Category Archives: हिन्दी साहित्य

लिपस्टिक प्रेम-हिन्दी हास्य कविता (lipstic prem-hindi hasya kavita)


टीवी पर चल रही थी खबर
एक इंजीनियरिंग महाविद्यालय में
छात्रों द्वारा छात्राओं को होठों पर
लिपस्टिक लगाने की
तब पति जाकर उसकी बत्ती बुझाई।
इस पर पत्नी को गुस्सा आई।
वह बोली,
‘क्यों बंद कर दिया टीवी,
डर है कहीं टोके न बीवी,
तुम भी महाविद्यालय में मेरे साथ पढ़े
पर ऐसा कभी रोमांटिक सीन नहीं दिया,
बस, एक प्रेम पत्र में फांस लिया,
उस समय अक्ल से काम नहीं किया,
एक रुखे इंसान का हाथ थाम लिया,
कैसा होता अगर यह काम हमारे समय में होता,
तब मन न ऐसा रोता,
तुम्हारे अंदर कुंठा थी
इसलिये बंद कर दिया टीवी,
चालू करो इसमें नहीं कोई बुराई।’’

सुनकर पति ने कहा
‘देखना है तो
अपनी अपनी आठ वर्षीय मेरे साथ बाहर भेज दो,
फिर चाहे जैसे टीवी चलाओ
चाहे जितनी आवाज तेज हो,
अभी तीसरी में पढ़ रही है
लिपस्टिक को नहीं जानती,
अपने साथियों को भाई की तरह मानती,
अगर अधिक इसने देखा तो
बहुत जल्दी बड़ी हो जायेगी,
तब तुम्हारी लिपस्टिक
रोज कहीं खो जायेगी,
पुरुष हूं अपना अहंकार छोड़ नहीं सकता,
दूसरे की बेटी कुछ भी करे,
अपनी को उधर नहीं मोड़ सकता,
ऐसा कचड़ा मैं नहीं फैलने दे सकता
अपने ही घर में
जिसकी न मैं और न तुम कर सको धुलाई।’’
पत्नी हो गयी गंभीर
खामोशी उसके होठों पर उग आई।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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पतंजलि योग विज्ञान-संतोष ही जीवन का सबसे बड़ा धन (patanjali yoga vigyan-santosh jivan ka dhan)


शौचात्स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः।।
हिन्दी में भावार्थ-
शौच करने से अपने अंगों में वैराग्य तथा दूसरों से संपर्क न रखने की इच्छा पैदा होती है।
सत्त्वशुद्धिसौमनरस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च।।
हिन्दी में भावार्थ-
इसके सिवा अंतकरण की शुद्धि, मन में प्रसन्नता, चित की एकाग्रता, इंद्रियों का वश में होना और आत्मसाक्षात्कार की योग्यता की अनुभूति भी होती है।
संतोषादनुत्तसुखलाभः।।
हिन्दी में भावार्थ-
संतोष से उत्तम दूसरा कोई सुख या लाभ नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम जब योग साधना करते हैं तब अपनी देह के समस्त अंगों की क्रियाओं को देख सकते हैं। हम अपनी खाने पीने तथा शौच की क्रियाओं को सामान्य बात समझ कर टालते हैं जबकि जीवन के आनंद का उनसे घनिष्ठ सम्बंध है। इसका अनुभव तभी किया जा सकता है जब हम योगासन, प्राणायाम, ध्यान तथा मंत्र जाप करें। हम जब शौच करते हैं तब अपनी देह से गंदगी निकलने के साथ ही अपने अंदर सुख का अनुभव करें। अगर ऐसा न हो तो समझ लेना चाहिए कि अभी हमारी देह में अनेक प्रकार के विकार रह गये हैं। जब हम शौच के समय अपने अंदर से विकार निकलने की अनुभूति होती है तब मन में एक तरह से वैराग्य भाव आता है और साथ ही मन में यह भी भाव आता है कि जितना हो सके अपने खान पान में सात्विक भाव का पालन किया जाये। ऐसी वस्तुऐं ग्रहण की जायें जो सुपाच्य तथा देह के लिये कम तकलीफदेह हों। इतना ही नहंी कम से कम भोजन किया जाये ताकि देह और मन में विकार न रहें यह अनुभूति भी होती है। कहने का अभिप्राय यह है कि शौच से निवृत होने पर देह के स्वस्थ होने की अनुभूति होना चाहिए। इसके विपरीत अगर शरीर में थकावट या कमजोरी के साथ मानसिक तनाव का अनुभव तो समझ लेना चाहिए कि हमारी देह बिना योगसाधना के विकार नहीं निकाल सकती।
इतना ही नहीं अपनी देह की हर शारीरिक क्रिया के साथ हमें अपने अंदर संतोष का अनुभव हो तभी यह मानना चाहिए कि हम स्वस्थ हैं। इस संसार में संतोष ही सुख का रूप है। अपने मन में असंतोष से अपना ही खून जलाकर कोई सुखी नहीं रह सकता।

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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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मनुस्मृति-शांत बैठना भी एक तरह से आसन (shant rahna bhee ek tarha se asan-manu smruti in hindi)


यदावगच्छेदायत्वयामाधिक्यं ध्रृवमात्मनः।
तदा त्वेचाल्पिकां पीर्डा तदा सन्धि समाश्चयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
भविष्य में अच्छी संभावना हो तो वर्तमान में विरोधियों और शत्रुओं से भी संधि कर लेना चाहिए।


क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी मनुष्य के जीवन में दुःख, सुख, आशा और निराशा के दौर आते हैं। आवेश और आल्हाद के चरम भाव पर पहुंचने के बाद किसी भी मनुष्य का अपने पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है। भावावेश में आदमी कुछ नहीं सोच पाता। मनु महाराज के अनुसार मनुष्य को अपने विवेक पर सदैव नियंत्रण करना चाहिये। जब शक्ति क्षीण हो या अपने से कोई गलती हो जाये तब मन शांत होने लगता है और ऐसा करना श्रेयस्कर भी है। अनेक बार मित्रों से वाद विवाद हो जाने पर उनके गलत होने पर भी शांत बैठना एक तरह से आसन है। यह आसन विवेकपूर्ण मनुष्य स्वयं ही अपनाता है जबकि अज्ञानी आदमी मज़बूरीवश ऐसा करता है। जिनके पास ज्ञान है वह घटना से पहले ही अपने मन में शांति धारण करते हैं जिससे उनको सुख मिलता है जबकि अविवेकी मनुष्य बाध्यता वश ऐसा करते हुए दुःख पाते हैं।

जीवन में ऐसे अनेक तनावपूर्ण क्षण आते हैं जब आक्रामक होने का मन करता है पर उस समय अपनी स्थिति पर विचार करना  चाहिए। अगर ऐसा लगता है कि भविष्य में अच्छी आशा है तब बेहतर है कि शत्रु और विरोधी से संधि कर लें क्योंकि समय के साथ यहां सब बदलता है इसलिये अपने भाव में सकारात्मक भाव रखते स्थितियों में बदलाव की आशा रखना चाहिए।कहने का अभिप्राय यह है कि हमेशा ही शांत होकर अपना काम करना चाहिए।

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पतंजलि योग साहित्य-तप, स्वाध्याय तथा भक्ति हैं क्रियायोग (patanjali yoga sahitya-tap, swadhayay tathaa bhakti is kriya yog)


तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधान क्रियायोगः।।
हिन्दी में भावार्थ-
तप, स्वाध्याये तथा ईश्वर के प्रति प्राण केंद्रित करना तीनों ही क्रियायोग हैं।
समाधिभावनार्थः क्लेशतनुरणर्थश्च।।
हिन्दी में भावार्थ-
समाधि में प्राप्त सिद्धि से अज्ञान तथा अविद्या के कारण होने वाले क्लेशों का नाश होता है।
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशा।।
हिन्दी में भावार्थ-
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश यह पांचों क्लेश है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योग साधना के आठ भाग हैं जिसमें समाधि का अत्यंत महत्व है। समाधि ध्यान का वह चरम शिखर है जहां मनुष्य इस दैहिक संसार से प्रथक ईश्वरीय लोक में स्थित हो जाता है। उसका अपने अध्यात्म से इस तरह योग या जुड़ाव हो जाता है कि उसकी देह में स्थित इंद्रिया निष्क्रिय और शिथिल हो जाती हैं और जब योगी समाधि से वापस लौटता है तो उसके लिये पूरा संसार फिर नवीन हो जाता है क्योंकि वह मन के सारे विकारों से निवृत होता है।
योगासन तथा प्राणायाम के बाद परम पिता परमात्मा के प्रति ध्यान लगाना भी योग हैं और इनको क्रियायोग कहा जाता है। इसमे सिद्धि होने पर किसी विषय का अध्ययन न करने या उसमें जानकारी का अभाव होने पर भी उसको जाना जा सकता है। ऐसे में अविद्या और अज्ञान से उत्पन्न क्लेश नहीं रह जाता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि योग साधना की सीमा केवल योगासन और प्राणायाम तक ही केंद्रित नहीं है बल्कि ध्यान और समाधि भी उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा है। मनुष्य का अपना संकल्प भी इसमें महत्व रखता है।
सच तो यह है कि मनुष्य मन के इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक तो है सहज योग जिसमें मनुष्य स्वयं संचालित होता है। दूसरा है असहज योग जिसमें मनुष्य अज्ञान तथा अविद्या के कारण इधर उधर प्रसन्नता तलाश करते हुए केवल तनाव ही पाता है। पूर्ण रूप से योग साधना का ज्ञान प्राप्त करने वाले मनुष्य तत्व ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तब उनका प्रयोजन इस नश्वर संसार से अधिक नहीं रह जाता है। योगासन तथा प्राणायाम करने वाले कुछ लोग अपने आपको सिद्ध समझने लगते हैं और तब वह दूसरों को चमत्कार दिखाकर अपनी दुकानें जमाते हैं। दरअसल वह योग का पूर्ण रूप नहीं जानते। जिन लोगों को योग साधना का पूर्ण ज्ञान होता है वह समाधि के द्वारा सिद्ध तो प्राप्त करते हैं पर उसकी आड़ में कोई धंधा नहीं करते क्योंकि उनके लिये इस संसार में कोई भी कार्य चमत्कार नहीं रह जाता।
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संत कबीर दर्शन-सामूहिक भक्ति और भजन दिखावा है (samuhik bhakti ek dikhava-sant kabir darshan)


ऊजल पहिनै कापड़ा, पान सुपारी खाय।
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय।।
संत कबीर कहते हैं कि जो उजले कपड़े पहनने के साथ ही पान सुपारी खाकर दिखावा करते हैं और गुरु की भक्ति नहीं करते वह बहुत तकलीफ के साथ मुत्यु को प्राप्त होते हैं।
दुनियां सेती दोसती, होय भजन में भंग।
एका एकौ राम सों, कै साधुन के संग।।
संत कबीर कहते हैं कि दुनियां के लोगों के साथ मित्रता करने से भक्ति में बाधा आती है। एक अकेले ही भगवान राम की भक्ति तथा साधुओं की संगत करने पर ही मन को शांति मिलती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आधुनिक युग ने भारत में जीवन के मायने ही बदल दिये हैं। मित्रता के नाम पर अनेक लोग कुसंगत में फंसकर जीवन तबाह करते हैं तो अनेक लोग समूहों में मिलकर भगवान भजन का आयोजन कर अपने धार्मिक होने की दिखावा करते हैं। स्थिति यह है कि अनेक लोग अपने यहां शादी विवाह के अवसर पर परंपरागत गीत गायन के स्थान पर भजन जागरण करते हैं और इस अवसर पर शराब तंबाकू का खुलकर सेवन होता है। कई बार तो हंसी आती है कि भक्ति को लेकर लोग समझते क्या हैं? वह भगवान को भक्ति दिखा रहे हैं या लोगों को बता रहे हैं या अपने आपको ही स्वयं के भक्त होने का विश्वास दिला रहे हैं। अब तो हर मौके पर सामूहिक भजन कार्यक्रम करने की ऐसी परंपरा शुरु हो गयी है कि देखकर लगता है कि पूरा देश ही भक्तमय हो रहा है। उस हिसाब से देश में नैतिकता तथा आचरण के मानदंड बहुत ऊंचे दिखना चाहिये पर ऐसा है नहीं।
दरअसल देश में बढ़ते धन ने लोगों को बावला बना दिया है और धनी लोग अपनी छबि धार्मिक बनाये रखने के लिये ऐसे आयोजन करते हैं जिससे समाज में भले आदमी की छबि बने रहे। उसी तरह कुछ बाहुबली लोगों से पैसा वसूल कर भी अनेक प्रकार के सामूहिक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं कि लोग उनकी छबि को साफ सुथरा समझें। सच तो यह है कि धर्म साधना एकांत का विषय है और इसमें जो समूह बनाकर भजन करते हैं या कार्यक्रमों में शामिल होते हैं वह सिवाय पाखंड के कुछ नहीं करते। दूसरों को नहीं अपने आपको धोखा देते हैं।
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संत कबीरदास-संत लोग मान अपमान के भाव से परे होते हैं (sant kabir das-man aur apman se pare hote sant)


निर्बेरी निहकामता, स्वामी सेती नेह।
विषया सो न्यारा रहे, साधुन का मत येह।।
संत कबीरदास जी का कहना है कि किसी से विवाद न करे, बैर न पाले और किसी विषया या वस्तु में कामना न रखे वहर सच्चे संत हैं। संतों का विषयों से प्रेम नहीं होता बल्कि उनका सारा ध्यान तो परमात्मा की भक्ति पर ही केंद्रित होता है।
मान अपमान न चित्त धरै, औरन का सनमान।
जो कोई आशा करै, उपदेशै तेहि ज्ञान।।
संत कबीर दास का मानना है कि संत लोग मान और अपमान को अपने हृदय में स्थान नहीं देते। वह सभी को सम्मान देते हैं और कोई आशा लेकर आये तो उसका उचित मार्गदर्शन करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग सवाल पूछते हैं कि सही गुरु कैसे ढूंढा जाये? ज्ञान तो अनेक कथित संतों ने रट लिया है और वह उसका व्यवसायिक उपयोग अपने प्रवचनों में करते हैं। दक्षिणा लेकर अनेक शिष्य वह बनाते हैं। उनमें अनेक शिष्य बाद में अपने गुरु का व्यवहारिक सत्य देखकर निराश हो जाते हैं। अनेक लोग कथित पेशेवर संतों को देखकर यह भी कहते हैं कि‘ आजकल सच्चे गुरु मिलते कहां हैं? फिर हमें उनकी पहचान भी तो नहीं पता।’
संतों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह स्थिरप्रज्ञ होते हैं। उनका हृदय केवल भक्ति में लीन रहता है। सांसरिक विषयों में वह निर्लिप्त भाव से सक्रिय रहते हुए मान अपमान का विचार नहीं करते। वह अपशब्द बोलने वाले की बातों को अनसुना कर उनसे भी सद्व्यवहार करते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वह अपने निष्काम कम के बदले कोई दक्षिणा या उपहार स्वीकार नहीं करते। अतः ऐसे ही लोगों को गुरु मानकर चलना चाहिए।
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मनुस्मृति-विद्यादान अत्यंत महत्वपूर्ण (hindu dharmik vichar-vidyadan ka mahatva)


सर्वेषामेव दानानो ब्रह्मदानं विशिष्यते।
वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाञ्चगसर्मिषाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जल, अन्न, गाय, भूमि, वस्त्र, तेल, सोना घी आदि वस्तुओं के दान से अधिक महत्व विद्या दान का है।
येन यने तू भावेन सद्यद्दानं प्रयच्छति।
तत्तत्तेनैव भावेन प्राष्नोति प्रतिपूजितः।।
हिन्दी में भावार्थ-
दान देने वाला जिस भावना से देता है वैसा ही फल उसे मिलता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे अध्यात्मिक महर्षियों ने मनुष्य के लिये दान की महत्ता अनेक कारणों से स्वीकार किया है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस संसार में मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जिसके पास विवेक है इस कारण वह अपनी आवश्यकताओं से अधिक संग्रह करता है। इसी कारण कुछ मनुष्य ऐसे भी रह जाते हैं जिनकी भौतिक उपलब्धियां कम रह जाती हैं। एक संग्रह करता है तो दूसरा अभाव झेलता है। इससे समाज में वैमनस्य का भाव भी फैलता है। यही कारण है कि अधिक धनवानों को हमेशा ही दान कर समाज में अपना प्रभाव बढ़ाने के साथ ही अध्यात्मिक शांति के साथ जीवन व्यतीत करने की राय दी जाती है। दूसरी बात यह है कि मनुष्य के अलावा अन्य समस्त जीवों में विवेक की सीमा होती है। न वह संग्रह करते हैं न शोषण करते हैं न उनके पास दान करने योग्य वस्तु न लेने की चाहत। अपनी उदरपूर्ति के अलावा उनके अन्य कार्य शेष नहीं रह जाता। ऐसे में मनुष्य की अलग पहचान केवल दान करने से ही बनती है।
अपने तथा परिवार का भरण भोषण तो सभी जीव करते हैं ऐसे में अगर मनुष्य होकर भी यही किया तो कौनसा तीर मार लिया। मनुष्य की श्रेष्ठता तो इसी में ही है कि वह दूसरे जीवों की सहायत के लिये हृदय से काम करे। वस्तुओं के दान से भी अधिक है दूसरे को विद्या और ज्ञान देना। इसीलिये आज के संदर्भ में उसका भी बहुत महत्व है। अनेक लोगों ने नयी नयी तकनीकी का ज्ञान प्राप्त किया है। उनको चाहिए कि वह ऐसे मनुष्यों को उससे अवगत करायें जो उसे नहीं जानते।
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भर्तृहरि नीति शतक-वाणी और धन के रोगियों से दूर रहें (bhartrihari neeti shatak-vani aur dhna ke rogi se door rahem)


पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
भूश्ययां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षधद्राणामविवेकमूढ़मनसां यन्नश्वाराणां सदा
वित्तव्याधिविकार विह्व्लगिरां नामापि न श्रूयते।।
हिन्दी में भावार्थ-
भर्तृहरि महाराज अपने प्रजाजनों से कहते हैं कि अब तुम लोग पवित्र फल फूलों खाकर जीवन यापन करो। सजे हुए बिस्तर छोड़कर प्रकृति की बनाई शय्या यानि धरती पर ही शयन करो। वृक्ष की छाल को ही वस्त्र बना लो लो। अब यहां से चले चलो क्योंकि वहां उन मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों का नाम भी सुनाई नहीं देगा जो अपनी वाणी और संपत्ति से रोगी होने के कारण अपने वश में नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में तीन प्रकार के लोग पाये जाते हैं-सात्विक, राजस और तामस! श्रेष्ठता का क्रम जैसे जैस नीचे जाता है वैसे ही गुणी लोगों की संख्या कम होती जाती है। कहने का अभिप्राय यह है कि तामस प्रवृत्ति की संख्या वाले लोग अधिक हैं। उनसे कम राजस तथा उनसे भी कम सात्विक होते हैं। धन का मद न आये ऐसे राजस और सात्विक तो देखने को भी नहीं मिलते। जिन लोगों को भगवान ने वाणी या जीभ दी है वह उससे केवल आत्मप्रवंचना या निंदा में नष्ट करते हैं। किसी को नीचा दिखाने में अधिकतर लोगों को मज़ा आता है। किसी की प्रशंसा कर उसे प्रसन्न करने वाले तो विरले ही होते हैं। इस संसार के वीभत्स सत्य को ज्ञानी जानते हैं इसलिये अपने कर्म में कभी अपना मन लिप्त नहीं करते।
विलासित और अहंकार लिप्त इस संसार में में यह तो संभव नहीं है कि परिवार या अपने पेट पालने का दायित्व पूरा करने की बज़ाय वन में चले जायें, अलबत्ता अपने ऊपर नियंत्रण कर अपनी आवश्यकतायें सीमित करें और अनावश्यक लोगों से वार्तालाप न करें। उससे भी बड़ी बात यह कि परमार्थ का काम चुपचाप करें, क्योंकि उसका प्रचार करने पर लोग हंसी उड़ा सकते हैं। सन्यास का आशय जीवन का सामान्य व्यवहार त्यागना नहीं बल्कि उसमें मन के लिप्त न होने देने से हैं। अपनी आवश्यकतायें कम से कम करना भी श्रेयस्कर है ताकि हमें धन की कम से कम आवश्यकता पड़े। जहां तक हो सके अपने को स्वस्थ रखने का प्रयास करें ताकि दूसरे की सहायता की आवश्यकता न करे। इसके लिये योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान करना एक अच्छा उपाय है।

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मनुस्मृति-अन्य लोगों का अपमान करने वाली नष्ट होता है (admi ka apman na karen-manu smriti)


सुखं द्वावमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते।
सुखं चरति लोकेऽस्मिनन्मन्ता विनश्तिं

हिन्दी में भावार्थ-अन्य व्यक्तियों द्वारा अपमान किये जाने पर उनको माफ करने वाला मनुष्य सुखी की नींद लेनें के साथ संसार में सहजता से विचरता है परंतु दूसरों का अपमान करने वाला मनुष्य स्वयं ही नष्ट होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन को अगर दृष्टा भाव से देखा जाये तो यकीनन उसके प्रति सहजता का बोध होता है। मान और अपमान से परे होकर विचार करें तो फिर जीवन का एक अलग ही मजा है। श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि गुण ही गुणों में तथा इंद्रिया ही इंद्रियों में बरत रही हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि देह पर जो तत्व प्रभाव डालते हैं उनको अमृतमय या विष से व्याप्त होने का प्रभाव भी मनुष्य पर पड़ता है। जो गंदा खाते पीते हैं उनकी वाणी और विचार उसी अनुरूप होते हैं इसलिये उनसे सद्व्यवहार की अपेक्षा ज्ञानियों को नहीं करना चाहिए। अगर वह अपमान करते हैं तो उसकी अनदेखी कर देना ही उचित है। क्योंकि अगर उनका प्रतिकार उनकी शैली में ही किया जाये तो अपना ही रक्तचाप भी बढ़ जाता है। फिर स्वयं वाणी में कटुता और आंखों में विष व्याप्त होता जाता है। इसलिये अच्छा यही है कि अपने अपमान करने वालों को माफ कर दें। उसके बाद चिंतन और ध्यान करें तो इस बात का अहसास होगा कि हमने ठीक किया।
एक बात निश्चित यह है कि हर आदमी को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है और जो दूसरों का अपमान करते हैं वह तनाव की अग्नि में स्वयं का मन और तन जलाते हैं। उनकी शक्ति और बुद्धि धीरे धीरे पतन की तरफ बढ़ती है और अंततः नष्ट हो जाते हैं। अतः अपने मन में क्षमा का भाव हमेशा धारण करना चाहिए।

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श्रीगुरुग्रंथ साहिब से-परमात्मा को कोई स्थापित नहीं कर सकता (shri gurugranth sahib-parmatma kee sthapna)


मनि साचा मुखि साचा सोइ।
अवर न पेखै ऐकस नि कोइ।
नानक इह लक्षण ब्रह्म गिआनी होइ।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस मनुष्य के मन और मुख का निवास होता है वह परमात्मा के अलावा कुछ नहीं देखता और किसी अन्य के सामने माथा नहीं टेकता।
थापिआ न जाइ कीता न होई, आपे आपि निरंजन सोइ।
हिन्दी में भावार्थ-
परमात्मा न तो कहीं स्थापित नहीं किया जा सकता है और बनाया जाता है। वह तो वह स्वयं ही निर्मित है।
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-श्री गुरुनानक जी ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता पर तो प्रहार किये ही साथ ही धर्म के लेकर लोगों के अंदर रहने वाले अहंकार भाव को भी रेखांकित किया है। सभी मनुष्य को अपना एक इष्ट होता है। हमारे देश में तो यह परंपरा भी रही है कि एक ही परिवार के सदस्यों का इष्ट अलग अलग होता है। हालांकि इसे लेकर अनेक लोग प्रतिकूल टीका टिप्पणियां करते हैं पर यह उनके अज्ञान का प्रमाण है। दरअसल पूरा देश ही निरंकार परमात्मा का उपासक रहा है पर सुविधा के लिये हर भक्त अपने लिये अपने मन के अनुसार किसी एक स्वरूप की पूजा करता है। जो ज्ञानी है वह तो निरंकार रूप का ही स्मरण करते हैं पर जो सामान्य मनुष्य है वह मूर्तियों के द्वारा उपासना कर अपना मन संतुष्ट करते हैं। इस पर विवाद नहीं होना चाहिऐ।
मुश्किल यह है कि हर कोई अपने स्वरूप को श्रेष्ठ बताकर दूसरे की मजाक उड़ाता है या आलोचना करता है। उससे भी ज्यादा बुरी बात यह है कि कुछ कथित ज्ञानी ऐसे भी हैं जो सभी स्वरूपों को एक बताकर अपने ही स्वरूप की पूजा दूसरे पर थोपते हैं यह कहते हुए कि हमारा धर्म तो एक ही है। कोई शिव का भक्त है तो कोई राम का या कृष्ण पर जब ऐसे भक्तों से माता या गणेश जी की मूर्तियों की झांकियों या कार्यक्रमों के नाम पर चंदा वसूलने का दबाव धार्मिक एकता के नाम पर बनाया जाता है तब कुछ लोगों का मन नाखुश हो जाता है। यही स्थिति उन लोगो की भी है जो निष्काम भाव से भगवान को भजते हैं और उन पर सकाम भक्ति-मंदिर या प्रवचनों में शामिल होना-करने के लिये दबाव बनाया जाता है।
कुछ लोगों के यह भ्रम है कि वह भगवान का नाम लेते हैं तो उनके दबदबे को सभी माने। धन, पद तथा बाहुबल के सहारे लोग भले ही दूसरों पर अपनी भक्ति का रौब जरूर गांठते हैं पर सच यही है कि परमात्मा की भक्ति किसी पर थोपी नहीं जा सकती। मुख्य बात यह है कि यह स्मरण स्वयं ही हृदय से करना चाहिये न कि दूसरे पर प्रभाव डालने के लिये।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें (kotilaya ka arthashastra-safalta ke liye janvirodhi kaam na karen)


आयत्याञ्प तदात्वे च यत्स्यादास्वादपेशलम्।
तदेव तस्य कुर्वीत न लोकद्विष्टमाचरेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
भविष्य की अच्छी संभावनाओं को देखते हुए बुद्धिसे जो कार्य करने में अच्छा लगे वही प्रारंभ करे परंतु कभी भी सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें।
श्लाघ्या चानन्दनीया च महतामुफ्कारिता।
करले कल्याणगायत्ते स्वल्पापि सुमहोदयम्।
हिन्दी में भावार्थ-
उच्च पुरुषों का उपकार कर्म अत्यंत प्रिय तथा आनंदमय लगता है वह अगर किसी का भी थोड़ा कल्याण करते हैं तो उसका महान उदय होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर मनुष्य में पूज्यता और अहंकार का भाव होता है। जब किसी को धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो फूलकर कुप्पा नहीं समाता और कई लोगों का तो मन ही विचलित हो जाता है। शक्ति आने पर ही अनेक लोग संतुष्ट नहीं होते बल्कि उसका प्रभाव समाज पर दृष्टिगोचर हो और वह डरे इसी उद्देश्य से कुछ लोग अपने बड़प्पन का दुरुपयोग करने लगते हैं। आजकल हम देख सकते है कि देश में अमीरों, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोगों का आतंक पूरे समाज पर दिखाई देता है। शक्तिशाली वर्ग के लोग अपनी शक्ति से छोटों को संरक्षण देने की बजाय अपनी शक्ति का उपयोग उनको दबाकर आत्म संतुष्टि कर लेते हैं। यही कारण है कि समाज में वैमनस्य का भाव बढ़ रहा है।
हम अनेक लोगों का उनके धन, पद और बल की वजह से बड़ा मान लेते हैं पर सच यह है कि वह समाज का भला करना नहीं जानते। बड़े आदमी की थोड़ी कृपा से छोटे आदमी प्रसन्न हो सकत हैं पर इसको समझने की बजाय उसे कुचलकर अपने आप को खुश करना चाहते हैं।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को न छाया मिले, पथिक को फल लागे अति दूर-यह कहावत अधिकतर बड़े लोगों पर लागू होती है। ऐसे लोगों को बड़ा मानना ही एक तरह से गलत है। बड़ा आदमी तो वह है जो लोकहित में अपनी शक्ति का उपयोग करता है न कि जनविरोधी काम करके अपने अहंकार की संतुष्टि! अतः धल, उच्च पद या बाहूबल होने पर छोटे और कमजोर आदमी को संरक्षण देना चाहिये ताकि समाज को एक नई दिशा मिल सके।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-प्रभाव बढ़ने के साथ शत्रु भी बढ़ते हैं (kautilya ka arthshastra-prabhav aur shatru)


न जातु गच्छेद्धिश्वासे सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान।
अद्रोहसमयं कृत्यां वृत्रमिन्द्रः पुरात्त्वद्यीत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अगर किसी कारणवश किसी से संधि भी की जाये तो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ‘मैं वैर नहीं करूंगा’ यह कहकर भी इन्द्र ने वृत्रासुर को मार डाला था।
विकारं याति पुत्रो हि राज्यान्नीचः पिता तथा।
तल्लोकवृत्तांन्नृपतेरन्यद्वृत्नं प्रचक्षते।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस प्रकार के व्यवहार से पुत्र तथा पिता नीच हो जाता है राजा का ऐसा व्यवहार लोक व्यवहार से भिन्न है। 
ज्यायांसं सिंहः साहसं यथं मध्नाति दन्तिनः।
तस्मार्तिह इवोदग्रमात्मानं वीक्ष्ण सम्पतेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
शक्तिशाली सेना को साथ लिए शत्रु को युद्ध में मारने पर राजा का प्रभाव बढ़ता है। इसी प्रताप के कारण सभी जगह उसके दूसरे शत्रु भी पैदा होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जीवन अद्भुत है और रहस्यमय भी। मनुष्य को अन्य जीवों से अधिक बुद्धि वरदान में मिली है और वही उसकी सबसे शत्रु और मित्र भी है। जहां पशु पक्षी तथा अन्य जीव मनुष्य के एक बार मित्र हो जाते हैं तो फिर शत्रुता नहीं करते मगर स्वयं मनुष्य ही एक विश्वसनीय जीव नहीं है। वह परिस्थितियों के अनुसार अपनी वफादारी बदलता रहता है। अतः यह कहना कठिन है कि कोई मित्र अपने संकट निवारण या स्वार्थ सिद्धि का अवसर आने पर विश्वासघात नहीं करेगा। ऐसे में किसी शत्रु से संधि हो या मित्र से नियमित व्यवहार की पक्रिया उसमें कभी स्थाई विश्वास की अपेक्षा नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा एक बात यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे के प्रति कठोरता या हिंसा का व्यवहार न करें। अनेक बार मनुष्य अपने को प्रभावशाली सिद्ध करने के लिये अपने से हीन प्राणी पर अनाचार करता है या फिर हमला कर उसे मार डालता है। इससे अन्य मनुष्य डर अवश्य जाते हैं पर मन ही प्रभावशाली आदमी के प्रति शत्रुता का भाव भी पाल लेते हैं। समय आने पर प्रभावशाली आदमी जब संकट में फंसता है तो वह उनका मन प्रसन्न हो जाता है। इसलिये जहां तक हो सके क्रूर तथा हिंसक व्यवहार से बचना चाहिए।
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भर्तृहरि नीति शतक-असिधारा व्रत का पालन करें (bhartrihari neeti shatak-asidhara vrat)


सन्तपन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषास्तान्प्रत्येष विशेष विक्रमरुची राहुर्न वैरायते।
द्वावेव प्रसते दिवाकर निशा प्रापोश्वरौ भास्करौ भ्रातः! पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषाकृतिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
आसमान में बृहस्पति समेत अनेक शक्तिशाली ग्रह हैं किन्तु पराक्रम में दिलचस्पी रखने वाला राहु उनसे कोई लड़ाई मोल नहीं लेता क्योंकि वह तो पूर्णिमा और अमावस्या के दिन अति देदीप्यमाान सूर्य तथा चंद्र को ही ग्रसित करता है।
असन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः प्रियान्यारूया वतिर्मलिनमसुभंगेऽप्यसुकरं।
विपद्युच्चैः स्थेयं पदमनुविधेयं च महतां सतां केनोद्दिष्टं विषमसिधाराव्रतमिदम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
सदाशयी मनुष्यों के लिये कठोर असिधारा व्रत का आदेश किसने दिया? जिसमें दुष्टों से किसी प्रकार की प्रार्थना नहीं की जाती। न ही मित्रों से धन की याचना की जाती है। न्यायिक आचरण का पालन किया जाता है। मौत सामने आने पर भी उच्च विचारों की रक्षा की जाती है और महान पुरुषों के आचरण की ही अनुसरण किया जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर मनुष्य को अपने पराक्रम में ही यकीन करना चाहिए न कि अपने लक्ष्यों को दूसरों के सहारे छोड़कर आलस्य बैठना चाहिए। इतना ही नहीं मित्रता या प्रतिस्पर्धा हमेशा अपने से ताकतवर लोगों की करना चाहिये न कि अपने से छोटे लोगों पर अन्याय कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए।
अनेक मनुष्य अपने आसपास के लोगों को देखकर अपने लिये तुच्छ लक्ष्य निर्धारित करते हैं। थोड़ा धन आ जाने पर अपने आपको धन्य समझते हुए उसका प्रदर्शन करते हैं। यह सब उनके अज्ञान का प्रमाण है। अगर स्थिति विपरीत हो जाये तो उनका आत्मविश्वास टूट जाता है और दूसरों के कहने पर अपना मार्ग छोड़ देते हैं। अनेक लोग तो कुमार्ग पर चलने लगते हैं। सच बात तो यह है कि हर मनुष्य को भगवान ने दो हाथ, दो पांव तथा दो आंखों के साथ विचारा करने के लिये बुद्धि भी दी है। अगर मनुष्य असिधारा व्रत का पालन करे-जिसमें दुष्टों ने प्रार्थना तथा मित्रों से धना की याचना न करने के साथ ही किसी भी स्थिति में अपने सिद्धांतों का पालन किया जाता है-तो समय आने पर अपने पराक्रम से वह सफलता प्राप्त करता है।

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-आलस्य छोड़कर नियत समय पर काम प्रारंभ करना श्रेयस्कर


न कार्यकालं मतिमानतिक्रामेत्कदायन।
कथञ्चिदेव भवति कार्ये योगः सुदृर्ल्लभः।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि अपने कार्य को निश्चित समय पर पूरा करे और इसमें किसी प्रकार की कोताही न बरते। कारण यह कि किसी भी कार्य में मन लगाना दुर्लभ है। फिर जीवन में संयोग बार बार नहीं आते।
सतां मार्गेण मतिमान् काले कर्म्म समाचरेत्।
काले समाचरन्साधु रसवत्फल्मश्नुते।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को सत्य मार्ग पर स्थिर होकर समय आने अपना कार्य निश्चित रूप से आरंभ करना चाहिऐ। समय पर कार्य करने पर सारे फल प्रकट होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य स्वभाव में आलस्य का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है। संत कबीर दास जी ने कहा भी है कि ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय हो जायेगी बहुरि करेगा कब।’ हर मनुष्य सोचता है कि अपना काम तो वह कभी भी कर सकता है पर ऐसा सोचते हुए उसका समय निकलता जाता है। चतुर मनुष्य इस बात को जानते हैं इसलिये ही वह विकास के पथ पर चलते हैं। अक्सर लोग अपनी असफलता और निराशा को लेकर भाग्य को कोसते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि विकास का समय हर आदमी के पास आता है और जो अपने ज्ञान और विवेक से उसका लाभ उठाते हैं उनकी पीढ़ियों का भी भविष्य सुधर जाता है। संसार में सफल और प्रभावशाली व्यक्त्तिव का स्वामी, उद्योगपति, तथा प्रतिष्ठाप्राप्त लोगों की संख्या आम लोगों से कम होती है इसका कारण यह है कि सभी लोग समय का महत्व नहीं समझते और आलस्य के भाव से ग्रसित रहते हैं।
जीवन में निरंतर सक्रिय रहने से मनुष्य के चेहरे और मन में स्फूर्ति बनी रहती है और बड़ी आयु होने पर भी उसका अहसास नहीं होता। आलस्य मनुष्य का एक बड़ा शत्रु माना जाता है इसलिये उससे मुक्ति पाना ही श्रेयस्कर है। कोई काम सामने आने पर उसको तुरंत प्रारंभ कर देना चाहिये यही जीवन में सफलता का मूलमंत्र है। 

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पतंजलि योग सूत्र-स्मृति और संस्कारों का रूप एक जैसा (patanjali yog darshan in hindi-sankar aur manushya ki smriti)


जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानष्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्।।
हिन्दी में भावार्थ-
पतंजलि योग सूत्र के अनुसार जाति, देश काल इन तीनों से संपर्क टूटने पर भी स्वाभाविक कर्म संस्कारों में बाधा नहीं आती क्योंकि स्मृति और संस्कारों का एक ही रूप होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम इस श्लोक में योग के संस्कारिक रूप को समझ सकते हैं। जब मनुष्य बच्चा होता है तब उसके अपने घर परिवार, रिश्तेदारी, विद्यालय तथा पड़ौस के लोगों से स्वाभाविक संपर्क बनते हैं। वह उनसे संसार की अनेक बातें ऐसी सीखता है जो उसके लिये नयी होती हैं। वह अपने मन और बुद्धि के तत्वों में उन्हें स्वाभाविक रूप से इस तरह स्थापित करता है जीवन भर वह उसकी स्मृतियों में बनी जाती हैं। कहा भी जाता है कि बचपन में जो संस्कार मनुष्य में आ गये फिर उनसे पीछा नहीं छूटता और न छोड़ना चाहिए क्योंकि वह कष्टकर होता है।
यही कारण है कि माता पिता तथा गुरुओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। संभव है बाल्यकाल में अनेक बच्चे उनकी शिक्षा पर ध्यान न दें पर कालांतर में जब वह उनकी स्थाई स्मृति बनती है तब वह उनका मार्ग प्रशस्त करती है। इसलिये बच्चों के लालन पालन में मां की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण मानी गयी है क्योंकि बाल्यकाल में वही अपने बच्चे के समक्ष सबसे अधिक रहती है और इसका परिणाम यह होता है कि कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जो अपनी मां को भूल सके।
इसलिये हमारे अध्यात्मिक संदेशों में अच्छी संगत के साथ ही अच्छे वातावरण में भी निवास बनाने की बात कहीं जाती है। अक्सर लोग कहते हैं कि पास पड़ौस का प्रभाव मनुष्य पर नहीं पड़ता पर यह गलत है। अनेक बच्चे तो इसलिये ही बिगड़ जाते हैं क्योंकि उनके बच्चे आसपास के गलत वातावरण को अपने अंदर स्थापित कर लेते हैं।
यही नहीं आज के अनेक माता पिता बाहर जाकर कार्य करते हैं और सोचते हैं कि उनका बच्चा उनकी तरह ही अच्छा निकलेगा तो यह भ्रम भी उनको नहीं पालना चाहिये क्योंकि किसी भी मनुष्य की प्रथम गुरु माता की कम संगत बच्चों को अनेक प्रकार के संस्कारों से वंचित कर देती है। ऐसे लोग सोचते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर ठीक हो जायेगा या हम उसे संभाल लेंगे तो यह भी भ्रामक है क्योंकि जो संस्कार कच्चे दिमाग में स्मृति के रूप में स्थापित करने का है वह अगर निकल गया तो फिर अपेक्षायें करना निरर्थक है। युवा होने पर दिमाग पक्का हो जाता है और सभी जानते हैं कि पक्की मिट्टी के खिलोने नहीं बन सकते-वह तो जैसे बन गये वैसे बन गये। दरअसल हम जिससे संस्कार कहते हैं वह प्रारम्भिक काल में स्थापित स्मृतियों का विस्तार ही हैं इसलिये अगर हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे बच्चे आगे चलकर वह काम करें जो हम स्वयं चाहते हैं तो उसकी शिक्षा पहले ही देना चाहिए। यह स्मृतियां इस तरह की होती हैं कि देश, काल तथा जाति से कम संपर्क रहने न बिल्कुल न होने पर भी बनी रहती हैं और मनुष्य अपने संस्कारों से भ्रष्ट नहीं होता है अगर किसी लोभवश वह अपना पथ छोड़ता भी है तो उसे भारी कष्ट उठाना पड़ता है और फिर अपने स्थान पर वापस आता है।
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