Category Archives: हिन्दी शायरी

चमचागिरी से ही बन जाती है चाट-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (chamchagiri se ban jati hai chat-hindi satire poem)


जिंदगी में सफलता के लिये
अब पापड़ नहीं बेलने पड़ते हैं
  चमचागिरी से ही बन जाती है चाट
बस, बड़े लोगों की दरबार में हाज़िर होकर
उनकी तारीफ में चंद शब्द ठेलने पड़ते हैं ।
——-
 


महंगाई ने इंसान की नीयत को
सस्ता बना दिया है,
पांच सौ और हजार के नोट
छापने के फायदे हैं
इसलिये  बड़े नोट के सायों   ने
बदनीयत लोगों को खरीदकर
थोकबंद जमा कर दिया है।
——–
अपने हाथों से ही सजा देना अपनी छबि
इंसान खो चुके हैं पहचान अच्छे बुरे की।
अपने आप बन रहे सभी मियां मिट्ठू
तारीफों में परोसते बात ऐसी, जो लगे छुरे की।
——–

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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नोटों से भरा है दिल जिनका-हिन्दी कविता (noton se bhara hai dil jinka-hindi poem)


हलवाई कभी अपनी मिठाई नहीं खाते
फिर भी तरोताजा नज़र आते हैं।
बेच रहे हैं जो सामान शहर में
उनकी दवा और सब्जी शामिल हैं जहर में
कहीं न उनके मुंह में भी जाता है
मग़र गज़ब है उनका हाज़मा
ज़हर को अमृत की तरह पचा जाते हैं।
———————–
सुनते हैं हर शहर में
दूध, दही और सब्जी के साथ
ज़हर बिक रहा है,
फिर भी मरने वालों से अधिक
जिंदा लोग घूमते दिखाई दे रहे हैं,
सच कहते हैं कि
पैसे में बहुत ताकत है
इसलिये नोटों से भरा है दिल जिनका
बिगड़ा नहीं उनका तिनका
बेशर्म पेट में जहर भी अमृत की तरह टिक रहा है।
———-

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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हिन्दी के अखबार-हिन्दी दिवस पर व्यंग्य कविता (hindi ke akhbar-hindi diwas par vyangya kavita)


अखबार आज का ही है
खबरें ऐसा लगता है पहले भी पढ़ी हैं
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

ट्रेक्टर की ट्रक से
या स्कूटर की बस से भिड़ंत
कुछ जिंदगियों का हुआ अंत
यह कल भी पढ़ा था
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

भाई ने भाई ने
पुत्र ने पिता को
जीजा ने साले को
कहीं मार दिया
ऐसी खबरें भी पिछले दिनों पढ़ चुके
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

कहीं सोना तो
कहीं रुपया
कहीं वाहन लुटा
लगता है पहले भी कहीं पढ़ा है
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

रंगे हाथ भ्रष्टाचार करते पकड़े गये
कुछ बाइज्जत बरी हो गये
कुछ की जांच जारी है
पहले भी ऐसी खबरें पढ़ी
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।

अखबार रोज आता है
तारीख बदली है
पर तय खबरें रोज दिखती हैं
ऐसा लगता है पहले भी भी पढ़ी हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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लुटेरों को ज़ागीर मिली-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (luteron ko zagir mili-hindi vyangya kavitaen)


खज़ाना लूटकर लुटेरे
करने लगे व्यापार,
बांटने लगे उधार,
इस तरह साहुकारों और सौदागरों भी
ऊंची जमात में शामिल हो गये,
क्योंकि उन सामंतों को मिला अपना हिस्सा
जिनको ज़माने की जागीर मिली
विरासत में,
इंसानियत के कायदे रहे जिनकी हिरासत में,
उन्होंने दौलत और शौहरत की ख्वाहिश पूरी करने के लिये
दरियादिली के इरादे कब्र में दफन कर दिये,
और तसल्ली कर ली यह सोचकर कि
वह ऊंची जमात की दावतों में जाने के काबिल हो गये।
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बरसात का पानी और पैसे का खेल-हास्य कविताएँ (barsat ka pani aur paise ka khel-hasya kavitaen))


बच्चे को मैदान पर हॉकी खेलते देख
पुराने एक खिलाड़ी ने उससे कहा
‘‘बेटा, बॉल से हॉकी कुछ समय तक
तक खेलना ठीक है,
फिर कुछ समय बाद पैसे का खेल भी सीख,
अगर केवल हॉकी खेलेगा  तो
बाद में मांगेगा भीख।’’
———-
बरसात के पानी से मैदान भर गया
खिलाड़ी दुःखी हो गये
पर प्रबंधक खुश होकर कार्यकर्ताओं में मिठाई बांटने लगा
जब उससे पूछा गया तो वह बोला
‘‘अरे, यह सब बरसात की मेहरबानी है,
मैदान बनाने के लिये फिर मदद आनी है।
वैसे ही मैदान ऊबड़ खाबड़ हो गया था,
पैसा तो आया
पर कैसे खर्च करूं समझ नहीं पाया,
इधर उधर सब बरबाद हो गये,
इधर जांच करने वाले भी आये थे
तो जैसे मेरे होश खो गये,
अब तो दिखाऊंगा सारी बरसात की कारिस्तानी,
हो जायेगा फिर दौलत की देवी की मेहरबानी,
धूप फिर पानी सुखा देगी
अगर फिर बरसात हुई तो समझ लो
अगली किश्त भी अपने नाम पर आनी है,
तुम खाओ मिठाई
मुझे तो बस किसी तरह कमीशन खानी है।
———

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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तबादला-हिन्दी हास्य कविता (tabadla-hindi shaya kavita


अपने तबादले से वह खुश नहीं थे,
क्योंकि नयी जगह पर
ऊपरी कमाई के अवसर कुछ नहीं थे,
इसलिये अपने बॉस के जाकर बोले,
‘‘मैंने तो आपकी आज्ञा का पालन
हमेशा वफादार की तरह किया,
मेरी टेबल पर जो भी तोहफा आया
बाद में डाला अपनी जेब में
आपका हिस्सा पहले आपके हवाले किया,
यह आप मेरे पेट पर क्यों मार रहे लात,
जो तबादले की कर दी घात।’’

बॉस ने रुंआसे होकर कहा
‘‘शायद तुम्हें पता नहीं
तुम्हारी वज़ह से मेरे ऊपर भी
संभावित जांच की तलवार लटकी है,
प्रचार वालों की नज़र अब तुम पर भी अटकी है,
जब आता है अपने पर संकट
तब शिकार के रूप में पेश
अपना वफ़ादार ही किया जाता है,
दाना दुश्मन से निपटते हैं बाद में
पहले नांदा दोस्त मिटाया जाता है,
तुम्हारे सभी जगह चर्चे हैं,
कि जितनी आमदनी है
उससे कई गुना घर के खर्चे हैं,
भला कौन बॉस सहन कर सकता है
अपने मातहत से अपनी तुलना,
बता रहे हैं लोग तुमको मेरे बराबर अमीर
तुम भी अब जाकर सुनना,
अधिकारी के अगाड़ी तुम चल रहे थे,
जैसे हम तुम्हारे हिस्से पर ही पल रहे थे,
एक तो छोटे के पिछाड़ी चलना मुझे मंजूर न था,
फिर तुम्हारी वज़ह से
हमारी मुसीबत का दिन भी दूर न था,
इसलिये तुम्हारा तबादला कर दिया,
अपने वफादार भी हम नहीं कृपालु
यह साबित कर
बदनामी से बचने के लिये रफादफा मामला कर दिया,
तुम्हारी वफदारी का यह है इनाम,
बर्खास्तगी का नहीं किया काम,
तबादले पर ही खत्म कर दी बात।
———

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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इश्क गुरु की महिमा-हिन्दी हास्य कविता (ishq guru ki mahima-hasya kavita)


आशिक ने माशुका से कहा
‘कल गुरूपूर्णिमा है
इसलिये तुमसे नहीं मिल पाऊंगा,
जिसकी कृपा से हुआ तुमसे मिलन
उस गुरु से मिलने
उनके गुप्त अड्डे पर जाऊंगा,
क्योंकि उन पर एक प्रेम प्रसंग को लेकर
कसा है कानून का शिकंजा
पड़ सकता है कभी भी उन पर धाराओं का पंजा
इसलिये इधर उधर फिर रहे हैं,
फिर भी चारों तरफ से घिर रहे हैं,
उन्होंने ही मुझे तुमसे प्रेम करने का रास्ता बताया,
इसलिये तुम्हें बड़ी मुश्किल से पटाया,
वही प्रेम पत्र लिखवाते थे,
बोलने का अंदाज भी सिखाते थे,
जितनी भी लिखी तुम्हें मैंने शायरियां,
अपने असफल प्रेम में उनसे ही भरी थी
मेरे गुरूजी ने अपनी डायरियां,
इसलिये कल मेरी इश्क से छुट्टी होगी।’

सुनकर भड़की माशुका
और लगभग तलाक की भाषा में बोली
‘अच्छा हुआ जो गुरुजी की महिमा का बखान,
धन्य है जो पूर्णिमा आई
हुआ मुझे सच का भान,
कमबख्त, इश्क गुरु से अच्छा किसी
अध्यात्मिक गुरु से लिया होता ज्ञान,
ताकि समय और असमय का होता भान,
मैं तो तुम्हें समझी थी भक्त,
तुम तो निकले एकदम आसक्त,
मंदिर में आकर तुमने मुझे अपने
धार्मिक होने का अहसास दिलाया,
मगर वह छल था, अब यह दिखाया,
कविता की बजाय शायरियां लिखते थे,
बड़े विद्वान दिखते थे,
अपनी और गुरुजी की असलियत बता दी,
इश्क की फर्जी वल्दियत जता दी,
इसलिये अब कभी मेरे सामने मत आना
कल से तुम्हारे इश्क से मेरी कुट्टी,
मैं तुमसे और तुम मुझसे पाओ छुट्टी।।
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दरियादिल हो गये तंगदिल-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


प्यार में धोखा नहीं होता तो
सच्चे प्यार की पहचान कैसे होती,
दौस्ती में गद्दारी न होती तो
वफा की कीमत भला क्या होती,
जिंदगी की असलियत जिसने जान ली
उसे दिल के घायल होने की शिकायत नहीं होती।
———
जब तक मतलब था
दरियादिली उन्होंने दिखाई
फिर अचानक लापता हो गये,
हमने उनका पता ढूंढ निकाला
जब मिले दोबारा तो
उनकी तंगदिली देखकर हैरान हुए हम
इससे तो उनकी यादें बेहतर थी
पछताये जो फिर उनके पास गये।
——–

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अंग्रेजी की सनसनी हिन्दी में-व्यंग्य कवितायें


हिन्दी में सनसनी खेज खबर भी
अंग्रेजी अखबार से ही क्यों आती है,
जो हिन्दी में हो
वह सनसनी क्यों नहीं बन पाती है।
डरे हुए हैं बंधुआ कलम मजदूर
उनकी कमजोरी
शायद परायी भाषा में छिप जाती है।
———
मखमली विकास तक ही
उनकी नज़र जाती है,
जहां पैबंद लगे हैं अभावों के
वहां पर आंखें बंद हो जाती हैं।
देसी गुलामों का नजरिया
विदेशी शहंशाहों को यहां गिरवी हैं,
जहां दलाली मिलती है
वहां जुबान दहाड़ती है
नहीं तो तालू से चिपक जाती है।
———

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सीधी राह नहीं चलते लोग-हिन्दी व्यंग्य शायरी


तारीफों के पुल अब उनके लिये बांधे जाते हैं,
जिन्होंने दौलत का ताज़ पहन लिया है।
नहीं देखता कोई उनकी तरफ
जिन्होंने ज़माने को संवारने के लिये
करते हुए मेहनत दर्द सहन किया है।
——–
खौफ के साये में जीने के आदी हो गये लोग,
खतरनाक इंसानों से दोस्ती कर
अपनी हिफाजत करते हैं,
यह अलग बात उन्हीं के हमलों से मरते हैं।
बावजूद इसके
सीधी राह नहीं चलते लोग,
टेढ़ी उंगली से ही घी निकलेगा
इसी सोच पर यकीन करते हैं।
———

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चमक रहा है वही इंसान-हिन्दी शायरी


अपराध की कामयाबी से
तभी आदमी तक डोलता है
जब तक वह सिर चढ़कर नहीं बोलता है।
यह कहना ठीक लगता है कि
जमाना खराब है,
चमक रहा है वही इंसान
जिसके पास शराब और शबाव है,
मगर यह सच भी है कि
सभी लोग नहीं डूबे पाप के समंदर में,
शैतान नहीं है सभी दिलों में अंदर में,
भले इंसान के दिमाग में भी
ख्याल आता है उसूल तोड़ने का
पर कसूर की सजा कभी न कभी मिलती है जरूर
भला इंसान इस सच से अपनी जिंदगी तोलता है।
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विकास दर-मजदूर दिवस पर व्यंग्य कविता


चार मजदूर
रास्ते में ठेले पर सरिया लादे
गरमी की दोपहर
तेज धूप में चले जा रहे थे,
पसीने से नहा रहे थे।
ठेले पर नहीं थी पानी से भरी
कोई बोतल
याद आये मुझे अपने पुराने दिन
पर तब इतनी गर्मी नहीं हुआ करती थी
मेरी देह भी इसी तरह
धूप में जलती थी
पर फिर ख्याल आया
देश की बढ़ती विकास दर का
जिसकी खबर अखबार में पढ़ी थी,
जो शायद प्रचार के लिये जड़ी थी,
और अपने पसीने की बूंदों से नहाए
वह मजदूर अपने पैदों तले रौंदे जा रहे थे

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अपनी भाषा छोड़कर कहां जाओगे-हिन्दी व्यंग्य कविता


अपनी भाषा छोड़कर
कब तक कहां जाओगे,
किसी कौम या देश का अस्त्तिव
कभी भी मिट सकता है
परायी भाषा के सहारे
कहां कहां पांव जमाओगे।
दूसरों के घर में रोटी पाने के लिये
वैसी ही भाषा बोलने की चाहत बुरी नहीं है
दूसरा घर अकाल या तबाही में जाल में फंसा
तो फिर तुम कहां जाओगे।
अपनी भाषा तो नहीं आयेगी तब भी जुबां पर
फिर दूसरे घर की तलाश में कैसे जाओगे।
————-
उपदेश देते हुए उनकी
जुबान बहुत सुहाती हैं,
और बंद कमरे में उनकी हर उंगली
चढ़ावे के हिसाब में लग जाती है।
किताबों में लिखे शब्द उन्होंने पढ़े हैं बहुत
सुनाते हैं जमाने को कहानी की तरह
पर अकेले में करते दौलत का गणित से हिसाब
लिखने में कलम केवल गुणा भाग में चल पाती है।
———-

अपने दर्द का बोझ कब तक सहेंगे।
हल्का लगेगा जब दिल से हंसेंगे।
अपने ख्वाब पूरे होने की सौदागरों से चाहत
कब तक ईमान बेचकर पूरी करेंगे।
बाजार में बिकती है ढेर सारी शयें
उनके कबाड़ होने पर, घर कब तक भरेंगे।
दिखा रहे हैं बड़े और छोटे पर्दे पर नकली दृश्य
झूठे जज़्बातों से कब तक अपना दिल भरेंगे।
अपने दर्द पर हंसना सीख लो यारों
रोते हुए जिंदगी के दरिया में कब तक बहेंगे।
दिल को दे सुकून, भुला दे सारे गम
वह दवा तभी बनेगी, जब खुद अपनी बात पर हंसेंगे।
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यकीन अब नहीं होता-हिन्दी शायरी


अपने को नायक दिखाने के लिये
उन्होंने बहुत सारे जुटा लिये
किराये पर खलनायक,
अपने गीत गंवाने के लिये
खरीद लिये हैं गायक।
यकीन अब उन पर नहीं होता
जो जमाने का खैरख्वाह
होने का दावा करते हैं
अपनी ताकत दिखाने के लिये
बनते हैं मुसीबतों को लाने में वही सहायक।
——————–
धोखे, चाल और बेईमानी का
अपने दिमाग में लिये
बढ़ा रहे हैं वह अपना हर कदम,
अपनी जुबान से निकले लफ्ज़ों
और आंखों के इशारो से
जमाने का भला करने का पैदा कर रहे वहम।
भले वह सोचते हों मूर्ख लोगों को
पर हम तोलने में लगे हैं यह कि
कौन होगा उनमें से बुरा कम,
किसे लूटने दें खजाना
कौन पूरा लूटेगा
कौन कुछ छोड़ने के लिये
कम लगायेगा दम।
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सबसे अधिक कायर लोग नायक बनाये जाते हैं-हिन्दी हास्य व्यंग्य कवितायें


कायरों की सेना क्या युद्ध लड़ेगी
सबसे अधिक कायर लोग नायक बनाये जाते हैं।
कुछ खो जाने के भय से सहमे खड़े है
भीड़ में भेड़ों की तरह लोग,
चिंता है कि छिन न जायें
तोहफे में मिले मुफ्त के भोग,
इसलिये लुटेरे पहरेदार बनाये जाते हैं।
————
अब तो पत्थर भी तराश कर
हीरे बनाये जाते हैं,
पर्दे पर चल रहे खेल में
कैमरे की तेज रोशनी में
बुरे चेहरे भी सुंदरता से सजाये जाते हैं।
ख्वाब और सपनों के खेल को
कभी हकीकत न समझना,
खूबसूरत लफ्ज़ों की बुरी नीयत पर न बहलना,
पर्दे सजे है अब घर घर में
उनके पीछे झांकना भी मुश्किल है
क्योंकि दृश्य हवाओं से पहुंचाये जाते हैं।
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