Category Archives: मस्तराम

उनके आंगन हुए रोशन-हिन्दी व्यंग्य कविता (unke ghar hue roshan-hindi vyangya kavitaen)


बरसों से उस आदमी को
ठेले पर सामान ढोते देखा है,
गमी, सर्दी और बरसात से
बेखबर वह चलता रहा है।
युवावस्था से वृद्धावस्था तक
उसे जीवन एक संघर्ष की तरह जिया है,
अपना ढेर सारा दर्द उसे खुद पिया है,
उस जैसे लोगों को जगाने,
लिखे गये ढेर सारे गाने,
कई लिखी किताबें उसकी हमदर्दी के लिये,
फिर भी चलता रहा अपने साथ बेदर्दी किये,
बहुत सारे घोषणपत्र जारी हुए,
पर फिर नहीं किसी ने अपने वादे छुए,
उसके पेट भरने के लिये
बड़ी बड़ी बहसें होती हैं,
कई रुदालियां भी नकली आंसु लिये रोती हैं,
उसकी रोटी के नाम पर
कई रसोई घर सज गये,
कई इमारतों के मुहूर्त पर बैंड बज गये,
मगर वह खुले आसमान में खुद पलता रहा है।
———–
उनके घर में रोशनी इसलिये ज्यादा है,
क्योंकि दूसरों की लूट का भी हिस्सा आधा है,
अंधेरा छा गया है कई घरों में
तब उनके आंगन हुए रोशन
क्योंकि उन्होंने शहर चमकाने का
बेचा वादा है।
———

नैतिकता और बेईमान का पैमाना
पता नहीं कब तय किया जायेगा,
वरना तो हर इंसान सौ फीसदी शुद्धता के फेरे में
हमेशा ही अपने को अकेला पायेगा।
सफेद ख्याल में काली नीयत की मिलावट
सही पैमाना तय हो जाये
तब तोल तोलकर हर कोई
अपने जैसे लोग जुटायेगा।
————-
कत्ल करने वाला
कौन कातिल कौन पहरेदार
इसका भी पैमाना जब तय किया जायेगा,
तभी ज़माना रहेगा सुकून से
हर कत्ल पर शोर नहीं मचायेगा।
वैसे भी कातिल और पहरेदार
वर्दी पहनने लगे एक जैसी,
अक्लमंदों की भीड़ भी जुटी है वैसी,
कुछ इंसानों का बेकसूर मारने की
छूट भी मिल जाये तो कोई बात नहीं
बहसबाजों को भी अपने अपने हिसाब से
इंसानियत के पैमाने तय करने का
हक आसानी से मौका मिल जायेगा।
————

कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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चमचागिरी से ही बन जाती है चाट-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (chamchagiri se ban jati hai chat-hindi satire poem)


जिंदगी में सफलता के लिये
अब पापड़ नहीं बेलने पड़ते हैं
  चमचागिरी से ही बन जाती है चाट
बस, बड़े लोगों की दरबार में हाज़िर होकर
उनकी तारीफ में चंद शब्द ठेलने पड़ते हैं ।
——-
 


महंगाई ने इंसान की नीयत को
सस्ता बना दिया है,
पांच सौ और हजार के नोट
छापने के फायदे हैं
इसलिये  बड़े नोट के सायों   ने
बदनीयत लोगों को खरीदकर
थोकबंद जमा कर दिया है।
——–
अपने हाथों से ही सजा देना अपनी छबि
इंसान खो चुके हैं पहचान अच्छे बुरे की।
अपने आप बन रहे सभी मियां मिट्ठू
तारीफों में परोसते बात ऐसी, जो लगे छुरे की।
——–

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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आधुनिक लोकतंत्र के सिद्ध-हिन्दी व्यंग्य (adhunik loktantra ke siddh-hindi vyangya


फिलीपीन के राजधानी मनीला में एक बस अपहरण कांड में सात यात्री मारे गये और दुनियां भर के प्रचार माध्यम इस बात से संतुष्ट रहे कि बाकी को बचा लिया गया। इस बस का अपहरण एक निलंबित पुलिस अधिकारी ने किया था जो बाद में मारा गया। पूरा दृश्य देखकर ऐसा लगा कि जैसे तय कर लिया गया था कि दुनियां भर के प्रचार माध्यमों को सनसनी परोसनी है भले ही अंदर बैठे सभी यात्रियों की जान चली जाये जो एक निलंबित पुलिस अधिकारी के हाथ में रखी एक 47 के भय के नीचे सांस ले रहे थे। एक आसान से काम को मुश्किल बनाकर जिस तरह संकट से निपटा गया वह कई तरह के सवाल खड़े करता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ ने कहा था कि ‘लोकतंत्र में क्लर्क राज्य करते हैं।’ यह बात उस समय समझ में नहीं आती जब शैक्षणिक काल में पढ़ाई जाती है। बाद में भी तभी समझ में आती है जब थोड़ा बहुत चिंतन करने की क्षमता हो। वरना तो क्लर्क से आशय केवल फाईलें तैयार करने वाला एक लेखकर्मी ही होता है। उन फाईलों पर हस्ताक्षर करने वाले को अधिकारी कहा जाता है जबकि होता तो वह भी क्लर्क ही है। अगर एडमस्मिथ की बात का रहस्य समझें तो उसका आशय फाईलों से जुड़े हर शख्स से था जो सोचता ही गुलामों की तरह है पर करता राज्य है।
अपहर्ता निलंबित पुलिस अधिकारी ने अपनी नौकरी बहाल करने की मांग की थी। बस में पच्चीस यात्री थे। उसमें से उसने कुछ को उसने रिहा किया तो ड्राइवर उससे आंख बचाकर भाग निकला। उससे दस घंटे तक बातचीत होती रही। नतीजा सिफर रहा और फिर फिर सुरक्षा बलों ने कार्यवाही की। बस मुक्त हुई तो लोगों ने वहां जश्न मनाया। एक लोहे लंगर का ढांचा मुक्त हो गया उस पर जश्न! जो मरे उन पर शोक कौन मनाता है? उनके अपने ही न!
संभव है पुलिस अधिकारी की नाराजगी को देखते हुए कुछ बुद्धिजीवी उसका समर्थन भी करें पर सवाल यहां इससे निपटने का है।
अपहर्ता ने बस पकड़ी तो उससे निपटने का दायित्व पुलिस का था मगर उसकी मांगें मानने का अधिकार तो नागरिक अधिकारियों यानि उच्च क्लर्कों के पास ही था। आखिर उस अपहर्ता से दस घंटे क्या बातचीत होती रही होगी? इस बात को कौन समझ रहा होगा कि एक पूर्व पुलिस अधिकारी के नाते उसमें कितनी हिंसक प्रवृत्तियां होंगी। चालाकी और धोखे से उसका परास्त किया जा सकता था मगर पुलिस के लिये यह संभव नहीं था और जो नागरिक अधिकारी यह कर सकते थे वह झूठा और धोखा देने वाला काम करने से घबड़ाते होंगे।
अगर नागरिक अधिकारी या क्लर्क पहले ही घंटे में उससे एक झूठ मूठ का आदेश पकड़ा देते जिसमें लिखा होता कि ‘तुम्हारी नौकरी बहाल, तुम्हें तो पदोन्नति दी जायेगी। हमने पाया है कि तुम्हें झूठा फंसाया गया है और ऐसा करने वालों को हमने निलंबित कर दिया है। यह लो उनके भी आदेश की प्रति! तुम्हें तो फिलीपीन का सर्वोच्च सम्मान भी दिया जायेगा।’
उसके निंलबन आदेश लिखित में थे इसलिये उसे लिखा हुआ कागज देकर ही भरमाया जा सकता था। जब वह बस छोड़ देता तब अपनी बात से पलटा जा सकता था। यह किसने कहा है कि अपनी प्रजा की रक्षा के लिये राज्य प्रमुख या उसके द्वारा नियुक्त क्लर्क-अजी, पद का नाम कुछ भी हो, सभी जगह हैं तो इसी तरह के लोग-झूठ नहीं बोल सकते। कोई भी अदालत इस तरह का झूठ बोलने पर राज्य को दंडित नहीं  कर सकती। पकड़े गये अपराधी को उल्टे सजा देगी वह अलग विषय है।
हम यह दावा नहीं करते कि अपराधी लिखित में मिलने पर मान जाता पर क्या ऐसा प्रयास किया गया? कम से कम यह बात तो अभी तक जानकारी में नहीं आयी।
किसी भी राज्य प्रमुख और उसके क्लर्क को साम, दाम, दण्ड और भेद नीति से काम करने का प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है। अपनी प्रजा के लिये छल कपट करना तो राष्ट्रभक्ति की श्रेणी में आता है। मगर यह बात समझी नहीं गयी या कुछ होता दिखे इस प्रवृत्ति के तहत दस घंटे तक मामला खींचा गया कहना कठिन है।
बात केवल फिलीपीन की नहीं  पूरी दुनियां की है। सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की है। नीतिगत निर्णय क्लर्क-जिनको हस्ताक्षर करने का अधिकार है उन क्लर्कों को अधिकारी कह कर बुलाया जाता है-लेते हैं। सजायें अदालतें सुनाती हैं। ऐसे में आपात स्थिति में संकट के सीधे सामने खड़ा पुलिस कर्मी दो तरह के संकट में होता है। एक तो यह कि उसके पास सजा देने का हक नहीं है। गलत तरह का लिखित आश्वासन देकर अपराधी को वह फंसा नहीं सकता क्योंकि वह उस पर यकीन नहीं करेगा यह जानते हुए कि कानून में उसके पास कोई अधिकारी नहीं है और बिना मुकदमे के दंड देने पर पुलिस कर्मचारी खुद ही फंस सकता हैै।
ऐसे में आधुनिक लोकतंत्र में क्लर्कों का जलजला है। संकट सामने हैं पर उससे निपटने का उनका सीधा जिम्मा नहीं है। मरेगा तो पुलिस कर्मचारी या अपराधी! इसलिये वह अपनी कुर्सी पर बैठा दर्शक की तरह कुश्ती देख रहा होता है। बात करने वाले क्लर्क भी अपने अधिकार को झूठमूठ भी नहीं छोड़ सकते। वह कानून का हवाला देते हैं ‘हम ऐसा नहीं कर सकते।’
जहां माल मिले वहां कहते हैं कि ‘हम ही सब कर सकते हैं’
पूरी दुनियां में अमेरिका और ब्रिटेन की नकल का लोकतंत्र है। वहां राज्य करने वाले की सीधी कोई जिम्मेदारी नहीं है। यही हाल अर्थव्यवस्था का है। कंपनी नाम का एक दैत्य सभी जगह बन गया है जिसका कोई रंग रूप नहीं है। जो लोग उन्हें चला रहे हैं उन पर कोई प्रत्यक्ष आर्थिक दायित्व नहीं है। यही कारण है कि अनेक जगह कंपनियों के चेयरमेन ही अपनी कंपनी को डुबोकर अपना घर भरते हैं। दुनियां भर के क्लर्क उनसे जेबे भरते हैं पर उनका नाम भी कोई नहीं ले सकता।
ऐसे में आतंकवाद एक व्यापार बन गया है। उससे लड़ने की सीधी जिम्मेदारी लेने वाले विभाग केवल अपराधियों को पकड़ने तक ही अपना काम सीमित रखते हैं। कहीं अपहरण या आतंक की घटना सामने आये तो उन्हें अपने ऊपर बैठे क्लर्कों की तरफ देखना पड़ता है जो केवल कानून की किताब देखते हैं। उससे अलग हटकर वह कोई कागज़ झूठमूठ भी तैयार नहीं कर सकते क्योंकि कौन उन पर सीधे जिम्मेदारी आनी है। जब घटना दुर्घटना में बदल जाये तो फिर डाल देते हैं सुरक्षा बलों पर जिम्मेदारी। जिनको रणनीति बनानी है वह केवल सख्ती से निपटने का दंभ भरते हैं। ऐसे में इन घटनाओं में अपनी नन्हीं सी जान लेकर फंसा आम इंसान भगवान भरोसे होता है।
मनीला की उस अपहृत बस में जब सुरक्षा बल कांच तोड़ रहे थे तब देखने वालों को अंदर बैठे हांगकांग के उन पर्यटकों को लेकर चिंता लगी होगी जो भयाक्रांत थे। ऐसे में सात यात्री मारे गये तो यह शर्मनाक बात थी। सब भी मारे जाते तो भी शायद लोग जश्न मनाते क्योंकि एक अपहृता मरना ही उनके लिए खुशी की बात थी। फिर अंदर बैठे यात्री किसे दिख रहे थे। जो बचे वह चले गये और जो नहीं बचे उनको भी ले जाया गया। आज़ाद बस तो दिख रही है।
अब संभव है क्लर्क लोग उस एतिहासिक बस को कहीं रखकर वहां उसका पर्यटन स्थल बना दें। आजकल जिस तरह संकीर्ण मानसिकता के लोग हैं तुच्छ चीजों में मनोरंजन पाते हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि यकीनन उस स्थल पर भारी भीड़ लगेगी। हर साल वहां मरे यात्रियों की याद में चिराग भी जल सकते हैं। उस स्थल पर नियंत्रण के लिये अलग से क्लर्कों की नियुक्ति भी हो सकती है। कहीं  उस स्थल पर कभी हमला हुआ तो फिर पुलिस आयेगी और कोई एतिहासिक घटना हुई तो उसी स्थान पर एक ही साल में दो दो बरसियां मनेंगी।
आखिरी बात यह कि अर्थशास्त्री एडस्मिथ अमेरिका या ब्रिटेन का यह तो पता नहीं पर इन दोनों  में से किसी एक का जरूर रहा था और उसने इन दोनों की स्थिति देखकर ही ऐसा कहा होगा। अब जब पूरे विश्व में यही व्यवस्था तो कहना ही पड़ता है कि गलत नहीं कहा होगा। आधुनिक लोकतंत्र में क्लर्क ही सिद्ध होते हैं।

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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तबादला-हिन्दी हास्य कविता (tabadla-hindi shaya kavita


अपने तबादले से वह खुश नहीं थे,
क्योंकि नयी जगह पर
ऊपरी कमाई के अवसर कुछ नहीं थे,
इसलिये अपने बॉस के जाकर बोले,
‘‘मैंने तो आपकी आज्ञा का पालन
हमेशा वफादार की तरह किया,
मेरी टेबल पर जो भी तोहफा आया
बाद में डाला अपनी जेब में
आपका हिस्सा पहले आपके हवाले किया,
यह आप मेरे पेट पर क्यों मार रहे लात,
जो तबादले की कर दी घात।’’

बॉस ने रुंआसे होकर कहा
‘‘शायद तुम्हें पता नहीं
तुम्हारी वज़ह से मेरे ऊपर भी
संभावित जांच की तलवार लटकी है,
प्रचार वालों की नज़र अब तुम पर भी अटकी है,
जब आता है अपने पर संकट
तब शिकार के रूप में पेश
अपना वफ़ादार ही किया जाता है,
दाना दुश्मन से निपटते हैं बाद में
पहले नांदा दोस्त मिटाया जाता है,
तुम्हारे सभी जगह चर्चे हैं,
कि जितनी आमदनी है
उससे कई गुना घर के खर्चे हैं,
भला कौन बॉस सहन कर सकता है
अपने मातहत से अपनी तुलना,
बता रहे हैं लोग तुमको मेरे बराबर अमीर
तुम भी अब जाकर सुनना,
अधिकारी के अगाड़ी तुम चल रहे थे,
जैसे हम तुम्हारे हिस्से पर ही पल रहे थे,
एक तो छोटे के पिछाड़ी चलना मुझे मंजूर न था,
फिर तुम्हारी वज़ह से
हमारी मुसीबत का दिन भी दूर न था,
इसलिये तुम्हारा तबादला कर दिया,
अपने वफादार भी हम नहीं कृपालु
यह साबित कर
बदनामी से बचने के लिये रफादफा मामला कर दिया,
तुम्हारी वफदारी का यह है इनाम,
बर्खास्तगी का नहीं किया काम,
तबादले पर ही खत्म कर दी बात।
———

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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बरसात के मौसम का दर्शन-हिन्दी व्यंग्य (barsat ke mausam ka darshan-hindi vyangya)


पुरानी लोक कथा है जिसे सभी पढ़ या सुन चुके हैं। एक किसान अपनी दो बेटियों से मिलने गया। एक बेटी किसान के घर में ब्याही थी। वह उससे मिलकर अपने घर जाने को तैयार हुआ तो बेटी ने कहा-‘पिताजी, भगवान से प्रार्थना करिये इस बार बरसात जल्दी और अच्छी हो क्योंकि अब खेतों में बोहनी का समय निकल रहा है।’
किसान ने कहा-‘हां भगवान से प्रार्थना करूंगा कि इस बार अच्छी और जल्दी बारिश हो।’
उसके बाद वह अपनी दूसरी बेटी से मिलने गया तो चलते समय उस बेटी नेे कहा-‘पिताजी, भगवान से प्रार्थना करिये कि अभी बारिश न हो क्योंकि
हमारे मटके धूप में सूखने के लिये रखे हुए हैं अगर पानी पड़ा तो सब बरबाद हो जायेगा। फिर बारिश होते ही उनकी बिक्री भी कम हो जाती है।’
यह तो पुरानी कहानी है जिसमें वर्षा ऋतु को लेकर मनुष्य समाज का अंतर्विरोध दर्शाया गया है पर वर्तमान समय में तो यही अंतर्विरोध एक मनुष्य में ही सिमट गया है और खासतौर से शहरी सभ्यता में तो इसके दर्शन प्रत्यक्ष किये जा सकते हैं।
हमारा घर ऐसी कालोनी में है जिसमें अपनी बोरिंग से ही पानी आता है। पिछले पांच छह वर्षों से गर्मियों में जिस संकट का सामना करना पड़ता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। इस बार फरवरी से ही संकट प्रारंभ हुआ जो हैरानी की बात थी। पिछली बार बारिश अच्छी हुई थी इसलिये हमें आशा थी कि इस बार पानी का स्तर अधिक नीचे नहीं जायेगा मगर फरवरी से ही संकट प्रारंभ हो गया। पानी पांच मिनट आता फिर बंद हो जाता था। तब बार बार मशीन बंद कर चलाना पड़ता। अप्रैल आते आते यह दो मिनट तक रह गया। जून आते आते एक मिनट तक रह गया। दरअसल हमारा इलाका पानी की बहुलता के लिये जाना जाता है और अनेक कारखाने इसलिये वहां बड़ी बड़ी मशीने लगाकर उसका दोहन करने लगे हैं।
अब समस्या दूसरी थी। अगर बोरिंग खुलवाते हैं तो कमरे में जाने वाला पाईप भी गल चुका है और उसे भी बदलवाना पड़ेगा क्योंकि वहां से हवा पकड़ लेती है। दो साल पहले पाईप दस फुट बढ़वाया था और अब उसमें बढ़ने की संभावना है कि पता नहीं। सोचा जब तक चल रहा है चलने दो। कहीं खुलवाया तो इससे भी न चले जायें। दूसरी बोरिंग खुदवाना इस समय महंगा काम हो सकता है दूसरा यह कि हम भी प्रंद्रह वर्षों से अपनी इस आशा को जिंदा रखते रहे हैं कि कालौनी में सरकारी पानी की लाईन आ जायेगी।
बहरहाल ऐसे में हमें बरसात से ही आसरा था। हर रोज यही लगता था कि आज पानी ने साथ छोड़ा कि अब छोड़ा। पिछले शनिवार जब आकाश में बादल चिढ़ा रहे थे तब तो लग रहा था कि अब पानी भी चिढ़ाने वाला है। आकाश से बादल चले जा रहे और नीचे सूखा। फिर उमस ऐसी कि लगता था कि शायद नरक इसे ही कहा जाता है।
ऐसे में बरसात हुई तो मजा आ गया। उम्मीद है कि कम से कम पानी अभी तत्काल साथ नहीं छोड़ेगा मगर सड़कों क्या करें? रात को घर लौटते हुए घर पहुंचना किसी जंग से कम नहीं लगता। सभी जगह विकास कार्यों की वजह से कीचड़! कई जगह बाई पास मार्ग ढूंढना पड़ता है। सबसे बड़ी बात यह कि अपनी कालोनी की सड़क अब पूरी तरह से मिट्टी वाली हो गयी है और डंबर नाममात्र को भी नहीं है, मगर यही सडक अब एक तरह से पानी संचय का काम करती है क्योकि बाकी जगह तो मकान बन गये हैं। जगह जगह पानी भर गया है पर फिर भी सड़क बन जाये ऐसा ख्याल नहीं आता क्योंकि हमारी मुख्य समस्या तो पानी है।
शाम को घर आते हुए पानी की बूंदे गिर रही थीं, सड़कों से जूझते हुए बढ़ रहे थे पर फिर भी दिल में यह ख्याल नहीं आया कि बरसात बंद हो जाये।
खराब सड़क देखकर चिढ़ आती है कि ‘यहां डंबरीकरण क्यों नहीं हो रहा है’ पर तत्काल अपनी बोरिंग का ख्याल आता है तो सोचते हैं कि बरसात तो कभी कभी न थम जायेगी तो सड़क वैसे ही दिखाई देगी पर अगर पानी नहीं मिला तो सड़क पर ही कहीं जाकर सरकारी स्त्रोत से पानी भरना पड़ेगा।
पिछले ऐसा ही वाक्या हुआ।
एक हमारी जान पहचान के सज्जन है उनके यहां सरकारी नल से पानी आता है। संयोगवश उस दिन बरसात हो रही थी और वह हमारे साथ ही एक दुकान की छत के नीचे आसरा लिये खड़े हुए थे। पता नहीं कैसे वह बड़बड़ाये कि ‘हे भगवान, पानी बंद हो जाये तो घर पहुंच जाऊं।’
पास ही एक ग्रामीण अपनी साइकिल खड़ी करके वहां बैठा बीड़ी पी रहा था। वह बोला-‘भगवान और जोर से बारिस कर।
फिर वह उन सज्जन की तरफ मूंह कर बोला-‘कैसी बात कर रहे हो। हमारे गांव में बोरिंग से पानी बहुत कठिनाई से निकल रहा है। खेत सूखे पड़े हैं और आप हो कि बारिश शुरु हुई नहीं है कि उसे बंद करने की प्रार्थना करने लगे।’
उस ग्रामीण ने बात हमारे मन की कही थी पर हमारे अंदर भी वैसा ही अंतर्द्वंद्व था जैसा कि किसान के मन में बेटियों की वजह से आया होगा।
बहरहाल स्थिति यह है कि सड़कों की हालत यह है कि बरसात के दिनों मे घर से बाहर निकलने की इच्छा ही नही होती। वैसे भी हमारे देश के अध्यात्म दर्शन में वर्षा ऋतु में बाहर निकलना वर्जित किया गया है । वैसे कुछ समय पहले तक कहा जाता था कि वर्तमान समय में सड़कें आदि बन गयी हैं इसलिये अब इस धारा से मुक्ति पायी जानी चाहिए पर जब देश के विभिन्न शहरों की स्थिति देखते हैं तो यह धारा आज भी प्रभावी लगती है क्योंकि डंबरीकृत सड़कें्र एक बरसात में ही बह जाती हैं उस पानी से लबालब सड़क पर कहां सीवर लाईन का गटर है पता नहीं क्योंकि उनमें गिरने वालों की बहुत बड़ी संख्या रहती है-ऐसे समाचार अक्सर आते रहते हें तब लगता है कि वर्षा ऋतु में भारतीय अध्यात्म ज्ञान आज भी प्रासांगिक है।
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काग़ज और जुबान-हिन्दी क्षणिकाऐं (kagaz aur juban-hindi short story)


कागज़ की ताकत
आम आदमी की जुबान से बढ़ी है,
वह चाहे कुछ भी बोले
सच है वही कारनामा
जिसकी कलम से लिखापढ़ी है।
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शहर में हर जगह कागज़    पर सड़क बन गयी,
सभी गांवों मे तालाब खुद गया,
और हर कालोनी में हराभरा पार्क खिलाखिलाता
नज़र आया।
शायद आम आदमी आंखों से देख नहीं पाते
वरना तो हर अखबार की
छपी रिपोर्टों में सुखद समाचारों का
झुंड हर रोज आया।
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महंगाई का अर्थशास्त्र-हिन्दी व्यंग्य (black economics-hindi satire article)


किसी भी देश की मुद्रा पर अर्थशास्त्र में अनेक बातें पढ़ने को मिलती हैं पर उसके संख्यांक पर कहीं अधिक पढ़ने को नहीं मिलता अर्थात मुद्रा एक से लेकर एक हजार तक के अंक में छापी जाये या नहीं इस पर अधिक चर्चा नहीं मिलती। हम सीधी बात कहें तो डालर या सौ रुपये से ऊपर हो या नहीं इस पर अर्थशास्त्री अधिक विस्तार से विचार नहीं रखते। वजह शायद यह है कि आधुनिक अर्थशास्त्र की संरचना भी पुरानी है और तब शायद यह मुद्दा अधिक विचार योग्य नहीं था। इसलिये नये संदर्भ ंअब अर्थशास्त्र में जोड़ा जाना आवश्यक लगता है। हम बात कर रहे हैं भारत के सौ रुपये के ऊपर से नोटों की जिनका प्रचलन ऐसी समस्यायें पैदा कर रहा है जिनकी जानकारी शायद अर्थ नियंत्रण कर्ताओं को नहीं है। कभी कभी तो लगता है कि काली अर्थव्यवस्था के स्वामी अपने काला अर्थशास्त्र भी यहां चलाते हैं।
कुछ समय पूर्व योग शिक्षक स्वामी रामदेव ने बड़े अंक वाली मुद्रा छापने का मसला उठाया था पर उसे भारतीय प्रचार माध्यमों ने आगे नहीं बढ़ाया। एक दौ टीवी चैनल ने इस पर चर्चा की तो अकेले बाबा रामदेव के मुकाबले अनेक वक्ता थे जो भारत में पांच सौ और हजार के नोटों के पक्षधर दिखाई दिये क्योंकि वह सभी बड़े शहरों के प्रतिबद्ध तथा पेशेवर विद्वान थे जो संभवत प्रचार माध्यमों द्वारा इसी अवसर के लिये तैयार रखे जाते हैं कि कब कोई बहस हो और उनसे मनमाफिक बात कहलवाई जाये। यही हुआ भी! एक ऐसे ही विद्वान ने कहा कि ‘बड़े अंक की मुद्रा से उसे ढोने में सुविधा होती है और महंगाई बढ़ने के कारण रुपये की कीमत गिर गयी है इसलिये हजार और पांच सौ के नोट छापने जरूरी है।’
हैरानी होती है यह देखकर कि एक बहुत ही महत्व के मुद्दे पर कथित बुद्धिजीवी खामोश हैं-शायद कारों में घूमने, ऐसी में बैठने वाले तथा होटलों में खाना खाने वाले यह लोग नहीं जानते कि छोटे शहरों और गांवों के लिये आज भी हजार और पांच सौ का नोट अप्रासंगिक है। अनेक वस्तुऐं महंगी हुईं है पर कई वस्तुऐं ऐसी हैं जो अभी भी इतनी सस्ती हैं कि पांच सौ और हजार के नोट उससे बहुत बड़े हैं। टीवी, फ्रिज, कार, कंप्यूटर खरीदने में पांच सौ का नोट सुविधाजनक है पर सब्जियां तथा किराने का सामान सीमित मात्रा में खरीदने पर यह नोट बड़ा लगता है। दूसरा यह भी कि जिस अनुपात में आधुनिक सामानों के साथ उपभोक्ता वस्तुओं में मूल्य वृद्धि हुई है उतनी सेवा मूल्यों में नहीं हुई। मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि बहुंत कम होती है तथा लघू तथा ग्रामीण व्यवसायों में भी कोई बजट इतना बड़ा नहीं होता। वहां अभी भी सौ रुपये तक का नोट भी अपनी ताकत से काम चला रहा है तब पांच सौ तथा हजार के नोट छापना एक तरह से अर्थशास्त्र को चुनौती देता लगता है।
साइकिल के दोनों पहियों में हवा आज भी एक रुपये में भरी जाती है तो दुपहिया वाहनों के लिए दो रुपये लगते हैं। बढ़ती महंगाई देखकर यह विचार मन में आता है कि कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को हजार और पांच सौ नोटों के प्रचलन योग्य बनाने का प्रयास तो नहीं हो रहा है। कभी कभी तो लगता है कि जिन लोगों के पास पांच सौ या हजार के नोट बहुत बड़ी मात्रा मैं है वह उसे खपाना चाहते हैं इसलिये बढ़ती महंगाई देखकर खुश हो रहै हैं क्योंकि उसकी जावक के साथ आवक भी उनके यहां बढ़ेगी। दूसरी बात यह भी लगती है कि शायद पांच सौ और हजार नोटों की वजह से पांच तथा दस रुपये के सिक्के और नोट कम बन रहे हैं। इससे आम अर्थव्यवस्था में जीने वाले आदमी के लिये परेशानी हो रही है। आम व्यवस्था इसलिये कहा क्योंकि हजार और पांच सौ नोट उसके समानातंर एक खास अर्थव्यवस्था का प्रतीक हैं इसलिये ही अधिक रकम ढोने के लिये जो तर्क दिया जा रहा है जो केवल अमीरों के लिये ही सुविधाजनक है।
अनेक जगह कटे फटे पुराने नोटों की वजह से विवाद हो जाता है। अनेक बार ऐसे खराब छोटे नोट लोगों के पास आते हैं कि उनका चलना दूभर लगता है। उस दिन एक दुकानदार ने इस लेखक के सामने एक ग्राहक को पांच का पुराना नोट दिया। ग्राहक ने उसे वापस करते हुए कहा कि ‘कोई अच्छा नोट दो।’
दुकानदार ने उसके सामने अपनी दराज से पांच के सारे नोट रख दिये और
कहा कि ‘आप चाहें इनमें से कोई भी चुन लो। मैंने ग्राहकों को देने के लिये सौ नोट कमीशन देकर लिये हैं।’
वह सारे नोट खराब थै। पता नहीं दुकानदार सच कहा रहा था या झूठ पर पांच के वह सभी नोट बाज़ार में प्रचलन योग्य नहीं लगते थे। पुरानी मुद्रा नहीं मुद्रा को प्रचलन से बाहर कर देती है-यह अर्थशास्त्र का नियम है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि नयी मुद्रा पुरानी मुद्रा को प्रचलन में ला देती है पर इसके पीछे तार्किक आधार होना चाहिए। ऐसे पुराने और फटे नोट बाज़ार में प्रचलन में रहना हमारी बैकिंग व्यवस्था के लिये बहुत बड़ी चुनौती है।
हम यहां बड़ी मुद्रा के प्रचलन का विरोध नहीं कर रहे पर अर्थनियंत्रणकर्ताओं को छोटे और बडे नोटों की संरचना के समय अर्थव्यवस्था में गरीब, अमीर और मध्यम वर्ग के अनुपात को देखना चाहिए। वैसे यहां इस बात उल्लेख करना जरूरी है कि जितने भी विकसित और शक्तिशाली राष्ट्र हैं उनकी मुद्रा का अंतिम संख्यांक सौ से अधिक नहीं है। इसलिये जो देश को शक्तिशाली और विकसित बनाना चाहते हैं वह यह भी देखें कि कहंी यह बड़ी मुद्रा असंतुलन पैदा कर कहीं राष्ट्र को कमजोर तो नहीं कर देगी। कहीं हम आधुनिक अर्थशास्त्र को पढ़कर कहीं काला अर्थशास्त्र तो नहीं रचने जा रहे यह देखना देश के बुद्धिमान लोगों का दायित्व है।
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कमीशन का खेल-हास्य कविताएं


जिनकी दौलत की भूख को
सर्वशक्तिमान भी नहीं मिटा सकता,
लोगों के भले का जिम्मा
वही लोग लेते हैं,
भूखे की रोटी पके कहां से
वह पहले ही आटा और आग को
कमीशन में बदल लेते हैं।
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गरजने वाले बरसते नहीं,
काम करने वाले कहते नहीं,
फिर क्यों यकीन करते हैं वादा करने वालों का
को कभी उनको पूरा करते नहीं।
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अंग्रेजी की सनसनी हिन्दी में-व्यंग्य कवितायें


हिन्दी में सनसनी खेज खबर भी
अंग्रेजी अखबार से ही क्यों आती है,
जो हिन्दी में हो
वह सनसनी क्यों नहीं बन पाती है।
डरे हुए हैं बंधुआ कलम मजदूर
उनकी कमजोरी
शायद परायी भाषा में छिप जाती है।
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मखमली विकास तक ही
उनकी नज़र जाती है,
जहां पैबंद लगे हैं अभावों के
वहां पर आंखें बंद हो जाती हैं।
देसी गुलामों का नजरिया
विदेशी शहंशाहों को यहां गिरवी हैं,
जहां दलाली मिलती है
वहां जुबान दहाड़ती है
नहीं तो तालू से चिपक जाती है।
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नेकी और इंसानियत के सौदागर-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


सोना, चांदी, पीतल और तांबा
धातुओं के नाम हैं
जिनकी चमक फीकी पड़ जाती है।
पर फिर भी इंसान की आंखें
उनके बने सामान पर हो जाती हैं फिदा,
तब सोच हो लेती है विदा,
बाहर की रौशनी से दिल रौशन नहीं होते
फैशन की अंधी दौड़ में
बिना अकल के घोड़े पर सवार
इंसान कई बार धोखा खाकर गिरता है
फिर भी यह बात उसे समझ में नहीं आती है।
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ख्वाहिश होती है
जिनको अपना नाम आकाश में चमकाने की
चाल उनकी बिगड़ जाती है,
नेकी और इंसानियत के बन जाते सौदागर वही
घर के सामने का दरवाजा लगता मंदिर जैसा
दौलत उनके यहां पिछवाड़े से आती है।
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हैवानों से समझौता-हिन्दी कविता


वह खून की होली खेलकर
लाल क्रांति लाने का सपना दिखा रहे हैं,
भरे पेट उनके रोटी से
खेल रहे हैं
बेकसूरों की शरीर से निकली बोटी से,
हैवानियत भरी सिर से पांव तक उनके
वही गरीबों के मसीहा की तरह नाम लिखा रहे हैं।
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गोली का जवाब गोली ही हो सकती है
जानवरों से दोस्ती संभव है,
अकेले आशियाना बनाकर
जीना भी बुरा नहीं लगता
पर हैवानों से समझौता कर
अपनी अस्मिता गंवाना है,
लड़ने के लिये उनको
फिर लाना कोई नया बहाना है,
कत्ल करने के लिये तत्पर हैं जो लोग,
उनको है खूनखराबे का रोग,
कत्ल हुए बिना वह नहीं मानेंगे,
जिंदा रहे तो फिर बंदूक तानेंगे,
सज्जन होते हैं ज़माने में
असरदार उन पर ही मीठी बोली हो सकती है।
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कंप्यूटर पर लिखने का अपना तरीका-हिन्दी लेख (computer par hindi likhne ka apna tarika)


अंतर्जाल पर अगर लिखते रहें तो अच्छा है, पर पढ़ना एक कठिन काम है। दरअसल लिखते हुए दोनों हाथ चलते हैंे और आंखें बंद रहती हैं तब तो ठीक है क्योंकि तब सामने से आ रही किरणों से बचाव होने के साथ दोनों हाथों के रक्त प्रवाह का संतुलन बना रहता है।
लिखते हुए आंखें बंद करने की बात से हैरान होने की आवश्यकता नहीं है। अगर आपको टाईपराइटिंग का ज्ञान है और लिखते भी स्वतंत्र और मौलिक हैं तो फिर की बोर्ड पर उंगलियों और दिमाग का काम है आंखों से उसका कोई लेना देना नहीं है।
सच बात तो यह है कि कंप्यूटर पर काम करते हुए माउस थकाता है न कि की बोर्ड-अपने अनुभव से लेखक यही बात समझ सका है।
जब भी इस लेखक ने कंप्यूटर खोलकर सीधे लिखना प्ररंभ किया है तब लगता है कि आराम से लिखते जाओ। हिन्दी टाईप का पूरा ज्ञान है इसलिये उंगलियां अपने आप कीबोर्ड पर अक्षरों का चयन करती जाती हैं। एकाध अक्षर जब अल्ट से करके लेना हो तब जरूर कीबोर्ड की देखना पड़ता है वरना तो दो सो से तीन सौ अक्षर तो ं कब टंकित हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। हालत यह होती है कि सोचते हैं कि चार सौ शब्दों का कोई लेख लिखेंगे पर वह आठ सौ हजार तक तो पहुंच ही जाता है। यही वजह है कि अनेक बार कवितायें लिखकर काम चला लेते हैं कि कहीं गद्य लिखने बैठे तो फिर विषय पकड़ना कठिन हो जायेगा।
अगर कहीं माउस पकड़ कर अपने विभिन्न ब्लागों की पाठक संख्या देखने या अन्य ब्लाग पढ़ने का प्रयास किया तो दायां हाथ जल्दी थक जाता है। वैसे फायर फाक्स पर टेब से काम कर दोनों हाथ सक्रिय रखे जा सकते हैं पर तब भी आंखें तो खुली रखनी पड़ेंगी। फिर आदत न होने के कारण उसमें देर लगती है तब माउस से काम करने का लोभ संवरण नहीं हो पाता। वैसे एक कंप्यूटर विशारद कहते हैं कि अच्छे कंप्यूटर संकलक तथा संचालक कभी माउस का उपयेग नहंी करते। शायद वह इसलिये क्योंकि वह थकावट जल्दी अनुभव नहीं करते होंगे।
आंखें बंद कर टंकण करने का एक लाभ यह भी है कि आप सीधे अपने विचारों को तीव्रता से पकड़ सकते हैं जबकि आंखें खोलकर लिखने से एकाग्रता तो कम होती है साथ ही दूसरे विचार की प्रतीक्षा करनी पड़ती है और कभी कभी तो एक विचार निकल जाता है दूसरा दरवाजे पर खड़ा मिलता है। तब पहले को पकड़ने के चक्कर में दूसरा भी लड़खड़ा जाता है और वाक्य कुछ का कुछ बन जाता है। कंप्यूटर का सबसे अधिक असर आंखों पर पड़ता है पर एक हाथ माउस पकड़ना भी कम हानिकारक नहीं है। वैसे हमारे देश में लोग इस बात की परवाह कहां करते हैं। अधिकतर लोग पश्चिमी में अविष्कृत सुविधाजनक साधनों का उपयोग  तो करते हैं पर उससे जुड़ी सावधानियों को अनदेखा कर जाते हैं।
वैसे कंप्यूटर से ज्यादा हानिकारक तो हमें मोबाईल लगता है। उन लोगों की प्रशंसा करने का मन करता है तो उस पर इतने छोटे अक्षर देखकर टाईप करते हैं। उनकी स्वस्थ आंखें और हाथ देखकर मन प्रसन्न हो उठता है। उस एक मित्र ने हमसे कहा ‘यार, तुम्हारा मोबाईल बंद था, तब मैंने तुम्हें एसएमएस भेजा। तुमने कोई जवाब भी नहीं दिया।’
हमें आश्चर्य हुआ। उससे हमने कहा कि ‘मैं तो कभी मोबाईल पर मैसेज पढ़ता नहीं। तुमने अपने मैसेज में क्या भेजा था?’
‘तुम्हारे ब्लाग की तारीफ की थी। वहां कमेंट लिखने में शर्म आ रही थी क्योंकि वहां किसी ने कुछ लिखा नहीं था कि हम उसकी नकल कर कुछ लिख जाते। तुम्हारी पोस्ट एक नज़र देखी फिर उसे बंद कर दिया। तब ख्याल आया कि चलो तुम्हें एसएमएस कर देते हैं। किसी ब्लाग की एक लाख संख्या पार होने पर तुम्हारा पाठ था।’
हमने कहा‘अच्छा मजाक कर लेते हो!’
मित्र ने कहा‘ क्या बात करते हो। तुम्हारे साथ भला कभी मजाक किया है?’
हमने कहा-‘नहीं! मेरा आशय तो यह है कि तुमने अपने साथ मजाक किया। इतना बड़ा कंप्यूटर तुम्हारे पास था जिस पर बड़े अक्षरों वाला कीबोर्ड था पर तुमने उसे छोड़कर एक छोटे मोबाईल पर संदेश टाईप कर अपनी आंखों तथा हाथ को इतनी तकलीफ दी बिना यह जाने कि हम उस संदेश को पढ़ने का प्रयास करेंगे या नहीं।’

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चमक रहा है वही इंसान-हिन्दी शायरी


अपराध की कामयाबी से
तभी आदमी तक डोलता है
जब तक वह सिर चढ़कर नहीं बोलता है।
यह कहना ठीक लगता है कि
जमाना खराब है,
चमक रहा है वही इंसान
जिसके पास शराब और शबाव है,
मगर यह सच भी है कि
सभी लोग नहीं डूबे पाप के समंदर में,
शैतान नहीं है सभी दिलों में अंदर में,
भले इंसान के दिमाग में भी
ख्याल आता है उसूल तोड़ने का
पर कसूर की सजा कभी न कभी मिलती है जरूर
भला इंसान इस सच से अपनी जिंदगी तोलता है।
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विकास दर-मजदूर दिवस पर व्यंग्य कविता


चार मजदूर
रास्ते में ठेले पर सरिया लादे
गरमी की दोपहर
तेज धूप में चले जा रहे थे,
पसीने से नहा रहे थे।
ठेले पर नहीं थी पानी से भरी
कोई बोतल
याद आये मुझे अपने पुराने दिन
पर तब इतनी गर्मी नहीं हुआ करती थी
मेरी देह भी इसी तरह
धूप में जलती थी
पर फिर ख्याल आया
देश की बढ़ती विकास दर का
जिसकी खबर अखबार में पढ़ी थी,
जो शायद प्रचार के लिये जड़ी थी,
और अपने पसीने की बूंदों से नहाए
वह मजदूर अपने पैदों तले रौंदे जा रहे थे

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इसका नाम ही क्रिकेट है-हिन्दी व्यंग्य लेख


उफ! यह क्रिकेट है! इस समय क्रिकेट खेल को देखकर जो विवाद चल रहा है उसे देखते हुए दिल में बस यही बात आती है कि ‘उफ! यह क्रिकेट है!
इस खेल को देखते हुए अपनी जिंदगी के 25 साल बर्बाद कर दिये-शायद कुछ कम होंगे क्योंकि इसमें फिक्सिंग के आरोप समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपने के बाद मन खट्टा हो गया था पर फिर भी कभी कभार देखते थे। इधर जब चार वर्ष पूर्व इंटरनेट का कनेक्शन लगाया तो फिर इससे छूटकारा पा लिया।
2006 के प्रारंभ में जब बीसीसीआई की टीम-तब तक हम इसे भारत की राष्ट्रीय टीम जैसा दर्जा देते हुए राष्ट्रप्रेम े जज्बे के साथ जुड़े रहते थे-विश्व कप खेलने जा रही थी तो सबसे पहला व्यंग्य इसी पर देव फोंट में लिखकर ब्लाग पर प्रकाशित किया था अलबता यूनिकोड में होने के कारण लोग उसे नहीं पढ़ नहीं पाये। शीर्षक उसका था ‘क्रिकेट में सब कुछ चलता है यार!’
टीम की हालत देखकर नहंी लग रहा था कि वह जीत पायेगी पर वह तो बंग्लादेश से भी हारकर लीग मैच से ही बाहर आ गयी। भारत के प्रचार माध्यम पूरी प्रतियोगिता में कमाने की तैयारी कर चुके थे पर उन पर पानी फिर गया। हालत यह हो गयी कि उसकी टीम के खिलाड़ियों द्वारा अभिनीत विज्ञापन दिखना ही बंद हो गये। जिन तीन खिलाड़ियों को महान माना जाता था वह खलनायक बन गये। उसी साल बीस ओवरीय विश्व कप में भारतीय टीम को नंबर एक बनवाया गया-अब जो हालत दिखते हैं उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है क्योंकि क्रिकेट के सबसे अधिक ग्राहक (प्रेमी कहना मजाक लगता है) भारत में ही हैं और यहां बाजार बचाने के लिये यही किया गया होगा। उस टीम में तीनों कथित महान खिलाड़ी नहीं थे पर वह बाजार के विज्ञापनों के नायक तो वही थे। एक बड़ी जीत मिल गयी आम लोग भूल गये। कहा जाता है कि आम लोगों की याद्दाश्त कम होती है और क्रिकेट कंपनी के प्रबंधकों ने इसका लाभ उठाया और अपने तीन कथित नायकों को वापसी दिलवाई। इनमें दो तो सन्यास ले गये पर वह अब उस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में खेलते हैं। अब पता चला है कि यह प्रतियोगिता तो ‘समाज सेवा’ के लिये आयोजित की जाती है। शुद्ध रूप से मनोरंजन कर पैसा बटोरने के धंधा और समाज सेवा वह भी क्रिकेट खेल में! हैरानी होती है यह सब देखकर!
आज इस बात का पछतावा होता है कि जितना समय क्रिकेट खेलने में बिताया उससे तो अच्छा था कि लिखने पढ़ने में लगाते। अब तो हालत यह है कि कोई भी क्रिकेट मैच नहीं देखते। इस विषय पर देशप्रेम जैसी हमारे मन में भी नहीं आती। हम मूर्खों की तरह क्रिकेट देखकर देशप्रेम जोड़े रहे और आज क्रिकेट की संस्थायें हमें समझा रही हैं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। यह अलग बात है कि टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाओं जब भारत का किसी दूसरे देश से मैच होता है तो इस बात का प्रयास करते हैं कि लोगों के अंदर देशप्रेम जागे पर सच यह है कि पुराने क्रिकेट प्रेमी अब इससे दूर हो चुके हैं। क्रिकेट कंपनियों की इसकी परवाह नहीं है वह अब क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की आड़ में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव के दर्शक ढूंढ रहे हैं। इसलिये अनेक जगह मुफ्त टिकटें तथा अन्य इनाम देने के नाम कुछ छिटपुट प्रतियोगितायें होने की बातें भी सामने आ रही है। बहुत कम लोग इस बात को समझ पायेंगे कि इसमें जितनी बड़ी राशि का खेल है वह कई अन्य खेलों का जन्म दाता है जिसमें राष्टप्रेम की जगह राष्ट्रनिरपेक्ष भाव उत्पन्न करना भी शामिल है।
कभी कभी हंसी आती है यह देखकर कि जिस क्रिकेट को खेल की तरह देखा वह खेलेत्तर गतिविधियों की वजह से सामने आ रहा है। यह क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में ऊपर क्या चल रहा है यह तो सभी देख रहे हैं पर जिस तरह आज के युवा राष्ट्रनिरपेक्ष भाव से इसे देख रहे हैं वह चिंता की बात है। दूसरी बात जो सबसे बड़ी परेशान करने वाली है वह यह कि इन मैचों पर सट्टे लगने के समाचार भी आते हैं और इस खेल में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव पैदा करने वाले प्रचार माध्यम यही बताने से भी नहीं चूकते कि इसमें फिक्सिंग की संभावना है। सब होता रहे पर दाव लगाने वाले युवकों को बर्बाद होने से बचना चाहिेए। इसे मनोंरजन की तरह देखें पर दाव कतई न लगायें। राष्ट्रप्र्रेम न दिखायें तो राष्ट्रनिरपेक्ष भी न रहे। हम तो अब भी यही दोहराते हैं कि ‘क्रिकेट में सब चलता है यार।’

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