Category Archives: सत्संग

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें (kotilaya ka arthashastra-safalta ke liye janvirodhi kaam na karen)


आयत्याञ्प तदात्वे च यत्स्यादास्वादपेशलम्।
तदेव तस्य कुर्वीत न लोकद्विष्टमाचरेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
भविष्य की अच्छी संभावनाओं को देखते हुए बुद्धिसे जो कार्य करने में अच्छा लगे वही प्रारंभ करे परंतु कभी भी सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें।
श्लाघ्या चानन्दनीया च महतामुफ्कारिता।
करले कल्याणगायत्ते स्वल्पापि सुमहोदयम्।
हिन्दी में भावार्थ-
उच्च पुरुषों का उपकार कर्म अत्यंत प्रिय तथा आनंदमय लगता है वह अगर किसी का भी थोड़ा कल्याण करते हैं तो उसका महान उदय होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर मनुष्य में पूज्यता और अहंकार का भाव होता है। जब किसी को धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो फूलकर कुप्पा नहीं समाता और कई लोगों का तो मन ही विचलित हो जाता है। शक्ति आने पर ही अनेक लोग संतुष्ट नहीं होते बल्कि उसका प्रभाव समाज पर दृष्टिगोचर हो और वह डरे इसी उद्देश्य से कुछ लोग अपने बड़प्पन का दुरुपयोग करने लगते हैं। आजकल हम देख सकते है कि देश में अमीरों, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोगों का आतंक पूरे समाज पर दिखाई देता है। शक्तिशाली वर्ग के लोग अपनी शक्ति से छोटों को संरक्षण देने की बजाय अपनी शक्ति का उपयोग उनको दबाकर आत्म संतुष्टि कर लेते हैं। यही कारण है कि समाज में वैमनस्य का भाव बढ़ रहा है।
हम अनेक लोगों का उनके धन, पद और बल की वजह से बड़ा मान लेते हैं पर सच यह है कि वह समाज का भला करना नहीं जानते। बड़े आदमी की थोड़ी कृपा से छोटे आदमी प्रसन्न हो सकत हैं पर इसको समझने की बजाय उसे कुचलकर अपने आप को खुश करना चाहते हैं।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को न छाया मिले, पथिक को फल लागे अति दूर-यह कहावत अधिकतर बड़े लोगों पर लागू होती है। ऐसे लोगों को बड़ा मानना ही एक तरह से गलत है। बड़ा आदमी तो वह है जो लोकहित में अपनी शक्ति का उपयोग करता है न कि जनविरोधी काम करके अपने अहंकार की संतुष्टि! अतः धल, उच्च पद या बाहूबल होने पर छोटे और कमजोर आदमी को संरक्षण देना चाहिये ताकि समाज को एक नई दिशा मिल सके।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-प्रभाव बढ़ने के साथ शत्रु भी बढ़ते हैं (kautilya ka arthshastra-prabhav aur shatru)


न जातु गच्छेद्धिश्वासे सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान।
अद्रोहसमयं कृत्यां वृत्रमिन्द्रः पुरात्त्वद्यीत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अगर किसी कारणवश किसी से संधि भी की जाये तो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ‘मैं वैर नहीं करूंगा’ यह कहकर भी इन्द्र ने वृत्रासुर को मार डाला था।
विकारं याति पुत्रो हि राज्यान्नीचः पिता तथा।
तल्लोकवृत्तांन्नृपतेरन्यद्वृत्नं प्रचक्षते।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस प्रकार के व्यवहार से पुत्र तथा पिता नीच हो जाता है राजा का ऐसा व्यवहार लोक व्यवहार से भिन्न है। 
ज्यायांसं सिंहः साहसं यथं मध्नाति दन्तिनः।
तस्मार्तिह इवोदग्रमात्मानं वीक्ष्ण सम्पतेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
शक्तिशाली सेना को साथ लिए शत्रु को युद्ध में मारने पर राजा का प्रभाव बढ़ता है। इसी प्रताप के कारण सभी जगह उसके दूसरे शत्रु भी पैदा होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जीवन अद्भुत है और रहस्यमय भी। मनुष्य को अन्य जीवों से अधिक बुद्धि वरदान में मिली है और वही उसकी सबसे शत्रु और मित्र भी है। जहां पशु पक्षी तथा अन्य जीव मनुष्य के एक बार मित्र हो जाते हैं तो फिर शत्रुता नहीं करते मगर स्वयं मनुष्य ही एक विश्वसनीय जीव नहीं है। वह परिस्थितियों के अनुसार अपनी वफादारी बदलता रहता है। अतः यह कहना कठिन है कि कोई मित्र अपने संकट निवारण या स्वार्थ सिद्धि का अवसर आने पर विश्वासघात नहीं करेगा। ऐसे में किसी शत्रु से संधि हो या मित्र से नियमित व्यवहार की पक्रिया उसमें कभी स्थाई विश्वास की अपेक्षा नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा एक बात यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे के प्रति कठोरता या हिंसा का व्यवहार न करें। अनेक बार मनुष्य अपने को प्रभावशाली सिद्ध करने के लिये अपने से हीन प्राणी पर अनाचार करता है या फिर हमला कर उसे मार डालता है। इससे अन्य मनुष्य डर अवश्य जाते हैं पर मन ही प्रभावशाली आदमी के प्रति शत्रुता का भाव भी पाल लेते हैं। समय आने पर प्रभावशाली आदमी जब संकट में फंसता है तो वह उनका मन प्रसन्न हो जाता है। इसलिये जहां तक हो सके क्रूर तथा हिंसक व्यवहार से बचना चाहिए।
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परमात्मा का इंद्रियों से संबंध-वेदांत दर्शन (bhagwan aur indriyan-vedant darshan in hindi)


करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः।
हिन्दी में भावार्थ-
यदि परमात्मा को देह इंद्रिय आदि करणों से युक्त मान लिया गया तो भोग आदि से उनका संबंध सिद्ध हो जायेगा जो कि ठीक नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-<कुछ आस्थावान लोग मानते हैं कि सर्वशक्तिमान केवल जीवात्मा के संचरण का काम करता है। न वह सुनता है, न वह देखता है और न बोलता है, वह तो केवल भक्ति की अनुभूति करता और कराता है। जब कोई भक्त नियमित रूप से उसकी आराधना करता है तो उसके हृदय में निर्मलता का भाव पैदा होता है जिससे उसके शरीर में ही ऐसा तेज व्याप्त हो जाता है जिसका प्रभाव दूसरे लोगों पर पड़ता है इसी कारण वह उनसे सहायता समर्थन पा लेता है। उसी तरह जब कोई मनुष्य कष्ट होने पर आर्त भाव से परमात्मा को पुकारता है तो उसकी अनुभूति परमात्मा तक पहुंचती है और वहां से संदेश किसी देहात्मा तक पहुंचता है और वही उसकी सहायता करता है। कहने का अभिप्राय यह है कि परमात्मा का स्वरूप अनंत है और उसके बारे अनेक तरह की कल्पनायें हम सुनते ही रहते हैं। वेदांत दर्शन में एक एक शब्द की स्वतंत्र व्याख्या है और उसे समझ पाने के लिये यह आवश्यक है कि उसके आशय पर थोड़ा चिंतन अवश्य करें। अक्सर लोग यह कहते हैं कि परमात्मा सब देखता, सुनता और समझता है। भक्तों का यह भाव बुरा नहीं है पर इससे होता यह है कि वह सांसरिक उपलब्धियों कासारा श्रेय भगवान को देते हैं तो दुःख के लिये उसे जिम्मेदार भी मानते हैं। यह अलग बात है कि अपने कर्तापन का अहंकार भी उनमें होता है। सच तो यह है कि सर्वशक्तिमान परमात्मा त्रिगुणमयी माया से परे है। वह इस संसार का निर्माता और नियंत्रणकर्ता है पर यहां विचरण करने वालों जीवों के कर्म का कारण नहीं है अतः उसके फल का भी उस पर दायित्व नहीं आता। इस संसार में मनुष्य को अपने ही कर्म के अनुसार क्रम से फल मिलता है। सुविधाओं का सेवन और दुविधाओं में फंसने के लिये उसकी बुद्धि और विवेक जिम्मेदार होता है। सकाम भक्ति वाले हर अच्छी और बुरी बात में परमात्मा का तत्व ढूंढने लगते हैं जबकि इसके विपरीत निष्काम भक्त तो अपने साथ होने वाली हर घटना को इस जगत का परिणाम मानते हैं। दूसरी बात यह कि वह दुःख सुख में समान रहते हैं क्योंकि उनको इस बात का आभास होता है कि यह संसार निरंकार परमात्मा की रचना है और यहां अच्छा या बुरा केवल जीव की अनुभूति और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। अतः वह निरंकार परमात्मा को इंद्रियों से रहित मानते हैं क्योंकि इद्रियों का गुण भोगना है और वह इससे दूर है।  
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भर्तृहरि नीति शतक-मणि के बावजूद विषधर किसी को प्रिय नहीं होता (mani aur vish-bhartrihari neeti shatak)


आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
हिन्दी में भावार्थ- जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
हिन्दी में भावार्थ- इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो  तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्द्ध  में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है। पड़ौस तथा कार्यस्थलों में हमारा संपर्क अनेक ऐसे लोगों से होता है जिनके प्रति हमारे हृदय में क्षणिक आत्मीय भाव पैदा हो जाता है। वह भी हमसे बहुत स्नेह करते हैं पर यह यह संपर्क नियमित संपर्क के कारण मौजूद हैं।  उन कारणों के परे होते ही-जैसे पड़ौस छोड़ गये या कार्य का स्थान बदल दिया तो-उनसे मानसिक रूप से दूरी पैदा हो जाती है।  इस तरह यह बदलने वाली मित्रता वास्तव में सत्य नहीं होती। मित्र तो वह है जो दैहिक रूप से दूर होते भी हमें स्मरण करता है और हम भी उसे नहीं भूलते। इतना ही नहीं समय पड़ने पर उनसे सहारे का आसरा मिलने की संभावना रहती है।  अतः स्थितियों का आंकलन कर ही किसी को मित्र मानकर उससे आशा करना चाहिये। जहां तक हो सके दुष्ट और स्वार्थी लोगों से मित्रता नहीं करना चाहिये जो कि कालांतर में घातक होती है।उसी तरह अपने व्यक्तित्व का भी निर्माण इसी तरह करना चाहिए कि वह दूसरों को प्रिय लगे।
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रहीम के दोहे-किसी के कहने से मर्यादा कम नहीं हो जाती (maryada-rahim ke dohe)


आजकल हर कोई प्रशंसा का भूखा है। मुश्किल यह है कि लोग आजकल केवल धनिकों तथा उच्च पदस्थ लोगों की झूठी प्रशंसा करने के इस कदर हावी हैं कि निष्काम भाव से कार्यरत लोगों को फालतू का आदमी समझा जाता है। सज्जन आदमी की बजाय धन तथा स्वार्थ पूर्ति के लिये दुष्ट की ही प्रशंसा करते हैं। यही कारण है कि समाज में उच्छ्रंखल प्रवृत्ति के लोग मर्यादाऐं तोड़ते हुए वाहवाही बटोरते हैं। हालांकि इसके बाद में न केवल उनको बल्कि समाज को भी दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं। इसलिये न तो तो उच्छ्रंखलता स्वयं बरतनी चाहिए न किसी को प्रोत्साहित करना चाहिए।
जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाहिं
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं
कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े लोगों को कोई छोटा कहता है तो वह छोटे नहीं हो जाते। भगवान श्री कृष्ण जिन्होंने गिरधर पर्वत उठाया उनको कुछ लोग मुरलीधर भी कहते हैं पर इससे उनकी मर्यादा कम नहीं हो जाती।
जो मरजाद चली सदा, सोई तो ठहराय
जो जल उमगै पारतें, कहे रहीम बहि जाय
कविवर रहीम कहते हैं कि जो सदा से मर्यादा चली आती है, वही स्थिर रहती है। जो पानी नदी के तट को पार करके जाता है वह बेकार हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कई लोगों को तब बहुत पीड़ा होती है जब कोई उनको छोटा या महत्वहीन बताता है। सच बात तो यह है कि आजकल हर कोई एक-दूसरे को छोटा बताकर अपना महत्व साबित करना चाहता है। ऐसे में कोई व्यक्ति अगर हमको छोटा कहता है या आलोचना करता है तो उसे सहज भाव से ग्रहण करना चाहिए। अपने मन में यह सोचना चाहिए कि जो हम और हमारा कार्य है वह अपने आप हमारा महत्व साबित कर देगा। भौतिक साधनों की उपलब्धता आदमी को बड़ा नही बनाती और उनका अभाव छोटा नहीं बनाती। आजकल के युग में जिसके पास भौतिक साधनों का भंडार है लोग उसे बड़ा कहते है और जिसके पास नहीं है उसे छोटा कहते है। जबकि वास्तविकता यह है कि जो अपने चरित्र में दृढ़ रहते हुए मर्यादित जीवन व्यतीत करता है वही व्यक्ति बड़ा है। इसलिये अगर हम इस कसौटी पर अपने को खरा अनुभव करते हैं तो फिर लोगों की आलोचना को अनसुना कर देना चाहिए।
वैसे भी आजकल लोग आत्मप्रशंसा में ही अपनी प्रसन्नता समझते हैं और दूसरे के गुण देखने का न तो उनके पास समय और न ही इच्छा। इसलिये अच्छा काम करने के बाद यह अपेक्षा तो कतई नहीं करना चाहिये कि स्वार्थी, लालची और अहंकार लोग उसकी प्रशंसा करेंगे। कोई भी परोपकार और परमार्थ का काम अपने दिल की तसल्ली के लिये ही करना श्रेयस्कर है क्योंकि इससे ही हमारी आत्मा प्रसन्न होती है। अपने कर्तव्य और धर्म का एकाग्रता के साथ निर्वाह निष्काम भाव से करना ही श्रेयस्कर क्योंकि दूसरे से प्रशंसा या तो चाटुकारिता करने पर मिलती है यह उसके स्वार्थ पूरा करने पर।
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पतंजलि योग सूत्र-समाधि के मध्य में विषयों का ज्ञान पूर्व संस्कारों की वजह से आता है (patnjali yog sootra-samdhi pad)


द्रष्टृदृश्यघोपरक्तं चितं सर्वार्थम्
हिन्दी में भावार्थ-
द्रष्टा और दृश्य-इन दो रंगों से रंगा चित्त सभी अर्थवाला हो जाता है।
तदंसख्येयवासनाभिश्चिन्नमपि परार्थ संहृत्यकारित्वात।
हिन्दी में भावार्थ-
वह चित्त असंख्येय वासनाओं से चित्रित होने पर भी दूसरे के लिए है क्योंकि वह सहकारिता के भाव से काम करने वाला है।
विशेषंषर्शिन आत्मभावभावनविनिवृत्तिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
चित्त और आत्मा के भेद को प्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष करने वाले योगी की आत्माभावविषयक भावना सर्वथा निवृत्त हो जाती है।
तदा विवेनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्।
हिन्दी में भावार्थ-
उस समय चित्त विवेक की तरफ झुककर कैवल्य के अभिमुख हो जाता है।
तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्राणि संसकारेभ्यंः।
हिन्दी में भावार्थ-
उसके अंतराल में दूसरे पदार्थों का ज्ञान पूर्वसंस्कारों से होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-महर्षि पतंजलि का योग सूत्र संस्कृत में है और उसके हिन्दी अनुवाद का अर्थ इतना किल्ष्ट होता है कि सीधी भाषा में बहुत कम विद्वान उसकी व्याख्या कर पाते हैं। हम यहां सीधी सादी भाषा में कहें तो हमारा चित्त या बुद्धि इस देह के कारण है और उसे आत्मा समझना अज्ञान का प्रमाण है। हमारे मन और बुद्धि में विचारों का क्रम आता जाता है जो केवल सांसरिक विषयों से संबंधित होता है। अध्यात्मिक विषयों के लिये हमें अपने अंदर संकल्प धारण करना पड़ता है और जब हम आत्मा और मन का अंतर समझ लेंगे तो दृष्टा की तरह जीने का आनंद ले पायेंगे।
एक तो संसार का दृश्य है और दूसरा वह दृष्टा आत्मा है जिसके बीच में यह देह स्थित है। पंच तत्वों से बनी इस देह की मन, बुद्धि तथा अहंकार की प्रकृतियों को अहंता, ममता और वासना की भावनायें बांधे रहती हैं। हम दृष्टा हैं पर कर्तापन का अहंकार कभी यह बात समझने नहीं देता। तत्वज्ञान के अभाव मनुष्य को दूसरा चतुर मायावी मनुष्य चाहे जब जहां हांक कर ले जाता है। इस संसार दो प्रकार के मनुष्य है एक वह जो शासक हैं दूसरे जो शासित हैं। निश्चित रूप से शासक चतुर मायावी मनुष्यों की संख्या कम और शासित होने वाले लोगों की संख्या अधिक है पर अगर तत्वज्ञान को जो समझ लें तो वह न तो शासक बनता है न शासित। योगी बनकर अपना जीवन आंनद से व्यतीत करता है।
एक बात दूसरी यह भी है इस विश्व में मनुष्य मन के चलने के दो ही मार्ग हैं-सहज योग और असहज योग। योग तो हर मनुष्य कर रहा है पर जो बिना ज्ञान के चलते हैं वह सांसरिक विषयों में चक्कर में अपना जीवन तबाह कर लेते हैं और जो ज्ञानी हैं वह उसे संवारते रहते हुए सुख अनुभव करते हैं। अतः आत्मा और चित्त का भेद समझना जरूरी है।
दूसरी बात हम समाधि या ध्यान के विषय में यह भी समझ लें कि जब हम उसमें लीन होने का प्रयास करते हैं तब हमारे अंदर विषयों का घेर आने लगता है। उनसे विचलित नहीं होना चाहिए क्योंकि यह उन विषयों से उत्पन्न विकार हैं जो उस समय भस्म होने आते हैं। जब वह पूरी तरह से भस्म होते हैं तब ध्यान आसानी से लग जाता है। ध्यान से जो मन को शांति मिलती है उससे बुद्धि में तीक्ष्णता आती है और प्रसन्न हो जाता है।
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भर्तृहरि नीति शतक-जिनका मन घोड़े की तरह दौड़े उनको प्रसन्न रखना कठिन


आम आदमी की जिंदगी हमेशा ही कठिन होती है पर आजकल के समय में तो लगभग दुरूह हो गयी है। बढ़ती महंगाई, हिंसा, तथा भ्रष्टाचार ने आम आदमी को त्रस्त कर दिया है। ऐसे में हर आम इंसान सोचता है कि वह बड़े आदमी की चमचागिरी कर जीवन में शायर कोई उपलब्धि प्राप्त कर ले। इस भ्रम में अनेक लोग बड़े लोगों की चाटुकारिता लगते हैं, मगर फायदा उसी को होता है जो दौलतमंदों के तलवे चाटने की हद तक जा सकता है। सच तो यह है कि कोई आदमी कितना भी दौल्त, शौहरत या पद की ऊंचाई पर पहुंच जाये पर उसकी मानसिकता छोटी रहती है। ऐसे में उनकी चमचागिरी से सभी को कुछ हासिल नहीं होता इसलिये जहां तक हो सके अपने अंदर आत्मविश्वास लाकर जीवन में संघर्ष करना चाहिए।

दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं
तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः

जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदं
सखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः
।।
हिंदी में भावार्थ- जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है। हमारी अभिलाषायें और आकांक्षायें की तो कोई सीमा ही नहीं है। सभी के मन में बड़ा पद पाने की लालसा है। इधर शरीर बुढ़ापे की तरह बढ़ रहा होता है। मृत्यु पीछे पड़ी हुई है। इन सभी को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि भक्ति और तप के अलावा को अन्य मार्ग ऐसा नहीं है जो हमारा कल्याण कर सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों के मन में धन पाने की लालसा बहुत होती है और इसलिये वह धनिकों, उच्च पदस्थ एवं बाहुबली लोगों की और ताकते रहते हैं और उनकी चमचागिरी करने के लिये तैयार रहते हैं। उनकी चाटुकारिता में कोई कमी नहीं करते। चाटुकार लोगांें को यह आशा रहती है कि कथित ऊंचा आदमी उन पर रहम कर उनका कल्याण करेगा। यह केवल भ्रम है। जिनके पास वैभव है उनका मन भी हमारी तरह चंचल है और वह अपना काम निकालकर भूल जाते हैं या अगर कुछ देते हैं तो केवल चाटुकारिता  के कारण नहीं बल्कि कोई सेवा करा कर। वह भी जो प्रतिफल देते हैं तो वह भी न के बराबर। इस संसार में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर उसके मद में डूबने से बच पाते हैं।  अधिकतर लोग तो अपनी शक्ति के अहंकार में अपने से छोटे आदमी को कीड़े मकौड़े जैसा समझने लगते हैं और उनकी चमचागिरी करने पर भी कोई लाभ नहीं होता।  अगर ऐसे लोगों की निंरतर सेवा की जाये तो भी सामान्य से कम प्रतिफल मिलता है।
सच तो यह है कि आदमी का जीवन इसी तरह गुलामी करते हुए व्यर्थ चला जाता हैं। जो धनी है वह अहंकार में है और जो गरीब है वह केवल बड़े लोगों की ओर ताकता हुआ जीवन गुंजारता है। जिन लोगों का इस बात का ज्ञान है वह भक्ति और तप के पथ पर चलते हैं क्योंकि वही कल्याण का मार्ग है।इस संसार में प्रसन्नता से जीने का एक ही उपाय है कि अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए ही जीवन भर चलते रहें।  अपने से बड़े आदमी की चाटुकारिता से लाभ की आशा करना अपने लिये निराशा पैदा करना है।

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मनु स्मृति-गंदे स्थानों पर पैदा होने वाले पदार्थ खाने से बुद्धि भ्रष्ट होती है (bhojan aur buddhi-manu smriti)


लशुनं, गुंजनं चैव पलाण्डूंु कचकानि च।
अभ्याक्षाणि द्विजातीनामेध्यप्रवानि।
हिन्दी में भावार्थ-
लहसून, शलजम, प्याज, कुकरमुत्ता तथा अन्य ऐसे खाद्य पदार्थ जो गंदे स्थानों पर पैदा होते हैं, उनका सेवन करने से बुद्धि भृष्ट होती है। अतः इनके प्रयोग से बचना चाहिए।
लोहितान् वृक्षनिर्यासान् वश्चनप्रभवांस्तथा।
शेतुं गव्यं य पीयुषं प्रयत्नेन विवर्जयवेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
लाल रंग वाले पेड़ों का गोंद, वृक्षों में छिद्र करने से निकलने वाला द्रव्य तथा लेस वाले फल तथा हाल ही में बच्चे को जन्म देने वाली गाय के दूध का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे अकाल मृत्यु की संभावना रहती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम यह तो जानते हैं कि ‘स्वस्थ शरीर में ही प्रसन्न मन का निवास होता है’, तो हमें यह भी समझना चाहिए कि शीरर में मौजूद तत्व ही हमारी बुद्धि का संचालन करते हैं। हम पचने योग्य वस्तु का भक्षण करें यह बात स्वीकार्य है पर यह भी याद रखना चाहिये कि उनका बुद्धि पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी देखना चाहिए। अक्सर हम कहते हैं कि हमें यह पच जाता है या वह पच जाता है पर रक्त कणों में सम्मिलित उन खाद्य पदार्थों से आये जीवाणु किस मानसिकता के हैं यह भी देखना ठीक है।
देखा जाये तो मांस खाने से भी कोई मर नहीं जाता और लोग उसे पचा भी लेते हैं पर उससे आए विषाणु किस तरह मन को विकृत करते हैं यह उन लोगों की मानसिकता देखकर समझा जाता है जो इसका सेवन करते हैं। शराब तथा अन्य व्यसन करने वाले भी सभी कोई तत्काल नहीं मर जाते पर धीरे धीरे उनका दिमागी संतुलन बिगड़ने लगता है और उसका दुष्प्रभाव उनके जीवन में देखने को मिलता है।
प्याज और लहसुन को स्वास्थय के लिये अच्छा मानाा जाता है पर उनसे निर्मित होने वाली मानसिकता विकृत होती है शायद यही कारण है कि अनेक लोग इनके सेवन से बचते हैं। उसी तरह मांस खाना भी बहुत बुरा जाता है। वैसे मांस खाने वाले सभी उसे पचा लेते हैं पर प्रश्न यह है कि उसके साथ आये  विषैले विषाणु जो रक्त में घुलकर कलुषित मनुष्य की मानसिकता का निर्माण करते हैं उनका अध्ययन अभी तक नहीं किया गया है।
श्री मद्भागवत गीता में कहा गया है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते है।’ उसी तरह यह भी एक महावत है कि ‘जैसा खायें अन्न वैसा हो जाये मन’। अन्न खाने से आशय केवल उसके अच्छे या बुरे होने सा नहीं है बल्कि वह किस कमाई से खरीदा गया और कहां पैदा हो यह भी महत्वपूर्ण है। श्री मद भागवत गीता में भोजन के तीन प्रकार-सात्विक, राजसी तथा तामसी-बताये गये हैं। उनका अर्थ और भाव समझ कर खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

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पतंजलि योग साहित्य-निर्विचार समाधि से बुद्धि ऋतंभरा होती (patanjali yoga sahitya-nirvichar samadhi)


पतंजलि योग सूत्र एक संपूर्ण विज्ञान है। जिसमें अनेक श्लोक हैं और उनका अर्थ बहुत छोटा लगता है पर उनका प्रभाव अत्यंत व्यापक है। सच तो यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान अत्यंत संक्षिप्त होता है पर अगर उनके बताये मार्ग पर चला जाये तो जीवन सहज हो जाता है।
निर्विचारवैशारद्योऽध्यात्मप्रसादः।।
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा।।
हिन्दी में भावार्थ-
निर्विचार समाधि अत्यंत निर्मल होने पर अध्यात्मप्रसाद प्राप्त होता है। उस समय बुद्धि ऋतंभरा अर्थात किसी वस्तु के सत्य स्वरूप को ग्रहण करने वाली होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जाग्रत हो या निद्रा में उसके अंदर विचारों का क्रम चलता रहता है। मस्तिष्क का एक भाग दिन में सक्रिय रहता है जो रात में सुप्तावस्था को प्राप्त होता है। मस्तिष्क के दूसरे भाग से मनुष्य दिन में काम नहीं लेता पर वह रात को स्वप्न देखता है। वैज्ञानिक तथ्य तो यह है कि मनुष्य अपने मस्तिष्क का केवल पांच प्रतिशत भाग ही उपयोग करता है भले ही उसकी सक्रियता अधिक दिखती है।
कहने का मतलब है कि मस्तिष्क कभी विराम नहीं करता। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अगर रात के स्वप्न अगर सुबह याद रहें तो इसका मतलब यह है कि आप ने पूरी तरह से निद्रा का सुख प्राप्त नहीं किया।
सच बात तो यह है कि अगर कोई रात को सपना आये तो सुबह उसे याद करने का प्रयास तक नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे मस्तिष्क में अनावश्यक तनाव होता है। इससे बचने का एक ही उपाय है कि समय मिलने पर ध्यान लगाया जाये जिसकी चरम परिणति निर्विचार समाधि के रूप में होती है। जिस तरह शरीर में भोजन आदि ग्रहण किये पदार्थ योगसन से पूरी तरह बाहर विसर्जित किये जाते हैं उसी तरह समाधि से मस्तिष्क में व्याप्त चिंताओं का निराकरण किया जा सकता है। पुताई के लिये जिस तरह सारे घर का सामान बाहर निकालना आवश्यक है उसी तरह मस्तिष्क से विचारों का कचड़ा निकालने के लिये ध्यान लगाना जरूरी है।
जब ध्यान लगाते हैं तब मस्तिष्क में विचारों का क्रम चलता है पर इसकी परवाह न करते हुए अपनी दृष्टि भृकुटि पर ही रखना चाहिए। धीरे धीरे स्वतः लगने लगेगा कि मस्तिष्क में विचारों का क्रम थमता जा रहा है। जब ध्यान में विचारशून्यता की स्थिति उत्पन्न हो तब समझना चाहिये कि मस्तिष्क से विकार निकाल लिये। कई लोगों को यह मजाक लगता हो पर जिन लोगों ने इसका अनुभव किया है वह इसे समझते हैं और ज्ञानी माने जाते हैं। दूसरी बात यह है कि मस्तिष्क में कर्मकांडों का बोझा लिये इंसान इतना अभ्यस्त हो जाता है कि वह उससे निवृत होने का सुख जानता ही नहीं है। मगर जो लोग ध्यान के निर्विचार समाधि से अध्यात्म प्रसाद प्राप्त कर लेते हैं वह जानते हैं कि सच्चा सुख क्या होता है।

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भर्तृहरि नीति शतक-आशा की लहरें धीरज का बांध तोड़ देती हैं (asha aur dhiraj-hindu adhyamik sandsh)


महाराज भर्तृहरि कहते हैं 
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आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङगाकुला
रामग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी
मोहावर्तसुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङगचिन्तातटी
तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगश्वराः
हिन्दी में भावार्थ-आशा एक नदी की भांति इसमे हमारी कामनाओं के रूप में जल भरा रहता है और तृष्णा रूपी लहरें ऊपर उठतीं है। यह नदी राग और अनुराग जैसे भयावह मगरमच्छों से भरी हुई हैं। तर्क वितर्क रूपी पंछी इस पर डेरा डाले रहते हैं। इसकी एक ही लहर मनुष्य के धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फैंकती है। मोह माया व्यक्ति को अज्ञान के रसातल में खींच ले जाती हैं, जहा चिंता रूपी चट्टानों से टकराता हैं। इस जीवन रूपी नदी को कोई शुद्ध हृदय वाला  योगी तपस्या, साधना और ध्यान से शक्ति अर्जित कर परमात्मा से संपर्क जोड़कर ही सहजता से पार कर पाता है।

वर्त्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- कहते हैं कि ‘उम्मीद पर आसमान टिका है’।  यह उम्मीद और आशा यानि क्या? सांसरिक स्वार्थों की पूर्ति होने ही हमारी आशाओं का केंद्र है। भक्ति, सत्संग तथा तत्वज्ञान से दूर भटकता मनुष्य अपना पेट भरते भरते थक जाता है पर वह है कि भरता नहीं।  कभी कभी जीभ स्वाद बदलने के लालायित हो जाती है।  सच तो यह है कि मन की तृष्णायें ही आशा का निर्माण करती हैं।  भारत जो कभी एक शांत और प्राकृतिक रूप से संपन्न क्षेत्र था आज पर्यावरण से प्रदूषित हो गया है।  हमेशा यहां आक्रांता आये और साथ में लाये नयी रौशनी की कल्पित आशायें।  सिवाय ढोंग के और क्या रहा होगा?  कुछ मूर्ख लोग तो कहते हैं कि इन आक्रांताओं ने यहां नयी सभ्यता का निर्माण किया।  इस पर हंसा ही जा सकता है।  यह नयी सभ्यता कभी अपना पेट नहीं भर पाती। जीभ के स्वाद के लिये अपना धर्म तक छोड़ देती है। रोज नये भौतिक साधनों के उपयोग की तरफ बढ़ चुकी यह सभ्यता जड़ हो चुकी है।  आशायें हैं कि पूर्ण नहीं होती। होती है तो दूसरी जन्म लेती है।  यह क्रम कभी थमता नहीं।
इस सभ्यता में हर मनुष्य का सम्मान की बात कही जाती है।  यह एक नारा है। योग्यता, चरित्र और वैचारिक स्तर के आधार पर ही मनुष्य को सम्मान की आशा करना चाहिये मगर नयी सभ्यता के प्रतिपादक यहां जातीय और भाषाई भेदों का लाभ उठाकर यहां संघर्ष पैदा कर  मायावी दुनियां स्थापित करते रहे। भारतीय अध्यात्म ज्ञान में जहां मान सम्मान से परे रहकर अपनी तृष्णाओं पर नियंत्रण करने के लिये संदेश दिया जाता है। सभी के प्रति समदर्शिता का भाव रखने का आदेश दिया जाता है। वही नयी सभ्यता के प्रतिपादक अगड़ा पिछड़ा का भेद यहां खड़ा करते हुए बतलाते हैं कि जिन तबकों को पहले  सम्मान नहीं मिला अब उनकी पीढ़ियों को विशेष सम्मान दिया जाना चाहिए।  कथित पिछड़े तबकों को विशेष सम्मान की तृष्णा जगाकर वह दावा करते हैं कि हम यहां समाज में बदलाव ला रहे हैं।  कितने आश्चर्य की बात है कि जिन जातियों में अनेक महापुरुष और वीर योद्धा पैदा हुए उनको ही पिछड़ा बताकर सामाजिक वैमनस्य पैदा केवल इसी ‘विशेष सम्मान’ की आड़ में पैदा किया गया है। आज हालत यह है कि पहले से अधिक जातिपाति का  फैल गया है।
विकास, सम्मान और आर्थिक समृद्धि की आशाऐं जगाकर भारतीय अध्यात्म ज्ञान को ढंकने का प्रयास किया गया।  ऐसी आशायें जो कभी पूरी नहीं होती और अगर हो भी जायें तो उनसे किसी मनुष्य को तत्वज्ञान नहीं मिलता जिसके परिणाम स्वरूप समाज में आज रोगों का प्रकोप और तनाव का वातावरण बन गया है।
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मनु दर्शन-क्रोध और गालियां देने के बुरे परिणाम होते हैं


मनु महाराज के अनुसार 
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अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन्
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्

हिन्दी में भावार्थ-सन्यासी और श्रेष्ठ पुरुषों को दूसरे लोगों द्वारा कहे कटु वचनों को सहन करना चाहिए। कटु शब्द (गाली) का उत्तर वैसे ही शब्द से नहीं दिया जाना चाहिए और न किसी का अपमान करना चाहिए। इस नश्वर शरीर के लिये सन्यासी और श्रेष्ठ पुरुष को किसी से शत्रुता नहीं करना चाहिए।
क्रुद्धयन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रृष्टः कुशलं वदेत्
साप्तद्वाराऽवकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत्
।।
 हिन्दी में भावार्थ – सन्यासी एवं श्रेष्ठ पुरुषों को कभी भी क्रोध करने वाले के प्रत्युत्तर में क्रोध का भाव व्यक्त नहीं करना चाहिए। अपने निंदक के प्रति भी सद्भाव रखना चाहिए। अपनी देह के सातों द्वारों -पांचों ज्ञानेंद्रियों नाक, कान, आंख, हाथ वाणी और विचार, मन तथा बुद्धि-से सद्व्यवहार करते हुए कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिए।

वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-सामान्य मनुष्य में सहिष्णुता और ज्ञान का अभाव होता है जबकि ज्ञानी लोग शांत और सत्य पथ पर दृढ़ता पूर्वक चलते हैं। फिर आजकल खान पान और रहन सहन की वजह से समाज में क्रोध, निराशा तथा हिंसका की भावना बढ़ रही है।  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार गुण ही गुणों को बरतते हैं। इस वैज्ञानिक सिद्धांत को ध्यान में रखें तो आजकल दवाईयों से उपजाये गये अन्न तथा सब्जियों का सेवन हर आदमी कर रहा है जिनसे शरीर के रक्त में विषैले तत्वों का बहना स्वाभाविक है। इन्हीं विषैले तत्वों का प्रभाव मनुष्य के मन, वचन, कर्म था वाणी पर पड़े बिना नहीं रह सकता जो अंततः व्यवहार में प्रकट होते हैं।  इसलिये जरा जरा सी बात पर उत्तेजित और निराश होने वाले लोगों को देखकर ज्ञानी विचलित नहीं होते क्योंकि वह जानते हैं कि मनुष्य तो गुणों के अधीन है और जिन तत्वों से वह संचालित हैं वह विषैले हैं।
तत्वज्ञानी इसलिये किसी की प्रशंसा से प्रसन्न होकर नाचते नहीं है तो गालियां देने पर भी अपने अंदर क्रोध को स्थान नहीं देते।  अगर कोई एक गाली देगा और उसके प्रत्तयुतर में दूसरा भी गाली देगा मगर फिर पहले वाला फिर गाली देगा। इस तरह अगर दोनों अज्ञानी हैं तो गालियां का समंदर बन जायेगा पर अगर एक ज्ञानी है तो वह चुपचाप गाली देने से वाले दूर हो जायेगा।  यही स्थिति क्रोध की है।  समय के अनुसार अच्छा और बुरा समय आता है और भले और लोग भी मिलते हैं। ज्ञानी लोग दूसरे का स्वभाव देखकर व्यवहार करते हैं जबकि अज्ञानी अपने स्वभाव के अनुसार दूसरे का चाल चरित्र देखना चाहते हैं। ऐसा न होने पर उनके अंदर क्रोध की उत्पति होती है जो कालांतर में मनुष्य देह को जलाता है।  
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संत कबीर दर्शन -प्रेम हमेशा बराबरी वालों में करना चाहिए


प्रीति ताहि सो कीजिये, जो आप समाना होय
कबहुक जो अवगुन पडै+, गुन ही लहै समोय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रीति उसी से करना चाहिए, जो अपने समान ही हृदय में प्रेम धारण करने वाले हों। यह प्रेम इस तरह का होना चाहिए कि समय-असमय किसी से भूल हो जाये तो उसे प्रेमी क्षमा कर भूल जायें।
यह तत वह तत एक है, एक प्रान दुइ गात
अपने जिये से जानिये, मेरे जिय की बात

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी लोगों की देह में जीव तत्व एक ही है। आपस में प्रेम करने वालों में कोई भेद नहीं होता क्योंकि दोनो के प्राण एक ही होता है। इस गूढ रहस्य को वे ही जानते हैं जो वास्तव में प्रेमी होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-प्रेम किया नहीं हो जाता है यह फिल्मों द्वारा संदेश इस देश में प्रचारित किया जाता है। सच तो यह है कि ऐसा प्रेम केवल देह में स्थित काम भावना की वजह से किया जाता है। प्रेम हमेशा उस व्यक्ति के साथ किया जाना चाहिए जो वैचारिक सांस्कारिक स्तर पर अपने समान हो। जिनका हृदय भगवान भक्ति में रहता है उनको सांसरिक विषयों की चर्चा करने वाले लोग विष के समान प्रतीत होते हैं। यहां दिन में अनेक लोग मिलते है पर सभी प्रेमी नहीं हो जाते। कुछ लोग छल कपट के भाव से मिलते हैं तो कुछ लोग स्वार्थ के भाव से अपना संपर्क बढ़ाते हैं। भावावेश  में आकर किसी को अपना सहृदय मानना ठीक नहीं है। जो भक्ति भाव में रहकर निष्काम से जीवन व्यतीत करता है उनसे संपर्क रखने से अपने आपको सुख की अनुभूति मिलती है।
वैसे बाज़ार तथा उसके प्रचार तंत्र ने प्रेम को केवल युवक युवती के इर्द गिर्द समेट कर रख दिया है जो कि केवल यौवन से उपजा एक भाव है।  कहीं न कहीं इसमें हवस का भाव रहता है। यही कारण है कि हमारे देश में आजकल कथित प्रेम में लिप्त प्रेमी और प्रेमियों के साथ ऐसे हादसे पेश आते हैं जिनसे उनकी जिंदगी तक समाप्त हो जाती है या फिर बदनामी का सामना करना पड़ता है। 
यौवन से उपजा यह आकर्षण प्रेम नहीं है पर अगर थोड़ी देर के लिये मान भी लिया जाये तो भी उसमें आर्थिक, सामाजिक तथा वैचारिक स्तर की समानता होना आवश्यक है वरना विवाह बाद जब आकर्षण कम होता है तब व्यक्तिगत विविधता तनाव का कारण बनती है।  कहते हैं कि बेटी हमेशा बड़े घर में देना चाहिये और बहु हमेशा छोटे घर से लाना चाहिये।  स्पष्टत इसके पीछे तर्क यही है कि विवाह बाद आर्थिक तथा सामाजिक सामंजस्य बना रहे।  अगर लड़की छोटे घर जायेगी तो तकलीफ उठायेगी। उसी तरह बहुत अगर अमीर घर से आयेगी तो उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करना कठिन हो जायेगा। कहने का अभिप्राय यह है कि प्रेम क्षणिक पर जीवन व्यापक है इसलिये संबंध स्थापित करते समय सब तरह की बातों का ध्यान रखना चाहिये।
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संत कबीरदास के दोहे-मित्रता से भक्ति और सत्संग में बाधा आती है (bhakti aur satsang-kabir das ji ke dohe)


दुनिया सेती दोसती, होय भजन के भंग
एका एकी राम सों, कै साधुन के संग।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोगों के साथ मित्रता बढ़ाने से भगवान की भक्ति में  बाधा आती है। एकांत में बैठकर भगवान राम का स्मरण करना चाहिये या साधुओं की संगत करना चाहिए तभी भक्ति प्राप्त हो सकती है।
ऊजल पहिनै कापड़ा, पान सुपारी खाय
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग साफ-सुथरे कपड़े पहन कर पान और सुपारी खाते हुए जीवन व्यतीत करते हैं। गुरु की भक्ति के बिना उनका जीवन निरर्थक व्यतीत करते हुए मृत्यु को प्राप्त होते हैं
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय  व्याख्या-भक्ति लोग अब जोर से शोर मचाते हुए कर रहे हैं। मंदिरों और प्रार्थना घरों में फिल्मी गानों की तर्ज पर भजन सुनकर लोग ऐसे नृत्य करते हैं मानो वह भगवान की भक्ति कर रहे हैं। समूह बनाकर दूर शहरों में मंदिरों में स्थित प्रतिमाओं के दर्शन करने जाते हैं। जबकि इससे स्वयं और दूसरों को दिखाने की भक्ति तो हो जाती है, पर मन में संतोष नहीं होता। मनुष्य भक्ति करता है ताकि उसे मन की शांति प्राप्त हो जाये पर इस तरह भीड़भाड़ में शोर मचाते हुए भगवान का स्मरण करना व्यर्थ होता है क्योंकि हमारा ध्यान एक तरफ नहीं लगा रहता। सच तो यह है कि भक्ति और साधना एकांत में होती है। जितनी ध्यान में एकाग्रता होगी उतनी ही विचारों में स्वच्छता और पवित्रता आयेगी। अगर हम यह सोचेंगे कि कोई हमारे साथ इस भक्ति में सहचर बने तो यह संभव नहीं है। अगर कोई व्यक्ति साथ होगा या हमारा ध्यान कहीं और लगेगा तो भक्ति भाव में एकाग्रता नहीं आ सकती। अगर हम चाहते हैं कि भगवान की भक्ति करते हुए मन को शांति मिले तो एकांत में साधना का प्रयास करना चाहिए।
कहने का अभिप्राय यह है कि भक्ति और सत्संग का मानसिक लाभ तभी मिल सकता है जब उसे एकांत में किया जाये। अगर शोर शराबे के साथ भीड़ में भक्ति या भजन गायेंगे तो फिर न केवल अपना ध्यान भंग होगा बल्कि दूसरे के कानों में भी अनावश्यक कटु स्वर का प्रसारण करेंगे। 
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रहीम संदेश-सुख दुःख तो चौसर की गोट की तरह हैं (rahim ke dohe-sukh dukh)


जब लगि जीवन जगत में, सुख दुख मिलन अगोट
रहिमन फूटे ज्यों, परत दुहुंन सिर चोट
कविवर रहीम कहते हैं कि इस जगत में जीवन है तब तक सुख और दुख और मिलते रहेंगे। यह ऐसे ही जैसे चौसर  की गोट को गोट मारने से दोनो के सिर पर चोट लगती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में दुःख और सुख दोनों ही रहते हैं। जिस तरह किसी भी खेल में दो खिलाड़ी होते हैं तभी खेल हो पाता है उसी तरह ही जीवन की अनुभूति भी तभी हो पाती है जब दुख और सुख आते हैं। सूरज डूबता है तभी आकाश में समस्त तारे और चंद्रमा दिखाई पड़ता ह। अगर यह प्रकृति द्वारा निर्मित चक्र घूमे नहीं तो हमें दिल औ रात का पता ही न चले-ऐसे मे क्या यह एकरसता हमें तकलीफ नहीं देगी?
गर्मी के दिनों में भी जब हम कूलर में बैठे रहते हैं तो घबड़ाहट होने लगती है और उस समय भी थोड़ी घूप का सेवन  केवल हमें राहत देता है। गर्मी में धूप कितनी कठोर और दुखःदायी लगती है पर कूलर में भी बहुत देर तक बैठना दुखदायी हो जाता है। इस तरह यह दुख सुख का चक्र है। यह देखा जाये तो यह वास्तव में भ्रम भी है। दुख और सुख मन के भाव हैं। इसलिये अगर हमारे साथ जो परेशानियां हैं उनको सहज भाव से लें तो हमें दुख की अनुभूति नहीं होगी। अगर हम इस चक्र को लेकर प्रसन्न या दुखी होंगे तो उससे मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न होता है जो कि वास्तव में कई रोगों का जनक है और उसका इलाज किसी के पास नहीं है। कहने का अभिप्राय यह है कि दुःख सुख तो मनस्थिति के अनुसार अनुभव होते हैं, पर हम सृष्टि के इस सत्य को नहीं समझ पाते और सुख मिलने पर उछलने लगते हैं और दुःख होने पर तनाव से घिर जाते हैं।

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संकलक, लेखक तथा संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर
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संत कबीर के दोहे-अपनी मति नहीं तो बड़े होने से क्या लाभ (bade hone se kya labh-hindu dharma sandesh)


हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुराय
लोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जाय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि तो हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं और लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जोरे बड़ मति नांहि
जैसे फूल उजाड़ को, मिथ्या हो झड़ जांहि
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आदमी धन, पद और सम्मान पाकर बड़ा हुआ तो भी क्या अगर उसके पास अपनी मति नहीं है। वह ऐसे ही है जैसे बियावन उजड़े जंगल में फूल खिल कर बिना किसी के काम आये मुरझा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय ने ऐसी करवट ली है कि इस समय धर्म और जनकल्याण के नाम पर भी व्यवसाय हो गया है। इस मायावी दुनियां में यह पता ही नहीं लगता कि सत्य और माया है क्या? जिसे देखो भौतिकता की तरफ भाग रहा है। क्या साधु और क्या भक्त सब दिखावे की भक्ति में लगे हैं। राजा तो क्या संत भी अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं। उनको देखकर लोग वाह-वाह करते हैं। सोचते हैं हां, राजा और संत को इस तरह रहना चाहिये। सत्य तो यह है कि इस तरह तो वह भी लोग भी भ्रम में हो जाते हैं और उनमें अहंकार आ जाता है और दिखावे के लिये सभी धर्म करते हैं और फिर अपनी मायावी दुनियां में अपना रंग भी दिखाते हैं। ऐसे लोग पुण्य नहीं पाप में लिप्त है और उन्हें भगवान भक्ति से मिलने वाला सुख नहीं मिलता और वह अपने किये का दंड भोगते हैं।
यह शाश्वत सत्य है कि भक्ति का आनंद त्याग में है और मोह अनेक पापों को जन्म देता है। सच्ची भक्ति तो एकांत में होती है न कि ढोल नगाड़े बजाकर उसका प्रचार किया जाता है। हम जिन्हें बड़ा व्यक्ति या भक्त कहते हैं उनके पास अपना ज्ञान और बुद्धि कैसी है यह नहीं देखते। बड़ा आदमी वही है जो अपनी संपत्ति से वास्तव में छोटे लोगों का भला करता है न कि उसका दिखावा। आपने देखा होगा कि कई बड़े लोग अनेक कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिये करते हैं और फिर उसकी आय किन्हीं कल्याण संस्थाओं को देते हैं। यह सिर्फ नाटकबाजी है। वह लोग अपने को बड़ा आदमी सबित करने के लिये ही ऐसा करते हैं उनका और कोई इसके पीछे जनकल्याण करने का भाव नहीं होता।
कभी कभी तो लगता है कि जनकल्याण का नारा देने वाले लोग बड़े पद पर प्रतिष्ठत हो गये हैं पर लगता नहीं कि उनके पास अपनी मति है क्योंकि वह दूसरों की राय लेकर काम करने आदी हो गये हैं। ऐसे लोगों के लिये कल्याण तो बस दिखावा है वह तो उसके नाम पर सुख तथा एश्वर्य प्राप्त करने में ही अपने को धन्य समझते हैं।

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