलेआम हो रहा है और यह बुद्धिजीवी अभी भी अपनी लकीर पीट रहे हैं तब हमारा क्या कर लेंगे? इतिहास खोद रहे हैं जबकि वह एक भूलभुलैया है। दरअसल यह बात लिखने से पहले कवि नीरज की काव्यात्मक पंक्तियां दिमाग में आयी थीं जिसे शैक्षणिक पाठ में एक निबंध में पढ़ा और जिसे परीक्षा में उत्तरपुस्तिका में भी लिखा था। जहां तक हमारी स्मरण शक्ति जाती है उस पंक्ति के बाद ही लिखने के लिये कलम उठाई थी। आज उस कविता का आधा हिस्सा झूठ लगता है और लिखने के लिये ऐसी उत्तेजना पैदा हो रही है कि लगता है कि हिन्दी का आधुनिक और उत्तर आधुनिक काल केवल भ्रमवश ही चलता रहा है। याद्दाश्त के आधार पंक्तियां यह हैं।
तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है,
बाग को उजाड़ बना देती है,
ओ भूखे को देशभक्ति का उपदेश देने वालों
भूख इंसान को गद्दार बना देती है।
कवि नीरज की यह कविता उस समय बहुत अच्छी लगी थी।
एक अन्य कविता की पंक्तियां है जो शायद रघुवीर सहाय या राजेन्द्र यादव की हो सकती है जिसने हम पर बहुत प्रभाव डाला था।
हमसे तो यह धूल ही अच्छी
जो कुचले जाने पर प्रतिरोध तो करती है।
यहां बात कवि नीरज जी काव्यात्मक पंक्तियों की करें। तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है। यह सच लगता है मगर भूख इंसान को गद्दार बना देती है, इन पर एतराज है।
हम पिछले कई दिनों से देश के साथ गद्दारी करने के आरोप में पकड़े गये लोगों की बात करते हैं। इनमें से कोई भूखा नहीं है। एक तो पाकिस्तान में ही विदेश सेवा में कार्यरत एक महिला पकड़ी गयी जो वहां के सैन्य अधिकारी से प्रेम की पीगें बढ़ा रही थी। संभव है तन की हवस ने गुनाहगार बनाया हो पर उसने भी वहां पैसा कमाया जो शायद उसका मुख्य उद्देश्य था। हालांकि अब भी यह कहना कठिन है कि तन की हवस ने ऐसा किया या पैसे की लालच ने। मगर वह रोटी की भूखी नहीं थी। कम से नीरज जी की यह पंक्तियां वहां ठीक नहीं बैठती। अभी एक भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी (आई. ए. एस.) भी एक अधिकारी पकड़ा गया। वह भी कौन? जिस पर देश की आंतरिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण दायित्व था। वह भी लड़कियों की मांग करता था। लगता है जैसे कि तन की हवस ने गुनाहगार बनाया मगर उसने पैसा भी कमाया और यही उसका ध्येय था। शारीरिक भूख से अधिक पैसे की लालच ने ही उसे देश की गद्दारी करने के लिये प्रेरित किया। पैसा हो तो शारीरिक हवस मिट ही जाती है इसलिये यह कहना बेकार है कि उन्होंने केवल यौन लाभ के लिये यह सब किया। इससे पहले भी एक अधिकारी पकड़ा गया जिस पर गोपनीय दस्तावेज लीक करने का आरोप लगा।
कोई बतायेगा कि किसी रोटी के भूखे ने देश से गद्दारी की हो। जरा, कोई बतायेगा कि किसी ने रोटी के लिये किसी का कत्ल किया हो! माओवाद के नाम पर चल रही हिंसा का समर्थन करने वाले वहां के क्षेत्रों की भूख और बेकारी की समस्याओं की बहुत आड़ लेते हैं। वह बताते हैं कि भूख की वजह से पूर्व में लोग हथियार उठा रहे हैं। जब उनसे कहा जाता है कि हथियार उठाने वाले तो भूखे नहीं है तो जवाब मिलता है कि वह भूखे नंगों को बचाने के लिये प्रेरित हुए हैं इसलिये हथियार उठाये हैं।
कौन बताये कि हमारे धर्मग्रंथों में एक सीता जी भी हुईं हैं जिन्होंने अपने पति भगवान श्रीराम को बताया था कि हथियार रखने से मन में हिंसा का भाव स्वतः आता है।
उन्होंने भगवान श्री राम को एक किस्सा सुनाया। एक तपस्वी की तपस्या से देवराज इंद्र विचलित हो गये तब उन्होंने उसके पास जाकर उससे कहा कि ‘मेरा यह खड्ग अपने पास धरोहर में रूप में रख लो कुछ दिन बाद ले जाऊंगा।’
तपस्वी ने रख लिया। चूंकि देवराज इंद्र बहुत प्रतिष्ठित थे इसलिये वह तपस्वी उस खड्ग की रक्षा मनोयोग से करने लगा। धीरे धीरे उसका मन तपस्या से अधिक उस खड्ग में लग गया और अंततः वह तपस्वी से हिंसक जीव बन गया। इससे तो यही आशय निकलता है कि जब हथियार रखने भर से ही तपस्वी का हृदय बदल गया तो जो यह आम माओवादी बंदूकें या बम होने पर देवता बने रह सकते हैं। तय बात है कि इससे वह वहीं अपने ही लोगों को आतंकित करते होंगे।
प्रगतिशील और जनवादियों ने भूख पर बहुत लिखा है। भूख में क्रांति की तलाश करते हुए इन लोगों पर अब तरस आने लगा है। उन पर ही नहीं अपने पर भी अब नाराजगी होने लगी है कि क्यों उनसे प्रभावित हुए। भूखा आदमी तो धीरे धीरे शारीरिक रूप से कमजोर हो जाता है और मानसिक रूप से उसकी स्थिति यह हो जाती है कि पत्थर भी उसको रोटी लगती है। इतना ही नहीं वह घास भी खाने लगता है। वह इतना अशक्त हो जाता है कि चोरी करना और कत्ल करने की सोचना भी उसके लिये मुश्किल हो जाता है। हालांकि हमारे बुजुर्ग कहते थे कि भूख आदमी शेर से भी लड़ जाता है पर अब उस पर यकीन नहीं होता।
देश में बरसों से भूख, गरीबी, बेरोजगारी और शोषण दूर करने का अभियान चल रहा है मगर उसका प्रभाव नहीं दिखता और अनेक बुद्धिजीवी इस पर रोते गाते हैं। यह अलग बात है कि इस पर इनाम के लिये वह राज्य और पूंजीपतियों से उनको सम्मान मिलता है-वह पूंजीपति जिन पर देश के गरीब रहने का आरोप लगाते हैं। ऐसे लोग केवल झूठ बेचते हैं। भूख से गद्दारी पैदा होने का भ्रम अब दिखने लगा है। जिनके पेट भरे हैं, जिनके पास सारे सुविधायें पहले से ही हैं। रोजगार की दृष्टि से ऐसे पद कि बेरोजगार ही नहीं बल्कि बारोजगारों के लिये भी एक क सपना हो। ऐसे में वह गद्दारी कर रहे हैं। तब कौन कहता है कि भूख इंसान को गद्दार बनाती है और कौन इसे मानेगा?
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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मनुस्मृति-शांत बैठना भी एक तरह से आसन (shant rahna bhee ek tarha se asan-manu smruti in hindi)


यदावगच्छेदायत्वयामाधिक्यं ध्रृवमात्मनः।
तदा त्वेचाल्पिकां पीर्डा तदा सन्धि समाश्चयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
भविष्य में अच्छी संभावना हो तो वर्तमान में विरोधियों और शत्रुओं से भी संधि कर लेना चाहिए।


क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी मनुष्य के जीवन में दुःख, सुख, आशा और निराशा के दौर आते हैं। आवेश और आल्हाद के चरम भाव पर पहुंचने के बाद किसी भी मनुष्य का अपने पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है। भावावेश में आदमी कुछ नहीं सोच पाता। मनु महाराज के अनुसार मनुष्य को अपने विवेक पर सदैव नियंत्रण करना चाहिये। जब शक्ति क्षीण हो या अपने से कोई गलती हो जाये तब मन शांत होने लगता है और ऐसा करना श्रेयस्कर भी है। अनेक बार मित्रों से वाद विवाद हो जाने पर उनके गलत होने पर भी शांत बैठना एक तरह से आसन है। यह आसन विवेकपूर्ण मनुष्य स्वयं ही अपनाता है जबकि अज्ञानी आदमी मज़बूरीवश ऐसा करता है। जिनके पास ज्ञान है वह घटना से पहले ही अपने मन में शांति धारण करते हैं जिससे उनको सुख मिलता है जबकि अविवेकी मनुष्य बाध्यता वश ऐसा करते हुए दुःख पाते हैं।

जीवन में ऐसे अनेक तनावपूर्ण क्षण आते हैं जब आक्रामक होने का मन करता है पर उस समय अपनी स्थिति पर विचार करना  चाहिए। अगर ऐसा लगता है कि भविष्य में अच्छी आशा है तब बेहतर है कि शत्रु और विरोधी से संधि कर लें क्योंकि समय के साथ यहां सब बदलता है इसलिये अपने भाव में सकारात्मक भाव रखते स्थितियों में बदलाव की आशा रखना चाहिए।कहने का अभिप्राय यह है कि हमेशा ही शांत होकर अपना काम करना चाहिए।

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मनुस्मृति-विद्यादान अत्यंत महत्वपूर्ण (hindu dharmik vichar-vidyadan ka mahatva)


सर्वेषामेव दानानो ब्रह्मदानं विशिष्यते।
वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाञ्चगसर्मिषाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जल, अन्न, गाय, भूमि, वस्त्र, तेल, सोना घी आदि वस्तुओं के दान से अधिक महत्व विद्या दान का है।
येन यने तू भावेन सद्यद्दानं प्रयच्छति।
तत्तत्तेनैव भावेन प्राष्नोति प्रतिपूजितः।।
हिन्दी में भावार्थ-
दान देने वाला जिस भावना से देता है वैसा ही फल उसे मिलता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे अध्यात्मिक महर्षियों ने मनुष्य के लिये दान की महत्ता अनेक कारणों से स्वीकार किया है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस संसार में मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जिसके पास विवेक है इस कारण वह अपनी आवश्यकताओं से अधिक संग्रह करता है। इसी कारण कुछ मनुष्य ऐसे भी रह जाते हैं जिनकी भौतिक उपलब्धियां कम रह जाती हैं। एक संग्रह करता है तो दूसरा अभाव झेलता है। इससे समाज में वैमनस्य का भाव भी फैलता है। यही कारण है कि अधिक धनवानों को हमेशा ही दान कर समाज में अपना प्रभाव बढ़ाने के साथ ही अध्यात्मिक शांति के साथ जीवन व्यतीत करने की राय दी जाती है। दूसरी बात यह है कि मनुष्य के अलावा अन्य समस्त जीवों में विवेक की सीमा होती है। न वह संग्रह करते हैं न शोषण करते हैं न उनके पास दान करने योग्य वस्तु न लेने की चाहत। अपनी उदरपूर्ति के अलावा उनके अन्य कार्य शेष नहीं रह जाता। ऐसे में मनुष्य की अलग पहचान केवल दान करने से ही बनती है।
अपने तथा परिवार का भरण भोषण तो सभी जीव करते हैं ऐसे में अगर मनुष्य होकर भी यही किया तो कौनसा तीर मार लिया। मनुष्य की श्रेष्ठता तो इसी में ही है कि वह दूसरे जीवों की सहायत के लिये हृदय से काम करे। वस्तुओं के दान से भी अधिक है दूसरे को विद्या और ज्ञान देना। इसीलिये आज के संदर्भ में उसका भी बहुत महत्व है। अनेक लोगों ने नयी नयी तकनीकी का ज्ञान प्राप्त किया है। उनको चाहिए कि वह ऐसे मनुष्यों को उससे अवगत करायें जो उसे नहीं जानते।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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