Category Archives: हिन्दू धर्म

योग शक्ति और माया की आसक्ति के बीच स्वामी रामदेव-हिन्दी लेख (yog shakti, maya ki asakti aur swami ramdev-hindi lekh)


योग साधकों को यह समझाना व्यर्थ है कि उनको क्या करना चाहिए और क्या नहीं! अगर कोई योग शिक्षक अपने शिष्य को योग के आठों अंगों की पूर्ण शिक्षा प्रदान करे तो फिर इस बात की आवश्यकता नहीं रह जाती कि उसे वह संसार में परिवार या समाज के संभालने के तरीके भी बताये। व्यापार और राजनीति के सिद्धांत समझाये। इसका कारण यह है कि योग साधना से आदमी की समस्त इंद्रियां बाहर और अंदर तीक्ष्णता से सक्रिय रहती है। उसके चिंतन  की धार इतनी तीक्ष्ण हो जाती है कि वह सामने दृश्य देखकर अपने मस्तिष्क उसकी अगली कड़ी का अनुमान तो कर ही लेता है भूतकाल भी समझ लेता है। उसे अपनी देह, मन और बुद्धि को कुछ करने का निर्देश देने की आवयकता भी नहीं  पड़ती क्योंकि योग साधक की सभी क्रिया शक्तियां स्वाभाविक रूप से सक्रिय हो जाती हैं। अपनी धारणा शक्ति से योगसाधक अपने सामने हर गतिविधि के पीछे छिपी शक्तियों को देख लेता है-या अनुमान कर लेता है। वह वैचारिक योग की ऐसी प्रक्रिया से गुजरता है जहां उसे अपने मस्तिष्क को अधिक कष्ट देना नहंी पड़ता। हालांकि इस प्रकार के गुण पाने के लिये यह जरूरी है कि योगसाधक पतंजलि योग दर्शन तथा तथा श्रीमद्भागवत्गीता का अध्ययन करे। ऐसे में आज विश्व के सबसे प्रसिद्ध शिक्षक बाबा रामदेव का जनजागरण अभियान बहुत दिलचस्पी और चर्चा का विषय बन गया है।
एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि योग शिक्षक स्वामी रामदेव अपने कार्यक्रमों में योग से इतर विषयों पर क्यों बोलते हैं? कभी राष्ट्रवाद तो कभी धार्मिक तथा सामाजिक गतिविधियों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्हें क्या इस बात का आभास होता है कि वह किसे और क्यों समझा रहे हैं? अगर स्वामी रामदेव इसे सामान्य ढंग से अपने जन जागरण का हिस्सा समझते हुए करते हैं तो कोई बात नहीं पर अगर वह अगर उनको लगता हैं कि उनके कथनों का प्रभाव हो रहा है तो गलती कर रहे हैं। पहली बात तो यह कि अगर वह उन लोगों को समझाते हैं जो योग साधना में नियमित रूप से संलग्न नहीं हैं तो शायद जरूर इस बात को न माने पर सच यह है कि ऐसे लोग इस कान से बात सुनते हैं और दूसरे कान से निकाल देते हैं। अगर लोग ऐसे ही समझने वाले होते तो आज शायद आज के संत लोग कबीर और तुलसी के दोहे पढ़ाकर उनको ज्ञान नहीं देते। मतलब योग साधना न करने वालों को अपना प्रवचन दिया कि नहीं, सब  बराबर है पर अगर योग साधक है तो उसे कुछ बताने या समझाने की आवश्यकता ही नहीं है वह सारी बातें स्वतः ही समझन की सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
हमारे देश में हर युग मे संत रहे हैं और आज भी हैं पर आमजन में कोई चेतना नहीं है। लोग अपने सांसरिक कामों में ही लिप्त रहते हुए सुख की कामना करते हैं। उनको अपने घर में कल्पित स्वर्ग के वह सुख चाहिये जिनकी कल्पना कुछ ग्रंथों में बताई गयी है। ज्ञान को वह केवल सन्यासियों की संपत्ति मानते हैं। एक अरब के इस देश को प्रचार माध्यमों के दम पर व्यापार, उद्योग राजनीति तथा फिल्म में रूढ़ता का दौर इसलिये चल रहा है क्योंकि चंद परिवार अपने ही समाज को मूढ़ समझते हैं। उनको कोई चुनौती नहंी दे सकता। हर स्तर पर वंशवाद फैला हुआ है। समाज का निचला तबका स्वयं को असहाय अनुभव करता है। स्पष्टतः इस चेतना विहीन समाज में योग साधना ही जान फूंक सकती है और बाबा रामदेव को अगर समर्पित बुद्धिजीवियों का सतत समर्थन मिल रहा है तो केवल इसलिये कि वह इस बात को समझते हैं कि लगभग बिखर रही सामाजिक परंपराओं को बचाने या नवीन समाज बनाने की जिम्मेदारी उन्होंने ली है शायद उससे कोई विकास का दीपक प्रज्जवलित हो उठे।
अपने को देश में मिल रहे समर्थन ने स्वामी रामदेव को प्रोत्साहित किया है जिससे उनके तेवर आक्रामक हो गये हैं। इसका प्रभाव भी हो रहा है क्योंकि प्रचार माध्यमों में उनके कथन सर्वत्र चर्चित हो रहे हैं, पर उनके भविष्य में प्रभावों का अभी अनुमान करना ठीक नहीं है क्योंकि समाज में चेतना विहीन लोगों से कोई आशा नहीं की जा सकती है और योग साधना से जिनकी इंद्रियों में चेतना है उनको तो कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है। सीधी बात कहें तो बाबा रामदेव के समर्थकों की प्रचारात्मक भूख इससे शांत होती है और हमें इस पर कुछ प्रतिकूल टिप्पणियां कर उनके अभियान पर प्रश्न चिन्ह खड़ा नहीं करना।
स्वामी रामदेव को राष्ट्रवादी अभियान में सबसे बड़ी समस्या यह आने वाली है कि उनके संगठन के प्रचारात्मक मोर्चे के अकेले ही सिपाही हैं और ऐसे अभियानों के लिय कम से कम आठ से दस उनको अपने जैसे लोग चाहिये। इतना ही नहीं अभी उनको यह भी प्रमाणित करना है कि वह योग साधना की शिक्षा से लेकर राष्ट्रवादी अभियान में उन शक्तियों से परे रहे हैं जो बाज़ार और प्रचार के दम पर समाज पर नियंत्रण किये हुए हैं। यह शक्तियां धर्म, राजनीति, समाज सेवा, कला, साहित्य और मनोरंजन के क्षेत्र में अपने मुखौटे रखकर आम लोगों की भीड़ पर शासन करती है। स्वामी रामदेव एक तरफ कहते हैं कि उनके पास एक भी रुपया नहीं है, पतंजलि योग पीठ की संपत्ति तो उनके द्वारा स्थापित ट्रस्ट की है’, तो दूसरी तरफ अपने ऊपर हो रहे शाब्दिक प्रहारों के लिये खुद ही सामने आकर कहते हैं कि ‘हमारे ट्रस्ट के आर्थिक कामकाज में पूरी तरह ईमानदारी बरती जाती है।’
ऐसे में कुछ सवाल स्वामी रामदेव से भी पूछे जा सकते हैं कि‘जब आपके पास रुपया नहीं है और ट्रस्ट काम देख रहा है तो आप उसकी ईमानदारी का दावा कैसे कर सकते हैं, खासतौर से जब उसमें दूसरे लोग भी सक्रिय हैं। आप तो घूमते रहते हैं तब आपको क्या पता कि ट्रस्ट के अन्य कामकाजी लोग क्या करते हैं? फिर वही लोग सामने आकर इन शब्दिक हमलों का सामना क्यों नहीं करते?’
योग शिक्षा से अलग स्वामी रामदेव की अन्य गतिविधियों मे अनेक पैंच हैं। क्या बाबा रामदेव के पीछे जो संगठन या व्यक्तियों का कोई ऐसा समूह है जो उनकी छवि या लोकप्रियता का लाभ निरंतर उठाकर अपना काम साध रहा है। 12 सौ करोड़ की संपत्ति होने की बात तो स्वयं स्वामी रामदेव ने स्वयं स्वीकारी है। इतनी संपत्ति को संभालने वालों में सभी माया से बचे रहने वाले पुतले हैं यह सहजता से स्वीकार करना कठिन है। किसी भी संगठन में पैसा देखकर कोई बेईमान न हो यह मान लेना कठिन लगता है। अगर बाबा रामदेव के संगठन में सभी योग साधना में निपुण हैं तो वह उनके अलावा अन्य कोई शब्दिक आक्रमण के बचाव में क्यों नहीं आता। हर बार अपने सर्वोच्च शिखर पुरुष को आगे क्यों करते हैं?
आखिरी बात यह कि हमारा मानना है कि बाबा रामदेव को अपनी शक्ति योग साधना की शिक्षा के साथ ही राष्ट्र जागरण के अभियान में लगाना चाहिए। वह चाहें तो समसामयिक विषयों पर भी बोलें, पर अपनी शक्ति अपने ऊपर लगने वाले आरोपों के खंडन में न लगायें। उनके स्थापित ट्रस्ट के पास 12 सौ करोड़ क्या 12 लाख करोड़ की संपत्ति भी हो तो हम उसमें छेद देखने का प्रयास नहंी करेंगे कि वह तो किसी एक व्यक्ति या उनके समूह की भी हो सकती है। चूंकि स्वामी रामदेव उसकी अपने होने से इंकार करते है तो फिर उनके भक्तों के लिये वह विवाद का विषय नहीं रह जाता। इस देश में इतने सारे लोगों के पास इतनी संपत्ति है पर आम लोग उनमें कितनी दिलचस्पी लेते हैं? यह काम राज्य का है और बाबा रामदेव के अनुसार उनके स्थापित ट्रस्ट की पूरी जानकारी संबंधित विभागां को है। अगर वह अपने ट्रस्ट की आर्थिक सफाई देते रहेंगे तो यकीनन अपने अभियान से भटक जायेंगे। एक बात याद रखनी चाहिये कि इस संसार में जो बना है नष्ट होगा। पतंजलि ट्रस्ट हो या उसकी संपत्ति भी एक न एक दिन प्रकृति के नियम का शिकार होगी पर बाबा रामदेव की पहचान भारत की प्राचीन विधा योग को चर्चित बनाने तथा जन जागरण की वजह से हमेशा रहेगी। आदमी के साथ संपत्ति नहीं जाती बल्कि उसका कर्म जाता हैं। ऐसे में इतने बड़े योगी को भौतिकता को लेकर विवाद में फंसना थोड़ा अचंभित करता है। एक आम लेखक और योग साधक होने के नाते हम देश की खुशहाली की कामना करते हैं और बाबा रामदेव इसके लिये प्रयासरत हैं तो उस पर हमारी दृष्टि जाती है तब कुछ न कुछ विचार आता ही है। खासतौर से तब जब हमने छह वर्ष पूर्व जब रामदेव को योग शिक्षा के लिये एक अवतरित होते देखा था तब यह आशा नहीं थी कि वह इतना सफर तय करेंगे। उन जैसे योगी पर माया भी अपना रंग जमायेगी। माया संतों की दासी होती है पर लगता है कि स्वामी रामदेव अब इसी दासी को अपने यहां जगह देने के लिये भी अपनी सफाई आलोचकों को देते हुए साथ में जनजागरण का अभियान भी जारी रखेंगे। अलबत्ता उन पर योगमाता की कृपा है और देखना यह है कि वह किस तरह यह दोनों काम एक साथ कर पायेंगे
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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भूख और गद्दारी-हिन्दी व्यंग्य चिंतन लेख (bhookh aur gaddari-hindi vyangya chittan lekh)


प्रगतिशील और जनवादी कवियों की सामाजिक तथा राजनीतिक कविताओं पर वाहवाही कितनी भी मिलती हो पर तार्किक रूप से उनका कोई आधार नहीं होता। खासतौर से जब वह भूख, गरीबी और लाचारी से त्रस्त लोगों से क्रांति की आशा करते हैं। इतिहास के उद्धरण देकर सोये समाज को जगाने के लिये मज़दूर और गरीब को नायक बनने के लिये प्रेरित करते हैं। संभव है कुछ लोग इस बात पर नाराज हो जायें पर हमारे देश के बुद्धिजीवियों, लेखकों और अंग्रेजी शिक्षा से पढ़े लोगों ने आधुनिक युग के कुछ महानायक गढ़ लिये हैं उनके रास्ते पर चलने का दावा करते हैं। उनकी कवितायें खोखली तो निबंध कबाड़ हैं। यह बात गुस्से या निराशा में लिखी गयी हैं पर इस भय से मुक्त होकर कि जब बेईमानी और भ्रष्टाचार इस तरह खुलेआम हो रहा है और यह बुद्धिजीवी अभी भी अपनी लकीर पीट रहे हैं तब हमारा क्या कर लेंगे? इतिहास खोद रहे हैं जबकि वह एक भूलभुलैया है। दरअसल यह बात लिखने से पहले कवि नीरज की काव्यात्मक पंक्तियां दिमाग में आयी थीं जिसे शैक्षणिक पाठ में एक निबंध में पढ़ा और जिसे परीक्षा में उत्तरपुस्तिका में भी लिखा था। जहां तक हमारी स्मरण शक्ति जाती है उस पंक्ति के बाद ही लिखने के लिये कलम उठाई थी। आज उस कविता का आधा हिस्सा झूठ लगता है और लिखने के लिये ऐसी उत्तेजना पैदा हो रही है कि लगता है कि हिन्दी का आधुनिक और उत्तर आधुनिक काल केवल भ्रमवश ही चलता रहा है। याद्दाश्त के आधार पंक्तियां यह हैं।
तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है,
बाग को उजाड़ बना देती है,
ओ भूखे को देशभक्ति का उपदेश देने वालों
भूख इंसान को गद्दार बना देती है।
कवि नीरज की यह कविता उस समय बहुत अच्छी लगी थी।
एक अन्य कविता की पंक्तियां है जो शायद रघुवीर सहाय या राजेन्द्र यादव की हो सकती है जिसने हम पर बहुत प्रभाव डाला था।
हमसे तो यह धूल ही अच्छी
जो कुचले जाने पर प्रतिरोध तो करती है।
यहां बात कवि नीरज जी काव्यात्मक पंक्तियों की करें। तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है। यह सच लगता है मगर भूख इंसान को गद्दार बना देती है, इन पर एतराज है।
हम पिछले कई दिनों से देश के साथ गद्दारी करने के आरोप में पकड़े गये लोगों की बात करते हैं। इनमें से कोई भूखा नहीं है। एक तो पाकिस्तान में ही विदेश सेवा में कार्यरत एक महिला पकड़ी गयी जो वहां के सैन्य अधिकारी से प्रेम की पीगें बढ़ा रही थी। संभव है तन की हवस ने गुनाहगार बनाया हो पर उसने भी वहां पैसा कमाया जो शायद उसका मुख्य उद्देश्य था। हालांकि अब भी यह कहना कठिन है कि तन की हवस ने ऐसा किया या पैसे की लालच ने। मगर वह रोटी की भूखी नहीं थी। कम से नीरज जी की यह पंक्तियां वहां ठीक नहीं बैठती। अभी एक भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी (आई. ए. एस.) भी एक अधिकारी पकड़ा गया। वह भी कौन? जिस पर देश की आंतरिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण दायित्व था। वह भी लड़कियों की मांग करता था। लगता है जैसे कि तन की हवस ने गुनाहगार बनाया मगर उसने पैसा भी कमाया और यही उसका ध्येय था। शारीरिक भूख से अधिक पैसे की लालच ने ही उसे देश की गद्दारी करने के लिये प्रेरित किया। पैसा हो तो शारीरिक हवस मिट ही जाती है इसलिये यह कहना बेकार है कि उन्होंने केवल यौन लाभ के लिये यह सब किया। इससे पहले भी एक अधिकारी पकड़ा गया जिस पर गोपनीय दस्तावेज लीक करने का आरोप लगा।
कोई बतायेगा कि किसी रोटी के भूखे ने देश से गद्दारी की हो। जरा, कोई बतायेगा कि किसी ने रोटी के लिये किसी का कत्ल किया हो! माओवाद के नाम पर चल रही हिंसा का समर्थन करने वाले वहां के क्षेत्रों की भूख और बेकारी की समस्याओं की बहुत आड़ लेते हैं। वह बताते हैं कि भूख की वजह से पूर्व में लोग हथियार उठा रहे हैं। जब उनसे कहा जाता है कि हथियार उठाने वाले तो भूखे नहीं है तो जवाब मिलता है कि वह भूखे नंगों को बचाने के लिये प्रेरित हुए हैं इसलिये हथियार उठाये हैं।
कौन बताये कि हमारे धर्मग्रंथों में एक सीता जी भी हुईं हैं जिन्होंने अपने पति भगवान श्रीराम को बताया था कि हथियार रखने से मन में हिंसा का भाव स्वतः आता है।
उन्होंने भगवान श्री राम को एक किस्सा सुनाया। एक तपस्वी की तपस्या से देवराज इंद्र विचलित हो गये तब उन्होंने उसके पास जाकर उससे कहा कि ‘मेरा यह खड्ग अपने पास धरोहर में रूप में रख लो कुछ दिन बाद ले जाऊंगा।’
तपस्वी ने रख लिया। चूंकि देवराज इंद्र बहुत प्रतिष्ठित थे इसलिये वह तपस्वी उस खड्ग की रक्षा मनोयोग से करने लगा। धीरे धीरे उसका मन तपस्या से अधिक उस खड्ग में लग गया और अंततः वह तपस्वी से हिंसक जीव बन गया। इससे तो यही आशय निकलता है कि जब हथियार रखने भर से ही तपस्वी का हृदय बदल गया तो जो यह आम माओवादी बंदूकें या बम होने पर देवता बने रह सकते हैं। तय बात है कि इससे वह वहीं अपने ही लोगों को आतंकित करते होंगे।
प्रगतिशील और जनवादियों ने भूख पर बहुत लिखा है। भूख में क्रांति की तलाश करते हुए इन लोगों पर अब तरस आने लगा है। उन पर ही नहीं अपने पर भी अब नाराजगी होने लगी है कि क्यों उनसे प्रभावित हुए। भूखा आदमी तो धीरे धीरे शारीरिक रूप से कमजोर हो जाता है और मानसिक रूप से उसकी स्थिति यह हो जाती है कि पत्थर भी उसको रोटी लगती है। इतना ही नहीं वह घास भी खाने लगता है। वह इतना अशक्त हो जाता है कि चोरी करना और कत्ल करने की सोचना भी उसके लिये मुश्किल हो जाता है। हालांकि हमारे बुजुर्ग कहते थे कि भूख आदमी शेर से भी लड़ जाता है पर अब उस पर यकीन नहीं होता।
देश में बरसों से भूख, गरीबी, बेरोजगारी और शोषण दूर करने का अभियान चल रहा है मगर उसका प्रभाव नहीं दिखता और अनेक बुद्धिजीवी इस पर रोते गाते हैं। यह अलग बात है कि इस पर इनाम के लिये वह राज्य और पूंजीपतियों से उनको सम्मान मिलता है-वह पूंजीपति जिन पर देश के गरीब रहने का आरोप लगाते हैं। ऐसे लोग केवल झूठ बेचते हैं। भूख से गद्दारी पैदा होने का भ्रम अब दिखने लगा है। जिनके पेट भरे हैं, जिनके पास सारे सुविधायें पहले से ही हैं। रोजगार की दृष्टि से ऐसे पद कि बेरोजगार ही नहीं बल्कि बारोजगारों के लिये भी एक क सपना हो। ऐसे में वह गद्दारी कर रहे हैं। तब कौन कहता है कि भूख इंसान को गद्दार बनाती है और कौन इसे मानेगा?
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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संत कबीरदास-संत लोग मान अपमान के भाव से परे होते हैं (sant kabir das-man aur apman se pare hote sant)


निर्बेरी निहकामता, स्वामी सेती नेह।
विषया सो न्यारा रहे, साधुन का मत येह।।
संत कबीरदास जी का कहना है कि किसी से विवाद न करे, बैर न पाले और किसी विषया या वस्तु में कामना न रखे वहर सच्चे संत हैं। संतों का विषयों से प्रेम नहीं होता बल्कि उनका सारा ध्यान तो परमात्मा की भक्ति पर ही केंद्रित होता है।
मान अपमान न चित्त धरै, औरन का सनमान।
जो कोई आशा करै, उपदेशै तेहि ज्ञान।।
संत कबीर दास का मानना है कि संत लोग मान और अपमान को अपने हृदय में स्थान नहीं देते। वह सभी को सम्मान देते हैं और कोई आशा लेकर आये तो उसका उचित मार्गदर्शन करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग सवाल पूछते हैं कि सही गुरु कैसे ढूंढा जाये? ज्ञान तो अनेक कथित संतों ने रट लिया है और वह उसका व्यवसायिक उपयोग अपने प्रवचनों में करते हैं। दक्षिणा लेकर अनेक शिष्य वह बनाते हैं। उनमें अनेक शिष्य बाद में अपने गुरु का व्यवहारिक सत्य देखकर निराश हो जाते हैं। अनेक लोग कथित पेशेवर संतों को देखकर यह भी कहते हैं कि‘ आजकल सच्चे गुरु मिलते कहां हैं? फिर हमें उनकी पहचान भी तो नहीं पता।’
संतों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह स्थिरप्रज्ञ होते हैं। उनका हृदय केवल भक्ति में लीन रहता है। सांसरिक विषयों में वह निर्लिप्त भाव से सक्रिय रहते हुए मान अपमान का विचार नहीं करते। वह अपशब्द बोलने वाले की बातों को अनसुना कर उनसे भी सद्व्यवहार करते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वह अपने निष्काम कम के बदले कोई दक्षिणा या उपहार स्वीकार नहीं करते। अतः ऐसे ही लोगों को गुरु मानकर चलना चाहिए।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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भर्तृहरि नीति शतक-वाणी और धन के रोगियों से दूर रहें (bhartrihari neeti shatak-vani aur dhna ke rogi se door rahem)


पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
भूश्ययां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षधद्राणामविवेकमूढ़मनसां यन्नश्वाराणां सदा
वित्तव्याधिविकार विह्व्लगिरां नामापि न श्रूयते।।
हिन्दी में भावार्थ-
भर्तृहरि महाराज अपने प्रजाजनों से कहते हैं कि अब तुम लोग पवित्र फल फूलों खाकर जीवन यापन करो। सजे हुए बिस्तर छोड़कर प्रकृति की बनाई शय्या यानि धरती पर ही शयन करो। वृक्ष की छाल को ही वस्त्र बना लो लो। अब यहां से चले चलो क्योंकि वहां उन मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों का नाम भी सुनाई नहीं देगा जो अपनी वाणी और संपत्ति से रोगी होने के कारण अपने वश में नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में तीन प्रकार के लोग पाये जाते हैं-सात्विक, राजस और तामस! श्रेष्ठता का क्रम जैसे जैस नीचे जाता है वैसे ही गुणी लोगों की संख्या कम होती जाती है। कहने का अभिप्राय यह है कि तामस प्रवृत्ति की संख्या वाले लोग अधिक हैं। उनसे कम राजस तथा उनसे भी कम सात्विक होते हैं। धन का मद न आये ऐसे राजस और सात्विक तो देखने को भी नहीं मिलते। जिन लोगों को भगवान ने वाणी या जीभ दी है वह उससे केवल आत्मप्रवंचना या निंदा में नष्ट करते हैं। किसी को नीचा दिखाने में अधिकतर लोगों को मज़ा आता है। किसी की प्रशंसा कर उसे प्रसन्न करने वाले तो विरले ही होते हैं। इस संसार के वीभत्स सत्य को ज्ञानी जानते हैं इसलिये अपने कर्म में कभी अपना मन लिप्त नहीं करते।
विलासित और अहंकार लिप्त इस संसार में में यह तो संभव नहीं है कि परिवार या अपने पेट पालने का दायित्व पूरा करने की बज़ाय वन में चले जायें, अलबत्ता अपने ऊपर नियंत्रण कर अपनी आवश्यकतायें सीमित करें और अनावश्यक लोगों से वार्तालाप न करें। उससे भी बड़ी बात यह कि परमार्थ का काम चुपचाप करें, क्योंकि उसका प्रचार करने पर लोग हंसी उड़ा सकते हैं। सन्यास का आशय जीवन का सामान्य व्यवहार त्यागना नहीं बल्कि उसमें मन के लिप्त न होने देने से हैं। अपनी आवश्यकतायें कम से कम करना भी श्रेयस्कर है ताकि हमें धन की कम से कम आवश्यकता पड़े। जहां तक हो सके अपने को स्वस्थ रखने का प्रयास करें ताकि दूसरे की सहायता की आवश्यकता न करे। इसके लिये योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान करना एक अच्छा उपाय है।

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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
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मनुस्मृति-अन्य लोगों का अपमान करने वाली नष्ट होता है (admi ka apman na karen-manu smriti)


सुखं द्वावमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते।
सुखं चरति लोकेऽस्मिनन्मन्ता विनश्तिं

हिन्दी में भावार्थ-अन्य व्यक्तियों द्वारा अपमान किये जाने पर उनको माफ करने वाला मनुष्य सुखी की नींद लेनें के साथ संसार में सहजता से विचरता है परंतु दूसरों का अपमान करने वाला मनुष्य स्वयं ही नष्ट होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन को अगर दृष्टा भाव से देखा जाये तो यकीनन उसके प्रति सहजता का बोध होता है। मान और अपमान से परे होकर विचार करें तो फिर जीवन का एक अलग ही मजा है। श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि गुण ही गुणों में तथा इंद्रिया ही इंद्रियों में बरत रही हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि देह पर जो तत्व प्रभाव डालते हैं उनको अमृतमय या विष से व्याप्त होने का प्रभाव भी मनुष्य पर पड़ता है। जो गंदा खाते पीते हैं उनकी वाणी और विचार उसी अनुरूप होते हैं इसलिये उनसे सद्व्यवहार की अपेक्षा ज्ञानियों को नहीं करना चाहिए। अगर वह अपमान करते हैं तो उसकी अनदेखी कर देना ही उचित है। क्योंकि अगर उनका प्रतिकार उनकी शैली में ही किया जाये तो अपना ही रक्तचाप भी बढ़ जाता है। फिर स्वयं वाणी में कटुता और आंखों में विष व्याप्त होता जाता है। इसलिये अच्छा यही है कि अपने अपमान करने वालों को माफ कर दें। उसके बाद चिंतन और ध्यान करें तो इस बात का अहसास होगा कि हमने ठीक किया।
एक बात निश्चित यह है कि हर आदमी को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है और जो दूसरों का अपमान करते हैं वह तनाव की अग्नि में स्वयं का मन और तन जलाते हैं। उनकी शक्ति और बुद्धि धीरे धीरे पतन की तरफ बढ़ती है और अंततः नष्ट हो जाते हैं। अतः अपने मन में क्षमा का भाव हमेशा धारण करना चाहिए।

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श्रीगुरुग्रंथ साहिब से-परमात्मा को कोई स्थापित नहीं कर सकता (shri gurugranth sahib-parmatma kee sthapna)


मनि साचा मुखि साचा सोइ।
अवर न पेखै ऐकस नि कोइ।
नानक इह लक्षण ब्रह्म गिआनी होइ।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस मनुष्य के मन और मुख का निवास होता है वह परमात्मा के अलावा कुछ नहीं देखता और किसी अन्य के सामने माथा नहीं टेकता।
थापिआ न जाइ कीता न होई, आपे आपि निरंजन सोइ।
हिन्दी में भावार्थ-
परमात्मा न तो कहीं स्थापित नहीं किया जा सकता है और बनाया जाता है। वह तो वह स्वयं ही निर्मित है।
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-श्री गुरुनानक जी ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता पर तो प्रहार किये ही साथ ही धर्म के लेकर लोगों के अंदर रहने वाले अहंकार भाव को भी रेखांकित किया है। सभी मनुष्य को अपना एक इष्ट होता है। हमारे देश में तो यह परंपरा भी रही है कि एक ही परिवार के सदस्यों का इष्ट अलग अलग होता है। हालांकि इसे लेकर अनेक लोग प्रतिकूल टीका टिप्पणियां करते हैं पर यह उनके अज्ञान का प्रमाण है। दरअसल पूरा देश ही निरंकार परमात्मा का उपासक रहा है पर सुविधा के लिये हर भक्त अपने लिये अपने मन के अनुसार किसी एक स्वरूप की पूजा करता है। जो ज्ञानी है वह तो निरंकार रूप का ही स्मरण करते हैं पर जो सामान्य मनुष्य है वह मूर्तियों के द्वारा उपासना कर अपना मन संतुष्ट करते हैं। इस पर विवाद नहीं होना चाहिऐ।
मुश्किल यह है कि हर कोई अपने स्वरूप को श्रेष्ठ बताकर दूसरे की मजाक उड़ाता है या आलोचना करता है। उससे भी ज्यादा बुरी बात यह है कि कुछ कथित ज्ञानी ऐसे भी हैं जो सभी स्वरूपों को एक बताकर अपने ही स्वरूप की पूजा दूसरे पर थोपते हैं यह कहते हुए कि हमारा धर्म तो एक ही है। कोई शिव का भक्त है तो कोई राम का या कृष्ण पर जब ऐसे भक्तों से माता या गणेश जी की मूर्तियों की झांकियों या कार्यक्रमों के नाम पर चंदा वसूलने का दबाव धार्मिक एकता के नाम पर बनाया जाता है तब कुछ लोगों का मन नाखुश हो जाता है। यही स्थिति उन लोगो की भी है जो निष्काम भाव से भगवान को भजते हैं और उन पर सकाम भक्ति-मंदिर या प्रवचनों में शामिल होना-करने के लिये दबाव बनाया जाता है।
कुछ लोगों के यह भ्रम है कि वह भगवान का नाम लेते हैं तो उनके दबदबे को सभी माने। धन, पद तथा बाहुबल के सहारे लोग भले ही दूसरों पर अपनी भक्ति का रौब जरूर गांठते हैं पर सच यही है कि परमात्मा की भक्ति किसी पर थोपी नहीं जा सकती। मुख्य बात यह है कि यह स्मरण स्वयं ही हृदय से करना चाहिये न कि दूसरे पर प्रभाव डालने के लिये।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें (kotilaya ka arthashastra-safalta ke liye janvirodhi kaam na karen)


आयत्याञ्प तदात्वे च यत्स्यादास्वादपेशलम्।
तदेव तस्य कुर्वीत न लोकद्विष्टमाचरेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
भविष्य की अच्छी संभावनाओं को देखते हुए बुद्धिसे जो कार्य करने में अच्छा लगे वही प्रारंभ करे परंतु कभी भी सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें।
श्लाघ्या चानन्दनीया च महतामुफ्कारिता।
करले कल्याणगायत्ते स्वल्पापि सुमहोदयम्।
हिन्दी में भावार्थ-
उच्च पुरुषों का उपकार कर्म अत्यंत प्रिय तथा आनंदमय लगता है वह अगर किसी का भी थोड़ा कल्याण करते हैं तो उसका महान उदय होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर मनुष्य में पूज्यता और अहंकार का भाव होता है। जब किसी को धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो फूलकर कुप्पा नहीं समाता और कई लोगों का तो मन ही विचलित हो जाता है। शक्ति आने पर ही अनेक लोग संतुष्ट नहीं होते बल्कि उसका प्रभाव समाज पर दृष्टिगोचर हो और वह डरे इसी उद्देश्य से कुछ लोग अपने बड़प्पन का दुरुपयोग करने लगते हैं। आजकल हम देख सकते है कि देश में अमीरों, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोगों का आतंक पूरे समाज पर दिखाई देता है। शक्तिशाली वर्ग के लोग अपनी शक्ति से छोटों को संरक्षण देने की बजाय अपनी शक्ति का उपयोग उनको दबाकर आत्म संतुष्टि कर लेते हैं। यही कारण है कि समाज में वैमनस्य का भाव बढ़ रहा है।
हम अनेक लोगों का उनके धन, पद और बल की वजह से बड़ा मान लेते हैं पर सच यह है कि वह समाज का भला करना नहीं जानते। बड़े आदमी की थोड़ी कृपा से छोटे आदमी प्रसन्न हो सकत हैं पर इसको समझने की बजाय उसे कुचलकर अपने आप को खुश करना चाहते हैं।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को न छाया मिले, पथिक को फल लागे अति दूर-यह कहावत अधिकतर बड़े लोगों पर लागू होती है। ऐसे लोगों को बड़ा मानना ही एक तरह से गलत है। बड़ा आदमी तो वह है जो लोकहित में अपनी शक्ति का उपयोग करता है न कि जनविरोधी काम करके अपने अहंकार की संतुष्टि! अतः धल, उच्च पद या बाहूबल होने पर छोटे और कमजोर आदमी को संरक्षण देना चाहिये ताकि समाज को एक नई दिशा मिल सके।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-प्रभाव बढ़ने के साथ शत्रु भी बढ़ते हैं (kautilya ka arthshastra-prabhav aur shatru)


न जातु गच्छेद्धिश्वासे सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान।
अद्रोहसमयं कृत्यां वृत्रमिन्द्रः पुरात्त्वद्यीत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अगर किसी कारणवश किसी से संधि भी की जाये तो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ‘मैं वैर नहीं करूंगा’ यह कहकर भी इन्द्र ने वृत्रासुर को मार डाला था।
विकारं याति पुत्रो हि राज्यान्नीचः पिता तथा।
तल्लोकवृत्तांन्नृपतेरन्यद्वृत्नं प्रचक्षते।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस प्रकार के व्यवहार से पुत्र तथा पिता नीच हो जाता है राजा का ऐसा व्यवहार लोक व्यवहार से भिन्न है। 
ज्यायांसं सिंहः साहसं यथं मध्नाति दन्तिनः।
तस्मार्तिह इवोदग्रमात्मानं वीक्ष्ण सम्पतेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
शक्तिशाली सेना को साथ लिए शत्रु को युद्ध में मारने पर राजा का प्रभाव बढ़ता है। इसी प्रताप के कारण सभी जगह उसके दूसरे शत्रु भी पैदा होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जीवन अद्भुत है और रहस्यमय भी। मनुष्य को अन्य जीवों से अधिक बुद्धि वरदान में मिली है और वही उसकी सबसे शत्रु और मित्र भी है। जहां पशु पक्षी तथा अन्य जीव मनुष्य के एक बार मित्र हो जाते हैं तो फिर शत्रुता नहीं करते मगर स्वयं मनुष्य ही एक विश्वसनीय जीव नहीं है। वह परिस्थितियों के अनुसार अपनी वफादारी बदलता रहता है। अतः यह कहना कठिन है कि कोई मित्र अपने संकट निवारण या स्वार्थ सिद्धि का अवसर आने पर विश्वासघात नहीं करेगा। ऐसे में किसी शत्रु से संधि हो या मित्र से नियमित व्यवहार की पक्रिया उसमें कभी स्थाई विश्वास की अपेक्षा नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा एक बात यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे के प्रति कठोरता या हिंसा का व्यवहार न करें। अनेक बार मनुष्य अपने को प्रभावशाली सिद्ध करने के लिये अपने से हीन प्राणी पर अनाचार करता है या फिर हमला कर उसे मार डालता है। इससे अन्य मनुष्य डर अवश्य जाते हैं पर मन ही प्रभावशाली आदमी के प्रति शत्रुता का भाव भी पाल लेते हैं। समय आने पर प्रभावशाली आदमी जब संकट में फंसता है तो वह उनका मन प्रसन्न हो जाता है। इसलिये जहां तक हो सके क्रूर तथा हिंसक व्यवहार से बचना चाहिए।
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पतंजलि योग सूत्र-स्मृति और संस्कारों का रूप एक जैसा (patanjali yog darshan in hindi-sankar aur manushya ki smriti)


जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानष्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्।।
हिन्दी में भावार्थ-
पतंजलि योग सूत्र के अनुसार जाति, देश काल इन तीनों से संपर्क टूटने पर भी स्वाभाविक कर्म संस्कारों में बाधा नहीं आती क्योंकि स्मृति और संस्कारों का एक ही रूप होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम इस श्लोक में योग के संस्कारिक रूप को समझ सकते हैं। जब मनुष्य बच्चा होता है तब उसके अपने घर परिवार, रिश्तेदारी, विद्यालय तथा पड़ौस के लोगों से स्वाभाविक संपर्क बनते हैं। वह उनसे संसार की अनेक बातें ऐसी सीखता है जो उसके लिये नयी होती हैं। वह अपने मन और बुद्धि के तत्वों में उन्हें स्वाभाविक रूप से इस तरह स्थापित करता है जीवन भर वह उसकी स्मृतियों में बनी जाती हैं। कहा भी जाता है कि बचपन में जो संस्कार मनुष्य में आ गये फिर उनसे पीछा नहीं छूटता और न छोड़ना चाहिए क्योंकि वह कष्टकर होता है।
यही कारण है कि माता पिता तथा गुरुओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। संभव है बाल्यकाल में अनेक बच्चे उनकी शिक्षा पर ध्यान न दें पर कालांतर में जब वह उनकी स्थाई स्मृति बनती है तब वह उनका मार्ग प्रशस्त करती है। इसलिये बच्चों के लालन पालन में मां की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण मानी गयी है क्योंकि बाल्यकाल में वही अपने बच्चे के समक्ष सबसे अधिक रहती है और इसका परिणाम यह होता है कि कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जो अपनी मां को भूल सके।
इसलिये हमारे अध्यात्मिक संदेशों में अच्छी संगत के साथ ही अच्छे वातावरण में भी निवास बनाने की बात कहीं जाती है। अक्सर लोग कहते हैं कि पास पड़ौस का प्रभाव मनुष्य पर नहीं पड़ता पर यह गलत है। अनेक बच्चे तो इसलिये ही बिगड़ जाते हैं क्योंकि उनके बच्चे आसपास के गलत वातावरण को अपने अंदर स्थापित कर लेते हैं।
यही नहीं आज के अनेक माता पिता बाहर जाकर कार्य करते हैं और सोचते हैं कि उनका बच्चा उनकी तरह ही अच्छा निकलेगा तो यह भ्रम भी उनको नहीं पालना चाहिये क्योंकि किसी भी मनुष्य की प्रथम गुरु माता की कम संगत बच्चों को अनेक प्रकार के संस्कारों से वंचित कर देती है। ऐसे लोग सोचते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर ठीक हो जायेगा या हम उसे संभाल लेंगे तो यह भी भ्रामक है क्योंकि जो संस्कार कच्चे दिमाग में स्मृति के रूप में स्थापित करने का है वह अगर निकल गया तो फिर अपेक्षायें करना निरर्थक है। युवा होने पर दिमाग पक्का हो जाता है और सभी जानते हैं कि पक्की मिट्टी के खिलोने नहीं बन सकते-वह तो जैसे बन गये वैसे बन गये। दरअसल हम जिससे संस्कार कहते हैं वह प्रारम्भिक काल में स्थापित स्मृतियों का विस्तार ही हैं इसलिये अगर हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे बच्चे आगे चलकर वह काम करें जो हम स्वयं चाहते हैं तो उसकी शिक्षा पहले ही देना चाहिए। यह स्मृतियां इस तरह की होती हैं कि देश, काल तथा जाति से कम संपर्क रहने न बिल्कुल न होने पर भी बनी रहती हैं और मनुष्य अपने संस्कारों से भ्रष्ट नहीं होता है अगर किसी लोभवश वह अपना पथ छोड़ता भी है तो उसे भारी कष्ट उठाना पड़ता है और फिर अपने स्थान पर वापस आता है।
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मनुस्मृति-भोजन के लिये जाति या गौत्र के नाम का उपयोग उचित नहीं (bhojan prapt karne ke liye-manu smriti in hindi)


उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः।
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नांदिदायिजः।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार जो निर्बुद्धि मनुष्य अच्छे खाने की लालच में दूसरे स्थान पर जाकर आतिथ्य सत्कार पाने का प्रयास करता है वह अगले जन्म में अन्न खिलाने वाले मनुष्यों के घर में पशु का रूप धारण कर रहता है।
न भोजनार्थ स्वे विप्र कुलगोत्रे निवेदयेत्।
भोजनार्थ हि ते शंसन्न्वान्ताशीत्युच्यते बुधैः।।
हिन्दी में भावार्थ-
किसी भी ज्ञानी आदमी को कहीं से खाना प्राप्त करने के लिये अपने कुल या जाति की सहायता नहीं लेना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति वान्ताशी यानि उल्टी किए गऐ भोजन को खाने वाला माना जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की जीभ स्वाद के लालायित रहती है। जो ज्ञानी लोग भोजन को केवल पेट भरने के लिये मानते हैं वह तो हर प्रकार के भोजन में संतुष्ट हो जाते हैं पर पेट भरना ही जीवन मानते हैं वह अच्छे खाने के लिये इधर उधर मुंह मारते हैं। जीवन के लिये भोजन आवश्यक है पर कुछ लोग तो भोजन को ही जीवन मानकर उसके पीछे फिरते हैं। ऐसे लोग हमेशा भूखे रहते हैं और अपने घर के खाने को विष समझकर इधर उधर ताकते रहते हैं। एसे लोगों की बुद्धि अत्यंत निकृष्ट होती है।
भोजन हमें इस उद्देश्य से ग्रहण करना चाहिये कि उससे हमारे शरीर को नियमित ऊर्जा मिलती रहे। भोजन में ऐसे पदार्थ ग्रहण करना चाहिए जो भले ही स्वादिष्ट न हों पर सुपाच्य होना चाहिए। जीभ के स्वाद के चक्कर में अज्ञानी लोग ऐसे पदार्थ ग्रहण करते हैं जो पेट के लिए हानिकारक हैं। आजकल हम देख भी रहे है कि स्वादिष्ट पदार्थों के सेवन से बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है। इसलिये सुपाच्य पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कर ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।
उसी तरह भोजन प्राप्त करने के लिऐ कभी अपने कुल या गौत्र का नहीं लेकर सदाशयी गृहस्थ की सद्भावना पर ही निर्भर रहना चाहिए। जो लोग अपने भोजन के लिये कुल या जाति का आसरा लेते हैं वह ऐसे ही होते हैं जैसे कि उल्टी का भोजन करने वाले पशु होते हैं।
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श्री गुरवाणी-मांगने वाले गुरु के चरण स्पर्श न करें (mangne vale ke charan sparsh na karen-shri gurvani in hindi)jsa


‘पर का बुरा न राखहु चीत।
तम कउ दुखु नहीं भाई मीत।
हिन्दी में भावार्थ-
दूसरे के अहित का विचार मन में भी नहीं रखना चाहिये। दूसरे के हित का भाव रखने वाले मनुष्य के पास कभी दुःख नहीं फटकता।
‘गुरु पीरु सदाए मंगण जाइ।
त के मूलि न लगीअै पाई।।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब की वाणी के अनुसार कुछ लोग अपने को गुरु और पीर कहते हुए अपने भक्तों से धन आदि की याचना करते हैं ऐसे लोगों के पांव कभी नहीं छूना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- महान संत भगवान श्री गुरुनानक देव जी ने अपने समय में देश में व्याप्त अंधविश्वास और रूढ़िवादिता पर जमकर प्रहार कर केवल अध्यात्मिक ज्ञान की स्थापना का प्रयास किया। उनके समकालीन तथा उनके बाद भी अनेक संत और कवियों ने धर्म के नाम पर पाखंड का जमकर प्रतिकार किया पर दुर्भाग्यवश इसके बावजूद भी हमारे देश में अंधविश्वास का अब भी बोलाबाला है। इतना ही अनेक संत कथित रूप से गुरु या पीर बनकर अपने भक्तों का दोहन करते हैं। हैरानी की बात यह है कि आजकल उनके जाल में अनपढ़ या ग्रामीण परिवेश के काम बल्कि शिक्षित लोग अधिक फंसते हैं। आज से सौ वर्ष पूर्व तक तो अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता के लिये देश की अशिक्षा तथा गरीबी को बताया जाता था मगर आजकल तो धनी और शिक्षित वर्ग अधिक जाल में फंसता है और हम जिनको अनपढ़, अनगढ़ और गंवार कहते हैं वही समझदार दिखते हैं।
आधुनिक शिक्षा में अध्यात्मिक ज्ञान को स्थान नहीं मिलता। लोग तकनीकी तथा उच्च शिक्षा को सर्वोपरि मानते हैं पर मन की शांति और अध्यात्मिक ज्ञान के लिये वह ऐसे अनेक ढोंगियों महात्माओं और संतों के जाल में फंस जाते हैं जो खुलेआम पैसा मांगने के साथ ही धर्म का खुलेआम व्यापार करते हैं। आश्चर्य तब होता है जब उच्च शिक्षा प्राप्त और धनीवर्ग उनके चरण स्पर्श करने के लिये भागता नज़र आता है।
जीवन में खुश रहने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि सबके हित की कामना करें। किसी के लिये बुरा विचार मन में न लायें। कभी कभी तो यह भी होता है कि जैसा अब दूसरे के लिये बुरा सोचते हैं वैसा ही अपने साथ ही हो जाता है। अतः सभी के लिये अच्छा सोचा जाये ताकि अपने साथ भी अच्छा हो।
आजकल अनेक ऐसे गुरु हैं जो खुलेआम अपने शिष्यों से आर्थिक भेंट मांगते हैं। इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो धन से ही धर्म की रक्षा का नारा देकर भक्तों के अंदर दान की भावना पैदा कर उसका दोहन करते हैं। सच बात तो यह है कि आदमी धर्म की रक्षा तभी कर सकता है जब उसके पास ज्ञान हो और उसके लिये जरूरी है कि स्वयं ही धार्मिक पुस्तको का एकांत में चिंतन कर ज्ञान प्राप्त किया किये जाये। भेंट या दक्षिण मांगने वाले गुरु कुछ देर तक हृदय में मनारंजन का भाव पैदा कर सकते हैं पर उससे मनुष्य के मन में स्थिरता नहीं आती।
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भर्तृहरि नीति शतक-मणि के बावजूद विषधर किसी को प्रिय नहीं होता (mani aur vish-bhartrihari neeti shatak)


आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
हिन्दी में भावार्थ- जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
हिन्दी में भावार्थ- इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो  तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्द्ध  में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है। पड़ौस तथा कार्यस्थलों में हमारा संपर्क अनेक ऐसे लोगों से होता है जिनके प्रति हमारे हृदय में क्षणिक आत्मीय भाव पैदा हो जाता है। वह भी हमसे बहुत स्नेह करते हैं पर यह यह संपर्क नियमित संपर्क के कारण मौजूद हैं।  उन कारणों के परे होते ही-जैसे पड़ौस छोड़ गये या कार्य का स्थान बदल दिया तो-उनसे मानसिक रूप से दूरी पैदा हो जाती है।  इस तरह यह बदलने वाली मित्रता वास्तव में सत्य नहीं होती। मित्र तो वह है जो दैहिक रूप से दूर होते भी हमें स्मरण करता है और हम भी उसे नहीं भूलते। इतना ही नहीं समय पड़ने पर उनसे सहारे का आसरा मिलने की संभावना रहती है।  अतः स्थितियों का आंकलन कर ही किसी को मित्र मानकर उससे आशा करना चाहिये। जहां तक हो सके दुष्ट और स्वार्थी लोगों से मित्रता नहीं करना चाहिये जो कि कालांतर में घातक होती है।उसी तरह अपने व्यक्तित्व का भी निर्माण इसी तरह करना चाहिए कि वह दूसरों को प्रिय लगे।
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पतंजलि योग सूत्र-समाधि के मध्य में विषयों का ज्ञान पूर्व संस्कारों की वजह से आता है (patnjali yog sootra-samdhi pad)


द्रष्टृदृश्यघोपरक्तं चितं सर्वार्थम्
हिन्दी में भावार्थ-
द्रष्टा और दृश्य-इन दो रंगों से रंगा चित्त सभी अर्थवाला हो जाता है।
तदंसख्येयवासनाभिश्चिन्नमपि परार्थ संहृत्यकारित्वात।
हिन्दी में भावार्थ-
वह चित्त असंख्येय वासनाओं से चित्रित होने पर भी दूसरे के लिए है क्योंकि वह सहकारिता के भाव से काम करने वाला है।
विशेषंषर्शिन आत्मभावभावनविनिवृत्तिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
चित्त और आत्मा के भेद को प्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष करने वाले योगी की आत्माभावविषयक भावना सर्वथा निवृत्त हो जाती है।
तदा विवेनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्।
हिन्दी में भावार्थ-
उस समय चित्त विवेक की तरफ झुककर कैवल्य के अभिमुख हो जाता है।
तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्राणि संसकारेभ्यंः।
हिन्दी में भावार्थ-
उसके अंतराल में दूसरे पदार्थों का ज्ञान पूर्वसंस्कारों से होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-महर्षि पतंजलि का योग सूत्र संस्कृत में है और उसके हिन्दी अनुवाद का अर्थ इतना किल्ष्ट होता है कि सीधी भाषा में बहुत कम विद्वान उसकी व्याख्या कर पाते हैं। हम यहां सीधी सादी भाषा में कहें तो हमारा चित्त या बुद्धि इस देह के कारण है और उसे आत्मा समझना अज्ञान का प्रमाण है। हमारे मन और बुद्धि में विचारों का क्रम आता जाता है जो केवल सांसरिक विषयों से संबंधित होता है। अध्यात्मिक विषयों के लिये हमें अपने अंदर संकल्प धारण करना पड़ता है और जब हम आत्मा और मन का अंतर समझ लेंगे तो दृष्टा की तरह जीने का आनंद ले पायेंगे।
एक तो संसार का दृश्य है और दूसरा वह दृष्टा आत्मा है जिसके बीच में यह देह स्थित है। पंच तत्वों से बनी इस देह की मन, बुद्धि तथा अहंकार की प्रकृतियों को अहंता, ममता और वासना की भावनायें बांधे रहती हैं। हम दृष्टा हैं पर कर्तापन का अहंकार कभी यह बात समझने नहीं देता। तत्वज्ञान के अभाव मनुष्य को दूसरा चतुर मायावी मनुष्य चाहे जब जहां हांक कर ले जाता है। इस संसार दो प्रकार के मनुष्य है एक वह जो शासक हैं दूसरे जो शासित हैं। निश्चित रूप से शासक चतुर मायावी मनुष्यों की संख्या कम और शासित होने वाले लोगों की संख्या अधिक है पर अगर तत्वज्ञान को जो समझ लें तो वह न तो शासक बनता है न शासित। योगी बनकर अपना जीवन आंनद से व्यतीत करता है।
एक बात दूसरी यह भी है इस विश्व में मनुष्य मन के चलने के दो ही मार्ग हैं-सहज योग और असहज योग। योग तो हर मनुष्य कर रहा है पर जो बिना ज्ञान के चलते हैं वह सांसरिक विषयों में चक्कर में अपना जीवन तबाह कर लेते हैं और जो ज्ञानी हैं वह उसे संवारते रहते हुए सुख अनुभव करते हैं। अतः आत्मा और चित्त का भेद समझना जरूरी है।
दूसरी बात हम समाधि या ध्यान के विषय में यह भी समझ लें कि जब हम उसमें लीन होने का प्रयास करते हैं तब हमारे अंदर विषयों का घेर आने लगता है। उनसे विचलित नहीं होना चाहिए क्योंकि यह उन विषयों से उत्पन्न विकार हैं जो उस समय भस्म होने आते हैं। जब वह पूरी तरह से भस्म होते हैं तब ध्यान आसानी से लग जाता है। ध्यान से जो मन को शांति मिलती है उससे बुद्धि में तीक्ष्णता आती है और प्रसन्न हो जाता है।
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पतंजलि योग साहित्य-निर्विचार समाधि से बुद्धि ऋतंभरा होती (patanjali yoga sahitya-nirvichar samadhi)


पतंजलि योग सूत्र एक संपूर्ण विज्ञान है। जिसमें अनेक श्लोक हैं और उनका अर्थ बहुत छोटा लगता है पर उनका प्रभाव अत्यंत व्यापक है। सच तो यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान अत्यंत संक्षिप्त होता है पर अगर उनके बताये मार्ग पर चला जाये तो जीवन सहज हो जाता है।
निर्विचारवैशारद्योऽध्यात्मप्रसादः।।
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा।।
हिन्दी में भावार्थ-
निर्विचार समाधि अत्यंत निर्मल होने पर अध्यात्मप्रसाद प्राप्त होता है। उस समय बुद्धि ऋतंभरा अर्थात किसी वस्तु के सत्य स्वरूप को ग्रहण करने वाली होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जाग्रत हो या निद्रा में उसके अंदर विचारों का क्रम चलता रहता है। मस्तिष्क का एक भाग दिन में सक्रिय रहता है जो रात में सुप्तावस्था को प्राप्त होता है। मस्तिष्क के दूसरे भाग से मनुष्य दिन में काम नहीं लेता पर वह रात को स्वप्न देखता है। वैज्ञानिक तथ्य तो यह है कि मनुष्य अपने मस्तिष्क का केवल पांच प्रतिशत भाग ही उपयोग करता है भले ही उसकी सक्रियता अधिक दिखती है।
कहने का मतलब है कि मस्तिष्क कभी विराम नहीं करता। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अगर रात के स्वप्न अगर सुबह याद रहें तो इसका मतलब यह है कि आप ने पूरी तरह से निद्रा का सुख प्राप्त नहीं किया।
सच बात तो यह है कि अगर कोई रात को सपना आये तो सुबह उसे याद करने का प्रयास तक नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे मस्तिष्क में अनावश्यक तनाव होता है। इससे बचने का एक ही उपाय है कि समय मिलने पर ध्यान लगाया जाये जिसकी चरम परिणति निर्विचार समाधि के रूप में होती है। जिस तरह शरीर में भोजन आदि ग्रहण किये पदार्थ योगसन से पूरी तरह बाहर विसर्जित किये जाते हैं उसी तरह समाधि से मस्तिष्क में व्याप्त चिंताओं का निराकरण किया जा सकता है। पुताई के लिये जिस तरह सारे घर का सामान बाहर निकालना आवश्यक है उसी तरह मस्तिष्क से विचारों का कचड़ा निकालने के लिये ध्यान लगाना जरूरी है।
जब ध्यान लगाते हैं तब मस्तिष्क में विचारों का क्रम चलता है पर इसकी परवाह न करते हुए अपनी दृष्टि भृकुटि पर ही रखना चाहिए। धीरे धीरे स्वतः लगने लगेगा कि मस्तिष्क में विचारों का क्रम थमता जा रहा है। जब ध्यान में विचारशून्यता की स्थिति उत्पन्न हो तब समझना चाहिये कि मस्तिष्क से विकार निकाल लिये। कई लोगों को यह मजाक लगता हो पर जिन लोगों ने इसका अनुभव किया है वह इसे समझते हैं और ज्ञानी माने जाते हैं। दूसरी बात यह है कि मस्तिष्क में कर्मकांडों का बोझा लिये इंसान इतना अभ्यस्त हो जाता है कि वह उससे निवृत होने का सुख जानता ही नहीं है। मगर जो लोग ध्यान के निर्विचार समाधि से अध्यात्म प्रसाद प्राप्त कर लेते हैं वह जानते हैं कि सच्चा सुख क्या होता है।

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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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हिन्दू धर्म संदेंश-शास्त्रों का सार ग्रहण करें (shastron ka sar grahan karen-hindu dharma sandesh)


हमारे अनेक धार्मिक ग्रन्थ हैं  और सभी का अपना अपना महत्व है परन्तु कुछ कथित ज्ञानी आत्मा प्रचार के लिए उनके विविध अर्थ निकाल कर समाज में भ्रम पैदा करते हैं जिसके कारन अनेक प्रकार के विवाद पैदा होते हैं। ऐसे में भर्तृहरि महाराज का यह सन्देश अत्यंत  महत्वपूर्ण है कि उनका सार ग्रहण करना चाहिए।
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अनन्तशास्त्रं बहुलाश्चय विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षरमिवाम्बुपमध्यात्
हिन्दी में भावार्थ-
शास्त्र और विद्या अनंत है। शास्त्रों में बहुत कुछ लिखा गया है। मनुष्य का जीवन संक्षिप्त है। उसके पास समय कम है जबकि जीवन में आने वाली बाधायें बहुत हैं। इसलिये उसे शास्त्रों का सार ग्रहण कर वैसे ही जीवन में आगे बढ़ना चाहिये जसे कि दूध में से हंस पानी को अलग ग्रहण करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में जीवन दर्शन का रहस्य और ज्ञान का भंडार समेटे अनेक वेद, पुराण और उपनिषदों के साथ ही अनेक महापुरुषों की पुस्तकें हैं। हमारे देश पर प्रकृति की ऐसी कृपा रही है कि हर काल में एक अनेक महापुरुष एक साथ उपस्थित रहते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में ज्ञान का अपार भंडार भरा पड़ा है पर उसमें कथा और उदाहरणों से विस्तार किया गया है। मूल ज्ञान अत्यंत संक्षिप्त है और उसके निष्कर्ष भी अधिक व्यापक नहीं है। अतः ऐसे बृहद ग्रंथों को पढ़ने में समय लगाना एक सामान्य व्यक्ति के लिये संभव नहीं पर अनेक विद्वानों ने इसमें डुबकी लगाकर इन व्यापक ग्रंथों का सार समय समय पर प्रस्तुत किया है। इतना ही नहीं कुछ विद्वानों ने तो लोगों के हृदय में महापुरुष की उपाधि प्राप्त कर ली।
वैसे वेद, पुराण, और उपनिषदों के साथ अन्य अनेक पावन ग्रंथों का ज्ञान और सार तत्व श्रीमद्भागवत गीता में मिल जाता है। अगर जीवन में शांति और सुख प्राप्त करना है तो उसमें वर्णित ज्ञान को ग्रहण करना ही श्रेयस्कर है। वैसे प्राचीन ग्रंथों की कथायें और उदाहरण सुनने में बहुत अच्छे लगते हैं और समय हो तो सत्संग में जाकर उनका भी श्रवण करना अच्छी बात है। जहां समय का अभाव हो वहां श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन अत्यंत फलदायी है। अगर श्रीगीता का अध्ययन और श्रवण करेंगे तो हंस के समान वैसे ही ज्ञान प्राप्त करेंगे जैसे वह दूध से पानी अलग कर ग्रहण करता है। एक बात निश्चित है कि उसका ज्ञान न तो गूढ़ है न कठिन जैसा कि कहा जाता है। उसे ग्रहण करने के लिये उसे पढ़ते हुए यह संकल्प धारण करना चाहिये कि उस ज्ञान को हम धारण कर जीवन में अपनायेंगे तभी उसे समझा जा सकता है।

संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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